अग्नि पुराण — पृष्ठ 1181–1190
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1181–1190
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एकोनाशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११७७ भजते प्राकृतान्धर्मानन्यस्तेभ्यो हि सोऽव्ययः । विषयात्तत्समाकृष्य ब्रह्मभूतं हरिं स्मरेत् । विचार्य स्वात्मनः शक्त्या लौहमाकर्षको यथा । तस्या ब्रह्मणि यमैः सनियमैः वशीकृतैस्ततः सनन्दनादयो हिरण्यगर्भादिषु प्रत्यस्तमितभेदं तच्च विष्णोः संयोगो योग इत्यभिधीयते । स्थित्वा प्रत्याहृत्या ' मरुज्जवैः । कुर्यात्स्थितं चेतः शुभाश्रये । ब्रह्मभावभावनया युताः । च ज्ञानकर्मात्मिका द्विधा । यत्सत्तामात्रमगोचरम् । परं रूपमरूपस्याजमक्षरम् । मद्भावभावमापन्नस्ततोऽसौ परमात्मना । इत्यादिमहापुराण आग्नेये ब्रह्मज्ञाननिरूपणं बन्धाय विषयासङ्गं मनो निर्विषयं धिये ॥२२ ॥
आत्मभावं नयत्येनं तद्ब्रह्मध्यायिनं मुने ॥ २३ ॥
आत्मप्रयत्नसापेक्षा विशिष्टा या मनोगतिः ॥ २४ ॥
विनिष्पन्दः समाधिस्थः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥२५ ॥
प्राणायामेन पवनैः प्रत्याहारेण चेन्द्रियैः ॥ २६ ॥
आश्रयश्चेतसो ब्रह्म मूर्तं चामूर्तकं द्विधा ॥ २७ ॥
कर्मभावनया चान्ये देवाद्याः स्थावरान्तकाः ॥२८ ॥
त्रिविधा भावना प्रोक्ता विश्वं ब्रह्म उपास्यते ॥ २ ९ ॥ वचसामात्मसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ३० ॥
अशक्यं प्रथमं ध्यातुमतो ' मूर्तादि चिन्तयेत् ॥३१ ॥
भवत्यभेदो भेदश्च तस्याज्ञानकृतो भवेत् । ३२ ॥ नामैकोनाशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३७ ९ ॥ से अहम् और मानादि से युक्त हो जाती है । प्राकृत धर्मों का सेवन करनेवाला अव्यय कहलाता है । विषयासक्त मन बन्धन के लिए और विषयरहित मन ज्ञान के लिए होता है । इसलिए उस मन को विषय से हटाकर ब्रह्मरूप विष्णु का स्मरण करना चाहिए । अये मुने! इस प्रकार आत्मा को ब्रह्म में लगा देना चाहिए । जिस प्रकार चुम्बक अपनी शक्ति से लोहे को अपनी ओर आकृष्ट करता है उसी प्रकार ब्रह्म अपनी शक्ति से अपने स्वरूप में मिला लेता है । आत्मप्रयत्नसापेक्ष जो मन की विशिष्ट गति होती है ॥१९ -२४ ॥ उसका ब्रह्म से संयोग होने से योग कहा जाता है । निष्पन्दरहित समाधिस्थ साधक परब्रह्म को प्राप्त करता है । यम - नियमों से युक्त होकर और प्राणायाम से वायु और प्रत्याहार से इन्द्रियों को वश में करके चित्त को शुभ आश्रय में लगा देना चाहिए । चित्त का आश्रय ब्रह्म दो प्रकार का होता है - निराकार और साकार । सनन्दन इत्यादि ब्रह्मभाव की भावना से युक्त रहते हैं किन्तु देवताओं से लेकर स्थावरपर्यन्त अन्य प्राणी कर्म भावना से युक्त रहते हैं । हिरण्यगर्भ आदि में ज्ञान और कर्मात्मक दो प्रकार की भावना होती है । कहीं - कहीं यह भावना तीन प्रकार की भी कही जाती है । इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म है इस भाव से उपासना की जाती है ॥ २५-२९ ॥ ब्रह्मज्ञान उसे कहते हैं जिसमें भेद नष्ट हो जाता है जो सत्तामात्र होता है और जो वाणी के द्वारा आत्मसंवेद्य रहा करता है । यह निराकार विष्णु का परमरूप है जो अज और अक्षर होता है । इस प्रथम निराकार विष्णु की उपासना अशक्य होने से उसके मूर्त रूप का चिन्तन करना चाहिए । तदनन्तर परमात्मा के साथ एकाकार होकर उसका अज्ञानजन्य भेद अभेद में परिवर्तित हो जाता है ॥३०-३२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में ब्रह्मज्ञाननिरूपण नामक तीन सौ उन्यासीवाँ अध्याय समाप्त ॥३७९ ॥
१ ख. श. ' ज्जयैः । प्रा ' । २ ख. ग. मूर्तानि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११७८ अग्निपुराणम् अथाशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः अद्वैतब्रह्मविज्ञानम् अग्निरुवाच अद्वैतब्रह्मविज्ञानं ' वक्ष्ये यद्भवतोऽगदत् ॥ शालग्रामे तपश्चक्रे वासुदेवार्चनादिकृत् ॥ ॥१ १ ॥ ॥ मृगसङ्गान्मृगोभूत्वा ह्यन्तकाले स्मरन्मृगम् । जातिस्मरो ' मृगं त्यक्त्वा देहं योगात्स्वतोऽभवत् ॥२ ॥
अद्वैतब्रह्मभूतश्च जडवल्लोकमाचरत् । क्षत्ता सौवीरराजस्य विष्टियोगममन्यत ॥ ३ ॥
उवाह शिविकामस्य क्षत्तुर्वचनचोदितः । गृहीतो विष्टिना ज्ञानी उवाहाऽऽत्मक्षयाय तम् ॥४ ॥
ययौ जडगतिः ' पश्चाद्ये त्वन्ये त्वरितं ययुः । शीघ्राशीघ्रगतीन्दृष्ट्वा अशीघ्रं तं नृपोऽब्रवीत् ॥ ५ ॥
राजोवाच किंश्रान्तोऽस्यल्पमध्वानं त्वयोढा शिविका मम । किमायाससहो न त्वं पीवा ' नासि निरीक्ष्यसे ॥६ ॥
अध्याय ३८० अद्वैतब्रह्म - विज्ञान अग्निदेव बोले - अब मैं उस ' अद्वैत ब्रह्मविज्ञान ' का वर्णन करूँगा, जिसे भरत ने ( सौवीरराज को ) बतलाया था । प्राचीन काल की बात है, राजा भरत शालग्राम क्षेत्र में रहकर भगवान् वासुदेव की पूजा आदि करते हुए तपस्या कर रहे थे । उनकी एक मृग के प्रति आसक्ति हो गयी थी इसलिए अन्तकाल में उसी का स्मरण करते हुए प्राण के कारण उन्हें मृग होना पड़ा । मृगयोनि में भी वे ' जातिस्मर ' हुए उन्हें पूर्वजन्म की बातों का स्मरण त्यागने उस मृग शरीर का परित्याग करके वे स्वयं ही योगबल से एक ब्राह्मण के रूप में प्रकट पूर्ण बोध था । वे साक्षात् ब्रह्मस्वरूप थे । तो भी लोक में जड़वत् व्यवहार करते थे । उन्हें नरेश के सेवक ने बेगार में लगाने के योग्य समझा । सेवक के कहने से वे सौवीरराज की वे ज्ञानी थे, तथापि बेगार में पकड़ जाने पर अपने प्रारब्ध भोग का क्षय करने के लिए लगे, परन्तु उनकी गति मन्द थी । वे पालकी में पीछे की ओर लगे थे तथा उनके सिवा सब - के - सब तेज चल रहे थे । राजा ने देखा, अन्य कहार शीघ्रगामी हैं तथा तीव्र गति से
आया है बहुत मन्द है । तब वे बोले ॥१-५ ॥
रहा । अतः हुए । उन्हें अद्वैत ब्रह्म का हृष्ट - पुष्ट देखकर सौवीर पालकी ढोने लगे । यद्यपि राजा का भार वहन करने दूसरे जितने कहार थे, वे चल रहे हैं । यह जो नया राजा बोले - अरे, क्या थक गये? अभी तो थोड़ी दूर ही तक मेरी पालकी को ले चले भी परिश्रम को सहन नहीं कर सकते हो? क्या तुम मोटे नहीं हो । क्या तुम इतने दिखायी दे रहे हो || ६ || १ क. ङ. बदे यद्भावतोऽगमत् । २ छ. मृगस्त्यक्त्वा । ३ क. ङ. छ. जलगतिः । ४ ख. ग. छ. ' वानसि CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA. ।
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अशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११७ ९ ब्राह्मण उवाच नाहं पीवा न वै वोढा शिविका भवतो मया भूमौ पादयुगं तस्थौ जङ्घे पादद्वये स्थिते वक्षःस्थलं तथा बाहू स्कन्धौ चोदरसंस्थितौ
शिविकायां स्थितं चेदं देहं त्वदुपलक्षितम् ।
अहं त्वं च तथाऽन्ये च भूतैरुह्याम पार्थिव ॥
कर्मवश्या गुणाश्चैते सत्त्वाद्याः पृथिवीपते । आत्मा शुद्धोऽक्षरः शान्तो निर्गुणः प्रकृतेः परः । यदा नोपचयस्तस्य यदा नापचयो नृप । भूजङ्घापादकट्यूरुजठरादिषु संस्थिता । तदन्यजन्तुभिर्भूपशिविकोत्थानकर्मणा । यथा पुंसः पृथग्भावः प्राकृतैः करणैर्नृप । यद्द्द्रव्या शिविका चेयं तद्द्द्रव्यो भूतसंग्रहः ॥ न श्रान्तोऽस्मि न वाऽऽयासो वोढव्योऽसि महीपते ॥७ ॥
। ऊरू जङ्घाद्वयावस्थौ तदाधारं तथोदरम् ॥ ८ ॥
। स्कन्धस्थितेयं शिविका मम भारोऽत्र ' किंकृत: ॥९ ॥
तत्र त्वमहमप्यत्र प्रोच्यते चेदमन्यथा ॥१० ॥
गुणप्रवाहपतितो गुणवर्गो हि यात्ययम् ॥ ११ ॥
अविद्यासंचितं कर्म तच्चाशेषेषु जन्तुषु ॥ ॥१२ १२ ॥ ॥ प्रवृद्धयपचयौ नास्य एकस्याखिलजन्तुषु ॥१३ ॥
तदा पीवान ( ना ) सीति ' त्वं कया युक्त्या त्वयेरितम् ॥१४ ॥
शिविकेयं तथा स्कन्धे तदा भारः समस्त्वया ॥१५ ॥
शैलद्रव्यगृहीतोत्थः पृथिवीसंभवोऽपि वा ॥१६ ॥
सोढव्यः स महाभारः कतरो नृपते मया ॥१७ ॥
भवतो मेऽखिलस्यास्य समत्वेनोपबृंहितः ॥१८ ॥
ब्राह्मण बोला - हे राजन्! न तो मैं मोटा हूँ, न मैं तुम्हारी पालकी को वहन कर रहा हूँ, न मैं थका हुआ हूँ और न तो तुम्हारा वहन किया जा रहा है । मेरे दोनों पैर पृथ्वी पर स्थित हैं । मेरी दोनों जङ्घाएँ मेरे दोनों पैरों पर स्थित हैं, ऊरुद्वय जङ्घाओं पर आधारित हैं और उनका आधार उदर है । वक्षःस्थल, दोनों भुजाएँ और दोनों कन्धे उदर पर स्थित हैं । यह पालकी तो मेरे कन्धों पर स्थित है इससे मेरे ऊपर क्या भार पड़ा है । इस पालकी पर सवार तुम्हारा शरीर ही तुम हो । जैसे तुम्हारे शरीर को तुम कहा जाता है वैसे ही यहाँ मेरे शरीर को मैं । अये राजन्! मैं, तुम तथा अन्य सभी इन्हीं पञ्चभूतों से ढोये जा रहे हैं । गुणों के प्रवाह में बहकर गुणवर्ग इसी प्रकार से चलता रहता है । अये राजन्! सत्त्व आदि ये सभी गुण कर्मों के अधीन हैं । सभी जीवों में जो यह कर्म है वह अविद्या के द्वारा संचित है ॥७-१२ ॥ यह आत्मा शुद्ध, अमर, शान्त, निर्गुण और प्रकृति के परे रहनेवाली है । सभी जन्तुओं में इस एकात्मा की न तो वृद्धि होती है और न उसका नाश ही । हे राजन्! यदि आत्मा की वृद्धि नहीं होती है तो उसकी क्षति भी नहीं हो सकती है । फिर क्या तुम स्थूल नहीं हो, इस प्रकार तुमने किस युक्ति से कहा है । जिस प्रकार पृथ्वी, जंघा, कटि, उदर आदि के ऊपर यह पालकी रखी हुई है उसी प्रकार कन्धे के ऊपर भी उसका भार तुम्हारे समान ही है । अये राजन्! इस सम्बन्ध में अन्य जन्तु अधिक श्रेष्ठ नहीं हैं । पालकी के अतिरिक्त वृक्षों, पर्वतों, द्रव्यों तथा पृथ्वी पर रहनेवाले अस्तित्व को रात - दिन सभी जन्तु वहन किया करते हैं । हे राजन्! क्योंकि यह पुरुष ( आत्मा ) प्राकृत कारणों से भिन्न है इसलिए मेरे द्वारा कोई भार कैसे वहन किया जा सकता है । यह पालकी उसी भूत समुदाय से बनी हुई है जिससे अन्य द्रव्य बने हुए हैं और जिन्हें हम अज्ञान अथवा अहंकार के कारण अपने रूप में समझने १ क. ङ. ' यावास्था त । २ छ. भावोऽत्र । ३ क. ङ. ' रो न कि । ४ ' आत्मा जन्तुषु ' च पुस्तके नास्ति । ५ ख. ग. ' सीतीत्थं क । ६ क. ङ. छ. भावः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११८० अग्निपुराणम् तच्छुत्वोवाच ' राजा तं गृहीत्वाऽङ्घ्री क्षमाप्य च । प्रसादं कुरु त्यक्त्वेमां शिविकां ब्रूहि शृण्वते ॥ यो भवान्यन्निमित्तं वा यदागमनकारणम् ॥१९ ॥
ब्राह्मण उवाच श्रूयतां योऽहमित्येतद्वक्तुं नैव च शक्यते । उपभोगनिमित्तं च सर्वत्राऽऽगमनक्रिया ॥२० ॥
सुखदुःखोपभोगौ तु तौ ' देश ( शा ) द्युपपादकौ । धर्माधर्मोद्भवौ भोक्तुं जन्तुर्देशादिमृच्छति ॥२१ ॥
राजोवाच योऽस्ति सोऽहमिति ब्रह्मन्कथं वक्तुं न शक्यते । आत्मन्येष न दोषाय शब्दोऽहमिति यो द्विज ॥ २२ ॥
ब्राह्मण उवाच ` शब्दोऽहमिति दोषाय नाऽऽत्मन्येष तथैव तत् । अनात्मन्यात्मविज्ञानं शब्दो वा भ्रान्तिलक्षणः ॥ २३ ॥
यदा समस्तदेहेषु पुमानेको व्यवस्थितः । तदा हि को भवान्कोऽहमित्येतद्विफलं वचः ॥ २४ ॥
त्वं राजा शिविका चेयं वयं वाहाः पुरःसराः । अयं च भवतो लोको न सदेतन्नृपोच्यते ॥ २५ ॥
वृक्षाद्दारु ततश्चेयं शिविका त्वदधिष्ठिता । का वृक्षसंज्ञा जाताऽस्य दारुसंज्ञाऽथ वा नृप ॥ २६ ॥
वृक्षारूढो महाराजो नायं वदति चेतनः । न च दारुणि सर्वस्त्वां ब्रवीति शिविकागतम् ॥२७ ॥
लगते हैं । यह सुनकर राजा ने उसके चरणों को पकड़कर उससे क्षमा याचना करते हुए कहा- कृपा करके इस पालकी को छोड़कर यह बताइये कि आप कौन हैं? और आपका यहाँ पर आगमन कैसे हुआ ॥१३-१९ ॥ ब्राह्मण बोला - हे राजन्! मेरी बात सुनिये, मैं क्या हूँ यह मैं बतला ही नहीं सकता हूँ । मैं यहाँ सर्वत्र इसलिए घूम रहा हूँ जिससे मैं अपने कर्मों का भोग कर सकूँ । यहाँ पर जिस सुख और दुःख का उपभोग किया जाता है वे धर्म और अधर्म से उत्पन्न होते हैं और उनका उपभोग करने के लिए प्राणियों को देश - देशान्तरों में भटकना पड़ता है ॥२०-२१ ॥ राजा बोले - अये ब्राह्मण! तुम क्यों नहीं कह सकते हो कि जो कुछ सत् है मैं वही हूँ । हे द्विज! आत्मा में ' मैं ' शब्द का प्रयोग दूषित नहीं कहा जाता है ॥२२ ॥
ब्राह्मण बोला - आत्मा में ' मैं ' शब्द का प्रयोग यद्यपि दूषित नहीं है तथापि अनात्मा में आत्मज्ञान भ्रान्ति का लक्षण है । जब शरीरों में एक ही पुरुष ( आत्मा ) निवास करता है तो ' आप कौन हैं और मैं कौन हूँ - इस प्रकार का कथन ही व्यर्थ है । हे राजन्! आप राजा हैं, यह पालकी है, हम लोग वाहक हैं और यह सब लोक आपका है- यह कथन असत्य है । वृक्ष से लकड़ी ली गयी है जिसकी यह पालकी बनी हुई है, जिसके ऊपर आप बैठे हुए हैं किन्तु इस पालकी पर बैठा हुआ देखकर कोई भी मनुष्य यह नहीं कहता है कि महाराज वृक्ष हे राजन्! तुम्हें के ऊपर बैठे हुए हैं । इसी प्रकार आपको किसी लकड़ी पर बैठा हुआ देखकर कोई यह नहीं कहेगा कि आप पालकी पर बैठे हुए हैं ॥२३-२७ ॥ लकड़ी १ ख. ग. ' च यानं तु हित्वा शीघ्रं क्ष । २ ग. देशाद्युपकारकौ । ३ ख. ग्, ' ब्दोऽयमि CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation T
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अशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११८१ शिविका दारुसंघातो रचनास्थितिसंस्थितः पुमान्स्त्री गौरयं वाजी कुञ्जरो विहगस्तरुः जिह्वा ब्रवीत्यहमिति दन्तोष्ठौ तालुकं नृप किं हेतुभिर्वदत्येषा वागेवाहमिति स्वयम् पिण्डः पृथग्यतः पुंसः शिरः पाय्वादिलक्षणः यदन्योऽस्ति परः कोऽपि मत्तः पार्थिवसत्तम परमार्थभेदो न नगो न पशुर्न च पादपः यस्तु राजेति यल्लोके यच्च राजभरात्मकम् त्वं राजा सर्वलोकस्य पितुः पुत्रो रिपो रिपुः । त्वं किमेतच्छिरः किं तु शिरस्तव तथोदरम् समस्तावयवेभ्यस्त्वं पृथग्भूतो व्यवस्थितः । तच्छुत्वोवाच राजा तमवधूतं द्विजं हरिम् । अन्विष्यतां नृपश्रेष्ठ तद्भेदे शिविका त्वया ॥ २८ ॥
॥ देहेषु लोकसंज्ञेयं विज्ञेया कर्महेतुषु ॥ २ ९ ॥ । एतेनाहं यतः सर्वे वानिष्पादनहेतवः ॥ ३० ॥
। तथाऽपि वाङ्नाहमेतदुक्तं मिथ्या न युज्यते ॥ ३१ ॥
। ततोऽहमिति कुत्रैतां संज्ञां राजन्करोम्यहम् ॥ ३२ ॥
। तदेषोऽहमयं चान्यो वाक्तुमेवमपीष्यते ' ॥३३ ॥
। शरीराच्च विभेदाश्च या एते कर्मयोनयः ॥ ३४ ॥
। तच्चान्यच्च नृपेत्थं तु न सत्सम्यगनामयम् ॥३५ ॥
पत्न्याः पतिः पिता सूनोः कस्त्वां भूप वदाम्यहम् ॥ ३६ ॥
। किमु पादादिकं त्वं वै तवैतत्किं महीपते ॥ ३७ ॥
कोऽहमित्यत्र निपुणं भूत्वा चिन्तय पार्थिव ॥ ॥३८ ॥
राजोवाच श्रेयोऽर्थमुद्यतः प्रष्टुं कपिलर्षिमहं द्विज । तस्यांशः कपिलर्षेस्त्वं मत्कृतेदा ( ज्ञा ) नदो भुवि ॥ ३ ९ ॥ ज्ञानवीच्युदधेर्यस्माद्यच्छ्रेयस्तच्च मे वद ॥४० ॥
के समूह को पालकी तभी कहा जाता है जबकि वह एक विशेष प्रकार की रचना में परिणत हो जाती है । हे राजन्! तभी आप लकड़ी और पालकी का भेद कर पाते हैं । यह पुरुष है, यह स्त्री है, यह गाय है, यह घोड़ा है, यह पक्षी है, यह वृक्ष है सभी शरीरधारियों के ये नाम कर्म के हेतु हुआ करते हैं । हे राजन्! दाँत और तालु की सहायता से जिह्वा ‘ मैं ' शब्द का उच्चारण करती है किन्तु ' मैं ' शब्द उन अवयवों का नहीं हो सकता है क्योंकि वे वाणी को उत्पन्न करने के हेतु ही हैं । वाणी ही किसलिए अपने ' मैं ' शब्द का प्रयोग करती है तथापि मैं वाणी नहीं हूँ यह कथन भी असत्य होने से उपयुक्त नहीं कहा जा सकता है ॥२८-३१ ॥ हे राजन्! जब सिर और पायु इत्यादि रूप यह पिण्ड आत्मा से अलग है तो मैं उसके लिए ' मैं ' शब्द का प्रयोग कैसे कर सकता हूँ । हे राजन्! मुझसे जो कुछ भिन्न हैं वही यह मैं हूँ, यह भी कहा जा सकता है । यह पर्वत है, यह पशु है, यह वृक्ष है इस प्रकार का भेद पारमार्थिक भेद नहीं होता है । ये भेद शरीरगत ही हैं जो कि कर्मों का जन्म - स्थान कहा गया है । इस लोक में जो राजा है अथवा जो राजा का योद्धा है - ये सब भेद समीचीन नहीं हैं । आप सारी प्रजा के राजा हैं, अपने पिता के पुत्र हैं इसलिए हे राजन्! आपको क्या कहूँ । तुम सिर हो क्या? ये सिर और उदर तुम्हारे ही नहीं हैं? क्या आप पाद इत्यादि हैं? क्या ये सब आपके नहीं हैं? आप समस्त अवयवों से भिन्न रहा करते हैं । हे राजन्! मैं क्या कहूँ, इस विषय में
बड़ी चतुरता से विचार करो । यह सुनकर राजा ने उस अवधूत रूप विष्णु से कहा ॥३२-३८ ॥
राजा बोले - अये ब्राह्मण! अपने कल्याण के लिए मैंने ऋषि कपिल से भी यही पूछना चाहा था, आप उन्हीं कपिल ऋषि के अंश हैं और इस पृथ्वी पर मुझे ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं । ज्ञान रूपी तरंगों से तरङ्गित सागर में जो भी मेरे लिये कल्याणकारी हो मुझसे बताइये ॥३९ -४० ॥ १ ख. ग. ° ते । पुमान्न देवो न च गौर्न प ° । २ ख. ' पेष्टं तु न सत्संकल्पमानयम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११८२ अग्निपुराणम् ब्राह्मण उवाच भूयः पृच्छसि किं श्रेयः परमार्थं न पृच्छसि । देवताराधनं कृत्वा धनसम्पत्तिमिच्छति । विवेकिनस्तु संयोगः श्रेयो यः परमात्मनः । परमार्थात्मनोर्योगः परमार्थ इतीष्यते । जन्मवृद्धयादिरहित आत्मा सर्वगतोऽव्ययः 1 । ` निदाघऋतुसंवादं वदामि द्विज तं शृणु । निदाघः प्राप्तविद्योऽस्मान्नगरे वै पुरे स्थितः । दिव्ये वर्षसहस्त्रेऽगान्निदाघमवलोकितुम् । भुक्त्यन्ते तृप्तिरुत्पन्ना तुष्टिदा साऽक्षया यतः श्रेयांसि परमार्थानि अशेषाण्येव भूपते ॥ ४१ ॥
पुत्रानिच्छति राज्यं च श्रेयस्तस्यैव किं नृप ॥४२ ॥
यज्ञादिका क्रिया न स्यान्नास्ति द्रव्योपपत्तिता ' ॥४३ ॥
एको व्यापी समः शुद्धो निर्गुणः प्रकृतेः परः ॥ ४४ ॥
परं ( र ) ज्ञानमयोऽसङ्गी गुणजात्यादिभिर्विभुः ॥ ४५ ॥
ऋतुर्ब्रह्मसुतो ज्ञानी तच्छिष्योऽभूत्पुलस्त्यजः ॥४६ ॥
देविकायास्तटे तं च तर्कयामास वै ऋतुः ॥ ४७ ॥
निदाघो वैश्वदेवान्ते भुक्त्वाऽन्नं शिष्यमब्रवीत् ॥ ॥४८ ॥
ऋतुरुवाच क्षुदस्ति यस्य भुक्तेऽन्ने तुष्टिर्ब्राह्मण जायते । न मे क्षुदभवतृप्तिं कस्मात्त्वं परिपृच्छसि ॥ ४ ९ ॥ क्षुक्तृष्णे देहधर्माख्ये न ममैते यतो द्विज ' । पृष्टोऽहं तत्त्वया ब्रूयां तृप्तिरस्त्येव मे सदा ॥ ५० ॥
पुमान्सर्वगतो व्यापी आकाशवदयं ततः । अतोऽहं प्रत्यगात्माऽस्मीत्येतदर्थे भवेत्कथम् ॥५१ ॥
ब्राह्मण बोला- तुम बार - बार कल्याण की बात पूछते हो, परमार्थ के विषय में नहीं पूछते हो । हे राजन्! सभी कल्याण मोक्ष ही हैं । देवताओं का पूजन करके मनुष्य धन और सम्पत्ति की इच्छा करता है, पुत्रों की इच्छा करता है और राज्य की इच्छा करता है । हे राजन्! क्या उसी को कल्याण कहते हैं । विवेकियों के लिए परमात्मा के साथ संयोग ही कल्याणकारी होता है, यज्ञ इत्यादि कर्म और द्रव्य इत्यादि की प्राप्ति नहीं । परमात्मा और आत्मा का संयोग ही परमार्थ कहलाता है । जो एक सर्वव्यापी, सब में समान, शुद्ध, निर्गुण और प्रकृति से परे रहा करता है । आत्मा, जन्म और वृद्धि आदि से रहित, सर्वगत और अवयव होती है । वह सर्वश्रेष्ठ, ज्ञानमय, अनासक्त, गुण और जाति आदि से रहित विभु है ॥४१-४५ ॥ हे द्विज! अब मैं तुमसे निदाघ और ऋतु के संवाद को कहता हूँ, उसे सुनो! ऋतु ब्रह्मपुत्र और ज्ञानी था । उसका एक शिष्य था - पौलस्त्य । निदाघ बड़ा विद्वान् था । ऋतु ने देविका - तट पर उससे विवाद प्रारम्भ किया । वह दिव्य हजार वर्ष व्यतीत होने के बाद निदाघ से मिलने के लिए गया । निदाघ ने वैश्वदेव बलि देकर अन्न खाकर शिष्य से कहा-भोग के बाद तृप्ति उत्पन्न हुई है जो सन्तोषजनक और अविनाशिनी है ॥४६-४८ ॥ ऋतु बोला - हे ब्राह्मण! जो भूखा होता है वह भोजन करने से संतुष्ट होता है । जब मैं भूखा ही नहीं था तो तुम मेरी तुष्टि के सम्बन्ध में क्या पूछते हो । हे ब्राह्मण! भूख और प्यास नामक जो शारीरिक धर्म है वह मुझमें है ही नहीं इसलिए तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में मैं यही कहना चाहता हूँ कि मैं निरन्तर सन्तुष्ट ही रहता हूँ । यह पुरुष ( आत्मा ) सर्वगत और आकाशवत् व्यापी हुआ करता है । इसलिए मैं प्रत्यगात्मा हूँ यह कैसे हो सकता है । वह मैं न जानेवाला हूँ, न आनेवाला क्व वासकः १ क. ख. ग. ङ. ' पपादिता । २ क. ख. ग. ङ. ऋभुसंवादमद्वैतबुद्धये ' शृ । ३ ख. ग. झभुर्ब ' । ४ ख. ग. तुष्टिं गन्ता । ऋभुरु ' । ५ ख. ग. ' ज CC । - ततः 0. JK Sanskrit क्षुत्संभवा Academy तावत्तृप्ति , Jammmu ' ।. ६ ख, ग, ततः कुत्र क्व गन्तासीत्ये ।
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अशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः सोऽहं गन्ता न चाऽऽगन्ता नैकदेशनिकेतनः मृण्मयं हि गृहं यद्वन्मृदा लिप्तं स्थिरी भवेत् ऋतुरस्मि तवाऽऽचार्यः प्रज्ञादानाय ते द्विज एकमेवमिदं विद्धि न भेदः सकलं जगत् ऋतुर्वर्षसहस्रान्ते पुनस्तन्नगरं ययौ एकान्ते स्थीयते कस्मान्निदाघ ऋतुमब्रवीत् ११८३ । त्वंचान्योन भवेन्ना ( र्ना ) पिनान्यस्तत्तोऽस्मि वाऽप्यहम् ॥५२ ॥
। पार्थिवोऽयं तथा देहः पार्थिवैः परमाणुभिः ॥ ५३ ॥
। इहाऽऽगतोऽहं यास्यामि परमार्थस्तवोदितः ॥५४ ॥
। वासुदेवाभिधेयस्य स्वरूपं परमात्मनः ॥५५ ॥
। निदाघं नगरप्रान्त एकान्ते स्थितमब्रवीत् ॥ ॥५६ ॥
निदाघ उवाच भो विप्र जनसंवादो महानेष नरेश्वरः । प्रविवीक्ष्य पुरं रम्यं तेनात्र स्थीयते मया ॥५७ ॥
ऋतुरुवाच नराधिपोऽत्र कतमः कतमश्चेतरो जनः । कथ्यतां मे द्विजश्रेष्ठ त्वमभिज्ञो द्विजोत्तम ॥५८ ॥
निदाघ उवाच योऽयं गजेन्द्रमुन्मत्तमद्रिशृङ्गसमुत्थितम् । अधिरूढो नरेन्द्रो ऽयं परिवारस्तथेतरः ॥५९ ॥
गजो योऽयमधो ब्रह्मन्नुपर्येष स भूपतिः । ऋतुराह गजः कोऽत्र राजा चाऽऽह निदाघकः ॥६० ॥
ऋतुर्निदाघ आरूढो दृष्टान्तं पश्य वाहनम् । उपर्यहं यथा राजा त्वमधः कुञ्जरो यथा ॥६१ ॥
हूँ और न एक स्थान में रहनेवाला हूँ । तुम मुझसे भिन्न नहीं हो और न मैं तुमसे भिन्न हूँ । जिस प्रकार मिट्टी का बना हुआ घर मिट्टी के लेप से स्थिर होता है उसी प्रकार यह पार्थिव शरीर पार्थिव परमाणुओं से स्थिर होता है ॥४९-५३ ॥ हे ब्राह्मण! मैं ऋतु हूँ, तुम्हारा आचार्य तुमको बुद्धि देनेवाला है । इसलिए मैं यहाँ आया हूँ और जब तुम्हें ज्ञान हो जायगा तब मैं चला जाऊँगा । इस सारे जगत् को एक ही समझो, इसमें कोई भेद नहीं हैं क्योंकि यह जगत् वासुदेव नामक परमात्मा का स्वरूप है । एक हजार वर्ष बीत जाने पर ऋतु उस नगर में गया और नगर के एक प्रदेश में रहनेवाले से बोला - निदाघ ने ऋतु से कहा ॥५४-५६ ॥ निदाघ बोला- हे ब्राह्मण! जनता में यह बात फैल गयी है कि महाराज नगर में आकर उसका निरीक्षण करेंगे । इसीलिए मैं यहाँ बैठा हुआ हूँ ॥५७ ॥
ऋतु बोला- यहाँ कौन राजा है और कौन प्रजा है । है द्विजोत्तम! तुम्हीं मुझे यह बताओ क्योंकि तुम ज्ञानी हो ॥५८ ॥
निदाघ बोला - जो व्यक्ति इस उत्तम तथा पर्वत की चोटी के समान ऊँचे गजराज के ऊपर बैठा हुआ है वही राजा है और जो लोग इसके चारों ओर हैं वे ही उसकी प्रजा है । यह जो नीचे है वही हाथी है और जो इसके ऊपर है वही राजा है । निदाघ ने उत्तर दिया - हे ऋतु! तुम नीचे बैठो और मैं तुम्हारे ऊपर सवार हो जाऊँ तो १ ख. प्रविविक्षुः । २ ' योऽयं समुत्थितम् ' नास्ति क. ख. ङ. पुस्तकेषु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११८४ अग्निपुराणम् ऋतुः प्राह निदाघं तं कतमस्त्वामहं वदे । उक्तो निदाघस्तं नत्वा प्राह मे त्वं गुरुर्ध्रुवम् ॥ ६२ ॥
नान्यस्माद्द्द्वैतसंस्कारसंस्कृतं मानसं तथा । ऋतुः प्राह निदाघं तं ब्रह्मज्ञानाय चाऽऽगतः ॥६३ ॥
परमार्थं सारभूतमद्वैतं दर्शितं मया ॥६४ ॥
ब्राह्मण उवाच
निदाघोऽप्युपदेशेन तेनाद्वैतपरोऽभवत् । सर्वभूतान्यभेदेन ददृशे स तदाऽऽत्मनि ॥ ६५ ॥
अवाप मुक्तिं ज्ञानात्स तथा त्वं मुक्तिमाप्स्यसि । एकः समस्तं त्वं चाहं विष्णुः सर्वगतो ' यतः ॥ ६६ ॥
पीतनीलादिभेदेन यथैकं दृश्यते नभः । भ्रान्तिदृष्टिभिरात्माऽपि तथैकः स पृथक्पृथक् ॥६७ ॥
अग्निरुवाच मुक्तिं ह्यवाप भवतो ज्ञानसारेण भूपतिः । संसाराज्ञानवृक्षारि ज्ञानं ब्रह्मेति चिन्तय ॥ ६८ ॥ |
इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽद्वैतब्रह्मविज्ञाननिरूपणं नामाशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३८० ॥
ऊपर रहनेवाला मैं राजा और नीचे रहनेवाले तुम हाथी बन जाओगे । ऋतु ने निदाघ से कहा मैं तुमसे क्या कह रहा हूँ । इस प्रकार कहने पर निदाघ ने प्रणाम करके ऋतु से कहा कि तुम निश्चय ही मेरे गुरु हो क्योंकि तुमने मुझको अद्वैत ज्ञान से संस्कृत कर दिया है । ऋतु ने निदाघ से कहा मैं ब्रह्मज्ञान देने के लिए ही यहाँ आया था इसलिए मैंने सारभूत, परमार्थभूत अद्वैत का उपदेश दिया है ॥ ५ ९ -६४ ॥ ब्राह्मण बोला - उस उपदेश से ब्राह्मण भी अद्वैतमय हो गया । उस समय से वह अपने में बिना किसी भेद के सभी प्राणियों को देखने लगा । उसने ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त कर लिया उसी प्रकार तुम भी मोक्ष प्राप्त कर लोगे । एक ही विष्णु मुझमें, तुममें और सबमें विद्यमान है । जिस प्रकार एक ही आकाश पीले और नीले आदि भेदों में दिखायी पड़ता है उसी प्रकार जिनकी दृष्टि भ्रम से युक्त है उन्हें एक ही आत्मा अलग - अलग दिखायी पड़ती है ॥६५-६७ ॥ अग्निदेव बोले - राजा ने आपके द्वारा ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त कर लिया था । ब्रह्म का चिन्तन करो क्योंकि उसका ज्ञान संसार के अज्ञान रूपी वृक्ष को नष्ट करनेवाली अग्नि है ॥६८ ॥
श्री अग्निमहापुराण में ब्रह्मविज्ञान - निरूपण नामक तीन सौ अस्सीवाँ अध्याय समाप्त ॥३८० ॥
१ क. ख. ग. ङ. ' र्वनिदाघक । पी । २ क. ख. ग. ज्ञानात्सौवीर भू । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकाशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११८५ अथैकाशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः गीतासारं प्रवक्ष्यामि गतासुरगतासुर्वा न ध्यायतो विषयान्पुंसः संमोहात्स्मृतिभ्रंशो कामत्यागादात्मनिष्ठः गीतासारः अग्निरुवाच सर्वगीतोत्तमोत्तमम् । ' कृष्णो यमर्जुनायाऽऽह पुरा वै भुक्तिमुक्तिदम् ॥१ ॥
भगवानुवाच शोच्यो देहवानजः । आत्माऽजरोऽमरोऽभेद्यस्तस्माच्छोकादिकं त्यजेत् ॥ २ ॥
सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्कामस्ततः क्रोधः क्रोधात्संमोह एव च ॥३ ॥
बुद्धिनाशात्प्रणश्यति । दुःसङ्गहानिः सत्संगान्मोक्षकामी च कामनुत् ॥४ ॥
स्थिरप्रज्ञस्तदोच्यते । या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ॥५ ॥
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः । आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ ६ ॥
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ॥७ ॥
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यति ॥८ ॥
अध्याय ३८१ गीतासार अग्निदेव बोले- ( अब मैं ) गीतासार बतलाऊँगा जो सभी गीताओं में उत्तमोत्तम है और जिसे प्राचीनकाल में कृष्ण ने अर्जुन से कहा था । वह ( गीतासार ) भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है ॥ १ ॥
श्री भगवान् बोले- शरीरधारियों के मरने - जीने का शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि यह आत्मा अजन्मा, अजर, अमर और भेदरहित है । इसलिए शोक इत्यादि का परित्याग कर देना चाहिए । जब मनुष्य विषयों का चिन्तन करता रहता है तो उसकी विषयों में आसक्ति उत्पन्न हो जाती है । आसक्ति से कामनाएँ उत्पन्न होती हैं, कामनाओं से क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध से सम्मोह उत्पन्न होता है, सम्मोह से स्मृति नष्ट होती है और बुद्धि का नाश होने मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है । सत्सङ्ग से दुःसङ्गति दूर होती है और मोक्ष की इच्छा करनेवाला कामनाओं का त्याग कर देता है । कामनाओं के परित्याग से आत्मनिष्ठा उत्पन्न होती है जिससे मनुष्य स्थिरप्रज्ञ कहलाता है । जो सभी प्राणियों की रात्रि है उसमें संयमी जागता है और जिसमें सभी प्राणी जागते हैं वह ज्ञानी मनुष्य के लिए रात्रि होती है, जो व्यक्ति अपने - आप में ही सन्तुष्ट रहता है उसका किसी से भी कुछ प्रयोजन नहीं रहता है ॥२-६ ॥ न तो उसे होनेवाले कार्य से कुछ प्रयोजन रहता है और न तो न होनेवाले कार्य से ही कुछ प्रयोजन रहता है । हे वीर! वह गुण और कर्मों के विभाग को भलीभाँति समझता है । सभी गुण गुणों में ही रहा करते हैं - ऐसा समझकर वह उनमें आसक्त नहीं होता है । वह ज्ञान रूपी नौका के द्वारा सभी इच्छाओं को पार कर लेता है । अये अर्जुन! १ छ. ' ष्णोऽर्जुनाय यमाह । ७५ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११८६ अग्निपुराणम् ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ॥९ ॥
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा । ' सर्वभूतेषु चाऽऽत्मानं सर्वभूतानि चाऽऽत्मनि ॥ १० ॥
ईक्ष योगयुक्तात्मा सर्वत्रसमदर्शनः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ११ ॥
न हि कल्याणकृत्कश्चिदुर्गतिं तात गच्छति । दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ॥१२ ॥
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १३ ॥
चतुर्विधा भजन्ते मां ज्ञानी चैकत्वमास्थितः । अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ॥ १४ ॥
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः । अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥१५ ॥
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर । अन्तकाले स्मरन्मां च मद्भावं यात्यसंशयः २ ॥१६ ॥
यं यं भावं स्मरन्नन्ते त्यजेद्देहं तमाप्नुयात् । प्राणं न्यस्य भ्रुवोर्मध्ये अन्ते प्राप्नोति मत्परम् ॥१७ ॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म वदन्देहं त्यजंस्तथा । ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ताः सर्वा मम विभूतयः ॥ १८ ॥
श्रीमन्तश्चोर्जिताः सर्वे ममांशाः प्राणिनः स्मृताः । अहमेको विश्वरूप इति ज्ञात्वा विमुच्यते ॥ १ ९ ॥ क्षेत्रं शरीरं यो वेत्ति क्षेत्रज्ञः स प्रकीर्तितः । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥२० ॥
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ २१ ॥
जो व्यक्ति आसक्तिरहित होकर सभी कर्मों को ब्रह्मार्पण करके करता है उसकी ज्ञानाग्नि सभी कर्मों को भस्म कर देती है । वह पापकर्मों से उसी प्रकार अछूता रहता है जिस प्रकार जल में रहनेवाला कमलपत्र जल से अछूता रहता है । समदर्शी योगी सभी प्राणियों में अपनी आत्मा को और अपने - आप में सभी प्राणियों का दर्शन करता है । योगभ्रष्ट व्यक्ति पवित्रों और धनवानों के घर में जन्म ग्रहण करता है ॥७-११ ॥ हे तात! ( सबका ) कल्याण करनेवाला दुर्गति को प्राप्त नहीं करता है । यह मेरी दैवीमाया गुणमयी और कठिनता से जानी जानेवाली है । इस माया से वही लोग पार हो सकते हैं जो मेरी शरण में आ जाते हैं । हे भरतवंश में श्रेष्ठ! चार प्रकार के लोग मेरी सेवा करते हैं - दु: खी, जिज्ञासु, धन के इच्छुक और ज्ञानी । इनमें से ज्ञानी ही ( मेरे ) एकत्व में स्थित होता है । ब्रह्म अविनाशी और सर्वश्रेष्ठ है । स्वभाव ही अध्यात्म कहा जाता है । प्राणियों और उनके भावों को उत्पन्न करनेवाला ज्ञानकर्म कहा जाता है । संसार तथा उससे सम्बद्ध ज्ञान नश्वर होता है । किन्तु आत्मज्ञान अनन्त कहा गया है । देहधारियों में श्रेष्ठ! कर्मयोगी मनुष्यों के यज्ञों में मैं ही रहा करता हूँ । अन्तकाल में मेरा स्मरण करते हुए निश्चय ही मनुष्य मुझे प्राप्त कर लेता १६ ॥ अन्त समय में मनुष्य जिस - जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है है ॥१२-करता है । दोनों भृकुटियों के बीच में प्राणों को रखकर मेरा ध्यान उसी को वह प्राप्त उच्चारण करते हुए और ' ओम् ' इस एकाक्षर ब्रह्म का करते हुए जो व्यक्ति प्राणों को छोड़ता है वह मुझे प्राप्त करता है । ब्रह्म से लेकर अणुपर्यन्त सभी मेरी विभूतियाँ हैं । धनवान् तथा वीर प्राणी मेरे ही अंश कहे गये हैं । मैं ही विश्वरूप हूँ, ऐसा जान लेने से मनुष्य मुक्त हो जाता है । क्षेत्र कहते हैं शरीर को और उसको जाननेवाला क्षेत्रज्ञ कहा गया है । क्षेत्र ज्ञान ही मेरा ज्ञान माना गया है । पंचमहाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त दस और क्षेत्रज्ञ का इन्द्रियाँ, पाँच इन्द्रियों के विषय, १ क. ख. ग. ङ. ' भूतस्थमात्मा ' । २ ख. ग. ' शयम् । यं । ३ छ. सर्वे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA