अग्नि पुराण — पृष्ठ 1141–1150
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1141–1150
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षट्षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११३७ माषादयः शमीधान्ये शूकधान्ये यवादयः स्यूतप्रसेवौ कण्डोलपिटौ ' कटकिनिञ्जकौ पौरोगवस्तदध्यक्षः सूपकारास्तु वल्लवाः क्लीवेऽम्बरीषं भ्राष्ट्रो ना कर्कर्यालुर्गलन्तिका आरनालस्तु कुल्माषं बाह्लीकं हिङ्गु रामठम् कूर्चिका क्षीरविकृतिः स्निग्धं मसृणचिक्कणम् जेमनं ' लेह आहारो माहेयी सौरभी च गौः चिरप्रसूता वष्कयणी धेनुः स्यान्नवसूतिका पण्याजीवो ह्यापणिको न्यासश्चोपनिधिः पुमान् विंशत्याद्याः सदैकत्वे सर्वाः संख्येयसंख्ययोः पङ्क्तेः शतसहस्त्रादि क्रमाद्दशगुणोत्तरम् । तृणधान्यानि नीवाराः शूर्प प्रस्फोटनं स्मृतम् ॥२६ ॥
। समानौ रसवत्यां तु पाकस्थानमहानसे ॥२७ ॥
। आरालिका आन्धसिकाः सूदा औदनिका गुणाः ॥ २८ ॥
। आलिंजरः स्यान्मणिकं सुषवी कृष्णजीरके ॥२९ ॥
। निशा हरिद्रा पीता स्त्री खण्डे मत्स्यण्डिफाणिते ॥३० ॥
। पृथुकः स्याच्चिपिटको धाना भ्र ( भृ ) ष्टयवाः स्त्रियः ॥३१ ॥
। युगादीनां च वोढारो युग्यप्रासङ्ग्यशाटकाः ( कटाः ) ॥३२ ॥
। संधिनी वृषभाक्रान्ता वेहद्गर्भोपघातिनी ॥ ३३ ॥
। विपणो विक्रयः संख्या संख्येये ह्यादश त्रिषु ॥ ३४ ॥
। संख्यार्थे द्विबहुत्वे स्तस्तासु चाऽऽनवतेः स्त्रियः ॥ ३५ ॥
। मानं तुलाऽङ्गुलिप्रस्थैर्गुञ्जाः पञ्चाद्यमाषकः ॥ ३६ ॥
माष आदि ( उड़द, मूँग, मोथी, राजमाष, कुलथी, चना, तिल, काकण्ड और चीवर ) शमी धान्य के अर्थ में, जौ ( टँड़वाले अनाज ) आदि शूक धान्य के अर्थ में, तृणधान्य और नीवार तिनी आदि के अर्थ में, प्रस्फोटन और सूर्प सूप के अर्थ में, स्यूत और प्रसेव बोरा के अर्थ में, कण्डोल और पिट बाँस के झाबे के अर्थ में, कट और किनिञ्जक चटाई के अर्थ में, रसवती, पाकस्थान और महानस रसोईघर के अर्थ में, पौरोगव रसोई के अध्यक्ष के अर्थ में, सूपकार, वल्लव, आरालिक, आन्धसिक, सूद, औदनिक और गुण रसोईदार के अर्थ में, अम्बरीष और भ्राष्ट्र भूँजनेवाले पात्र खपरी आदि के अर्थ में, कर्करी, आलू और गलन्तिका करवा के अर्थ में, आलिञ्जर और मणिक मेढुका के अर्थ में, सुषवी काले जीरा के अर्थ में, आरनाल और कुल्माष कांजी के अर्थ में, वाह्लीक, हिंगु और रामठ हींग के अर्थ में, निशा, हरिद्रा और पीता हल्दी के अर्थ में, मत्स्यण्डी और फाणित खाँड़ के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥२६-३० ॥ कूर्चिका और क्षीरविकृति खोवा के अर्थ में, स्निग्ध, मसृण और चिक्कण चिकने के अर्थ में, पृथुक और त्रिपिटक चिउरा के अर्थ में, धाना और भ्रष्टयवा बहुरी के अर्थ में, जेमन, लेह और आहार भोजन के अर्थ में, माहेयी, सौरभी और गौ गाय के अर्थ में, युग्य और प्रासंग्य कन्धे पर जुआ ढोनेवाले बैल के अर्थ में, शाकट गाड़ी खींचनेवाले बैल के अर्थ में, चिरप्रसूता और वष्कयिणी देर से ब्याई हुई गाय ( बकेना ) के अर्थ में, धेनु, नवसूतिका नयी ब्याई गाय के अर्थ में, संधिनी गर्भिणी गाय के अर्थ में, वेहत् और गर्भोपघातिनी गर्भपात करानेवाली गाय के अर्थ में, पण्याजीव और आपणिक क्रय - विक्रय करनेवाले ( साहूकार ) के अर्थ में, न्यास और उपनिधि धरोहर के अर्थ में, विपण और विक्रय बेचने के अर्थ में, एक से दस तक और क्षीरस्वामी के मत से दस से अट्ठारह तक तथा बीस से आरम्भ कर सौ तक की संख्या तीनों लिङ्गों में एकवचन होती है । संख्यार्थ में प्रयोग करने पर ये संख्याएँ द्विवचन और बहुवचन में प्रयुक्त होती हैं और नब्बे तक की संख्याओं के रूप स्त्रीलिंग में प्रयुक्त होते हैं ॥ ३१-३५ ॥ पंक्ति को दस गुना करने पर शत और इसे दस गुना करने पर सहस्र की संख्या बनती है । इसी प्रकार क्रमशः सभी संख्याओं को दस गुना करने पर शेष सभी संख्याएँ बन जाती हैं । मान तीन प्रकार के होते हैं - तुलामान, अंगुलिमान और प्रस्थमान । १ ख. ' किणिञ्जकौ । २ क. ङ. छ. लेप । ३ ख. ग. ' स्त्राणि क्र । ७२ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११३८ अग्निपुराणम् ते षोडशाक्षः कर्षोऽस्त्री पलं कर्षचतुष्टयम् । सुवर्णविस्तौ हेम्नोऽक्षे कुरुविस्तस्तु तत्पले ॥ ३७ ॥
तुला स्त्रियां पलशतं भारः स्याद्विंशतिस्तुलाः । कार्षापणः कार्षिकः स्यात्कार्षिके ताम्रिके पणः ॥ ३८ ॥
द्रव्यं वित्तं स्वापतेयं रिक्थमृक्थं धनंं वसु । रीतिः स्त्रियामारकूटो ना स्त्रियामथ ताम्रकम् ॥ ३ ९ ॥ शुल्वमौदुम्बरं लौहे तीक्ष्णं कालायसायसी । क्षारः काचोऽथ चपलो रसः सूतश्च पारदे ॥ ४० ॥
गरलं माहिषं शृङ्गं त्रपुसीसकपिच्चटम् । हिण्डीरोऽब्धिकफः फेनो मधूच्छिष्टं तु सिक्थकम् ॥४१ ॥
रङ्गवङ्गे पिचुस्थूलो कूलटी तु मनःशिला । यवक्षारश्च पाक्यः स्यात्त्वक्क्षीरा ' वंशलोचना ॥४२ ॥
वृषला जघन्यजाः शूद्राश्चाण्डालान्त्याश्च शं ( सं ) कराः । कारुः शिल्पी संहतैस्तैर्द्वयोः श्रोणिः सजातिभिः ॥४३ ॥
रङ्गाजीवश्चित्रकरस्त्वष्टा तक्षा च वर्धकिः । नाडिंधमः स्वर्णकारो नापितान्तावसायिनः ॥४४ ॥
जाबालः स्यादजाजीवो देवाजीवस्तु देवलः । जायाजीवास्तु शैलूषा भृतको भृतिभुक्तथा ॥ ४५ ॥
विवर्णः पामरो नीचः प्राकृतश्च पृथग्जनः । विहीनोऽपसदो जाल्मो भृत्ये दासेरचेटकाः || ४६ ॥ पटुस्तु पेशलो दक्षो मृगयुर्लुब्धकः स्मृतः । चाण्डालस्तु दिवाकीर्तिः पुस्तं लेप्यादिकर्मणि ॥४७ ॥
पाँच गुंजे ( रत्ती ) का एक माशा होता है । अक्ष और कर्ष १६ माशे के अर्थ में, कर्षचतुष्टय पल के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । एक अक्ष सोने को ' सुवर्ण ' और ' विस्त ' कहते हैं तथा एक पल सुवर्ण का नाम ' कुरुविस्त ' है । सौ पल की एक ' तुला ' होती है । यह स्त्रीलिंग शब्द है । भार बीस तुला के अर्थ में, कार्षापण, कार्षिक चाँदी के रुपये के अर्थ में, पण ताँबे के पैसे के अर्थ में, द्रव्य, वित्त स्वापतेय, रिक्थ, ऋक्थ, धन और वसु धन के अर्थ में, रीति और आरकूट पीतल के अर्थ में, ताम्र, शुल्व और औदुम्बर ताँबे के अर्थ में, तीक्ष्ण, कालायस और अयस् लोहे के अर्थ में, क्षार और काँच काँच के अर्थ में, चपल, रस, सूत और पारद पारा के अर्थ में, गरल भैंस के सींग के अर्थ में, त्रपु, सीसक और पिच्चट सीसे के अर्थ में, हिण्डीर, अब्धिकफ और फेन समुद्र फेन के अर्थ में, मधूच्छिष्ट और सिक्थक मोम के अर्थ में, रङ्ग और वङ्ग राँगा के अर्थ में, पिचु और तूल रुई के अर्थ में, कूनटी, मन: शिला मैनसिल के अर्थ में, यवक्षार और पाक्य जवाखार के अर्थ में, त्वक्क्षीरी और वंशलोचना वंशलोचन के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं ॥ ३६-४२ ॥ वृषल और जघन्यज शूद्र जाति के अर्थ में, संकर चाण्डाल के अर्थ में, कारु शिल्पी के अर्थ में, श्रेणि सजातीय शिल्प - संघ के अर्थ में, रङ्गाजीव और चित्रकार रँगरेज के अर्थ में, त्वष्टा, तक्षा और वर्धकि बढ़ई के अर्थ में, नाडिंघम और स्वर्णकार सोनार के अर्थ में, नापित और अन्तावसायी नाई के अर्थ में, जाबाल और अजाजीव गड़ेरिया के अर्थ में, देवाजीव और देवल पण्डा पुजारी के अर्थ में, जायाजीव और शैलूष नट के अर्थ में, भृतक और भृतिभुक् मजदूर के अर्थ में, विवर्ण, पामर, नीच, प्राकृत, पृथग्जन, विहीन, अपसद और जाल्म नीच के अर्थ में, भृत्य, दासेर और चेटक सेवक के अर्थ में, पटु, पेशल और दक्ष चतुर के अर्थ में, और लुब्धक बहेलिया के अर्थ में, दिवाकीर्ति चाण्डाल के अर्थ में, पुस्त लीपनेवाले के अर्थ में प्रयुक्त होते मृगयु हैं ॥४३-४७ ॥ १ ख. ग. कक्षरी वं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११३ ९ पञ्चालिका पुत्रिका स्याद्वर्करस्तरुणः पशूः । मञ्जूषा पेटकः ' पेडा तुल्यसाधारणौ समौ प्रतिमा स्यात्प्रतिकृतिर्वर्गा ब्रह्मादयः ॥४८ ॥
स्मृताः इत्यादिमहापुराण आग्नेये क्षत्रविट्शूद्रवर्गनिरूपणं ॥४९ ॥
नाम षट्षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३६६ ॥
अथ सप्तषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः सामान्यनामलिङ्गानि अग्निरुवाच सामान्यान्यथ वक्ष्यामि नामलिङ्गानि तच्छृणु । सुकृती पुण्यवान्धन्यो महेच्छस्तु महाशयः ॥ १ ॥
प्रवीणनिपुणाभिज्ञविज्ञनिष्णातशिक्षिताः । स्युर्वदान्यस्थूललक्षदानशौण्डा कृती कृतज्ञः कुशल आसक्तोद्युक्त उत्सुकः । इभ्य आढ्यः परिवृढो ह्यधिभूर्नायकोऽधिपः बहुप्रदे ॥२ ॥
॥३ ॥
लक्ष्मीवाँल्लक्ष्मणः श्रीलः ` स्वतन्त्रः स्वैर्यपावृतः । खलपूः स्याद्बहुकरो दीर्घसूत्रश्चिरक्रियः जाल्मोऽसमीक्ष्यकारी स्यात्कुण्ठो मन्दः क्रियासु यः । कर्मशूरः कर्मठः स्याद्भक्षको घस्मको ( रो ) ऽद्मरः ॥५ ॥४ ॥ ॥
पञ्चालिका और पुत्रिका गुड़िया के अर्थ में, वर्कर तरुण पशु के अर्थ में, मञ्जूषा, पेटक और पेटा पेटारी के अर्थ में, प्रतिमा और प्रतिकृति मूर्ति के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । इस प्रकार ब्राह्मण आदि वर्गों का वर्णन किया गया है ॥४८-४९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में क्षत्रविट्शूद्रर्गनिरूपण - कथन नामक तीन सौ छाछठवाँ अध्याय समाप्त ॥३६६ ॥
अध्याय ३६७ सामान्यनामलिङ्ग - कथन अग्निदेव बोले - अब मैं सामान्यतः नामलिंगों का वर्णन करूँगा । आप उसे सुनिये । सुकृति, पुण्यवान् और धन्य - ये शब्द पुण्यात्मा और सौभाग्यशाली पुरुष के लिए आते हैं । जिनकी अभिलाषा, आशय या अभिप्राय महान् हों उन्हें महेच्छ और महाशय कहते हैं । प्रवीण, निपुण, अभिज्ञ, विज्ञ, निष्णात और शिक्षित - सुयोग्य एवं कुशल के अर्थ में आते हैं । वदान्य, स्थूललक्ष, दानशौण्ड और बहुप्रद - ये अधिक दान करनेवाले के वाचक हैं । कृती, कृतज्ञ और कुशल - ये भी प्रवीण, चतुर एवं दक्ष के ही अर्थ में आते हैं । आसक्त, उद्युक्त और उत्सुक - ये उद्योगी और कार्यपरायण पुरुष के लिए प्रयुक्त होते हैं । अधिक धनवान् को इभ्य और आदय कहते हैं । परिवृढ, अधिभू, नायक और अधिप-ये स्वामी के वाचक हैं । लक्ष्मीवान्, लक्ष्मण तथा श्रील - ये शोभा और श्री से सम्पन्न पुरुष के अर्थ में आते हैं । स्वतन्त्र, स्वैरी और अपावृत शब्द स्वाधीन अर्थ के बोधक हैं । खलपू और बहुकर - खलिहान या मैदान साफ करनेवाले पुरुष के अर्थ में तथा दीर्घसूत्र और चिरक्रिय - ये आलसी, बहुत विलम्ब से काम पूरा करनेवाले पुरुष के बोधक हैं । बिना विचारे काम करनेवाले को जाल्म और असमीक्ष्यकारी कहते हैं । जो कार्य करने में ढीला हो, वह कुण्ठ कहलाता है । कर्मशूर और कर्मठ - ये उत्साहपूर्वक कार्य करनेवालों के वाचक हैं । खानेवाले को भक्षक, घस्मर और अमर कहते हैं ॥१-६ ॥ १ ख. ग. पेटा । २ ख. ग. ' लक्ष्यदा । ३ क. ग. न्त्रः ' स्थैर्यगौरवः । ख ' । ख. ग. ' न्त्र स्थैर्य आवृ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११४० अग्निपुराणम् लोलुपो गर्धलो गृध्नुर्विनीतप्रश्रितौ तथा प्रगल्भो भीरुको भीरुर्वन्दारुरभिवादके मत्तशौण्डोत्कटक्षीवाश्चण्डस्त्वत्यन्तकोपनः यः सहाञ्चति सध्र्यङ्ग्स ' सतिर्यङ्यस्तिरोऽञ्चति स्याज्जल्प ( ल्पा ) कस्तु वाचालो वाचाटो बहुगर्ह्य वाक् वरणः शब्दनो नान्दीवादी नान्दीकरः समौ विहस्तव्याकुलौ तुल्यौ नृशंसक्रूरघातकाः कदर्ये कृपणक्षुद्रौ मार्गणो याचकार्थिनौ कान्तं मनोरमं रुच्यं हृद्याभीष्टे ह्यभीप्सिते श्रेयाञ्श्रेष्ठः पुष्कलः स्यात्प्राग्र्याग्रीयमग्रियम् । धृष्टे धृष्णुर्वियातश्च निभृतः प्रतिभान्विते ॥ ६ ॥
॥ भूष्णुर्भविष्णुर्भविता ज्ञाता विदुरविन्दुकौ ॥ ७ ॥
। देवानञ्चति देवद्र्यविष्य ' विश्वगञ्चति ॥८ ॥
। वाचोयुक्तिः पटुर्वाग्मी वावदूकश्च वक्तरि ॥ ९ ॥
। अपध्वस्तो धिक्कृतः स्याद्बद्धे कीलितसंयतौ ॥ १० ॥
। व्यसनार्तोपरक्तौ द्वौ बद्धे कीलितसंयतौ ॥ ११ ॥
। पापो धूर्तो वञ्चकः स्यान्मूर्खे वैदेहवालिशौ ॥ १२ ॥
। अहंकारवानहंयुः शुभंयुस्तु शुभान्वितः ॥ १३ ॥
1 । असारं फल्गु शून्यं वै मुख्यवर्यवरेण्यकाः ॥१४ ॥
। वड्रोरुविपुलं पीनपीनी तु स्थूलपीवरे ॥ ॥१५ १५ ॥ ॥ लोलुप, गर्धल और गृध्नु- ये लोभी के पर्याय हैं । विनीत और प्रश्रित - ये विनययुक्त पुरुष का बोध करानेवाले हैं । धृष्णु और वियात - ये धृष्ट के लिए प्रयुक्त होते हैं । प्रतिभाशाली पुरुष के अर्थ में निभृत और प्रगल्भ शब्द का प्रयोग होता है । भीरुक और भीरु- डरपोक के, वन्दारु और अभिवादक प्रणाम करनेवाले के, भूष्णु, भविष्णु और भविता होनेवाले के तथा ज्ञाता, विदुर और विन्दुक- ये जानकार के वाचक हैं । मत्त, शौण्ड, उत्कट और क्षीव - ये मतवाले के अर्थ में आते हैं । चण्ड और अत्यन्तकोपन - ये अधिक क्रोध करनेवाले पुरुष के बोधक हैं । देवताओं का अनुकरण करनेवालों को देवद्र्यङ् और सब ओर जानेवाले को विष्वद्र्यङ् कहते हैं । इसी प्रकार साथ चलनेवाला सथ्र्यङ् और तिरछा चलनेवाला तिर्यङ् कहलाता है । वाचोयुक्ति पटु, वाग्मी और वावदूक- ये कुशलवक्ता के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । बहुत अनाप - शनाप बकनेवाले को जल्पाक, वाचाल, वाचाट और बहुगर्ह्यवाक् कहते हैं । अपध्वस्त और धिक्कृत - ये धिक्कार हुए पुरुष के वाचक हैं । कीलित और संयत शब्द बद्ध ( बँधे हुए ) का बोध करानेवाले हैं ॥६-१० ॥ वरण और शब्दन - ये आवाज करनेवाले के अर्थ में आते हैं । नान्दी पाठ करनेवालों को नान्दीवादी और नान्दीकर कहते हैं । व्यसनार्त और उपरक्त- 5 - ये पीड़ित के अर्थ में आते हैं । विहस्त और व्याकुल - ये शोकाकुल पुरुष का बोध कराते हैं । नृशंस, क्रूर, घातक और पाप - ये दूसरों से द्रोह करनेवाले निर्दय मनुष्य के वाचक हैं । ठग को धूर्त और वञ्चक कहते हैं । वैदेह ( वैधेय ) और वालिश - ये मूर्ख के वाचक हैं । कृपण और क्षुद्र-ये कदर्य ( कंजूस ) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । मार्गण, याचक और अर्थी - ये याचना करनेवाले के अर्थ में आते हैं । अहङ्कारी को अहङ्कारवान् और अहंयु तथा शुभ के भागी को शुभान्वित और शुभंयु कहते हैं । कान्त, मनोरम और रुच्य - ये सुन्दर अर्थ के वाचक हैं । हृद्य, अभीष्ट और अभीप्सित - ये प्रिय के समानार्थक शब्द हैं । असार, फल्गु तथा शून्य - ये निस्सार अर्थ का बोध करानेवाले हैं । मुख्य, वर्य, वरेण्यक, श्रेयान्, श्रेष्ठ और पुष्कल - ये श्रेष्ठ के वाचक हैं । प्राग्र्य, अग्र्य, अग्रीय तथा अग्रिय शब्द भी इसी अर्थ में आते हैं । वडू, उरु और विपुल - ये विशाल अर्थ के बोधक हैं । पीन, पीवन्, स्थूल और पीवर - ये स्थूल या मोटे अर्थ का बोध करानेवाले हैं ॥११-१५ ॥ १ क. ख. ग. ङ. ' था । लिङ्गानि लिङ्गिनः साधुर्निभृ । २ ङ. छ. विश्वविश्वगः । ३ ख. ग. स घूर्णितः प्रचलायितः । वा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation US!
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सप्तषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११४१ स्तोकाल्पक्षुल्लकाः सूक्ष्मं श्लक्ष्णं दभ्रं कृशं तनु अखण्डं पूर्णसकलमुपकण्ठान्तिकाभितः सुदूरे तु दविष्ठं स्याद्वृत्तं निस्तलवर्तुले आविद्धं कुटिलं भुग्नं वेल्लितं वक्रमित्यपि प्रत्यग्रोऽभिनवो ' नव्यो नवीनो नूतनो नवः उच्चावचं नैकभेदं संबाधकलिलं तथा स्फातिवृद्धौ प्रथा ख्यातौ समाहारः समुच्चयः प्रत्याहार उपादानं निर्हारोऽभ्यवकर्षणम् संनिधिः संनिकर्षः स्यात्संक्रमो दुर्गसंचरः परिरम्भः परिष्वङ्गः संश्लेष उपगूहनम् स्तोक, अल्प, क्षुल्लक, सूक्ष्म, श्लक्ष्ण, दभ्र, कृश, ॥ मात्राकुटीलवकणा भूयिष्ठं पुरुहं पुरु ॥ १६ ॥
। समीपे संनिधाभ्यासौ नेदिष्ठं सुसमीपकम् ॥१७ ॥
। उच्चप्रांशून्नतोदग्रा ध्रुवो नित्यः सनातनः ॥ १८ ॥
। चञ्चलं तरलं चैव कठोरं जठरं दृढम् ॥१९ ॥
। एकतानोऽनन्यवृत्तिरुच्चण्डमविलम्बितम् ॥२० ॥
। तिमितं स्तिमितं क्लिन्नमभियोगस्त्वभिग्रहः ॥२१ ॥
। अपहारस्त्वपचयो विहारस्तु परिक्रमः ॥२२ ॥
। विघ्नोऽन्तरायः प्रत्यूहः स्यादास्या त्वासना स्थितिः ॥ २३ ॥
। उपलम्भस्त्वनुभवः प्रत्यादेशो निराकृतिः ॥ २४ ॥
। अनुमा पक्षहेत्वाद्यैर्डिम्बे भ्रमरविप्लवौ ॥२५ ॥
तनु, माया, त्रुटि, लव और कण - ये स्वल्प या सूक्ष्म अर्थ के वाचक हैं । भूयिष्ठ, पुरुह और पुरु - ये अधिक अर्थ के बोधक हैं । अखण्ड, पूर्ण और सकल - ये समग्र के वाचक हैं । उपकण्ठ, अन्तिक, अभितः, संनिधि और अभ्यास - ये समीप अर्थ में आते हैं । अत्यन्त निकट को नेदिष्ठ कहते हैं । बहुत दूर के अर्थ में दविष्ठ शब्द का प्रयोग होता है । वृत्त, निस्तल और वर्तुल - ये गोलाकार के वाचक हैं । उच्च, प्रांशु, उन्नत और उदग्र - ये ऊँचा के अर्थ में आते हैं । ध्रुव, नित्य और सनातन - ये नित्य अर्थ के बोधक हैं । आविद्ध, कुटिल, भुग्न, वेल्लित और वक्र - ये टेढ़े का बोध करानेवाले हैं । चञ्चल और तरल - ये चपल के अर्थ में आते हैं । कठोर, जठर और दृढ़ - ये समानार्थक शब्द हैं । प्रत्यग्र, अभिनव, नव्य, नवीन, नूतन और नव - ये नये के अर्थ में आते हैं । एकतान और अनन्यवृत्ति - ये एकाग्र चित्तवाले पुरुष के बोधक हैं । उच्चण्ड और अविलम्बित - ये फुर्ती के वाचक हैं । उच्चावच और नैकभेद - ये अनेक प्रकार के अर्थ में आते हैं । सम्बाध और कलित - ये संकीर्ण एवं गहन के बोधक हैं । तिमित, स्तिमित और क्लिन्न - ये आर्द्र या भीगे हुए के अर्थ में आते हैं । अभियोग और अभिग्रह-ये दूसरे पर किये हुए दोषारोपण के नाम हैं । स्फाति शब्द वृद्धि के और प्रथा शब्द ख्याति के अर्थ में आता है । समाहार और समुच्चय - ये समूह के वाचक हैं । अपहार और अपचय - ये ह्रास का बोध करानेवाले हैं । विहार और परिक्रम-ये घूमने के अर्थ में आते हैं ॥१६-२२ ॥ प्रत्याहार और उपादान - ये इन्द्रियों को विषयों से हटाने के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । निर्हार तथा अभ्यवकर्षण - ये शरीर में धँसे हुए शस्त्रादि को युक्तिपूर्वक निकालने के अर्थ में आते हैं । विघ्न, अन्तराय और प्रत्यूह - ये विघ्न का बोध करानेवाले हैं । आस्या, आसना और स्थिति - ये बैठने की क्रिया के बोधक है । संनिधि और संनिकर्ष - ये समीप रहने के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । किले में प्रवेश करने की क्रिया को संक्रम और दुर्ग - संचर कहते हैं । उपलम्भ और अनुभव - ये अनुभूति के नाम हैं । प्रत्यादेश और निराकृति - ये दूसरे के मत का खण्डन करने में आते हैं । परिरम्भ, परिष्वङ्ग, संश्लेष और उपगूहन - ये आलिंगन के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । पक्ष और हेतु आदि के द्वारा निश्चित होनेवाले ज्ञान का नाम अनुमा या अनुमान है । बिना हथियार की लड़ाई १ ख. ग. ‘ व्योह्मस्त्रमत्यन्तपश्चिमम् । ए ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११४२ अग्निपुराणम् असंनिकृष्टार्थज्ञानं शब्दाद्धि शाब्दमीरितम् । सादृश्यदर्शनात्तुल्ये बुद्धिः स्यादुपमानकम् ॥ २६ ॥
कार्यं दृष्ट्वा विना न स्यादर्थापत्तिः परार्थधीः । प्रतियोगिन्यगृहीते भुवि नास्तीत्यभावकः || २७ || ` इत्यादिनामलिङ्गो हि ' हरिरुक्तो नृबुद्धये ॥२८ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये सामान्यनामकथनं नाम सप्तषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६७ ॥
अथाष्टषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः प्रलयवर्णनम् अग्निरुवाच चतुर्विधस्तु प्रलयो नित्यो यः प्राणिनां लयः । सदा विनाशो जातानां ब्राह्मो नैमित्तिको लयः ॥ १ ॥
चतुर्युगसहस्रान्ते प्राकृतः प्रकृतौ लयः । लय आत्यन्तिको ज्ञानादात्मनः परमात्मनि ॥२ ॥
नैमित्तिकस्य कल्पान्ते वक्ष्ये रूपं लयस्य ते । चतुर्युगसहस्रान्ते क्षीणप्राये महीतले ॥३ ॥
तथा भयभीत होने पर किये हुए शब्द का नाम डिम्ब, भ्रमर ( या डमर ) तथा विप्लव है । शब्द के द्वारा जो परोक्ष अर्थ का ज्ञान होता है, उसे शब्दज्ञान कहते हैं । समानता देखकर जो उसके तुल्य वस्तु का बोध होता है, उसका नाम उपमान है । जहाँ कोई कार्य देखकर कारण का निश्चय किया जाय, अर्थात् अमुक कारण के बिना यह कार्य नहीं हो सकता है - इस प्रकार विचार करके जो दूसरी वस्तु अर्थात् कारण का ज्ञान प्राप्त किया जाय, उसे अर्थापत्ति कहते हैं । प्रतियोगी का ग्रहण न होने पर जो ऐसा कहा जाता है कि ' अमुक ' वस्तु पृथ्वी पर नहीं है उसका नाम अभाव है । इस प्रकार मनुष्यों का ज्ञान बढ़ाने के लिए मैंने नाम और लिङ्गस्वरूप श्रीहरि का वर्णन किया है ॥२३-२८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में सामान्यनाम - कथन नामक तीन सौ सरसठवाँ अध्याय समाप्त ॥३६७ ॥
अध्याय ३६८ प्रलय - वर्णन अग्निदेव बोले - प्रलय के चार प्रकार हैं । उत्पन्न वस्तुओं और प्राणियों का सदा विनाश होते ब्रह्ममय समस्त सृष्टि का नाश होना ' नैमित्तिक लय ' और चारों रहना ' नित्यलय ', समस्त वस्तुओं का प्रकृति में लीन युगों के सहस्र बार व्यतीत होने पर प्रकृतिजनित ' आत्यन्तिक लय ' कहलाता हो जाना ' प्राकृत लय ' तथा ज्ञान द्वारा आत्मा का परमात्मा में लीन हो जाना है । ( अब ) मैं उस नैमित्तिक लय का विवरण बता रहा हूँ जो कल्प चारों युगों के सहस्र बार व्यतीत होने और भूमण्डल के क्षीणप्राय के अन्त में होने पर सम्भव होता है ॥१-३ ॥ उस समय १ ‘ इत्यादि “ नृबुद्धये ' नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । २ ख. ग. ' क्तो न दृश्यते । इ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अष्टषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११४३ अनावृष्टिरतीवोग्रा जायते शतवार्षिकी स्थितो जलानि पिबति भानोः सप्तसु रश्मिषु ततस्तस्यानुभावेन तोयाहारोपबृंहिताः दहन्त्यशेषं त्रैलोक्यं सपातालतलं द्विज शेषा हि श्वाससंपातः ' पातालानि दहत्यधः अम्बरीषमिवाऽऽभाति त्रैलोक्यमखिलं तथा गच्छन्ति ते महर्लोकं महर्लोकाज्जनं ततः । उत्तिष्ठन्ति ततो मेघा नानारूपाः सविद्युतः । सप्तर्षिस्थानमाक्रम्य स्थितेऽम्भसि शतं मरुत् । वायुं पीत्वा हरिः शेषे शेते चैकार्णवे प्रभुः । आत्ममायामयीं दिव्यां योगनिद्रां समास्थितः । कल्पं शेते प्रबुद्धोऽथ ब्रह्मरूपी सृजत्यसौ ॥ ततः सत्त्वक्षयः स्याच्च ततो विष्णुर्जगत्पतिः ॥४ ॥
। भूपातालसमुद्रादितोयं नयति संक्षयम् ॥५ ॥
। त एव रश्मयः सप्त जायन्ते सप्त भास्कराः ॥ ६ ॥
। कूर्मपृष्ठसमा भूः स्यात्ततः कालाग्निरुद्रकः ॥७ ॥
। पातालेभ्यो भुवं विष्णुर्भुवः स्वर्गं दहत्यतः ॥८ ॥
। ततस्तापपरीतास्तु लोकद्वयनिवासिनः ॥९ ॥
रुद्ररूपी जगद्दग्ध्वा मुखनिःश्वासतो हरेः ॥ १० ॥
शतं वर्षाणि वर्षन्तः शमयन्त्यग्निमुत्थितम् ॥११ ॥
मुखनिःश्वासतो विष्णोर्नाशं नयति तान्घनान् ॥१२ ॥
ब्रह्मरूपधरः सिद्धैर्जलगैर्मुनिभिः स्तुतः ॥१३ ॥
आत्मानं वासुदेवाख्यं चिन्तयन्मधुसूदनः ॥१४ ॥
द्विपरार्धं ततो व्यक्तं प्रकृतौ लीयते द्विज ॥ १५ ॥
सौ वर्षों तक निरन्तर अत्यन्त भीषण अनावृष्टि होती रहती है, जिससे समस्त प्राणियों का संक्षय हो जाता है । जगदीश्वर भगवान् विष्णु सूर्य की सातों किरणों में स्थित रहकर समस्त जल पी जाते हैं । इस प्रकार पृथिवी, पाताल और समुद्र आदि के जल के सूख जाने पर जल पीने के कारण बढ़ी हुई सूर्य की वे सातों किरणें ( पृथक् - पृथक् ) सात सूर्य के रूप में परिणत हो जाती हैं । अये द्विज! उन्हीं सातों सूर्यों द्वारा पाताल तल आदि समस्त त्रैलोक्य के भस्मसात् होने पर यह पृथ्वी कछुवे की पीठ की भाँति कठोर हो जाती है । ( सर्वप्रथम ) कालाग्निरूपी रुद्रदेव नागराज शेष के श्वास द्वारा पाताल को भस्म करते हैं । पाताल से निकली हुई अग्नि द्वारा पृथिवी तथा पृथिवी से निकली हुई अग्नि द्वारा विष्णुदेव स्वर्ग को भस्म कर डालते हैं । उस समय यह सम्पूर्ण त्रैलोक्य जलती हुई भट्ठी की भाँति दिखायी देता है । तत्पश्चात् उस अग्नि से संतप्त होकर दोनों लोकों के निवासी प्राणी महर्लोक को चले जाते हैं और महर्लोक से पुनः जनलोक की यात्रा प्रारम्भ करते हैं ॥४ - ९ ३ ॥ रुद्ररूपी कालाग्नि द्वारा सम्पूर्ण संसार के जल जाने पर भगवान् विष्णु के नि: श्वास द्वारा विद्युत् समेत अनेक भाँति के मेघ उत्पन्न होते हैं, जो सौ वर्ष तक निरन्तर बरसते हुए इस प्रचण्ड अग्नि को शान्त कर देते हैं । सप्तर्षि के स्थान में पहुँचकर वायु इस ( अगाध ) जल में सौ वर्ष तक ठहरकर भगवान् विष्णु के निःश्वास से उत्पन्न हुए उन मेघों को नष्ट करता रहता है । उस समय ब्रह्मरूपधारी प्रभु नारायण देव वायु पान करते हुए उस एकार्णव में शयन करते हैं, जिनकी स्तुति सिद्ध और मुनिगण वहाँ भी पहुँचकर किया करते हैं । इस प्रकार भगवान् मधुसूदन अपनी मायारूपी और दिव्यरूपवाली उस योगनिद्रा को प्राप्तकर अपने को वासुदेव के रूप में समझते हुए शयन करते रहते हैं । एक कल्प तक शयन करने के अनन्तर ब्रह्मस्वरूप नारायण देव जागकर पुन: इस संसार का निर्माण करते हैं और द्विज! व्यक्त रूप यह सारा ब्रह्माण्ड द्विपरार्ध काल तक प्रकृति में लीन १ छ. ' पातात्पाता । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११४४ अग्निपुराणम् स्थानात्स्थानं दशगुणमेकस्माद्गुण्यते ' स्थले । ततोऽष्टादशमे ( के ) भागे परार्धमभिधीयते ॥ १६ ॥
परार्धं द्विगुणं यत्तु प्राकृतः प्रलयः स्मृतः । आनवृष्ट्याऽग्निसंपर्कात्कृते संज्वलने द्विज ॥१७ ॥
महदादेर्विकारस्य विशेषान्तस्य संक्षये । कृष्णेच्छाकारिते तस्मिन्संप्राप्ते प्रतिसंचरे ॥ || १८ || आपो ग्रसन्ति वै पूर्वं भूमेर्गन्धादिकं गुणम् । ' आत्मगन्धा ततो भूमिः प्रलयत्वाय कल्पते ॥ १ ९ ॥ रसात्मिकाश्च तिष्ठन्ति ह्यापस्तासां रसो गुणः । पीयते ज्योतिषा तासु नष्टास्वग्निश्च दीप्यते || २० || ज्योतिषोऽपि गुणं रूपं वायुर्ग्रसति भास्क ( स्व ) रम् । नष्टे ज्योतिषि वायुश्च बली दोधूयते महान् ॥ २१ ॥
वायोरपि गुणं स्पर्शमाकाशं ग्रसते ततः । वायौ नष्टे तु चाऽऽकाशं नीरवं तिष्ठति द्विज ॥२२ ॥
आकाशस्याथ वै शब्दं भूतादिग्रसते च खम् | अभिमानात्मकं खं च भूतादिं ग्रसते महान् || २३ || भूमिर्याति लयं चाप्सु आपो ज्योतिषि तद्व्रजेत् । वायौ वायुश्च खे खं च अहंकारे लयं स च ॥२४ ॥
महत्तत्त्वे महान्तं च प्रकृतिर्ग्रसते द्विज । व्यक्ताऽव्यक्ता च प्रकृतिर्व्यक्तस्याव्यक्तके लयः ॥ २५ ॥
पुमानेकाक्षरः शुद्धः सोऽप्यंशः परमात्मनः ॥ प्रकृतिः पुरुषश्चैतौ लीयते परमात्मनि ॥ २६ ॥
न सन्ति यत्र सर्वेशे नामजात्यादिकल्पनाः । सत्तामात्रात्मके ज्ञेये ज्ञानात्मन्यात्मनः परे ॥ २७ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये नित्यनैमित्तिकप्राकृतप्रलयवर्णनं नामाष्टषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६८ ॥
रहता है । एक संख्या को दस से गुणा करके उसे पुनः आठ बार दस - दस से गुणा करने पर जो संख्या बनती है उसे परार्ध कहा जाता है । अये द्विज! परार्ध के दुगुने समय तक प्राकृतिक वस्तुओं आदि का प्रकृति में लीन रहना प्राकृत लय कहलाता है । यह अनावृष्टि और अग्निदाह द्वारा उत्पन्न होता है ॥ १०-१७ ॥ भगवान् कृष्ण की इच्छा से जनित उस प्रलय में महदादि विकारों का उस अपने विशेष ( सूक्ष्मताओं ) में लीन होने पर जल सर्वप्रथम भूमि के गन्धादि गुणों को नष्ट करता है । तत्पश्चात् गन्धहीन होने पर पृथिवी नष्ट हो जाती है । केवल रसात्मक वस्तुएँ और जल ही शेष रह जाते हैं, किन्तु उनके रस रूपी गुण को तेज पी जाता है, जिससे नष्ट हुई अग्नि पुनः हो जाती है । उसी प्रकार तेज के उस रोचनशील गुण को वायु ग्रसित कर लेता है, जिसके कारण प्रदीप्त नष्ट होने पर वायु अत्यन्त प्रचण्ड होकर सबको कम्पित करने लगता है । अयं द्विज उस ज्योति के नष्ट कर देता है और वायु के विनष्ट होने पर आकाश! वायु के स्पर्श गुण को आकाश के शब्द रूपी गुण को भूत ( सूक्ष्म तत्त्व ) नितान्त नीरव हो जाता है ॥१८-२२ ॥ उस समय आकाश करता है । इस प्रकार आदि नष्ट करते हैं और अहंकार उन तत्त्वों को तथा उन्हें महान् नष्ट पृथ्वी का लय जल में और जल का लय तेज में, तेज का लय वायु में, वायु का लय आकाश में और आकाश का लय अहंकार में हो जाता है । अये द्विज! प्रकृति महान् को महत्तत्त्व व्यक्त और अव्यक्त दोनों है । व्यक्त का अव्यक्त में लय होता में विलीन करती है । प्रकृति है, प्रकृति के साथ उस परमात्मा में विलीन है । एकाक्षर तथा शुद्ध पुरुष जो परमात्मा का ही अंश है तथा जो केवल सत्तामात्र होता है जिस सर्वेश्वर में नाम और जाति आदि की कल्पना नहीं होती , ज्ञानात्मा, आत्मा से परे और ज्ञेय रूप है ॥ २३-२७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नित्यनैमित्तिकप्राकृतप्रलय - वर्णन नामक तीन सौ अरसठवाँ अध्याय समाप्त ॥३६८ ॥
१ क. ख. ग. मुने । २ क. ख. सलयः । ३ छ. विशाषा । ४ ख. ग. आत्तगन्धा CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation । USA ,
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एकोनसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११४५ अथैकोनसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः आत्यन्तिकलयगर्भोत्पत्त्योर्निरूपणम् अग्निरुवाच आत्यन्तिकं लयं वक्ष्ये ज्ञानादात्यन्तिको लयः । आध्यात्मिकादिसंतापं ज्ञात्वा स्वस्य विरागतः ॥ १ ॥
आध्यात्मिकस्तु संतापः शारीरो मानसो द्विधा । शारीरो बहुभिर्भेदैस्तापोऽसौ श्रूयतां द्विज ॥२ ॥
( ' त्यक्त्वा जीवो भोगदेहं ' गर्भमाप्नोति कर्मभिः । आतिवाहिकसंज्ञस्तु देहो भवति वै द्विज ॥३ ॥
केवलं स मनुष्याणां मृत्युकाल उपस्थिते । याम्यैः पुंभिर्मनुष्याणां तच्छरीरं द्विजोत्तम ) ॥४ ॥
नीयते याम्यमार्गेण नान्येषां प्राणिनां मुने । ततः स्वर्याति नरकं स भ्रमेर्घ ( द्ध ) टयन्त्रवत् ॥५ ॥
कर्मभूमिरियं ब्रह्मन्फलभूमिरसौ स्मृता । यमो योनि ( नी ) श्च नरकान्निरूपयति कर्मणा ॥६ ॥
पूरणीयाश्च तेनैव यमं चैवानुपश्यताम् । वायुभूताः प्राणिनश्च गर्भं ते प्राप्नुवन्ति हि ॥७ ॥
यमदूतैर्मनुष्यस्तु नीयते तं च पश्यति । धर्मी च पूज्यते तेन पापिष्ठस्ताड्यते गृहे ॥८ ॥
शुभाशुभं कर्म तस्य चित्रगुप्तो निरूपयेत् । बान्धवानामशौचे तु देहे खल्वातिवाहिके ॥ ९ ॥
अध्याय ३६ ९ आत्यन्तिकलयगर्भोत्पत्तिनिरूपण अग्निदेव बोले- ( अब ) मैं उस आत्यन्तिक लय का वर्णन कर रहा हूँ जो ज्ञान के द्वारा प्राप्त होता है और वह ज्ञान अपने आध्यात्मिक आदि संताप के जान लेने पर ही विराग द्वारा उत्पन्न होता है । अये द्विज! शारीरिक और मानसिक भेदों से वह आध्यात्मिक संताप दो प्रकार का होता है । शारीरिक संताप अनेक भेदोंवाला होता है, उन्हें सुनो । अये द्विज! यह जीव अपने भोग शरीर का त्याग करके कर्मानुसार गर्भ में जाता है । उस समय उसकी ' अतिवाहिक ' संज्ञा होती है । द्विजोत्तम! मनुष्यों का मृत्युकाल उपस्थित होने पर यम के दूतगण दक्षिण रास्ते से उनका शरीर यमपुरी पहुँचा देते हैं । तत्पश्चात् वह जीव वहाँ पहुँचकर नीचे - ऊपर होनेवाले घटयन्त्र की भाँति अपने कर्मानुसार स्वर्ग और नरक आया - जाया करता है । अये मुने! अन्य प्राणियों के लिए वैसी व्यवस्था नहीं है ॥१-५ ॥ ब्रह्मन्! यह लोक कर्मभूमि है और परलोक फलभूमि । यमराज जीव को उसके कर्मानुसार भिन्न - भिन्न योनियों तथा नरकों में डाला करते हैं । यमराज ही जीवों द्वारा नरकों को भरते हैं । वे ही इनके नियामक हैं । जीव वायु रूप होकर गर्भ में प्रविष्ट होते हैं । यम के दूतों द्वारा मनुष्य वहाँ पहुँचकर यमराज का दर्शन करता है । धार्मिक होने से यमराज द्वारा वहाँ उसका सुसम्मान होता है और पापी होने से उसे ताड़ना मिलती है । वहाँ चित्रगुप्त उसके शुभाशुभ कर्म को बता देते हैं । अये धर्मज्ञ! वह अतिवाहिक संज्ञक जीव अन्त्येष्टि क्रिया में बान्धवों द्वारा दिये गये पिण्डदान भोजन १ ' त्यक्त्वा ' ' द्विजोत्तम ' च पुस्तके नास्ति । २ क. ङ. ' हं सर्वमा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११४६ अग्निपुराणम् तिष्ठन्नयति धर्मज्ञ दत्तपिण्डाशनं ततः । वसेत्क्षुधातृषायुक्त आमश्राद्धान्नभुङ्नरः । न हि मोक्षमवाप्नोति पिण्डांस्तत्रैव सोऽश्नुते । प्रेतदेहं समुत्सृज्य भोगदेहं प्रपद्यते । भुक्त्वा तु भोगदेहेन ' कर्मबन्धान्निपात्यते । पापे तिष्ठति चेत्स्वर्गं तेन भुक्तं तदा द्विज । भुक्त्वा तु पापं वै पश्चाद्येन भुक्तं त्रिविष्टपम् । पुण्ये तिष्ठति चेत्पापं तेन भुक्तं तदा भवेत् । कर्मण्यल्पावशेषे तु नरकादपि मुच्यते । जीवः प्रविष्टो गर्भं तु कललेऽप्यत्र तिष्ठति । चतुर्थेऽस्थीनि त्वङ्मासं पञ्चमे रोमसंभवः ।
जरायुवेष्टिते देहे मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिस्तथा ।
तं त्यक्त्वा प्रेतदेहं तु प्राप्यान्यं प्रेतलोकतः ॥ १० ॥
आतिवाहिकदेहात्तु प्रेतपिण्डैर्विना नरः ॥११ ॥
कृते सपिण्डीकरणे नरः सम्वत्सरात्परम् ॥१२ ॥
भोगदेहावुभौ प्रोक्तावशुभा ( भ ) शुभसंज्ञितौ ॥१३ ॥
तं देहं परतस्तस्माद्भक्षयन्ति निशाचराः ॥ १४ ॥
तदा द्वितीयं गृह्णाति भोगदेहं तु पापिनाम् ॥१५ ॥
शुचीनां श्रीमतां गेहे स्वर्गभ्रष्टोऽभिजायते ॥१६ ॥
तस्मिन्संभक्षिते देहे शुभं गृह्णाति विग्रहम् ॥१७ ॥
मुक्तस्तु नरकाद्याति तिर्यग्योनिं न संशयः ॥ १८ ॥
घनीभूतं द्वितीये तु तृतीयेऽवयवास्ततः ॥ १ ९ ॥
षष्ठे चेतोऽथ जीवस्य दुःखं विन्दति सप्तमे ॥ २० ॥
मध्ये क्लीवं तु वामे स्त्री दक्षिणे पुरुषस्थितिः ॥ २१ ॥
से वञ्चित ही रह जाता है क्योंकि उसे उसके त्यागपूर्वक प्रेतलोक से प्राप्त अनेक प्रेतशरीर को धारण करके सदैव भूख - प्यास से व्याकुल ही रहना पड़ता है । उस आम ( कच्चा ) श्राद्ध - भोजी प्राणी प्रेत पिण्डदान के बिना अपने उस आतिवाहिक शरीर से मुक्त नहीं हो पाता है । इसलिए वह उन्हीं पिण्डों का भोजन करता है । इस प्रकार सपिण्डन हो जाने पर वर्ष के अनन्तर वह प्राणी उस प्रेत शरीर को त्यागकर भोग देह धारण करता है ॥६-१२३ ॥ यह दोनों शुभ और अशुभ संज्ञक देह भोगदेह की कही जाती है जिनके द्वारा वह फलों के उपभोगपूर्वक अपने कर्मबन्धन को शिथिल करता है । उस देह के पतित होने पर राक्षसगण उसका भक्षण कर जाते हैं । अये द्विज! उस पापी अवस्था में भी उसे स्वर्ग का उपभोग प्राप्त होता है किन्तु उस समय उसे दूसरी ( शुभ ) भोगदेह प्राप्त हो जाती है । पाप का परिणाम भोगने के अनन्तर वह जीव जो स्वर्ग - सुख का भी अनुभव कर लेता है और भी सम्पन्न तथा पवित्र कुल में जन्म ग्रहण करता है । उस पुण्य कुल एवं अवस्था में रहते हुए भी उसे पाप के परिणाम भोगने पड़ते हैं किन्तु पश्चात् उसे शुभ शरीर की प्राप्ति हो जाती है । कुछ थोड़े से कर्म शेष रहने पर उसे नरक से मुक्त कर दिया जाता है किन्तु वहाँ से मुक्त होने पर भी उसे तिर्यग् ( पक्षी ) आदि की योनि प्राप्त होती है, इसमें सन्देह नहीं है ॥१३-१८ ॥ जीव जिस गर्भ में प्रविष्ट होता है उसमें पहले मास में ( स्त्री - पुरुष के रज - वीर्य का ) कलल होता है अर्थात् कल - कल शब्द होते हुए वह पकता है । दूसरे मास में वह घनीभूत होता है, तीसरे मास में उसमें अवयव उत्पन्न होते हैं, चौथे मास में हड्डियाँ, चमड़े और मांस बन जाते हैं और पाँचवें मास में रोम उत्पन्न हो जाते हैं । इस प्रकार शरीर के सर्वाङ्ग सम्पन्न होने पर छठे मास में उसमें जीव प्रविष्ट होता मास में उसे ( नाना प्रकार के ) कष्टों का अनुभव होने लगता है । जरायुवेष्टित है और सातवें वह प्राणी गर्भ के भीतर नपुंसक होने पर मध्य देह में रहकर सिर से अञ्जलि लगाये में, स्त्री होने पर बायें और पुरुष होने पर दाहिनी ओर स्थित रहता १. क. ख. ग. में स्वर्गान्नि । २ क.. ख. ङ. पततस्त ' । ३ क. ख. पातितम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA