अग्नि पुराण — पृष्ठ 1021–1030
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1021–1030
पृष्ठ 1021
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०१७ अथाष्टाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः छन्दःसारः अग्निरुवाच ' छन्दो वक्ष्ये ' मूलजैस्तैः पिङ्गलोक्तं यथाक्रमम् । सर्वादिमध्यान्तगणौ ' ग्लौ भ्यो ज्रौ ' स्तौत्रिका गणाः ॥ १ ॥
' ह्रस्वो गुरुर्वा पादान्ते पूर्वयोगाद्विसर्गतः । अनुस्वाराद्व्यञ्जनात्स्याज्जिह्वामूलीयतस्तथा ॥२ ॥
उपध्मानीयतो दीर्घो " गुरुग्लौ नौ गणाविह । वसवोऽष्टौ च चत्वारो " वेदादीन्यादिलोकतः ' ॥३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये छन्दः सारकथनं नामाष्टाविंशत्य-धिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३२८ ॥
अध्याय ३२८ छन्दःसार अग्निदेव बोले - अब मैं वेद के मूलमन्त्रों के अनुसार पिङ्गलोक्त छन्दों का क्रमशः वर्णन करूँगा । ' मगण ', ‘ नगण ’, ‘ भगण ’, ‘ यगण ’, ' जगण ', ' रगण ', ' सगण ' और ' तगण'- ये आठ गण होते हैं । सभी गण तीन - तीन अक्षरों के हैं । इनमें ‘ मगण ' के सभी अक्षर गुरु और ' नगण ' के सब अक्षर लघु होते हैं । आदि गुरु होने से ' भगण ' तथा आदि लघु होने से ‘ यगण ' होता है । इसी प्रकार अन्त्य गुरु होने से ' सगण ' तथा अन्त्य लघु होने से ' तगण ' होता है । पाद के अन्त में वर्तमान ह्रस्व अक्षर विकल्प से गुरु माना जाता है । विसर्ग, अनुस्वार, संयुक्त अक्षर ( व्यञ्जन ), जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय से अव्यवहित पूर्व में स्थित होने पर ' ह्रस्व ' भी गुरु माना जाता है, दीर्घ तो गुरु है ही । गुरु का संकेत ' ग ' और लघु का संकेत ' ल ' है । ये ' ग ' और ' ल ' गण नहीं हैं । वसु शब्द आठ की और वेद चार की संज्ञा है, इत्यादि बातें लोक के अनुसार जाननी चाहिए ॥१-३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में छन्दःसार - कथन नामक तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त ॥३२८ ॥
१ क. ङ. छन्दान्वक्ष्ये । २ ख. ग. ' लशब्दैःपि । ३ क. ङ. न्नौ । ख. ग. म्रौ । ४ क. ङ. ज्मौ । ५ ख. ग. स्वो लघुर्वा । ६ ख. ग. ‘ रुलौ सगलावि । ७ ख. ग. ' दा इत्यादि । ८ छ. लोपतः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 1022
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०१८ अग्निपुराणम् अथैकोनत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः छन्दःसारः अग्निरुवाच छन्दोधिकारे गायत्री देवी चैकाक्षरा भवेत् । पञ्चदशाक्षरा सा स्यात्प्राजापत्याऽष्टवर्णिका ॥ | १ || यजुषां षडर्णा गायत्री साम्नां स्याद्वादशाशरा । ऋचामष्टादशार्णा स्यात्साम्नां वर्धेत च द्वयम् ॥२ ॥
ऋचां त्रयं च वर्धेत प्राजापत्याचतुष्टयम् । वर्धेदेकैककं शेषे आसुर्या एकमुत्सृजेत् || ३ || उष्णिगनुष्टुब्बृहती पंक्तिस्त्रिष्टुब्जगत्यपि । तानि ज्ञेयानि क्रमशो गायत्र्यो ब्राह्य एव ताः || ४ || तिस्रस्तिस्रः सनाम्न्य स्युरेकैका ' आर्य्यं एव च ' । प्राग्यजुषां च संज्ञाः स्युश्चतुःषष्टिपदे लिखेत् ॥५ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये छन्दः सारकथनं नामैकोनत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३२९ ॥
अध्याय ३२ ९ छन्दः सार अग्निदेव बोले- ( गायत्री छन्द के आठ भेद हैं - आर्षी, दैवी, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी, साम्नी, आर्ची तथा ब्राह्मी ) ‘ छन्द ' शब्द अधिकार में प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् इस पूरे प्रकरण में छन्द शब्द की अनुवृत्ति होती है । ' दैवी ’ गायत्री एक अक्षर की, ' आसुरी ' पन्द्रह अक्षरों की, ' प्राजापत्या ' आठ अक्षरों की, ' याजुषी ' छह अक्षरों की, ' साम्नी ' गायत्री बारह अक्षरों की तथा ' आर्ची ' अठारह अक्षरों की है । यदि साम्नी गायत्री में क्रमशः दो - दो अक्षर बढ़ाते हुए उन्हें छह कोष्ठों में लिखा जाय, इसी प्रकार आर्ची गायत्री में तीन - तीन, ' प्राजापत्या ' में चार - चार तथा अन्य गायत्रियों में अर्थात् दैवी और याजुषी में क्रमशः एक - एक अक्षर बढ़ जाय एवं आसुरी गायत्री का एक - एक अक्षर क्रमशः छह कोष्ठों में घटता जाय तो उन्हें ' साम्नी ' आदि भेदसहित क्रमशः उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् और जगती छन्द जानना चाहिए । याजुषी, साम्नी तथा आर्ची - इन तीन भेदोंवाले गायत्री आदि प्रत्येक छन्द के अक्षरों को पृथक् - पृथक् जोड़ने पर उन सबको ' ब्राह्मी गायत्री ', ' ब्राह्मी - उष्णिक् ' आदि छन्द याजुषी पहले जो दैवी, आसुरी और प्राजापत्या नामक तीन भेद हैं, उनके अक्षरों को जोड़ने पर जितने अक्षर होते हैं, वे ' आर्षी गायत्री ', ' आर्षी उष्णिक् ' आदि कहलाते हैं । समझने के लिए चौंसट कोष्ठों को लिखना चाहिए ॥१-५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में छन्द: सार - कथन नामक तीन सौ उन्तीसवाँ अध्याय १ क. ङ. “ दश्यासुरी रम्या प्राजा । २ क. ङ. ° र्धेद्द्वयं द्व ' । ३ क. ङ. ह्य्य देव ' । ४ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA समझना चाहिए । इसी प्रकार पृथक् - पृथक् छह कोष्ठों में इनमें दो को स्पष्ट रूप से समाप्त ॥३२९ ॥
छ. आर्य । ५ छ. च । ऋग्यौं ।
पृष्ठ 1023
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०१ ९ अथ त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः छन्दःसारः अग्निरुवाच पाद आपादपूरणे ' गायत्र्यो वसवः स्मृताः । ' त्रिष्टुभो रुद्राः पादः स्याच्छन्द एकादिपादकम् । ( रेसा गायत्री पादनिवृत्प्रतिष्ठाष्टाद्रिषट्त्रिपात् । ' गायत्र्यतिपादनिचृन्नागो नवनवर्तुभिः । द्विपादद्वादशवस्वर्णैस्त्रिपात्तु त्रैष्टुभैः स्मृतम् । ' ककुबुष्णिगष्टसूर्यवस्वर्णै " स्त्रिभिरेव सः परोष्णिक्परतस्तु स्याच्चतुष्पादृषिभिर्भवेत् " जगत्या आदित्याः पादो विराजो दिश ईरिताः ॥१ ॥
आद्यं चतुष्यादृतुभिस्त्रिपात्सप्ताक्षरैः क्वचित् ॥२ ॥
वर्धमाना षडष्टाष्टा त्रिपात्ष ' डष्टभूधरैः ॥३ ॥
वाराही " रसद्विरन्धैश्छन्दश्चाथ तृतीयकम् ॥४ ॥
उष्णिकुछन्दोऽष्टवस्वर्कैः पादैर्वेदे प्रकीर्तितः ॥५ ॥
। पुर उष्णिक्सूर्यवसुवस्वर्णैश्च त्रिपाद्भवेत् ) ॥ ६ ॥
। साष्टाक्षरैरनुष्टुप्स्याच्चतुष्पाच्च त्रिपात्क्वचित् ॥७ ॥
अध्याय ३३० छन्दः सार अग्निदेव बोले - पादपूर्ति तक ' पाद ' का अधिकार है । गायत्री के एक पाद में आठ अक्षर बताये गये हैं । जगती के एक पाद में बारह अक्षर, विराट् में एक पाद में दस अक्षर, त्रिष्टुप् के एक पाद में ग्यारह अक्षर होते हैं । छन्दों में एक और उससे अधिक पाद हो सकते हैं । प्रथम ( गायत्री ) छन्द छह - छह अक्षरवाले चार पादों से युक्त होता है । कहीं - कहीं इसमें सात - सात अक्षरों के तीन पाद भी होते हैं ॥१-२ ॥ यह गायत्री पाद निचृत् कहलाती है । यदि गायत्री के प्रथम पाद में आठ अक्षर, दूसरे में सात अक्षर और तीसरे में छह अक्षर हों तो उसे ' विपरीता ' गायत्री कहते हैं । इसमें तीन पाद होते हैं । ' वर्धमाना गायत्री ' उसे कहते हैं जिसके प्रथम पाद में छह अक्षर और शेष दो में आठ - आठ अक्षर होते हैं । जिस गायत्री के प्रथम पाद में छह, दूसरे में आठ और तीसरे में सात अक्षर होते हैं उसे ‘ अतिपादनिचृत् ’ गायत्री कहते हैं । जिस गायत्री के प्रथम दो पादों में नौ - नौ अक्षर और तीसरे में छह अक्षर होते हैं उसे ' नागी ' कहते हैं । किन्तु जिसके प्रथम पाद में छह अक्षर तथा दूसरे और तीसरे पाद में नौ - नौ अक्षर होते हैं उसे ' वाराही ' गायत्री कहते हैं ॥३-४ ॥ जब दो चरण आठ - आठ अक्षरों के और एक चरण बारह अक्षरों का हो तो वेद में उसे ‘ उष्णिक् ’ नाम दिया गया है । प्रथम और तृतीय चरण आठ अक्षरों के हों और बीच का द्वितीय चरण बारह अक्षरों का हो तो वह तीन पादों का ' ककुप् उष्णिक् ' नामक छन्द होता है । जब प्रथम चरण बारह अक्षरों का और द्वितीय - तृतीय चरण आठ - आठ अक्षरों के हों तो ' पुर उष्णिक् ' नामक तीन पादोंवाला छन्द होता है । जब प्रथम और द्वितीय चरण आठ - आठ अक्षरों के हों और तृतीय चरण बारह अक्षरों का हो तो ' परोष्णिक् ' छन्द होता है । सात-१ ख. ' पूरेण गा ' । २ छ. विष्णुतो । ३ ' सा त्रिपाद्भवेत् ' च. पुस्तके नास्ति । ४ छ. ' त्री पदे नीवृत्तत्प्रतिष्ठाद्रि ' । ५ छ. ' त्षड्वसुभू ' । ६ छ. ' यत्रीतिपदलीवृन्ना ' । ७ क. द्विनवकं वर्धमानर्त्वगष्टभिः । वस्वश्वषट्कवर्णैश्च ’ । छ. “ स्वर्णात्रिभि प्रतिष्ठा तु । प्रकीर्तिता ॥ द्वि । ८ क. ङ. पात्वर्णेर्जुनैः स्मृ । ९ ख. मनुष्टुप्सूर्य ' । '१० ख. ग. ' स्वर्णाङ्घ्रिभि ११ क. ङ. ' ष्पान्मुनिभिर्भ । छ. ' ष्षादात्रिभिः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 1024
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०२० अग्निपुराणम् अष्टार्कसूर्यवर्णैः स्यान्मध्येऽन्ते च क्वचिद्भवेत् । ' बृहती जगतस्त्रयो गायत्र्याः पूर्वको यदि || ८ || तृतीयः पथ्या भवति द्वितीया न्यङ्कुसारिणी । स्कन्धो ग्रीवा क्रौष्टके ' स्याद्यास्कस्योरो ' बृहत्यपि ॥९ ॥
उपरिष्टादब्रहत्यन्ते पुरस्ताद्बृहती पुनः । क्वचिन्नवकाश्चत्वारो दिग्विदिक्ष्वष्टवर्णिका ॥१० ॥
महाबृहती जागतैः स्यात्त्रिभिः सतो बृहत्यपि । ' ताण्डिनः पङ्क्तिश्छन्दः स्यात्सूर्यार्काष्टाष्टवर्णकैः ॥११ ॥
' पूर्वौ चेदयुजौ सतः पङ्क्तिश्च विपरीतकौ । प्रस्तारपङ्क्तिः पुरतः परादा ' ॰स्तारपङ्क्तिकः ॥१२ ॥
" विस्तारपङ्क्तिरन्तश्चेवहिः संस्तारपङ्क्तिका । अक्षरपङ्क्तिः पञ्चकाश्च चत्वारश्चाल्पशो द्वयम् ॥१३ ॥
सात अक्षरों के चार चरण होने पर भी ' उष्णिक् ' नामक छन्द होता है । आठ - आठ अक्षर के चार चरणों का ' अनुष्टुप् ' नामक छन्द होता है । ' अनुष्टुप् छन्द कहीं - कहीं तीन चरणों का भी होता है । ' त्रिपाद अनुष्टुप् ' दो तरह के होते हैं । एक तो वह है, जिसके प्रथम चरण में आठ तथा द्वितीय और तृतीय चरणों में बारह - बारह अक्षर होते हैं । दूसरा वह है, जिसका मध्यम अथवा अन्तिम पद आठ अक्षर का हो तथा शेष दो चरण बारह - बारह अक्षर के हों । यदि एक चरण ' जगती ' का ( अर्थात् बारह अक्षर का ) हो और शेष तीन चरण गायत्री के ( अर्थात् आठ - आठ अक्षरों के ) हों तो यह चार चरणों का ' बृहती छन्द ' होता है । इसमें भी जब पहले का स्थान तीसरा चरण ले ले अर्थात् वही जगती का पाद हो और शेष तीन चरण गायत्री के हों तो उसे ' पथ्याबृहती ' कहते हैं । जब पहलेवाला ' जगती ' का चरण द्वितीय पाद हो जाय और शेष तीन गायत्री के चरण हों तो ' न्यङ्कुसारिणी बृहती ' नामक छन्द होता है । आचार्य क्रोष्टुकि के मत में यह ( न्यङ्कुसारिणी ) ‘ स्कन्ध ' या ' ग्रीवा ' नामक छन्द है । यास्काचार्य ने इसे ही ' उरो बृहती ' नाम दिया है । जब अन्तिम ( चतुर्थी ) चरण ' जगती ' का हो और आरम्भ के तीन चरण गायत्री के हों तो ' उपरिष्टाद् बृहती ' नामक छन्द होता है । वही ‘ जगती ' का चरण जब पहले हो और शेष तीन चरण गायत्री छन्द के हों तो उसे ' पुरस्ताद् बृहती ' छन्द कहते हैं । वेद में कहीं - कहीं नौ - नौ अक्षरों के चार चरण दिखायी देते हैं । वे भी ' बृहती ' छन्द के अन्तर्गत हैं । जहाँ पहले दस अक्षर के दो चरण हों, फिर आठ अक्षरों के दो चरण हों, उसे भी ' बृहती छन्द ' कहते हैं । केवल ' जगती ' छन्द के तीन चरण हों तो उसे ‘ महाबृहती ’ कहते हैं । ताण्डी नामक आचार्य के मत में यही ' सतो बृहती ' नामक छन्द है ॥५-१०३ ॥ जहाँ दो पाद बारह - बारह अक्षरों के और दो आठ - आठ अक्षरों के हों, वहाँ ' पङ्क्ति ' नामक छन्द होता है । यदि विषम पाद, अर्थात् प्रथम और तृतीय चरण पूर्वकथनानुसार बारह - बारह अक्षरों के हों और शेष दोनों आठ - आठ अक्षरों के हों तो उसे ‘ सतः पङ्क्ति ' नामक छन्द कहते हैं । यदि वे ही चरण विपरीत अवस्था में हों, अर्थात् प्रथम - तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरों के और द्वितीय - चतुर्थ बारह - बारह अक्षरों के हों तो भी वह छन्द ' सत: पङ्क्ति ' ही कहलाता है । तब पहले के दोनों चरण बारह - बारह अक्षरों के हों और शेष दोनों आठ - आठ अक्षरों के हों तो उसे ' प्रस्तारपङ्क्ति ' कहते हैं । जब अन्तिम दो चरण बारह - बारह अक्षरों के हों और आरम्भ के दोनों आठ - आठ अक्षरों के हों तो ‘ आस्तारपङ्क्ति ’ नामक छन्द होता है । यदि बारह अक्षरोंवाले दो चरण बीच में हों और प्रथम और चतुर्थ चरण आठ - आठ अक्षरों के हों तो उसे ‘ विस्तारपङ्क्ति ' कहते हैं । यदि बारह अक्षरोंवाले दो चरण बाहर हों, अर्थात् प्रथम एवं चतुर्थ चरण के रूप में हों और बीच में द्वितीय - तृतीय चरण आठ - आठ अक्षरों के हों तो वह ' संस्तार - पङ्क्ति ' नामक छन्द होता है । पाँच - पाँच अक्षरों दिग्दिगष्टाष्ट १ क. “ तीजागतस्त्र ' । २ छ. गत्यस्त्र ' । ३ छ. स्कन्धौ । ४ छ. स्याद्यक्षे स्याद्द्वोनृ । ५ क. ङ. " स्योबृ । ६ ख. ग. " । ७ छ. मण्डिलः । ८ घ, ङ. च. ' व वेदयु ' । ध. ' वौं देवयु ' । ९ ख. ङ. पश्चादा ' । १० क. ङ. ' दास्वासप । ११ ‘ विस्तारपङ्क्ति संस्तारपङ्क्तिका ' नास्ति क. घ. ङ. पुस्तकेषु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 1025
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः पदपङ्क्तिः पञ्च भवेच्चतुष्कं षट्ककत्रयम् । एकेन त्रिष्टुब्ज्योतिष्मती तथैव जगतीरिता । उपरिष्टाज्ज्योतिरन्त्यादेकस्मिन्पञ्चके तथा । त्रिपादशिशुमध्या स्यात्सा पिपीलिकमध्यमा । ' भूरिजैकेनाधिकेन विहीना च चिराद्भवेत् । आदिपादान्निश्चयः स्याच्छन्दसां देवताः क्रमात् । १०२१ षट्कपञ्चीभर्गायत्रैः षड्भिश्च जगती भवेत् ॥१४ ॥
पुरस्ताज्ज्योतिः प्रथमे मध्येज्योतिश्च मध्यतः ॥ १५ ॥
भवेच्छन्दः शङ्कुमती षट्के छन्दः ककुद्मती ॥१६ ॥
विपरीता यवमध्या ' त्रिवृदेकेन वर्जिता ॥१७ ॥
स्वराट्स्याद्द्वाभ्यामधिकं संदिग्धे दैवतादितः ॥१८ ॥
( ' अग्निः सूर्यः शशी जीवो वरुणश्चन्द्र एव च ॥ १ ९ ॥ के चार पाद होने पर ‘ अक्षरपङ्क्ति ' नामक छन्द होता है । पाँच अक्षरों के दो ही चरण होने पर ' अल्पशः पङ्क्ति ' नामक छन्द कहलाता है । जहाँ पाँच - पाँच अक्षरों के पाँच पाद हों, वहाँ ' पदपङ्क्ति ' नामक छन्द जानना चाहिए । जब पहला चरण चार अक्षरों का, दूसरा छह अक्षरों का तथा शेष तीन पाद पाँच - पाँच अक्षरों के हों तो भी ' पदपङ्क्ति ' छन्द होता है । आठ-आठ अक्षरों के पाँच पादों को ‘ पथ्यापङ्क्ति ' नामक छन्द कहा गया है । आठ - आठ अक्षरों के छह चरण होने पर ‘ जगतीपङ्क्ति ' नामक छन्द होता है ॥११-१४ ॥ ' त्रिष्टुप् ' अर्थात् ग्यारह अक्षरों का एक पाद हो और आठ - आठ अक्षरों के चार पाद हों तो पाँच पादों का ' त्रिष्टुब्ज्योतिष्मती ' नामक छन्द होता है । इसी प्रकार जब एक चरण ' जगती ' का अर्थात् बारह अक्षरों का हो और चार चरण ' गायत्री ' के ( आठ - आठ अक्षरों के ) हों तो उस छन्द का नाम ' जगतीज्योतिष्मती ' होता है । यदि पहला ही चरण ग्यारह अक्षरों का हो और शेष चार चरण आठ - आठ अक्षरों के हों तो ' पुरस्ताज्ज्योति ' नामक त्रिष्टुप् छन्द होता है और यदि पहला ही चरण बारह अक्षरों का तथा शेष चार चरण आठ - आठ के हों तो ' पुरस्ताज्ज्योति ' नामक जगती छन्द होता है । जब मध्यम चरण ग्यारह अक्षरों और आगे - पीछे के दो - दो चरण आठ - आठ के हों तो ' मध्येज्योति ' नामक त्रिष्टुप् छन्द होता है, इसी प्रकार जब मध्यम चरण बारह का तथा आदि - अन्त के दो - दो चरण आठ - आठ के हों तो ' मध्येज्योति ' नामक जगती छन्द होता है । जब आरम्भ के चार चरण आठ - आठ अक्षरों के हों तथा अन्तिम चरण ग्यारह अक्षरों का हो तो उसे ‘ उपरिष्टाज्ज्योति ’ त्रिष्टुप् कहते हैं । इसी प्रकार जब आदि के चार चरण पूर्ववत् आठ - आठ के हों और अन्तिम पाद बारह अक्षरों का हो तो उसका नाम ' उपरिष्टाज्ज्योति ' जगती छन्द होता है । गायत्री आदि सभी छन्दों के एक पाद में यदि पाँच अक्षर हों तथा अन्य पादों में पहले के अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उस छन्द का नाम ' शङ्कुमती ’ होता है । जब एक चरण छह अक्षरों का हो और अन्य चरणों में पहले बताये अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उसका नाम ‘ ककुद्मती ' होगा । जहाँ तीन पादवाले छन्द के पहले और दूसरे चरण में अधिक अक्षर हों और बीचवाले में बहुत ही कम हों, वहाँ उस छन्द का नाम ' पिपीलिकमध्या ' होगा । इसके विपरीत जब आदि और अन्तवाले पादों के अक्षर कम हों और बीचवाला पाद अधिक अक्षरों का हो तो उस ' त्रिपादगायत्री ' आदि छन्द को ' यवमध्या ' कहते हैं । यदि ‘ गायत्री ' या ‘ उष्णिक् ' आदि छन्दों में केवल एक अक्षर की कमी हो उसकी ' निचृत् ' यह विशेष संज्ञा होती है । एक अक्षर की अधिकता होने पर वह छन्द ' भूरिक् ' नाम धारण करता है । इस प्रकार दो अक्षरों की कमी के कारण ' विराट् ' और दो अक्षर अधिक होने पर ' स्वराट् ' संज्ञा होती है । संदिग्ध अवस्था में आदि पाद के अनुसार छन्द का निर्णय करना चाहिए ॥१५-१८ ॥ इसी प्रकार देवता, स्वर, वर्ण तथा गोत्र आदि के द्वारा संदिग्ध स्थल में छन्द का निर्णय हो सकता है । गायत्री आदि छन्दों के देवता क्रमशः इस प्रकार हैं - अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति, मित्रावरुण, इन्द्र तथा विश्वेदेव । १ क. ङ. निछेदैकेन । ख. ग. निवृदेकेन । २ छ. ' भूमिजै ' । ३ छ. द्विहीना । ४'अग्निः क्रमात् ' नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 1026
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०२२ अग्निपुराणम् विश्वेदेवाश्च ' षड्जगत्याः स्वराः षड्जो वृशः क्रमात् ) । गान्धारो मध्यमश्चैव पञ्चमो धैवतस्तथा ॥ २० ॥
निषादो वर्णः श्वेतश्च सारङ्गश्च पिशङ्गकः । कृष्णो नीलो लोहितश्च गौरो गायत्रिमुख्यके ' ॥ २१ ॥
गोरोचनाभाः कृतयो ' ह्यतिपूछ ( च्छ ) न्दो हि श्यामलम् । अग्निर्वैश्यः काश्यपश्च गौतमाङ्गिरसौ क्रमात् ॥२२ ॥
भार्गवः कौशिकश्चैव वासिष्ठो गोत्रमीरितम् ॥२३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये छन्दः सारकथनं नाम त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३० ॥
अथैकत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः छन्दोजातिनरूपणम् अग्निरुवाच चतुःशतमुत्कृतिः स्यादुत्कृतेश्चतुरस्त्यजेत् । अभिसंख्या प्रत्यकृतिस्तानि च्छन्दांसि वै पृथक् ॥१ ॥
" कृतिश्चातिधृतिर्धात्री " अत्यष्टिश्चाष्टिरित्यतः । ' अतिशक्वरी शक्वरीति अतिजगती जगत्यपि ॥२ ॥
छन्दोऽत्र लौकिकं स्याच्च ‘ आर्षमात्रैष्टुभात्स्मृतम् । त्रिष्टुप्पङ्क्तिबृहती अनुष्टुबुष्णिगीरितम् ॥३ ॥
उक्त छन्दों के स्वर हैं - ‘ षड्ज ' आदि । उनके नाम क्रमश: ये हैं - षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद । श्वेत, सारंग, पिशङ्ग, कृष्ण, नील, लोहित ( लाल ) तथा गौर - ये क्रमशः गायत्री आदि छन्दों के वर्ण हैं । ' कृति ' नामवाले छन्दों का वर्ण गोरोचन के समान है और अतिच्छन्दों का वर्ण श्यामल है । अग्निवेश्य, काश्यप, गौतम, अङ्गिरा, भार्गव, कौशिक तथा वशिष्ठ - ये क्रमशः उक्त सात छन्दों के गोत्र बताये गये हैं ॥ १ ९ -२३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में छन्दःसार कथन - नामक तीन सौ तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३३० ॥
अध्याय ३३१ छन्दोजाति - निरूपण अग्निदेव बोले - एक सौ चार अक्षरों का ' उत्कृति ' छन्द होता है । ' उत्कृति ' छन्द में से चार - चार घटाते जायँ तो क्रमशः निम्नाङ्कित छन्द होते हैं- सौ अक्षरों की ' अभिकृति ', छानबे अक्षरों की ' संस्कृति ', बानबे अक्षरों की ‘ विकृति ’, अठासी अक्षरों की ' आकृति ', चौरासी अक्षरों की ' प्रकृति ', अस्सी अक्षरों की ' कृति ', छिहत्तर अक्षरों की ‘ अधिकृति ’, बहत्तर अक्षरों की ' धृति ', अड़सठ अक्षरों की ' अत्यष्टि ', चौंसठ अक्षरों की ' अष्टि ', साठ अक्षरों की ‘ अतिशक्वरी ’, छप्पन अक्षरों की ' शक्वरी ', बावन अक्षरों की अतिजगती तथा अड़तालीस अक्षरों की ' जगती ' होती है । यहाँ तक केवल वैदिक छन्द हैं । यहाँ से आगे लौकिक छन्द का अधिकार है । ' गायत्री ' से लेकर ' त्रिष्टुप् ' तक जो आर्षछन्द वैदिक छन्दों में गिनाये गये हैं, वे लौकिक छन्द भी हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं - त्रिष्टुप् ', पङ्क्ति, बृहती, अनुष्टुप्, उष्णिक् १ छ. षड्जाद्याः । २ क. ङ. ' यत्र्यमुच्यते गो ' । ३ ज्योतिश्छन्दो । ४ क. ङ. ' तिर्बृहती अ ' । छ. तिवृत्ती अ ' । ५ क. ङ. अष्टिप्रत्यष्टि ° । ६ क. ङ. छ. अतिशकरी । ७ क. ङ. छ. शर्करी । ८ क. ङ. आर्यामात्रैष्टतान्स्मृत ' । ख. ग. आर्यामात्रैस्थमस्मृत ं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 1027
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०२३ गायत्री स्यात्सुप्रतिष्ठा प्रतिष्ठा मध्यया सह । अत्युक्तात्युक्त आदिश्च ' एकैकाक्षरवर्जितम् ' ॥४ ॥
चतुर्भागो भवेत्पादो रेगणच्छन्दः ' प्रदर्श्यते । तावन्तः समुद्रा गणा ह्यादिमध्यान्तसर्वगाः ॥५ ॥
चतुर्वर्णाः पञ्च गणा आर्यालक्षणमुच्यते । स्वरार्धं च आर्यार्धं स्यादार्यायां ' विषमेण जः ॥६ ॥
षष्ठो जो न लघुर्वा स्याद्वितीयादिपदं नले । सप्तमेऽन्ते प्रथमा च द्वितीये पञ्चमे नले || ७ || अर्धे पदं प्रथमादि षष्ठ एको लघुर्भवेत् । त्रिषु गणेषु पादः स्यादार्या ' पञ्चार्धके स्मृता ॥८ ॥
विपुलान्यथ चपला गुरुमध्यगतौ च जौ । द्वितीयचतुर्थौ पूर्वे च चपला मुखपूर्विका ॥ ९ ॥
द्वितीये जघनपूर्वा चपलार्या प्रकीर्तिता ॥ ' उभयोर्महाचपला गीतवाद्यार्धतुल्यका ' ॥१० ॥
और गायत्री । गायत्री छन्द में क्रमशः एक - एक अक्षर की कमी होने पर ' सुप्रतिष्ठा ', प्रतिष्ठा ' ' मध्या ', ' अत्युक्तात्युक्त ' तथा ‘ आदि ' नामक छन्द होते हैं ॥१ - ४ ॥ छन्द के चौथाई भाग को ' पाद ' या ' चरण ' कहते हैं । पहले ' गणच्छन्द ' दिखलाया जाता है । चार लघु अक्षरों की गण संज्ञा होती है । ये गण पाँच हैं । कहीं आदि गुरु, कहीं मध्य गुरु, कहीं अन्त्य गुरु, कहीं सर्वगुरु और कहीं चारों अक्षर लघु होते हैं । अब आर्या का लक्षण बताया जाता है । साढ़े सात गणों की अर्थात् तीस मात्राओं की या तीस लघु अक्षरों की आधी ' आर्या ' होती है । आर्या छन्द के विषम गणों में जगण का प्रयोग नहीं होता । किन्तु छठा गण अवश्य जगण होना चाहिए अथवा वह नगण और लघु यानी सब - का - सब लघु भी हो सकता है । जब छठा गण सब - का - सब लघु हो तो उस गण के द्वितीय अक्षर से सुबन्त या तिङन्त लक्षण पद संज्ञा की प्रवृत्ति होती है । यदि छठा गण मध्य गुरु अथवा सर्व लघु हो सातवाँ गण भी सर्व लघु ही हो, तो सातवें गण के प्रथम अक्षर से ' पद ' संज्ञा की प्रवृत्ति होती है । इसी प्रकार जब आर्या के उत्तरार्ध भाग में पाँचवाँ गण सर्व लघु हो तो उसके प्रथम अक्षर से ही पद का आरम्भ होता है । आर्या के उत्तरार्ध भाग में छठा गण एकमात्र लघु अक्षर का होता है । जिस आर्या के पूर्वार्ध और उत्तरार्ध में तीन - तीन गणों के बाद पहले पाद का विराम होता है, उसे ' पथ्या ' माना गया है ॥५-८ ॥ जिस आर्या के पूर्वार्ध में या उत्तरार्ध में अथवा दोनों में तीन गणों पर पाद विराम नहीं होता, उसका नाम ' विपुला ' होता है । जिस आर्या छन्द में द्वितीय तथा चतुर्थ गण गुरु अक्षरों के बीच में होने के साथ ही जगण अर्थात् मध्यगुरु हों, उसका नाम ' चपला ' है । तात्पर्य यह है कि ' चपला ' नामक आर्या में प्रथम गण अन्त्यगुरु, तृतीय गण दो गुरु तथा पञ्चम गण आदि गुरु होता है । शेष गण पूर्ववत् रहते हैं । पूर्वार्ध में ' चपला ' का लक्षण हो तो उस आर्या का नाम ' मुखचपला ' होता है । परार्ध में चपला का लक्षण होने पर उसे जघनचपला कहते हैं । पूर्वार्ध और परार्ध - दोनों में चपला का लक्षण संघटित होता हो तो उसका नाम ' महाचपला ' है । जहाँ आर्या के पूर्वार्ध के समान ही उत्तरार्ध भी हो, तो उसे ‘ गीति ' नाम दिया गया है । तात्पर्य यह कि उसके उत्तरार्ध में भी छठा गण मध्यगुरु अथवा सर्वलघु करना चाहिए । उसी प्रकार जहाँ आर्या के उत्तरार्ध के समान ही पूर्वार्ध भी हो, उसे ' उपगीति ' कहते हैं । आर्या के पूर्वोक्त क्रम को विपरीत कर देने पर ‘ उद्गीति ' नाम पड़ता है । सारांश यह है कि उसमें पूर्वार्ध को उत्तरार्ध में और उत्तरार्ध को पूर्वार्ध में रखा जाता है । यदि पूर्वार्ध में आठ गण हों तो ' आर्यागीति ' नामक छन्द होता है । कोई विशेषता न होने से इसका उत्तरार्ध भी १ क. ङ. " कैकोत्तर ' । २ ख. ग. ' वर्धित ' । ३ क. ङ. गणछन्दं । ४ क. ङ. प्रशस्यते । ५ ख. ग. ' ते । भवेन्तः । ६ ख. ङ. ° मे नरः । ष ° । ७ ख. ग. ' ञ्चाब्द्यके । ८ क. ङ. ' ला शीतवार्यर्ध । ९ ख. ग. ‘ का । आद्येना ” । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 1028
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०२४ अग्निपुराणम् ' अन्त्येनार्थेनोपगीतिरुद्गीतिश्चोत्क्रमात्स्मृता ॥ ' अर्धे रक्षगणा आर्यागीतिच्छन्दोऽथ मात्रया ॥ ११ ॥
ग्वैतालीयं द्विशस्ता स्याच्चतुष्पादे समे नलः । वसवोऽन्ते वनगाश्च गोपुच्छं दशकं भवेत् ॥१२ ॥
भगणान्ता ' पातलिका शेषे परे च पूर्ववत् । साकं षड्वा मिश्रयुजि प्राच्यवृत्तिः प्रदर्श्यते ॥ १३ ॥
पञ्चमेन पूर्वासकं तृतीयेन सहस्रयुक् । उदीच्यवृत्तिराद्या स्याद्युगपच्च प्रवर्तकम् ॥१४ ॥
" अयुक् चारुहासिनी स्याद्युगपच्चान्तिका भवेत् । सप्तार्चिवसवश्चैव मात्रासमकमीरितम् ॥१५ ॥
१ ° भवेन्नलरमौ लश्च द्वादशो वानवासिका । " विश्लोकः पञ्चमाष्टौ मो चित्रा नवमकश्च लः ॥१६ ॥
परमुक्ते नोपचित्रा १२ पादाकुलकमित्यतः । १३ गीत्यार्यालोपश्चेत्सौम्या लपूर्वा ज्योतिरीरिता ॥१७ ॥
ऐसा ही समझना चाहिए । यहाँ भी छठे गण में मध्यगुरु और सर्वलघु - इन दोनों की प्राप्ति थी, उसके स्थान में केवल एक ' लघु ' का विधान है । अब ' मात्रा छन्द ' बतलाया जाता है जहाँ विषम, अर्थात् प्रथम और द्वितीय चरण में चौदह लघु ( मात्राएँ ) हों और सम - द्वितीय चतुर्थ चरणों में सोलह लघु हों तथा इनमें से प्रत्येक चरण के अन्त में रगण, एक लघु और एक गुरु हो तो ' वैतालीय ' नामक छन्द होता है । वैतालीय छन्द के अन्त में एक गुरु और बढ़ जाय तो उसका नाम ' औपच्छन्दसक ' होता है ॥९ - १२ ॥ पूर्वोक्त वैतालीय छन्द के प्रत्येक चरण के अन्त में जो रगण, लघु और गुरु की व्यवस्था की गयी है, उसकी जगह यदि भगण और दो गुरु हो जायँ तो उस छन्द का नाम ' आपातलिका ' होता है । उपर्युक्त वैतालीय छन्द के अधिकारों में जो रगण आदि के द्वारा प्रत्येक चरण के अन्त में आठ लकारों ( मात्राओं ) का नियम किया गया है, उनको छोड़कर प्रत्येक चरण में जो ' लकार ' शेष रहते हैं उनमें से सम लकार विषम लकार के साथ मिल नहीं सकता । अर्थात् दूसरा तीसरे के और चौथा पाँचवें के साथ संयुक्त नहीं हो सकता; उसे पृथक् ही रखना चाहिए । इससे विषम लकारों का सम लकारों के साथ मेल अनुमोदित होता है । द्वितीय और चतुर्थ चरणों में लगातार छह लकार पृथक् - पृथक् नहीं प्रयुक्त होने चाहिए । प्रथम और तृतीय चरणों में रुचि के अनुसार किया जा सकता है । अब ' प्राच्यवृत्ति ' नामक वैतालीय छन्द का दिग्दर्शन कराया जाता है । जब दूसरे को चौथे चरण में चतुर्थ लकार ( मात्रा ) पञ्चम लकार के साथ संयुक्त हो तो उसका नाम ' प्राच्यवृत्ति ' होता है । शेष लकार पूर्वोक्त प्रकार से ही रहेंगे । जब प्रथम और तृतीय चरण में दूसरा लकार तीसरे के साथ मिश्रित होता है, तब ‘ उदीच्यवृत्ति ' नामक वैतालीय कहलाता है । शेष लकार पूर्वोक्त रूप में ही रहते हैं । जब दोनों लक्षणों की एक साथ ही प्रवृत्ति हो, अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ पादों में पंचम लकार के साथ चौथा मिल जाय और प्रथम एवं तृतीय चरणों में तृतीय के साथ द्वितीय लकार संयुक्त हो जाय तो ' प्रवृत्तिक ' नामक छन्द होता है । जिस वैतालीय छन्द के चारों चरण विषम पादों के ही अनुस्वार हों, अर्थात् प्रत्येक पाद चौदह लकारों से युक्त हो तथा द्वितीय लकार तृतीय से १ क. ङ. अनन्तेनो ' । २ क. ङ. ' र्घे च. ख. गणमार्या ' । ख. ग. र्धे वसुगण आ ' । ३ ख. ग. ' ली पङ्क्ति सुरास्या ' । ४ छ. द्विस्वरा स्यादयुष्पारौं । ५ ' क. ङ. ' वो तेन नागा ' । ६ छ. पाटलिका । ७ ख. ग. अमुकचारहा ' । ८ क. ङ. ' युष्मारु " । ९ क. ङ. ' त् । गताद्विर्व । ख. ग. ' त् । गतादिर्व ' । १० क. ङ. ' वेत्तु नवमो नश्च द्वास्योवामन । ११ क. ङ. विष्णोः कपञ्चमाष्टौमोचित्रनवमकश्चनः । प ° । १२ क. ख. ङ. ' पवित्रा । १३ क. ङ. ' लोगश्वेत्सौम्या नः पूर्वो ज्यो ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 1029
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०२५ स्याच्छिखा ' विपर्यस्तार्धा तूलिका समुदाहृता । एकोनत्रिंशदन्ते गः स्याज्ज्ञेन ' न समावला ' ॥१८ ॥
' गु इत्येकगुरुं संख्या वर्णादेश्च ' विपर्ययात् ॥१९ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये छन्दोजातिनिरूपणं नामैकत्रिंशदधिक-त्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३१ ॥
मिला हो, उसे ‘ चारुहासिनी ' कहते हैं । जब चारों चरण सम पादों के लक्षण से युक्त हों, अर्थात् सब में सोलह लकार ( मात्राएँ ) हों और चतुर्थ लकार पञ्चम में मिला हो तो उसका नाम ' अपरान्तिका ' है । जिसके प्रत्येक पाद में सोलह लकार हों, किन्तु पाद के अन्तिम अक्षर गुरु ही हों, उसे ' मात्रासमक ' नामक छन्द कहा गया है । साथ ही इसी छन्द में नवम लकार किसी से मिला नही रहता । जिस ' मात्रासमक ' के चरण में बारहवाँ लकार अपने स्वरूप में ही स्थित रहता है; किसी में मिलता नहीं, उसका नाम ' वानवासिका ' है । जिसके चारों चरणों में पाँचवाँ और आठवाँ लकार लघुरूप में ही स्थित रहता है, उसका नाम ' विश्लोक ' है । जहाँ नवाँ भी लघु हो, वह ' चित्रा ' नामक छन्द कहलाता है । जहाँ नवाँ लकार दसवें के साथ मिलकर गुरु हो गया हो, वहाँ ' उपचित्रा ' नामक छन्द होता है । मात्रासमक, विश्लोक, वानवासिका, चित्रा और उपचित्रा, इन पाँचों में जिस किसी भी छन्द के एक - एक पाद को लेकर जब चार चरणों का छन्द बनाया जाय, तब उसे ' पादाकुलक ' कहते हैं । जिसके प्रत्येक चरण में सोलह लघु स्वरूप ही स्थित हों, किसी से मिलकर गुरु न हो गये हों, उस छन्द का नाम ' गीत्यार्या ' है । इसी ' गीत्यार्या ' में जब आधे भाग की सभी मात्राएँ गुरु रूप में हों और आधे भाग की मात्राएँ लघु रूप में हों तो उसका नाम ' शिखा ' होता है । इसी के दो भेद हैं - पूर्वार्ध भाग में लघु - ही - लघु और उत्तरार्ध में गुरु - ही - गुरु हों तो उसका नाम ' ज्योति ' बताया गया है । इसके विपरीत पूर्वार्ध भाग में सब गुरु और उत्तरार्ध में सब लघु हों तो ' सौम्या ' नामक छन्द होता है । जब पूर्वार्ध भाग में उन्तीस लकार और उत्तरार्ध में इकतीस लकार हों एवं अन्तिम दो लकारों के स्थान में एक - एक गुरु हो तो उसका नाम ' तूलिका ' होता है । छन्द की मात्राओं से उसके अक्षरों में जितनी कमी गुरु की संख्या में हो, उतनी लघु संख्या मानी गयी है । तात्पर्य यह है कि यदि कोई पूछे तो उस आर्या को लिखकर उसकी सभी मात्राओं की गणना करके कहीं लिख ले, फिर अक्षरों की संख्या लिख ले । मात्रा के अंकों में अक्षरों के अंक घटा दे, जितना बचे वह गुरु की संख्या हुई । इसी प्रकार अक्षर संख्या में गुरु की संख्या घटा देने पर जो बचे, वह लघु अक्षरों की संख्या होगी । इस प्रकार वर्ण आदि के अन्तर में गुरु - लघु आदि का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए ॥१३-१९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में छन्दोजाति - निरूपण - कथन नामक तीन सौ इकतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ ३३१ ॥
१ क. ङ. विस्तरार्धा । २ क. ङ. गुप्तिका । ख. ग. मूलिका । ३ क. ङ. एकेन विंशदन्ते शः स्याजननसमहाबलाः । गु ' । ४ ग. ' ज्ज्ञेजन । ५ क. ङ. " ला । लई इत्येवं गुरुसं । ६ ख. ग. ग । ७ ° र्णाद्दशवि ” । ८ छ. “ देशवि ” । ६५ EC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 1030
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०२६ अग्निपुराणम् अथ द्वात्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः विषमकथनम् अग्निरुवाच वृत्तं समं चार्धसमं विषमं च त्रिधा वदे । समं ' तावत्कृत्वकृतमर्ध ' समं च कारयेत् ॥ १ ॥
विषमं चैव वा स्यूनमतिवृत्तं समान्यपि । लग्नौ चतुष्प्रमाणी स्यादाभ्यामन्यद्वितानकम् ॥२ ॥
* पादस्याऽऽद्यं तु वक्त्रं स्यात्सनौ न प्रथमा स्मृतौ । वान्यमुश्चतुर्थाद्वर्णात्पथ्यावक्त्रं स्वयोजतः || ३ || विपरीतपथ्या न्यासाच्चपला वायुजस्वनः । ' विपुल ' युग्मसप्तमः सर्वे तस्यै तस्य च ॥४ ॥
भौतो वा विपुलानेका वक्त्रजाति: समीरिता । भवेत्पदं चतुरूर्ध्वं चतुर्वृद्धया पदेषु च ॥५ ॥
अध्याय ३३२ विषम - कथन अग्निदेव बोले - वृत्त के तीन भेद बतलाये गये हैं - सम, अर्धसम और विषम । सम ( वृत्त की संख्या ) को उतने से गुणित करके अर्धसम ( की संख्या ) को उतने से ही गुणन करके विषम वृत्त की संख्या निकल आती है । विषम वृत्त अथवा अर्धसम वृत्त को एक राशि से कम करना चाहिए । जो वृत्त गकार और लकार से समाप्त होता है उसे ' समानी ' कहते हैं और जो लकार और गकार से समाप्त होता है उसे ' प्रमाणी ' कहते हैं । इन ( समानी और प्रमाणी नामक वृत्तों ) से भिन्न वृत्त वितान कहलाता है ॥१ २ । ' वक्त्र ' नामक छन्द के प्रत्येक पाद में आठ अक्षर होते हैं । वक्त्र में किसी भी पाद के प्रथम अक्षर के बाद सगण और नगण का प्रयोग नहीं करना चाहिए । पथ्यावक्त्र पूर्वोक्त ( वृत्त ) का ही परिवर्तित रूप है जिसके प्रत्येक पाद में आठ अक्षर होते हैं । जिस वक्त्र में ( द्वितीय और चतुर्थ ) युग्म पाद के चतुर्थ अक्षर के बाद जगण का प्रयोग किया जाता है उसे पथ्यावक्त्र कहते हैं । कुछ आचार्यों के मत से उक्त लक्षण की विपरीतता में भी ' पथ्या ' नामक छन्द होता है । जिस छन्द में अयुग्म ( प्रथम, तृतीय ) पाद में चतुर्थ अक्षर के बाद नगण होता है और युग्म पाद में यगण होता है उसे ' चपला ' कहते हैं । जब युग्म ( द्वितीय और चतुर्थ ) पादों में सप्तम वर्ण लघु होता है तब ' विपुला ' नामक छन्द बनता है । कुछ आचार्यों के मत में अयुग्म ( प्रथम, तृतीय ) और युग्म ( द्वितीय, चतुर्थ ) सर्वत्र सप्तम वर्ण लघु होना चाहिए । विपुला के अयुग्म पादों में कभी-कभी चतुर्थ अक्षर के बाद भगण अथवा तगण भी आ सकते हैं । इन प्रकार वक्त्र जाति की ' विपुला ' अनेक प्रकार की कही गयी है । ( अनुष्टुप् ) पाद के बाद में प्रत्येक पाद में जहाँ पर चार - चार अक्षरों की वृद्धि हो जाती है उसे ‘ पदचतुरूर्ध्व ’ नामक छन्द कहते हैं । चारों पादों के अन्त में दो गुरु अक्षर आने पर ' आपीड ' नामक छन्द बनता है, १ ख. ग. “ वद् हृदुहृतमर्धस ’ । च. ' वद् हृदुत्कृतधर्मस ' । २ क. ङ. " त्कृद्वहृदमर्धस ' । ३ ख़. ग. “ पि । गलौच । च. ' पि । नगौ च ं । ४‘पादस्याऽऽद्यं ° इत्यत्र पाठोऽयं क. ख. पुस्तकयोः “ यादष्टं नष्टवत्कं स्यात्मनौ तत्प्रथमा स्मृतौ । वान्यद्यश्वयथा वर्णापख्यावक्त्रं युयोज न इति । ” ५ विपुला “ इत्यत्र क. ङ. पुस्तकयोः " विपुलायुग्मसयूर्माः सर्वतः सैवतस्य च ' इति । ६ ख. ग. ' लाप्रश्नस । ७ ख. ग. च. डौ तौ वा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA