अग्नि पुराण — पृष्ठ 11–20

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 11–20

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भूमिका अग्निपुराण का स्वरूप एवं उसका श्लोकपरिमाण पुराणों में अष्टादश पुराणों ( जो कभी - कभी महापुराण भी कहलाते हैं ) की जो सूचियाँ मिलती हैं, उनमें अग्नि या आग्नेय नाम अवश्य मिलता है, जिससे अग्निपुराण की प्राचीनता एवं प्रामाणिकता ज्ञात होती है । अग्नि नामक देव इस पुराण के वक्ता हैं, अतः यह अग्नि नाम से अभिहित होता है । आग्नेय का अर्थ है - अग्नि से सम्बन्धित अथवा अग्नि द्वारा प्रोक्त । अग्निपुराण के स्वरूप एवं परिमाण के विषय में पुराणों में कुछ निर्देश मिलते हैं । मत्स्यपुराण में कहा गया है कि जिस पुराण में अग्नि ने वशिष्ठ को ईशानकल्प का वृत्तान्त कहा, वह आग्नेयपुराण है ( ५३।२८ ) । स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड ( २।४७ ) तथा नारदीयपुराण ( १।९९ । १ ) का भी यही मत है । प्रचलित अग्निपुराण का वक्ता यद्यपि अग्नि है, तथापि इसमें ईशानकल्प का नाम नहीं मिलता । इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कोई प्राचीनतर ईशानकल्पीय वृत्तान्तख्यापक अग्निपुराण था, जो लुप्त हो गया है और प्रचलित अग्निपुराण उस पुराण का आश्रय करके लिखा गया है ( अल्प प्राचीन सामग्री के साथ अत्यधिक नवीन सामग्री जोड़कर ) । विभिन्न समयों में विभिन्न अग्निपुराण ( प्राचीन तथा नवीन सामग्री का संयोजनात्मक ) प्रचलित थे - इस तथ्य में सर्वबलिष्ठ हेतु है - अग्निपुराण के परिमाण के विषय में मतभेद । अग्निपुराण में एक स्थल पर अग्निपुराण का परिमाण १२००० ( २७२/११ ) तथा अन्यत्र ( ३८३/६४ ) १५००० कहा गया है । इस पुराण का श्लोकपरिमाण भागवतानुसार १५४०० ( १२।१३।५ ), देवीभागवतानुसार १६००० ( १।३।९ ) तथा नारदीयपुराणानुसार १५००० है ( १।९९ ।२ ) । एक निश्चित ग्रन्थ के श्लोकपरिमाण के विषय में ऐसे मतभेद नहीं हो सकता, अतः यह स्वीकार्य है कि इन पुराणों के रचनाकारों ने अपने समय में जिस अग्निपुराण को देखा था, उनके परिमाण का ही उल्लेख उन्होंने किया है । निबन्धग्रन्थों को देखने से भी ज्ञात होता है कि कभी प्रचलित अग्निपुराण से पृथक् ( चाहे सर्वथा भिन्न न हो ) कोई अग्निपुराण विद्यमान था, क्योंकि निबन्धग्रन्थों में उद्धृत अग्निपुराण के श्लोक प्रचलित अग्निपुराण में नहीं मिलते ( अपेक्षाकृत अर्वाचीन निबन्धग्रन्थों में प्रचलित अग्निपुराण के श्लोक उद्धृत मिलते हैं ) । प्रसिद्ध १. श्लोकपरिमाण का तात्पर्य है -३२ अक्षरों को एक श्लोक मानकर गणना करना । मुद्रित अग्निपुराण के प्रत्येक अध्याय में जो श्लोकगणना मिलती है, वह श्लोकपरिमाण गणना नहीं है । अग्निपुराण में कितने ही श्लोक हैं, जिनमें ३२ से अधिक अक्षर हैं । कितने ही बड़े - बड़े मन्त्र हैं, जिनमें ५० से भी अधिक अक्षर हैं । ऐसे स्थलों में ३२ अक्षरों को एक श्लोक मानकर ही गणना की जाती है । अग्निपुराण के आनन्दाश्रम संस्करण में श्लोकपरिमाण ११४५७ कहा गया है । प्रत्येक अध्याय के श्लोकों को गिनकर यह संख्या दी गयी है- ऐसा प्रतीत होता है । यह गणना श्लोकों की संख्या को दिखाती है, श्लोकों के परिमाण को नहीं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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८ निबन्धग्रन्थकार वल्लालसेन ने तो प्रचलित अग्निपुराण को अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में एक अप्रामाणिक ग्रन्थ कहा है । अग्निपुराण को ' तामस ' माना गया है ( पद्मपु ० ६ । २६३।८१-८२ ) । पुराणों में ही कहा गया है कि तामस वह पुराण होता है, जिसमें अग्नि अथवा शिव की महिमा का प्रधानतः प्रतिपादन किया गया हो ( मत्स्यपु ० ५३।६८-६ ९ ) । प्रचलित अग्निपुराण में अग्निदेवता के माहात्म्य के विषय में कुछ भी नहीं कहा गया । इससे भी यह सिद्ध होता है कि प्रचलित अग्निपुराण से भिन्न कोई प्राचीनतर अग्निपुराण था, जिसमें अग्नि- महिमा का विशेष रूप से प्रतिपादन किया गया था । उपलब्ध प्राचीनतर अग्निपुराण हमारा सौभाग्य है कि अग्निपुराण के पुराणोक्त लक्षण जिसमें घटते हों, ऐसे एक अग्निपुराण का हस्तलेख प्राप्त हो गया है । इसका हस्तलेख एशियाटिक सोसाइटी ( कलकत्ता ) में है और वह्निपुराण नाम से अभिहित हुआ है । निबन्धग्रन्थों में ‘ आग्नेयपुराण ' नाम से जो उद्धरण मिलते हैं, वे इस पुराण में मिल जाते हैं । इस पुराण में तान्त्रिक प्रभाव अणुमात्रा में नहीं है । इसमें अग्निमाहात्म्य का प्रतिपादन है । पर इसमें भी ईशानकल्प का उल्लेख नहीं है, जिससे सिद्ध होता है कि यह आग्नेयपुराण ( प्रचलित अग्निपुराण से प्राचीन होने पर भी ) वह पुराण नहीं है, जो मत्स्य - आदि - पुराणकारों के द्वारा लक्षित हुआ है । यह भी हो सकता है कि इस आग्नेयपुराण से ईशानकल्प का वृत्तान्त च्युत हो गया है । प्रचलित अग्निपुराण के साथ इस आग्नेयपुराण का तुलनामूलक अध्ययन करके तथा आग्नेयपुराण पर सर्वाङ्गीण विचार करके डॉ ० आर ० सी ० हाजरा ने एक विद्वत् - प्रशंसित निबन्ध प्रकाशित किया है । ' अग्निपुराण के विषय में विशेष जिज्ञासुओं को यह निबन्ध अवश्य देखना चाहिए । प्रचलित अग्निपुराण का वैशिष्ट्य उपर्युक्त आग्नेयपुराण के अतिरिक्त अन्य भी अग्निपुराण ( कथंचित् सदृश ) थे - यह निश्चित है । चूँकि ये अनुपलब्ध हैं, अतः इन पर कुछ विचार नहीं किया जा सकता । आग्नेयपुराण पर भी विवाद करना व्यर्थ है, क्योंकि यह अभी तक अमुद्रित है । अग्निपुराण के नाम से जो पुराण आजकल प्रचलित हैं ( जिसके संस्करण आनन्दाश्रम एवं वेंकटेश्वर प्रेस से देवनागरी लिपि में तथा कलकत्ता के वङ्गवासी प्रेस से बँगलालिपि में प्रकाशित हुए हैं ), उस पुराण के विषय में हम मुख्य रूप से कुछ चर्चा करना चाहते हैं ।

१. तार्क्ष्य पुराणमपरं ब्राह्ममाग्नेयमेव च ।

दीक्षाप्रतिष्ठापाषण्डमुक्तिरत्नपरीक्षणैः ॥

मृषावंशानुचरितैः कोशव्याकरणादिभिः असंगतकथाबन्ध- परस्परविरोधितः 1 इत्यादि । वल्लालसेन - कृत दानसागर - ग्रन्थ के ये श्लोक डॉ ० हाजरा कृत आग्नेयपुराण - सम्बन्धी लेख में उद्धृत हुए हैं । ( इस लेख के विषय में अगली टिप्पणी देखें ) २. Our Heritage ( Vol. I तथा II ) में प्रकाशित Studies in the genuine Agneyapurana alias Vahni - purana शीर्षक लेख द्र ० । All - India Kashiraj Trust द्वारा प्रकाशित Dr. R. C. Hazra Commemoration Volume, Part - I में यह लेख अन्तर्भूत है । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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९ प्रचलित अग्निपुराण ( जो मूलतः अग्नि- वसिष्ठ संवाद में है ) अपने को ' विद्यासार ' कहता है ( १।६ ।, १।७ १।१३ ) । इस पुराण में सभी विद्याएँ प्रदर्शित हुई हैं - यह ३८३।५२ में कहा गया है । अग्निदेवता, बाद वसिष्ठ स्वयं भी व्यास को कहते हैं कि ' मैं दोनों प्रकार के ब्रह्म को कहूँगा से उपदेश पाने के है कि इस पुराण का मुख्य प्रतिपाद्य विषय है ' ( १।८ ) । इन कथनों से ज्ञात होता - ' नानाविध विद्याएँ । पुराणपरम्परा में प्रसिद्ध ' पञ्चलक्षण ' ( सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंश्यानुचरित; वंशानुचरित शब्द असंगत है ) इस पुराण में गौण हैं, यद्यपि इन पाँच विषयों का प्रतिपादन भी विभिन्न अध्यायों में मिलता है । अग्निपुराण का गौरव विविध विद्याओं का प्रतिपादन करने में ही है । गरुड़ एवं नारदीयपुराणों में भी विद्याओं का विवरण मिलता है, पर अग्निपुराण में यह विवरण अधिक मात्रा में है-यह प्रत्यक्षतः देखा जा सकता है । अग्निपुराण के विषयों का क्रमबद्ध निर्देश अग्निपुराण में जिस क्रम के अनुसार विषयों का प्रतिपादन किया गया है, उसका एक स्पष्ट विवरण नारदीयपुराण ( पूर्वार्द्ध ९९।१-२२ ) में मिलता है । नारदीय - पुराणोक्त क्रम के साथ प्रचलित अग्निपुराण का विषयक्रम सर्वथा समान नहीं है । ' इससे यह अनुमित होता है कि सूचीकार ने जिस अग्निपुराण को देखा था, वह प्रचलित अग्निपुराण से थोड़ा - बहुत भिन्न था । सूचीकार के द्वारा दृष्ट अग्निपुराण ने पुनः सम्पादित ( परिवर्तन - परिवर्द्धन - परिवर्जन से युक्त ) होकर वर्तमान अग्निपुराण का रूप लिया है- यह कहना असंगत नहीं है । प्रचलित अग्निपुराण में जिन विषयों की चर्चा की गयी है, उन विषयों का क्रमबद्ध निर्देश अग्निपुराण के ३८३ अध्याय ( अन्तिम अध्याय ) में किया गया है ( श्लोक ५२-६४ ) । ऐसा प्रतीत होता है कि यह सूची प्रचलित अग्निपुराण को देखकर लिखी गयी है और पुराण के अन्तिम अध्याय के रूप में इस सूची को रखा गया है । सूची-रचना के बाद भी पुराण में ईषत् परिवर्तन हुआ है, क्योंकि सूची में पूर्वमीमांसा और न्यायविस्तर का उल्लेख है ( श्लोक ६० ), पर ये विषय प्रचलित अग्निपुराण में नहीं मिलते । अग्निपुराण का रचना - काल प्रत्येक पुराण का रचना - काल सामान्यतः इतना विवादास्पद है कि ' भूमिका ' में इस पर विचार नहीं किया जा सकता । सामान्य रूप से यह कहा जा सकता है कि चूँकि वल्लालसेन ( ईसवीय १२ वीं शती का मध्य ) को प्रचलित अग्निपुराण ज्ञात था, अतः यह पुराण उनसे कई शताब्दियों से पहले प्रणीत हुआ था । ' कितनी शताब्दियों से पहले ' इसका अवधारण करना दुष्कर है । आधुनिक गवेषक विद्वानों का अनुमान है कि अग्निपुराण का रचना - काल ईसवीय सप्तम शताब्दी के बाद का है । कुछ विद्वानों के अनुसार यह पुराण ईसवीय नवम शताब्दी में या उससे कुछ काल बाद रचित हुआ था ।२ १. सूची में रामोक्त नीति ( अग्निपु ० २८-२४२ ) के बाद रत्नलक्षण कहा गया है, जो अ ० २४६ में है । पर अ ० २४३-२४४ में पुरुषलक्षण, स्त्रीलक्षण आदि कहे गये हैं, जिनका निर्देश सूची में नहीं है । रत्नलक्षण ( अ ० २४६ ) के बाद धनुर्विद्या का उल्लेख किया गया है, जो २४ ९ - २५२ अध्यायों में है । पर अ ० २४७-२४८ में वास्तुपूजा का विधान है, जो सूची में नहीं है । व्यवहार ( अ ० २५३-२५८ ) के बाद देवासुरविमर्द का उल्लेख है, जो अ ० २७६ में है । अ ० २५ ९ -२७५ में चतुर्वेदविधान, पूजा, वेदशाखा, पुराण, वंश आदि कथित हुए हैं; इन विषयों का निर्देश सूची में नहीं है । २. द्रष्टव्य P. V. Kane कृत History of Sanskrit Poetics ( पृ ० ९ ), J. R. A. S. १ ९ १२३, पृ ० ५२७-५४९ में प्रकाशित डॉ ० सुशीलकुमार दे का निबन्ध; Dr. R. C. Hazra कृत Puranic Records ग्रन्थ ( पृ ० १३८ ), J. A. H. R. S. भाग १०, पृ ० १२७-१३४ में S. B. Chowdhury का निबन्ध आदि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१० इस विषय में यह स्पष्टतया ज्ञातव्य है कि नवम शताब्दी अथवा उससे किंचित् पूर्व या पश्चात् काल की रचना होने पर भी अग्निपुराण के सभी श्लोक अग्निपुराण - रचना - काल में ही रचित हुए हैं- ऐसा नहीं समझना चाहिए । ' पुराण - रचना - काल ' का अर्थ है - पुराण के अन्तिम सम्पादन का काल - यद्यपि सम्पादित सामग्री सम्पादन - काल की ही है, ऐसी बात नहीं । इसमें अणुमात्र संशय नहीं है कि अग्निपुराण के अनेक प्रकरण प्राचीन - प्राचीनतर ग्रन्थों के आधार पर ( बहुधा उन ग्रन्थों के वाक्यों का ही प्रयोग कर ) देश - काल- सम्प्रदायानुसार अल्प या अधिक परिवर्तन ( जिसमें परिवर्धन एवं परिवर्जन दोनों हैं ) के साथ लिखे गये हैं । विद्वानों का कहना है कि इस पुराण का तान्त्रिक कर्म - प्रतिपादक अंश अपेक्षाकृत अर्वाचीन है । रचना - काल के विषय में इतना ही कहना पर्याप्त है । अग्निपुराणोक्त विषय चूँकि अग्निपुराण अपना परिचय विविध विद्याओं के संग्राहक के रूप में देता है, इसलिए इस पुराण में प्रतिपादित विषयों पर विचार करना हम सर्वाधिक आवश्यक समझते हैं । प्रस्तुत भूमिका में इन विषयों पर विस्तृत विचार करना सम्भव नहीं है । हम यहाँ पुराणोक्त कुछ पर आकृष्ट हो । अध्याय १ में ऋषियों के प्रश्न के द्विविध विद्या का परिचय दिया है ( ५ - ९ ) है, क्योंकि अथर्ववेदीय मुण्डक उपनिषद् ( के नाम हैं - चार वेद, छह अङ्ग, ज्योतिष, मीमांसा, धर्मशास्त्र, पुराण, न्याय, वैद्यक, विशिष्ट बातों का ही उल्लेख करेंगे, जिससे पाठकों का ध्यान इन विषयों उत्तर में सूत ने शब्दब्रह्म ( ऋग्वेदादिशास्त्र ) एवं परब्रह्म ( ब्रह्मविद्या ) रूप । यह भी कहा गया है कि यह मत ' आथर्वणी श्रुति ' का है । यह कथन सत्य ५।४-५ ) पुराणवाक्य का आधार है । १५-१८ श्लोकों में १८ अपरा विद्याओं छन्दः शास्त्र ( छन्द है अभिधान = नाम जिसका वह छन्दोऽभिधान - छन्द: शास्त्र ), गान्धर्व, धनुर्वेद तथा अर्थशास्त्र । यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि उपर्युक्त मुण्डकवाक्य में चार वेद और छह अंगों का ही निर्देश है, मीमांसा, धर्मशास्त्र आदि आठ शास्त्रों का नहीं । यह निश्चित है कि पुराणवाक्य का आधार मुण्डक उपनिषद् है ( अग्नि १।१७ ख, १८ के साथ मुण्डक १ - १।५-६ तुलनीय है ) और यह भी निश्चित है कि पुराणोक्त विद्यागणना ( अष्टादश विद्यागणना ) परम्परा - प्रसिद्ध है । अतः यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि पुराणकार ने मुण्डक उपनिषद् को अपने आधार के रूप में क्यों कहा । प्रतीत होता है कि मुण्डक उपनिषद् का ऐसा भी कोई पाठ प्रचलित था, जिसमें चार वेद और छह अंगों के अतिरिक्त मीमांसा आदि की गणना भी की गयी थी और अग्निपुराणकार ने उस पाठ के अनुसार उपर्युक्त मत को कहा है । यह मत काल्पनिक नहीं है, क्योंकि न्यायवार्त्तिक की भूमिका में पं ० विन्ध्येश्वरीप्रसाद द्विवेदी ने कहा है कि उन्होंने मुण्डक का ऐसा हस्तलेख देखा है जिसमें अपराविद्या की गणना में वेद - वेदाङ्गों के साथ मीमांसादि शास्त्रों के नाम भी गिनाये गये हैं ( पृ ० २० ) । १ अ ० २-१६ में विभिन्न अवतारों का विवरण इन अध्यायों में दिया गया है । ' मत्स्यावतार के प्रसंग में कृतमाला १. मुण्डक उपनिषद् के किसी पाठ में मीमांसादि का उल्लेख था, यह मुण्डक उपनिषद् के शांकरभाष्य की नारायणकृत दीपिका टीका से भी जाना जाता है । यह बात दूसरी है कि टीकाकार नारायण ने उस पाठ को प्रक्षिप्त माना है । प्रबोधचन्द्रोदय ( कृष्णमिश्रकृत ) की चन्द्रिका टीका से भी ज्ञात होता है कि मुण्डक उपनिषद् के किसी पाठ में मीमांसा, इतिहास - पुराण आदि का उल्लेख था ( पृ ० ३१ ) । अग्निपुराण का मत कितना सुदृढ़ है - यह उपर्युक्त उदाहरण से ज्ञात होता है । २. इन अवतारों के स्वरूपादि के विषय में ( मुख्यतया पुराणवाक्यों का आश्रय करके ) रूपगोस्वामी ने संक्षेपभागवतामृतग्रन्थ ( विद्याभूषणकृत टीका सहित ) में तथा सनातन गोस्वामी ने बृहद्भागवतामृतग्रन्थ में विशद विचार किया है । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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११ नदी का उल्लेख है, जो भागवत ( ८।२४।१२ ) में भी मिलता है, यद्यपि इस कथा के वैदिक मूल १।८।१।१ ) में इस नदी का कोई उल्लेख नहीं है । सम्भवतः अग्निपुराण ( शतपथ ब्राह्मण वनपर्व में इस प्रसंग में चारिणी का आधार भागवतपुराण ही है ( महाभा ० नदी का उल्लेख है, १७७।६ ) । मत्स्य ने वेदापहरणकारी हयग्रीव दानव का भी वध किया था, यह २।१६-१७ में कहा गया है । कूर्मावतार की घटना वाराहकल्प की है, यह २।१७ में कहा गया है । अ ० ४ में वराह, नरसिंह, वामन तथा परशुराम ( ४।१६ में ' राम ' शब्द प्रयुक्त हुआ है, जो इनका प्रकृत नाम है; परशुयुक्त राम = परशुराम ) की कथाएँ हैं । ये कथाएँ अन्यान्य पुराणों में भी हैं; अग्निपुराण के विवरण में कोई वैशिष्ट्य नहीं है । अ ० ५-११ में रामावतार की कथा है । यहाँ का विवरण सप्त - काण्डयुत वाल्मीकि - रामायण पर पूर्णतया आधारित है । पुराण के कितने ही वाक्यांश हैं, जो रामायण में अविकल रूप से या ईषत् पाठभेद के साथ मिलते हैं ॥ यह लक्षणीय है कि गुह का उल्लेख ( ६।३३ ) रहने पर भी शबरी का कोई उल्लेख अग्निपुराण में नहीं मिलता । अ ० १२ में कृष्णावतार का वर्णन है । यहाँ ' हरिवंशं ' प्रवक्ष्यामि ( १२।१ ) कहा गया है, हरिवंश का अर्थ है - हरि का वंश, न कि हरिवंश नामक पुराण । कृष्ण का जो चरित विष्णुपुराण ( अ ० ४ ), ब्रह्मपुराण ( अ ० १८०-२१२ ), हरिवंशपुराण ( विष्णुपर्व ) और भागवत में है, उसका संक्षिप्त - सार यहाँ कहा गया है । कृष्णानुरक्त गोपियों का उल्लेख १२।२३ में है, यद्यपि राधा का नाम नहीं है । अ ० १३-१५ में भारत - कथा ( महाभारत की मूल घटना ) दी गयी है - ' भारतं संप्रवक्ष्यामि ' कहा गया है ( १३।१ ), ' महाभारतम् ' नहीं । इससे यह अनुमित हो सकता है कि २४ सहस्रश्लोकमय जो भारतसंहिता थी, उसका सार यहाँ दिया गया है । पर यह अनुमान सुदृढ़ नहीं है, क्योंकि अग्निपुराण के रचना - काल में भारतग्रन्थ प्रचलित था - ऐसा मानना कठिन है । यह हो सकता है कि परम्परा में भरतवंशियों की जो कथा ज्ञात थी, उसके आधार पर यह श्लोकबद्ध प्रकरण लिखा गया है । गीता का उपदेश अ ० १४ में लक्षित हुआ है । अ ० १६ में बुद्ध और कल्कि का वर्णन है । बुद्ध को दैत्यमोहकर एवं शुद्धोदनसुत कहा गया है । कलियुगान्त में आविर्भूत होनेवाले कल्कि के प्रसंग में दो बातें कही गयी हैं, जो अस्पष्ट हैं- ( १ ) कलियुगान्त में वाजसनेयक वेद की १५ शाखाओं की स्थिति ' तथा ( २ ) याज्ञवल्क्य को कल्कि का पुरोहित मानना । ( अ ० १७-२० ) अ ० १७ में जगत् - सृष्टि, अ ० १८ में स्वायंभुवमनु ( प्रथम मनु ) के वंशजों के नाम तथा अ ० १ ९ में कश्यप के वंशजों के नाम कहे गये हैं । १ ९।२३-२९ में राज्यप्रदान का विवरण ( किसको किस विषय का अधिपति बनाया गया — इसका विवरण ) है । यह विषय गीता ( अ ० १० ) में भी है ( अमुकों में मैं अमुक हूँ - इस प्रकार का उल्लेख करके ) । गीता में जहाँ ' मरीचिर्मरुतामस्मि ' ( १०-२१ ) कहा गया है, वहाँ पुराण में ' मरुतां वासवः प्रभुः ' कहा गया है ( १ ९ -२४ ), प्रह्लाद ' को दानवाधिप कहा गया है ( १ ९ ।२४ ), यद्यपि जातितः प्रह्लाद दैत्य है ( दिति - गर्भज हिरण्यकशिपु के पुत्र होने के कारण ) । गीता में उचित ही कहा गया है - ' प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानाम् ' ( १०।३० ) । १. अग्निपुराण के आनन्दाश्रम संस्करण के सम्पादक ने वेदशाखापरक वाक्य के पाठ को सन्दिग्ध माना है । ( प्रश्नज्ञापक चिह्न का प्रयोग करके ) । इस प्रसंग में यह ज्ञातव्य है कि हरिवंश के कलियुग - विवरण में कहा गया है -- सर्वे वाजसनेयिनः ( ३।३।१२ ) । इस पर टीकाकार नीलकण्ठ कहते हैं - ' शाखान्तरलोपात् । तेन वेदत्रयसाध्यो यज्ञ उत्सन्नो भविष्यति इति भावः । इदानीमेव पश्चिमदेशे तथा दर्शनात् ' । २. अग्निपुराण में ' प्रह्लाद ' ऐसा रकारघटित मुद्रित पाठ है । यह पाठ अन्यत्र भी मिलता है । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१२ अ ० २० में प्राकृत आदि सर्गों का उल्लेख तथा भृगु, मरीचि आदि के वंशों का विवरण है । उपर्युक्त सभी विषय अन्यान्य पुराणों में भी हैं । अग्निपुराणगत विवरण अत्यल्प है तथा इस विवरण का कोई वैशिष्ट्य नहीं है । ( अ ० २१-१०६ ) अनेक स्मार्त एवं तान्त्रिक कर्मों का विवरण इन अध्यायों में मिलता है । यह विवरण तन्त्र एवं स्मृतिग्रन्थों पर आधारित है । आधारग्रन्थों की तुलना में पुराण का विवरण अनेकत्र संक्षिप्त एवं सामान्य है । इन अध्यायों में विभिन्न देवताओं की सामान्य पूजा ( स्नान आदि कर्मों के वर्णनों के साथ ) तथा प्रतिष्ठाविधि ( वास्तुपूजा, प्रासाद में देवतास्थापन, प्रतिमाओं के लक्षण, शालिग्रामों के लक्षण, शान्तिकर्म, अधिवास, ध्वजारोपण, होम, दीक्षा आदि के साथ ) कही गयी हैं । यहाँ कुछ विशिष्ट बातें मिलती हैं, यथा - हयशीर्ष आदि २५ तन्त्रों के नाम ( अ ० ३ ९ ), स्मार्तकर्मों के प्रसंग में अनेक वैदिक मन्त्र, सूक्त आदि का उल्लेख ' ( अ ० ५६, ५८, ६०, ६१, ६२, ६४, ६६, ६७ ) है, ये सभी मन्त्र आदि वैदिक ग्रन्थ एवं सूत्रग्रन्थों में मिल जाते हैं । पुस्तक - लेखन की चर्चा ६३।१३ - १६ में है । यहाँ रौप्य आधार में स्वर्णनिर्मित लेखनी से नागराक्षर लिखने का उल्लेख है । ' गर्गविद्या ' शब्द का प्रयोग ६५/७ में है, इसका अर्थ है - गृह - प्रासादादि निर्माण का शास्त्र । वास्तुशास्त्र से तथा बृहत्संहिताग्रन्थ से ज्ञात होता है कि गर्ग इस विद्या के आचार्य थे । दीक्षा के प्रसंग में अनेक तान्त्रिक मन्त्र भी उद्धृत हुए हैं । ( मन्त्रों का पाठ तन्त्रग्रन्थ के आधार पर कहीं - कहीं संशोधनीय है ) । तन्त्र की कई गूढ़ बातें ( जैसे शक्तिपात, ८८।५६-६१ ) यहाँ कही गयी हैं । ( अ ० १०७-१२० ) स्वायंभुवमनु ( प्रथम मनु ) का वंश, तीर्थ एवं भुवनकोश यहाँ प्रतिपादित हुए हैं । स्वायंभुवमनु के वंशजों ने पृथिवी को सात द्वीपों में बाँटकर राज्य किया था - यह पुराणप्रसिद्ध मत है । इन द्वीपों ( जम्बू आदि ) के वर्ष, नदी, पर्वत आदि का विवरण पुराणीय भुवनकोश का मुख्य विषय है । अग्निपुराण का विवरण संक्षिप्त है । यहाँ यह महत्त्वपूर्ण सूचना दी गयी है कि स्वायंभुववंशीय भरत के नाम से इस देश का नाम भारत ( वर्ष ) पड़ा था ( १०७।१२ ) । प्रायः सभी पुराणों में यह मत मिलता है । शकुन्तलापुत्र भरत के नाम से इस देश का नाम भारत हुआ था - यह मत पुराणों द्वारा कथमपि समर्थित नहीं होता है - यह ज्ञातव्य है । भरत का उल्लेख १०७ अ ० में है, उनका चरित ३८० अ ० में द्रष्टव्य है । इस पुराण में भुवनकोश का प्रारम्भिक विवरण १०७-१०८ अ ० में दिया गया है, अ ० ११८-१२० में भारतवर्ष, प्लक्ष आदि द्वीप तथा पाताल आदि का विवरण दिया गया है । अग्निपुराण के विवरण में कोई विशिष्ट बात नहीं मिलती । अग्निपुराण में तीर्थपरक विवरण विस्तृत नहीं है । अ ० १० ९ में तीर्थों की गणना, अ ० ११० में गंगा का माहात्म्य, अ ० १११ में प्रयाग - माहात्म्य, अ ० ११२ में वाराणसी - माहात्म्य, अ ० ११३ में नर्मदा - माहात्म्य, अ ० ११४-११६ १. अग्निपुराण के सभी संस्करणों में ये मन्त्र आदि कहीं - कहीं भ्रष्टरूप से मुद्रित हुए हैं । २५।२ ९ में यज्ञ को ' सप्तरूप ' कहा गया है, पर छह ही रूपों के नाम कहे गये हैं - अग्निष्टोम, उक्थ, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम ( २८-२ ९ ) । यहाँ अग्निष्टोम के बाद अत्यग्निष्टोम नाम होना चाहिए । इन अध्यायों में जिन वैदिक सूक्तों के नाम कहे गये हैं ( श्रीसूक्त, मैत्रक, वृषाकपि आदि ) उनके परिचय के लिए मेरा ' पुराणगत - वेदविषयक सामग्री का समीक्षात्मक अध्ययन ' ग्रन्थ ( अ ० २, परि ० ५ ) द्रष्टव्य है । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 17

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१३ में गया - माहात्म्य कहे गये हैं । इन अध्यायों के कुछ श्लोकों का तात्पर्य स्पष्टीकरणीय है ( यथा १११।४ ) १, कहीं-कहीं यात्राविधि भी कही गयी है । वाराणसी - माहात्म्य में अष्ट गुह्येश्वर की गणना है ( ११२।३-५ ) । पर गिनने पर सात नाम होते हैं । हिन्दी अनुवादक ने भूमि और चण्डेश्वर को दो नाम मानकर आठ संख्या की पूर्ति की है, जो विचारणीय है । गयातीर्थ के प्रसंग में महाबोधितरु का उल्लेख है ( ११५।३२ ) । अन्य पुराणों में भी इसी प्रकरण में इसका उल्लेख मिलता है । गया के प्रसंग में ही चार प्रकार की मुक्ति कही गयी है । कात्यायन द्वारा प्रोक्त श्राद्धकल्प का उल्लेख ११७।१ में है । चूँकि गयातीर्थ के साथ श्राद्ध का निकटतम सम्बन्ध है, अतः गयातीर्थ के बाद श्राद्ध का प्रसंग किया गया है - ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है । कात्यायन नामक ऋषि का कोई श्राद्धसूत्र था - यह वैदिकपरम्परा में प्रसिद्ध है, निबन्धग्रन्थों में इस ग्रन्थ के वाक्य उद्धृत हुए हैं । ( अ ० १२१-१४३ ) फलितज्योतिष, युद्धजयार्णव, नानाविध मन्त्र, ओषधि एवं तान्त्रिक कर्म इन अध्यायों में कहे गये हैं । अ ० १२३-१३९ में युद्धजयार्णव है, युद्ध में विजय - प्राप्ति के लिए जिन तान्त्रिक कर्मों का अनुष्ठान किया जाता है, वे यहाँ कहे गये हैं । युद्धजयार्णव नामक कोई ग्रन्थ अवश्य था, क्योंकि निबन्धग्रन्थों में इस ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है । यहाँ जो कुब्जा - पूजा और त्वरिता - पूजा का उल्लेख है, उनका विशेष विवरण तन्त्रग्रन्थों में द्रष्टव्य है ( द्र ० कृष्णानन्द आगमवागीश - कृत तन्त्रसार ) । इन अध्यायों में कुछ विशिष्ट बातें कही गयी हैं-( १ ) जरामृत्युनाशक ३६ ओषधियों की एक सूची १४१।१ - ५ में दी गयी है, ( २ ) अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी आदि नक्षत्रों के संक्षिप्त नाम ( अ, भ, कृ, रो आदि ) १३६ । ७-८ में कहे गये हैं । ३ ( अ ० १५० ) स्वायंभुव, स्वारोचिष आदि चौदह मन्वन्तरों का जैसा विवरण अन्य पुराणों में मिलता है, वही यहाँ भी है । अध्यायान्त में एक वेद के चतुर्धाकरण का तथा ऋक् आदि चार वेदों की शाखाओं का अतिसंक्षिप्त उल्लेख मिलता है । यहाँ यजुर्वेद की २७ शाखाएँ हैं- ऐसा कहा गया है ( १५०।२७ ) । इस मत का मूल अन्वेषणीय है । वेदशाखाविवरणपरक चरणव्यूहग्रन्थ में ' यजुर्वेदस्य चतुर्विंशतिभेदा भवन्ति ' कहा गया है । ऐसा प्रतीत होता है कि ‘ सप्तविंशतिभेद ' माननेवाली भी कोई वैदिक परम्परा थी । अथर्ववेदीय शाखा के प्रसंग में पिप्पलाद आदि शाखाकार आचार्यों का उल्लेख है ( पैप्पलादीन् सहस्रशः, १५०।३०, ' पैप्पलादीन् ' के स्थान पर ' पिप्पलादीन् ' होना चाहिए— ' पिप्पलाद ' ही ऋषि का नाम है, पैप्पलाद नहीं ) । ४ १. गङ्गायमुनयोर्मध्यं पृथिव्या जघनं स्मृतम् । प्रयागं जघनस्यान्तरुपस्थवृषयो विदुः ॥ ( १११/४ ) । जघन एवं उपस्थ से कौन - सा सादृश्य विवक्षित है - यह निर्धारणीय है । २. ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोगृहे मरणं तथा । वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा ॥ ( ११५ / ५ ख -६ क ) यहाँ प्रकृत पाठ ' गोग्रहे मरणं ' ( किसी के द्वारा बलपूर्वक गो का ग्रहण होने पर उसका विरोध करनेवाले का जो मरण होता है वह ' गोग्रहे मरणम् ' है ) । ' गोगृह में मरण ' कोई उदात्त कर्म नहीं है । यह श्लोक अन्य ग्रन्थों में भी मिलता है, जहाँ ' गोग्रहे मरणम् ' पाठ है । ३. संक्षेपीकरण की ऐसी प्रवृत्ति अन्यत्र भी देखी जाती है । आषाढी - कार्तिकी - माघी - वैशाखी ( पूर्णिमा ) के लिए ' आ - का - मा - वै ' शब्द का प्रयोग स्मार्त ग्रन्थकारों ने किया है । ४. अथर्ववेद की शाखाएँ आजकल प्रचलित हैं - शौनक तथा पिप्पलाद । पुराणों में अथर्ववेद के प्रथम मन्त्र के निर्देश में पिप्पलाद शाखा के प्रथम मन्त्र का ही उल्लेख सर्वत्र किया गया है । यह ज्ञातव्य है ( द्र ० पुराणगत - वेदविषयक सामग्री का समीक्षात्मक अध्ययन, पृ ० १३ ९ -१४० ) । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१४ ( अ ० १५१-२१७ ) वर्णाश्रम - धर्म तथा व्रत आदि का विशद विवरण इन अध्यायों में मिलता है । इस विवरण में कोई वैशिष्ट्य नहीं है, मनु, याज्ञवल्क्य आदि के वाक्य अविकलरूप से या अल्पाधिक परिवर्तन के साथ यहाँ मिलते हैं । कहीं - कहीं भ्रष्ट पाठ भी है । अग्निपुराण में ‘ पञ्चधा ' धर्म कहा गया है ( १६६।१ ) । वर्ण, आश्रम, वर्णाश्रम, गुण और नैमित्तिक रूप पाँच भेद स्वीकृत हुए हैं । यह दृष्टि परम्परास्वीकृत है ( द्र ० मनुस्मृति २१५ का मेधातिथिकृत भाष्य ) । यह ज्ञातव्य है कि पुराणों में वर्णित धर्मकृत्य पृथक् - पृथक् शाखा पर प्रायेण प्रतिष्ठित होता है । यही कारण है कि कर्मानुष्ठानसम्बन्धी पौराणिक मतों में कभी - कभी भिन्नता पायी जाती है, उदाहरणार्थ अग्निपुराण में बृहस्पतिग्रह का मन्त्र ' बृहस्पते अतियदर्यो '... ' ( ऋग्वेद २।२३।१५ ) है ( १६४।७ ), जबकि मत्स्यपुराण ( १३।३५ ) में ' बृहस्पते परिदीया.... ……… ". ' ( ऋग्वेद १०।१०३।४ ) है । व्रत के प्रसंग में यह कहा गया है कि व्रत को क्यों ' तपः ' या ' नियम ' कहा जाता है ( १७५।२-३ ) । इस पुराण में तिथि के अनुसार व्रतों का विवरण दिया गया है और बाद में ' नक्षत्रव्रत ', ' दिवसव्रत ' आदि का विवरण है । प्रत्येक व्रत के साथ सम्बन्धित पूजा, उपवास आदि भी उल्लिखित हुए हैं । दोनों का विवरण अ ० २१० में है, प्रकरण के अन्त में सन्ध्या एवं गायत्री का विवरण दिया गया है । गायत्री का अर्थ अ ० २१५ में सविस्तार दिया गया है । इस प्रसंग में एक विशेष बात ज्ञातव्य है । गायत्री मन्त्र ( ऋग्वेद ३।६२।१० ) में जो ' प्रचोदयात् ' शब्द है, वह लोट् लकार का रूप है, विधिलिङ्ग का नहीं, पर अग्निपुराण में ' प्रचोदयात् ' की व्याख्या ' प्रेरयेत् ' शब्द से की गयी है, जो विधिलिङ्ग का रूप है । इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि पुराणकार को यहाँ भ्रम हुआ है । ' ( अ ० २१८-२४२ ) राजनीति- राजधर्म का प्रतिपादन इन अध्यायों में किया गया है । अ ० २१८-२३७ में वक्ता पुष्कर हैं और श्रोता राम अर्थात् परशुराम ( भार्गवराम ) हैं, दाशरथि राम नहीं । इन अध्यायों में राजा का अभिषेक, सहाय - सम्पत्ति, भृत्य आदि के कर्त्तव्य, दुर्ग, राज्यपालन, अन्तःपुर - व्यवस्था, साम - दाम - दण्ड - भेद, युद्ध, शकुन ( शुभाशुभसूचक - चिह्न ), षाड्गुण्य ( सन्धि, विग्रह आदि ) तथा प्रात्यहिक राजकर्म आदि का विशद विवरण दिया गया है । अ ० २३८-२४२ पर्यन्त राम - प्रोक्त राजनीति है ( लक्ष्मण के प्रति प्रोक्त ) । इसमें सात अंग ( स्वामी, अमात्य, राष्ट्र आदि ) एवं सन्धि आदि छह गुणों के साथ तीन शक्तियों ( प्रभाव - मन्त्र- उत्साह - शक्ति ) राज्यव्यसन, सामादि उपाय एवं षड्विध बलों की विस्तृत चर्चा की गयी है । दोनों नीतियों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि राजनीति कामन्दकीय नीतिसार का अतिसंक्षिप्त रूप है; तथा पुष्करोक्त नीति की अपेक्षा इसमें कौटिल्य की चिन्ताधारा अधिक मात्रा में प्रतिफलित हुई है ।२ ( अ ० २४३-२४५ ) अ ० २४३-२४४ में समुद्र नामक आचार्य के द्वारा प्रोक्त स्त्री - पुरुष - लक्षणशास्त्र का सार १. देवीभागवत की टीका में नीलकण्ठ ने भी गायत्रीमन्त्रस्थ ' प्रचोदयात् ' को विधिलिङ्ग का रूप ही समझा है, क्योंकि वे कहते हैं-' प्रचोदयात् प्रेरयेत् प्रार्थनायां लिङ्ग ' ( टीकारम्भ में भागवतस्वरूपविचारप्रकरण द्रष्टव्य ) । २. दशरथ शर्मा के Political thought and practice in the AgnipurIna शीर्षक लेख ( PurIna Vol. III, PP. 23-37 ) में इन दोनों नीतियों पर विशद चर्चा की गयी है । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१५ कहा गया है । यह सामुद्रिक विद्या कहलाता है । शरीर का कौन अंग किस प्रकार का होने पर किस भाव ( शुभ-अशुभ ) का सूचक होता है - यह इस शास्त्र में दिखाया जाता है । यह ' अङ्गविद्या ' बहुत प्राचीन है । पाणिनि के गणपाठ ( ४-३-७३ ) में इस विद्या का निर्देश है । लक्षणप्रकाश आदि ग्रन्थों में इस शास्त्र के अनेक वाक्य उद्धृत मिलते हैं अ ० २४५ में चामर, खड्ग आदि के विषय में कई ज्ञातव्य बातें कही गयी हैं; यथा- किस देश के खड्ग का वैशिष्ट्य । क्या है, यह २४५।२२ में उल्लिखित हुआ है । ( अ ० २४६-२४८ ) विभिन्न दलों के लक्षण, वास्तु ( गृहनिर्माणार्थ भूमि ) के लक्षण तथा पूजा में उपयोगी पुष्पों के विवरण यहाँ दिये गये हैं । ( अ ० २४ ९ -२५२ ) इन अध्यायों में धनुर्वेद का स्पष्ट विवरण दिया गया है । वैशम्पायन आदि के प्राचीन धनुर्वेदविषयक ग्रन्थ लुप्त हो गये हैं । वासिष्ठी धनुर्वेदसंहिता प्रचलित है, पर वह अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ प्रतीत नहीं होता ( इस ग्रन्थ का बँगला अनुवाद प्रकाशित हो चुका है ) । कोदण्डमण्डन - ग्रन्थ बँगला - लिपि में सानुवाद प्रकाशित है, पर यह बहुत ही अर्वाचीन ग्रन्थ है । युक्तिकल्पतरु आदि कुछ ग्रन्थों में इस शास्त्र का अल्प विवरण मिल जाता है । ऐसी स्थिति में अग्निपुराणोक्त धनुर्वेद महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ का विवरण अपेक्षाकृत विशद है । कामन्दकीय नीतिसार का कुछ प्रभाव भी पुराणोक्त विवरण में देखा जाता है । चतुरङ्गबल प्रसिद्ध है, अग्निपुराण में अस्त्रहीन योद्धा को पञ्चम बल माना गया है । योद्धाओं के आसनों के नामों में कुछ भिन्नता मिलती है । ( अ ० २५३-२५८ ) स्मृतिशास्त्रीय व्यवहार - प्रकरण का एक सारवान् विवरण इन अध्यायों में दिया गया है । जिन विषयों को लेकर विवाद, हिंसा आदि कर्म किये जाते हैं, वे ' व्यवहार ' के विषय हैं । ऋण, साक्ष्य, सम्पत्तिविभाग, सीमा, परुषवाक्य आदि से सम्बन्धित व्यवहार व्यवहारप्रकरण में विचारित होते हैं । अग्निपुराण का यह प्रकरण याज्ञवल्यक्यस्मृतिगत व्यवहारप्रकरण पर अधिकांशतः आधारित है; कहीं - कहीं नारदस्मृति का भी अनुसरण किया गया है - ऐसा विद्वानों का कहना है । ' ( अ ० २५ ९ -२६२ ) ऋग् - यजुः - साम- अथर्ववेदों के मन्त्र - सूक्त - अनुवादक आदि का विनियोग ( कर्मों में प्रयोग ) इन अध्यायों में दिखाया गया है । यह प्रकरण ऋग्विधान आदि ग्रन्थों पर प्रतिष्ठित है । खेद है कि इन अध्यायों के पाठ अनेकत्र भ्रष्ट हो गये हैं । कुछ शब्द अस्पष्ट हैं, यथा- एकचक्रा ( २६०-८१ ), तनूनन्पाग्ने सदिति ( २६०-१५ ) । विनियोग के लिए ऋषि, देवता, छन्द का ज्ञान चाहिए- इस वैदिक दृष्टि का उल्लेख २६२-२५ में किया गया है । ( अ ० २६३-२७० ) उत्पातशान्ति, पूजा, वैश्वदेव - बलि, स्नान, होम, नीराजन ( एक प्रकार का कर्म जो युद्ध से पहले राजा के द्वारा अनुष्ठित होता है ) आदि यहाँ कहे गये हैं । स्मृति आदि शास्त्रों में इन कर्मों का जो विवरण ?. The Vyavahara portion of the Purana leaves no doubt that it is borrowed partly from the Naradasmriti and largely from the Yajnavalkya - smriti ( द्र ० Purana पत्रिका के वर्ष २० में S. C. Banerjee का लेख ' Vyavahara portion of the Agni purana ' ), पृ ० ३ ९; काणे कृत History of Dharmashastra भाग १, पृ ० १६२ भी द्रष्टव्य । २. उभे पुमान मन्त्र २५ ९ / ३३ में उक्त हुआ है, जिसका प्रकृत पाठ ' उभे पुनामि ' है ( द्र ० ऋग्वेद १/१३३/१ ) । ' स्वस्ति पन्था ' मन्त्र ( २५ ९ / ५१ ) मन्त्र का प्रकृत पाठ ' स्वस्ति पन्थाम ' होगा ( ऋग् ० ५/५१/१५ ); या ओषधयः ( २५ ९ / ८५ ) ' या ओषधीः ' होगा; या सेना ( २६०/३५ ) ' याः सेना ' होगा ( यजुर्वेद ११/७७ ), चत्वारि शृङ्गः ( २६०/३८ ) ‘ चत्वारि शृङ्गाः ' होगा ( यजुः ( १७ / ९ १ ); परिमे गामनेनेति ( २६०/७७ ) ' परी मे ' ( यजुः ३५/१८ ) होगा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१६ है, इस पर ही पुराण का विवरण आधारित है । कहीं - कहीं मन्त्रादि के पाठ में भ्रंश है । ' स्रावन्तीयं " ( २६३।२ ) का प्रकृत पाठ ‘ श्रायन्तीयं... ' होगा । यह ‘ श्रायन्त इव सूर्यम्... ' इस सामवेदीय मन्त्र ( २६७ स्वाध्यायमण्डल संस्क ० ) पर गायी जानेवाली गीति का नाम है । २६ ९ ।१४ में कुमुद, ऐरावत ( ऐरावण पाठ भ्रष्ट है ) आदि दिग्गजों के नाम कहे गये हैं ( अमरकोश, दिग्वर्ग ५ ); इनको यहाँ ' देवयोनि ' कहा गया है । अवश्य ही ' देवयोनि ' पाठ भ्रष्ट है, क्योंकि अन्यान्य ग्रन्थों में भी कुमुद आदि को ' दिग्गज ' ही कहा गया है । ( अ ० २७१-२७२ ) वेद की शाखाओं तथा अट्ठारह पुराणों का विवरण यहाँ दिया गया है । चारों वेदों के मन्त्रों की संख्या एक लाख कही गयी है ( २७१।१ ) । यह मत परम्परागत है, क्योंकि चरणव्यूह में ' लक्षं तु चतुरो वेदा: ' कहा गया है । ‘ शत साहस्र समित ' ( अर्थात् एक लाख परिमाणवाले ) वेद का उल्लेख विष्णुपुराण ३।४।१ में मिलता है । यह गणना किस रीति से की गयी है- यह अज्ञात है । ऐसी एक प्रसिद्धि है कि वेद के ८०००० मन्त्र कर्मकाण्डपरक, १५००० मन्त्र उपासनापरक तथा ५००० मन्त्र ज्ञानपरक हैं । इस प्रसिद्धि की संगति चिन्तनीय है । यहाँ ऋग्वेदीय मन्त्र के परिमाण के विषय में ' यतानि दश ' ( १००० ) कहा गया है ( २७१।२ ), जो प्रायः सत्य है । ' ऋग्वेदीय ब्राह्मण के परिमाण के विषय में जो कहा गया है ( ब्राह्मणं द्विसहस्रकम् ), वह परीक्षणीय है । इस पुराण में ऋग्वेद की आश्वलायन शाखा एवं शाङ्खायन शाखा का उल्लेख है ( २७१।२ ) । वायु आदि पुराणों के शाखा प्रकरण में ये नाम नहीं मिलते हैं । कुछ विद्वानों का कहना है कि ये दो शाखाएँ कृष्णद्वैपायन व्यास से पहले काल की हैं, अतः वायु आदि पुराणों में इन दोनों के नाम नहीं लिये गये हैं क्योंकि इन पुराणों में कृष्णद्वैपायन की परम्परा कृत शाखाविभाग का ही विवरण दिया गया है । चारों वेदों की शाखा आदि के मुद्रित नामों में कई भ्रष्ट पाठ हैं । मूल पुराण संहिता ( जिसको व्यास ने बनाकर लोमहर्षण को पढ़ाया ) का उल्लेख २७१।११-१२ में मिलता है । छह आदिम पुराणाचार्यों के नामों के पाठ कुछ भ्रष्ट हो गये हैं? - शिंशपायन शांशपायन होगा, कृतव्रण अकृतव्रण होगा । यहाँ १८ पुराणों में प्रत्येक का जो श्लोकपरिमाण कहा गया है ( २७२।१-२३ ), उसका पूर्णयोग ३४०००० ( तीन लाख चालीस हजार ) होता है - चार लाख नहीं । कुछ पुराणों के श्लोकपरिमाण सांशयिक हैं- पद्मपुराण का

श्लोकपरिमाण १२००० कहा गया है, जो अन्यत्र नहीं मिलता । पद्मपुराण का जो प्रचलित रूप है, उसमें न्यूनाधिक

५००० श्लोक निश्चयेन हैं । सम्भवतः पद्मपुराण के श्लोकपरिमाण का मुद्रित पाठ भ्रष्ट है । ( अ ० २७३-२७८ ) सूर्य एवं सोम वंशों ( ये दो राजवंश हैं ) का धारावाहिक विवरण यहाँ दिया गया है । इस विवरण में अग्निपुराण का कोई वैशिष्ट्य नहीं है । यह विवरण प्राचीन प्रतीत नहीं होता । अनेक नये श्लोक बनाकर पुराणकार ने इस प्रकरण की रचना की है । कान्यकुब्ज एवं काशी वंश के विवरण में कई भ्रान्तियाँ लक्षित होती हैं ।३ १. तुल ० दशेदमृक्सहस्त्राणि निर्मथ्य ( शान्तिपर्व २४६/१४ ) । इसकी व्याख्या में नीलकण्ठ ने कहा है कि प्रकृतमन्त्रसंख्या दस सहस्र से कुछ अधिक है । इस विषय में अतिविस्तृत विचार के लिए पं ० युधिष्ठिर मीमांसक कृत ' ऋग्वेद की ऋक्संख्या ' ग्रन्थ द्रष्टव्य है । २. इन छह पुराण प्रणेताओं एवं मूलपुराणसंहिता के विषय में विशद विवरण के लिए ( Ancient Indian Historical Tradition ) ग्रन्थ ( पृ ० २१-२४ ) तथा पं ० बलदेव उपाध्यायकृत पुराणविमर्श ( पृ ० ५८-६२ ) द्रष्टव्य हैं । ३. द्र ० Ancient Indian Historical Tradition ( पृ ० ८० ) । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA