अग्नि पुराण — पृष्ठ 1131–1140

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1131–1140

पृष्ठ 1131

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त्रिषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११२७ ' आस्फोता गिरिकर्णी स्यात्सिंहास्यो वासको वृषः । मिशी मधुरिका छत्रा कोकिलाक्षेक्षुरक्षुरा ॥५१ ॥

विडङ्गोऽस्त्री कृमिघ्नः स्याद्वज्रदुः स्नुक्स्नुही सुधा । मृद्वीका गोस्तनी द्राक्षा बला वाट्यालकस्तथा ॥५२ ॥

काला मसूरविदला त्रिपुटा त्रिवृता त्रिवृत् । मधुकं क्लीतकं यष्टिमधुका मधुयष्टिका || ५३ ॥ विदारी क्षीरशुक्लेक्षुगन्धा क्रोष्ट्री च या सिता 1 । गोपी श्यामा शारिवा स्यादनन्तोत्पलशारिवा ॥५४ ॥

मोचा रम्भा च कदली भण्टाकी ' दुष्प्रधर्षिणी । स्थिरा ध्रुवा ' सालपर्णी शृङ्गी तु वृषभो वृषः ॥ ५५ ॥

गाङ्गेरुकी ' नागबला मुषली तालमूलिका । ज्यो ( ज्यौ ) त्स्नी पटोलिका जाली अजशृङ्गी विषाणिका ॥५६ ॥

स्याल्लाङ्गलिक्यग्निशिखा ताम्बूली ' नागवल्ल्यपि । हरेणू रेणुकः कौन्ती ' हीबेरी दिव्यनागरम् ॥५७ ॥

कालानुसार्यवृद्धाश्मपुष्पशीतशिवानि तु । शैलेयं तालपर्णी तु दैत्या गन्धकु ( पु ) टी मुरा ॥५८ ॥

ग्रन्थिपर्णं शुकं बर्हि बला तु त्रिपटा त्रुटि: । शिवा तामलकी चाथ हनुर्हट्टविलासिनी ॥५९ ॥

कुटं नटं द ( दा ) शपुरं वानेयं परिपेलवम् । तपस्विनी जटामांसी पृक्का देवी लता लशूः " ॥६० ॥

गोलोमी और शतपर्विका खुरासानी बच के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । आस्फोता और गिरिकर्णी, विष्णुक्रान्ता के अर्थ में, सिंहास्य, वासक और वृष रुसा के अर्थ में, मिशी, मधुरिका और छत्रा सौंफ के अर्थ में, कोकिलाक्ष, इक्षुर और क्षुर तालमखाना के अर्थ में, विडङ्ग और कृमिघ्न वायविडङ्ग के अर्थ में, मृद्वीका, गोस्तनी और द्राक्षा किशमिश ( छोहारा ) के अर्थ में, बला और वाट्यालक बरियारा के अर्थ में, काला और मसूरविदला कालानिसोत के अर्थ में, त्रिपुटा और त्रिवृता त्रिवृत् निसोत के अर्थ में, मधुक, क्लीतक, यष्टिमधुका और मधुयष्टिक मुलेठी के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥४८-५३ ॥ विदारी, क्षीरशुक्ला, इक्षुगन्धा और क्रोष्ट्री भूमि में होनेवाले सफेद कुम्हड़े के अर्थ में, गोपी, श्यामा, शारिवा, अनन्त और उत्पल शारिवा प्रियंगुलता के अर्थ में, मोचा, रम्भा और कदली केला के अर्थ में, भण्टाकी और दुष्प्रधर्षिणी बैगन के अर्थ में, स्थिरा, ध्रुवा, सालपर्णी सरिवन के अर्थ में, शृङ्गी, वृषभ और वृषन काकड़ासिंगी के अर्थ में, गाङ्गेरुकी और नागबला ककड़ी के अर्थ में, मुसली और तालमूलिका मुसली के अर्थ में, ज्यो ( ज्यौ ) त्स्नी पटोलिका और जाली चचेड़ा के अर्थ में, अजशृङ्गी और विषाणिका मेढ़ासिंगी के अर्थ में, लाङ्गलिकी और अग्निशिखा कलिहारी के अर्थ में, ताम्बूली और नागवल्ली पान के अर्थ में, हरेणू, रेणुका और कौन्ती गगनधूरि के अर्थ में, हीबेरी और दिव्य नागर नेत्रबाला के अर्थ में, कालानुसार्य, वृद्ध अश्मपुष्प और शीतशिव और शिलाजीत के अर्थ में, शैलेय, तालपर्णी, दैत्या, शैलेयथ, गन्धकुटी और मुरा तालीसपत्र के अर्थ में प्रयुक्त होता है ॥ ५४-५८ ॥ ग्रन्थिपर्ण, शुक और बर्हि गठिवन के अर्थ में, त्रिपुटा और त्रुटि छोटी इलायची के अर्थ में, शिवा और तामलकी भूमि आँवले के अर्थ में, हनु और हट्टविलासिनी नखी नामक गन्धद्रव्य के अर्थ में, कुटन्नट, दाशपुर, वानेय और परिपेलव मोथा के अर्थ में, तपस्विनी जटामांसी १ क. ख. ग. ङ. ' स्फोटा गिरिमल्ली स्या ' । २ क. ङ. ' ज्रद्रुस्तु गृहा गुहा । मृ । ख. ग. ' ज्रद्रस्तु खु ' । ३ क. ख. ङ. ' ष्टिकाराख्या कारवी स्मृता । वि । ४ ख. ' धर्षणी । ५ ख. ग. शालपर्णी । ६ क. ङ. ' गवल्ली सुखताला च मूः । 1 ७ ख. ग. गपर्ण्यपि । ८ क. ङ. न्ती हरीवेदोदीष्वबालकम् । ख. ' न्ती क्लीबेरोदीव्यबालकम् । ९ ख. ग. हिरेला । १० क. ख. ङ. वालेयं । ११ ख. ग. लघुः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1132

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११२८ अग्निपुराणम् कर्पूरको द्राविडको गन्धमूली शठी स्मृता तुण्डिकेरी रक्तफला बिम्बिका पीलुपर्ण्यपि सहस्रवेधी चुक्रोऽम्लवेतसः शतवेध्यपि कूर्चशीर्षो मधुकर ( रक ) श्चन्द्रः कपिवृकस्तथा कुनन्दती निकुम्भस्त्रा यमानी वार्षिका तथा वाराही ' वरदा गृष्टिः काकमाची तु वायसी अवाक्पुष्पी कारवी च सरणा तु ' प्रसारणी पटोल: कुलकस्तिक्तः कारवेल्लः कटिल्लकः इक्ष्वाकुः कटुतुम्बी स्याद्विशाला त्विन्द्रवारुणी वंशे त्वक्सारकर्मारवेणुमस्करतेजनाः तृणराजाह्वयस्तालो घोण्टा क्रमुकपूगकौ । स्यादृक्षगन्धा ' छगलान्त्रा वेगी वृद्धदारकः ॥६१ ॥

। चाङ्गेरी चुक्रोऽम्बष्ठा स्वर्णक्षीरी हिमावती ॥ ६२ ॥

1 । जीवन्ती जीवनी जीवा भूमिनिम्बः किरातकः ॥६३ ॥

। दद्रुघ्नः स्यादेडगजो वर्षाभूः शोथहारिणी ॥ ६४ ॥

। लशुनं गृञ्जनारिष्टमहाकन्दरसोनका: ॥ ६५ ॥

। शतपुष्पा सितच्छत्राऽतिच्छत्रा मधुरा मिसि: ॥ ६६ ॥

। ' कटंभरा भद्रबला कर्बूरश्च शटी ह्यथ ॥ ६७ ॥

। कूष्माण्डकस्तु " कर्कारुरिर्वारुः कर्कटी स्त्रियौ ॥ ६८ ॥

। अर्शोघ्नः सूरणः कन्दो मुस्तकः कुरुविन्दकः ॥ ६ ९ ॥ । छत्रातिच्छत्रपालघ्नौ मालातृणक भूस्तृणे ॥ ७० ॥

॥ शार्दूलद्वीपिनौ व्याघ्रे हर्यक्षः ' केशरी हरिः ॥ । ७१ ॥ के अर्थ में, पृक्का, देवी, लता, लशू, असवरग के अर्थ में, कर्चूरक और द्राविड़क कचूर के अर्थ में, गन्धमूली धतूरे के अर्थ में, ऋक्षगन्धा, छगलान्त्रा, वेगी और वृद्धदारक विधारा के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । तुण्डिकेरी, रक्तफला, बिम्बिका और पीलुपर्णी कुंदरू के अर्थ में, चाङ्गेरी, चुक्रिका और अम्बष्ठा अम्लोनिया के अर्थ में, स्वर्णक्षीरी और हिमावती मकोय के अर्थ में, सहस्रवेधी, चुक्र, अम्लवेतस और शतवेधी अमलवेत के अर्थ में, जीवन्ती, जीवनी और जीवा जीवन्ती के अर्थ में, भूमिनिम्ब और किरातक चिरायता के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥ ५ ९ -६३ ॥ कूर्चशीर्ष और मधुरक जीवक के अर्थ में, चन्द्र और कपिवृक कबीला के अर्थ में, दद्रुघ्न और एडगज चकवड़ के अर्थ में, वर्षाभू, शोथहारिणी, कुनन्दती, निकुम्भस्त्रा, यमानी, वार्षिका - लशुन, गृञ्जन, अरिष्ट, महाकन्द और रसोनक लहसुन के अर्थ में, वाराही, वदरा और गृष्टि विलाईकन्द के अर्थ में, काकमाची और वायसी काकजंघा के अर्थ सितच्छत्रा, अतिच्छत्रा, मधुरा और मिसी सौंफ के अर्थ में, अवाक्पुष्पी, कारवी, सरणा और प्रसारिणी में, शतपुष्पा, में, कटझरा और भद्रबला कूबड़ीलता के अर्थ में, कर्पूर और शटी आमाहल्दी के अर्थ लता के अर्थ परवल के अर्थ में, कारवेल्ल और कटिल्लक करेला में, पटोल और कुलक तिक्त और कर्कटी के अर्थ में, कूष्माण्डक और कर्कारु कुम्हड़े के अर्थ में, उर्वारुक ककड़ी के अर्थ में, इक्ष्वाकु और कटुतुम्बी कड़वी लौकी के अर्थ में, विशाला और इन्द्रवारुणी इन्द्रायनि के अर्थ में, अर्शोघ्न, सूरण और कन्द जिमीकन्द के अर्थ में, मुस्तक और कुरुविन्दक मोथा कर्मार, वेणु, मस्कर और तेजन बाँस के अर्थ में, छत्र, अतिच्छत्र और पालघ्न के अर्थ में, त्वक्सार, में, माला, तृणक और भूस्तृण नये तृण के अर्थ में पानी में उत्पन्न होनेवाले तृण के अर्थ पूग सुपारी प्रयुक्त होते हैं । तृणराज ताड़ के अर्थ में, घोण्टा, क्रमुक और के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥६४-७० ३॥ शार्दूल और द्वीपी व्याघ्र के अर्थ में, हर्यक्ष, केसरी और हरि निगतस्त्रायमाना १ ख. ग. “ ला आवेदी गन्धदा । २ ख. ग. न्द्रः कम्पिल्वकस्त ' । ३ “ कुनन्दती " तथा " ७ क. ङ. ' रुरूव कर्षिकास्तथा । ८ ख. ग. " केसरी इति क ।. ङ. पुस्तकयोः वर्तते । ४ ख. बदरी । ५ ख. ग. ' सारिणी । ६ इत्यत्र ख. ग ". सकुलदन्ती कटुंभरा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1133

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त्रिषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११२ ९ " कोलः पोत्री वराहः स्यात्कोक ईहामृगो वृकः । लूतोर्णनाभौ तु समौ तन्तुवायश्च मर्कटे ॥७२ ॥

वृश्चिकः शूककीटः स्यात्सारङ्गस्तोककौ समौ । कृकवाकुस्ताम्रचूडः पिकः कोकिल इत्यपि ॥७३ ॥

का तु करटारिष्टौ व ( ब ) कः ' कह्न उदाहृतः । कोकश्चक्रश्चक्रवाकः कादम्बः कलहंसकः ॥७४ ॥

पतङ्गिका पुत्तिका स्यात्सरघा मधुमक्षिका । द्विरेफपुष्पलिङ्भृङ्गषट्पदभ्रमरालयः ॥७५ ॥

केकी शिख्यस्य वाक्केका शकुन्तिशकुनिद्विजाः । स्त्री पक्षतिः पक्षमूलं चञ्चुस्तोटिरुभे स्त्रियौ ॥७६ ॥

गतिरुड्डीनसण्डीनौ कुलायो नीडमस्त्रियाम् । पेषी ( शी ) कोषो द्विहीनेऽण्डं पृथुकः शावकः शिशुः ॥७७ ॥

पोतः पाकोऽर्भको डिम्भः संदोहव्यूहकौ गणः । स्तोमौघनिकरव्राता निकुरम्बं कदम्बकम् ॥

संघातसंचयौ वृन्दं पुञ्जराशी तु कूटकम् ॥७८ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये भूमिवनौषध्यादिवर्गनिरूपणं नाम त्रिषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६३ ॥

सिंह के अर्थ में, कोल, पोत्री और वराह सुअर के अर्थ में, कोक, ईहामृग और वृक भेड़िया के अर्थ में, लूता, उर्णनाभ, तन्दुवाय और मर्कट मकड़ी के अर्थ में, वृश्चिक और शूककीट बिच्छू के अर्थ में, सारङ्ग और स्तोकक पपीहा के अर्थ में, कृकवाकु और ताम्रचूड़ मुर्गा के अर्थ में, पिक और कोकिल कोयल के अर्थ में, करट और अरिष्ट कौवे के अर्थ में, बक और कह्न बकुला के अर्थ में, कोक और चक्रवाक चकवा के अर्थ में, कादम्ब और कलहंस बत्तख के अर्थ में, पतङ्गिका और पुत्तिका पाँखी के अर्थ में, सरघा और मधुमक्षिका मधुमक्खी के अर्थ में, द्विरेफ, पुष्पलिड्, भृङ्ग, षट्पद, भ्रमर और अलि भँवरे के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥७१-७५ ॥ केकी और शिखी मोर के अर्थ में, शकुन्ति, शकुनि और द्विज पक्षी मात्र के अर्थ में, पक्षति, पक्षमूल, चञ्चु और तोटि, चोंच के अर्थ में, उड्डीन और सण्डीन उड़ने के अर्थ में, कुलाय और नीड़ घोंसले के अर्थ में, पेशीकोष और द्विहीन अण्डे के अर्थ में, पृथुक, शावक, शिशु, पोत, पाक, अर्भक और डिम्भ बच्चे के अर्थ में, संदोह, व्यूह, गण, सोम, ओघ, निकर, व्रात, निकुरम्ब, कदम्बक, संघात, संचय और वृन्द समूह के अर्थ में, पुञ्ज, राशि और कूट अनाज की ढेरी के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥७६-७८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में भूमिवनौषध्यादि वर्ग - निरूपण कथन नामक तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय समाप्त ॥३६३ ॥

१ क. ख. कङ्क । २ छ. ' लं लञ्चु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1134

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११३० अग्निपुराणम् अथ चतुःषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः नृब्रह्मक्षत्रविट्शूद्रवर्गाः अग्निरुवाच नृब्रह्मक्षत्रविट्शूद्रवर्गान्वक्ष्येऽथ नामतः । नरः पञ्चजना मर्त्या योषिद्योषाऽबला वधूः ॥१ ॥

कान्तार्थिनी तु या याति संकेतं साऽभिसारिका । कुलटा पुंश्चल्यसती नग्निका स्त्री च कोटवी ॥ २ ॥

कात्यायन्यर्धवृद्धा या सैरन्ध्री परवेश्मगा । असिक्नी स्यादवृद्धा या मालिनी तु रजस्वला ॥ ३ ॥

वारस्त्री गणिका वेश्या भ्रातृजायास्तु यातरः । ननन्दा तु स्वसा पत्युः सपिण्ड ( ण्डा ) स्तु सनाभयः ॥४ ॥

समानोदर्यसोदर्यसगर्भसहजाः समाः । सगोत्रबान्धवज्ञातिबन्धुस्वस्वजनाः समाः ॥५ ॥

दंपती जंपती भार्यापती जायापती च तौ । गर्भाशयो जरायुः स्यादुल्बं च कललोऽस्त्रियाम् || ६ || गर्भो भ्रूण इमौ तुल्यौक्लीवं शण्डो ( ण्ढो ) नपुंसकम् । स्यादुत्तानशया डिम्भो बालो माणवकः स्मृतः ॥७ ॥

पिचि ( च ) ण्डिलो बृहत्कुक्षिरभ्रटो नतनासिके । विकलाङ्गस्तु पोगण्ड आरोग्यं स्यादनामयम् ॥८ ॥

स्यादेडे वधिरः कुब्जे गडुलः ककुरे ' कुनिः । क्षयः शोषश्च यक्ष्मा च प्रतिश्यायस्तु पीनसः ॥ ९ ॥

अध्याय ३६४ नृब्रह्मक्षत्रविट्शूद्रवर्ग अग्निदेव बोले- - अब मैं मनुष्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्गों का वर्णन उनके नामानुसार कर रहा हूँ । नर, पञ्चजन, मर्त्य और मनुष्य पुरुषमात्र के अर्थ में, योषित्, योषा, अबला और वधू स्त्रीभाव के अर्थ में, परपुरुषार्थ, संकेत स्थान जानेवाली स्त्री को अभिसारिका कहा जाता है । कुलटा, पुंश्चली और असती व्यभिचारिणी के अर्थ में, नग्निका और कोटवी नग्नस्त्री के अर्थ में, कात्यायनी अर्धबूढ़ी के अर्थ में, सैरन्ध्री दासी से अर्थ में, असिक्नी युवती दासी के अर्थ में, मालिनी रजस्वला के अर्थ में, वारस्त्री और गणिका वेश्या के अर्थ में, याता, देवरानी या जेठानी के अर्थ में, ननन्दा पति की बहन के अर्थ में तथा सपिण्ड और सनाभि भाई - बन्धु के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥१-४ ॥ समानोदर्य, सोदर्य, सगर्भ, सहज सगे भाई के अर्थ में, सगोत्र, बान्धव, ज्ञाति, बन्धु, स्व और स्वजन सगोत्री भाई के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । दम्पती, जम्पती, भार्यापती और जायापती स्त्री - पुरुष के अर्थ में, गर्भाशय, जरायु, उल्ब और कलल गर्भ को लपेटनेवाली झिल्ली के अर्थ में प्रयुक्त होता है । कलल शब्द पुल्लिंग और नपुंसक लिंग दोनों हैं । गर्भ और भ्रूण ये दोनों तुल्य शब्द हैं । क्लीव, शण्ड और नपुंसक हिंजड़े के अर्थ में, उत्तानशया डिम्म बच्चे के अर्थ में, बाल और माणवक बालक के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥५-७ ॥ पिचिण्डिल और और तुन्दिल के अर्थ में, अभ्रट और नत - नासिक नकचपटे के अर्थ में, विकलांग और पोगण्ड वामन के बृहत्कुक्षि अर्थ आरोग्य और अनामय आरोग्य के अर्थ में, एड और बधिर बहिरे के अर्थ में, कुब्ज और गडुल में, में, लूले के अर्थ में कुनि, क्षय, शोष, यक्ष्मा, राजयक्ष्मा के अर्थ में, प्रतिश्याय और कुबड़े के अर्थ पीनस जुकाम के अर्थ में १. क. ङ. कुणिः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1135

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चतुःषष्ट्यधिकत्रिशतमोऽध्यायः ११३१ स्त्री क्षुत्क्षुतं ' क्षवः पुंसि कासस्तु क्षवथुः पुमान् । किलास सिध्म कच्छ्वां तु पाम पामा विचर्चिका । आनाहस्तु विबन्धः स्याद्ग्रहणी रुक्प्रवाहिका । बुक्काऽग्रमांसं हृदयं हृन्मेदस्तु वपा वसा । तिलकं क्लोम मस्तिष्कं दूषिका नेत्रयोर्मलम् । स्नायुः स्त्रियां कालखण्डयकृती तु समे इमे । स्याच्छरीरास्थ्नि कंकालः पृष्ठास्थिन तु कशेरुका । अङ्गं प्रतीकोऽवयवः शरीरं वर्ष्म विग्रहः । पश्चान्नितम्बः स्वीकट्याः क्लीवे तु जघनं पुरः । स्त्रियां स्फिचौ कटिप्रोथावुपस्थो वक्ष्यमाणयोः ।

पिचि ( च ) ण्डकुक्षी जठरोदरं तुन्दं कुचौ स्तनौ ।

शोथस्तु श्वयथुः शोफः पादस्फोटो विपादिका ॥१० ॥

कोठो मण्डलकं कुष्ठं श्वित्रे दुर्नामकार्शसी ॥११ ॥

बीजबीर्येन्द्रियं शुक्रं पललं क्रव्यमामिषम् ॥ १२ ॥

पश्चाद्ग्रीवाशिरा मन्या नाडी तु धमनिः शिरा ॥१३ ॥

अन्त्रं पुरीतद्गुल्मस्तु प्लीहा पुंस्यथ वस्नसा ॥१४ ॥

' स्यात्कर्परः कपालोऽस्त्री कीकसं कुल्यमस्थि च ॥ १५ ॥

शिरोस्थनि करोटिः स्त्री पार्श्वोस्थनि तु ' पर्शुका ॥१६ ॥

कटो ना श्रोणिफलकं कटिः श्रोणिः ककुद्मती ॥१७ ॥

कूपकौ तु नितम्बस्थौ द्वयहीने ' कुकुन्दरे ॥ १८ ॥

भगं योनिर्द्वयोः शिश्नो मेद्रो ( ढूं ) मेहनशेफसी ॥१९ ॥

चूचुकं तु कुचाग्रं स्यान्न ना क्रोडं भुजान्तरम् ॥२० ॥

प्रयुक्त होते हैं । स्त्रीलिंग क्षुत्, पुल्लिंग क्षव और स्त्रीलिंग क्षुत छींक के अर्थ में, कास और क्षवथु खाँसी के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । शोथ, श्वयथु और शोफ सूजन के अर्थ में तथा पाद - स्फोट और विपादिका व्यवाइ के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । किलास और सिध्म सेहुआँ रोग के अर्थ में, कच्छू, पाम, पामा और विचर्चिका खुजली के अर्थ में, कोढ़ और मण्डलक मण्डलाकार कोढ़ के अर्थ में, कुष्ठ और श्वित्र सफेद कोढ़ के अर्थ में, दुर्नामक और अर्श गुदारोग के अर्थ में, आनाह और विबन्ध कब्जियत के अर्थ में, ग्रहणी और प्रवाहिका संग्रहणी के अर्थ में, शुक्र ( तेज, रेतस् ), बीज और वीर्य - इन्द्रिय बीज के अर्थ में, पलल, क्रव्य और आमिष मांस के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥८-१२ ॥ बुक्का और अग्रमांस कलेजे के अर्थ में, हृदय और हृत् हृदय के अर्थ में, मेद, वपा और वसा चर्बी के अर्थ में, पश्चाद्ग्रीवा, शिरा और मन्या गले की पिछली नस के अर्थ में, नाड़ी, धमनी और शिरा नाड़ी के अर्थ में, तिलक और क्लोम पेट में पानी की झिल्ली ( फेफड़ा ) के अर्थ में, मस्तिष्क और गोर्द मस्तक - स्नेह के अर्थ में, दूषिका नेत्रों के मैल के अर्थ में, अन्त्र और पुरीतत् आँत के अर्थ में, गुल्म और प्लीहा पिलही के अर्थ में, वस्नसा और स्नायु वायु - वाहिनी नाड़ी के अर्थ में, कालखण्ड और यकृत् दाहिनी कुक्षि के मांस खण्ड ( कलेजे ) के अर्थ में, कर्पर और कपाल सिर की हड्डी के अर्थ में, कीकस, कुल्य और अस्थि हड्डी के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है ॥१३-१५ ॥ कंकाल शरीर की हड्डी के अर्थ में, कशेरुका पीठ की रीढ़ के अर्थ में, करोटि सिर की हड्डी के अर्थ में, ' पर्शुका ' पसली के अर्थ में, अंग, प्रतीक और अवयव अंग के अर्थ में, शरीर, वर्ष्म और विग्रह शरीर के अर्थ में, कट, श्रोणिफलक, कटि, श्रोणि और ककुद्मती कटि के अर्थ में, ' नितम्ब ' स्त्री की कटि के पिछले भाग के अर्थ में और उसके आगेवाले भाग के अर्थ में जघन शब्द प्रयुक्त होता है । कूपक और ककुन्दर नितम्ब के दोनों गड्ढों के अर्थ में, स्फिच तथा कटिप्रोथ स्त्री के दोनों कूल्हों के अर्थ में, उपस्थ, भग और योनि भग के अर्थ में और शिश्न, मेढू, मेहन और शेफस् लिंग के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । पिचण्ड, कुक्षि, जठर, उदर और तुन्द पेट के अर्थ में, कुच स्तन के अर्थ में, चूचुक और ' कुचाग्र कुच के अग्रभाग के अर्थ में, क्रोड और भुजान्तर गोद के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥१६-२०१ १ क. ङ. च. क्षम्यं । २ ग. छ. ' त्कर्पूरः । ३ ख. ग. पार्श्वकम् । ४ ख. ग. ककुन्दरे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1136

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११३२ अग्निपुराणम् स्कन्धो भुजशिरोंऽसोऽस्त्री संधी तस्यैव जत्रुणी प्रादेशतालगोकर्णास्तर्जन्याद्वियुते तते पाणौ चपेटप्रतलप्रहस्ता विस्तृताङ्गुलौ कम्बुग्रीवा त्रिरेखा साऽवटुर्घाटा कृकाटिका अपाङ्गौ नेत्रयोरन्तौ कटाक्षोऽपाङ्गदर्शने आकल्पवेशौ नेपथ्यं ' प्रत्यक्षं खेलयोगजम् कर्णिका तालपत्रं स्याल्लम्बनं स्याल्ललन्तिका दैर्घ्यमायाम आरोहः परिणाहो विशालता रचना स्यात्परिस्पन्द आभोगः परिपूर्णता इत्यादिमहापुराण आग्नेये । पुनर्भवः कररुहो नखोऽस्त्री नखरोऽस्त्रियाम् ॥ २१ ॥

। अङ्गुष्ठे सकनिष्ठे स्याद्वितस्तिर्द्वादशाङ्गुलः ॥ २२ ॥

। बद्धमुष्टिकरो रत्निररनिः सकनिष्ठवान् ( ष्ठिकः ) ॥२३ ॥

। अधः स्याच्चिबुकं चोष्ठादथ गण्डौ गलो हनुः ॥ २४ ॥

। चिकुरः कुन्तलो बालः प्रतिकर्म प्रसाधनम् ॥ २५ ॥

। चूडामणिः शिरोरलं तरलो हारमध्यगः ॥ २६ ॥

। मञ्जीरो नूपुरं पादे किङ्किणी छुद्रघण्टिका ॥ २७ ॥

। पटच्चरं जीर्णवस्त्रं संव्यानं चोत्तरीयकम् ॥२८ ॥

। समुद्गकः संपुटकः प्रतिग्राहः पतग्रहः ॥ २ ९ ॥ नृब्रह्मक्षत्रविट्शूद्रवर्गनिरूपणं नाम चतुःषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६४ ॥

स्कन्ध, भुजशिर और अंस कन्धे के अर्थ में, जत्रुणी कन्धे के समीप हँसुली के अर्थ में, पुनर्भव, कररुह, नख और नखर नाखून के अर्थ में, अँगूठे से लेकर तर्जनी तक फैलाये हुए हाथ को प्रादेश, अँगूठे से मध्यमा तक को ताल और अनामिका तक फैलाये हुए हाथ को गोकर्ण कहते हैं । अँगूठे और कनिष्ठिका के मध्य भाग को, जो बारह अंगुल विस्तृत रहता है, वितस्ति ( बालिस्त ) कहा जाता है । चपेट, प्रतल और प्रहस्त अँगुलियों के बीच के भाग हथेली ( चटकने ) के अर्थ में, रत्नि और अरत्नि मुट्ठी बाँधे हाथ के अर्थ में, कम्बुग्रीवा और ग्रीवा ( गले ) के अर्थ में, अवटु, घाटा और कृकाटिका घाँटी के अर्थ में, चिबुक ओष्ठ के नीचेवाले भाग ( ठुड्डी ) के अर्थ में, गण्ड और कपोल गाल के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं और चिबुक के नीचे की हड्डी के अर्थ में हनु शब्द का प्रयोग होता है । अपांग नेत्र के किनारे के अर्थ में, कटाक्ष तिरछी चितवन के अर्थ में, चिकुर, कुन्तल और बाल केश के अर्थ में, प्रतिकर्म और प्रसाधन शब्द श्रृंगार करने के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥ २१-२५ ॥ आकल्प, वेश और नेपथ्य अलंकार रचनादि की शोभा के अर्थ में, शिरोरत्न चूड़ामणि के अर्थ में, तरल हार के मध्य में रहनेवाली बड़ी मणि के अर्थ में, कर्णिका तर्की के अर्थ में, तालपत्र ऐरन के अर्थ में, लम्बन और ललन्तिका लम्बी कण्ठी के अर्थ में, मञ्जीर और नूपुर पायजेब के अर्थ में, किंकिणी और छुद्रघण्टिका घूँघुर के अर्थ में, दैर्घ्य, आयाम और आरोह ( लम्बाई के अर्थ में, परिणाह और विशालता चौड़ाई के अर्थ में, पटच्चर और जीर्ण वस्त्र फटे - पुराने ) संव्यान और उत्तरीयक दुपट्टे के अर्थ में, रचना और परिस्पन्द शिल्पादि वस्त्र के अर्थ में, रचना के अर्थ में, आभोग और परिपूर्णता पूर्णता के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । ढक्कनदार पेटी को समुद्गक और सम्पुटक कहते हैं । प्रतिग्राह ये पीकदान के नाम हैं ॥२६-२९ ॥ और पतद्ग्रह– श्री अग्निमहापुराण में नृब्रह्मक्षत्रविट्शूद्र वर्ग - निरूपण - कथन नामक तीन सौ चौंसठवाँ अध्याय समाप्त ॥३६४ ॥

१ ख. ग. क्षं स्वेन यो ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1137

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पञ्चषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११३३ अथ पञ्चषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ब्रह्मवर्गः अग्निरुवाच वंशोऽन्ववायो गोत्रं स्यात्कुलान्यभिजनान्वयौ यष्टा च यजमानः स्याज्ज्ञात्वाऽऽरम्भ उपक्रमः सभासदः सभास्तारा ऋत्विजो याजकाश्च ते चषालो यूपकटकः समे स्थण्डिलचत्वरे पृषदाज्यं सदध्याज्ये परमान्नं तु पायसम् परं पराकं शमनं प्रोक्षणं च वधार्थकम् वरिवस्या तु शुश्रूषा परिचर्याऽप्युपासनम् मुख्यः स्यात्प्रथमः कल्पोऽनुकल्पस्तु ततोऽधमः संस्कारपूर्व ग्रहणं स्यादुपाकरणं श्रुतेः ऋषयः सत्यवचसः स्नातकश्चाऽप्लुतव्रती । मन्त्रव्याख्याकृदाचार्य आदेष्टा त्वध्वरे व्रती ॥ १ ॥

। सतीर्थ्याश्चैकगुरवः सभ्याः सामाजिकास्तथा ॥२ ॥

। अध्वर्यूद्गातृहोतारो यजुः सामग्विदः क्रमात् ॥३ ॥

। आमिक्षा सा शृतोष्णे या क्षीरे स्याद्दधियोगतः ॥४ ॥

। उपाकृतः पशुरसौ योऽभिमन्त्र्य क्रतौ हतः ॥५ ॥

। पूजा नमस्याऽपचितिः सपर्यार्चार्हणाः समाः ॥६ ॥

। नियमो व्रतमस्त्री तच्चोपवासादि पुण्यकम् ॥७ ॥

। कल्पे विधिक्रमौ ज्ञेयौ विवेकः पृथगात्मता ॥८ ॥

। भिक्षुः परिव्राट् कर्मन्दी पाराशर्यपि मस्करी ॥ ९ ॥

। ' ये निर्जितेन्द्रियग्रामा यतिनो यतयश्च ते ॥१० ॥

अध्याय ३६५ ब्रह्मवर्ग अग्निदेव बोले- वंश, अन्ववाय, गोत्र, कुल और अभिजन वंश के अर्थ में, मन्त्रों की व्याख्या करनेवाले के अर्थ में आचार्य, यज्ञ में व्रत की दीक्षा ग्रहण करनेवाले के अर्थ में आदेष्टा, यष्टा और यजमान का प्रयोग होता है । उपक्रम आरम्भ करने के अर्थ में, सतीर्थ्य और एकगुरु सहपाठी के अर्थ में, सभ्य, सामाजिक, सभासद और सभास्तार सभा में बैठनेवाले के अर्थ में, ऋत्विक् याजक के अर्थ में, अध्वर्यु, उद्गाता और होता क्रमशः यजुर्वेदी, सामवेदी और अथर्ववेदी ( ऋत्विक् ) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । चषाल और यूपकटक यज्ञस्तम्भ के अर्थ में, स्थण्डिल यज्ञ के चबूतरे के अर्थ में, आमिक्षा दधियुक्त पके हुए दुग्ध के अर्थ में, पृषदाज्य दहीयुक्त घृत के अर्थ में, पायस खीर के अर्थ में, उपाकृत यज्ञ में हत होनेवाले अभिमन्त्रित पशु के अर्थ में, परम्पराक, शमन और प्रोक्षण यज्ञीय पशु के वध के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । पूजा, नमस्या, अपचिति, सपर्या, अर्चा और अर्हणा पूजा के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥१-६ ॥ वरिवस्या, शुश्रूषा, परिचर्या और उपासन सेवा के अर्थ में, नियम व्रत के अर्थ में, प्रथमकल्प मुख्य विधान के अर्थ में, अनुकल्प गौण विधि के अर्थ में, विधि और क्रम कल्प के अर्थ में, विवेक और पृथगात्मता प्रकृति और पुरुष के भेदज्ञान के अर्थ में, उपाकरण विधानपूर्वक वेदाध्ययन के अर्थ में, भिक्षु, परिव्राट्, कर्मन्दी, पाराशरी और मस्करी संन्यासी के अर्थ में, सत्यवचस् ऋषि के अर्थ में, स्नातक, आप्लुतवती वेदाध्ययन समाप्त करके दूसरे ( गृहस्थ ) आश्रम में प्रविष्ट होने के अर्थ में, निर्जितइन्द्रियग्राम और यति जितेन्द्रिय के अर्थ में, यम शरीरमात्र से साध्य होनेवाले नित्यकर्म के १ ख. ग. ये संयतेन्द्रि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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११३४ अग्निपुराणम्

शरीरसधनापेक्षं नित्यं यत्कर्म तद्यमः । नियमस्तु स यत्कर्मानित्यमागन्तुसाधनम् ॥

स्याद्ब्रह्मभूयं ब्रह्मत्वं ब्रह्मसायुज्यमित्यपि ॥११ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये ब्रह्मवर्गनिरूपणं नाम पञ्चषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३६५ ॥

अथ षट्षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः क्षत्रविट्शूद्रवर्गाः अग्निरुवाच मूर्धाभिषिक्तो राजन्यो बाहुजः क्षत्रियो विराट् । राजा तु प्रणताशेषसामन्तः स्यादधीश्वरः ॥ १ ॥

चक्रवर्ती सार्वभौमो नृपोऽन्यो मण्डलेश्वरः । मन्त्री धीसचिवोऽमात्यो महामात्राः प्रधानकाः ॥२ ॥

द्रष्टरि व्यवहाराणां प्राड्विवाकाक्षदर्शकौ । भौरिकः कनकाध्यक्षोऽथाध्यक्षाधिकृतौ समौ || ३ || अन्तःपुरे त्वधिकृतः स्यादन्तर्वंशिको जनः । सौविदल्लाः कञ्चुकिनः स्थापत्याः सौविदाश्च ते || ४ || षण्डो वर्षवरस्तुल्याः ' सेवकार्थ्यनुजीविनः । विषयानन्तरो राजा शत्रुर्मित्रमतः परम् ॥५ ॥

उदासीनः परतरः पाणिग्राहस्तु पृष्ठतः । चरः स्पशः स्यात्प्रणिधिरुत्तर काल आयतिः ॥ ६ ॥

अर्थ में, नियम कभी - कभी होनेवाले विशेष कर्म के अर्थ में, ब्रह्मभूय, ब्रह्मत्व और ब्रह्मसायुज्य ब्रह्म में लीन होने के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥७-११ ॥ श्री अग्निमहापुराण में ब्रह्मवर्ग - निरूपण कथन नामक तीन सौ पैंसठवाँ अध्याय समाप्त ॥३६५ ॥

अध्याय ३६६ क्षत्रविट्शूद्रवर्ग अग्निदेव बोले - मूर्धाभिषिक्त, राजन्य, बाहुज, क्षत्रिय और विराट् - ये क्षत्रिय के वाचक हैं । जिस राजा के सामने सभी सामन्त नरेश मस्तक झुकाते हैं, उसे अधीश्वर कहते हैं । चक्रवर्ती सार्वभौम महाराजाधिराज के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । मन्त्री, धीसचिव और अमात्य मन्त्री के अर्थ में, महामात्र प्रधानमन्त्री के अर्थ में, प्राड्विवाक् और अक्षदर्शक धर्माध्यक्ष ( न्यायाधीश ) के अर्थ में, भौरिक सुवर्ण सिक्के के अध्यक्ष के अर्थ में ( नैष्किक चाँदी के सिक्के के अध्यक्ष के अर्थ में ), अध्यक्ष और अधिकृत अधिकारी के अर्थ में, अन्तर्वेशिक अन्तःपुर के अध्यक्ष के अर्थ में, सौविदल्ल, कञ्चुकी, स्थापत्य और सौविद रनिवास के सेवक के अर्थ में, षण्ड और वर्षवर हिंजड़े के अर्थ में, सेवक, अर्थी और अनुजीवी सेवक के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । अपने राज्य की सीमा पर रहनेवाला राजा शत्रु होता है और शत्रु की राज्य - सीमा पर रहनेवाला राजा अपना मित्र होता है ॥१५ ॥ उदासीन शत्रु - मित्र से भिन्न राजा के अर्थ में, विजिगीषु राजा के पीछे

रहनेवाले राजा को पाष्णिग्राह कहते हैं । चर, स्पश, प्रणिधि जासूस के अर्थ में, आयति, उत्तरकाल भविष्य के अर्थ १ ख. ग. ' काद्यानु ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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षट्षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११३५ तत्कालस्तु तदात्वं स्यादुदर्कः फलमुत्तरम् । भद्रकुम्भः पूर्णकुम्भो भृङ्गारः कनकालुका । ' स्त्रियां सृणिस्त्वङ्कुशोऽस्त्री परिस्तोमः कुथो द्वयोः । आधोरणा हस्तिपका हस्त्यारोहा निषादिनः । शीर्षण्यं च शिरस्त्रेऽथ तनुत्रं वर्म दंशनम् । व्यूहस्तु बलविन्यासश्चक्रं चानीकमस्त्रियाम् । पत्त्यस्त्रिगुणैः सर्वैः क्रमादाख्या यथोत्तरम् ।

अनीकिनी दशानीकिन्योऽक्षौहिण्यो गजादिभिः ।

अदृष्टं वह्नितोयादि दृष्टं स्वपरचक्रजम् ॥७ ॥

प्रभिन्नो गर्जितो मत्तो वमथुः करशीकरः ॥८ ॥

कर्णीरथः प्रवहणं दोला प्रेङ्खादिका स्त्रियाम् ॥९ ॥

भटा योधाश्च योद्धारः कञ्चुको वारणोऽस्त्रियाम् ॥१० ॥

आमुक्तः प्रतिमुक्तश्च पिनद्धश्चापिनद्धवत् ॥११ ॥

एकेभैकरथा त्र्यश्वा पत्तिः पञ्चपदातिका ॥१२ ॥

सेनामुखं गुल्मगणौ वाहिनी पृतना चमूः ॥ १३ ॥

धनुः कोदण्ड इष्वासौ ( सः ) कोटिरस्याटनी स्मृता ं ॥१४ ॥

में, तत्काल, तदात्व वर्तमान के अर्थ में, उदर्क आगामी फल के अर्थ में, अदृष्ट भय, अग्नि, जल आदि जनित भय के अर्थ में, दृष्ट भय अपने तथा अन्य सेनाजनित भय के अर्थ में, भद्रकुम्भ और पूर्णकुम्भ पूर्णकलश के अर्थ में, भृङ्गार, कनकालुका झारी के अर्थ में, प्रभिन्न, गर्जित और मत्त मदश्रावी हाथी के अर्थ में, वमथु और करशीकर हाथी के सूँड़ से निकले हुए जल के अर्थ में, अंकुश और सृणि अंकुश के अर्थ में, परिस्तोम और कुथ हाथी के ऊपर पड़े हुए चित्र - विचित्र झूले के अर्थ में, कर्णीरथ और प्रवहण डोला के अर्थ में, दोला और प्रेङ्खादि पालकी डोला के अर्थ में, अधोरण, हस्तिपद, हस्त्यारोह और निषादी पीलवान के अर्थ में, भट, योधा और योद्धा सैनिक के अर्थ में, कञ्चुक और वारण कवच ( बख्तर ) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । इनका प्रयोग स्त्रीलिंग के अतिरिक्त सभी लिङ्गों में होता है ॥६-१० ॥ शीर्षण्य टोप के अर्थ में, तनुत्र, वर्म और दंशन कवच के अर्थ में, आमुक्त, प्रतिमुक्त, पिनद्ध, अपिनद्ध, पहने हुए झिल्लिम के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । व्यूह और बल विन्यास मोर्चे के अर्थ में, चक्र और अनीक सेना के अर्थ में, ' पत्ति ' एक हाथी, एक रथ, तीन घोड़े और पाँच पैदलवाली सेना के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । पत्ति के प्रत्येक अंग को क्रमशः तिगुना करने पर विशेष नाम की सेना का निर्माण होता है । जैसे - पत्ति के अंगभूत १ हाथी, १ रथ, ३ घोड़े और ५ पैदल को क्रमशः तिगुना करने पर ३ हाथी, ३ रथ, ९ घोड़े तथा १५ पैदल की सेना मुख नामक सेना होती है । इसी प्रकार सेनामुख के प्रत्येक अंग को क्रमशः तिगुना करने पर ' गुल्म ' नामक सेना, गुल्म के अंग को तिगुना करने पर ' गण ' नामक सेना, गण को तिगुने करने पर ' वाहिनी ' नामक सेना, वाहिनी को तिगुना करने पर ' पृतना ' नामक सेना, पृतना को तिगुना करने पर ' चमू ' नामक सेना, चमू को तिगुना करने पर ' अनीकिनी ' नामक सेना और अनीकिनी को तिगुना करने पर ‘ अक्षौहिणी ' नामक सेना तैयार होती है । ' उपर्युक्त सेना- विशेष में गजादि निर्णयचक्र ' सेना पत्ति सेनामुख गुल्म गण वाहिनी पृतना चमू अनीकिनी अक्षौहिणी गजरथ ३ ९ २७ ८१ २४३ ७२ ९ २१८७ २१८७० घोड़े ३ ९ २७ ८१ २४३ ७२ ९ २१८७ ६५६१ ६५६१० पैदल ५ १५ ४५ १३५ ४०५ १२१५ ३६४५ १० ९ ३५ १० ९ ३५० धनु, कोदण्ड और इष्वास धनुष के अर्थ में, कोटि और अटनी धुनष के अन्तिम भाग के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ।११-१४ ॥ १ छ. ' यां शृणि ' । २ ख. ग. ' ता । लस्त ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1140

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११३६ अग्निपुराणम् नस्तकस्तु धनुर्मध्यं मौर्वी ज्या शिञ्जिनी गुणः । तूणोपासङ्गतूणीरनिषङ्गा इषुधिर्द्वयोः । त्सरुः खड्गस्य मुष्टौ ' स्यादीली तु ' करपालिका । प्रासस्तु कुन्तो विज्ञेयः सर्वला तोमरोऽस्त्रियाम् । संशप्तकास्तु समयात्संग्रामादनिवर्तिनः । अहं पूर्वमहं पूर्वत्मित्यहंपूर्विका स्त्रियाम् । शक्तिः पराक्रमः प्राणः शौर्यं स्थानसहोबलम् । अभ्यवस्कन्दनं त्वभ्यासादनं विजयो जयः । स्यात्पञ्चता कालधर्मो दिष्टान्तः प्रलयोऽत्ययः । कृष्यादिवृत्तयो ज्ञेयाः कुसीदं वृद्धिजीविका ।

किंशारुः सस्यशूकं स्यात्स्तम्बो गुच्छस्तृणादिनः ।

पृषत्कबाणविशिखा अजिह्मगखगाशुगाः ॥१५ ॥

असिर्ऋष्टिश्च निस्त्रिंशः करवालः कृपाणवत् ॥१६ ॥

द्वयोः कुठारः सु ( स्व ) घितिश्छुरिका चासिपुत्रिका ॥१७ ॥

वैतालिका बोधकरा मागधा बन्दिनस्तु तौ ( ते ) ॥१८ ॥

पताका वैजयन्ती स्यात्केतनं ध्वजमस्त्रियाम् ॥१९ ॥

अहमहमिका सा स्याद्योऽहंकारः परस्परम् ॥२० ॥

मूर्च्छा तु कश्मलं मोहोऽप्यवमर्दस्तु पीडनम् ॥२१ ॥

निर्वासनं संज्ञपनं ' मारणं प्रतिघातनम् ॥ २२ ॥

विशो भूमिस्पृशो वैश्या वृत्तिर्वर्तनजीवने ॥ २३ ॥

उद्धारोऽर्थप्रयोगः स्यात्कणिशं शस्यमञ्जरी ॥ २४ ॥

धान्यं व्रीहिः स्तम्बकरिः कंडगरो बुषं ( सं ) स्मृतम् ॥ २५ ॥

नस्तक, धनुर्मध्य धनुष के मध्यभाग के अर्थ में, मौर्वी, ज्या, शिञ्जिनी और गुण धनुष की डोरी ( प्रत्यञ्चा ) के अर्थ में, पृषत्क, बाण, विशिख, अजिह्मग, खग और आशुग बाण के अर्थ में, तूण, उपासङ्ग, तूणीर, निषंग और इषुधि तरकस के अर्थ में, असि, ऋष्टि, निस्त्रिंश, करवाल और कृपाण तलवार के अर्थ में, त्सरु खड्ग की मूठ के अर्थ में, ईली और करवालिका गुप्ती के अर्थ में, कुठार और सुधिति फरसा के अर्थ में, छुरिका और असिपुत्रिका छुरी के अर्थ में, प्रास और कुन्त भाला के अर्थ में, सर्वला और तोमर गँड़ासे के अर्थ में, वैतालिक और बोधकर प्रात: काल राजा को जगानेवाले के अर्थ में, मागध और बन्दी वंशपरम्परा के गुणगान करनेवाले के अर्थ में, संशप्तक युद्धस्थल से न भागनेवाले वीर के अर्थ में, पताका, वैजयन्ती, केतन और ध्वज पताका के अर्थ में, अहंपूर्विका ' मैं पहले मैं ' पहले के अर्थ में और अहमहमिका आपस में होड़ करने के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥ १५-२० ॥ शक्ति, पराक्रम, प्राण, शौर्य, स्थान, सहस् और बल - ये सभी शब्द बल के वाचक हैं । मूर्च्छा, कश्मल और मोह मूर्च्छा के अर्थ में, अवमर्द और पीड़न कष्ट पहुँचाने के अर्थ में, अभ्यवस्कन्दन और अभ्यासादन शत्रु को धर दबाने के अर्थ में, जय और विजय जीतने के अर्थ में, निर्वासन, संज्ञापन, मारण और प्रतिघातन वध करने के अर्थ में, पञ्चता, कालधर्म दिष्टान्त, प्रलय और अत्यय मृत्यु के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । विश्, भूमिस्पृश् और वैश्य वैश्यजाति के अर्थ में, वृत्ति वर्तन, जीवन और जीविका के उपाय के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥ २१-२३ ॥ कृषि और पशुपालन वैश्य जाति की जीविका कही गयी है । कुसीद, वृद्धि - जीविका और अर्थप्रयोग ब्याज से चलायी जानेवाली जीविका के अर्थ में, उद्धार ऋण के अर्थ में, कणिश और शस्यमञ्जरी धान आदि की बाली के अर्थ में, किंशारु और शस्यशूक जवा आदि के अग्रभाग ( टँड़ ) के अर्थ में, स्तम्ब गुच्छे के अर्थ में, धान्य, व्रीहि और स्तम्बकरि धान्य सामान्य के अर्थ में, कडङ्गर और बुष भूसा के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥२४-२५॥ १ क. ङ. स्यादाली । ख. स्यादानी तु । २ ख. ग. करवालिका । ३ क. ख. ग. मोहः पटहाडम्बरौ समौ । अ । ४ ख. ग. निर्वापणम् । ५ क. ग. ङ. सारणं । ६ ख. ग. किंसारः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA