अग्नि पुराण — पृष्ठ 1051–1060

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1051–1060

पृष्ठ 1051

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एकोनचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०४७ इष्टप्राप्तेरुपचितः संपदाभ्युदयो धृतिः भवेद्विषादो दैवादेर्विघातोऽभीष्टवस्तुनि चित्तेन्द्रियाणां स्तैमित्यमपस्मारोऽनवस्थिति: क्रोधस्याप्रशमो ऽमर्षः प्रबोधश्चेतनोदयः रोषतो गुरुवाग्दण्डपारुष्यं विदुरुग्रताम् अनिबद्धप्रलापादिरुन्मादो मदनादिभिः कविभिर्योजनीया वै भावाः काव्यादिके रसाः विभावो नाम स द्वेधाऽऽलम्बनोद्दीपनात्मकः आलम्बनविभावोऽसौ नायकादिभवस्तथा धीरप्रशान्त इत्येवं चतुर्धा नायकः स्मृतः पीठमर्दो विटश्चैव विदूषक इति त्रयः पीठमर्दस्तु कलशः श्रीमांस्तद्देशजो विटः । गर्वः परेष्ववज्ञानमात्मन्युत्कर्षभावना ॥२९ ॥

। औत्सुक्यमीप्सिताप्राप्तेर्वाञ्छया तरला स्थितिः ॥ ३० ॥

। ' युद्धे व्याधादिभिस्त्रासो वीप्सा चित्रचमत्कृतिः ॥ ३१ ॥

। अवहित्थं भवेद्गुप्तिरिङ्गिताकारगोचरा ॥३२ ॥

॥ ऊहो वितर्कः स्याद्व्याधिर्मनोवपुरवग्रहः ॥३३ ॥

। तत्त्वज्ञानादिना चेतः कषायोपरमः शमः ॥३४ ॥

। विभाव्यते हि रत्यादिर्यत्र येन विभाव्यते ॥ ३५ ॥

। रत्यादिभाववर्गोऽयं यमाजीव्योपजायते ॥ ३६ ॥

। धीरोदात्तो ' धीरोद्धतः स्याद्धीरललितस्तथा ॥ ३७ ॥

। अनुकूलो दक्षिणश्च शठो धृष्टः प्रवर्तितः ॥ ३८ ॥

। शृंगारे नर्मसचिवा नायकस्यानुनायकाः ॥३९ ॥

। विदूषको वैहसिक अ ( स्त्व ) ष्ट नायकनायिकाः ॥४० ॥

भावना को धृति कहते हैं । आत्मोत्कर्ष की भावना से दूसरों के तिरस्कार करने या अनादर करने को गर्व कहते हैं । किसी दैवी कारण से प्रिय वस्तु के विनाश से जो आघात पहुँचता है उसे विषाद कहते हैं । ईप्सित वस्तु की प्राप्त्यर्थ जो मन की चंचल अवस्था होती है उसे औत्सुक्य कहते हैं । चित्त की जड़ता और इन्द्रियों की विक्षुब्धावस्था को अपस्मार कहते हैं । युद्ध में अथवा व्याघ्रादि से होनेवाले भय में जो आश्चर्य होता है उसे वीप्सा कहते हैं ॥२९-३१ ॥ क्रोध के शान्त न होने को ' अमर्ष ' कहते हैं । चेतना के उदय का नाम ' प्रबोध ' है । जब रहस्य इङ्गित और आकार के द्वारा स्पष्ट होता है तो उसे अवहित्था कहते हैं । क्रोध से परुष असंगत शब्दावली के प्रयोग को उग्रता कहते हैं । किसी प्रस्तुत समस्या के आधार पर तर्क - वितर्क की सम्भावना ' ऊहा ' है । मन और शरीर की जड़ता को व्याधि कहते हैं । कामादि दशा के कारण जो अन्तर्गत प्रलाप किया जाता है उसे ' उन्माद ' कहते हैं । तत्त्वज्ञानादि के कारण चित्त की संसार से उदासीनता को शम कहते हैं ॥ ३२-३४ ॥ कवियों को चाहिए कि वे काव्य आदि में भावों को सम्बन्धी रसों के साथ संयोजित करें । रत्यादि भावों ( स्थायी ) के कारण रस उत्कर्ष को पहुँचकर अनुभूति का विषय बनता है । विभाव के आलम्बन और उद्दीपन दो भेद होते हैं । रत्यादि स्थायी भावों का वर्ग इस आलम्बन का ही उपजीवी होता है । यह आलम्बन विभाव नायकादि में ही होता है अथवा नायकादि को आलम्बन विभाव कहते हैं । धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित, धीरप्रशान्त - ये नायक के चार भेद किये गये हैं । प्रत्येक भेद के अनुकूल, दक्षिण, शठ, धृष्ट - ये चार उपभेद होते हैं ॥ ३५-३८ ॥ शृङ्गार रस में नायक को नायिका से मिलाने में तीन सहायक कहे गये हैं - पीठमर्द, विट और विदूषक ॥३ ९ ॥ पीठमर्द नायक का कुशल सहायक होता है, विट उसका तद्देशज ( अन्तरंग ) मित्र होता है और विदूषक विनोदी सहायक । नायक और नायिका के प्रमुख आठ - आठ भेद हैं ॥४० ॥ कौशिक के

१ क. ङ. ' द्धेज्यावादि । २ ख. ग. ' काबिभ । ३ क. ङ. ' दिरसस्त । ४ क. ङ. धीरवृत्तः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1052

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१०४८ अग्निपुराणम् स्वकीया परकीया च पुनर्भूरिति कौशिकाः । उद्दीपनविभावास्ते संस्कारैर्विविधैः स्थिताः । चतुः षष्टिकला द्वेधा ' कर्माद्यैर्गीतिकादिभिः । आलम्बनविभावस्य भावैरुदबुद्धसंस्कृतैः । आरम्भ एव विदुषामनुभाव इति स्मृतः । मनोव्यापारभूयिष्ठो मनआरम्भ उच्यते । शोभा विलासो माधुर्यं स्थैर्यं गम्भीर्यमेव च नीचनिन्दोत्तमस्पर्धा शौर्यं दाक्षा ( क्ष्या ) दिकारणम् । भावो हारश्च हेला च शोभा कान्तिस्तथैव च स्थैर्यं गम्भीरता स्त्रीणां विभावा द्वादशेरिताः वाचो युक्तिर्भवेद्वागारम्भो द्वादश एव सः विलापो दुःखवचनमनुलापोऽसकृद्वचः सामान्या न पुनर्भूरि इत्याद्या बहुभेदतः ॥ ४१ ॥

आलम्बनविभावेषु भावानुद्दीपयन्ति ये ॥४२ ॥

कुहकं स्मृतिरप्येषा प्रायो हासोपहारकः ॥ ४३ ॥

मनोवाग्बुद्धिवपुषां स्मृतीच्छाद्वेषयत्नतः ॥ ४४ ॥

स चानुभूयते चात्र भवत्युत निरुच्यते ॥ ४५ ॥

द्विविधः पौरुषः स्त्रैण ईदृशोऽपि प्रसिध्यति ॥ ४६ ॥

। ललितं च तथौदार्यं तेजोऽष्टाविति पौरुषाः ॥ ४७ ॥

मनोधर्मे भवेच्छोभा शोभते भवनं यथा ॥। ४८ ॥ । दीप्तिर्माधुर्यशौर्ये च प्रागल्भ्यं स्यादुदारता ॥ ४ ९ ॥ । भावो विलासो हावः स्याद्भावः किंचिच्च हर्षजः ॥५० ॥

। तत्र भाषणमालापः प्रलापो वचनं बहु ॥ ५१ ॥

। संलाप उक्तप्रत्युक्तमपलापोऽन्यथा वचः ॥ ५२ ॥

मत में नायिकाएँ तीन प्रकार की हैं- स्वकीया, परकीया और पुनर्भू । कई विद्वानों के विचार में सामान्या नायिका होती है, पुनर्भू नहीं होती । इस प्रकार नायिका के अनेक भेद हैं । इन विविध नायिकाओं में उद्दीप्त करनेवाले संस्कार रहते हैं जो आलम्बन विभावों में विविध भावों को उद्दीप्त कर देते हैं ॥४१-४२ ॥ चौंसठ कलाओं के दो भाग हैं कर्मादि ( अभिनय ) और गीतादि । इनकी छलपूर्वक की गयी स्मृति भी प्राय: हास्य लानेवाली होती है ॥ ४३ ॥ मन की स्मृति

से, वाणी की इच्छा से, बुद्धि की प्रेरणा से एवं शरीर के यत्न से आलम्बन विभाव के उद्बुद्ध एवं परिष्कृत भावों के आरम्भ को विद्वानों ने अनुभाव कहा है । क्योंकि इसका अनुभव किया जाता है । इसीलिए इसे अनुभाव कहा जाता है ॥४४-४५ ॥ मानसिक व्यापारों के आधिक्य को ही ' मन आरम्भ ' कहा जाता है । वे दो प्रकार के होते हैं पुरुष के और स्त्री के ॥४६ ॥ पुरुष में रहनेवाले भाव आठ प्रकार के होते हैं । शोभा, विलास, माधुर्य, स्थैर्य, गाम्भीर्य,

ललित, औदार्य, तेज ॥४७ ॥ शूरता और दक्षता ( चतुरता ) आदि के कारण नीचों की निन्दा, उत्तम जनों के प्रति

स्पर्धा की शोभा ( मनो व्यापार ) कहते हैं । इससे व्यक्ति की शोभा इस प्रकार होती है जैसे प्रसाधनों से भवन की । भाव, हेला, हार, शोभा, कान्ति, दीप्ति, माधुर्य, शौर्य, प्रागल्भ्य या प्रगल्भता, उदारता, स्थिरता, गम्भीरता — ये बारह प्रकार के विभाव स्त्रियों के माने गये हैं ॥४८-४९ ३ ॥ भाव के विलास को ही हाव कहते हैं । इसमें हर्ष रहता है । वचनवक्रता को ही वागारम्भ कहते हैं और वह बारह प्रकार का होता है ॥५०-५० ३ ॥ पारस्परिक भाषण को आलाप कहा गया है । वचनाधिकता या अधिक बोलने को प्रलाप कहते हैं । दुःख में कथित वचन विलाप होते हैं । अनुलाप बात को बार - बार कहने को कहते हैं । संलाप आपस में उक्ति - प्रत्युक्तिपूर्वक कथित वचनों को कहते किसी में रहस्य को छिपाकर इधर - उधर या व्यर्थ की बातें की जायँ ॥५१-५२ हैं जबकि अपलाप ॥ परस्पर ज्ञात किसी बात को दूसरों तक १ ख. ग. ' र्भूव इत्या । २ ख. ग. स्मृताः । ३ ख. ग. ° धा प्रवाद्यैर्गीतका । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1053

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चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०४ ९ वार्ता प्रमाणं संदेशो निर्देशः प्रतिपादनम् । तत्त्वदेशोऽतिदेशोऽयमपदेशो ऽन्यवर्णनम् ॥५३ ॥

उपदेशश्च शिक्षावाग्व्याजोक्तिर्व्यपदेशकः ' । बोधाय एष व्यापारः सुबुद्धयारम्भ इष्यते ॥ तस्य भेदास्त्रयस्ते च रीतिवृत्तिप्रवृत्तयः ॥५४ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये शृङ्गारादिरसनिरूपणं नामैकोनचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३ ९ ॥ अथ चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः रीतिनिरूपणम् अग्निरुवाच वाग्विद्यासंप्रतिज्ञाने रीतिः साऽपि चतुर्विधा । पाञ्चाली गौडदेशीया वैदर्भी लाटजा तथा ॥१ ॥

उपचारयुता मृद्वी पाञ्चाली ह्रस्वविग्रहा । अनवस्थितसंदर्भा गौडीया दीर्घविग्रहा ॥२ ॥

उपचारैर्न " बहुभिरुपचारैर्विवर्जिता । नातिकोमलसंदर्भा वैदर्भी मुक्तविग्रहा ॥३ ॥

लाटीया स्फुटसंदर्भा ' नातिविस्फुरविग्रहा । परित्यक्ताऽभिभूयोऽपि रुपचारैरुदाहृता (? ) ॥४ ॥

पहुँचाने का नाम सन्देश है, जब कि किसी एक को क्रियात्मक रूप देने का नाम निर्देश है । अन्य वस्तु के वर्णन को तत्त्वदेश, अतिदेश व्याजोक्ति को व्यपदेश करते हैं ॥५५ ॥

श्री अग्निमहापुराण अग्निदेव बोले और उपदेश कहते हैं ॥ ५३ ॥ किसी बात का वाणी द्वारा कथन उपदेश कहलाता है जबकि

कहते हैं । इस वाग्विद्या के सम्यग्ज्ञान के लिए विद्वान् इसके रीति, वृत्ति, प्रवृत्ति - ये तीन भेद में शृङ्गारादिरस - निरूपण - कथन नामक तीन सौ उन्तालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३३ ९ ॥ अध्याय ३४० रीतिनिरूपण - वाग्विद्या का पूर्ण ज्ञान कराने में रीति का स्थान निर्विवाद है । इसके पाञ्चाली, गौड़ी, वैदर्भी और लाटी ( लाटजा ) चार भेद हैं ॥१ ॥ पाञ्चाल रीति में छोटे - छोटे विग्रह ( समास ) होने चाहिए और वह कोमल

तथा अलंकृत भाषा से संयुक्त हो । गौड़ी रीति में लम्बे - लम्बे समास हों और सन्दर्भ अनवस्थित ( क्षीण सम्बन्ध ) हों ॥२ ॥ वैदर्भी रीति में न तो अधिक अलंकृत भाषा का प्रयोग हो और न अलंकृत प्रयोग से वह सर्वथा हीन ही

हो । इसमें अति कोमल शब्दावली का प्रयोग न हो और वह समास से भी रहित होनी चाहिए ॥३ ॥ लाटी रीति में

वाक्य सीधे और सरल होने चाहिए जबकि समास अत्यन्त स्फुट न हो । भाषा का अनावश्यक अलंकरण इसमें नहीं होना चाहिए । यह अधिक लाक्षणिक तत्त्वों से रहित हो ॥४ ॥ क्रियाओं ( नायकादि के कार्यों ) में नियमपूर्वक व्यवहार

१ क. ङ. ' त्त्वदोषोऽर्तिदोषोऽयम ' । २ क. ग. ' कः । वाचोऽपदेशोव्या ' । ३ ख. ग. ' डीस्थाद्दीर्घ ' । ४ क. ङ. च. ' चारविव ' । ५ च. ' स्फुटवि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1054

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१०५० अग्निपुराणम् ' क्रियास्वविषमा वृत्तिभारत्यारभटी तथा वाक्प्रधाना नरप्राया स्त्रीयुक्ता प्राकृतोक्तिता ( ` चत्वार्यङ्गानि भारत्या वीथी प्रहसनं तथा उद्घातकं तथैव ' स्याल्लपितं स्याद्द्वितीयकम् ) व्याहारस्त्रिमतं चैव " च्छलावस्कन्दिते तथा । तापसादेः प्रहसनं परिहासपरं वचः संक्षिप्तकारपातौ च वस्तूत्थापनमेव च इत्यादिमहापुराण आग्नेये रीतिनिरूपणं । २ ( कौशिकी सात्त्वती चेति सा चतुर्धा प्रतिष्ठिता ॥५ ॥

। भरतेन प्रणीतत्वाद्भारती रीतिरुच्यते ॥६ ॥

। प्रस्तावना नाटकादेर्वीथ्यङ्गाश्च त्रयोदश ॥ ७ ॥

। असत्प्रलापो वाक्श्रेणी नालिका विपणं तथा ॥८ ॥

) गण्डोऽथ मृदवश्चैव त्रयोदशमथोचितम् ॥९ ॥

। मायेन्द्रजालयुद्धादिबहुलाऽऽरभटी स्मृता ॥१० ॥

॥११ ॥

नाम चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४० ॥

अथैकचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः नृत्यादावङ्गकर्मनिरूपणम् अग्निरुवाच चेष्टाविशेषमप्यङ्गप्रत्यङ्गे कर्म चानयोः । शरीरारम्भमिच्छन्ति प्रायः पूर्वोऽबलाश्रयः ॥१ ॥

को वृत्ति कहते हैं । इसके भारती, आरभटी, कौशिकी ( केशिकी ), सात्त्वती ये चार भेद हैं ॥५ ॥ भारती वृत्ति

में शब्दों के महत्त्व पर अधिक ध्यान दिया जाता है । और स्त्री पात्रों द्वारा प्राकृत का प्रयोग कराया जाता है । भरतमुनि द्वारा प्रवर्तित या प्रणीत होने के कारण ही इसका नाम भारती वृत्ति है । भारती वृत्ति के चार अंग हैं-वीथी, प्रहसन, नाटक की प्रस्तावना । वीथी के निम्नलिखित तेरह अंग हैं - उद्घातक, लपित, असत्प्रलाप, वाक्श्रेणी, नाटिका, विपण, व्यवहार, त्रिमत, छल, अवस्कन्दित, गंड, मृदु, अथोचित ॥६ - ९ ॥ प्रहसन नामक एकांकी में तपस्वी आदि के लिए हास्यपरक वचन प्रयुक्त किये जाते हैं । आरभटी वृत्ति में मायावी और अद्भुत दृश्य रहते हैं और युद्ध आदि की बहुलता रहती है । संक्षिप्तक, अवपात और वस्तूत्थापन ये इसके तीन भेद हैं ॥१०-११ ॥ श्री अग्निमहापुराण में रीति - निरूपण कथन नामक तीन सौ चालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३४० ॥

अध्याय ३४१ नृत्यादावङ्गकर्म - निरूपण अग्निदेव बोले- -नाटक में नायक - नायिका की विशेष चेष्टाएँ और अङ्ग - प्रत्यङ्ग ( आङ्गिक अभिनय ) कहाता है । इनमें चेष्टाएँ प्रायः नारी पात्रों में ही होती हैं ॥१ का कर्म ही शरीरारम्भ ॥ ये चेष्टाएँ बारह प्रकार की हैं-१ क. ङ, ‘ यासु नियमो वृ ’ । २ ' कौशिकी स्याद्वितीयकम् ' च. पुस्तके नास्ति पुस्तकयोर्नास्ति । ४ ख. ग. ' ल्लगितं । ५ ख. ग. च. ' वश्यंदिते ॥ ३ ' चत्वार्यङ्गानि तथा ' क. ङ. CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1055

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चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०५१ लीला विलासो विच्छित्तिविभ्रमं किलकिंचितम् विकृतं क्रीडितं केलिरिति द्वादशधैव सः विशेषान्दर्शयन्किञ्चिद्विलासः सद्भिरिष्यते विकारः कोऽपि विव्वोको ललितं सौकुमार्यतः अङ्गानि भ्रूलतादीनि प्रत्यङ्गान्यभिजायते न प्रयोगः क्वचिन्मुख्यं तिरश्चीनं च तत्क्वचित् परिवाहितमाधूतमवधूतमथाऽऽचितम् ललितं चेति विज्ञेयं त्रयोदशविधं शिरः दृष्टिस्त्रिधा रसस्थायिसंचारिप्रतिबिन्धना नवधा तारकाकर्म भ्रमणं चलनादिकम् षोढौष्ठकर्मकं पाद्यं सप्तथा चिबुकक्रिया असंयुतः संयुक्तश्च भूम्ना हस्तः प्रयुज्यते अर्धचन्द्रोत्करालश्च शुकतुण्डस्तथैव च लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, किलकिंचित, । ( ' मोट्टायितं कुट्टमितं विव्वोको ललितं तथा ॥२ ॥

। लीलेष्टजनचेष्टानुकरणं संवृतक्षये ॥३ ॥

। हसितक्रन्दितादीनां संकरः किलकिञ्चितम् ॥४ ॥

। शिरः पाणिरुरः पार्श्वं कटिरङ्घ्रिरिति क्रमात् ॥५ ॥

। अङ्गप्रत्यङ्गयोः कर्म प्रयत्नजनितं विना ॥६ ॥

। आकम्पितं कम्पितं च धुतं विधुतमेव च ॥७ ॥

। निकुञ्चितं परावृत्तमुत्क्षिप्तं चाप्यधोगतम् ॥८ ॥

। भ्रूकर्म सप्तधा ज्ञेयं पातनं भृकुटीमुखम् ॥९ ॥

। षट्त्रिंशद्भेदविधुरा रसजा तत्र चाष्टधा ) ॥१० ॥

। षोढा च नासिका ज्ञेया निःश्वासो नवधा मतः ॥ ११ ॥

। ' कलुषादिमुखं षोढा ग्रीवा नवविधा स्मृता ॥१२ ॥

। पताकस्त्रिपताकश्च तथा वै कर्तरीमुखः ॥ १३ ॥

। मुष्टिश्च शिखरश्चैव कपित्थः ' कटकामुखः ॥ १४ ॥

मोट्टायित, कुट्टमित, विव्वोक, ललित, विकृत, क्रीडित और केलि ॥२-२३ ॥ ( वियोगावस्था ) क्षीणस्मृति में प्रिय जन की चेष्टाओं के अनुकरण को लीला कहते हैं । भावों के विशेष प्रदर्शन को विद्वान् विलास कहते हैं । हास्य और क्रन्दन आदि का मिश्रित रूप किलकिञ्चित कहाता है । किसी के प्रिय का विकृत रूप प्रस्तुत करने को विव्वोक और ( गत्यादि की ) सुकुमारता को ललित कहते हैं । सिर, हाथ, वक्ष, पार्श्व, कटि, पाद, इन्हें अंग कहते हैं । भ्रू आदि को प्रत्यङ्ग कहते हैं । अङ्ग और प्रत्यङ्ग के ये अप्रयत्नज अर्थात् स्वाभाविक रूप में ही होने चाहिए । नृत्य में कोई विशिष्ट नियम मुख्य नहीं होता । कहीं - कहीं पर नृत्य का तिरश्चीन प्रयोग भी किया जाता है ॥३-६ ॥ नृत्य में सिर से सम्बन्धित अभिनय तेरह प्रकार का माना गया है । आकम्पित, कम्पित, धुत, विधुत, परिवाहित, आधूत, अवधूत, अचित, निकुंचित, परावृत्त, उत्क्षिप्त, अधोगत तथा ललित ॥७-८३ ॥ भ्रूकर्म - भृकुटिपात सात प्रकार का होता है । रस, स्थायीभाव तथा संचारीभावों से सम्बद्ध दृष्टि तीन प्रकार की है । रस, स्थायी और संचारी के भेद से इस दृष्टि के छत्तीस भेद हैं । इसमें रसजा दृष्टि के भेद आठ हैं । तारिका का कार्य ( आँख चलाना ) नौ प्रकार का है । नासिका की गति सोलह प्रकार की मानी गयी है और निःश्वास की गति नौ प्रकार की है ॥९ -११ ॥ नृत्य में ओष्ठ के कर्म सोलह प्रकार के कहे गये हैं, और चिबुक की क्रियाएँ सात प्रकार की मानी गयी हैं । मुख का प्रदर्शन कलुष आदि के भेद से सोलह प्रकार का है और ग्रीवा की नौ गतियाँ मानी गयी हैं ॥१२ ॥ नृत्य में भूमि पर हाथों का प्रयोग दो प्रकार का है - संयुत

और असंयुत । पताका, त्रिपताका, कर्तरीमुख, अर्धचन्द्र, उत्कराल, शुकतुण्ड, मुष्टि, शिखर, कपित्थ, कटकामुख, चाष्टधा " च. पुस्तके नास्ति । २ क. ङ. ' षानुशनं किंचि ' ख. ग. ' षाद्व्यसनं किंचि । ३ क. ङ. १ " चरित्रप्र मोट्टायितं ' । ४ क. ङ. षड्विंशभेदभिदुरा वसुधा तं । ५ क. ङ. ' लुखादि । ६ क. ङ. कटुका । ' सस्तासां CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1056

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१०५२ अग्निपुराणम् सूच्यास्यः पद्मकोषोहि शिराः समृगशीर्षकः । ' कामूलकालपद्मौ च चतुरभ्रमरौ तथा ॥ १५ ॥

हंसास्यहंसपक्षौ च संदंशमुकुलौ तथा । ऊर्णनाभस्ताम्रचूडश्चतुर्विंशतिरित्यमी ॥१६ ॥

असंयुतकराः प्रोक्ताः संयुतास्तु त्रयोदश । अञ्जलिश्चकपोतश्च कर्कटः स्वस्तिकस्तथा ॥१७ ॥

कटको वर्धमानश्चाप्यसङ्गो निषधस्तथा । ' दोलः पुष्पपुटश्चैव तथा ' मकर एव च ॥ १८ ॥

गजदन्तो बहिःस्तम्भो वर्धमानोऽपरे कराः । उरः पञ्चविधं स्यात्तु आभुग्ननर्तकादिकम् ॥१९ ॥

उदरं त्वनतिक्षामं खण्डं ॰ पूर्णमिति त्रिधा । पार्श्वयोः पञ्चकर्माणि जङ्ङ्घाकर्म च पञ्चधा ॥२० ॥

अनेकधा पादकर्म नृत्यादौ नाटके स्मृतम् ॥२१ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये नृत्यादावङ्गकर्मनिरूपणं नामैकचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४१ ॥

अथ द्वाचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः अभिनयादिनिरूपणम् अग्निरुवाच ' आभिमुख्यं नयन्नर्थान्विज्ञेयोऽभिनयो बुधैः । चतुर्धा संभवः “ सत्त्ववागङ्गाहरणाश्रयः ॥१ ॥

सूच्यास्य, पद्मकोष, अहिशिर, मृगशीर्षक, कामूल, कालपद्म, चतुर, भ्रमर, हंसास्य, हंसपक्ष, संदर्श, मुकुल, ऊर्णनाभ, ताम्रचूड - ये चौबीस असंयुत कर कहे गये हैं । अर्थात् नृत्य में इन चौबीस प्रकारों से असंयुत करों का प्रयोग किया जाता है । संयुत करों का प्रयोग तेरह प्रकार से किया जाता है- अंजलि, कपोत, कर्कट, स्वस्तिक, कटक, वर्धमान, अप्यसंग, निषध, दोल, पुष्पपुट, कमठ, गजदन्त, बहिः स्तम्भ इत्यादि - इत्यादि ॥१३-१८३ ॥ नृत्य आदि में वक्ष संचालन पाँच प्रकार से किया जाता है । जैसे आभुग्न नर्तकादि । उदर प्रदर्शन तीन प्रकार से किया जाता है - अनतिक्षाम, खण्ड और पूर्ण । पार्श्व भाग के पाँच कर्म हैं । जंघाओं के कर्म भी पाँच प्रकार के होते हैं । नाटक में नृत्यादि में पादकर्म भी अनेक प्रकार का कहा श्री अग्निमहापुराण अग्निदेव बोले का होता है - सत्त्वाश्रय गया है ॥१९ -२१ ॥ में नृत्यादावङ्गकर्म - निरूपण कथन नामक तीन सौ अध्याय ३४२ अभिनयादि - निरूपण - नाटक की वर्ण्य - वस्तु को दर्शकों के समक्ष लानेवाला , वागाश्रय, अंगाश्रय, आहरणाश्रय । स्तम्भादि सात्त्विक इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३४१ ॥

अभिनय ही होता है । वह अभिनय चार प्रकार भावों का प्रदर्शन सात्त्विक अभिनय कहलाता १ ख. ग. शिवाः । २ क. ङ. च. ' कः । काङ्गुल ' । ३ क. ङ. संदर्शमु । ४ क. ङ. दोलं पुष्पपट ६ क. ख. बहिस्थश्च व ' । ७ क. ङ. भुग्नानिर्गुणादि । ८ क. ङ. खलं । ९ ख. ' । ५ क. ङ. कमठ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 ग. Foundation ' ख्यं त्वयनार्थान्वि USA । १० क. ख. ङ. सत्त्वो वा ।

पृष्ठ 1057

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द्वाचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०५३ स्तम्भादिः'सात्त्विको वागारम्भो वाचिक आङ्गिकः रसादिविनियोगोऽथ कथ्यते ह्यतिमानतः । सम्भोगो विप्रलम्भश्च शृङ्गारो द्विविधः स्मृतः । विप्रलम्भाभिधानो यः शृङ्गारः स चतुर्विधः । एतेभ्योऽन्यतरं जायमानं संभोगलक्षणम् । " स्त्रीपुंसयोस्तद्वदयं तस्य निर्वर्तिका रतिः । धर्मार्थकाममोक्षैश्च शृङ्गार उपचीयते शृङ्गारं द्विविधं विद्याद्वाङ्नेपथ्यक्रियात्मकम् किंचिल्लक्षितदन्ताग्रं हसितं फुल्ललोचनम् सशब्दं पापहसितमशब्दमतिहासितम् । धर्मोपघातजश्चित्तविलासजनितस्तथा । अङ्गनेपथ्यवाक्यैश्च रौद्रोऽपि त्रिविधो रसः ॥ शरीरारम्भ आहार्यो बुद्ध्यारम्भप्रवृत्तयः ॥२ ॥

तमन्तरेण सर्वेषामपार्थैव स्वतन्त्रता ॥ ३ ॥

प्रच्छन्नश्च प्रकाशश्च तावपि द्विविधौ पुनः ॥४ ॥

पूर्वानुरागमानाख्यः प्रवासकरुणात्मकः ॥५ ॥

विवर्तते चतुधैव च प्रागतिवर्तते ॥६ ॥

निखिलाः सात्त्विकास्तत्र ' वैवर्ण्यप्रलयौ विना ॥७ ॥

। आलम्बनविशेषैश्च तद्विशेषैर्निरन्तरः ॥८ ॥

। हासश्चतुर्विधोऽलक्ष्यदन्तः स्मित इतीरितः ॥९ ॥

। विहसितं सस्वनं स्याज्जिह्मोपहसितं तु तत् ॥१० ॥

यश्चासौ करुणो नाम स रसस्त्रिविधो भवेत् ॥११ ॥

शोकः शोकाद्भवेत्स्थायी ' कः स्थायी पूर्वजो मतः ॥१२ ॥

तस्य निर्वर्तकः क्रोधः स्वेदो रोमाञ्चवेपथुः ॥१३ ॥

है । शरीर से सम्बद्ध आंगिक अभिनय तथा बुद्धि से सम्बद्ध आहार्य अभिनय ॥१-२ ॥ अब विस्तारपूर्वक रस आदि का प्रकरण निर्दिष्ट किया जाता है । इसके बिना सब ( कवियों एवं सहृदयों ) की सार्थकता ही व्यर्थ है । संभोग और विप्रलम्भ ये शृंगार के दो भेद हैं । पुनः इसके दो भेद होते हैं - प्रच्छन्न और प्रकाश । विप्रलम्भ शृंगार के चार भेद हैं - पूर्वराग, मान, प्रवास और करुण । इन चारों से भिन्न रूप से उत्पन्न होनेवाला संभोग श्रृंगार है । यह इन चारों में विद्यमान रहता है परन्तु इनका अतिक्रमण नहीं करता । इसका सम्बन्ध स्त्री - पुरुष से है । इसका निर्वाह रति स्थायी भाव द्वारा होता है । इस रस में समस्त सात्त्विकों का समावेश रहता है और वैवर्ण्य तथा प्रलय का अभाव रहता है । धर्मार्थ, काम, मोक्ष तथा आलम्बनादि के द्वारा शृंगार निरन्तर बढ़ता रहता है । शृंगार के मुख्य रूप से दो भेद होते हैं - साहित्यिक रूप ( काव्यादि में ), अभिनेय रूप ( नाटकादि में ) ॥३-८३ ॥ हास चार प्रकार का होता है । अलक्ष्यदन्त अर्थात् जिसमें दाँत दिखायी न दें, ऐसा हास्य ' स्मित ' कहाता है । जिस हास्य में दाँतों का अग्रभाग थोड़ा - थोड़ा दिखायी दे और नेत्रों में भी उल्लास हो उसे ' हसित ' कहते हैं । जिस हास्य में मधुर - मधुर शब्द भी हो उसे विहसित और जहाँ मुख भी खुल जाय और शब्द भी हो उसे अपहसित कहते हैं । इस अपहसित हास्य में पाप हँसी रहती है अर्थात् इसमें हास्य का विकृत रूप रहता है ॥९ -१०३ ॥ करुण रस के तीन भेद हैं - धर्महानि द्वारा उद्भूत शोक, चित्तग्लानिजन्य शोक तथा वियोग से उत्पन्न शोक । इनका स्थायी भाव पूर्वज अर्थात् प्रथम का धर्म, द्वितीय का विलास तथा तृतीय का शोक है ॥११-१२ ॥ रौद्र रस के तीन भेद हैं - अङ्गरौद्र, नेपथ्यरौद्र तथा वाक्यरौद्र । इसका निर्वर्तक स्थायी भाव क्रोध है तथा स्वेद, रोमांच, कम्प इसके संचारी भाव १ ख. ग. ' को रागारम्भो वाऽधिक । २ छ. ह्यभिमा । ३ क. ङ. प्रस्तारकरुणामयः । ए । ४ छ. ' स्तदुहयस्तस्य । ५ क. ङ. ' वर्त्यप्रलयोऽपि वा । ध । ६ क. ङ. म् । बिन्दु ' सि ' । ७ क. ङ. ' यी कुत्सापूर्वः पुनः पुनः । अ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१०५४ अग्निपुराणम् दानवीरो धर्मवीरो युद्धवीर इति त्रयम् । आरम्भेषु भवेद्यत्र वीरमेवानुवर्तते । उद्वेजनः क्षोभन ( ण ) श्च वीभत्सो द्विविधः स्मृतः । ' जुगुप्साऽऽरम्भिका तस्य सात्त्विकांशो निवर्तते । अलंका ( क ) रिष्णवस्ते च शब्दमर्थमुभौ त्रिधा । ` शब्दालङ्कारमाहुस्तान्काव्यमीमांसका विदः । वाको वाक्यमनुप्रासश्चित्रं दुष्करमेव च । तन्त्रान्योक्तेरनुकृतिश्छाया साऽपि चतुर्विधा । आभाणको हि लोकोक्तिः सर्वसामान्य एव ताः । छेका विदग्धा वैदग्ध्यं कलासु कुशला मतिः । अव्युत्पन्नोक्तिरखिलैरर्भकोक्त्योपलक्ष्यते विप्लुताक्षरमश्लीलवचो मत्तस्य तादृशी अभिप्रायविशेषेण कविशक्तिं विवृण्वती वीरस्तस्य च निष्पत्तिर्हेतुरुत्साह इष्यते ॥ १४ ॥

भयानको नाम रसस्तस्य निर्वर्तकं भयम् ॥ १५ ॥

उद्वेजनः स्यात्प्लुत्याद्यैः क्षोभनो ( णो ) रुधिरादिभिः ॥ १६ ॥

काव्यशोभाकरान्धर्मानलंकारान्प्रचक्षते ॥१७ ॥

ये व्युत्पत्त्यादिना शब्दमलंकर्तुमिह क्षमाः ॥ १८ ॥

छाया मुद्रा तथोक्तिश्च युक्तिर्गुम्फनया सह ॥ १ ९ ॥ ज्ञेया नवालंकृतयः शब्दानामित्यसंकरात् ॥ २० ॥

लोकच्छेकार्भकोक्तीनामत्तोक्तेरनुकारतः ॥२१ ॥

याऽनुधावति लोकोक्तिश्छाया मिच्छन्ति तां बुधाः ॥ २२ ॥

तामुल्लिखन्ती छेकोक्तिश्छाया कविभिरिष्यते ॥२३ ॥

। तेनार्भकोक्तिश्छाया तन्मात्रोक्तिमनुकुर्वती ॥२४ ॥

। या सा भवति मत्तोक्तिश्छायोक्ताऽप्यतिशोभते ॥ २५ ॥

। मुत्प्रदायिनीति सा मुद्रा सैव ' शय्याऽपि नो मते ॥ २६ ॥

हैं । वीर रस के तीन भेद हैं - दानवीर, धर्मवीर तथा युद्धवीर । इस रस की अभिव्यक्ति उत्साह द्वारा होती है । भयानक रस का स्थायीभाव भय है, यह रस वीररस की पूर्वावस्था है । अर्थात् भय के उपरान्त ही वीररस की स्थिति सम्भव होती है ॥१३-१५ ॥ वीभत्स रस के दो भेद हैं - उद्वेजन और क्षोभन । उद्वेजन का प्रदर्शन उछल - कूद द्वारा तथा क्षोभन का प्रदर्शन रुधिरपातादि के द्वारा किया जाता है । इसका स्थायी भाव जुगुप्सा है तथा इसमें सात्त्विक अंश नहीं रहने पाता ॥१६-१६३ ॥ काव्य की शोभा बढ़ानेवाले धर्मों को अलंकार कहा जाता है । ये अलंकार तीन प्रकार के होते हैं - शब्दालंकार, अर्थालंकार, शब्दार्थालंकार । जो अलंकार व्युत्पत्ति अर्थात् शब्दों की विशिष्ट संयोजन - शैली द्वारा शब्द अलङ्कृत करते हैं उन्हें काव्यशास्त्र के ज्ञाता शब्दालंकार कहते हैं । ये अलंकार संख्या में नौ हैं - छाया, मुद्रा, उक्ति, युक्ति, गुम्फन, वाकोवाक्य, अनुप्रास, चित्र, दुष्कर ॥१७-२० ॥ अन्य के कथन की अनुकृति ( तद्वत् अनुकरण ) छाया कहाती है । इसके चार भेद हैं - लोकोक्ति, छेकोक्ति, अर्भकोक्ति तथा मत्तोक्ति । लोक प्रसिद्ध कथन को लोकोक्ति कहते हैं । यह सर्वमान्य होती है । जब यह लोकोक्ति प्रचलित होती है तो इसे विद्वान् छाया नाम देते हैं ॥ २१-२२ ॥ छेक विदग्ध को कहते हैं । कलाओं में प्रदर्शित बुद्धि कौशल वैदग्ध्य कहलाता है । इस विदग्धता का उल्लेख करनेवाली उक्ति को कवियों ने छेकोक्ति छाया कहा है । अव्युत्पन्न अर्थात् अपरिपक्व मस्तिष्क व्यक्ति की उक्ति अर्भकोक्ति कहाती है, इस अर्भकोक्ति मात्र की अनुकर्त्री उक्ति को अर्भकोक्ति छाया कहा जाता है ॥२३-२४ ॥ शब्दाडम्बर तथा अश्लील वचनों से संवलित तथा प्रमत्त व्यक्ति के समान कही गयी उक्ति मत्तोक्ति छाया कहाती है, कही जाने पर यह उक्ति अति सुन्दर लगती है । किसी विशेष अभिप्राय से कवि के बुद्धि - वैभव को प्रदर्शित करनेवाली उक्ति, जो कि पाठकों का मनोरंजन करती है, मुद्रा कहलाती है । हमारे मत से उसे शय्या भी कहना चाहिए ॥ २५-२६ ॥ जहाँ पर किसी १ ख. ग. ' गुप्सर ' । २ क. च. ' रनाम्नस्तान्का ' । ३ क. च. विदुः । ४ क. ङ. ° ति मन्त्रोक्ति ' । ५ क. ङ. ' ती । उद्धरोतीति । ख. ' ती । उदरोभीति । ६ क. ङ. ' वसिज्यासिनो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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त्रिचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०५५ उक्तिः सा ' कथ्यते यस्यामर्थः कोऽप्युपपत्तिमान् । लोकायात्रार्थविधिना धिनोति हृदयं सताम् ॥२७ ॥

उभौ विधिनिषेधौ च नियमानियमावपि 1 । विकल्पपरिसंख्ये च तदीयाः षडथोक्तयः ॥ २८ ॥

अयुक्तयोरिव मिथो वाच्यवाचकयोर्द्वयोः । योजनायै कल्पमाना युक्तिरुक्ता मनीषिभिः ॥२९ ॥

पदं चैव पदार्थश्च वाक्यं वाक्यार्थमेव च । विषयोऽस्याः प्रकरणं प्रपञ्चश्चेति षड्विधः ॥३० ॥

गुम्फना रचना चार्था (? ) शब्दार्थक्रमगोचरा । शब्दानुकारादर्थानुपूर्वार्थेयं * क्रमात्त्रिधा ॥३१ ॥

उक्तिप्रत्युक्तिमद्वाक्यं वाको वाक्यं द्विधैव तत् । ऋजुवक्रोक्तिभेदेन तत्राऽऽद्यं सहजं वचः ॥ ३२ ॥

साऽऽपूर्वप्रश्निका प्रश्नपूर्विकेति द्विधा भवेत् । वक्रोक्तिस्तु भवेद्भङ्ग्या काकुस्तेन कृता द्विधा ॥३३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽभिनयादिनिरूपणम् नाम द्वाचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३४२ ॥

अथ त्रिचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः शब्दालंकाराः अग्निरुवाच स्यादावृत्तिरनुप्रासो वर्णानां पदवाक्ययोः । एकवर्णोऽनेकवर्णो वृत्तेर्वर्गगणो द्विधा ॥१ ॥

विशिष्ट बात को लोकव्यवहारानुकूल बनाकर कहा जाता है जिससे वह सहृदयों के हृदय को स्पर्श कर सकती है ऐसे कथन को ' उक्ति ' कहा गया है । इसके छह भेद होते हैं - विधि, निषेध, नियम, अनियम, विकल्प तथा परिसंख्या ॥२७-२८ ॥ किन्हीं दो अयुक्त, वाच्य और वाचक के परस्पर मिलानेवाली कल्पना को मनीषियों ने युक्ति कहा है । पद, पदार्थ, वाक्य, वाक्यार्थ, विषय प्रपञ्च, इसके प्रकरणानुसार ये छह भेद होते हैं ॥ २ ९ -३० ॥ शब्दार्थ क्रम को दृष्टि में रखकर जो संयोजन किया जाता है उसे ' गुम्फना ' कहते हैं । इस गुम्फना के तीन भेद हैं - शब्दसाम्य को लेकर, अर्थसाम्य को लेकर तथा शब्दों के स्वाभाविक क्रम को समक्ष रखकर ॥ ३१ ॥ उक्ति - प्रत्युक्तिवाला वाक्य

ही वाकोवाक्य कहाता है । उसके दो भेद होते हैं - ऋजु और वक्रोक्ति । स्वाभाविक वचन को ऋजु वाकोवाक्य कहते हैं । इसके भी दो प्रकार हैं - अप्रश्न ऋजु और प्रश्नपूर्वक ऋजु । वक्रोक्ति के भी दो भेद होते हैं - प्रथम भङ्गिमा के द्वारा तथा द्वितीय काकु के द्वारा ॥३२-३३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अभिनयादि - निरूपण कथन नामक तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३४२ ॥

अध्याय ३४३ शब्दालङ्कार अग्निदेव बोले - पद और वाक्य में वर्णों की आवृत्ति का नाम अनुप्रास है । इसके दो भेद हैं - एकवर्णगतावृत्ति १ क. ङ. " ते कस्मात्सर्वार्थाभ्युप । २ क. ङ. ' याः स तथो ' । ख. ग. ' याः षोडशोक्त ' । ३ छ. चर्या । ४ ख. ' वयस्तु क्र ' । ५ क. ख. वाक्यविधैव । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१०५६ अग्निपुराणम् एकवर्णगता वृत्तेर्जायन्ते पञ्च वृत्तयः । मधुरायाञ्च वर्गान्तादधो ' वर्ग्यारुणौ स्वनौ ' न कार्या ' वर्ग्यवर्णानामावृत्तिः ' पञ्चमाधिका ललिता बलभूयिष्ठा प्रौढा या पणवर्गजा भद्रायां परिशिष्टाः स्युः परुषा साऽभिधीयते अकारवर्जमावृत्तिः स्वराणामतिभूयसी शषसा रेफसंयुक्ताश्चाकारश्चापि भूयसा अन्यथाऽपि गुरुर्वर्णः संयुक्ते परिपन्थिनि ' क्षेपे शब्दानुकारे च परुषाऽपि प्रयुज्यते द्रावणी माधवी पञ्चवर्णान्तस्थोष्मभिः क्रमात् यमकं साऽव्यपेतं च व्यपेतं चेति तद्विधा द्वैविध्येनानयोः स्थानपादभेदाच्चतुर्विधम् तथा अनेकवर्णगतावृत्ति । एकवर्णगतावृत्ति की पाँच मधुरा ललिता प्रौढा भद्रा परुषया सह ॥२ ॥

। ह्रस्वस्वरेणान्तरितौ संयुक्तत्वं नकारयोः ॥ ॥३ ३ ॥ ॥ । महाप्राणोष्मसंयोगप्रविमुक्तलघूत्तरौ 11811 । ऊर्ध्वं रेफेण युज्यन्ते नटवर्गो न पञ्चमाः ॥५ ॥

। भवति यस्यामूष्माणः संयुक्तास्तत्तदक्षरैः ॥६ ॥

। अनुस्वारविसर्गौ च पारुष्याय निरन्तरौ ॥७ ॥

। अन्तस्था भिन्नमाभ्यां च हः पारुष्याय संयुतः ॥८ ॥

। पारुष्यायाऽऽदिमांस्तत्र पूजिता न तु पञ्चमी ॥ ९ ॥

। कर्णाटी कौन्तली कौन्ती कौङ्कणी वामनासिका ॥१० ॥

। अनेकवर्णा वृत्तिर्या भिन्नार्थप्रतिपादिका ॥११ ॥

। आनन्तर्यादव्यपेतं व्यपेतं व्यवधानतः ॥१२ ॥

। आदिपादादिमध्यान्तेष्वेकद्वित्रिनियोगतः ॥१३ ॥

वृत्तियाँ हैं- मधुरा, ललिता, प्रौढ़ा, भद्रा और परुषा ॥ १-२ ॥ मधुरावृत्ति में वर्गों के अन्तिम वर्णों से पूर्ववर्ती दो कोमल स्वरों ( वर्णों ) अर्थात् वर्गों के तीसरे और चौथे वर्णों की आवृत्ति होती है । ये वर्ण ह्रस्व ' अ ' से पृथग्भूत हों अर्थात् असंयुक्त होने चाहिए, और यदि संयुक्त भी हों तो केवल नकार के ही साथ हों । यहाँ वर्ग्य वर्णों की आवृत्ति पाँच बार से अधिक नहीं होनी चाहिए । इसमें महाप्राण ऊष्मवर्णों का संयोग न हो और लघु अक्षर उत्तर में हो || ३-४ ॥ ललिता वृत्ति में अधिक बलवाले कठोर शब्दों का प्रयोग होता है । प्रौढ़ा में ' प ' तथा ' ण ' वर्ग के शब्दों का प्रयोग होता है । यहाँ ' ट ' वर्ग और वर्गों का पंचमाक्षर ऊर्ध्व रेफ से संयुक्त नहीं होते ॥५ ॥ परुषा वृत्ति उसे कहते हैं जिसमें स्वरसम्बन्धी अक्षरों के साथ ऊष्म वर्णों का संयोग रहता

है । इसमें अकार को छोड़कर शेष स्वरों की आवृत्ति प्रचुर मात्रा में होती है, अनुस्वार तथा विसर्ग के द्वारा निरन्तर पारुष्य लाया जाता है । इसमें रेफ तथा अकार से संयुक्त श, ष, स का प्रयोग होता है । अन्तस्थवर्णों से संयुक्त रकार और हकार परुषता लाने में समर्थ होता है । इनके अतिरिक्त गुरुवर्ण तथा संयुक्त अक्षर परिपन्थि अर्थात् परुषता के उपयुक्त हैं । वर्गों के आदिम वर्ण तो परुषता लाने में समर्थ हैं पर पंचम वर्ण नहीं । निन्दा में तथा शब्दानुवृत्ति में परुषा वृत्ति का प्रयोग होता है । कर्णाटी, कौन्तली, कौन्ती, कौङ्कणी, वामनासिका, द्रावणी और माधवी नामक ( परुषा ) वृत्तियों में क्रमशः कवर्ग आदि पंच वर्गों, अन्तस्थवर्णों तथा ऊष्मवर्णों की आवृत्ति ( अधिकतया ) होती है ॥६-१०३ ॥ अनेकवर्णावृत्ति में आवृत्तिवर्णों के अर्थ भिन्न - भिन्न होते हैं और ऐसी आवृत्ति यमक कहाती है । इसके दो भेद हैं-अव्यपेत और व्यपेत । अव्यपेत यमक वह कहाता है जहाँ वर्णों की आवृत्ति लगातार होती है । व्यपेत यमक में आवृत्ति व्यवधान के साथ होती है । इन दो भेदों के पुनः स्थान और पाद के क्रम से चार भेद होते हैं । स्थान यमक के तीन भेद होते हैं - आदि, पादमध्य तथा पादान्त । ये यमक के सात भेद हुए । इसी प्रकार पाद यमक के भी एकपाद, द्विपाद १ क. ङ. ' घोवक्षावशौधनौ । २ ख. धनौ । ३ क. ङ. ' र्यावृक्षव । ४ क. ङ. ञ्चधा स्मृताः । म ' । ५ क. ङ. क्षेपशब्दानुकारेण प ' । ६ क. ङ. प्रपूज्यते । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA