अग्नि पुराण — पृष्ठ 1041–1050
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1041–1050
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षट्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०३७ ह्रस्वो दीर्घः प्लुत इति कालतो नियमा अपि ( चि ) । कष्ठ्या कु ( व ) हाविचुयशास्तालव्या ओष्ठजावुपू ॥१७ ॥
स्युर्मूर्धन्या ऋटुरषा दन्त्या ऌतुलसाः स्मृता: । जिह्वामूले तुकुः प्रोक्तो दन्त्योष्ठ्यो वःस्मृतो बुधैः ॥ १८ ॥
ए ऐ तु कण्ठतालव्या ओ औ कण्ठ्यौ ( ष्ठो ) ठजौ स्मृतौ । अर्धमात्रा तु कण्ठस्य एकारैकारयोर्भवेत् ॥१९ ॥
अयोगवाहा विज्ञेया आश्रयस्थानभागिनः । अचोऽस्पृष्टायणस्त्वीषन्नेमा: ( म ) स्पृष्टाःशलःस्मृताः ॥२० ॥
शेषाः स्पृष्टा हलः प्रोक्ता निबोधात्र प्रधानतः । अमोऽनुनासिका नह्रौ ( ह्रौ ) नादिनो हझषः स्मृताः ॥२१ ॥
ईशन्नादो ( दा ) यणश्चैव श्वासिनश्च खफादयः । ईषच्छ्वासं शरं विद्याद्गोर्धामैतत्प्रचक्षते ॥ २२ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये शिक्षानिरूपणं नाम षट्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३६ ॥
एवं शकार - ये तालुस्थान से उच्चारित होते हैं । उकार और पवर्ग - ये दोनों ओष्ठस्थान से उच्चारित होनेवाले हैं । ऋकार, टवर्ग, रेफ एवं षकार -ये मूर्धन्य तथा ऌकार, तवर्ग, लकार और सकार- ये दन्तस्थानीय होते हैं । क वर्ग का स्थान जिह्वामूल है । वकार को विद्वज्जन दन्त और ओष्ठों से उच्चारित होनेवाला बताते हैं ॥ १३-१८ ॥ एकार और ऐकार कण्ठ - तालव्य तथा ओकार एवं औकार कण्ठोष्ठज माने गये हैं । एकार, ऐकार तथा ओकार और औकार में कण्ठस्थानीय वर्ण अकार की आधी मात्रा या एक मात्रा होती है । ' अयोगवाह ' आश्रयस्थान के भागी होते हैं, ऐसा जानना चाहिए । ( अच् अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ ) -ये स्वर स्पर्शाभाव रूप ' विवृत ' प्रयत्नवाले हैं । यण् ( य, व, र, ल ) ‘ ईषत्स्पृष्ट ' एवं शल् ( श, ष, स, ह ) ' अर्धस्पृष्ट ' अर्थात् ' ईषद्विवृत ' प्रयत्नवाले हैं । शेष ' हल् ' अर्थात् क से लेकर म तक के अक्षर ' स्पृष्ट प्रयत्नवाले ' माने गये हैं । इनमें बाह्य प्रयत्न के कारण वर्णभेद जानना चाहिए । ‘ ञम् ’ प्रत्याहार में स्थित वर्ण ( ञ, म, ङ, ण, न ) अनुनासिक होते हैं । हकार और रेफ अनुनासिक नहीं होते । ‘ हकार ’, झकार तथा षकार के ' संवार ', ' घोष ' और ' नाद ' प्रयत्न हैं । ' यण ' और जश् ' ’ - इनके ' ईषन्नाद ' अर्थात् अल्पप्राण प्रयत्न हैं । ख, फ आदि का ' विवार ', अघोष और ' श्वास ' प्रयत्न हैं । चर् ( च, ट, त, क, प, श, ष, स ) का ‘ ईषच्छ्वास ' प्रयत्न जानना चाहिए । यह व्याकरणशास्त्र वाणी का धाम कहा जाता है ॥१९ -२२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में शिक्षानिरूपण - कथन नामक तीन सौ छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३३६ ॥
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१०३८ अग्निपुराणम् अथ सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः काव्यादिलक्षणम् अग्निरुवाच काव्यस्य नाटकादेश्च अलंकारान्वदाम्यथ । शास्त्रेतिहासवाक्यानां त्रयं यत्र समाप्यते । अभिधायाः प्रधानत्वात्काव्यं ताभ्यां विभिद्यते । कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र च दुर्लभा । सर्वं शास्त्रमविद्वद्भिर्मृग्यमाणं न सिद्ध्यति
वर्गेषु वर्णवृन्दं स्यात्पदं सुप्तिङ्प्रभेदतः ।
काव्यं स्फुरदलंकारं गुणवद्दोषवर्जितम् ॥
' देवादीनां संस्कृतं स्यात्प्राकृतं त्रिविधं नृणाम् ' ध्वनिर्वर्णाः पदं वाक्यमित्येतद्वाङ्मयं मतम् ॥ १ ॥
शास्त्रे शब्दप्रधानत्वमितिहासेषु निष्ठता ॥२ ॥
नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा ॥३ ॥
व्युत्पत्तिर्दुर्लभा तत्र विवेकस्तत्र दुर्लभः ॥ ४ ॥
। आदिवर्णा द्वितीयाश्च महाप्राणास्तुरीयकाः ॥५ ॥
संक्षेपाद्वाक्यमिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली ॥६ ॥
योनिर्वेदश्च लोकश्च सिद्धमर्थादयोनिजम् ॥७ ॥
। गद्यं पद्यं च मिश्रं च काव्यादि त्रिविधं स्मृतम् ॥ ८ ॥
अग्निदेव बोले - अब मैं वाक्य वाङ्मय कहलाता है ॥ १ में शब्द प्रधान होता है, इतिहास की प्रधानता के कारण, काव्यशास्त्र कठिनता से होती है । मनुष्य जन्म शक्ति तो और भी दुष्प्राप्य है, ये सब अध्याय ३३७ काव्यादिलक्षण काव्य, नाटक आदि के अलङ्कारों का वर्णन करता हूँ । ध्वनि, वर्ण, पद और ॥ शास्त्र, इतिहास और काव्य ये तीनों वाङ्मय के अन्तर्गत आते हैं । शास्त्र और कथा ग्रन्थों में इतिवृत्तात्मकता का महत्त्व होता है, तथा काव्य में अभिधा शक्ति और इतिहास से पृथक् हो जाता है ॥२-२ - २३ ॥ संसार में मनुष्य जन्म की प्राप्ति बड़ी प्राप्त करके भी उसमें विद्या की उपलब्धि और भी कठिन है तथा कविता करने की मिल जाने पर भी लोक, शास्त्र, काव्य, इतिहासादि के अध्ययन द्वारा प्राप्त होनेवाली निपुणता और दुर्लभ है । ( यह सब तत्त्ववेत्ताओं द्वारा ही सम्भव है, क्योंकि ) अतत्त्ववेत्ताओं के द्वारा अन्वेषित शास्त्र किसी भी प्रकार से सफल सिद्ध नहीं होता || ३-४३ ॥ वर्ण वर्गों में बद्ध हैं । इनमें वर्ग के प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ वर्ण महाप्राण कहलाते हैं । वर्ण - समुदाय का नाम पद है । पद के दो भेद हैं - सुबन्त और तिङन्त । निष्कर्ष यह है कि इष्ट अर्थ से युक्त पदों के समूह का नाम वाक्य है । जिस वाक्य - समूह में अलंकार स्पष्ट रूप से दिखायी दें तथा जो गुणों से युक्त और दोषों से मुक्त हो उसे काव्य कहते हैं । काव्य का आधार वेद है अथवा लोक, परन्तु अर्थ की दृष्टि से काव्य अयोनिज है अर्थात् स्वतःसिद्ध है ॥५-७ ॥ काव्य या नाटक में संस्कृत भाषा का प्रयोग देवताओं के मुख से कराना चाहिए, जबकि मनुष्यों के मुख से तीन प्रकार की प्राकृत ( महाराष्ट्री, शौरसेनी, मागधी ) का प्रयोग कराना चाहिए । काव्य तीन प्रकार का कहा गया है । गद्य,, पद्य और चम्पू || ८ || १ ख. ग. “ निवर्णप ’ । २ ख. ग. ' तदाश्रयं । ३ क. ङ. तिष्ठता । ४ च. ' प्राणाः स्वरूपकाः । क ५ ख. ग. वेदादीनां ।. ङ. ' प्राणाः शकारकाः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०३ ९ अपदः पदसन्तानो गद्यं तदपि गद्यते ' अल्पाल्पविग्रहं नातिमृदुसंदर्भनिर्भरम् भवेन्मध्यमसन्दर्भ नातिकुत्सितविग्रहम् आख्यायिका कथा खण्डकथा परिकथा तथा कर्तृवंशप्रशंसा स्याद्यत्र गद्येन विस्तरात् भवन्ति यत्र दीप्ताश्च रीतिवृत्तिप्रवृत्तयः वक्त्रं वाऽपरवक्त्रं वा यत्र साऽख्यायिका स्मृता मुख्यस्यार्थावताराय भवेद्यत्र कथान्तरम् सा कथा नाम तद्गर्भे निबध्नीयाच्चतुष्पदीम् अमात्यं सार्थकं वाऽपि द्विजं वा नायकं विदुः समाप्यते तयोर्नाऽऽद्या सा कथामनुधावति भयानकं सुखपरं गर्भे च करुणो रसः । चूर्णकोत्कलिकावृत्तसंधिभेदात् त्रिरूपकम् ॥९ ॥
। चूर्णकं नामतो दीर्घसमासोत्कलिका भवेत् ॥१० ॥
। वृत्तच्छायाहरं वृत्तसंधिनैतत्किलोत्कटम् ॥११ ॥
। कथानिकेति मन्यन्ते गद्यकाव्यं च पञ्चधा ॥१२ ॥
। कन्याहरण - संग्राम - विप्रलम्भविपत्तयः ॥१३ ॥
। उच्छ्वासैश्च परिच्छेदो यत्र या चूर्णकोत्तरा ॥ १४ ॥
। श्लोकैः स्ववंशं संक्षेपात्कविर्यत्र प्रशंसति ॥ १५ ॥
। परिच्छेदो न यत्र स्याद्भवेद्वा ' लम्बकैः क्वचित् ॥१६ ॥
। भवेत्खण्डकथा याऽसौ कथा परिकथा तयोः ॥१७ ॥
। स्यात्तयोः करुणं विद्धि विप्रलम्भश्चतुर्विधः ॥ १८ ॥
। कथाख्यायिकयोर्मिश्रभावात्परिकथा स्मृता ॥१९ ॥
। अद्भुतोऽन्ते सुक्लृप्तार्थो नोदात्ता सा कथानिका ॥२० ॥
पद ( चरण ) रहित पद - समूह गद्य कहलाता है । चूर्णक, उत्कलिका और वृत्तसन्धि ये तीन इसके रूप कहे गये हैं । जो गद्य अल्पाल्प समास से संयुक्त हो और जिसमें कर्कश शब्दावली का प्रयोग हो उसे चूर्णक गद्य कहते हैं । और जिस गद्य में लम्बे - लम्बे समास हों, उसे उत्कलिका गद्य कहते हैं । जिस गद्य में शब्दावली न तो अति कर्कश हो, न ही अति कोमल हो और न ही समास प्रौढ़ स्तर का हो तथा जिसमें वृत्त की छाया अत्यन्त ही क्षीण हो वह वृत्त-सन्धि गद्य है ॥९ -११ ॥ आख्यायिका, कथा, खण्डकथा, परिकथा, कथानिका - गद्य काव्य के ये पाँच प्रकार हैं ॥१२ ॥
जिस गद्य काव्य में ग्रन्थकर्त्ता के वंश की प्रशस्ति विस्तारपूर्वक दी हुई हो, कन्याहरण, संग्राम, विप्रलम्भजन्य विपत्तियाँ हों, जहाँ रीति, वृत्ति, प्रवृत्ति अपने चमत्कृत रूप से प्रस्तुत की जाय, जिसके कथा भागों का नाम उच्छ्वास हो और जिसमें चूर्णक नामक गद्य का प्रयोग हो तथा जहाँ कथा नायक के मुख से कही गयी हो अथवा किसी अन्य पात्र के मुख से उसे ‘ आख्यायिका ' नामक गद्य - काव्य कहा जाता है ॥ १३-१४३ ॥ जिस गद्यकाव्य के ग्रन्थकार संक्षेप में श्लोकों द्वारा अपने वंश की प्रशंसा करता है । जहाँ मुख्य कथा को लाने के लिए अवान्तर कथा की सृष्टि की जाती है और जिसमें परिच्छेद नहीं होते अथवा कहीं - कहीं ( ग्रन्थ के अन्त में ) समस्त वर्ण्य विषय प्रबन्ध में अनुस्यूत रहता है उसे ' कथा ' नाम का गद्य - काव्य कहा गया है । यदि कवि कथा - काव्य में चतुष्पदी का प्रयोग करता है तो उसे ' खण्ड - कथा ' कहते हैं । कथा और परिकथा नामक गद्यकाव्यों में राज्य का मन्त्री, व्यापारी अथवा ब्राह्मण नायक होता है । इनमें करुण रस और चार प्रकार का विप्रलम्भ शृङ्गार होता है ॥१५-१८ ॥ इन दो गद्यकाव्य भेदों में से ' कथा ' में घटना समाप्त नहीं की जाती है, अपितु अधूरी छोड़ दी जाती है । कथा और आख्यायिका के मिश्रित रूप को परिकथा कहते हैं । कथानिका नामक गद्यकाव्य में, सुखपरक भयानक रस, मध्य में करुण रस और अन्त में अद्भुत रस का परिपाक होता है । इस गद्यकाव्य का केन्द्रीभूत विषय उदात्त न होते हुए भी सुनियोजित अवश्य होना चाहिए ॥१९ -२० ॥ पद्य में १ क. ङ. ल्पान्यविग्रहं जाति । २ क. ख. ग. छ. ' त्तगन्धिनै । ३ ख. ग. लम्भकैः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१०४० अग्निपुराणम् पद्यं चतुष्पदी तच्च वृत्तं जातिरिति द्विधा ' मात्राभिर्गणना यत्र सा जातिरिति काश्यप सा विद्या नौस्तितार्षूणां गभीरं काव्यसागरम् कुलकं मुक्तकं कोष इति पद्यकुटुम्बकम् तादात्म्यमजहत्तत्र तत्समं नातिदुष्यति मंत्रदूतप्रयाणाजिनियतं नातिविस्तरम् पुष्पिताग्रादिभिर्वक्त्राभिजनैश्चारुभिः समैः ' अतिशक्वरिकाष्टम्यामेकसंकीर्णकैः परः कल्पोऽतिनिन्दितस्तस्मिन्विशेषानादरः सताम् उद्यानसलिलक्रीडामधुपानरतोत्सवैः ६ तमसा मरुताऽप्यन्यैर्विभावैरतिनिभरैः सर्वरीतिरसैः स्पृष्टं ' पुष्टं गुणविभूषणैः वाग्वैदग्ध्यप्रधानेऽपि रस एवात्र जीवितम् । वृत्तमक्षरसंख्येयमुक्थं तत्कृतिशेषजम् ॥ २१ ॥
। सममर्धसमं वृत्तं विषमं पैङ्गलं त्रिधा ॥ २२ ॥
। महाकाव्यं कलापश्च पर्याबन्धो विशेषकम् ॥२३ ॥
। सर्गबन्धो महाकाव्यमारब्धं संस्कृतेन यत् ॥ २४ ॥
। इतिहासकथोद्भूतमितरद्वा सदाश्रयम् ॥२५ ॥
। शक्वर्याऽतिजगत्याऽतिशक्वर्या त्रिष्टुभा तथा ॥ २६ ॥
। मुक्ता तु भिन्नवृत्तान्ता नातिसंक्षिप्तसर्गकम् ॥२७ ॥
। मात्रयाऽप्यपरः सर्गः प्राशस्त्येषु च पश्चिमः ॥२८ ॥
। ' नगरार्णवशैलचन्द्रार्काश्रमपादपैः ॥२९ ॥
। दूतीवचनविन्यासैरसतीचरिताद्भुतैः ॥३० ॥
। सर्ववृत्तिप्रवृत्तं च सर्वभाव प्रभावितम् ॥३१ ॥
। अत एव महाकाव्यं तत्कर्ता च महाकविः ॥ ३२ ॥
। पृथक्प्रयत्नं निर्वर्त्यं वाग्विक्रमणि (? ) रसाद्वपुः ॥३३ ॥
भी चार पाद होते हैं । वृत्त और जाति इसके दो भेद हैं । जहाँ नियमानुसार अक्षरों की संख्या की जाती है उसे वृत्त, जहाँ मात्राओं की गणना की जाती है उसे जाति छन्द कहते हैं । छन्दःशास्त्र के अनुसार सम, अर्धसम और विषम, छन्द के ये तीन भेद माने गये हैं । छन्दःशास्त्र का ज्ञान काव्यरूपी गम्भीर सागर को पार करने के लिए नाव की तरह सहायक हैं ॥२१-२२३ ॥ महाकाव्य, कलाप, पर्याबन्ध, विशेषक, कुलक, मुक्तक और कोष ये पद्य के भेद हैं ॥२३-२३३ ॥ महाकाव्यों का विभाजन सर्गों में होता है और आरम्भ संस्कृत से होता है । स्वरूप को छोड़ते हुए, अन्य भाषा प्राकृत आदि से आरम्भ करना भी दोष नहीं । इसका इतिवृत्त इतिहास की कथा से सम्बन्धित हो अथवा सभ्यों में प्रचलित हो । मंत्रणा, दूत - प्रेषण, युद्धादि का अति विस्तार न हो । शक्वरी, अतिजगती, अतिशक्वरी, त्रिष्टुप्, पुष्पिताग्रा, वक्त्रादि छन्दों से समन्वित हो । सर्गान्त में छन्द बदला हुआ हो और सर्ग अति संक्षिप्त न हो । अतिशक्वरी आदि छन्दों के साथ - साथ कोई सर्ग मात्रा छन्दों से भी रचित होना चाहिए । जिस पद्धति में सज्जनों का अनादर होता है वह निन्दित है अतः यहाँ वह त्याज्य है ॥ २४-२८३ ॥ नगर - वर्णन, समुद्र, पर्वत, ऋतु, चन्द्र, सूर्य, आश्रम, पादप, उद्यान, जलक्रीड़ा, मद्यपानादि उत्सवों तथा दूती वचन, कुलटाओं के विस्मयजनक चरित्रों के साथ - साथ गाढ़ान्धकार, प्रचण्ड पवन आदि आदि लोकातिशायी तत्त्वों की चर्चा से महाकाव्य संयुक्त होना चाहिए । इसका कथानक सब प्रकार की वृत्तियों से समन्वित हो, सब प्रकार के भावों से संकलित हो, रीति तथा रस से संयुक्त हो तथा अलङ्कारों से पुष्ट हो । इस प्रकार के गुणों से संयुक्त महाकाव्य का रचयिता महाकवि कहाता है । इस महाकाव्य वाक् - कौशलों की प्रधानता होते हुए भी इसकी आत्मा तो रस ही है अतः कवि व्यर्थ के वाग् - विक्रम में विविध कलेवर रससिक्त बनाये और नायक की कथा से चतुर्वर्ग की फल - प्राप्ति को दर्शाये ॥२९ को छोड़कर इसका १ च. त्रिधा । २ क. ङ. ' रसंक्षेप ' युज्यते तद्विशेषणम् -३३ ॥ जिसमें केवल एक नातिसंक्षिप्तसङ्गकम् । ” इति क. ङ. पुस्तकयोः । ४ ख. ङ. ' काद्याम्यामे । ३ " मुक्ता । सर्गकम् " इत्यत्र “ युक्ता तु भिन्नवृत्ताख्या ७ क. ङ. ‘ वविभाववित् । शर्वरीतिरजैर्जुष्टं पुणिर्गुण । ८ ख. ग. ष्टं ५ ख. ग. ' गरान्तरशैः । ६ ख. ग. ' वैः । कृतीव ' । वासुकिन्निर ' । गण । ९ क. ङ. ' वानुजीवनम् । १० क. ङ. ' यत्ननिवृत्त्यै CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०४१ ' चतुर्वर्गफलं विश्वग्व्याख्यातं नायकाख्यया । ` समानवृत्तिर्निव्यूढः कौशिकीवृत्तिकोमलः ॥३४ ॥
कलापोऽत्र प्रवासः प्रागनुरागाह्वयो रसः । सविशेषकं प्राप्त्यादि संस्कृतेनेतरेण च ॥ ३५ ॥
( " श्लोकैरनेकैः कुलकं ' स्यात्संदानितकानि तत् । मुक्तकं श्लोक एकैकश्चमत्कारक्षमः सताम् ) ॥३६ ॥
सूक्तिभिः कविविंसहानां सुन्दरीभिः समन्वितः । कोषो ब्रह्मापरिच्छिन्नः स विदग्धाय रोचते ॥ ३७ ॥
आभासोपमशक्तिश्च सर्गे यद्भिन्नवृत्तता । मिश्रं वपुरिति ख्यातं प्रकीर्णमिति च द्विधा ॥ ३८ ॥
( श्रव्यं चैवाभिनेयं च प्रकीर्णं सकलोक्तिभिः ॥३९ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये काव्यादिलक्षणकथनं नाम सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३३७ ॥
ही छन्द का प्रयोग हो, जो कौशिकी वृत्ति के प्रयोग द्वारा कोमल बनाया गया हो, उसे ' कलापक ' कहते हैं । इसमें प्रवास और पूर्वराग का समावेश होना चाहिए । ' सविशेषक ' उसे कहते हैं जिसमें संस्कृत भाषा अथवा किसी अन्य भाषा में काव्य - सामग्री की प्राप्ति हो । ' कुलक ' नामक काव्य में विभिन्न छह छन्दों का प्रयोग होता है इसे ' संदानितक ' भी कहते हैं । ' मुक्तक ' रचना वह होती है, जिसका प्रत्येक श्लोक सहृदयों को प्रभावित करने में समर्थ होता है ॥३४-३६ ॥ ‘ कोष ' नामक काव्य, शिरोमणि कवियों की प्रभावशाली सूक्तियों का संग्रह होता है । इसमें रस का प्रवाह सतत प्रवहमान होता है । चतुर सहृदयों को यह अति प्रिय होता है । इसमें रसाभास और उपशम की शक्ति होती है और एक ही सर्ग में भिन्न - भिन्न छन्दों का प्रयोग रहता है । इसके दो भेद हैं - ' मिश्रित और प्रकीर्णक ' । प्रथम तो श्रव्य भी होता है और अभिनेय भी । ' प्रकीर्ण ' में एक प्रकार की उक्तियाँ होती हैं ॥ ३७-३९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में काव्यादिलक्षण - कथन नामक तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ ३३७ ॥
१ ख. ग. ' तुर्वक्त्रं च संधिश्च व्याख्या ' । २ ख. ग. " श्वव्या ' । ३ क. ग. ' वृत्तनि । ४ " श्लोकैरनेकैः सताम् " च पुस्तके नास्ति । ५ क. ङ. स्याच्छब्दानितकादि त ' । ६ " भव्यं नाटिका " क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ६६ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१०४२ अग्निपुराणम् अथाष्टात्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः नाटकनिरूपणम् अग्निरुवाच नाटकं सप्रकरणं डिम ईहामृगोऽपि वा । व्यायोगभाणवीथ्यङ्कत्रोटकान्यथ ' नाटिका । प्रस्थानं भाणिका भाणी गोष्ठी ' हल्लीशकानि च । उल्लाप्यकं प्रेङ्ङ्क्षणं च सप्तविंशतिधैव तत् । सामान्यं सर्वविषयं विशेष: क्वापि वर्तते । रसभावविभावानुभावा अभिनयास्तथा विशेषोऽवसरे वाच्यः सामान्यं पूर्वमुच्यते । इतिकर्तव्यता तस्य पूर्वरङ्गी यथाविधि देवतानां नमस्कारो गुरूणामपि च स्तुतिः
नाद्य ( न्द्य ) न्ते सूत्रधारोऽसौ रूपकेषु निबध्यते ।
ज्ञेयः समवकारश्च भवेत्प्रहसनं तथा ॥१ ॥
सट्टकं शिल्पकः कर्णा एको दुर्मल्लिका तथा ॥२ ॥
काव्यं श्रीगदिनं नाट्यरासकं रासकं तथा ॥३ ॥
सामान्यं च विशेषश्च लक्षणस्य द्वयी गतिः ॥ ४ ॥
पूर्वरङ्गे निवृत्ते द्वौ देशकालावुभावपि ॥५ ॥
। अङ्कः स्थितश्च सामान्यं सर्वत्रैवोपसर्पणात् ॥६ ॥
त्रिवर्गसाधनं नाट्यमित्याहुः करणं च यत् ॥७ ॥
। नान्दीमुखानि द्वात्रिंशदङ्गानि पूर्वरङ्कके ॥ ८ ॥
। गोब्राह्मणनृपादीनामाशीर्वादादि गीयते ॥९ ॥
गुरुपूर्वक्रमं वंशप्रशंसा पौरुषं कवेः ॥१० ॥
अध्याय ३३८ नाटक - निरूपण अग्निदेव बोले - दृश्यकाव्य सत्ताईस प्रकार का होता है । नाटक, प्रकरण, डिम, ईहामृग, समवकार, प्रहसन, व्यायोग, भाण, वीथी, अङ्क, त्रोटक, नाटिका, सट्टक, शिल्पक, कर्ण, दुर्मल्लिका, प्रस्थान, भाणिका, भाणी, गोष्ठी, हल्लीशक, काव्य, श्रीगदित, नाट्यरासक, रासक, उल्लाप्यक, प्रेङ्क्षण ॥१-३३ ॥ नाटक लक्षण की दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ हैं, सामान्य और विशेष । प्रथम प्रकार की प्रवृत्तियाँ सब नाटकों में होती हैं और द्वितीय प्रकार की कहीं - कहीं । पूर्व रंग के पश्चात् देश और काल का संकलन, रस, भाव, विभाव, अनुभाव, अभिनय तथा अंक - विभाजन, कार्यावस्थाओं का प्रतिपादन, ये सभी नाटक की सामान्य प्रवृत्तियाँ हैं क्योंकि इनकी उपस्थिति सर्वत्र रहती है । विशेष प्रवृत्तियों का प्रयोग अवसर - विशेष पर होना चाहिए, जबकि सामान्य के विषय में कह दिया है ॥४-६३ ॥ नाटक त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ, काम की प्राप्ति ) का हेतुभूत साधन है । पूर्व रंग में विधिपूर्वक नान्दी आदि बत्तीस अङ्गों का निर्वाह करना चाहिए । इस स्थल पर देवताओं को नमस्कार, गुरुजनों की प्रशंसा, गौ, ब्राह्मण और राजा के आशीष का गायन किया जाता है ॥७ - ९ ॥ रूपकों में नान्दी के पश्चात् सूत्रधार का समावेश किया जाता है । वह सूत्रधार इन पाँच बातों का निर्देश करे - कवि ( रूपककार ) की गुरु परम्परा, वंशोल्लेख तथा पौरुष ( काव्यशक्ति ), काव्य ( रूपक ) १ ख. ग. समरकारश्च । २ ख. ग. ' ङ्कतोट ' । ३ ख. ग. दुर्मणिका । ४ ख. ग. हन्दीसकानि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अष्टात्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः सम्बन्धार्थौ च काव्यस्य पञ्चैतानेष निर्दिशेत् सहिताः सूत्रधारेण संलापं यत्र कुर्वते आमुख्यं तत्तु विज्ञेयं बुधैः प्रस्तावनाऽपि सा आमुख्यस्य त्रयो भेदा बीजांशेषूपजायते । तदाश्रयस्य पात्रस्य प्रवेशस्तत्प्रवृत्तकम् । गृहीत्वा प्रविशेत्पात्रं कथोद्घातः स उच्यते । ततश्च प्रविशेत्पात्रं प्रयोगातिशयो हि सः । सिद्धमुत्प्रेक्षितं चेति तस्य भेदावुभौ स्मृतौ । बीजं बिन्दुः ३ पताका च ' प्रकरी कार्यमेव च । प्रारम्भश्च प्रयत्नश्च प्राप्तिः सद्भाव एव च । मुखं प्रतिमुखं गर्भो विमर्शश्च तथैव च । अल्पमात्रं समुद्दिष्टं बहुधा यत्प्रसर्पति । यत्र बीजसमुत्पत्तिर्नानार्थरससंभवा ॥ नटी विदूषको वाऽपि । चित्रैर्वाक्यैः ' स्वकार्यार्थे ( । प्रवृत्तकं कथोद्घातः कालं प्रवृत्तमाश्रित्य सूत्रधारस्य वाक्यं वा प्रयोगेषु प्रयोगं तु १०४३ पारिपार्श्वक एव च ॥११ ॥
र्थैः ) प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः ॥१२ ॥
प्रयोगातिशयस्तथा ॥१३ ॥
सूत्रधृग्यत्र वर्णयेत् ॥१४ ॥
यत्र वाक्यार्थमेव वा ॥१५ ॥
सूत्रधृग्यत्र वर्णयेत् ॥१६ ॥
शरीरं नाटकादीनामितिवृत्तं प्रचक्षते ॥१७ ॥
सिद्धमागमदृष्टं च सृष्टमुत्प्रेक्षितं कवेः ॥ १८ ॥
अर्थप्रकृतयः पञ्च पञ्च चेष्टा अपि क्रमात् ॥१९ ॥
नियता च फलप्राप्तिः फलयोगश्च पञ्चमः ॥ २० ॥
तथा " निहरणं चेति क्रमात्पञ्चैव संधयः ॥ २१ ॥
फलावसानं यच्चैव बीजं तदभिधीयते ॥ २२ ॥
काव्ये शरीरानुगतं तन्मुखं परिकीर्तितम् ॥ २३ ॥
की पूर्व कथा का सम्बन्ध और प्रयोजन । जहाँ सूत्रधार के साथ नटी, विदूषक अथवा पारिपाश्विक स्वकार्यसिध्यर्थ चमत्कृत वाक्यों से परस्पर चर्चा करते हैं, नाटक के उसी स्थल को आमुख्य कहते हैं । विद्वानों ने इसे प्रस्तावना भी कहा है । इसके तीन भेद हैं- प्रवृत्तक, कथोद्घात और प्रयोगातिशय । ये तीनों नाटक के बीजांश से ही ( यथा विधि ) उत्पन्न होते हैं ॥१०-१३३ ॥ जहाँ सूत्रधार किसी तत्कालीन चरित्र का आश्रय लेकर वर्णन करे और इस वर्णन के साथ ही तत्सम्बद्ध पात्र का प्रवेश हो तो वह प्रस्तावना प्रवृत्तक कहलाती है । जहाँ पर सूत्रधार के वाक्य को अथवा उसके व्याक्यार्थ को दोहराता हुआ कोई पात्र प्रवेश करे तो उसको कथोद्घात प्रस्तावना कहा जाता है ॥१४-१५३ ॥ नाटकों ( की प्रस्तावना ) में जब सूत्रधार अपने अभीष्ट कर्त्तव्य का सम्पादन कर चुके और तब पात्र का प्रवेश हो तो वह प्रयोगातिशय नाम की प्रस्तावना कहाती है । नाटक के इतिवृत्त ( कथानक ) को शरीर कहा जाता है । इतिवृत्त के दो भेद हैं - सिद्ध और उत्प्रेक्षित । आगम ( शास्त्र ) से प्राप्त कथानक सिद्ध कहाता है और कविकल्पना-प्रसूत कथानक उत्प्रेक्षित ॥१६-१८ ॥ नाटक की अर्थप्रकृतियाँ पाँच हैं- बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी, कार्य और इनकी चेष्टाएँ ( कार्यावस्थाएँ ) भी पाँच हैं - प्रारम्भ, प्रयत्न, सद्भाव, फलप्राप्ति, फलयोग ॥१९ -२० ॥ नाटक में क्रमशः पाँच सन्धियाँ होती हैं - मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और निहरण । जहाँ संकेत मात्र से ही फल - प्राप्ति तक की समस्त कथावस्तु ज्ञात - सी हो जाय, उस कार्यावस्था को बीज कहते हैं ॥२१-२२ ॥ जहाँ चमत्कृत अर्थ, रस आदि से युक्त उपर्युक्त ' बीज ' नामक कार्यावस्था होती है वहाँ नाटकीय कथावस्तु का अनुकारक स्थल मुख- सन्धि कहाता है । १ क. ख. ग. ° र्थे वीथ्यङ्गैरन्यकाऽपि वा । आ ' । २ क. ङ. वर्तयेत् । ३ क. ख. ग. बिन्दु । ४ क. ङ. प्राकरी । ५ छ. निर्वहणं । ६ क. ख. ग. ' गता तन्मु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१०४४ अग्निपुराणम् इष्टस्यार्थस्य रचना वृत्तान्तस्यानुपक्षयः । रागप्राप्तिः प्रयोगस्य गुह्यानां चैव गूहनम् ॥२४ ॥
आश्चर्यवदभिख्यातं प्रकाशानां प्रकाशनम् । अङ्गहीनो नरो यद्वन्न श्रेष्ठं काव्यमेव च ॥ २५ ॥
देशकालैर्विना किंचिन्नेतिवृत्तं प्रवर्तते । अतस्तयोरुपादानं नियमात्पदमुच्यते ॥ २६ ॥
देशेषु भारतं वर्षं काले कृतयुगत्रयम् । नर्ते ताभ्यां प्राणभृतां सुखदुःखोदयः क्वचित् ॥ सर्गे सर्गादिवार्त्ता च ' प्रसञ्जन्ती न दुष्यति ॥२७ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये नाटकनिरूपणं नामाष्टात्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३८ ॥
अथैकोनचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः शृङ्गारादिरसनिरूपणम् अग्निरुवाच अक्षरं परमं ब्रह्म सनातनमजं विभुम् । वेदान्तेषु वदन्त्येकं चैतन्यं ज्योतिरीश्वरम् || १ || आनन्दः “ सहजस्तस्य " व्यज्यते स कदाचन । व्यक्तिः सा तस्य चैतन्यचमत्काररसाह्वया ॥ २ ॥
आद्यस्तस्य विकारो यः सोऽहङ्कार इति स्मृतः । ततोऽभिमानस्तत्रेदं समाप्तं भुवनत्रयम् ॥३ ॥
मुख- सन्धि में ही अभीष्ट कथावस्तु की रचना, वृत्त ( कथा ) का अनुपक्षय अर्थात् अक्षीयमाणस्वरूप, प्रयोग ( नाटक ) की आनन्दमयी स्थिति, गोपनीय बातों का गोपन, ख्यात ( घटना सूत्र ) का आश्चर्यमयी पद्धति से कथन, प्रकाशनीय तथ्यों का प्रकाशन, इन नाटकीय गुणों का उल्लेख होना चाहिए । इन उपर्युक्त गुणों से रहित काव्य अंगहीन मनुष्य की भाँति श्रेष्ठ नहीं बन सकता ॥२३-२५ ॥ देश - काल के बिना किसी भी कथानक की रचना नहीं होती, इसलिए नियमपूर्वक उन दोनों का उपादान करना ' पद ' कहलाता है । नाटक के दृश्य सदा भारत के ही होने चाहिए और कालों में सत्ययुग, त्रेता और द्वापर इन तीन का उल्लेख होना चाहिए । देश और काल के सम्यक् उल्लेख के बिना दर्शकों में सुख और दुःख की अनुभूति ठीक प्रकार से नहीं करायी जा सकती । अंक में सृष्टि की आरम्भिक कथा का दिखाना भी दोष नहीं है ॥२६-२७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नाटक निरूपण - कथन नामक तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३३८ ॥
अध्याय ३३ ९ शृङ्गारादिरस - निरूपण अग्निदेव बोले - वह परब्रह्म परमेश्वर अक्षय है । वह शाश्वत, अजन्मा और ( समस्त सृष्टि में ) परिव्याप्त है । वेदान्त ग्रन्थों में उसे अद्वितीय ज्योतिर्मान् और सामर्थ्यवान् कहा गया है ॥१ ॥ उसका आनन्द स्वाभाविक है पर
उसकी अभिव्यक्ति कभी - कभी होती है । उसकी अभिव्यक्ति का नाम चैतन्य चमत्कार अथवा रस है । उस परब्रह्म का आदिम विकार अहंकार कहलाता है । उस अहंकार से अभिमान की उत्पत्ति हुई और उसी अभिमान में तीन १ क. ङ. श्रेयः । २ क. ख. ग. ' दाननि ' । ३ ख. च. नर्तिताभ्यां । ग. वर्तिताभ्यां । ४ ख. ग. प्रमज्जन्ती । ५ क. ङ. ' हजं ह्येष बाधते स । ६ ख. ज. युज्यते । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकोनचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०४५ ' अभिमानाद्रतिः ' सा च परिपोषमुपेयुषी तदभेदाः काममितरे हास्याद्या अप्यनेकशः ' सत्त्वादिगुणसंतानाज्जायन्ते परमात्मनः वीरोऽवष्टम्भजः संकोचभूर्वीभत्स इष्यते वीराच्चाद्भुतनिष्पत्तिः स्याद् वीभत्साद्भयानकः वीभत्साद्भुतशान्ताख्याःस्वभावाच्चतुरो रसाः अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः शृङ्गारी चेत्कविः काव्ये जातं रसमयं जगत् न भावहीनोऽस्ति रसो न भावो रसवर्जितः स्थायिनोऽष्टौ रतिमुखाः स्तम्भाद्या व्यभिचारिणः हर्षादिभिश्च मनसो विकासो हास उच्यते क्रोधस्तैक्ष्ण्यं प्रबोधश्च प्रतिकूलानुकारिणी ( पृथ्वीलोक, पाताललोक, स्वर्गलोक ) परिव्याप्त हैं । आदि भावों से परिपुष्ट होती है तब उसे शृङ्गार कहते । ' व्यभिचार्यादिसामान्याच्छृङ्गार इति गीयते ॥४ ॥
। ( ' स्वस्वस्थायिविशेषोऽथ परिघोषस्वलक्षणाः ॥५ ॥
। रागाद्भवति शृङ्गारो रौद्रस्तैक्ष्ण्यात्प्रजायते ॥६ ॥
। शृङ्गाराज्जायते हासो रौद्रात्तु करुणो रसः ) ॥७ ॥
। शृङ्गारहास्यकरुणा रौद्रवीरभयानकाः ॥८ ॥
। लक्ष्मीरिव विना त्यागान्न वाणी भाति नीरसा ॥९ ॥
। यथा वै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते ॥१० ॥
। स चेत्कविर्वीतरागो नीरसं व्यक्तमेव तत् ॥११ ॥
। भावयन्ति रसानेभिर्भाव्यन्ते च रसा इति ॥१२ ॥
। ' मनोनुकूलेऽनुभवः सुखस्य रतिरिष्यते ॥१३ ॥
। मनोवैक्लैव्यमिच्छन्ति शोकमिष्टक्षयादिभिः ॥१४ ॥
। पुरुषानुसमोऽप्यर्थो यः स उत्साह उच्यते ॥१५ ॥
अभिमान से रति का जन्म होता है, और जब रति व्यभिचारी हैं ॥ २-४ ॥ रति अथवा शृङ्गार के अनेक भेद हैं काम ( शृङ्गार ) हास्यादि । प्रत्येक रस का अपना - अपना स्थायीभाव है और उनके स्वरूप स्वनाम से ही स्पष्ट हैं । ये स्थायीभाव परब्रह्म के सत्त्वादिगुणों के प्रसार से ही समुत्पन्न होते हैं । राग ( प्रणय ) से शृङ्गार की उत्पत्ति होती है । असहिष्णुता से रौद्र रस की, उत्साह से वीर रस की, संकोच अथवा ग्लानि से वीभत्स रस की उत्पत्ति होती है । शृङ्गार रस से हास रस उत्पन्न होता है, रौद्र रस से करुण रस ॥५-७ ॥ वीर से अद्भुत रस की निष्पत्ति होती है और वीभत्स से भयानक रस की निष्पत्ति होती है । शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शान्त - ये नौ रस हैं । इनमें से रौद्र, वीर, वीभत्स ये चार रस स्वाधीन ( स्वाभाविक ) हैं ( और शेष परजन्य ) । जिस प्रकार बिना दान के लक्ष्मी शोभित नहीं होती, इसी प्रकार कविता ( वाग्देवी ) भी रसों के बिना शोभित नहीं होती । कवि इस अपार काव्य - जगत् का निर्माता है । जिसे जो वस्तु जिस प्रकार अच्छी लगती है यह उसे वैसे ही बनाता है ॥८-१० ॥ यदि कवि शृङ्गारी प्रकृति का अर्थात् सहृदय होगा तो उसकी सृष्टि अर्थात् रचना भी सरस होगी । पर यदि वह नीरस होगा तो उसका काव्य भी नीरस ही होगा । न तो रस के बिना कोई भाव होता है और न ही भाव के बिना रस । इन भावों से रसों का भावन किया जाता है और रसों के द्वारा भावों का । रत्यादि आठ स्थायी भाव कहाते हैं और स्तम्भादि ( आठ ) व्यभिचारी भाव सुख के मनोनुकूल अनुभव का नाम रति है ॥ ११-१३ ॥ हर्षादि से मन का जो विकास होता है उसे हास कहते हैं । प्रिय वस्तु के विनाशादि से मन में होनेवाली विकलता का नाम शोक है । किसी प्रतिकूल परिस्थिति में समुत्पन्न तीक्ष्णता का नाम क्रोध है । हृदय में उत्पन्न पौरुष को ' उत्साह ' कहते हैं ॥१४-१५ ॥ किसी १ ख. ग. ' मानावृतिः । २ क. ङ. ' नात्स्मृतिः । ३ क. ख. ' रितोष ' । ४ क. ङ. ' चारादि । ५ ख. ग. ' शः । सुषुम्नादिविशेषोत्सप ' । ६ ' स्वस्वस्थायि करुणोरसः ' क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ७ क. ' ख्याः स्वपुष्टाश्चतु ' । ख. ग. ' ख्याः सुषुष्पाश्चतु । ८ ख. ग. ' कूलोऽनु ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१०४६ अग्निपुराणम् चित्रादिदर्शनाच्चेतोवैक्लव्यं ब्रुवते भयम् । 1 । विस्मयोऽतिशयेनार्थ दर्शनाच्चित्तविस्मृतिः । स्तम्भश्चेष्टा प्रतीघातो भयरागाद्युपाहितः । स्वेदो हर्षादिभिर्देहोच्छ्वासोऽन्तः पुलकोद्गमः । ' चित्तक्षोभभवस्तम्भो वेपथुः परिकीर्तितः । दुःखानन्दादिजं नेत्रजलमश्रु च विश्रुतम् । वैराग्यादेर्मनः खेदो निर्वेद इति कथ्यते । शङ्काऽनिष्टागमोत्प्रेक्षा स्यादसूया च मत्सरः क्रियातिशयजन्माऽन्तः शरीरोत्थक्लमः श्रमः दैन्यं सत्त्वादपभ्रंशश्चिन्तार्थपरिभावनम् स्मृतिः स्यादनुभूतस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम् ' व्रीडानुरागादिभवः संकोचः कोऽपि चेतसः आवेशश्च प्रतीकाराशया वैधुर्यमात्मनः जुगुप्सा च पदार्थानां निन्दा दौर्भाग्यवाहिनाम् ॥१६ ॥
अष्टौ स्तम्भादयः सत्त्वाद्रजसस्तमसः परम् ॥१७ ॥
श्रमरागाद्युपेतान्तः क्षोभजन्म वपुर्जलम् ॥१८ ॥
हर्षादिजन्मवान्सङ्गः स्वरभेदो भयादिभिः ॥ १ ९ ॥ वैवर्ण्यं च विषादादिजन्मा कान्तिविपर्ययः ॥ २० ॥
इन्द्रियाणामस्तमयः प्रलयो लङ्घनादिभिः ॥ २१ ॥
मनः पीडादिजन्मा च सादो ग्लानिः शरीरगा ॥ २२ ॥
। मदिराद्युपयोगोत्थं मनः संमोहनं मदः ॥२३ ॥
। शृङ्गारादि क्रियाद्वेषश्चित्तस्याऽऽलस्यमुच्यते ॥ २४ ॥
। इतिकर्तव्यतोपायादर्शनं मोह उच्यते ॥ २५ ॥
। मतिरर्थपरिच्छेदस्तत्त्वज्ञानोपनायितः ॥२६ ॥
। भवेच्चपलताऽस्थैर्यं हर्षचि ( श्चि ) त्तप्रसन्नता ॥२७ ॥
। कर्त्तव्ये प्रतिभाभ्रंशो जडतेत्यभिधीयते ॥२८ ॥
चित्र अथवा भयंकर दृश्य को देखने से चित्त को जो व्याकुलता होती है उसे भय कहते हैं । गन्दी वस्तुओं के निन्दात्मक भाव का नाम जुगुप्सा कहाता है । आठ स्तम्भादि भाव त्रिगुणातीत माने गये हैं, भय या रति की अधिकता के कारण निश्चेष्ट होने का नाम स्तम्भ है । श्रम, प्रणय, भय के आधिक्य के कारण अन्तर्मन्थन द्वारा शरीर पर आनेवाली आर्द्रता को स्वेद कहते हैं । हर्ष, भय आदि के कारण होनेवाले शारीरिक उच्छ्वास को पुलक कहते हैं । हर्ष, भयादि के कारण होनेवाले कण्ठावरोध को स्वरभेद कहते हैं ॥ १६-१९ ॥ हृदय के विक्षोभस्वरूप होनेवाले स्तम्भ को वेपथु कहा गया है । विषादादि भयादि के कारण होनेवाली रूप या कवि की म्लानता को वैवर्ण्य कहते हैं । दुःख, आनन्दादि से नेत्रों में उत्पन्न या दृश्यमान जल को अश्रु कहा जाता है । अशनादि के कारण इन्द्रियों की विकलता प्रलय कहलाती है । वैराग्य या दुःख के कारण मन में उत्पन्न खेद को निर्वेद कहते हैं । मानसिक पीड़ादि से प्रसूत अवसाद जब अभिव्यक्त होता है तो उसे ग्लानि कहते हैं ॥ २०-२२ । अनिष्ट आगमन की कल्पना को आशंका कहते हैं । मात्सर्य को ही असूया कहते हैं । मदिरा आदि के सेवन से जो मानसिक शिथिलता होती है उसे मद कहते हैं । कार्याधिक्य के फलस्वरूप उद्भूत शारीरिक क्लान्ति को श्रम कहते हैं । शृङ्गारादि क्रियाओं से चित्त की उदासी आलस्य कही जाती है । स्वअपमान का चिन्तन करते हुए सत्त्व से अपभ्रंश होने का नाम दैन्य है । करणीय उपाय के न सूझने की अवस्था को मोह कहते हैं ॥२३-२५ ॥ किसी पूर्वानुभूत वस्तु के प्रत्यभिज्ञान को स्मृति कहते हैं । तत्त्वज्ञान की सहायता से अर्थ धारण का नाम मति है । अनुरागादि के कारण चित्त में होनेवाले संकोच को व्रीड़ा कहते हैं । चित्त की अस्थिरता ही चपलता होती है और चित्त की प्रसन्नता को हर्ष कहते हैं । प्रतीकार की भावना से व्यक्ति में आनेवाले उद्वेग को आवेग कहते हैं । कर्त्तव्य में प्रतिभा के कुष्ठित होने को ' जड़ता ' कहा गया है ॥ २६-२८ ॥ लक्ष्यप्राप्ति से प्राप्त आत्मसंशयकी १ क. ङ. ' भपरिस्तम्भो । ख. ग. ' भतरस्तम्भो । २ ख. ' तिवेशनन् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA