अग्नि पुराण — पृष्ठ 1101–1110

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1101–1110

पृष्ठ 1101

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षट्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १० ९ ७ अथ षट्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः तद्धितः स्कन्द उवाच तद्धितं ' त्रिविधं वक्ष्ये सामान्या वृत्तिरीदृशी । लच्यंसलो वत्सलः स्यादिलचि स्यात्तु फेनिलम् ॥१ ॥

लोमशः शे पामनो ने इलचि स्यात्तु पिच्छिलम् । अणि प्राज्ञ आर्चिकः स्याद्दन्तादुरचि दन्तुरः ॥२ ॥

रेस्यान्मधुरं सुशि ( षि ) रं वे स्यात्केशव ईदृशम् । हिरण्यं ये मालवो वे बलचि स्याद्रजस्वलः ॥३ ॥

इनौ धनी करी हस्ती धनिकं टिकनीरितम् । पयस्वी विनि मायावी ऊर्णायुर्युसि ईरितम् || ४ ॥ अध्याय ३५६ तद्धित स्कन्द बोले - -अब अ त्रिविध ' तद्धित ' का वर्णन करूँगा । ' तद्धित ' के तीन भेद हैं- सामान्या वृत्ति तद्धित, अव्यय तद्धित तथा भाववाचक तद्धित । ' सामान्या वृत्ति तद्धित ' इस प्रकार है - ' अंस ' शब्द से ‘ लच् ' प्रत्यय होने पर ‘ अंसलः ’ बनता है, इसका अर्थ है बलवान् । ' वत्स ' शब्द से ' लच् ' प्रत्यय होने पर पर ' वत्सलः ' रूप होता है, इसका अर्थ स्नेहवान् है! ‘ फेन ' शब्द से ' इलच् ' प्रत्यय होने पर ' फेनिलम् ' रूप होता है, इसका अर्थ है - फेनयुक्त जल । लोमादि गण से ' श ' प्रत्यय होता है ( विकल्प से ' मतुप् ' भी होता है ) - इस नियम के अनुसार ' श ' प्रत्यय होने पर ‘ लोमश: ' प्रयोग बनता है । ( मतुप् होने पर ' लोमवान् ' होता है । इसी तरह ' रोमशः, रोमवान्'- ये प्रयोग सिद्ध होते हैं ), पामादि शब्दों से ' न ' होता है - इस नियम के अनुसार ' पाम ' शब्द से ' न ' होने पर ' पामनः ', ' अङ्गात् कल्याणे ' - इस वार्तिक के अनुसार ' कल्याण ' अर्थ में ' अङ्ग ' शब्द से ' न ' होने पर ' लक्ष्मणः ' ( उत्तम लक्षणों से युक्त ) ये रूप बनते हैं । II वैकल्पिक ‘ मतुप् ’ होने पर तो ' पामवान् ' आदि रूप होंगे । जिसे खुजली हुई हो, वह ' पामन ' या ' पामवान् ' है । इसी तरह पिच्छादि शब्दों में ‘ इलच् ' होता है - इस नियम के अनुसार ' इलच् ' होने पर ' पिच्छिलः ', ' पिच्छवान् ', ' उरसिलः ', ' उरस्वान् ' इत्यादि रूप होते हैं । ' पिच्छिलः ' का अर्थ ' पंखवान् ' होता है । मार्ग का विशेषण होने पर यह फिसलनयुक्त का बोधक होता है । उरस्वान् का अर्थ मनस्वी समझना चाहिए । ( प्रज्ञाश्रद्धार्चाभ्यो णः ) के अनुसार ' ण ' प्रत्यय होने पर प्रज्ञा शब्द से ‘ प्राज्ञः ' ( प्रज्ञावान् ), श्रद्धा शब्द से श्राद्धः ( श्रद्धावान् ) और ' अर्चा ' शब्द से ' आर्चः ' ( अर्चावान् ) रूप बनते हैं । ‘ दन्त ' शब्द से ' उरच् ' प्रत्यय होने पर ' दन्तुरः ' यह रूप होता है । ' मधु ' शब्द से ' र ' प्रत्यय होने पर मधुरम् और सुषि शब्द से ' र ' प्रत्यय होने पर ' सुषिरम् ', केश शब्द से ' व ' प्रत्यय होने पर ' केशवः ', ' हिरण्य ' तथा ' मणि ' शब्दों में ' व ' प्रत्यय होने पर ' हिरण्यवः ', ' मणिव: ' - ये प्रयोग सिद्ध होते हैं । ' रजस् ' शब्द से ' बलच् ' प्रत्यय होने पर ‘ रजस्वलम् ' पद की सिद्धि होती है ॥१-३ ॥ धन, कर तथा हस्त- इन शब्दों से ' इनि ' प्रत्यय होने पर क्रमशः ' धनी ', ' करी ' और ' हस्ती'- ये पद सिद्ध होते हैं । ' धन ' शब्द से ' ठन् ' प्रत्यय होने पर ' धनिकं कुलम् ' या ' धनिकः पुरुष: ' - ये प्रयोग सिद्ध होते हैं । ' पयस् ' तथा ' माया ' शब्दों में ' विनि ' प्रत्यय होने पर ' पयस्वी ', ' मायावी ' - ये रूप बनते हैं । ' ऊर्णा ' शब्द से मत्वर्थीय ' युस् ' प्रत्यय होने पर ' ऊर्णायुः ' पद की सिद्धि बतायी गयी है । ' वाच् ' शब्द ' से १ क. ङ. द्विविधं । २ “ गुणवान्मतुपि प्रोक्तश्चूडालश्चालरीदृशम् " इत्यर्ध ' ख. ग. पुस्तकयोरधिकम् । ३ ख. ग. म् । न प्राज्ञा आलुकः श्राद्धो दन्ता । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1102

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१० ९ ८ अग्निपुराणम् वाग्मी मिनि आलचि स्याद्वाचालश्चाऽऽटचीरितम् । आलुचि शीतं न सहते शीतालुश्चैवमीदृशम् । रूपं वातादुलचि स्याद्वातुलश्चान ( ण ) पत्यके । तत्र वासो माथुरः स्याद्वेत्यधीते च चान्द्रकः । प्रियंगुणां भवं क्षेत्रं प्रैयंगवीन ( ण ) कं खञि इञि दाक्षिर्दाशरथिः फकि नाडायनादिकम् ढकि स्याद्वैनतेयादिश्चाटकैरस्तथैरकि

क्षत्रियो घे कुलीनः खे ण्ये कौरव्यादयः स्मृताः ।

फलिनो बर्हिणः केकी वृन्दारकस्तथा कनि ॥५ ॥

हिमालुरालुचि स्याच्च हिमं न सहते तथा ॥ ६ ॥

वाशिष्ठः कौरवो वास. पाञ्चालः सोऽस्य वासकः ॥७ ॥

' व्युत्क्रमं वेत्ति क्रमको नरश्चक्राम कौशकः (? ) ॥८ ॥

। मौद्गीनं कौद्रवीणं च वैदेहश्चान ( ण ) पत्यके ॥९ ॥

। आश्वायनः स्याच्च पञि यञि गार्ग्यश्च वात्स्यकः ॥१० ॥

। ढुकि गौधेरको रूपं गौधारश्चाऽऽरकीरितम् ॥ ११ ॥

यति मूर्धन्यमुख्यादिः सुगन्धिरिति रूपकम् ॥ १२ ॥

' ग्मिनि ' प्रत्यय होने पर ' वाग्मी ' तथा ' आलच् ' प्रत्यय होने पर ' वाचाल: ' - ये रूप बनते हैं । उसी से ' आटच् ' प्रत्यय होने पर ' वाचाटः ' रूप बनता है । ' फल ' तथा ' बर्ह ' शब्दों से ' इनच् ' प्रत्यय होने पर क्रमशः ' फलिनः ', ' बर्हिणः'-ये रूप बनते हैं । ' वृन्द ' शब्द से ' आरकन् ' प्रत्यय होने पर ' वृन्दारकः ' इन पद की सिद्धि होती है ॥४-५ ॥ ‘ शीतं न सहते ', ' हिमं न सहते'- इस विग्रह में ' शीत ' तथा ' हिम ' शब्दों से ' आलुच् ' प्रत्यय करने पर ' शीतालुः ' तथा ' हिमालुः ' रूप बनते हैं । ' वात ' शब्द से ' उलच् ' प्रत्यय होने पर ' वातुलः ' रूप बनता है । ' अपत्य ' अर्थ में ' अण् ' प्रत्यय होता है । ' वशिष्ठस्यापत्यं पुमान् वाशिष्ठः ' । ' कुरोरपत्यं पुमान् कौरव: ' ( वशिष्ठ की सन्तान ' वाशिष्ठ ' कहलाती है । तथा ' कुरु ' की सन्तान ' कौरव ' ) ' वहाँ उसका निवास है'- इस अर्थ में सप्तम्यन्त ' समर्थ ' शब्द से ' अण् ' प्रत्यय होता है । तथा-' मथुरायां वासोऽस्येति माथुरः ' ( मथुरा में निवास है इसका, इसलिए यह माथुर है ) ' सोऽस्य वासः ' । वह इसका वासस्थान है, इस अर्थ में भी प्रथमान्त ' समर्थ ' से ' अण् ' प्रत्यय होता है । ' उसको जानता और उसको पढ़ता है'-इस अर्थ में द्वितीयान्त ' समर्थ ' पद से ' अण् ' प्रत्यय होता है । ' चान्द्रं व्याकरणमधीते तद् वेद वा इति चान्द्रः ' ( चान्द्र एवं चान्द्रकः स्वार्थे क प्रत्ययः ) । ' क्रमादि ' शब्दों से ' वुन् ' प्रत्यय होता है ( ' वु ' के स्थान में ' अक ' आदेश होता है ) । ‘ क्रमं वेत्ति इति क्रमक: ' - जो क्रमपाठ को जानता है, वह ' क्रमक ' है । इसी तरह ' पदकः ', ' शिक्षकः ', ‘ मीमांसकः ’ इत्यादि पद बनते हैं । ‘ कोशम् अधीते वेद वा ' जो कोश को जानता या पढ़ता है, वह ' कौशक ' है ॥६-८ ॥ ' प्रियंगूणां भवं क्षेत्रं ' में खञ् प्रत्यय लगाने से ' प्रैयंगवीणकम् ' बनता है । मुद्ग शब्द से खञ् होने पर मौद्गीन और कोद्रव से खञ् होने पर कौद्रवीण की सिद्धि होती है । विदेह शब्द से अण् प्रत्यय होने पर वैदेहः शब्द बनता है । अपत्य अर्थ में इञ् प्रत्यय लगाने से दाक्षिः, दाशरथिः, फक् प्रत्यय लगाने से नाडायन, फञ् प्रत्यय लगाने से आश्वायन, यञ् प्रत्यय लगाने से गार्ग्यः, वात्स्यकः, ढक् प्रत्यय लगाने से वैनतेयः, ऐरक् प्रत्यय लगाने से चाटकैर, ढक् प्रत्यय लगाने से गौघेरक और आरक् प्रत्यय लगाने से गौधरः शब्द बनते हैं ॥९ -११ ॥ ' क्षत्रिय: ' में ' घ ' प्रत्यय, कुलीन में ' ख ' प्रत्यय और ' कौरव्य ' आदि में ' ण्य ' प्रत्यय कहे गये हैं । ' यत् ' प्रत्यय लगाने से मूर्धन्य, मुख्य और सुगन्धि आदि शब्द बनते हैं ॥१२ ॥ तारक

१ ' व्युत्क्रम ' कौशकः इत्यत्र " व्यक्तसंवेत्ति बुरुको नरश्चक्रमशोंऽशकः " इति क. ङ. पुस्तकयोः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1103

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षट्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः १० ९९ तारकादिभ्य इतचि नभस्तारकितादयः चुञ्चुपि वित्तचुञ्चुः स्याद्वित्तमस्य च शब्दके । ईयसि च पटीयान्स्यात्तरप्यक्षतरादिकम् । मृदुकल्पः कल्पपि स्यादिन्द्रकल्पोऽर्ककल्पकः पटुजातीयो जातीये जानुमात्रं च मात्रचि । तयपि स्यात्पञ्चतयो दौवारिकष्ठकीरितम् यस्माद्यतस्तसिलि च यत्र तत्र त ( त्र ) लीरितम् सर्वस्मिन्सर्वदा दा स्यात्तस्मिन्काले र्हिलीरितम् यथा थालि थमि कथं पूर्वंस्यां दिशि संचयेत् पुरस्तात्संचरेद्गच्चेत्सद्यस्तुल्येऽहनीरितम् ऐषमोऽस्मिन्संवत्सरे रूपं समसणीरितम् अद्यास्मिन्नहनि द्ये स्यात्पूर्वेद्युश्च तथैद्युसि ॥ अनङि स्याच्च कुण्डोघ्नी ' पुष्पधन्वसुधन्वनौ ॥१३ ॥

चणपि स्यात्केशचणो रूपे स्यात्पटरूपकम् ॥१४ ॥

पचतितरां च तरपि तमप्यटतितमामपि ॥१५ ॥

। राजदेशीयो देशीये देश्ये देश्यादिरूपकम् ॥ १६ ॥

ऊरुद्वयसो द्ययसच्यूरुदघ्नं च दघ्नचि ॥१७ ॥

। सामान्यवृत्तिरुक्ताऽथ अव्ययाख्यश्च तद्धितः ॥१८ ॥

। अस्मिन्काले ह्यधुना स्यादिदानीं चैव दान्यपि ( नीमि ) ॥ १ ९ ॥ । तर्हि होऽस्मिन्काल इह कर्हि कस्मिंश्च कालके ॥२० ॥

। अस्ताति चैव पूर्वस्याः पूर्वादिग्रामणीयकाः ॥ २१ ॥

। उतिः पूर्वाब्दे च परुत्पूर्वतरे परार्यपि ॥ २२ ॥

। एद्यवौ परेद्यवि स्यात्परस्मिन्नहनीरितम् ॥२३ ॥

दक्षिणस्यां दिशि वसेद्दक्षिणाद्दक्षिणाद्युभौ ॥२४ ॥

इत्यादि में ‘ इतच् ' प्रत्यय लगाने से तारकित इत्यादि शब्द बनते हैं । कुण्डोघ्नी, पुष्पधन्वा और सुधन्वा में ' अनङ् ’ प्रत्यय लगता है ॥१३ ॥ ' चुञ्चुप् ' प्रत्यय लगाने से वित्तचुञ्चुः, चणप् प्रत्यय लगाने से ' केशचण: ' होता है । ' पटु ' '

शब्द से प्रशस्त अर्थ में ' रूप ' प्रत्यय होने पर ' पटुरूप: ' पद बनता है । अतिशयार्थ द्योतन के लिए ' तमप् ', ' इष्ठन् ', ‘ तरप् ' और ' ईयसुन ' ये दोनों दो में से एक श्रेष्ठता का प्रतिपादन करते हैं और ' तमप् ' तथा ' इष्ठन् ' ये दोनों बहुतों में से एक की श्रेष्ठता बताते हैं । ' ईयस् ' प्रत्यय लगाने से पटीयान्, ' तरप् ' प्रत्यय लगाने से अक्षतर, तरप्, आम् प्रत्यय लगाने से पचतितराम् तथा तमप्, आम् प्रत्यय लगाने से अटतितरा शब्द बनते हैं । ' कल्पप् ' प्रत्यय लगाने से मृदुकल्पः, इन्द्रकल्पः और अर्ककल्पः शब्द बनते हैं । देशीयर् प्रत्यय लगाने से राजदेशीय, देश्य लगाने से देश्य इत्यादि, जातीय लगाने से पटुजातीय:, ‘ मात्रच् ' लगाने से जानुमात्रम्, ' द्वयसच् ' लगाने से ऊरुद्वयसः, दघ्नच् लगाने से उरुदघ्नम् ॥१४-१७ ॥ ‘ तमप् ' लगाने से पञ्चतयः, ' ठक् ' लगाने से दौवारिकः बनते हैं । यहाँ तक सामान्य वृत्तियाँ बता दी गयी हैं । अब अव्यय नामकं तद्धित प्रत्यय का निरूपण किया जाता है । तसिल् प्रत्यय लगाने से यस्मात् का यतः और त्रल् प्रत्यय लगाने से यत्र, तत्र शब्द बनते हैं । अधुना और दानीम् प्रत्यय लगाने से अस्मिन् काले के स्थान पर अधुना और इदानीम् शब्द बनते हैं ॥ १८-१९ ॥ ' दा ' प्रत्यय लगाने से सर्वस्मिन् काले का सर्वदा, हिलि प्रत्यय लगाने से तस्मिन् काले का तर्हि, ह लगाने से अस्मिन् काले का इह, र्हिल् लगाने से कस्मिन् काले का कर्हि शब्द बनते हैं । थाल् प्रत्यय लगाने से यथा, थम् लगाने से कथम्, पूर्वस्यां दिशि इस विग्रह में पूर्व शब्द से पुरः, पुरस्तात्, समाने अहनि इस अर्थ में सद्यः, पूर्वाब्दे इस अर्थ में परुत् और पूर्वतरे वर्षे इस अर्थ में पसरि प्रयोग होते हैं ॥२०-२२ ॥ समसण् प्रत्यय लगाने से ' अस्मिन् संवत्सरे ' का ऐषमः, एद्यवि प्रत्यय लगाने से ' परस्मिन्नहनि ' अर्थ में परेद्यवि और द्ये तथा द्युस् प्रत्यय लगाने से अस्मिन्नहनि इस अर्थ में अद्य और पूर्वस्मिन् दिने इस अर्थ में पूर्वेद्युः शब्द बनते हैं । ‘ दक्षिणस्याम् दिशि वसेत् ' अर्थ में दक्षिणात् और दक्षिणाहि दोनों रूप होते हैं । इसी प्रकार उत्तरस्यां दिशि वसेत् अर्थ १ क. ङ. ' धन्वा सुधन्विनि । चुञ्चु । ख. ग. ' धन्वाअथड्यपि । चुञ्चु । २ ख. क्वेति । ३ क. ङ. वसेत्प्रत्ययेतत्रचेरितम् । उ । ख. वसेत्प्रत्ययेतस्वधीरितम् । उ ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1104

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११०० अग्निपुराणम् उत्तरस्यां दिशि वसेदुत्तरादुत्तराद्युभौ । उपरि वसेदुपरिष्टाद्भवेद्रिष्टाति ऊर्ध्वकात् ॥ २५ ॥

उत्तरेण च पित्रोक्तमाचि च स्याच्च दक्षिणा । आहौ दक्षिणाहि वसेद्विप्रकारं द्विधा च धा ॥ २६ ॥

ध्यमुञि चैकध्यं कुरु त्वं द्वैधं धमुञि चेदृशम् । द्वौ प्रकारौ द्विधा धाचि आसुसुरतरं यथा ॥ २७ ॥

निपातास्तद्धिताः प्रोक्तास्तद्धितो भाववाचकः । पटोर्भावः पटुत्वं त्वे पटुता तलि चेरितम् ॥ २८ ॥

प्रथिमा चेमनि पृथोः सौख्यं सुखात्ष्यञीरितम् । स्तेयं याति च स्तेनस्य ये सख्युः सख्यमीरितम् ॥ २ ९ ॥ कपेर्भावश्च कापेयं सैन्यं पथ्यं यकीरितम् । आश्वं कौमारकं चाणि रूपं चाणि च यौवनम् ॥ आचार्यकं कनि प्रोक्तमेवमन्येऽपि तद्धिताः 113011 इत्यादिमहापुराण आग्नेये तद्धितरूपकथनं नाम षट्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५६ ॥

में उत्तरात् रूप होता है । उपरिवसेत् अर्थ में उपरिष्टाद् तथा ऊर्ध्व शब्द से रिष्टातिल् प्रत्यय होता है ॥ २३-२५ ॥ उत्तर शब्द से एनप् प्रत्यय लगने पर ' उत्तरेण ' और दक्षिणा शब्द आच् प्रत्यय से होता है । दक्षिणा में आहि प्रत्यय लगाने से दक्षणाहि शब्द बनता है । धा प्रत्यय लगाने से द्विधा शब्द बनता है जिसका अर्थ है दो प्रकार || २६ || ध्यमुञ् प्रत्यय लगाने से ऐकध्यम् तथा धमुञ् प्रत्यय लगाने से द्वैध और धाच् प्रत्यय लगाने से द्विधा शब्द बनते हैं । इन सबका अर्थ होता है दो प्रकार । निपातों को भी तद्धित कहा गया प्रत्यय लगाने से पटुत्वम् और तल् प्रत्यय लगाने से पटुता में ष्यञ् प्रत्यय लगाने से सौख्यम् शब्द बनते हैं । स्तेन में से सख्य शब्द बनते हैं ॥ २७-२९ ॥ ढक् प्रत्यय लगाने से ष्यञ् करने से सैन्यम् और यत् करने से पथ्यम् रूप होते हैं भाववाचक संज्ञाएँ बनती हैं । आचार्य में कन् प्रत्यय लगाने भी होते हैं || ३० || श्री अग्निमहापुराण में तद्धितरूप कथन नामक है । ये तद्धित भाववाचक होते हैं जैसे- पटोर्भावः में त्व शब्द बनते हैं । पृथु में इमन् प्रत्यय लगाने से प्रथिमा सुख य प्रत्यय लगाने से स्तेय और सखि में य प्रत्यय लगाने भी भाववाचक संज्ञाएँ होती हैं जैसे- कपेर्भावः कापेयम्, । अण् प्रत्यय लगाने से आश्वम्, कौमारकं और यौवनम् से आचार्यकम् बनता है । इसी प्रकार अन्य तद्धित प्रत्यय तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय समाप्त ॥३५६ ॥

१ ‘ उपरि ऊर्ध्वकात् ' इत्यत्र “ आलोद्यपरिवामेषु प्रविष्टाद्वसतेरपि " इति दृश्यते क. ङ. पुस्तकयोः । २ वावि आमुमुक्षुतरा तथा । ख. ' धा वारि अयुयुष्टतरास्तथा । क. ख. ' धा CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1105

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सप्तपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११०१ अथ सप्तपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः उणादिसिद्धरूपम् कुमार उवाच उणादयोऽभिधास्यन्ते प्रत्यया धातुतः परे गोमायुरायुर्वेदेषु बहुलं स्युरुणादयः । कृकवाकुः कुक्कुटः ` स्याद्गुरुर्भर्ता मनुस्तथा स्वरुर्वज्रं त्रपुः सीसमसारं फल्गुरीरितम् । इलचि सलिलं वारि कल्याणं भण्डिलं स्मृतम् । ओतुर्विडालश्च तुनि अभिधानादुगादयः । * अनड्वान्वहतेर्हिनिः स्याज्जातौ जीवार्णवौषधम् । करण्डो भाजनं भाण्डं सरण्डश्च चतुष्पदः । स्फारं प्रभूतं स्यान्नप्तप्रत्यये चीरवल्कलम् ॥ उणि कारुश्च ' शिल्पी स्याज्जायुर्मायुश्च पित्तकम् ॥१ ॥

आयुः स्वादुश्च हेत्वाद्याः किंशारुर्धान्यशूककः ॥२ ॥

। शयुश्चाजगरो ज्ञेयः सरुरायुधमुच्यते ॥३ ॥

गृध्रश्च क्रनि किरचि मन्दिरं तिमिरं तमः ॥४ ॥

बुधो विद्वान्क्वसौ स्याच्च शिविरं गुप्तसंस्थितिः ॥५ ॥

कर्ण: कामी च गृहभूर्वास्तु जैवातृकः स्मृतः ॥ ६ ॥

नौ वह्निरिननि हरिणो मृगः कामी च भाजनम् ॥७ ॥

तरुरेरण्डः संघातो वरण्डः साम निर्भरम् ॥८ ॥

कातरो भीरुरुग्रस्तु प्रचण्डो यावसं तृणम् ॥९ ॥

अध्याय ३५७ उणादिसिद्धरूप कुमार बोले- धातु के बाद अब उणादि प्रत्ययों का वर्णन किया जा रहा है । उण् प्रत्यय लगाने से कारुः, शिल्पी, जायुः, मायुः, गोमायुः, आयुर्वेद, आयुः, स्वादुः, हेतु:, किंशारु, धान्यशूकक, कृकवाकु, कुक्कुट, गुरु, भर्ता, मनु, शयु, अजगर, सरु, आयुध, स्वरु, वज्र, त्रपु और फल्गु । क्रन् प्रत्यय लगने पर गृध्र बनता है । किरच् प्रत्यय से मन्दिर, तिमिर ( अन्धकार ) शब्द बनते हैं । इलच् प्रत्यय से सलिल ( जल ) और कल्याण अर्थवाले भण्डिल शब्द की निष्पत्ति होती है । क्वसु प्रत्यय से बुध अर्थवाला विद्वान् और किरच् से शिविर शब्द बनते हैं । तुन् प्रत्यय से ओतु ( विडाल ) और कृ धातु से न प्रत्यय होने पर कर्ण, कम् धातु से णिङ् प्रत्यय करने पर कामी, वस् धातु के तुन् करने पर वास्तु, जिसका अर्थ है गृहभूमि और जीव् धातु से आतृकन् करने पर जैवातृक शब्द बनते हैं ॥ १-६ ॥ वह धातु से अनड्वान् शब्द बनता है । जीव् धातु से आतु प्रत्यय करने पर जीवातु होता है, जिसका अर्थ है अर्णव औषध । वह धातु से नि प्रत्यय से वह्नि, हृ धातु से इनन् प्रत्यय से हरिण बनता है, जिसका अर्थ है मृग, कामी और भाजन । कृ धातु से अण्डन् प्रत्यय करने पर करण्डः बनता है, जो भाजन और भाण्ड का वाचक है । सृ धातु से अण्डन् करने पर सरण्ड: होता है, जो चौपाये का वाचक है । इर् धातु से अण्डन् प्रत्यय करने पर एरण्ड शब्द बनता है, जो वृक्ष का वाचक है । वृ धातु से अण्डन् करने पर वरण्ड बनता है, जो सामवेद का वाचक है । स्फाय् धातु से रक् प्रत्यय करने पर प्रभूतवाची स्फार, चि से क्रन् करने पर वल्कलवाची चीर, भी से क्रुकन् करने पर डरपोकवाची भीरुक, १ क. ङ. श्रेणी । २ ख. ग. स्यात्तरुर्भ । ३ क. ङ. ' नाद्द्वादशाद ' । ४ क. ङ. ' ड्वानत्र तु स्तौ स्यादाप्तौ जीवन्तिरौष । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1106

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११०२ अग्निपुराणम् जगच्चैव तु भूर्लोको ( कः ) कृशानुर्ज्योतिरर्ककः । वर्वरः कुटिलो धूर्तश्चत्वरं च चतुष्पथम् ॥ १० ॥

चीवरं भिक्षुप्रावृत्तिरादित्यो मित्र ईरितः । ( ' पुत्रः सूनुः पिता तातः पृदाकुर्व्याघ्रवृश्चिके ॥ ११ ॥

गर्तोऽवटोऽथ भरतो नटोऽपरेऽप्युणादयः ॥१२ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये उणादिसिद्धरूपकथनं नाम सप्तपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५७ ॥

अथाष्टपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः तिविभक्तिसिद्धरूपम् कुमार उवाच तिविभक्तिं प्रवक्ष्यामि तथाऽऽदेशं समासतः । तिस्त्रिष्वपि वर्तन्ते भावे कर्मणि कर्तरि ॥१ ॥

सकर्मकाकर्मकाच्च कर्तरि द्विपदे स्मृताः । सकर्मकाकर्मणि च तदादेशस्तथेरितः ॥२ ॥

वर्तमाने लडाख्यातो विध्याद्यर्थे लिङ्गीरितः ) । विध्यादौ लोडाशिषि च भूतानद्यतने च लङ् । ३ ॥ भूते लुङ् लिट् ' परोक्षेऽथ भाविन्यद्यतने च लुट् । लिङाशिषि च शेषेऽर्थे ऌड्भविष्यति लृङ्भवेत् ॥४ ॥

उच् से रन् करने पर उग्र, यु से असच् करने पर तृणवाची यावस, गम् से अत् करने पर भूलोकवाची जगत्, कृश् से आनुक् करने पर अग्निवाची कृशानु, अर्च् से क करने पर सूर्यवाची अर्क, वृ से ष्वरच् करने पर कुटिलवाची वर्वर, धूर्व् से तन् करने पर धूर्त, चत् से ष्वरच् करने पर चौराहावाची चत्वर, चि से ष्वरच् करने पर भिक्षुवस्त्रवाची चीवर, मिद् से क्त्र करने पर सूर्यवाची मित्र, पू से क्त्र करने पर पुत्र, सू से नु करने पर सूनु, पा से तृच् करने पर पिता, तन् से तन् करने पर गड्ढावाची गर्त और भृ से इनके अतिरिक्त भी ( बहुत श्री अग्निमहापुराण कुमार बोले - -अब अ तात, पर्द से काकु करने पर व्याघ्र और वृश्चिक अर्थवाची पृदाकु, गृ से तन् करने पर

अतच् करने पर नट अर्थवाची भरत शब्द की निष्पत्ति होती है । ये उणादिसिद्ध रूप हैं ।

से ) उणादि प्रत्यय होते हैं ॥७-१२ ॥

में उणादिसिद्धरूप कथन नामक तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय समाप्त ॥३५७ ॥

अध्याय ३५८ तिविभक्तिसिद्धरूप मैं संक्षेप से तिङ् विभक्ति तथा आदेश के सम्बन्ध में बतलाऊँगा । भाव, कर्म और कर्तृ तीनों में तिङ् प्रत्यय रहते हैं । कर्तृ में सकर्मक और अकर्मक से दो पद कहे गये हैं । उसका आदेश सकर्मक और अकर्मक कहे गये हैं । वर्तमान में लट् लकार, विधि आदि में लिङ् लकार, आशीर्वाद में लोट्, अनद्यतन भूत में लङ् लकार, ( सामान्य ) भूत में लुङ, परोक्ष में लिट्, अनद्यतन भावी में लुट्, आशी तथा शेष अर्थ में लिङ्, भविष्यत् में ऌट् और ऌङ्, निमित्त में लिङ् और क्रियातिपत्ति में तङ् प्रत्यय होते हैं । यह आत्मनेपद है इसमें से पहले के १ ‘ “ पुत्रः ” “ लिङीरितः ” ख. ग. पुस्तकयोर्नास्ति । २ " सकर्मका कर्तृकाच्च कर्तरि द्विपदे स्मृतः क. ङ. पुस्तकयोः । " इत्यधिकं CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1107

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अष्टपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११०३ लिङ्गनिमित्ते क्रियातिपत्तौ तङानावात्मनेपदम् । सिप् थस् थ मध्यमनरो मिप्वस्मश्चोत्तमः पुमान् । " उत्तम इ वहि महि भूवाद्या धातवः स्मृताः । " शीङि: क्रीडोजु ( डिर्जु ) होतिश्च जहातिश्चदधात्यपि । तुदिर्मृशतिर्मुञ्चती रुधिर्भुजित्यजितनिः । क्रीडतिर्वृङ् ग्रहिश्चोरिः पा नीरर्चिश्च नायकाः । भवसि त्वं युवां भवथो यूयं भवथ चाप्यहम् द्वे तथैन्ते एधसे त्वं हि मेधया । एधामहे हरेर्भक्त्या पचतीत्यादि पूर्ववत् । बुभूषति सनीत्येवं " णिचि भावयतीश्वरम् । पुत्रीयति पुत्रकाम्यत्येवं पटपटायते । भवेद्भवेतां च लिङि भवेयुश्चः भवेः परे ।

एधेत् ( च ) एधेयातामेधेरन्मनसा श्रिया ।

पूर्वं नव परस्मैपदं तिप्तसन्तीति प्रथमः पुमान् ॥ ५ ॥

त'आतामन्ताऽऽत्मने मुख्यस्थासाथां ध्वं च मध्यमः ॥६ ॥

भुविरेधिः पचिर्नन्दिर्ध्वंसिः श्रंसिः पदिस्त्वदिः ॥७ ॥

दीव्यतिः स्वपितिर्नहिः सुनोतिर्वसिरेव च ॥८ ॥

शवादिके विकरणे मनिश्चैव करोत्यपि ॥ ९ ॥

' भुवि स्यात्तिङ् भवति स भवतस्तौ भवन्ति ते ॥१० ॥

। भवाम्यावां भवावश्च भवामो ह्येधते कुलम् ॥११ ॥

एधेथे च समेधध्वे एधे ह्येधावहे धिया ॥१२ ॥

भूयतेऽनुभूयतेऽसौ भावे कर्मणि वै यकि ॥१३ ॥

यङि बोभूयते वाद्यं बोभोति स्याच्च यङ्लुकि ॥१४ ॥

घटयत्यथ सनि णिचि बुभूषयति रूपकम् ॥ १५ ॥

भवेतं च भवेतैवं भवेयं च ' भवेव च भवेमच (? ) ॥१६ ॥

एधेथाश्च एधेयाथामेधेध्वमेधेय एधेवहि एधेमहि ॥१७ ॥

नौ परस्मैपद हैं, जिसके प्रथम पुरुष के तीनों वचनों में क्रमशः ये प्रत्यय होते हैं - तिप्, तस्, अन्ति, मध्यम पुरुष में सिप्, थस्, थ, उत्तम पुरुष में मिप्, वस् और मस् प्रत्यय होते हैं । आत्मनेपद के प्रत्यय इस प्रकार हैं- प्रथम पुरुष - ते, आताम्, अन्त, मध्यम पुरुष में थ, आसाथाम्, ध्वम्, उत्तम पुरुष में इ, वहि, महि, भूव आदि धातुएँ कहीं गयी हैं । इसके अतिरिक्त ये भी धातुएँ होती हैं - एधि, पचि, नन्दि, ध्वंसि, शंसि, पदि, त्वदि ॥१-७ ॥ शी, क्रीड्, हु, हा, धा, दिव्, स्वप्, नह्, सू, वस्, तुद्, मृश्, मृञ्च्, रुध्, भुज्, त्यज्, तन्, वृ, ग्रह, चुर्, पा, नी और अर्च् आदि धातुओं में शप् आदि विकरण लगते हैं । भू में तिङ् आदि प्रत्यय लगाने से इस प्रकार रूप बनते हैं - सः भवति, तौ भवतः, ते भवन्ति । त्वम् भवसि, युवाम् भवथः, यूयं भवथ । अहं भवामि, आवाम् भवावः, वयम् भवामः । कुलं एधते, द्वे एधेते, ते एधन्ते । त्वम मेधया एधसे, युवाम् मेधया एधेथे, यूथम् मेधया एधध्वे, अहं धिया एधे, आवां धिया एधावहे, वयं धिया एधामहे । इसी प्रकार हरेः भक्त्या पचति इत्यादि रूप पूर्ववत् बनते हैं । भाव और कर्म में यक् प्रत्यय लगाकर भूयते अथवा अनुभूयते रूप बनते हैं ॥८-१३ ॥ सन् प्रत्यय से बुभूषति, णिच् से भावयति, यङ् से बोभूयते और यङ्लुक् से बोभोति, नामधातु से पुत्रीयति, पुत्रकाम्यति, पटपटायते, णिच् से घटयति और सन्- णिच् से बुभूषयति रूप बनते हैं । लिङ् लकार के प्रथम पुरुष में भवेत्, भवेताम्, भवेयुः, मध्यम पुरुष में भवेः, भवेतम्, भवेत और उत्तम पुरुष में भवेयम्, भवेव, भवेम रूप होते हैं ॥१४-१६ ॥ इसी प्रकार एध् धातु के लिङ् लकार में इस प्रकार रूप बनते हैं - प्रथम पुरुष, मनसा श्रिया एधेत, मनसा श्रिया एधेयाताम्, मनसा श्रिया एधेरन् । मध्यम पुरुष, एधेथाः, एधेयाथाम् एधेध्वम् । उत्तम पुरुष, एधेय, एधेवहि, एधेमहि । १ ख. ग. ' क्षेऽर्थे भा ' । २ ख. ग. प्तस्झीति । ३ ख. ग. आतांझाऽऽत्म । ४ क. ख. ङ. ' म इड्वहिमहिङ् भू ° । ५ ख. शीङ्कुङौ जु ' । ६ ख. लटि । ७ ख. ग. चि तारय । ८ क. ङ. भवेम । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1108

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११०४ अग्निपुराणम् अस्तु तावद्भवतां लोटि भवन्तु भवताद्भव एधतामेधेतामेधन्तामेधै पचावहै पचामहै अभवतमभवतापचमपचावापचाम च अभूदभूतामभूवन्नभूश्चाभूवमेव लुङ् लिटि बभूव बभूवतुर्बभूवुश्च बभूविथ पेचे पेचाते पेचिरे त्वमेधांचकृषे तथा लुटि भविता भवितारौ भवितारो हरादयः पक्ता पक्तारौ पक्तारः पक्तासि त्वं शुभौदनम् लिङाशिषि सुखं भूयाद्भूयास्तां हरिशंकरौ भूयास्त यूयं भूयासमहं भूयास्म सर्वदा यक्षीवह्येधिषीमहि लिङि चायक्ष्यतेति लृङ् अयक्ष्यध्वमैधिष्यावह्यैधिष्यामह्यरेर्वयम् एवं विभावयिष्यन्ति बोभविष्यति रूपकम् । भवतं भवत भवानि भवाव च भवाम च ॥ १८ ॥

। अभ्यनन्ददपचतामपचन्नपचस्तथा ॥१९ ॥

। एधेतैधेतामैधध्वमैधे । ऐधिष्टैधिषातां नरौ ( रा । बभूवथुर्बभूय च । एधांचक्राथे पेचिध्वे । भवितासि भवितास्थो । पक्ताध्वे पक्ताहे चाहं । भूयासुस्ते च भूयास्त्वं । यक्षीष्ट ह्येधिषीयास्तां चैधामहीरितम् ॥२० ॥

) वैधिष्ठा ऐधिषीदृषम् ॥ २१ ॥

बभूविव बभूविम ॥ २२ ॥

पेचे पेचिमहे तथा ॥ २३ ॥

भवितास्मस्तथा वयम् ॥२४ ॥

पक्तास्महे हरेश्चरुम् ॥ २५ ॥

युवां भूयास्तमीश्वरौ ॥ २६ ॥

यक्षीरन्नेधिषीय च ॥ २७ ॥

। अयक्ष्येतामयक्ष्यन्तायक्ष्येऽयक्ष्येथां युवाम् ॥२८ ॥

। लुटि स्याद्भविष्यतीति ऐधिष्यामह ईदृशम् ॥ २ ९ ॥ । घटयेत्पटयेत्तद्वत्पुत्रीयति च काम्यति ॥ ३० ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये तिविभक्तिसिद्धरूपकथनं नामाष्टपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३५८ ॥

लोट् लकार में भू धातु के रूप इस प्रकार होते हैं- प्रथम पुरुष - ( अस्तु ) भवतु, भवताम् भवन्तु । मध्यम पुरुष– भव, भवताद्, भवतम्, भवत । उत्तम पुरुष - भवानि, भवाव, भवाम ॥१७-१८ ॥ एध् धातु के लोट् लकार में रूप इस प्रकार चलते हैं - प्रथम पुरुष - एधताम्, एधेताम्, एधन्ताम् । एधै, पचावहै, पचामहै, अभ्यनन्दत्, अपचताम्, अपचन्, अपचः, अभवतम्, अभवत, अपचम्, अपचाव, अपचाम, एधेत, एधेताम्, एधध्वम्, एधे और एधामहि रूप भी विभिन्न धातुओं के विभिन्न लकारों में कहे गये हैं । भू धातु के लुङ् लकार में रूप इस प्रकार चलते हैं - अभूत्, अभूताम्, अभूवन्, अभूः, अभूवम्, एध् धातु के लुङ् लकार में ऐधिष्ट, ऐधिषाताम्, ऐधिष्ठाः, ऐधिषि । भू धातु के लिट् लकार के रूप हैं - बभूव, बभूवतुः, बभूवुः, बभूविथ, बभूवथुः, बभूव, बभूविव, बभूविम, पच् के लिट् में पेचे, पेचाते, पेचिरे, एध् के लिट् में एधांचकृषे, एधांचक्राथे, पच् के पेचिध्वे, पेचे, पेचिमहे ॥१९ -२३ ॥ लुट् लकार के रूप हैं-भविता, भवितारौ, भवितारः, भवितासि, भवितास्थः, वयं भवितास्मः, शुभौदनम् पक्ता, पक्तारौ, पक्तारः, पक्तासि, पक्ताध्वे, पक्ताहे, पक्तास्महे । आशीर्लिङ् में इस प्रकार रूप होते हैं - सुखं भूयात्, हरिशंकरौ भूयास्ताम् भूयासुः, भूयाः, भूयास्तम्, भूयास्त, भूयासम्, भूयास्म । यज् और एध् के लिङ् में यक्षीष्ट, एधिषीयास्ताम्, यक्षीरन्, एधिषीय, यक्षीवहि, ऐधिषीमहि । ऌङ् लकार में अयक्ष्यत, अयक्ष्येताम्, अयक्ष्यन्त, अयक्ष्ये, अयक्ष्येथाम्, अयक्ष्यध्वम्, ऐधिष्यावहि, ऐधिष्यामहि । भू और एध् के ऌट् लकार के रूप हैं - भविष्यति, एधिष्यामहे, भू से णिच् करने पर ऌट् में विभावयिष्यन्ति सन् करने पर ऌट् में बोभविष्यति, घट् णिच् लिङ् में घटयेत्, पट् णिच् लिङ् में पटयेत् । पुत्र शब्द से नामधातु में क्यच् करने पर पुत्रीयति और काम्यच् करने पर पुत्रकाम्यति रूप होते हैं ॥२४-३० ॥ श्री अग्निमहापुराण में तिविभक्तिसिद्धरूप कथन नामक तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय समाप्त ॥३५८ ॥

१ छ. नरा । २ ख. ग. ध्वे एधतामेधेय पचावहै पचामहै । लु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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एकोनषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११०५ अथैकोनषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः कृत्सिद्धरूपम् कुमार उवाच कृतस्त्रिष्वपि विज्ञेया भावे कर्मणि कर्तरि । अचि धर्मस्य विनय उत्करः प्रकरस्तथा । क्तिनि वृद्धिः स्तुतिमती घञि भावोऽथ युच्यपि । तथा तव्यो ह्यनीयश्च कर्त्तव्यं करणीयकम् । कर्तरि क्तादयो ज्ञेया भावे कर्मणि च क्वचित् । शतृशानचौ ( च ) भवेन्नेधमानो भवन्त्यपि । क्विवन्तश्च स्वयंभूश्च भूते लिटः ' क्वसुकान् च । अणि स्युः तुम्भकाराद्या भूतेऽप्युणादयः स्मृताः । इत्यादिमहापुराण आग्नेये कृत्सिद्धरूपकथनं अज् ल्युट् क्तिन् घञो भावे ( च ) ' युजकारत'एवच ॥१ ॥

देवो भद्रः श्रीकरश्च ल्युटि रूपं तु शोभनम् ॥२ ॥

कारणा भावनेत्यादि अकारे च चिकित्सया ॥ ३ ॥

देयं ध्येयं चैव यति ण्यति कार्यं च कृत्यकाः ॥४ ॥

गतो ग्रामं गतो ग्राम आश्लिष्टश्च गुरुस्त्वया ॥५ ॥

ण्वल्तृचौ सर्वधातुभ्यो भावको भविता तथा ॥ ६ ॥

बभूविवान्पेचिवांश्च पेचानः श्रद्दधानकः ॥७ ॥

वायुः पायुश्च कारुः स्याद्बहुलं छन्दसीरितम् ॥८ ॥

नामैकोनषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५ ९ ॥ अध्याय ३५ ९ कृत्सिद्धरूप कुमार बोले- भाव, कर्म और कर्तृ इन तीनों में कृत् प्रत्यय होते हैं । अच्, ल्युट्, क्तिन्, घञ्, युच् और अकार प्रत्यय भाववाचक शब्दों में लगते हैं । अच् प्रत्यय लगने से विनयः, अप् प्रत्यय लगने से उत्करः तथा प्रकरः, अच् प्रत्यय से देवः तथा भद्रः और अप् लगने से श्रीकरः शब्द बनते हैं । ल्युट् प्रत्यय में रूप बनता है ' शोभनम् ' ॥१-२ ॥ ‘ क्तिन् ' प्रत्यय से वृद्धि, स्तुति और मति, घञ् से भाव:, युच् के कारणा, भावना इत्यादि और अकार से चिकित्सा इत्यादि शब्द बनते हैं । तव्यत् और अनीयर् प्रत्यय लगाने से क्रमशः कर्तव्यम् और करणीयम् शब्द बनते हैं । यत् प्रत्यय से देयम् और ध्येयम् । ण्यत् से कार्यम् । यहाँ तक कृत्यसंज्ञक प्रत्यय कहे गये हैं ॥ ३-४ ॥ ' क्त ' प्रत्यय कर्ता, भाव और कर्म में भी होता है । जैसे - गतोग्रामम्, गतोग्रामः, त्वया गुरुः आश्लिष्टः । शतृ और शानच् प्रत्यय लगाने से भवन् और एधमानः तथा भवन्ती शब्द भी बनते हैं । ण्वुल् और तृच् प्रत्यय सभी धातुओं के साथ लगते हैं, जैसे-भावकः और भविता । स्वयंभूः शब्द क्विप् प्रत्ययान्त है । भूतकाल में लिट् लकार के स्थान पर क्वसु और कानच् प्रत्यय लगाने से बभूविवान्, पेचिवान्, पेचानः, श्रद्दधानकः शब्द बनते हैं । कुम्भकार इत्यादि में अण् प्रत्यय होता है । उणादि प्रत्यय भूत अर्थ में होते हैं । उण् प्रत्यय लगने से वायुः, पायुः और कारुः आदि शब्द बनते हैं । वेद में ये प्रत्यय बहुल प्रकार से ( अनियमित रूप से ) होते हैं ॥५-८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में कृत्सिद्धरूप कथन नामक तीन सौ उनसठवाँ अध्याय समाप्त ॥३५९ ॥

१ क. ङ. ' कारानए ' । २ ख. ग. रउ ए । ३ क. ख. ग. ' सुर्भवेत् । ब ' । ७० CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1110

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११०६ अग्निपुराणम् अथ षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः स्वर्गपातालादिवर्गाः अग्निरुवाच स्वर्गादिनामलिङ्गो यो हरिस्तं प्रवदामि ते । स्वः स्वर्गनाकत्रिदिवा द्यौदिवौ द्वे त्रिविष्टपम् ॥ १ ॥

देवा वृन्दारका लेखा रुद्राद्या गणदेवताः । विद्याधरा ( रो ) प्सरोयक्षरक्षोगन्धर्वकिन्नराः ॥ २ ॥

पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः । देवद्विषोऽसुरा दैत्याः सुगतः स्यात्तथागतः ॥ ३ ॥

ब्रह्माऽऽत्मभूः सुरज्येष्ठो विष्णुर्नारायणो हरिः 1 । रेवतीशो हली रामः कामः पञ्चशरः स्मृतः ॥४ ॥

लक्ष्मीः पद्मालया पद्मा स ( श ) र्वः सर्वेश्वरः शिवः । कपर्दोऽस्य जटाजूटः पिनाकोऽजगवं धनुः ॥ ५ ॥

प्रमथाः स्युः पारिषदा मृडानी चण्डिकाऽम्बिका । द्वैमातुरो गजास्यश्च सेनानीरग्निभूर्गुहः ॥६ ॥

' आखण्डलः शुनासीरः सुत्रामा च दिवस्पतिः । पुलोमजा शचीन्द्राणी देवी तस्य तु वल्लभा ॥७ ॥

स्यात्प्रासादो वैजयन्तो जयन्तः पाकशासनिः । ऐरावतोऽभ्रमातङ्गैरावणाभ्रमुवल्लभाः ॥८ ॥

ह्रादिनी वज्रमस्त्री स्यात्कुलिशं भिदुरं पविः । व्योमयानं विमानोऽस्त्री पीयूषममृतं सुधा ॥९ ॥

अध्याय ३६० स्वर्गपातालादि वर्ग अग्निदेव बोले - अब मैं स्वर्गादि नामों के पर्यायों को बतला रहा हूँ । स्वर्ग के पर्यायवाची स्वः, नाक, त्रिदिव, द्योः, दिव और त्रिविष्टप । देव शब्द के पर्याय हैं - वृन्दारक और लेख । रुद्र इत्यादि गण देवता हैं । देवयोनियाँ हैं-विद्याधर, अप्सरस्, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, किन्नर, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध और भूत । देवताओं के शत्रु हैं - असुर,, दैत्य | सुगत और तथागत - ये बुद्ध के नाम हैं । आत्मभू और सुरज्येष्ठ ब्रह्मा के नाम हैं । विष्णु, नारायण और हरि विष्णु के नाम हैं । रेवतीश, हली और राम बलराम के नाम हैं । कामदेव के पर्याय हैं - पञ्चशर और स्मर ॥१-४ ॥ लक्ष्मी, पद्मालया और पद्मा - ये लक्ष्मी जी के तथा शर्व, सर्वेश्वर और शिव - ये भगवान् शंकर के नाम हैं । उनकी बँधी हुई जटा के दो नाम हैं - कपर्द और जटाजूट । उनके धनुष के भी दो नाम हैं - पिनाक और अजगव । शिव जी के पार्षद प्रमथ कहलाते हैं । मृडानी, चण्डिका और अम्बिका - ये पार्वती जी के, द्वैमातुर और गजास्य ( गजानन ) -ये गणेश जी के तथा सेनानी, अग्निभू और गुह - ये स्वामी कार्तिकेय जी के नाम हैं । आखण्डल, शुनासीर, सुत्रामा और दिवस्पति - ये इन्द्र के तथा पुलोमजा, शची और इन्द्राणी - ये उनकी प्रियतमा शची देवी के नाम हैं ॥५-७ ॥ उनके प्रासाद को वैजयन्त कहते हैं । इन्द्रपुत्र का नाम है जयन्त । उनके हाथी के पर्याय हैं - ऐरावत, अभ्रमातङ्ग, ऐरावण और अभ्रभुवल्लभ । उनके आयुध के पर्याय हैं - हादिनी, वज्र, कुलिश, भिदुर और पवि । उनके वाहन को व्योमयान और विमान कहा जाता है । अमृत के पर्याय हैं - पीयूष, अमृत और सुधा । देवसभा को सुधर्मा कहते हैं । आकाश-१ ख. ग. ' ण्डलशुनासीरसुत्रामाणो दि । २ क. ख. ग. ' वी हस्तिस्य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA