अग्नि पुराण — पृष्ठ 21–30
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 21–30
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१७ इन अध्यायों में कई नाम भ्रष्ट रूप से मुद्रित हुए हैं । एक उदाहरण लें- गङ्गायां शन्तनोर्भीष्मः चित्रवीर्यकः । कृष्णद्वैपायनश्चैव क्षेत्रे वैचित्र - वीर्यके ॥ ( २७८।३६ ) । इन श्लोकों में ' काल्यायां ' के स्थान पर काल्यायां ' काल्यां पाठ होगा तथा ' वैचित्रवीर्यके ' एक शब्द होगा । ’ यहाँ शकुन्तलापुत्र भरत के विषय में कहा गया है- दुष्यन्ताद् भरतोऽभवत् । शकुन्तलायां तु बली यस्य नाम्ना तु भारताः ( २७८।६-७ ) । ' भारताः ' का अर्थ है- ' भारता जनाः ' - भारत नामक जनसमुदाय ( क्षत्रियगण ) । इससे स्पष्ट है कि पुराणकार के अनुसार इस देश का ' भारत ' नाम शकुन्तलापुत्र के नाम के अनुसार नहीं पड़ा । सभी पुराणों के अनुसार इस नाम का हेतु है - स्वायंभुवमनुवंशीय भरत, जो भारतवर्ष के अधिपति थे ' । ( अ ० २७ ९ -२८६ ) धन्वन्तरि ने सुश्रुत के प्रति जो आयुर्वेदविषयक सिद्धान्त कहा, वह यहाँ प्रतिपादित हुआ है । मनुष्य, अश्व तथा हस्ती के रोग, रोगों की चिकित्सा तथा अन्यान्य आवश्यक विषय संक्षेप - विस्तार के साथ कहे गये हैं । यह विवरण वाग्भट - कृत अष्टाङ्गहृदय पर मुख्यतया आधारित है । २ ( अ ० २८७।२ ९ २ ) अङ्गराज लोमपाद ( १८६।२४ ) के प्रति ' हस्तिशास्त्रविद् ' पालकाप्य ने जो कहा, उसका सार यहाँ दिया गया है । पालकाप्य का ग्रन्थ प्रसिद्ध रहा है । उनका हस्त्यायुर्वेदपरक ग्रन्थ मुद्रित हुआ है । कुमारिल भट्ट के तन्त्रवार्त्तिक में इस ग्रन्थ का वाक्य उद्धृत हुआ है ( पृ ० २५ ९, आनन्दाश्रम संस्करण ) । अश्वायुर्वेद के दो वक्ता हैं - धन्वन्तरि ( अ ० २८८ ) तथा शालिहोत्र ( २८ ९ -२ ९ १ ) । गजशान्ति ( अ ० २ ९ १ ) के वक्ता भी शालिहोत्र हैं । अद्भुत सागर ग्रन्थ में शालिहोत्र के मत उद्धृत हुए हैं । धन्वन्तरि द्वारा प्रोक्त गवायुर्वेद का विवरण अ ० २ ९ २ में मिलता है । वहाँ गोचिकित्सा के साथ गोपरक शान्ति कर्म भी उक्त हुआ है । ( अ ० २३ ९ -३२७ ) नानाविध ( वैदिक एवं तान्त्रिक ) मन्त्रों का प्रयोग तथा मन्त्रसिद्धि के उपाय यहाँ कहे गये हैं । अ ० २ ९ ५ में मन्त्रप्रयोग द्वारा सर्पदंश की चिकित्सा कही गयी है, इस अध्याय में विषसम्बन्धी आवश्यक बातें मिलती हैं । स्तम्भनादि - षट्कर्मपरक मन्त्र अ ० ३१५ में हैं । ( अ ० ३२८-३३५ ) छन्दःशास्त्रपरक जो विवरण यहाँ दिया गया है, वह पिङ्गलछन्द सूत्र पर आधारित है । छन्दःसूत्र के विषयक्रम का भी अनुसरण अनेक स्थानों पर किया गया है - यह देखा जाता है । छन्द सम्बन्धी गण, छन्दों के देवता, पाद, उत्कृति आदि छन्दोभेद, सम - अर्धसम - विषम रूप तीन छन्द - प्रकार, यति तथा प्रस्तार का विशद विवरण यहाँ मिलता है । कुछ श्लोकों के पाठ भ्रष्ट हैं । ३३०।९ ( स्कन्धो ग्रीवा ) का पाठ भ्रष्ट है, शुद्ध पाठ होगा - ' स्कन्धोग्रीवी क्रौष्टुकेः स्याद् यास्कस्योरोबृहत्यपिः; द्र ० छन्दः सूत्र ३।२ ९ -३० । ३३४।२६ में मत्तक्रीडा नाम छपा है, जो मत्ता क्रीडा होगा ( द्र ० छन्दः सूत्र ७।२८ ), उसी प्रकार ३३४।२ ९ में जो ' दण्डदः ' शब्द है, वह दण्डकः होगा । १. यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि कालिदास ने भी शकुन्तला नाटक में शकुन्तलापुत्र भरत के विषय में यह नहीं कहा कि इस देश का नाम भरत के नाम के अनुसार हुआ था । २. अग्निपुराण के इन अध्यायों पर पूर्ववङ्ग - निवासी कविराज ( वैद्य ) गङ्गाधर ( १७ ९८-१८८५ ई ० ) का एक भाष्य है । यह भाष्य अब अप्रचलित हो गया है । भाष्यकार ने चरक पर जल्पकल्पतरु नामक सुप्रसिद्ध टीका लिखी है । ३. गोपरकशास्त्र प्राचीनकाल में रचित हुआ था - यह निश्चित है । बृहत्संहिता ( अ ० ६१ ) में पराशकृत गोलक्षण का उल्लेख है । २ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१८ ( अ ० ३३६ ) शिक्षा ( ' वर्णोच्चारणशास्त्र ' ) परक यह अध्याय श्लोकात्मक पाणिनीय शिक्षा पर आधारित है-यह स्पष्टतया प्रतीत होता है । डॉ ॰ मनीमोहन घोष द्वारा सम्पादित ' पाणिनीय शिक्षा ' ( कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित ) में इस शिक्षा - अध्याय का अन्तर्भाव किया गया है । सम्पादक ने टिप्पणियों में अग्निपुराण के मतों पर कहीं - कहीं संक्षिप्त आलोचना की है । ( अ ० ३३७-३४७ ) इन ११ अध्यायों के विषय यथाक्रम में हैं- काव्यादि- लक्षण, नाटकादि - लक्षण, रसनिरूपण, रीतिनिरूपण, नृत्यादिगत अङ्गकर्म, अभिनयादि, शब्दालङ्कार, अर्थालङ्कार, शब्दार्थालङ्कार, काव्यगुण तथा काव्य - दोष । अग्निपुराण के इन अध्यायों के विषय में कई विद्वानों ने विचार किया है । पुराणोक्त मतों का मूल क्या है तथा पुराणमतों का आश्रयकारी कौन - कौन आचार्य हैं - इत्यादि विषयों का निरूपण करने की चेष्टा की गयी है । ' डॉ ॰ सुशीलकुमार दे ने अत्यन्त विशदता के साथ यह दिखाया है कि अग्निपुराणगत यह विवरण भोज के सरस्वतीकण्ठाभरण ग्रन्थ का उपजीव्य है । ( अ ० ३४८ ) एकाक्षराभिधान अर्थात् एकाक्षर कोश । इसमें अ, आ आदि वर्णों के अर्थ दिये गये हैं, कु आदि अक्षरों ( व्यञ्जन सहित स्वर = अक्षर ) के अर्थ भी कहीं - कहीं कहे गये हैं । एक - दो स्थलों पर मुद्रित पाठ भ्रष्ट हैं-ऋ शब्दे चादितौ ऋ स्यात् ( ३४८।३ ) का शुद्ध पाठ होगा- ' ऋ ( दीर्घ ॠ ) स्यात् । ' ऋ का अर्थ अदिति है — यह प्रसिद्ध है ( अदितिपुत्र देवों को ' ऋभु ' कहा जाता है ) । पूर्वाचार्यों ने कई एकाक्षर कोश लिखे हैं । इन ग्रन्थों के आधार पर यह अंश लिखा गया है । ( अ ० ३४ ९ -३५ ९ ) व्याकरणपरक यह प्रकरण कातन्त्र ( नामान्तर कलाप ) पर आधारित है । स्कन्द ने कात्यायन से यह शास्त्र कहा - यह ३४८।२८ तथा ३४ ९ ।१ में कहा गया है । यह प्रसिद्ध है कि कातन्त्र व्याकरण मूलतः कुमार ( स्कन्द ) द्वारा प्रोक्त है ( अर्थात् कुमार की कृपा से शर्ववर्मा ने यह व्याकरण रचा है ) तथा कात्यायन नामक विद्वान् ने इस व्याकरण का आंशिक पूरण किया है । यह आश्चर्य है कि इस प्रकरण में पाणिनीय पद्धति भी अंशतः मिश्रित है । यहाँ जिस क्रम में व्याकरणीय विषय रखे गये हैं, वह क्रम पाणिनि - व्याकरण का नहीं है, वह अधिकांशतः कातन्त्र में मिलता है । यह ज्ञातव्य है कि इस प्रकरण में जितने उदाहरण दिये हुए हैं, वे सब कातन्त्र में मिल जाते हैं । ( अ ० ३६०-३६७ ) कोशपरक ये अध्याय सर्वथा अमरकोश पर आधारित हैं । इनके प्रायः सभी वाक्य अमरकोश के वाक्य ( क्वचित् अल्पाधिक परिवर्तित रूप में ) ही हैं । शब्दों का क्रम भी प्रायेण सर्वत्र अमरकोशानुसारी है, क्वचित् भिन्नता देखी जाती है । अमर में ' संश्लेष उपगूहनम् ' के बाद ' प्रत्यादेशो निराकृतिः ' कहा गया है ( संकीर्णवर्ग ३०-३१ ) । १. द्रष्टव्य P. V. Kane कृत History of Sanskrit Poetics ( पृ ० ४ - ९ ); P. C. Lahiri का Theory of रीति and गुण in Agni Purana शीर्षक लेख ( Indian Historical Quarterly, IX ); Descriptive style of Alankara's in the Agnipurana ( Munshi Felicitation Volume, पृ ० ९६-११० ); अग्निपुराण का काव्यशास्त्रीय भाग आदि । द्र ० नानार्थरत्नमालाकोश ( शाश्वत कोश के साथ प्रकाशित, Oriental Book Agency ), सौभरिकृत एकार्थनाममाला, एकाक्षरीकोश ( ज्ञानपीठ - मूर्तिदेवी जैनग्रन्थमाला ) के अन्त मुद्रित । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१ ९ पर अग्निपुराण में प्रत्यादेशो निराकृतिः ( २४ श्लोक ) के बाद ' संश्लेष उपगूहनम् ' ( २५ ) कहा गया है । अ ० ३६७ के अन्त में अनुमा, शाब्द, उपमान, अर्थापत्ति और अभाव का उल्लेख है, पर ये शब्द अमरकोश में नहीं मिलते । ( अ ० ३६८-३७१ ) नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत और आत्यन्तिक रूपं चार प्रकार के प्रलय का विवरण यहाँ दिया गया है । प्रसंगतः यहाँ परार्ध का परिमाण कहा गया है, जो १ के बाद १७ शून्य है ( १००००००००००००००००० ) २ नागेश भट्ट द्वारा उद्धृत ब्रह्माण्डपुराण - वचन में यह मत माना गया है ( सप्तशती २।४१ की टीका ) । इसी प्रकार आतिवाहिक शरीर का विवरण अ ० ३६ ९ में मिलता है, गर्भोत्पत्ति तथा शरीरावयवों का विवरण इसी अध्याय में तथा अ ० ३७० में दिया गया है । अ ० ३७१ में प्राणनिर्गमनमार्गों तथा नरकों के नाम आवश्यक विवरण के साथ कहे गये हैं । क्षिति के अधोदेश में अष्टाविंशति नरक- क - कोटि ( २८ प्रकार के नरक ) की सत्ता ३७१।१३ में कही गयी है तथा नरक के २८ नाम १४-१८ श्लोकों में कहे गये हैं । ( अ ० ३७२-३८० ) इन अध्यायों में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि तथा ब्रह्मज्ञान ( अन्तिम तीन अध्यायों में ) का उत्कृष्ट विवरण दिया गया है । प्राचीन तथा अर्वाचीन योगग्रन्थों तथा स्मृतियों में अष्टाङ्ग योग का जो विवरण मिलता है, पुराणोक्त विवरण उससे सारतः भिन्न नहीं है । उपनिषद्, गीता एवं याज्ञवल्क्य स्मृति के कई वचन यहाँ अविकल रूप से या ईषत् पाठभेद के साथ पठित हुए हैं । ३७ ९ । ७ ख -३२ क ० में प्रतिपादित विषय विष्णुपुराण ( ६।५-७ ) में मिलता है, अ ० ३८० का विषय भी विष्णुपुराण ( २।१५-१६ ) में मिलता है । सम्भवतः विष्णुपुराण से ही इन विषयों को अग्निपुराण ने लिया है । खाण्डिक्य-केशिध्वजसंवाद नारदीयपुराण १ / ४६-४७ में भी है । यह पुराण विष्णुपुराण से अर्वाचीन है । इन अध्यायों में कई मुद्रित पाठ भ्रष्ट हैं । ' पातितः श्रावणोधातुर्दशनस्वाङ्ग वेदनाः ' तुलनीय योगसूत्र ३।६६।३ ।३७६।१३ का ' तथा विपक्षकरणः ' का शुद्ध पाठ ' तथाऽविपक्तकरणः ' होगा । ३८०।४६ का ' निदाघ - ऋतु - संवादम् ' ' निदघऋभुसंवादम् ' होगा । ( इस अध्याय में जहाँ भी ' ऋतु ' है वह ' ऋभु ' होगा ) । ( अ ० ३८१-३८२ ) कृष्ण ने अर्जुन के प्रति जो कहा ( भगवद्गीता ), उसका संक्षिप्तसार अ ० ३८१ में दिया गया है । इसके प्रायः सभी वाक्य गीता के शब्दों पर आश्रित हैं, कुछ वाक्य शब्दों पर आश्रित न होकर अर्थों पर आश्रित हैं, जैसे ' दुःसंगहानिः सत्संगात् मोक्षकामी च कामनुत् ' ( ३८१/४ ) । गीता ( १८/१४ ) में ' विविधाश्चपृथक् १. यह ज्ञातव्य है कि अमरकोश की पूर्ति के लिए त्रिकाण्डशेष नामक जो कोश पुरुषोत्तमदेव द्वारा प्रणीत हुआ था, उसमें अनुमा का उल्लेख है । ( अनुमात्वनुमानं स्यात् ३/२/११, अग्निपु ० का वाक्य है - अनुमा पक्षहेत्वाद्यैः, ३६७/२५ ) । पर इस कोश में शाब्द, उपमान और अर्थापत्ति का कोई उल्लेख नहीं है । २. परार्ध - परिमाण के विषय में मतभेद है । शुक्लयजुर्वेद संहिता के अनुसार परार्ध = १०००००००००००० ( १ के बाद १२ शून्य ) है; पर वेदव्याख्याकार महीधर परार्ध = १००००००००००००००००० ( १ के बाद १७ शून्य ) कहते हैं । ज्योतिषी धनंजय भट्ट के अनुसार परार्ध = १ के बाद ३१ शून्य है । ३. ३/३६ योगसूत्र का मुद्रित पाठ है - ' ततः प्रातिभ - श्रावण - वेदना दर्शास्वादवार्ता जायन्ते । ' सभी व्याख्याकार षष्ठ सिद्धि का नाम ' वार्ता ' ( आकारान्त ) समझते हैं, यह वस्तुतः अकारान्त वार्त शब्द है । इस विषय में विस्तृत विचार के लिए मेरा An Introduction to the Yoga - sutra ( Chapter V, Section 2 ) द्रष्टव्य है । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२० चेष्टाः ' कहा गया है, पर पुराण में ' त्रिविधाश्च ' पाठ है ( ३८१/५१ ) । शायद यह भ्रष्ट पाठ है । क्या यह हो सकता है कि यहाँ ' शारीरिक, वाचिक और मानसिक ' रूप त्रिविध चेष्टा की बात कही गयी है । > यमगीता ( अ ० ३८२ ) कठोपनिषद् पर आधारित है । इस उपनिषद् के कई वाक्य यहाँ अविकल रूप से या किंचित् पाठभेद के साथ उद्धृत हुए हैं । इस अध्याय में ( कपिल, पञ्चशिख, जैगीषव्य, देवल आदि कुछ आचार्यों ) सांख्याचार्यों के श्रेय: परक मत उद्धृत हुए हैं ( ३८२ / ३-१० ) । इन नामों में ' गङ्गाविष्णु ' नाम भी है, जो सर्वथा सांशयिक है । इस नाम का कोई आचार्य इतिहासपुराणादि में स्मृत नहीं हुए हैं । यह अवश्य ही भ्रष्ट पाठ है, प्रकृत पाठ क्या होगा - इसका निर्धारण करना दुष्कर है । ' ( अ ० ३८३ ) अग्निपुराण के स्वरूप तथा माहात्म्य के साथ इस पुराण में प्रतिपादित विषयों का परिचय यहाँ दिया गया है । इस अध्याय की सामग्री के विषय की भूमिका में यथास्थान विचार किया गया है । विविध विद्याओं के विवरण से विभूषित साथ ही अनेकत्र भ्रष्ट पाठों से दूषित अग्निपुराण का अनुवाद करना वस्तुतः एक कठिन कार्य है । अग्निपुराण में ऐसे अनेक वाक्य या वाक्यांश हैं, जो दुरूहार्थक हैं, कहीं - कहीं अस्पष्टार्थक भी । प्रस्तुत अनुवाद में अनुवादक महोदय का परिश्रम दर्शनीय है । हम उनको धन्यवाद देकर इस भूमिका को समाप्त करते हैं । रामशंकर भट्टाचार्य ( सम्पादक / पुराण सर्वभारतीय काशिराज न्यास वाराणसी ) १. अग्निपुराण के श्रेयःपरक श्लोक ( ३८२ / ३-११ ) विष्णुधर्मनामक पुराण में भी हैं । यह अमुद्रित है । इस पुराण में गाविष्णु के स्थान पर मगारिष्ट पाठ है; द्रष्टव्य आर ० सी ० हाजरा कृत Studies in the Upapuranas Volume I ( पृ ० १३० ) । यह नाम भी अशुद्ध प्रतीत होता है । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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विषयानुक्रमणिका अध्याय विषय मंगलाचरण ऋषियों द्वारा सूत से प्रश्न । बदरिकाश्रम में सूत, शुक और पैल आदि ऋषियों द्वारा व्यास से प्रश्न । ऋषियों और व्यास के संवाद में अग्नि और वसिष्ठ का संवाद । विद्यातत्त्व और विज्ञान के सम्बन्ध में वसिष्ठ द्वारा अग्नि से प्रश्न | अग्नि द्वारा वसिष्ठ के प्रति सबके कारणभूत विष्णु का प्रभाव - वर्णन । मत्स्यावतार - वर्णन विष्णु के मत्स्य आदि अवतार के सम्बन्ध में वशिष्ठ द्वारा अग्नि से प्रश्न । अग्नि द्वारा वशिष्ठ से कृतमाला नदी में वैवस्वत मनु को मत्स्यरूप भगवान् के दर्शन होने का कथन । मत्स्यावतार भगवान् विष्णु द्वारा हयग्रीव दैत्य का वध । कूर्मावतार वर्णन दुर्वासा के शाप से नष्ट वैभववाले देवताओं का विष्णु के पास जाना । विष्णु के द्वारा देवताओं को समुद्र - मन्थन करने की आज्ञा । विष्णु की आज्ञा से मन्दराचल को समुद्र में डालकर देव - दानवों द्वारा किये गये क्षीरसागर के मन्थन का वर्णन । क्षीरसागर से हलाहल विष की उत्पत्ति । शंकर द्वारा हलाहल विष का भक्षण । कूर्मावतार विष्णु द्वारा मन्दराचल का धारण । क्षीरसागर से वारुणी, मदिरा, कौस्तुभ मणि, लक्ष्मी आदि की उत्पत्ति । लक्ष्मी द्वारा विष्णु को पति रूप में स्वीकार । अमृतकलश के साथ धन्वन्तरि का उद्भव । उनके हाथ से दैत्यों द्वारा अमृत का अपहरण । विष्णु द्वारा मोहिनी रूप धारणकर देवताओं को अमृत देना और दैत्यों को मोहित करना । चन्द्रमा का रूप धारणकर राहु द्वारा अमृत भक्षण । सूर्य और चन्द्रमा द्वारा सूचित करने पर राहु का शिरःकर्तन । अत्यन्त प्रसन्न विष्णु द्वारा राहु के प्रति देवत्व - प्राप्ति का वर्णन । विष्णु की कृपा से सन्तुष्ट राहु द्वारा चन्द्रमा और सूर्य के प्रति ग्रहण प्राप्त करने का शाप और प्रसंगतः ग्रहण - काल में दान की प्रशंसा । शंकर की प्रार्थना करने पर विष्णु द्वारा शंकर के प्रति पुनः मोहिनी रूप का प्रदर्शन । मोहिनी के रूप से मोहित होकर पार्वती का परित्याग करके उसके पीछे दौड़ना । पृथ्वी पर शंकर का वीर्यस्खलन । अमृत न पानेवाले दैत्यों का देवताओं के साथ युद्ध । देवताओं द्वारा दैत्यों का पराजय । पृ ० सं ० श्लोक सं ० ६५ १ ९ ६७ १७ ६ ९ २३ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२२ अध्याय विषय पृ ० सं ० श्लोक सं ० ४ वराह, नृसिंह आदि अवतारों का वर्णन हिरण्याक्ष का देवेन्द्र पद पर अधिरोहण । हिरण्याक्ष के बल से उद्विग्न देवताओं द्वारा विष्णु की स्तुति । वराह द्वारा हिरण्याक्ष का वध । उसके भाई हिरण्यकशिपु का नरसिंह अवतार विष्णु द्वारा वध । बलि आदि के द्वारा पराजित देवताओं द्वारा विष्णु की स्तुति । अदिति से वामन रूप विष्णु का प्रादुर्भाव । पादत्रय - परिमित भूमि- याचन द्वारा वामनकृत राजा बलि की वञ्चना । जमदग्नि से रेणुका में परशुराम का अवतार । परशुराम द्वारा सहस्रार्जुन का वध । इस आख्यान के श्रवण का फल । श्रीरामावतार - वर्णन प्रसंगतः वैवस्वत मनु का वंशवर्णन । कौशल्या से राम की उत्पत्ति । भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न की उत्पत्ति । यज्ञ - रक्षा के लिए राम - लक्ष्मण का विश्वामित्र के आश्रम में जाना । विश्वामित्र के यज्ञ में राम द्वारा मारीच - सुबाहु का वध । जनक के गृह में राम द्वारा शिव - चाप का खण्डन । सीता के साथ राम का विवाह । उर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकीर्ति का क्रमशः लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के साथ विवाह । परशुराम को जीतकर राम आदि का अयोध्या लौटना । अयोध्याकाण्ड दशरथ का रामचन्द्र के साथ युवराज पद सँभालने के सम्बन्ध में वार्तालाप । मन्थरा के वचन से कैकेयी का मति - परिवर्तन । दशरथ से कैकेयी को दो वर की प्राप्ति । कैकेयी के वचनानुसारं दशरथ की आज्ञा से राम का सीता और लक्ष्मण के साथ वन - गमन । चित्रकूट पर्वत पर सीता के प्रति अपराधी होते हुए भी शरण में आये हुए इन्द्र - पुत्र जयन्त की राम द्वारा रक्षा । कौशल्या के प्रति ' पुत्र - शोक से मेरा मरण अवश्यम्भावी है ' दशरथ का यह कथन । दिवंगत दशरथ के शरीर को तेल - पात्र में रखा जाना । वशिष्ठ की आज्ञा से सुमन्त आदि द्वारा भरत को अयोध्या ले आना । सरयू के तट पर भरत के द्वारा दशरथ की अन्त्येष्टि - क्रिया । वशिष्ठ के द्वारा भरत को राजपालन का उपदेश । राजपद स्वीकार कर भरत का राम को लौटाने के लिए भरद्वाज आश्रम को जाना । भरत के साथ राम - लक्ष्मण का मिलन । पिता का निधन-समाचार देकर भरत की राम से राजपद स्वीकार करने की प्रार्थना । राम की आज्ञा से भरत का पादुका ग्रहणपूर्वक राज्य पालन के लिए नन्दि ग्राम में जाना । ७ अरण्यकाण्ड अत्रि, शरभंग और सुतीक्ष्ण आदि का राम के साथ समागम । अगस्त्य से राम को धनुष और खड्ग की प्राप्ति । दण्डकारण्य में राम का जाना । पंचवटी में राम का CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA ७२ २१ ७४ १५ ७५ ५० ८० २४
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२३ अध्याय विषय रूप देखकर शूर्पणखा का मोहित होना । पंचवटी में राम के कहने पर लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा का कर्ण - नासिका - छेदन | राम द्वारा खर, दूषण, त्रिशिरा आदि राक्षसों का वध । पुत्र के निधन से पीड़ित शूर्पणखा का रावण के प्रति सीता हरण विषयक सम्भाषण । रावण की मारीच से स्वर्णमृग का रूप धारणकर राम को ठगने के लिए अभ्यर्थना । राम द्वारा मारीच का वध । रावण द्वारा सीता का हरण । रावण और जटायु का युद्ध । रावण द्वारा जटायु का वध । सीतापहारक रावण का लंका पहुँचना । सीता वियुक्त राम का विलाप । राम द्वारा सीता का अन्वेषण । राम द्वारा जटायु का अन्त्येष्टि संस्कार । राम द्वारा कबन्ध राक्षस का वध । शापमुक्त कबन्ध का राम के प्रति सुग्रीव से मैत्री का कथन । किष्किन्धाकाण्ड राम का पम्पासर में गमन । राम का सुग्रीव के साथ समागम । सुग्रीव के विश्वास के लिए राम द्वारा सात ताड़वृक्षों का भेदन । राम द्वारा दुन्दुभि का शरीरपात । राम द्वारा बालि का वध । किष्किन्धा में लक्ष्मण का गमन । सीता के अन्वेषण के सम्बन्ध में सुग्रीव द्वारा वानरों के साथ हनुमान् को भेजना । वानरों को सम्पाति का दर्शन । सुन्दरकाण्ड सम्पाति के कहने से लंका में हनुमान् द्वारा अशोक वाटिका में दर्शनपूर्वक सीता को अँगूठी देना । सीता द्वारा हनुमान् को चूड़ामणि प्रदान करना । हनुमान् द्वारा रावण के उपवन का विध्वंस । मेघनाद द्वारा नागपाश से हनुमान् का बन्धन । हनुमान् के साथ रावण का सम्भाषण । हनुमान् द्वारा लंकादहन । हनुमान् द्वारा राम को सीता द्वारा दी हुई चूड़ामणि समर्पित करना । राम का विभीषण के साथ समागम । राम द्वारा विभीषण का राज्याभिषेक । राम द्वारा सेतु बाँधकर सुवेल पर्वत पर पहुँचना । १० युद्धकाण्ड अंगद का रावण के साथ लंका में सम्भाषण । राम - रावण का युद्ध । राम से पराजित रावण द्वारा कुम्भकर्ण को जगाना । राम द्वारा कुम्भकर्ण और रावण का वध । युद्ध में मरे हुए वानरों को राम द्वारा अमृत वर्षा करके जिलाना । विभीषण को लंका का राज्य प्रदान करना । अग्नि - परीक्षा के द्वारा शुद्ध सीता के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या जाते हुए श्रीराम का नन्दिग्राम में भरत से मिलाप । राम का अयोध्या गमन । ११ उत्तरकाण्ड अगस्त्य आदि के द्वारा राम की स्तुति । वाल्मीकीय आश्रम में सीता से कुश और लव की उत्पत्ति । राम का स्वर्गलोक गमन । इस अध्याय के श्रवण करने का फल । रामचरित की समाप्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA पृ ० सं ० श्लोक सं ० ८३ १७ ८५ ३३ ८८ ३५ ९ १ १३
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२४ अध्याय विषय पृ ० सं ० श्लोक सं ० १२ कृष्णावतार - कथा प्रसंगतः हरिवंश का वर्णन । बलराम और कृष्ण की उत्पत्ति । वसुदेव द्वारा कृष्ण गोकुल पहुँचाना । कृष्ण द्वारा यमलार्जुन का मोक्ष । कृष्ण द्वारा शकटासुर का वध । कृष्ण द्वारा पूतना का वध । कृष्ण द्वारा कालिय का मर्दन । कृष्ण द्वारा गोवर्धन का धारण । कंस के भेजे हुए अक्रूर का राम और कृष्ण के साथ मथुरा जाना । मथुरा में कृष्ण द्वारा रजक का वध । कृष्ण द्वारा माली को वरदान देना । कृष्ण द्वारा कुब्जा के शरीर को सीधा करना । कृष्ण द्वारा कुवलयापीड नामक हाथी का वध । कृष्ण और बलराम का चाणूर और मुष्टिक नामक पहलवानों के साथ मल्लयुद्ध । कृष्ण और बलराम द्वारा चाणूर और मुष्टिक का वध । कृष्ण द्वारा कंस का वध । कृष्ण द्वारा उग्रसेन को कंस का राज्य देना । कृष्ण द्वारा जरासन्ध और पौण्ड्रक वासुदेव का वध । कृष्ण का द्वारका जाना । कृष्ण द्वारा नरकासुर को मारकर उसके द्वारा लायी गयी सोलह हजार राजकन्याओं का पाणिग्रहण । रुक्मिणी आदि का कृष्ण द्वारा पाणिग्रहण । सान्दीपनि गुरु के मृतक पुत्रों को पुनः प्रत्यावर्तित करके कृष्ण द्वारा गुरु को सौंपना । कृष्ण द्वारा कालयवन का वध । कृष्ण से रुक्मिणी में प्रद्युम्न की उत्पत्ति । प्रद्युम्न से अनिरुद्ध नामक पुत्र की उत्पत्ति । बाणासुर की कन्या उषा को स्वप्न में अनिरुद्ध का दर्शन । चित्रलेखा द्वारा द्वारका से अनिरुद्ध को आनयन । शोणितपुर में उषा के साथ अनिरुद्ध का विवाह । अनिरुद्ध और बाणासुर में युद्ध । शंकर और विष्णु का युद्ध । कृष्ण द्वारा बाणासुर की सहस्र भुजाओं का छेदन । बाणासुर के ऊपर शिव द्वारा प्रार्थित श्रीकृष्ण का अनुग्रह । उषा से युक्त अनिरुद्ध का कृष्ण आदि के साथ द्वारका - गमन । बलराम द्वारा हस्तिनापुर का आकर्षण । रुक्मिणी आदि में कृष्ण से अनन्त पुत्रों की उत्पत्ति । हरिवंश पाठ का फल । १३ भारताख्यान ( महाभारत ) ब्रह्मा के पुत्र अत्रि से चन्द्रमा की उत्पत्ति । चन्द्रमा से बुध आदि की उत्पत्ति । विचित्रवीर्य की भार्या अम्बिका - अम्बालिका में व्यास से धृतराष्ट्र और पाण्डु की उत्पत्ति । धृतराष्ट्र से गान्धारी में दुर्योधन आदि की उत्पत्ति । पाण्डवों की उत्पत्ति का वर्णन दुर्योधन आदि का पाण्डवों के साथ विरोध । द्रुपद द्वारा किये गये द्रौपदी स्वयंवर में पाण्डवों को द्रौपदी की प्राप्ति । अर्जुन द्वारा खाण्डव वन का दहन । युधिष्ठिर द्वारा किया गया राजसूय यज्ञ । दुर्योधन आदि के साथ पाण्डवों की द्यूत - क्रीड़ा । द्यूत में पाण्डवों का पराजयपूर्वक वनवास । पाण्डवों के साथ दुर्योधन आदि का युद्धारम्भ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA ९ ३ ५६ ९९ २ ९
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२५ अध्याय विषय १४ भारताख्यान में कौरव और पाण्डवों का संग्राम कृष्ण का अर्जुन के प्रति उपदेश । शिखण्डी के द्वारा भीष्म का पतन । धृष्टद्युम्न से द्रोण का वध । कर्ण और अर्जुन का युद्ध । अर्जुन द्वारा कर्ण का वध । भीम और दुर्योधन का युद्ध । भीम द्वारा दुर्योधन का वध । अश्वत्थामा द्वारा पाण्डवों के पुत्रों का विनाश । कृष्ण द्वारा उत्तरा के गर्भ में परीक्षित की रक्षा । युधिष्ठिर द्वारा मृतकों को जलाञ्जलि । युधिष्ठिर के प्रति भीष्म द्वारा राजधर्म आदि का उपदेश । युधिष्ठिर द्वारा परीक्षित का राज्याभिषेक । १५ पाण्डवों का स्वर्गारोहण गान्धारी के साथ धृतराष्ट्र का वन - गमन । मूसल से यदुवंशियों का नाश । चोरों के द्वारा श्रीकृष्ण की पत्नियों का हरण । पाण्डवों का महापथ पर गमन । स्वर्ग में पाण्डवों का वासुदेव का दर्शन । भारताख्यान के श्रवण का फल । १६ बुद्धावतार - वर्णन दैत्यों की वञ्चना के लिए विष्णु का बौद्धावतार । प्रसंगतः कल्कि अवतार का वर्णन । अवतारों के चरित्र- -श्रवण का फल । १७ जगत्सृष्टि - वर्णन सृष्टि - काल में महत्तत्त्व की उत्पत्ति । महत्तत्त्व से अहंकार की उत्पत्ति । उससे वैकारिक आदि की उत्पत्ति । पृथ्वी आदि पंचमहाभूतों की उत्पत्ति । ब्रह्मा की उत्पत्ति । ब्रह्मा से मरीचि आदि मानस - पुत्रों की उत्पत्ति । १८ स्वायंभुव मनु के वंश का वर्णन स्वायंभुव से प्रियव्रत और उत्तानपाद की उत्पत्ति । उत्तानपाद से सुरुचि, सुनीति में उत्तम और ध्रुव की उत्पत्ति । प्रसंगतः ध्रुव की महिमा का वर्णन । ध्रुव से वृद्धि आदि पुत्रों की उत्पत्ति । पृथ्वी का आख्यान । पृथु द्वारा पृथ्वी का दोहन । दक्ष की उत्पत्ति का प्रकार । प्रसंगतः कश्यप से एकादश रुद्रों की उत्पत्ति । कश्यपवंश का वर्णन १ ९ कश्यप से बारह आदित्यों की उत्पत्ति । कश्यप से हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष की उत्पत्ति । प्रह्लाद की उत्पत्ति । विरोचन से बलि की उत्पत्ति । इन्द्र द्वारा दिति के गर्भ को सात टुकड़े करना । उससे मरुतों की उत्पत्ति । हरि द्वारा पृथु आदि को राज्य पद प्रदान । जगत्सृष्टि का वर्णन २० से नौ प्रकार की सृष्टियों की उत्पत्ति । दक्ष कन्याओं द्वारा भृगु आदि को पति ब्रह्मा CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA पृ ० सं ० श्लोक सं ० १०२ २८ १०४ १५ १०६ १४ १०८ १७ ११० ४५ ११४ २ ९ ११६ २३
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२६ अध्याय विषय पृ ० सं ० श्लोक सं ० रूप में वरण । अत्रि से अनसूया में सोम आदि पुत्रों की उत्पत्ति । सात हजार बालखिल्यों की उत्पत्ति । अधर्म से हिंसा रूपी पत्नी में अनृत आदि पुत्रों की उत्पत्ति । २१ विष्णु आदि देव का सामान्य पूजा - विधान विष्णु आदि के मन्त्रों से उन - उन देवताओं का पूजन । नवग्रह पूजन । सरस्वती आदि देवताओं की पूजा - विधि । देवताओं की तुष्टि के लिए तिलादि द्रव्यों से हवन । देवताओं का मन्त्र - निरूपण । २२ पूजा अधिकार के लिए सामान्य स्नान - विधि मृत्तिका - स्नान आदि की विधि । अघमर्षण आदि की विधि । पितर आदि का तर्पण । २३ पूजा - विधि योग के द्वारा शरीरशोधनपूर्वक न्यास आदि । विष्णु और द्वारस्थ देवताओं की पूजा-विधि । आवाहन आदि के द्वारा विष्णु की सपर्या । नवव्यूह का अर्चन । २४ कुण्ड निर्माण एवं अग्नि विधि कार्य अर्ध चन्द्राकार, चौकोर, गोलाकार कुण्डों का निर्माण । होम - विधि का प्रकार । अग्नि - संस्कार कथन । गुरु द्वारा शिष्यों को उपदेश । २५ वासुदेव आदि के मन्त्रों के लक्षण जीवों का स्वरूप - वर्णन । ११ ९ २७ १२२ १२३ २३ १२६ ५ ९ १३२ ५० २६ मुद्रा - लक्षण अञ्जलि मुद्रा - लक्षण । वन्दनी मुद्रा - लक्षण । वराह मुद्रा - लक्षण । २७ शिष्यों को दीक्षा - दान विधि गुरु द्वारा शिष्य को दीक्षा - विधि प्रकार - वर्णन । २८ आचार्य के अभिषेक का विधान २ ९ मन्त्रसाधन विधि तथा सर्वतोभद्रादिमण्डल के लक्षण ३० सर्वतोभद्रमण्डलादि विधि - वर्णन पूर्वादिक्रम से ब्रह्मादि देवताओं की प्रतिष्ठा । सर्वतोभद्रादि मण्डल की रक्त, आदि अनेक वर्णों से संरचना । साधक का नियम कथन! 3 Foundation USA १३७ ७ १३८ ८१ १४५ ५ १४६ ५० १५१ ३६ पीत