अग्नि पुराण — पृष्ठ 1151–1160
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1151–1160
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एकोनसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११४७ तिष्ठत्युदरभागे तु पृष्ठस्याभिमुखस्तथा । यस्यां तिष्ठत्यसौ योनौ तां स वेत्ति न संशयः ॥ २२ ॥
सर्वं च वेत्ति वृत्तान्तमारभ्य ' नरजन्मनः । ' अन्धकारे च महतीं पीडां विन्दति मानवः ॥२३ ॥
मातुराहारपीतं तु सप्तमे मास्युपाश्नुते । अष्टमे नवमे मासि भृशमुद्विजते तथा ॥ २४ ॥
व्यवायपीडामाप्नोति मातुर्व्यायामके तथा । व्याधिश्च व्याधितायां स्यान्मुहूर्तं शतवर्षवत् ॥ २५ ॥
संतप्यते कर्मभिस्तु कुरुतेऽथ मनोरथान् । गर्भाद्विनिर्गतो ब्रह्मन्मोक्षज्ञानं करिष्यति ॥ २६ ॥
सूतिवातैरधोभूतो निःसरेद्योनियन्त्रतः । पीड्यमानो मासमात्रं करस्पर्शेन दुःखितः ॥२७ ॥
खशब्दात्क्षुद्रश्रोतांसि देहे श्रोत्रं विविक्तता । श्वासोच्छ्वासौ गतिर्वायोर्वक्रसंस्पर्शनं तथा ॥ २८ ॥
अग्रे रूपं दर्शने स्यादूष्मा पङ्क्तिश्च पित्तकम् । मेधा वर्णं बलं छाया तेजः शौर्यं शरीरके ॥ २ ९ ॥ जलात्स्वेदश्च रसनं देहे वै संप्रजायते । ' क्लेदो वसा रसा रक्तं शक्रमूत्रकफादिकम् ॥३० ॥
भूमेर्घाणं ' केशनखं रोमं च शिरसस्तथा । मातृजानि मृदून्यत्र त्वङ्मांसहृदयानि च ॥ ३१ ॥
नाभिर्मज्जा शकृन्मेदः क्लेदान्यामाशयानि च । पितृजानि शिरा स्नायुः शुक्रं चैवाऽऽत्मजानि तु ॥३२ ॥
कामक्रोधौ भयं हर्षो धर्माधर्मात्मता तथा । आकृतिः स्वरवर्णौ तु मेहनाद्यं तथा च यत् ॥३३ ॥
तामसानि तथा ज्ञानं प्रमादालस्यतृक्षुधाः । मोहमात्सर्यवैगुण्यशोकायासभयानि च ॥३४ ॥
है । पीठ की ओर मुख किये स्थित रहता है । जिस योनि में वह रहता है उसे उसका पूर्ण ज्ञान रहता है इसमें संशय नहीं । उसे अपने पूर्व जन्म के समस्त वृत्तान्त का वहाँ स्मरण होता है तथा उस अंधकार में उसे मार्मिक पीड़ा का घोर अनुभव भी होता है ॥१९ -२३ ॥ सातवें मास में माँ के अन्न - जल को प्राप्त करता है । इसी प्रकार आठवें, नवें मास में उसे अत्यन्त उद्विग्न होना पड़ता है । उसे माँ के शारीरिक परिश्रम की पीड़ा का अनुभव होता है । इतना ही नहीं, अपितु माता में किसी प्रकार की व्याधि उत्पन्न होने पर उसको मुहूर्त्त मात्र में सौ वर्ष की पीड़ा का अनुभव होने लगता है । उस समय वह अपने कर्म - बन्धनों से संतप्त होता है और उसमें अनेक प्रकार के मनोरथ उत्पन्न हो जाते हैं । ‘ अये ब्रह्मन्! इस गर्भ से निकलकर मैं मोक्ष - ज्ञान ही प्राप्त करूँगा ' - इस प्रकार की प्रार्थना करता है । पश्चात् प्रसूतिवायु द्वारा नीचे जाकर योनि - यन्त्र के बाहर निकलता है जो एक मास तक पीड़ित और कर - स्पर्श से दुःखी हो जाया करता है । उसकी देह में आकाश शब्द द्वारा दोनों कानों के निर्माण एवं उसकी विविक्तता होती है और वायु द्वारा श्वास, उच्छ्वास, गति और स्पर्श, अग्नि द्वारा ( सबके ) रूप को देखना तथा ऊष्मा, पङ्क्ति, पित्त, बुद्धि, वर्ण, बल, छाया, तेज और शौर्य उत्पन्न होते हैं । उसी प्रकार जल द्वारा स्वेद, जिह्वा, क्लेद, वसा, रस, रक्त, वीर्य, मूत्र और कफ आदि उत्पन्न होते हैं ॥ २४-३० ॥ पृथ्वी द्वारा नाक, केश, नाखून, सिर के लोम तथा मातृजन्य ( माता के अनुसार ) कोमल त्वचा, मांस और हृदय का निर्माण होता है । नाभि, मज्जा, यकृत, मेदा, आमाशय, नाड़ी, स्नायु, वीर्य, काम, क्रोध, भय, हर्ष, धर्म, अधर्म, आकृति, स्वर - वर्ण तथा लिंग आदि की रचना पिता के अनुसार होती है । ज्ञान, प्रमाद, आलस्य, भूख, प्यास, मोह, मात्सर्य, गुणहीनता, शोक, आयास और भय तमोगुण द्वारा उत्पन्न होते १ क. ख. ङ. ‘ नवज ' । २ छ. अन्धकारं । ३ छ. ' वाये पी ' । ४ ख. ग. ' तः ॥ शब्दादिक्षुद्रस्रोतांसि देहे श्रोताविधिं तथा । श्वा ' । ५ ख. ग. ' दो रक्तं वसारक्तं शु । ६ छ. खं गौरवं स्थिरतोऽस्थितः । मा । ७ ख. ग. मार्थता । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११४८ अग्निपुराणम् कामक्रोधौ तथा शौर्यं यज्ञेप्सा बहुभाषिता धर्मेप्सा मोक्षकामित्वं परा भक्तिश्च केशवे चपलः क्रोधनो भीरुर्बहुभाषी कलिप्रियः अकालपलितः क्रोधी महाप्राज्ञो रणप्रियः ( ' स्थिरमित्रः स्थिरोत्साहः स्थिराङ्गो द्रविणान्वितः रसस्तु प्राणिनां देहे जीवनं रुधिरं तथा धारणं त्वस्थिमज्जा स्यात्पूरणं वीर्यवर्धनम् ओजः शुक्रात्सारतरमापीतं हृदयोपगम् षट् त्वचा बाह्यतो यद्वदन्या रुधिरधारिका ' पञ्चमीमिन्द्रियस्थानं ' षष्ठी प्राणधरा मता । अहंकारः परावज्ञा राजसानि महामुने ॥ ३५ ॥
। दाक्षिण्यं व्यवसायित्वं सात्त्विकानि विनिर्दिशेत् ॥ ३६ ॥
। स्वप्ने गगनश्चैव बहुवातो नरो भवेत् ॥ ३७ ॥ ॥ स्वप्ने च दीप्तिमत्प्रेक्षी बहपित्तो नरो भवेत् || ३८ ||
। स्वप्ने जलसितालोकी बहुश्लेष्मा नरो भवेत् ) ॥ ३ ९ ॥ । लेपनं च तथा मांसं मेहस्नेहकरं तु तत् ॥ ४० ॥
। शुक्रवीर्यकरं ह्योजः प्राणकृतज्जीवसंस्थितिः ॥४१ ॥
। षडङ्गं सक्थिनी सक्थिनी बाहुमूर्धाजठरमीरितम् ॥४२ ॥
। किलासधारिणी चान्या चतुर्थी कुण्डधारिणी ॥ ४३ ॥
। कला सप्तमी मांसधरा द्वितीया रक्तधारिणी ॥ ४४ ॥
हैं । काम, क्रोध, शौर्य, यज्ञ की इच्छा, बहुभाषिता, अहंकार, दूसरे की अवहेलना करना रजोगुण द्वारा उत्पन्न होते हैं । उसी प्रकार धर्म की इच्छा, मोक्ष की कामना, भगवान् की उत्तम भक्ति, दाक्षिण्य और व्यवसायी होना सत्त्वगुण द्वारा प्राप्त होते हैं । वायु की अधिकता से मनुष्य चपल, क्रोधी, भीरु, बहुभाषी, कलहप्रिय और स्वप्न में आकाश की यात्रा करनेवाला होता है ॥ ३१-३७ ॥ जिसके असमय में ही बाल सफेद हो जायँ, जो क्रोधी, महाबुद्धिमान् और युद्ध को पसन्द करनेवाला हो, जिसे सपने में प्रकाशमान वस्तुएँ अधिक दिखायी देती हों, उसे पित्तप्रधान प्रकृति का मनुष्य समझना चाहिए । जिसकी मैत्री, उत्साह और अंग सभी स्थिर हों, जो धन आदि से सम्पन्न हो तथा जिसे स्वप्न में जल एवं श्वेत पदार्थ का अधिक दर्शन होता है, उस मनुष्य में कफ की प्रधानता रहती है । प्राणियों के शरीर में रस जीवन देनेवाला होता है, रक्त लेपन का कार्य करता है तथा मांस मेहन एवं स्नेहन क्रिया का प्रयोजक है । हड्डी और मज्जा का काम है शरीर को धारण करना । वीर्य की वृद्धि शरीर को पूर्ण बनानेवाली होती है । ओज शुक्र एवं वीर्य का उत्पादक है वही जीव की स्थिति एवं प्राण की रक्षा करनेवाला है । ओज शुक्र की अपेक्षा भी अधिक सार वस्तु है । वह हृदय के समीप रहता है । और उसका रंग पीला होता है । दोनों जंघे ( ये समस्त पैर के उपलक्षण हैं ), दोनों भुजाएँ, उदर और मस्तक कुछ - कुछ - ये छह अंग बताये गये हैं । त्वचा के छह स्तर हैं । एक तो वही है, जो बाहर दिखायी देती है । दूसरी वह है, जो रक्त धारण करती है । तीसरी किलास ( धातु - विशेष ) और चौथी कुण्ड ( धातु - विशेष ) को धारण करनेवाली इन्द्रियों का स्थान है और छठी प्राणों को धारण करनेवाली है । पाँचवीं त्वचा मानी गयी है । कला भी सात प्रकार की है - पहली मांस धारण करनेवाली, दूसरी रक्तधारिणी, तीसरी जिगर एवं प्लीहा को आश्रय देनेवाली, चौथी मेदा और अस्थि १ ' स्थिरमित्रः भवेत् ' छ. पुस्तके नास्ति । २ क. ख. ग. ' त् । श्रीरस्थिप्रा ' । ३ ' पञ्चमी मता ' नास्ति ४ क. ङ. मी चित्रधिष्टानं ष ' । छ. पुस्तके । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११४ ९ यकृत्प्लीहाश्रया चान्या मेदोधराऽस्थिधारिणी । मज्जाश्लेष्मपुरीषाणां धरा पक्वाशयस्थिता ॥ षष्ठी पित्तधरा शुक्रधरा शुक्राशयाऽपरा ॥४५ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये आत्यन्तिकलयगर्भोत्पत्तिनिरूपणं नामैकोनसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६ ९ ॥ अथ सप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः शरीरावयवाः अग्निरुवाच श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा घ्राणं धीः खं च भूतगम् । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः पायूपस्थौ करौ पादौ वाग्भवेत्कर्म खं तथा । उत्सर्गानन्दकादानगति ' पञ्च कर्मेन्द्रियाण्यत्र पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि च । इन्द्रियार्थाश्च पञ्चैव आत्माऽव्यक्तश्चतुर्विंशत्तत्त्वानि पुरुषः परः । संयुक्तश्च वियुक्तश्च अव्यतमाश्रितानीह रजः सत्त्वतमांसि च । आन्तरः पुरुषो जीवः खादिषु तद्गुणाः ॥१ ॥
वागादिकर्म तत् ॥२ ॥
महाभूता मनोधिपाः ॥ ३ ॥
यथा मत्स्योदके उभे ॥ ४ ॥
स परं ब्रह्म कारणम् ॥५ ॥
धारण करनेवाली, पाँचवी मज्जा, श्लेष्मा और पुरीष को धारण करनेवाली, जो पक्वाशय में स्थित रहती है, छठी पित्त धारण करनेवाली और सातवीं शुक्र धारण करनेवाली है । वह शुक्राशय में स्थित रहती है ॥ ३८-४५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में आत्यन्तिकलयगर्भोत्पत्ति - निरूपण नामक तीन सौ उनहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥३६९ ॥
अध्याय ३७० शरीरावयव अग्निदेव बोले - कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका - ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । आकाश सभी भूतों में व्यापक है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध - ये क्रमशः आकाश आदि पाँच भूतों के गुण हैं । गुदा, उपस्थ ( लिङ्ग या योनि ), हाथ, पैर और वाणी - ये कर्मेन्द्रिय कहे गये हैं । मलत्याग, विषयजनित आनन्द का अनुभव, ग्रहण, चलन तथा वार्तालाप - ये क्रमशः उपर्युक्त इन्द्रियों के कार्य हैं । पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच इन्द्रियों के विषय, पाँच महाभूत, मन, बुद्धि, आत्मा ( महत्तत्त्व ), अव्यक्त ( मूल प्रकृति ) ये चौबीस तत्त्व हैं । इन सबसे परे है - पुरुष । वह इनसे संयुक्त भी रहता है और पृथक् भी, जैसे मछली और जल - ये दोनों एक साथ संयुक्त भी रहते हैं वियुक्त भी । रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण - ये अव्यक्त के आश्रित हैं । अन्तःकरण की उपाधि से युक्त पुरुष ' जीव ' कहलाता है, वही निरुपाधिक स्वरूप से ' परब्रह्म ' कहा गया है जो सबका कारण है ॥१-५ ॥ उस पुरुष १ ख. ग. तिश्वासादिकर्मतः । प ° । २ ख. ग. ' त्त्वादिपु । ३ क. ख. ग. अन्तरः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११५० अग्निपुराणम् स याति परमं स्थानं यो वेत्ति पुरुषं परम् । ' श्लेष्मणश्चाऽऽमपित्ताभ्यां पक्वाशयस्तु पञ्चमः । पित्तात्पक्वाशयोऽग्नेः स्याद्योनिर्विकशिता ' द्युतौ । शुक्रं स्वशुक्रतश्चाङ्गं कुन्तलान्यत्र कालतः । ऋतावपि च योनिश्चेद्वातपित्तकफावृता । बुक्कात्पुक्कसकप्लीहकृतकोष्ठाङ्गहृद्व्रणाः ३ । रसस्य पच्यमानस्य साराद्भवति देहिनाम् ।
रक्तं पित्तं च भवति तथा तण्डकसंज्ञकः ।
सप्ताऽऽशयाः स्मृता देहे रुधिरस्यैक आशयः ॥ ६ ॥
वायुमूत्राशयः सप्त स्त्रीणां गर्भाशयोऽष्टमः ॥७ ॥
पद्मवद्गर्भाशयः स्यात्तत्र धत्ते सरक्तकम् ॥८ ॥
न्यस्तं शुक्रमतो योनौ नैति गर्भाशयं मुने ॥ ९ ॥
भवेत्तदा विकाशित्वं नैव तस्यां प्रजायते ॥१० ॥
तण्डकश्च महाभाग निबद्धान्याशये मतः ॥ ११ ॥
प्लीहा यकृच्च धर्मज्ञ रक्तफेनाच्च पुक्कसः ॥१२ ॥
भेदो रक्तप्रसाराच्च बुक्कायाः संभवः स्मृतः ॥ १३ ॥
रक्तमांसप्रकाराच्च भवन्त्यन्त्राणि देहिनाम् । ' सार्धत्रिव्यायाम ( व्याम ) संख्यानि तानि नृणां विनिर्दिशेत् ॥१४ ॥
त्रिव्यामानि तथा स्त्रीणां प्राहुर्वेदविदो जनाः । रक्तवायुसमायोगात्कामे यस्योद्भवः स्मृतः ॥ १५ ॥
कफप्रसाराद्भवति हृदयं पद्मसंनिभम् । अधोमुखं तच्छुषिरं यत्र जीवो व्यवस्थितः ॥ १६ ॥
चैतन्यानुगता भावाः सर्वे तत्र व्यवस्थिताः । तस्य वामे यथा प्लीहा दक्षिणे च यथा यकृत् ॥१७ ॥
श्रेष्ठ ( परब्रह्म ) को पूर्ण तथा जाननेवाला ( जीव ) परम स्थान ( मोक्ष ) की प्राप्ति करता है । इस देह में सात आशय हैं । पहला रुधिर का आशय, दूसरा श्लेष्मा का आशय, तीसरा आमाशय, चौथा पित्त का आशय, पाँचवाँ पक्वाशय, छठा वायु का आशय और सातवाँ मूत्राशय होता है । स्त्रियों के आठवाँ गर्भाशय भी होता हैं । पित्त के तीक्ष्ण होने पर पक्वाशय द्वारा योनि का विकास होता है, जिसके भीतर कमल के आकार की भाँति गर्भाशय रहता है और जो रक्त समेत शुक्र धारण करता है । जिस समय शुक्र द्वारा अङ्गों और समयानुसार सिर के केश की उत्पत्ति होती है उस समय ( अर्थात् बच्चे के गर्भाशय में रहते समय ) योनि में गिरा हुआ वीर्य गर्भाशय में नहीं पहुँचता है । हे मुने! ऋतुकाल में भी वात, पित्त और कफ से घिरी हुई होने के कारण योनि में विकास नहीं होता है ( अर्थात् उस समय गर्भ धारण नहीं हो सकता है ) ॥६-१० ॥ बुक्का से पुक्कस, प्लीहा, यकृत्, कोष्ठाङ्ग, हृदय, व्रण तथा तण्डक होते हैं । ये सभी आशय में निबद्ध हैं । प्राणियों के पकाये जानेवाले रस के सार से प्लीहा और यकृत् होते हैं । हे धर्म के ज्ञाता! रक्त के फेन से पुक्कस की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार रक्त, पित्त तथा तण्डक भी उत्पन्न होते हैं । मेदा और रक्त के प्रसार से बुक्का की उत्पत्ति होती है । रक्त और मांस के प्रसार से देहधारियों की आँतें बनती हैं । पुरुष की आँतों का परिमाण साढ़े तीन व्याम लम्बी बतलाते हैं । रक्त और वायु के संयोग से काम का उदय होता है ॥११-१५ ॥ कफ से प्रसार से कमल की भाँति हृदय उत्पन्न होता है जिसके कोषाशय में यह जीव अधोमुख किये स्थित रहता है । उस स्थान में चैतन्य आदि उसके सभी भाव अनुगत होते रहते हैं । ठीक उसी प्रकार से जैसे उसके बायें भाग में प्लीहा और दाहिनी ओर यकृत् रहता है । उस कमल के दाहिनी ओर क्लोम रहता है । इस देह में कफ और १ ख. ग. " ष्मणः श्वासपि । २ क. ङ. क्षुतौ । ख. ध्रुतौ । ग. द्रुता । ३ क. ङ. ' णाः । उण्डरुश्च । ख. ' णाः । डुण्डुकश्च
' ४ क, ङ. ' था डण्डुक ' । ५ ख. ग. ' व्याससं । ६ ख. ग. ' त्कालीय ' ॥
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सप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः दक्षिणे च तथा क्लोम पद्मस्यैवं प्रकीर्तितम् । तेषां भूतानुमानाच्च भवतीन्द्रियसंभवः कृष्णं च मण्डलं वातात्तथा भवति मातृकम् । मांसासृक्कफजा जिह्वा मेदोसृक्कफमांसजौ मूर्धा हृन्नाभिकण्ठाश्च जिह्वा शुक्रं च शोणितम् । द्वे करे द्वे च चरणे चतस्त्रः पृष्ठतो गले ' । मांसस्नायुशिरास्थिभ्यश्चत्वारश्च पृथक्पृथक् । षट् कूर्चानि ' स्मृतानीह हस्तयोः पादयोः पृथक् । पृष्ठवंशस्योपगताश्चतस्रो मांसरज्जवः " सीरण्यश्च तथा सप्त पञ्च मूर्धानमाश्रिताः सूक्ष्मैः सह चतुः षष्टिर्दशना विंशतिर्नखाः । षष्ट्यङ्गुलीनां द्वे पार्ष्णयोर्गुल्फेषु च चतुष्टयम् । द्वे द्वे जानुकपोलोरुफलकांशसमुद्भवम् ( भवे ) । ११५१ श्रोतांसि यानि देहेऽस्मिन्कफरक्तवहानि च ॥ १८ ॥
। नेत्रयोर्मण्डलं शुक्लं कफाद्भवति पैतृकम् ॥१९ ॥
पित्तात्त्वङ्मण्डलं ज्ञेयं मातापितृसमुद्भवम्॥२० ॥
। वृषा ( ष ) णौ दश प्राणस्य ज्ञेयान्यायतनानि तु ॥२१ ॥
गुदं वस्तिश्च गुल्फं च ' कण्डुराः षोडशेरिताः ॥ २२ ॥
देहे पादादिशीर्षान्ते जालानि चैव षोडश । २३ ॥ मणिबन्धनगुल्फेषु निबद्धानि परस्परम् ॥२४ ॥
ग्रीवायां च तथा मेद्रे कथितानि मनीषिभिः ॥ २५ ॥
। ` तावन्त्य ( त्य ) श्च तथा पेश्यस्तासां बन्धनकारिकाः ॥ २६ ॥
। एकैका मेढ्रजिह्वास्ता अस्थिषष्टिशतत्रयम् ॥२७ ॥
पाणिपादशलाकाश्च तासां स्थानचतुष्टयम् ॥२८ ॥
चत्वार्यरत्योरस्थीनि जङ्घयोस्तद्वदेव तु ॥२९ ॥
अक्षस्थानांशक श्रोणिफलके चैवमादिशेत् ' ॥३० ॥
रक्त आदि के वाहक कान आदि हैं, वे उन्हीं पञ्चभूतों द्वारा उत्पन्न इन्द्रियों से ही उत्पन्न होनेवाले हैं । दोनों नेत्रमण्डल का श्वेतभाग कफ से उत्पन्न तथा पैतृक होता है । नेत्रों का कृष्णभाग माता तथा वात के अंश से प्रकट होता है । पित्त द्वारा माता - पिता के सम्मिश्रण से त्वक् मण्डल उत्पन्न होता है ॥ १६-२० ॥ मांस, रक्त और कफ के सम्मिश्रण से जिह्वा की रचना होती है । मेदा, रक्त, कफ तथा मांस से अण्डकोष की उत्पत्ति होती है । प्राणी के दस स्थान बताये गये हैं - मूर्धा, हृदय, नाभि, कण्ठ, जिह्वा, शुक्र, शोणित, गुदा, वस्ति ( मूत्राशय ) तथा गुल्फ । सोलह कण्डुरा होते हैं । हाथ पैर में दो - दो पीठ और गले में चार - चार इस प्रकार देह में करण से सिर तक सोलह जाल होते हैं । ये मांस, स्नायु ( नसें ), शिरा ( धमनी नाड़ी ) से पृथकृ - कृथक् मणिबन्ध और गुल्फ ( एड़ी ) में चार रूपों में निबद्ध हैं । हाथ और पैर से पृथक् - पृथक् ग्रीवा तथा लिङ्ग में कूर्च होते हैं || २१-२५ ॥ पृष्ठ के मध्य भाग में जो मेरुदण्ड है, उसके निकट चार मांसमयी डोरियाँ हैं तथा उतनी ही पेशियाँ भी हैं, जो उन्हें बाँधे रखती हैं । सात सीरणियाँ हैं । उनमें से पाँच तो मस्तक के आश्रित हैं और एक - एक मेढ्र ( लिङ्ग ) तथा जिह्वा में हैं । हड्डियाँ अठारह हजार हैं । सूक्ष्म और स्थूल - दोनों मिलकर चौंसठ दाँत हैं । बीस नख हैं । इनके अतिरिक्त हाथ और पैरों की शलाकाएँ हैं । जिनके चार स्थान हैं । अँगुलियों में साठ, एड़ियों में दो, गुल्फों में चार, अरत्नियों में चार और जंघों में भी चार हड्डियाँ हैं । घुटनों में दो, गालों में दो, ऊरुओं में दो तथा फलकों के मूलभाग में भी दो ही हड्डियाँ हैं । इन्द्रियों के स्थानों तथा श्रोणिफलकों में भी इसी प्रकार दो - दो हड्डियाँ बतायी गयी हैं ॥२६-३० ॥ १ क. ख. ग. कण्डराः । २ ख. ग. " ले । द्वे द्वे पा । ३ ख. ग. जानुनी द्वे च षो । ४ छ. ' स्थिन्यश्च । ५ ख. रा. ट् कूर्पाणि स्मृ । ६ छ. नवत्यश्च । ७ क. ङ. सीवन्यश्च । ख. ग. सीदन्त्यश्च । ८ क. ख. ' त् । तथा हस्ते त । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११५२ अग्निपुराणम् भगास्तोकं तथा पृष्ठे चत्वारिंशच्च पञ्च च । तन्मूलं द्वे ललाटाक्षिगण्डनासाङ्ख्यवस्थिताः । द्वे शङ्खके कपालानि चत्वार्येव शिरस्तथा । अष्टषष्टिस्तु शाखासु षष्टिश्चैकविवर्जिता । त्रिंशाधिके द्वे शते तु अन्तराधौ तु सप्ततिः पञ्च पेशीशतान्येव चत्वारिंशत्तथोर्ध्वगाः । स्त्रीणां चैकाधिका वै स्याद्विंशतिश्चतुरुत्तरा । गर्भस्य च चतस्रः स्युः शिराणां च शरीरिणाम् षट्पञ्चाशत्सहस्त्राणि रसं देहे वहन्ति ताः द्वासप्ततिस्तथा ' कोट्यो व्योम्नामिह महामुने मूत्रस्य चैव पित्तस्य श्लेष्मणः शकृतस्तथा अर्धार्धाभ्यधिकाः सर्वाः पूर्वपूर्वाञ्जलेर्मताः रजसस्तु तथा स्त्रीणां चतस्त्रः कथिता बुधैः ग्रीवायां च तथाऽस्थीनि जत्रुकं च तथा हनुः ॥३१ ॥
पर्शुकास्तालुकैः सार्धमर्बुदैश्च द्विसप्ततिः ॥ ३२ ॥
उरः सप्तदशाऽस्थीनि संधीनां द्वे शते दश ॥ ३३ ॥
अन्तरा वै त्र्यशीतिश्च स्नायोर्नवशतानि च ॥ ३४ ॥
। ऊर्ध्वगाः षट् शतान्येव शाखास्तु कथितानि तु ॥३५ ॥
चतुः शतं तु शाखासु अन्तराधौ च षष्ठिका ॥ ३६ ॥
स्तनयोर्दश योनौ च त्रयोदश तथाऽऽशये ॥ ३७ ॥
। त्रिंशच्छतसहस्राणि तथाऽन्यानि नवैव तु ॥ ३८ ॥
। केदार इव कुल्याश्च क्लेदलेपादिकं च यत् ॥ ३ ९ ॥ । मज्जाया मेदसश्चैव वसायाश्च तथा द्विज ॥ ४० ॥
। रक्तस्य सरसस्यात्र क्रमशोऽञ्जलयो मताः ॥ ४१ ॥
। अर्धाञ्जलिश्च शुक्रस्य तदर्थं च तथौजसः ॥४२ ॥
। शरीरं मलदोषादिपिण्डं ज्ञात्वाऽऽत्मनि त्यजेत् ॥४३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये शरीरावयवविभागवर्णनं नाम सप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३७० ॥
भग में भी थोड़ी - सी हड्डियाँ हैं । पीठ में पैंतालीस और गले में भी पैंतालीस हैं । गले की हँसली; ठोड़ी तथा उसकी जड़ में दो - दो अस्थियाँ हैं । ललाट, नेत्र, कपोल, नासिका, चरण, पसली, तालु तथा अर्बुद - इन सब में सूक्ष्म रूप से बहत्तर हड्डियाँ हैं । मस्तक में दो शंख और चार कपाल हैं तथा छाती में सत्रह हड्डियाँ हैं । संधियाँ दो सौ दस बतायी गयी हैं । इनमें से शाखाओं में अड़सठ तथा उनसठ हैं और अन्तरा में तिरासी संधियाँ बतलायी गयी हैं । स्नायु की संख्या नौ सौ है, जिनमें से अन्तराधि में दो सौ तीस हैं, सत्तर ऊर्ध्वगामी हैं और शाखाओं में छह सौ स्नायु हैं । पेशियाँ पाँच सौ बतलायी गयी हैं । इनमें चालीस तो ऊर्ध्वगामिनी हैं, चार सौ शाखाओं में हैं और साठ अन्तराधि में हैं । स्त्रियों की मांसपेशियाँ पुरुषों की अपेक्षा सत्ताईस अधिक हैं । उनमें दस दोनों स्तनों में, तेरह योनि में तथा चार गर्भाशय में स्थित हैं ॥ ३१-३७ ॥ देहधारियों के शरीर में तीस लाख नौ तथा छप्पन हजार नाड़ियाँ हैं । जैसे छोटी - छोटी नालियाँ क्यारियों में पानी बहाकर ले जाती हैं, उसी प्रकार वे नाड़ियाँ सम्पूर्ण शरीर में रस को प्रवाहित करती हैं । क्लेद और लेप आदि उन्हीं के कार्य हैं । महामुने! इस देह में बहत्तर करोड़ छिद्र या रोम- कूप हैं तथा मज्जा, मेदा, वसा, मूत्र, पित्त, श्लेष्मा, मल, रक्त और रस - इनकी क्रमशः ' अञ्जलियाँ ' मानी गयी हैं । इनमें से पूर्व-पूर्व अञ्जलि की अपेक्षा उत्तरोत्तर सभी अञ्जलियाँ मात्रा में डेढ़ गुनी अधिक हैं । एक अञ्जलि में आधी वीर्य की आधी ओज की है । विद्वानों ने स्त्रियों के रज की चार अञ्जलियाँ बतायी हैं । यह शरीर मल और दोष आदि का पिण्ड है, ऐसा समझकर अपने अन्तःकरण में इसके प्रति होनेवाली आसक्ति का त्याग करना चाहिए ॥३८-४३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में शरीरावयवविभाग - वर्णन नामक तीन सौ सत्तरहवाँ अध्याय समाप्त ॥३७० ॥
१ ख. ग. ' ट्यो रोम्णामि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११५३ अथैकसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः नरकनिरूपणम् अग्निरुवाच उक्तानि ' यममार्गाणि वक्ष्येऽथ मरणे नृणाम् शरीरमुपरुध्याथ कृत्स्नान्दोषान्रुणद्धि वै शैत्यात्प्रकुपितो वायुश्छिद्रमन्विष्यते ततः ऊर्ध्वं तु सप्तच्छिद्राणि अष्टमं वदनं तथा । अधः पायुरुपस्थं च अनेनाशुभकारिणाम् । अन्तकाले तु सम्प्राप्ते प्राणऽपानमुपस्थिते । स जीवो नाभ्यधिष्ठानाच्चाल्यते मातरिश्वना । च्यवन्तं जायमानं वा प्रविशन्तं च योनिषु । गृह्णाति तत्क्षणाद्योगे शरीरं चाऽऽतिवाहिकम् । जलं मही च पञ्चत्वमापन्नः पुरुषः स्मृतः ॥ ऊष्मा प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः ॥ १ ॥
। छिनत्ति प्राणस्थानानि पुनर्मर्माणि चैव हि ॥ २ ॥
। द्वे नेत्रे द्वौ तथा कर्णौ द्वौ तु नासापुटौ तथा ॥३ ॥
एतैः प्राणो विनिर्याति प्रायशः शुभकर्मणाम् ॥४ ॥
मूर्धानं योगिनो भित्त्वा जीवो यात्यथ चेच्छया ॥५ ॥
तमसा संवृते ज्ञाने संवृतेषु च मर्मसु ॥ ६ ॥
बाध्यमानश्चाऽऽनयते अष्टाङ्गाः प्राणवृत्तिकाः ॥७ ॥
प्रपश्यन्ति च तं सिद्धा ' देवा दिव्येन चक्षुषा ॥८ ॥
आकाशवायुतेजांसि विग्रहादूर्ध्वगामिनः ॥ ९ ॥
आतिवाहिकदेहं तु यमदूता नयन्ति तम् ॥१० ॥
अध्याय ३७१ नरक - निरूपण अग्निदेव बोले- अब मैं उन यम के मार्गों के सम्बन्ध में बतलाऊँगा जो मनुष्यों के मरने पर प्राप्त होते हैं । शरीर में ऊष्मा के प्रकुपित होने पर उसे तीव्र वायु कहा जाता है । वह शरीर में अवरोध उत्पन्न करके, सम्पूर्ण दोषों को अवरुद्ध करके प्राण - स्थानों और गर्भ - स्थानों को काट देती है । तदनन्तर शैत्य से प्रकुपित वायु अपने निर्गमन के लिए छिद्र खोजती हैं । दो नेत्र, दो कान, दो नासापुट, ऊर्ध्ववायुस्थान और मुख इन आठ मार्गों से प्राय: पुण्यात्माओं का प्राण निकलता है । पाप कर्म करनेवाले के प्राणवायु उपस्थ स्थानों से निकलते हैं । जीव योगियों के मस्तक को तोड़कर इच्छानुसार निकल जाता है ॥१-५ ॥ अन्तकाल उपस्थित होने पर जब प्राणवायु अपानवायु से मिलती है, ज्ञान अज्ञान से आवृत हो जाता है और सभी मर्मस्थान अवरुद्ध हो जाते हैं । उस समय जीव वायु के द्वारा नाभि - स्थान से विचलित कर दिया जाता है और पुनः अवरुद्ध होकर प्राणवायु के आठ अंगों से मिल जाता है उस समय गिरते हुए, उत्पन्न होते हुए और योनियों में प्रविष्ट होते हुए उसे सिद्ध जन तथा देवगण अपने दिव्य चक्षु से देखा करते हैं । उस समय से वह जीव सूक्ष्म शरीर को ग्रहण कर लेता है । वह पुरुष ऊर्ध्वगामी शरीर से आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी में मिलकर पञ्चत्व प्राप्त कर लेता है । उस समय यमदूत उस सूक्ष्म शरीर को लेकर चलते हैं ॥६-१० ॥ .१ क. ङ. ' ममोक्षाणि । २ ख. ग. र्गादि व ' । ३ क. ख. ' वायुः स । ४ ख. ग. देवं । ७३ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११५४ अग्निपुराणम् याम्यं मार्गं महाघोरं षडशीतिसहस्रकम् यमं दृष्ट्वा यमोक्तेन चित्रगुप्तेन चेरितान् भुज्यन्ते पापिभिर्वक्ष्ये नरकांस्ताश्च यातनाः सप्तमस्य तलस्यान्ते घोरे तमसि संस्थिताः अतिघोरा महाघोरा घोररूपा च पञ्चमी भयोत्कटा कालरात्री महाचण्डा च चण्डया पद्मावती भीषणा च भीमा चैव करालिका सुदीर्घा वर्तुला सप्तभूमा चैव ' सुभूमिका अष्टाविंशतिकोटीनां पञ्च पञ्च च नाय ( यि ) काः तामिश्रमन्धतामिश्रं महारौरवरौरवौ नरकं कालसूत्रं च महानरकमेव च संघातं च सकाकोलं कुड्मलं पूतिमृत्तिकम् नरकान्विद्धि " कोटीशनागान्वै घोरदर्शनान् ' मार्जारोलूकगोमायुगृध्रादिवदनाश्च ते वहाँ वह महाभयंकर छियासी हजार योजन यम के । अन्नोदकं नीयमानो बान्धवैर्दत्तमश्नुते ॥ ११ ॥
। प्राप्नोति नरकान्नरौद्रान्धर्मी शुभपथैर्दिवम् ॥१२ ॥
। अष्टाविंशतिरेवाधः क्षितेर्नरककोटयः ॥१३ ॥
। घोराख्या प्रथमा कोटिः सुघोरा तदधः स्थिता ॥१४ ॥
। षष्ठी तरलताराख्या सप्तमी च भयानका ॥१५ ॥
। कोलाहला प्रचण्डाख्या पद्मा नरकनायिका ॥ १६ ॥
। विकराला महावज्रा त्रिकोणा पञ्चकोणिका ॥१७ ॥
। ' दीप्तमायाऽष्टाविंशतयः कोटयः पापिदुःखदाः ॥ १८ ॥
। रौरवाद्याः शतं चैकं चत्वारिंशच्चतुष्टयम् ॥१९ ॥
। असिपत्रं ( त्र ) वनं चैव लोहभारं तथैव च ॥ २० ॥
। संजीवनं महावीचि तपनं संप्रतापनम् ॥२१ ॥
। लोहशङ्कुमृजीषं च प्रधानं शाल्मलीं नदीम् ॥ २२ ॥
। पात्यन्ते पापकर्मणि एकैकस्मिन्बहुष्वपि ॥ २३ ॥
। तैलद्रोण्यां नरं क्षिप्त्वा ज्वालयन्ति हुताशनम् ॥२४ ॥
मार्ग से ले जाया जाता हुआ अपने बन्धुओं के द्वारा दिये गये अन्न और जल को प्राप्त करता है । यम को देखकर यम के कहने से चित्रगुप्त के द्वारा प्रेरित भयङ्कर नरकों को प्राप्त करता है किन्तु धार्मिक व्यक्ति कल्याणप्रद मार्गों से स्वर्गलोक को चला जाता है । अब मैं उन नरकों का तथा उन यातनाओं का वर्णन करूँगा जिनका भोग पापियों द्वारा किया जाता है । पृथ्वी के नीचे अट्ठाईस करोड़ नरक हैं । सप्तम तल के नीचे घोर अन्धकार में रहनेवाले घोर नामक नरक प्रथम कोटि में हैं । उनके नीचे सुघोर, अतिघोर, महाघोर और पाँचवाँ घोर नामक नरक है । उसके नीचे छठा तरलतर और सातवाँ भयानक नामक नरक कहा गया है ॥ ११-१५ ॥ भयोत्कटा, कालरात्रि, महाचण्डा, चण्डया, कोलाहला, प्रचण्डा और पद्मा, नरकनायिका, पद्मावती, भीषणा, भीमा, करालिका, विकराला, महावज्रा, त्रिकोणा, पंचकोणिका, सुदीर्घा, वर्तुला, सप्तभूमा, सुभूमिका और दीप्तमाया इत्यादि अट्ठाईस करोड़ नरकों की पाँच - पाँच नायिकाएँ हैं । रौरव इत्यादि पाँच सौ चौंसठ नरक हैं । जिनके नाम हैं - तामिश्र, अन्धतामिश्र, महारौरव, रौरव, असिपत्रवन, लोहभार, कालसूत्र, महानरक, संजीवन, महावीचि, तपन, सम्प्रतापन, संघात, सकाकोल, कुड्मल, पूतिमृत्तिक, लोहशंकु, ऋजीष और शाल्मली - इनमें करोड़ों नाग रहा करते हैं और उनका दर्शन अत्यन्त भयंकर होता है । एक - एक अथवा अनेक पाप कर्मों के लिए मनुष्य इनमें डाल दिये जाते हैं ॥१६-२३ ॥ वहाँ बिल्ली, उलूक, शृगाल और गृध्र आदि के समान मुखवाले यमदूत इन्हें तेल के कड़ाह में डालकर आग जला देते हैं । १ ख. ग. सुधूलिका । २ ख. ग. दीप्तायामष्टविंशत्याः को । ३ ख. ग. संहारकं स । ४ ख. ' शसंख्यान्वै । ५ ख. ग. ' जरिवृकगो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११५५ अम्बरीषेषु चैवान्यांस्ताम्रपात्रेषु चापरान् । अयस्पात्रेषु चैवान्यान्बहुवह्निकणेषु च ॥२५ ॥
शूलाग्रारोपितांश्चान्ये छिद्यन्ते नरकेऽपरे । ताड्यन्ते कशाभिस्तु भोज्यन्ते चाप्ययोगुडान् ॥ २६ ॥
यमदूतैर्नराः पांशून्विष्ठारक्तकफादिकान् । तप्तं मद्यं पाययन्ति पाटयन्ति पुनर्नरान् ॥ २७ ॥
यत्रेषु पीडयन्ति स्म भक्ष्यन्ते वायसादिभिः 1 । तैलेनोष्णेन सिच्यन्ते छिद्यन्ते नैकधा शिरः ॥ २८ ॥
हा तातेति क्रन्दमानाः स्वकं निन्दन्ति कर्म ते । कर्मक्षयात्प्रजायन्ते महापातकिनस्त्विह । खरपुक्कश ( स ) म्लेच्छानां मद्यपः स्वर्णहार्यपि । ब्रह्महा क्षयरोगी स्यात्सुरापः श्यावदन्तकः । यो येन संस्पृशत्येषां स तल्लिङ्गोऽभिजायते । धान्यं हृत्वाऽतिरिक्ताङ्गः पिशुनः पूतिनासिकः । परस्य योषितं हृत्वा ब्रह्मस्वमपहृत्य च । रत्नहारी हीनजातिर्गन्धांश्छुच्छुन्दरी शुभान् । कुछ पापियों को तवों में, कुछ को ताम्रपात्रों में, कुछ महापातकजान्घोरान्नरकान्प्राप्यगर्हितान् ॥२९ ॥
मृगश्वशूकरोष्ट्राणां ब्रह्महा योनिमृच्छति ॥ ३० ॥
कृमिकीटपतङ्गत्वं गुरुगस्तृणगुल्मताम् ॥३१ ॥
स्वर्णहारी तु कुनखी दुश्चर्मा गुरुतल्पगः ॥ ३२ ॥
अन्नहर्ता मायावी स्यान्मूको वागपहारकः ॥३३ ॥
तैलहृत्तैलपायी स्यात्पूतिवक्त्रस्तु सूचकः ॥ ३४ ॥
अरण्ये निर्जने देशे जायते ब्रह्मराक्षसः ॥ ३५ ॥
पत्रं शाकं शिखी हृत्वा मुखरो धान्यहारकः ॥३६ ॥
को लौहपात्रों में और कुछ को बहुत - से अग्निकणों में डाल देते हैं । अन्य पापियों को काँटों से युक्त नरक में डालकर उन्हें छेदा जाता है । कुछ को चाबुकों से पीटा जाता है और कुछ को लोहे के ठोकरों को खाना पड़ता है । यमदूतों के द्वारा मनुष्यों को धूलि, विष्ठा, रक्त, कफ इत्यादि तथा तप्त मद्य पिलाया जाता है और उन्हें पुनः विदीर्ण किया जाता है । उन्हें यन्त्रों में पीसा जाता है और कौवों इत्यादि के द्वारा उनका भक्षण किया जाता है, उनके ऊपर गर्म तेल छिड़का जाता है और अनेक बार उनका सिर काटा जाता है ऐसा किये जाने पर हा तात! हा तात! चिल्लाते हुए अपने कर्मों की निन्दा करते हैं क्योंकि इन्हें बड़े - बड़े पापों से उत्पन्न होनेवाले घोर नरकों को प्राप्त करना पड़ता है । वे बड़े - बड़े पापी अपने कर्मों के नष्ट होने पर पुनः इस संसार में उत्पन्न होते हैं । ब्रह्महत्या करनेवाला मृग, कुत्ता, शूकर और उष्ट्रों की योनि में जाता है ॥२४-३० ॥ मदिरापान करनेवाला गधा, नीच और म्लेच्छों की योनि प्राप्त करता है । सोने को चुरानेवाला कीट - पतङ्गों की योनि प्राप्त करता है । गुरुगामी तृण और गुल्म होता है । ब्रह्महत्या करनेवाला क्षयरोगी, सुरापान करनेवाला, काले दाँतोंवाला, सोने को चुरानेवाला, कुरूप नाखूनोंवाला और गुरु की शय्या पर जानेवाला दुश्चर्मवाला होता है । जो जिस वस्तु का स्पर्श करता है वह उसके चिह्न से चिह्नित हो जाता है । अन्न को चुरानेवाला मायावी और झूठ ' बोलनेवाला ' ' मूक ' होता है । धान्य को चुरानेवाला अतिरिक्त अंग से युक्त, चुगलखोर दुर्गन्धयुक्त नासिकावाला होता है । तेल चुरानेवाले को तेल पीना पड़ता है और गप लगानेवाला दुर्गन्धयुक्त मुखवाला होता है । परस्त्री और ब्राह्मणों के धन को चुरानेवाला, वन अथवा निर्जन स्थान में ब्रह्मराक्षस होता है ॥३१-३५ ॥ रत्नों को चुरानेवाला हीन जाति में उत्पन्न होता है और अच्छे-अच्छे सुगन्धित पदार्थों को चुरानेवाला छछूंदर, शाक - पात चुरानेवाला मयूर, धान्य को चुरानेवाला कौवा, पशु का १ ख. ग. निर्जले । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११५६ अग्निपुराणम्
अजः पशुं पयः यानमुष्ट्रः फलं कपिः । मधु दंशः फलं गृध्रो गृहकाक उपस्करम् ॥३७ ॥
श्वित्री वस्त्रं सारसं च झिल्ली लवणहारकः । उक्त आध्यात्मिकस्तापः शस्त्राद्यैराधिभौतिकः ॥ ३८ ॥
ग्रहाग्निदेवपीडाद्यैर ( रा ) धिदैविक ईरितः । त्रिधा तापं हि संसार ज्ञानयोगाद्विनाशयेत् ॥ ३ ९ ॥ कृच्छैर्व्रतैश्च दानाद्यैर्विष्णुपूजादिभिर्नरः 118011 इत्यादिमहापुराण आग्नेये नरकनिरूपणं नामैकसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३७१ ॥
अथ द्विसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः यमनियमाः अग्निरुवाच संसारतापमुक्त्यर्थं वक्ष्याम्यष्टाङ्गयोगकम् । ब्रह्मप्रकाशकं ज्ञानं चित्तवृत्तिनिरोधश्च जीवब्रह्मात्मनोः परः । अहिंसा सत्यमस्तेयं यमाः पञ्च स्मृता विप्र ' नियमा भुक्तिमुक्तिदाः । शौचं संतोषतपसी भूतापीडा ह्यहिंसा स्यादहिंसा धर्म उत्तमः । यथा गजपदेऽन्यानि अपहरण करनेवाला बकरा, दूध चुरानेवाला कौवा, सवारी को चुरानेवाला ऊँट, योगस्तत्रैकचित्तता ॥१ ॥
ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ ॥ २ ॥
स्वाध्यायेश्वरपूजने ॥३ ॥
पदानि पथगामिनाम् ॥४ ॥
फल को चुरानेवाला बन्दर, मधु को चुरानेवाला मक्खी, फल को चुरानेवाला गृध्र और अन्य सामग्री को चुरानेवाला गृहकाक होता है । वस्त्र और सरस वस्तुएँ चुरानेवाला श्वेत कुष्ठ से युक्त और नमक चुरानेवाला झींगुर होता है । यह आध्यात्मिक ताप का वर्णन किया गया है । शस्त्र आदि से कष्ट की प्राप्ति होना आधिभौतिक ताप है । आधिदैविक ताप उसे कहते हैं जो ग्रह, अग्नि, देवताजन्य पीड़ाओं से उत्पन्न होता है । तीनों प्रकार के तापों से युक्त इस संसार का विनाश ज्ञान, योग, हठयोग, व्रत और दान आदि तथा विष्णु के पूजन आदि से करना चाहिए ॥ ३६ ॥
श्री अग्निमहापुराण में नरक - निरूपण कथन नामक तीन सौ इकहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥३७१ ॥
अध्याय ३७२ यम - नियम अग्निदेव बोले- ( अब ) मैं सांसारिक संतापों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए अष्टाङ्ग योग का वर्णन करूँगा जो ब्रह्म को प्रकाशित करनेवाला ज्ञान है । योग कहते हैं चित्त की एकाग्रता को । चित्तवृत्ति का निरोध ही योग है जो कि जीवात्मा और ब्रह्मात्मा से परे रहा करता है । हे विप्र! यम पाँच कहे गये हैं - अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह । भोग और मोक्ष को प्रदान करनेवाले नियम हैं - शौच, सन्तोष, तपस्, स्वाध्याय और ईश्वरपूजन ॥१-३॥ प्राणियों को कष्ट न देना अहिंसा है । अहिंसा ही उत्तम धर्म है । जिस प्रकार पथिकों के सभी पद हाथी के पद १ छ. ' माद्भुक्ति ' । २ CC ख - 0.. JK " था Sanskrit नागप Acade जे कख सद्या S3 Foundation USA