अग्नि पुराण — पृष्ठ 1111–1120

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1111–1120

पृष्ठ 1111

अग्नि पुराण, पृष्ठ 1111 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः स्यात्सुधर्मा देवसभा स्वर्गङ्गा सुरदीर्घिका हाहा हूहूश्च गन्धर्वा अग्निर्वह्निर्धनञ्जयः हिरण्यरेताः सप्तार्चिः शुक्रश्चैवाऽऽशुशुक्षणिः वह्नेर्द्वयोर्ज्यालकीलावर्चिर्हेतिः शिखा स्त्रियाम् ' कालोऽन्तको दण्डधरः श्राद्धदेवोऽथ राक्षसः प्रचेता वरुणः पाशी श्वसनः स्पर्शनोऽनिलः जवो रंहस्तरसी तु लघु क्षिप्रमरं द्रुतम् सततेऽनारताश्रान्तसंतताविरतानिशम् अतिवेलभृशात्यर्थातिमात्रोद्गाढनिर्भरम् गुह्यकेशो यक्षराजो राजराजो धनाधिपः निधिर्ना शेवधिर्व्योम त्वभ्रं पुष्करमम्बरम् ' अभ्यन्तरं त्वन्तरालं चक्रवालं तु मण्डलम् " कादम्बिनी मेघमाला स्तनितं गर्जितं तथा तडित्सौदामिनी विद्युच्चञ्चला चपलाऽपि च । गंगा को स्वर्गङ्गा और सुरदीर्घिका कहा गया है । उर्वशी ११०७ । स्त्रियां बहुष्वप्सरसः स्वर्वेश्या उर्वशीमुखाः ॥ १० ॥

। जातवेदाः कृष्णवर्त्मा आश्रयाशश्च पावकः ॥११ ॥

। शुचिरप्पित्तमौर्वस्तु वाडवो वडवानलः ॥१२ ॥

। त्रिषु स्फुलिङ्गोऽग्निकणो धर्मराजः परेतराट् ॥१३ ॥

। कौणपात्रपक्रव्यादा यातुधानश्च नैर्ऋतिः ॥१४ ॥

। सदागतिर्मातरिश्वा प्राणो मरुत्समीरणः ॥१५ ॥

। सत्वरं चपलं तूर्णमविलम्बितमाशु च ॥ १६ ॥

। नित्यानवरताजस्रमप्यथातिशयो भरः ॥१७ ॥

। तीव्रैकान्तनितान्तानि गाढबाढदृढानि च ॥१८ ॥

। स्यात्किंनरः किंपुरुषस्तुरङ्गवदनो मयुः ॥ १ ९ ॥ । द्योदिवौ चान्तरिक्षं खं काष्ठाशाककुभो दिशः ॥२० ॥

। तडित्वान्वारिदो मेघस्तनयित्नुर्बलाहकः ॥२१ ॥

। शम्पाशतह्रदाह्लादिन्यैरावत्यः क्षणप्रभा ॥ २२ ॥

स्फूर्जथुर्वज्रनिर्घोषो वृष्टिघातस्त्ववग्रहः ॥२३ ॥

इत्यादि को अप्सरस् और स्वर्वेश्या कहा जाता है । अप्सरस् शब्द का प्रयोग स्त्रीलिङ्ग तथा बहुवचन में होता है । गन्धर्वों के नाम हैं हाहा, हूहू । अग्नि के पर्याय हैं - वह्नि, धनञ्जय, जातवेदाः, कृष्णवर्त्मा, आश्रयाश, पावक, हिरण्यरेता, सप्तार्चि, शुक्र, आशुशुक्षणि, शुचि, अप्पित्त, और्व, वाडव, वडवानल । अग्नि की ज्वाला के पर्याय हैं - ज्वाल, कील, अर्चि, हेति और शिखा जो कि स्त्रीलिङ्ग शब्द हैं । अग्नि की चिनगारी को स्फुलिंग और अग्नि कहते हैं । इनका प्रयोग तीनों लिङ्गों में किया जाता है । यम के पर्याय हैं - धर्मराज, परेतराट्, काल, अन्तक, दण्डधर और श्राद्धदेव । राक्षस के पर्याय हैं - कौणप, आस्रप, क्रव्याद्, यातुधान, नैर्ऋति । वरुण के पर्याय हैं - प्रचेता और पाशी । वायु के पर्याय हैं- श्वसन, स्पर्श, अनिल, सदागति, मातरिश्वा, प्राण, मरुत् और समीरण । वेग के पर्याय हैं - जव, रंहस्, तरसी, लघु, क्षिप्र, अर, द्रुत, सत्वर, चपल, तूर्ण, अविलम्बित और आशु ॥८-१६ ॥ निरन्तर के पर्याय हैं - सतत, अनारत, अश्रान्त, संतत, अविरत, अनिश, नित्य, अनवरत और अजस्त्र | अतिशय के पर्याय हैं - भर, अतिवेल, भृश, अत्यर्थ, अतिमात्र, उद्गाढ, तीव्र, एकान्त, नितान्त, गाढ, बाढ और दृढ़ । कुबेर के पर्याय हैं - गुह्यकेश, यक्षराज, राजराज और धनाधिप । उनके सेवकों के नाम हैं किन्नर, किंपुरुष, तुरङ्गवदन और मयु । निधि के नाम हैं ' निधि ' और शेवधि । आकाश के पर्याय हैं- व्योम, अभ्र, पुष्कर, अम्बर, द्यौ, दिव, अन्तरिक्ष और ख । दिशा के पर्याय हैं- आशा, काष्ठा, ककुभ् ॥१७- २० ॥ अभ्यन्तर और अन्तराल मध्य के तथा चक्रवाल और मण्डल गोलाकार एवं समुदाय के वाचक हैं । मेघ के पर्याय हैं - तडित्वान्, वारिद, मेघ, स्तनयित्नु और बलाहक । मेघावलि के पर्याय हैं - मेघमाला और कादम्बिनी । मेघों के गर्जन के पर्याय हैं - स्तनित तथा गर्जित । विद्युत् के पर्याय हैं - शम्पा, शतह्रदा, ह्लादिनी, ऐरावती, क्षणप्रभा, तडित्, सौदामिनी, चञ्चला और चपला । बिजली के गर्जन को कहते हैं- स्फूर्जथु, वज्र और निर्घोष । अनावृष्टि के पर्याय हैं - वृष्टिघात और अवग्रह ॥२१-२३ ॥ वर्षा की १ ख. ग. कालान्तकः । २ क. ङ. रंहश्च तु रयो ल । ३ क. ङ. ' म् । द्योर्दिवा चा ' । ४ ख. ग. ' दम्बरी मे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1112

अग्नि पुराण, पृष्ठ 1112 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

११०८ अग्निपुराणम् धारासंपात आसारः शीकरोऽम्बुकणाः स्मृताः । अन्तर्धा व्यवधा पुंसि त्वन्तर्धिरपवारणम् । अब्जो जैवातृकः सोमो ग्लौर्मृगाङ्कः कलानिधिः । कला तु षोडशो भागो भित्तं शकलखण्डके । लक्षणं लक्ष्मकं चिह्नं शोभा कान्तिर्द्युतिश्छविः । अवश्यायस्तु नीहारः प्रालेयः शिशिरो हिमः । गुरुर्जीव आंगिरस उशना भार्गवः कविः । सप्तर्षयो मरीच्यत्रिमुखाश्चित्रशिखण्डिनः । परिवेषस्तु परिधिरुपसूर्यकमण्डले । भानुः करो मरीचिः स्त्री पुसयोर्दीधितिः स्त्रियाम् । रोचिः शोचिरुभे क्लीवे प्रकाशो द्योत आतपः ।

तिग्मं तीक्ष्णं खरं तद्वद्दिष्टोऽनेहा च कालकः ।

वर्षोपलस्तु करका मेघच्छन्नेह्नि दुर्दिनम् ॥ २४ ॥

अपिधानतिरोधानपिधानाच्छादनानि च ॥२५ ॥

विधुः कुमुदबन्धुश्च बिम्बोऽस्त्री मण्डलं त्रिषु ॥२६ ॥

चन्द्रिका कौमुदी ज्योत्स्ना प्रसादस्तु प्रसन्नता ॥२७ ॥

सुषमा परमा शोभा तुषारस्तुहिनं हिमम् ॥ २८ ॥

नक्षत्रमृक्षं भं तारा तारकाऽप्युडु वा स्त्रियाम् ॥ २ ९ ॥

विधुंतुदस्तमो राहुर्लग्नं राश्युदयः स्मृतः ॥ ३० ॥

' हरिदश्वब्रघ्नपूषद्युमणिर्मिहिरो रविः ॥ ३१ ॥

किरणोत्रमयूखांशुगभस्तिघृणिधृष्णयः १ ॥३२ ॥

स्युः प्रभा रुग्रचिस्त्विड्भा भाश्छविद्युतिदीप्तयः ॥ ३३ ॥

कोष्णं कवोष्णं मन्दोष्णं कदुष्णं त्रिषु तद्वति ॥ ३४ ॥

घस्त्रो दिनाहनी चैव सायंसन्ध्या पितृप्रसूः ॥ ३५ ॥

झड़ी के पर्याय हैं - धारासम्पात और आसार । जल की बूँदों को कहा जाता है - शीकर और अम्बुकण । ओलों के पर्याय हैं - वर्षोपल और करका । मेघाच्छादित दिन को दुर्दिन कहते हैं । अन्तर्धा, व्यवधा और अन्तर्धि पुल्लिंग शब्द हैं । अपवारण, अपिधान, तिरोधान, पिधान और आच्छादान ये आठों न दिखायी पड़ने को कहते हैं ॥ २४-२५ ॥ चन्द्रमा के पर्याय हैं - अब्ज, जैवातृक, सोम, ग्लौ, मृगाङ्क, कलानिधि, विधु और कुमुदबन्धु । चन्द्रमण्डल को चन्द्रबिम्ब भी कहते हैं । सोलहवें भाग को कला कहते हैं और भाग के पर्याय हैं - भित्त, शकल और खण्ड । चन्द्रिका के पर्याय हैं - कौमुदी और ज्योत्स्ना । प्रसन्नता का पर्याय है - प्रसाद । चिह्न के पर्याय हैं - लक्षण और लक्ष्मक । शोभा के पर्याय हैं - कान्ति, द्युति और छवि | सुषमा कहते हैं रमणीयता को । हिम के पर्याय हैं - तुषार और तुहिन । ओस के पर्याय हैं - नीहार और प्रालेय । शिशिर को हिम कहते हैं । नक्षत्र के पर्याय हैं - ऋक्ष, भ, तारा, तारका और उडु । उडु शब्द विकल्प से स्त्रीलिंग है ॥२६-२९ ॥ बृहस्पति के पर्याय हैं - गुरु, जीव और आंगिरस । शुक्र के पर्याय हैं - उशना, भार्गव और कवि । राहु के पर्याय हैं - विधुंतुद और तम । राशियों के उदय अत्रि को लग्न कहा गया है । मरीचि और अत्रि आदि सप्तर्षि को चित्र शिखण्डि कहते हैं । सूर्य के पर्याय हैं - हरिदश्व, ब्रघ्न, पूषा, द्युमणि, मिहिर और रवि । सूर्यमण्डल के पर्याय हैं-परिवेश, परिधि और उपसूर्य । किरण के पर्याय हैं - उस्र, मयूख, अंशु, धृष्णि, भानु, कर, मरीचि और दीधिति । प्रभा, रुक्, रुचि, त्विट्, भा, आभा, छवि, द्युति, दीप्ति, रोचिस् - ये प्रभा के नाम हैं । धूप के नाम हैं - प्रकाश, द्योत और आतप । इनमें से मरीचि स्त्रीलिंग और पुल्लिंग दोनों में होता है । दीधिति स्त्रीलिंग शब्द है और रोचिः, शोचि: दोनों ही नपुंसकलिंग शब्द हैं । कुछ - कुछ गर्म को कोष्ण, कवोष्ण, मंदोष्ण और कदुष्ण कहते हैं । तीक्ष्ण के पर्याय हैं - तिग्म और खर । समय के पर्याय हैं - दिष्ट, अनेहस् और काल । दिन के पर्याय हैं - घस्र और अहन् । सायंकाल के पर्याय हैं - सन्ध्या और १ " राशीनामुदयो लग्नं तेषु मेषवृषादयः " इति क. ङ. पुस्तकयोरधिकम् । २ ख. ग. णिरश्मयः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1113

अग्नि पुराण, पृष्ठ 1113 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११० ९ प्रत्यूषोऽहर्मुखं कल्यमुषः प्रत्युषसी अपि ' यामी तमी तमिस्रा च ' ज्योत्स्नी चन्द्रिकयाऽन्विता अर्धरात्रनिशीथौ द्वौ प्रदोषो रजनीमुखम् पक्षान्तौ पञ्चदश्यौ द्वे पौर्णमासी तु पूर्णिमा अमावास्या त्वमावस्या दर्शः सूर्येन्दुसंगमः संवर्तः प्रलयः कल्पः क्षयः कल्पान्त इत्यपि स्याद्धर्ममस्त्रियां पुण्यश्रेयसी सुकृतं वृषः । स्यादानन्दथुरानन्दः शर्मशातसुखानि च । भावुकं भविकं भव्यं कुशलं क्षेममस्त्रियाम् । क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः प्रधानं प्रकृतिः स्त्रियाम् । चित्तं तु चेतो हृदयं स्वान्तं हृन्मानसं मनः । प्रेक्षोपलब्धिश्चित्संवित्प्रतिपज्ज्ञप्तिचेतनाः । संख्या विचारणा चर्चा विचिकित्सा तु संशयः ॥ प्राह्णापराह्णमध्याह्नास्त्रिसंध्यमथ शर्वरी ॥ ३६ ॥

। आगामिवर्तमानाहर्युक्तायां निशि पक्षिणी ॥ ३७ ॥

। स पर्वसंधिः प्रतिपत्पञ्चदश्योर्यदन्तरम् ॥३८ ॥

। कलाहीने सानुमतिः पूर्णं राका निशाकरे ॥ ३ ९ ॥ । सा दृष्टेन्दुः सिनीवाली सा नष्टेन्दुकला कुहूः ॥४० ॥

। कलुषं वृजिनैनोघमंहोदुरितदुष्कृतम् ॥४१ ॥

मुत्प्रीतिः प्रमदो हर्षः प्रमोदामोदसंमदाः ॥४२ ॥

श्वः श्रेयसं शिवं भद्रं कल्याणं मङ्गलं शुभम् ॥४३ ॥

दैवं दिष्टं भागधेयं भाग्यं स्त्री नियतिर्विधिः ॥ ४४ ॥

हेतुर्ना कारणं बीजं निदानं त्वादिकारणम् ॥४५ ॥

बुद्धिर्मनीषा धिषणा धीः प्रज्ञा शेमुषी मतिः ॥ ४६ ॥

धीर्धारणावती मेधा संकल्पः कर्म मानसम् ॥४७ ॥

अध्याहारस्तर्क ऊहः समौ निर्णयनिश्चयौ ॥४८ ॥

पितृप्रसू ॥३०-३५ ॥ प्रातः काल के पर्याय हैं- प्रत्यूष, अहर्मुख, कल्य, उषस् और प्रत्युषस् । दिन के पहरों को प्राह्ण, अपराह्न और मध्याह्न कहते हैं । सन्ध्या को त्रिसन्ध्य और शर्वरी भी कहते हैं रात्रि के पर्याय हैं - यामी, तमी और तमिस्रा । चन्द्रिका से युक्त रात्रि को ज्योत्स्नी कहते हैं । आगामी तथा वर्तमान दिनों से युक्त रात्रि को पक्षिणी कहा जाता है । आधी रात को अर्धरात्र और निशीथ कहते हैं । रात्रि के प्रारम्भ को प्रदोष कहा जाता है । प्रतिपदा और अमावस्या के बीच को पर्वसन्धि कहते हैं । दोनों अमावस्याओं को पक्षान्त और पूर्णिमा को पूर्णमासी कहा जाता है । एक कला से हीन चन्द्रमा से युक्त रात्रि अनुमति कहलाती है और पूर्ण चन्द्रमण्डल से युक्त रात्रि को राका कहा जाता है । अमावस्या को दर्श और सूर्येन्दुसंगम कहते हैं । जिसमें चन्द्रमा की कला दिखायी पड़ती है उसे सिनीवाली और जिसमें चन्द्रकला अदृश्य होती है । उसे कुहू कहते हैं ॥ ३६-४० ॥ प्रलय को संवर्त, कल्प, क्षय और कल्पान्त भी कहते हैं । पाप के पर्याय हैं - कलुष, वृजिन, एनस्, अघ, मंहस्, दुरित और दुष्कृत । कर्म के पर्याय हैं- पुण्य, श्रेयस्, सुकृत् और वृष । हर्ष के पर्याय हैं - मुत्, प्रीति, प्रमद, प्रमोद, आमोद, संमद, आनन्दथुः, आनन्द, शर्म, शात और सुख । कल्याण के पर्याय हैं- श्वः, श्रेयस्, शिव, भद्र, मंगल, शुभ, भावुक, भविक, भव्य, कुशल और क्षेम । भाग्य के पर्याय हैं - दैव, दिष्ट, भागधेय, नियति और विधि । आत्मा के पर्याय हैं-क्षेत्रज्ञ और पुरुष । प्रकृति को कहते हैं प्रधान । हेतु से पर्याय हैं - कारण, बीज, निदान और आदिकारण । चित्त के पर्याय हैं--चेतस्, हृदय, स्वान्त, हृद्, मानस और मन । बुद्धि के पर्याय हैं- मनीषा, धिषणा, धी, प्रज्ञा, शेमुषी, मति, प्रेक्षोपलब्धि, चित्, संवित्, प्रतिपद्, ज्ञप्ति और चेतना । धारण करनेवाली बुद्धि मेघा है । संकल्प है मन का कर्म ॥४१-४७ ॥ विचार के पर्याय हैं - संख्या, विचारणा और चर्चा । विचिकित्सा कहते हैं - संशय को, तर्क के पर्याय हैं - अध्याहार और कह । निर्णय और निश्चय १ क. ख. ग. यामा । २ क. ङ. ज्योत्स्ना । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1114

अग्नि पुराण, पृष्ठ 1114 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१११० अग्निपुराणम् मिथ्यादृष्टिर्नास्तिकता भ्रान्तिर्मिथ्यामतिर्भ्रमः ॥ मोक्षे धीर्ज्ञानमन्यत्र विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः । मोक्षोऽपवर्गोऽथाज्ञानमविद्याऽहंमतिः स्त्रियाम् । आमोदः सोऽतिनिर्हारी सुरभिर्घाणतर्पणः । अवदातः सितो गौरो वलक्षो धवलोऽर्जुनः । कृष्णे नीलासितश्यामकालश्यामलमेचकाः रोहितो लोहितो रक्तः शोणः कोकनदच्छविः श्यावः स्यात्कपिशो धूम्रधूमलौ कृष्णलोहिते चित्रं किर्मीरकल्माषशबलैताश्च कर्बुरे तिङ्सुबन्तचयो वाक्यं क्रिया वा कारकान्विता आख्यायिकोपलब्धार्था प्रबन्धकल्पना कथा समस्या तु समासार्था स्मृतिस्तु धर्मसंहिता अंगीकाराभ्युपगमप्रतिश्रवसमाधयः ॥४९ ॥

मुक्तिः कैवल्यनिर्वाणश्रेयोनिः श्रेयसामृतम् ॥५० ॥

विमर्दोत्थे परिमलो गन्धे जनमनोहरे ॥ ५१ ॥

शुक्लशुभ्रशुचिश्वेतविशदश्वेतपाण्डराः ॥५२ ॥

हरिणः पाण्डुरः पाण्डुरीषत्पाण्डुस्तु धूसरः ॥ ५३ ॥

। पीतो गौरो हरिद्राभः पालाशो हरितो हरित् ॥५४ ॥

। अव्यक्तरागस्त्वरुणः श्वेतरक्तस्तु पाटलः ॥ ५५ ॥

। कडारः कपिलः पिङ्गपिशाङ्गौ कद्रुपिङ्गलौ ॥५६ ॥

। व्याहार उक्तिर्लपितमपभ्रंशोऽपशब्दकः ॥५७ ॥

। इतिहास: पुरावृत्तं पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥५८ ॥

। समाहारः संग्रहस्तु प्रवह्निका प्रहेलिका ॥ ५ ९ ॥ । आख्याह्ने चाभिधानं च वार्ता वृत्तान्त ईरितः ॥ ६० ॥

समान अर्थवाले हैं । नास्तिकता को मिथ्यादृष्टि कहते हैं । भ्रान्ति के पर्याय हैं - मिथ्या मति और भ्रम । स्वीकृति को अंगीकार, अभ्युपगम, प्रतिश्रव और समाधि कहते हैं । मोक्ष से सम्बद्ध बुद्धि को विज्ञान कहा गया है । मुक्ति के पर्याय हैं - कैवल्य और निर्वाण । अमृत के पर्याय हैं - श्रेयस् और निःश्रेयस् ॥४८-५० ॥ मोक्ष अपवर्ग को कहते हैं । अज्ञान को अविद्या और अहम्मति कहा गया है । ये दोनों स्त्रीलिंग शब्द हैं । मसलने से उत्पन्न होनेवाला तथा मनुष्यों के मन को हरण करनेवाला गन्ध परिमल कहलाता है । अत्यन्त हरण करनेवाले गन्ध को आमोद कहा गया है । सुरभि के पर्याय हैं - घ्राण और तर्पण । श्वेत के पर्याय हैं - शुक्ल, शुभ्र, शुचि, विशद, श्वेत, पाण्डर, अवदात, सित, गौर, वलक्ष, धवल और अर्जुन । पीलिमायुक्त श्वेतवर्ण को हरिण, पाण्डुर और पाण्डु कहते हैं । बहुत हल्का होने पर इस रंग को धूसर कहा गया है । काले रंग के पर्याय हैं - कृष्ण, नील, असित, श्याम, काल, श्यामल और मेचक । पीले रंग को पीत, गौर और हरिद्राभ कहते हैं । हरे को पालाश, हरित तथा हरित् कहते हैं । लाल को रोहित, लोहित और रक्त कहते हैं । लाल कमल के समान रंग को शोण कहते हैं । अरुण उस लालिमा को कहते हैं जो अस्पष्ट होती है और पाटल कहते हैं गुलाबी को । भूरे रंग को श्याव अथवा कपिश कहते हैं और काले के साथ लाल को धूम्र और धूमल । कडार, पिङ्ग, पिशङ्ग, कट्ठ और पिङ्गल भूरे रंग का वाचक है । चित्तीदार के पर्याय हैं - चित्र, किर्मीर, कल्माष, शबल, एत और कर्बुर । वाणी के पर्याय हैं - व्यवहार, उक्ति और लपित । अपशब्द को अपभ्रंश कहते हैं ॥५१-५७ ॥ तिङ्न्त ( क्रियापदों ) और सुबन्त ( संज्ञा पदों ) के समूह को वाक्य कहा जाता है । क्रिया उसे कहते हैं जो कारकों से युक्त रहती है । इतिहास कहते हैं प्राचीन वृत्तान्त को । पुराण के पाँच लक्षण हुआ करते हैं । जिसका अर्थ पहले से ज्ञात हो उसे आख्यायिका कहते हैं और जहाँ पर प्रबन्ध की कल्पना की जाती है उसे कथा कहते हैं । संग्रह कहते हैं समाहार को और प्रहेलिका कहते हैं बुझौवल को । संक्षिप्त अर्थवाली समस्या कहलाती है और धर्मसंहिता को स्मृति कहते हैं । आख्या, आह्वा और अभिधान ये नाम के वाचक हैं । वार्ता को वृत्तान्त कहा गया है । हूति CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1115

अग्नि पुराण, पृष्ठ 1115 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११११ हूतिराकारणाऽऽह्वानमुपन्यासस्तु वाङ्मुखम् उपोद्घात उदाहारो हाथ मिथ्याभिशंसनम् । आम्रेडितं द्विस्त्रिरुक्तं ' कुत्सानिन्दे च गर्हणे । अनुलापो मुहुर्भाषा विलापः परिदेवनम् । सुप्रलापः सुवचनमपलापस्तु निह्नवः । अत्यर्थमधुरं सान्त्वमबद्धं स्यादनर्थकम् । सत्यं तथ्यमृतं सम्यङ्नादनिःस्वाननिःस्वनाः । स्वनिते वस्त्रपर्णानां भूषणानां तु शिञ्जितम् । कोलाहलः कलकलो गीतं गानमिमे समे । काकली तु कले सूक्ष्मे ध्वनौ तु मधुरास्फुटे । समन्वितलयस्त्वेकतालो वीणा तु वल्लकी । ततं वीणादिकं वाद्यमानद्धं मुरजादिकम् ॥ विवादो व्यवहारः स्यात्प्रतिवाक्योत्तरे समे ॥ ६१ ॥

अभिशापो यशः कीर्तिः प्रश्नः पृच्छाऽनुयोगकः ॥ ६२ ॥

स्यादाभाषणमालापः प्रलापोऽनर्थकं वचः ॥ ६३ ॥

विप्रलापो विरोधोक्तिः संलापो भाषणं मिथः ॥ ६४ ॥

रुशती वागकल्याणी संगतं हृदयंगमम् ॥६५ ॥

निष्ठुराश्लीलपरुषं ग्राम्यं वै सूनृतं प्रिये ॥ ६६ ॥

आरवारावसंरावविरावा अथ मर्मरः ॥६७ ॥

वीणाया निक्वणः क्वाणस्तिरश्चां वाशितं रुतम् ॥६८ ॥

स्त्री प्रतिश्रुत्प्रतिध्वाने ' तन्त्रीकण्ठान्निसा ( षा ) दकः ॥६९ ॥

कलो मन्द्रस्तु गम्भीरे तारोऽत्युच्चैस्त्रयस्त्रिषु ॥७० ॥

विपञ्ची सा तु तन्त्रीभिः सप्तभिः परिवादिनी ॥७१ ॥

वंशादिकं तु ' सुषिरं कांस्यतालादिकं घनम् ॥७२ ॥

आकारणा और आह्वान ये पुकारने के अर्थ में आते हैं । वाणी के आरम्भ को उपन्यास और वाङ्मुख कहते हैं । विवाद और व्यवहार मुकदमेबाजी का नाम है । प्रतिवाक्य और उत्तर ये दोनों समानार्थक हैं ॥५८-६१ ॥ उपोद्घात और उदाहार-ये भूमिका के नाम हैं । झूठा कलंक लगाने को मिथ्याभिशंसन और अभिशाप कहा गया है । यश कहते हैं कीर्ति को और प्रश्न का पर्याय है पृच्छा । किसी बात को दो या तीन बार कहना आम्रेडित कहलाता है और कुत्सा तथा निन्दा कहते हैं तिरस्कार को । परस्पर की बातचीत, आलाप और अनर्थक वाणी को प्रलाप कहा गया है । बार - बार किसी बात को कहना अनुलाप कहलाता है और परिदेवना को विलाप कहा गया है । विरोधी वचनों को विप्रलाप और परस्पर भाषण को संलाप कहते हैं । अच्छी बातचीत को सुप्रलाप तथा किसी बात को छिपाना अपलाप कहलाता है । अकल्याणकारी वाणी रुशती कहलाती है तथा हृदयङ्गम करने को संगति कहा जाता है ॥ ६२-६५ ॥ अत्यन्त मधुर बातचीत को सान्त्वना तथा अनर्थक बातचीत को अबद्ध कहते हैं । निष्ठुर, अश्लील और परुष को ग्राम्य और प्रियवाणी को सुनृत कहा जाता है । सत्य, तथ्य, ऋत और सम्यक् - ये यथार्थबोधक हैं । नाद, निःस्वान, निःस्वन, आरव, आराव, संराव और विराव अव्यक्त शब्द के वाचक हैं । वस्त्र और पत्रों की ध्वनि को मर्मर, आभूषणों की ध्वनि को शिञ्जित, वीणा की ध्वनि को निक्वण तथा क्वाण और पक्षियों के कलरव को वाशित कहते हैं । कोलाहल और कलकल सामूहिक ध्वनि को कहते हैं । गीत और गान समानार्थक हैं । प्रतिश्रुति और प्रतिध्वान - ये प्रतिध्वनि के वाचक हैं । प्रतिश्रुत् शब्द स्त्रीलिंग है । वीणा के कण्ठ से निषाद आदि स्वर प्रकट होते हैं । सूक्ष्मध्वनि को काकली, मधुर और अव्यक्त ध्वनि को कल, गम्भीर ध्वनि को मन्द्र और अत्यन्त उच्च ध्वनि को तार कहते हैं । लययुक्त को एकताल और वीणा को वल्लकी कहते हैं । सात तन्त्रियों से युक्त वीणा विपञ्ची कहलाती है ॥६६-७१ ॥ वीणा आदि वाद्य ' तत ' ( तारयुक्त ) समूह के अन्तर्गत, मुरज आदि ' आनद्ध ' समूह के अन्तर्गत, वंशी आदि ' सुषिर ' समूह के अन्तर्गत, कांस्य और ताल आदि ' घन ' समूह के अन्तर्गत आते हैं । इन १ ख. ग. निन्दा च । २ क. ङ. छ. उषती । ३ क. ङ. ' ण्ठानिषादका । का । ४ क. ङ. शुषिरं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1116

अग्नि पुराण, पृष्ठ 1116 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१११२ अग्निपुराणम् चतुर्विधमिदं वाद्यं वादित्रातोद्यनामकम् । स्याद्यशः पटहो ढक्का भेर्यामानकदुन्दुभिः (? ) । मर्दलः पणवस्तुल्यो क्रियामानं तु तालकः । तौर्यत्रिकं नृत्यगीतवाद्यं नाट्यमिदं त्रयम् । शृङ्गारवीरकरुणाद्भुतहास्यभयानकाः । उत्साहवर्धनो वीरः कारुण्यं करुणा घृणा । हासो हास्यं च वीभत्सं विकृतं त्रिष्विदं द्वयम् । दारुणं भीषणं भीष्मं घोरं भीमं भयानकम् । चतुर्दश दरस्त्रासौ ( सो ) भीतिर्भीः साध्वसं भयम् । गर्वा ( र्वो s ) भिमानोऽहंकारो मानश्चित्तसमुन्नतिः । व्रीडा लज्जा त्रपा ह्रीः स्यादभिध्यानं धने स्पृहा । स्त्रीणां विलासविव्वोकविभ्रमा ललितं तथा ।

द्रवकेलिपरीहासाः क्रीडा लीला च कूर्दनम् ।

मृदङ्गा मुरजा भेदास्त्वक्यालिङ्ग्योर्ध्वकास्त्रयः ॥७३ ॥

आनकः पटहो भेदा ' झर्झरीडिण्डिमादयः ॥७४ ॥

लयः साम्यं ताण्डवं तु नाट्यं लास्यं च नर्तनम् ॥७५ ॥

राजा भट्टारको देवः साभिषेका च देव्यपि ॥ ७६ ॥

वीभत्सरौद्रौ च रसाः शृङ्गारः शुचिरुज्ज्वलः ॥७७ ॥

कृपा दया चानुकम्पाऽप्यनुक्रोशोऽप्यथो हसः ॥७८ ॥

विस्मयोऽद्भुतमाश्चर्यं चित्रमप्यथ भैरवम् ॥ ७ ९ ॥

भयंकरं प्रतिभयं रौद्रं तूग्रममी त्रिषु ॥ ८० ॥

विकारो मानसो भावोऽनुभावो भावबोधनः ( कः ) ॥८१ ॥

अनादरः परिभवः ' परिभावस्तिरस्क्रिया ॥८२ ॥

कौतूहलं कौतुकं च कुतुकं च कुतूहलम् ॥८३ ॥

हेला लीलेत्यमी हावाः क्रियाः शृङ्गारभावजाः ॥ ८४ ॥

स्यादाच्छुरितकं हासः सोत्प्रासः समनाक्स्मितम् ॥ ८५ ॥

चारों प्रकार के बाजों का नाम वाद्य, वादित्र और आतोद्य है । मृदङ्ग और मुरज ढोल के नाम हैं । उसके भेद हैं अङ्कय, आलिङ्ग्य और ऊर्ध्व । यशः पटह को ढक्का तथा भेरी को आनक और दुंदुभि कहते हैं । इसके अन्य भेद हैं - आनक, पटह, झर्झरी और डिण्डिम आदि । मर्दल और पणव समान बाजे हैं । ताल कहते हैं क्रियामान को और लय का अभिप्राय है साम्य । ताण्डव नाट्य के अन्तर्गत तथा लास्य नर्तन में आता है । नृत्य, गीत और वाद्य से युक्त नाट्य अथवा तौर्यत्रिक कहलाता है । राजा को भट्टारक तथा देव शब्दों से तथा अभिषिक्ता रानी को देवी शब्द से सम्बोधित किया जाता है ॥७२-७६ ॥ रस ये हैं - शृङ्गार, वीर, करुण, अद्भुत, हास्य, भयानक, वीभत्स और रौद्र । शृङ्गार, शुचि और उज्ज्वल होता है । उत्साहवर्धन और वीर - ये वीर रस के नाम हैं । कारुण्य, करुणा, घृणा, कृपा, दया, अनुकम्पा और अनुक्रोश ये दया के नाम हैं । हस, हास, हास्य - ये हँसी के नाम हैं । वीभत्स और विकृत - ये वीभत्स के नाम हैं । ये ' रस ' अर्थ में पुल्लिंग और ' रसविशिष्ट ' अर्थ में त्रिलिंग हैं । विस्मय, अद्भुत, आश्चर्य, चित्र- ये आश्चर्य के नाम हैं । भैरव, दारुण, भीषण, भीष्म, भयानक, भयङ्कर, प्रतिभय - ये भयानक के नाम हैं । रौद्र, उग्र - रौद्र के नाम हैं । ' अद्भुत ' से लेकर ' उग्र ' शब्द पर्यन्त चौदहों शब्द त्रिलिंग हैं । दर, त्रास, भीति, भी, साध्वस, भय - ये डर के नाम हैं । मानस विकार का नाम भाव और मानस विकार सूचक कटाक्ष आदि का नाम अनुभाव है । गर्व, अभिमान, अहंकार, मान और चित्तसमुन्नति - ये गर्व के नाम हैं । अनादर, परिभाव और तिरस्क्रिया - ये तिरस्कार के नाम हैं । व्रीडा, लज्जा, त्रपा और ह्री - ये लज्जा के नाम हैं । घन विषयक स्पृहा को अभिध्यान कहते हैं ॥७७-८२३ ॥ कौतूहल के पर्याय हैं - कौतुक, कुतुक और विलास, विव्वोक, विभ्रम, ललित, हेला और लीला - ये स्त्रियों के हाव हैं । ये सभी क्रियाएँ श्रृंगार कुतूहल । हैं । द्रव, केलि, परिहास, क्रीड़ा, लीला और कूदना क्रीड़ा के नाम भाव से उत्पन्न होती हैं । हास के भेद हैं - आच्छुरितक, हास, सोत्प्रास १ ख. ग. ' र्झरो डि ' । २ ख. ग. परीभा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1117

अग्नि पुराण, पृष्ठ 1117 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः १११३ अधोभुवनपातालं छिद्रं श्वभ्रं वपा सुषिः । सर्पः पृदाकुर्भुजगो दन्दशूको बिलेशयः पयः कीलालममृतमुदकं भुवनं वनम् । पृषन्ति बिन्दुपृषताः कूलं रोधश्च तीरकम् । जलोच्छ्वासाः परीवाहाः कूपकास्तु विदारकाः । कलुषश्चाऽऽविलोऽच्छस्तु प्रसन्नोऽथ गभीरकम् । सौगन्धिकं तु कहारं नीलमिन्दीवरं कजम् । शालूकमेषां कन्दः स्यात्पद्मं तामरसं कजम् । करहाट: शिफा कन्दः किंजल्कः केशरोऽस्त्रियाम् ।

उपत्यकाऽद्रेरासन्ना भूमिरूर्ध्वमधित्यका ।

गर्तावटौ भुविश्वभ्रे तमिश्रं ( त्रं ) तिमिरं तमः ॥ ८६ ॥

। विषं क्ष्वेडश्च गरलं निरयो दुर्गतिः स्त्रियाम् ॥८७ ॥

भङ्गस्तरङ्ग ऊर्मिर्वा कल्लोलोल्लोलकौ च तौ ॥८८ ॥

तोयोत्थितं तत्पुलिनं जम्बालं पङ्ककर्दमौ ॥८९ ॥

आतरस्तरपण्यं स्याद्द्रोणी काष्ठाम्बुवाहिनी ॥ ९ ० ॥

अगाधं ' दासकैवर्तौ शम्बूका जलशुक्तयः ॥ ९ १ ॥

स्यादुत्पलं कुवलयं सिते कुमुदकैरवे ॥९ २ ॥

नीलोत्पलं कुवलयं रक्तं कोकनदं स्मृतम् ॥ ९ ३ ॥

खनिः स्त्रियामाकरः स्यात्पादाः प्रत्यन्तपर्वताः ॥ ९ ४ ॥

स्वर्गपातालवर्गाद्या उक्ता नानार्थकाञ्शृणु ॥ ९ ५ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये स्वर्गपातालादिवर्गकथनं नाम षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३६० ॥

और स्मित । पाताल का पर्याय है - अधोभुवन । छिद्र के पर्याय हैं- श्वभ्र, वपा, सुषि, गर्त और अवट । अन्धकार के पर्याय हैं - तमिस्र, तिमिर और तम । सर्प के पर्याय हैं - पृदाकु, भुजंग, दन्दशूक और बिलेशय । विष को क्ष्वेड और गरल कहते हैं । नरक के पर्याय हैं - निरय और दुर्गति । इनमें दुर्गति स्त्रीलिंग हैं ॥८३-८७ ॥ जल के पर्याय हैं - पय, कीलाल, अमृत, उदक, भुवन और वन । तरङ्ग के पर्याय हैं- भङ्ग, ऊर्मि, कल्लोल और उल्लोलक । बिन्दु के पर्याय हैं - पृषत्, बिन्दु और पृषत । तट के पर्याय हैं - कूल, रोधस् और तीर । जल से बने हुए ( रेतीले ) तट को पुलिन कहते हैं । कीचड़ को जम्बाल, पङ्क और कर्दम कहा जाता है । नाली को जलोच्छ्वास और परिवाह कहते हैं । कुएँ के पर्याय हैं - कूपक और विदारक, ( नदी को ) पार करने के शुल्क को आतर और तरपण कहा जाता है । काठ के बने हुए जल ले जाने के पात्र को द्रोणी कहा जाता है ॥८८ - ९ ० ॥ कलुष को आविल और साफ पानी को अच्छ और प्रसन्न कहते हैं । गहरे जल को अगाध और गम्भीर कहते हैं । धीवर को दास और कैवर्त कहते हैं । सीपी को शम्बूक कहते हैं । मलकोका को सौगन्धिक और कह्लार कहते हैं । नील कमल को इन्दीवर, कज, उत्पल और कुवलय तथा श्वेत कमल को कुमुद और कैरव कहते हैं । कमलों की जड़ को शालूक कहते हैं । कमल के पर्याय हैं - पद्म, तामरस और कज । नीलकमल को कुवलय और रक्तकमल को कोकनद कहा जाता है । कुमुदिनी की जड़ को करहाट तथा केसर को किञ्जल्क कहते हैं । खान को खनि और आकर कहते हैं । पर्वतों की तलहटियों को पाद कहा जाता है । पर्वत के निकट की भूमि ( घाटी ) को उपत्यका और उनके ऊपर की भूमि को अधित्यका कहते हैं । स्वर्ग और पाताल आदि वर्ग का वर्णन किया गया है, अब विभिन्न अर्थोंवाले शब्दों को सुनो ॥९ १ - ९ ५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में स्वर्गपातालादिवर्ग - कथन नामक तीन सौ साठवाँ अध्याय समाप्त ॥३६० ॥

१ ख. ग. दाशकै । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1118

अग्नि पुराण, पृष्ठ 1118 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१११४ अग्निपुराणम् अथैकषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः अव्ययवर्गः अग्निरुवाच आङीषदर्थेऽभिव्याप्तौ सीमार्थे धातुयोगजे । आ प्रगृह्यः स्मृतौ वाक्येऽप्यास्तु स्यात्कोपपीडयोः ॥१ ॥

पापकुत्सेषदर्थे ' कु धिङनिर्भर्त्सननिन्दयोः । चान्वाचयसमाहारेतरेतरसमुच्चये ॥२ ॥

स्वस्त्याशीः क्षेमपुण्यादौ प्रकर्षे लङ्घनेऽप्यति । स्वित्प्रश्ने च वितर्के च तु स्यादभेदेऽवधारणे || ३ || सकृत्सहैकवारे स्यादाराद्दूरसमीपयोः । प्रतीच्यां चरमे पश्चादुताप्यर्थविकल्पयोः || ४ ॥ पुनः सदार्थयोः शश्वत्साक्षात्प्रत्यक्षतुल्ययोः । खेदानुकम्पासंतोषविस्मयामन्त्रणे वत ॥५ ॥

हन्त हर्षेऽनुकम्पायां वाक्यारम्भविषादयोः । प्रति प्रतिनिधौ वीप्सालक्षणादौ प्रयोगतः || ६ || इति रहेतुप्रकरणप्रकाशादिसमापिषु । प्राच्यां ' पुरस्तात्प्रथमे पुरार्थेऽग्रत इत्यपि ॥७ ॥

यावत्तावच्च साकल्येऽवधौ मानेऽवधारणे । मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्नकार्येष्वथो अथ ॥८ ॥

वृथा निरर्थकाविध्योर्नानाऽनेकोभयार्थयोः । नु पृच्छायां विकल्पे च पश्चात्सादृश्ययोरनु ॥९ ॥

अध्याय ३६१ अव्ययवर्ग अग्निदेव बोले - ' आङ् ' का प्रयोग ईषत्, अभिव्याप्ति और सीमा के अर्थ में होता है । कहीं - कहीं वह प्रगृह्य के रूप में भी होता है और कभी - कभी उससे क्रोध और पीड़ा का अर्थ ज्ञात होता है । ' कु ' का प्रयोग पाप, कुत्सा और ईषत् के अर्थ में होता है । धिङ् का अर्थ होता है भर्त्सना और निन्दा | ' च ' का अर्थ है अन्वाचय, समाहार, इतरेतर और समुच्चय ‘ स्वस्ति ' का प्रयोग आशीष, क्षेम, पुण्य इत्यादि में और प्रकर्ष तथा उल्लंघन में भी होता है । स्वित् का अर्थ होता है प्रश्न । और वितर्क । ' तु ' का प्रयोग भेद और अवधारणा में किया जाता है ॥१-३ ॥ ' सकृत् ' का अर्थ है एक बार । ‘ आरात् ’ दूर और समीप के अर्थ में प्रयुक्त होता है । पश्चाद् पश्चिम तथा अन्तिम के अर्थ में प्रयुक्त होता है । उत का प्रयोग भी और अर्थों के विकल्प में होता है । पुनः का अर्थ है बार - बार । इसी अर्थ में शश्वत् का भी प्रयोग होता है । प्रत्यक्ष और के अर्थ में साक्षात् का प्रयोग होता है । वत का प्रयोग खेद, अनुकम्पा, वाक्यारम्भ और विषाद में किया तुल्य का प्रयोग प्रतिनिधि तथा वीप्सा के अर्थ में होता है ॥४-६ ॥ इति हेतु के अर्थ में तथा प्रकरण जाता है । प्रति समाप्ति में प्रयुक्त होता है । पुरस्तात् का प्रयोग पूर्व दिशा, प्रथम, पुरा, प्राचीन काल में और आगे और प्रकाश आदि की है ॥ यावत् और तावत् का प्रयोग साकल्य, अवधि, परिमाण और अवधारणा के अर्थ में भी होता प्रश्न और सम्पूर्णता के अर्थ के अर्थ में होता है । मंगल, अनन्तर, आरम्भ, में अथ प्रयुक्त होता है । वृथा का अर्थ है - निरर्थक और अविधि तथा नाना का प्रयोग अनेक तथा उभय के अर्थ में होता है । पृच्छा और विकल्प में ' नु ' का प्रयोग होता है तथा पश्चात् और सादृश्य के अर्थ में ‘ अनु ’ १ ख. ग. ‘ र्थे कुः किंधिक्कुत्सन ' । २ क. ङ. सहार्थ । ३ ख. ग. हेतौ प्रकारेणु । ४ ख CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA. ग. पुरस्तु प्रथ ।

पृष्ठ 1119

अग्नि पुराण, पृष्ठ 1119 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः १११५ प्रश्नावधारणानुज्ञानुनयामन्त्रणे ' ननु उपमायां विकल्पे वा सामि त्वर्धे जुगुप्सिते इत्थमर्थयोरेवं नूनं तर्केऽर्थंनिश्चये । नाम प्राकाश्यसंभाव्यक्रोधोपगमकुत्सने हूं वितर्के परिप्रश्ने समयान्तिकमध्ययोः । स्यात्प्रबन्धे चिरातीते निकटागामिके पुरा स्वर्गे परे च लोके स्वर्वार्ता संभाव्ययोः किल । समीपोभयतः शीघ्रसाकल्याभिमुखेऽभितः । तिरोऽन्तर्धौ तिर्यगर्थे हा विषादशुगर्तिषु । चिराय चिररात्राय चिरस्यार्था ( द्या ) श्चिरार्थकाः । द्राग्झटित्यञ्जसाऽह्नाय सपदि द्राङ्मङ्क्षु द्रुते ॥ गर्हा समुच्चयप्रश्नशङ्कासम्भावनास्वपि ॥१० ॥

। अमा सह समीपे च कं वारिणि च मूर्धनि ॥११ ॥

तूष्णीमर्थे सुखे जोषं किं पृच्छायां जुगुप्सने ॥ १२ ॥

। अलं भूषणपर्याप्तिशक्तिवारणवाचकम् ॥१३ ॥

पुनरप्रथमे भेदे निर्निश्चयनिषेधयोः ॥१४ ॥

। उरर्यूरी चोररी च विस्तारेऽङ्गीकृतौ त्रयम् ॥१५ ॥

निषेधवाक्यालंकारे जिज्ञासावसरे खलु ॥१६ ॥

नामप्रकाशयोः प्रादुर्मिथोऽन्योन्यं रहस्यपि ॥१७ ॥

अहहेत्यद्भुते खेदे हि हेताववधारणे ॥१८ ॥

मुहुः पुनः पुनः शश्वदभीक्ष्णमसकृत्समाः ॥१९ ॥

बलवत्सुष्ठु किमुत विकल्पे किं किमूत च ॥२० ॥

का । प्रश्न, अवधारणा, अनुज्ञा, अनुनय और आमन्त्रण में ' ननु ' प्रयुक्त होता है । इसका प्रयोग निन्दा, समुच्चय और सम्भावना में भी होता है ॥७ - १० ॥ ' वा ' का अर्थ है उपमा और विकल्प । सामि का प्रयोग अर्ध और जुगुप्सा में किया जाता है । अमा का अर्थ है साथ और समीप । ' क ' का अर्थ है जल तथा मूर्धा । ' एवम् ' का प्रयोग ' इव ' तथा ‘ इत्थम् ' के अर्थ में तथा ‘ नूनम् ' का तर्क और निश्चय में किया जाता है । ' जोषम् ' का प्रयोग चुपचाप और सुख के अर्थ में होता है । ' किम् ' पृच्छा तथा जुगुप्सा के अर्थ में प्रयुक्त होता है । नाम का प्रयोग स्पष्टतः सम्भावना, क्रोध और कुत्सा अर्थ में किया जाता है । अलम् शब्द भूषण, पर्याप्ति, शक्ति और निषेध का वाचक है । ' हुं ' वितर्क और परिप्रश्न के अर्थ में तथा समया निकट और मध्य के अर्थ में प्रयुक्त होता है । पुनः का प्रयोग बार - बार तथा भेद के अर्थ में होता है । निः का अर्थ है निश्चय और निषेध ॥११-१४ ॥ ' पुरा ' का प्रयोग प्रबन्ध ( अविच्छेदेन क्रियाकरण ) अर्थ में, चिरन्तन अर्थ में, भूत अर्थ में, समीप और भावी अर्थ में होता है । उररि, ऊरि और उररी इन तीनों का प्रयोग विस्तार और अङ्गीकार में किया जाता है । स्वः का प्रयोग स्वर्ग और परलोक के अर्थ में किया जाता है । किल का अर्थ वार्ता और सम्भावना होता है । निषेध, वाक्यपूर्ति, जिज्ञासा और अवसर के लिए खलु प्रयुक्त होता है । अभितः का प्रयोग निकट, दोनों ओर, शीघ्रता से, सम्पूर्ण रूप से और सामने के अर्थ में किया जाता है । प्रादुः का प्रयोग नाम और प्राकाश्य के अर्थ में होता है । मिथः का अर्थ है - परस्पर अथवा एकान्त में । तिरः का अर्थ है - अन्तर्धान होना और टेढ़ा । विषाद, शोक और दुःख में ' हा ' का प्रयोग किया जाता है । ' अहह ' का प्रयोग आश्चर्य तथा खेद को सूचित करता है । ' हि ’ का अर्थ है हेतु और अवधारणा ॥१५-१८ ॥ ' चिर ' के अर्थ में ही चिराय, चिररात्राय और चिरस्य आदि प्रयुक्त होते हैं । मुहुः, पुनः पुनः, शश्वत्, अभीक्ष्णम् और असकृत् ये सब समानार्थक हैं । द्राक्, झटिति, अंजसा, आह्राय, सपदि, द्राङ् और मङ्क्षु का प्रयोग शीघ्रता के अर्थ में किया जाता है । किसी बात पर बल देने के लिए बलवत्, सुष्ठु और किमुत का प्रयोग किया जाता है । विकल्प के अर्थ में भी किम् और किमुत प्रयुक्त होते हैं । ' तु ' ' हि ' १ ख. ग. ' णार्थज्ञानु ' । २ क. ङ. हुं । ३ ख. ग. ' दे विनाऽऽश्चर्यनि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1120

अग्नि पुराण, पृष्ठ 1120 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१११६ अग्निपुराणम् तु हि च स्म ह वै पादपूरणे ' पूजनेऽप्यति । दिवाऽह्नीत्थ दोषा च नक्तं च रजनाविति ॥ २१ ॥

तिर्यगर्थे साचि तिरोऽप्यथ संबोधनार्थकाः । स्युः प्याट् पाडङ्ग हे है भोः समया निकषा हिरुक् ॥ २२ ॥

अतर्किते तु सहसा स्यात्पुरः पुरतोऽग्रतः । स्वाहा देवहविर्दाने श्रौषड्वौषड्वषट्स्वधा ॥ २३ ॥

किंचिदीषन्मनागल्पे प्रेत्यामुत्र भवान्तरे । यथा तथा चैव साम्ये अहो हो इति विस्मये ॥ २४ ॥

मौने तु तूष्णीं तूष्णीकं सद्यः सपदि तत्क्षणे । दिष्ट्या समुपजोषं चेत्यानन्देऽथान्तरेऽन्तरा ॥ २५ ॥

अन्तरेण च मध्ये स्युः प्रसह्य तु हठार्थकम् । युक्ते द्वे सांप्रतं स्थानेऽभीक्ष्णं शश्वदनारते ॥ २६ ॥

अभावे नह्य नो नापि मा स्म माऽलं च वारणे । पक्षान्तरे चेद्यदि च तत्त्वे त्वद्धाञ्जसा द्वयम् ॥ २७ ॥

प्राकाश्ये प्रादुराविः स्यादोमेवं परमं मते । समन्ततस्तु परितः सर्वतो विष्वगित्यपि ॥ २८ ॥

अकामानुमतौ काममसूयोपगमेऽस्तु च । ननु च स्याद्विरोधोक्तौ कच्चित्कामप्रवेदने ॥ २ ९ ॥ निःषमं दुःषमं गर्ह्ये ` यथास्वं तु यथायथम् । मृषा मिथ्या च वितथे यथार्थं तु यथातथम् ॥३० ॥

' च ' ' स्म ' ' ह ' और ' वै ' का प्रयोग पादपूर्ति के लिए किया जाता है । पूजा के अर्थ में अधि का प्रयोग होता है । दिन के अर्थ में दिवा तथा रात्रि के अर्थ में दोषा और नक्तम् प्रयुक्त होते हैं । १ ९ - २१ ॥ तिरछे के अर्थ में साचि और तिरः का प्रयोग होता है । प्याट्, पाट्, अङ्ग, हे, है और भोः का प्रयुक्त होता है सम्बोधन के अर्थ में । निकट के अर्थ में समया, निकषा और हिरुक् प्रयुक्त होते हैं । बिना विचारे जो कुछ किया जाता है उसे सहसा कहते हैं । सामने के अर्थ में पुरतः और अग्रतः का प्रयोग होता है । देवताओं को हविष् प्रदान करने में स्वाहा, श्रौषट्, वौषट्, वषट् और स्वधा तथा पितरों को दिये जानेवाले हविष् के लिए स्वधा का प्रयोग होता है । अल्प के अर्थ में किञ्चित्, ईषत् और मनाक् का प्रयोग होता है । परलोक के लिए प्रेत्य और अमुत्र शब्दों का प्रयोग होता है । यथा, तथा और एक साम्य के अर्थ में तथा अहो और हो विस्मय में प्रयुक्त होते हैं । मौन के अर्थ में तूष्णीम् तथा तूष्णीकम् तथा तुरन्त के लिए सद्यः और सपदि का प्रयोग होता है । मध्य के अर्थ में अन्तरे, अन्तरा तथा अन्तरेण शब्दों का प्रयोग होता है । तथा हठपूर्वक किये जानेवाले कर्म में प्रसह्य शब्द का प्रयोग होता है ॥२२-२५३ ॥ साम्प्रतं और स्थांने ये दोनों शब्द उचित के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । निरन्तरम् के अर्थ में अभीक्ष्णम् और शश्वद् शब्द प्रयुक्त अभाव के अर्थ में नहि, अ नो और न का प्रयोग होता है और प्रतिषेध में मा, स्म, मा और अलम् होते हैं । के लिए चेत् और यदि तथा वास्तविकता के लिए अद्धा और अञ्जसा शब्दों का । पक्षान्तर ये दोनों शब्द प्रयुक्त होते हैं । प्रकट करने के अर्थ में प्रादुः और आविः तथा स्वीकृति, ओम्, एवम् और परमम् प्रयुक्त होते हैं । चारों ओर के अर्थ में समन्ततः परितः, सर्वतः और विष्वग् शब्द प्रयुक्त होते हैं । अनिच्छया अनुमति और असूया से अंगीकार, प्रयोग होता है । ननु का प्रयोग विरोधोक्ति में तथा कच्चित् का प्रयोग इष्ट अर्थ में कायम् का में ' निःषमम् ' और ' दुःषमम् ' प्रयुक्त होते हैं तथा प्रश्न में किया जाता है । निन्दनीय अर्थ ठीक - ठीक के अर्थ में यथास्वम् और यथायथम् का प्रयोग होता है । असत्य के अर्थ में मृषा और मिथ्या तथा सत्य अर्थ में यथार्थम् और यथायथम् का प्रयोग होता है ॥ २६-३० ॥ १ ख. ग. ने स्वति । २ ख. ग. ' थार्थस्तु य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA