अग्नि पुराण — पृष्ठ 1191–1200

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1191–1200

पृष्ठ 1191

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एकाशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११८७ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार · एव च असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी अध्यात्मज्ञाननिष्ठत्वं तत्त्वज्ञानानुदर्शनम् ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यं ज्ञा ( यज्ज्ञा ) त्वामृतमश्नुते सर्वतः पाणिपादान्तं स ( दं तत्स ) र्वतोक्षिशिरोमुखम् सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ध्यानेनाऽऽत्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ॥ एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ २२ ॥

। आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥२३ ॥

। जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥२४ ॥

। नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥२५ ॥

। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥२६ ॥

। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥२७ ॥

। ' अनादि परमं ब्रह्म सत्त्वं नाम तदुच्यते ॥ २८ ॥

। सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ २ ९ ॥ । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥३० ॥

सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिकेऽपि यत् ॥ ३१ ॥

। भूतभर्तृ च विज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ ३२ ॥

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य संस्थितम् ॥३३ ॥

अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन ( ण ) चापरे ॥ ३४ ॥

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, उन सबका समूह, चेतना और धैर्य इन सबको संक्षेपतः विकारयुक्त क्षेत्र कहा गया है ॥१७-२२ ॥ ज्ञान के विषय हैं - मानरहित होना, दम्भरहित होना, अहिंसा, क्षमा, ऋजुता, आचार्य - पूजा, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, विषयों से वैराग्य, अहंकारहीनता, जन्म - मृत्यु, जरा, व्याधि, दुःख और दोषों का ज्ञान, पुत्र, कलत्र और गृह आदि में अनासक्ति, इष्ट और अनिष्ट में नित्य समान रूप से रहना, मेरे प्रति अनन्य भाव से दोषरहित भक्ति, एकान्तवास, जनसमूह से वैराग्य, अध्यात्मज्ञान, निष्ठा और तत्त्वज्ञान जो कुछ इससे भिन्न है उसे अज्ञान कहा गया है । अब मैं उसे बताऊँगा जो जानने योग्य है और जिसे जानकर अमृत की प्राप्ति होती है । वह अनादि और परब्रह्म है जिसे सत्त्व कहा जाता है ॥२३-२८ ॥ उसके हाथ और पैर सब ओर फैले रहते हैं, उसके नेत्र, सिर और मुख सभी ओर रहते हैं । वह लोक में सब - कुछ सुननेवाला और सबको आवृत करके रहता है । वह सभी इन्द्रियों के गुणों से आभासित होते हुए भी सभी इन्द्रियों से रहित होता है । वह आसक्तिहीन, सबका भरण करनेवाला, निर्गुण और गुणों का भोक्ता है । वह प्राणियों के बाहर और भीतर रहता है । वही चर और अचर है । सूक्ष्म होने के कारण वह अविज्ञेय है और दूर होते हुए भी निकट है । वह अविभक्त होते हुए भी प्राणियों में विभक्त - सा रहता है । वही प्राणियों का भरण करनेवाला, विज्ञेय, सबको ग्रसित करनेवाला और सबसे शक्तिशाली है । वह ज्योतियों में भी ज्योति और अन्धकार से परे रहनेवाला कहा गया है । वही ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञानगम्य और सबके हृदयों में रहनेवाला है ॥ २ ९ -३३ ॥ कुछ लोग ध्यान में अपने में अपनी आत्मा को देखते हैं । अन्य लोग इसे सांख्य योग से देखते हैं और दूसरे इसे कर्मयोग से देखते हैं । १ ख. ग. दिमत्परम् ब्रह्म न सत्तन्नासदु । २ क. ङ. ' र्वभूतेषु नि । ख. ग. ' र्वभूतेभ्यो नि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1192

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११८८ अग्निपुराणम् अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च न शौचं नापि वाऽ ( चा ) चारो ह्यासुरी संपदोद्भवः यज्ञस्तपस्तथा दानं सत्त्वाद्यैस्त्रिविधं स्मृतम् दुःखशोकामयायान्नं तीक्ष्णरूक्षं तु राजसम् यष्टव्यो विधिना यज्ञो निष्कामाय स सात्त्विकः श्रद्धामन्त्रादिविध्युक्तं तपः शारीरमुच्यते अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं स्वाध्यायसज्जपः सात्त्विकं च तपोऽकामं फलाद्यर्थं तु राजसम् । तेऽपि चाऽऽशु तरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ ३५ ॥

। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ ३६ ॥

। मानावमानमित्रारितुल्यस्त्यागी स निर्गुणः ॥ ३७ ॥

। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ ३८ ॥

। अहिंसादिः क्षमा चैव दैवी संपत्ततो नृणाम् ॥ ३ ९ ॥ । ' नरकत्वात्क्रो ( दाः क्रो ) धलोभकामास्तस्मात्त्रयं त्यजेत् ॥४० ॥

। आयुः सत्त्वं बलारोग्यसुखायान्नं तु सात्त्विकम् ॥४१ ॥

। अमेध्योच्छिष्टपूत्यन्नं तामसं नीरसादिकम् ॥४२ ॥

। यज्ञः फलाय दम्भाय राजसस्तामसः क्रतुः ॥ ४३ ॥

। देवादिपूजाऽहिंसादि वाङ्मयं तप उच्यते ॥ ४४ ॥

। मानसं ' चित्तसंशुद्धिर्मौनमात्मविनिग्रहः ॥ ४५ ॥

। तामसं परपीडायै सात्त्विकं दानमुच्यते ॥४६ ॥

अन्य लोग उसे न जानते हुए भी दूसरों से सुनकर उसकी उपासना किया करते हैं । ब्रह्म के श्रवण में लगे हुए भी वे लोग शीघ्र ही ( संसार - सागर को ) पार कर लेते हैं । सत्त्व से ज्ञान और रजस् से लोभ उत्पन्न होता है । तमोगुण के प्रमाद और मोह तथा संसार से अज्ञान उत्पन्न होता है । इस प्रकार से रहनेवाले गुणों में जो अविचल भाव से स्थित रहता है और मान - अपमान तथा शत्रु - मित्र में समान व्यवहार करनेवाला और त्यागी होता है वही निर्गुण है । ज्ञान का जो अश्वत्थ तरु है उसकी जड़ें ऊपर की ओर और शाखाएँ नीचे की ओर रहती हैं । उसे अव्यय कहा गया है तथा छन्द ही उसके पत्ते हैं । इस प्रकार जो उस अश्वत्थ तरु को जाननेवाला है वही वेदज्ञ है ॥ ३४-३८ ॥ इस संसार में प्राणियों की सृष्टियाँ दो प्रकार की हैं - एक दैवी और दूसरी आसुरी । अहिंसा इत्यादि और क्षमा दैवी सम्पत्ति हैं तथा अशौच और अनाचार आसुरी सम्पत्तियों से उत्पन्न होते हैं । क्रोध, लोभ और काम नरक के हेतु हैं इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए । यज्ञ, तप एवं दान सात्त्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार के कहे गये हैं । सात्त्विक अन्न, आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य और सुख के लिए होता है । तीखा और रूखा अन्न राजस है जो दुःख, शोक, रोग के लिए होता है । नीरस इत्यादि अमेध्य, उच्छिष्ट और दुर्गन्धयुक्त अत्र तामस कहा गया है । सात्त्विक यज्ञ वह कहलाता जो बिना किसी कामना के विधिपूर्वक किया जाता है । फल के लिए किया जानेवाला यज्ञ राजस और है के लिए किया जानेवाला यज्ञ तामस है । श्रद्धा मन्त्र इत्यादि और विधिपूर्वक किया गया दम्भ गया है तथा देव आदि की पूजा और हिंसादि वाङ्मय तप कहा जाता है ॥ ३ ९ -४४ ॥ उद्विग्न तप शारीरिक तप कहा सत्य कहलाता है । जप कहते हैं स्वाध्याय को जिससे मन की शुद्धि होती है और मौन से आत्म - निग्रह न करनेवाला वाक्य तप सात्त्विक और फल इत्यादि के लिए किया गया तप राजस कहलाता होता है । इच्छारहित दूसरों को पीड़ित करने के लिए है तथा तामस तप उसे कहते हैं जो किया जाता है । ( उचित ) देश आदि में दिया गया दान तामस दान कहा गया है । १ छ. ' पत्तितो । २ " नरकत्वात्को ( क्षः क्रो ) त्रयं त्यजेत् " इत्यत्र “ त्रिविधं क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेदिति क. ङ. पुस्तकयोः नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः CO. JK Sanskrit Academy Sa: पादम्भार्थ । ४ क. ङ. ' शुद्धेम ' ।

पृष्ठ 1193

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एकाशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११८ ९ देशादौ चैव दातव्यमुपकाराय राजसम् ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् तामसः ' कर्मसंयोगान्मोहात्क्लेशभयादिकात् अधिष्ठानं तथा कर्त्ता करणं च पृथग्विधम् एकं ज्ञानं सात्त्विकं स्यात्पृथग्ज्ञानं तु राजसम् कामाय राजसं कर्म मोहात्कर्म तु तामसम् शठोऽलसस्तामसः स्यात्कार्यादिधीश्च सात्त्विकी मनोधृतिः सात्त्विकी स्यात्प्रीतिकामेति राजसी सुखं तद्राजसं चाग्रे अन्ते दुःखं तु तामसम् स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य विष्णुं सिद्धं च विन्दति । ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगद्विष्णुं च वेत्ति यः ॥ अदेशादाववज्ञातं तामसं दानमीरितम् ॥४७ ॥

। यज्ञदानादिकं कर्म भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणाम् ॥४८ ॥

। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥४९ ॥

। राजसः सात्त्विकोऽकामात्पञ्चैते कर्महेतवः ॥ ५० ॥

। त्रिविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥५१ ॥

। अतत्त्वार्थं तामसं स्यात्कर्माकामाय सात्त्विकम् ॥५२ ॥

। सिद्ध्यसिद्ध्योः समः कर्ता सात्त्विको राजसो ह्यपि ॥५३ ॥

। कार्यार्थं सा राजसी स्याद्विपरीता तु तामसी ॥५४ ॥

। तामसीतुप्र ( पुत्र (? ) ) शोकादौ सुखं सत्त्वात्तदन्तगम् ॥ ५५ ॥

। अतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ॥५६ ॥

कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा ॥५७ ॥

सिद्धिमाप्नोति भगवद्भक्तो भागवतो ध्रुवम् ॥५८ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये गीतासारनिरूपणं नामैकाशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३८१ ॥

‘ ॐ तत्सत् ' इस प्रकार से ब्रह्म का त्रिविध निर्देश किया गया है । यज्ञ और दान आदि कर्म मनुष्यों को भोग और मोक्ष देनेवाले होते हैं । कर्म का फल तीन प्रकार का होता है - अनिष्ट, इष्ट और इष्टानिष्ट । यह उन्हीं के लिए होता है जो बिना त्याग के शरीर छोड़ते हैं । संन्यासियों में यह कभी भी नहीं होता है । कर्म के हेतु पाँच हैं - तामस हेतु जो कर्म संयोग और मोह से होता है, राजस हेतु जो क्लेश और भय आदि से होता है और सात्त्विक हेतु जो कामनाओं के नाश से होता है ॥४५-५० ॥ भेदरहित ज्ञान सात्त्विक, पृथग् ज्ञान राजस और तत्त्वहीन ज्ञान तामस कहा गया है । जो कर्म बिना किसी कामना के किया जाता है वह सात्त्विक कर्म, जो किसी कामना से किया जाता है वह राजस कर्म और जो मोहवश किया जाता है वह तामस कर्म कहलाता है । कार्य की सफलता और असफलता में समान रूप से रहनेवाला कर्त्ता सात्त्विक है, जो राजस कर्त्ता के विपरीत इन दोनों में से किसी से प्रभावित नहीं होता है और तामस कर्त्ता शठ तथा आलसी हुआ करता है । कार्य के आदि में रहनेवाली बुद्धि सात्त्विकी, कार्य के लिए रहनेवाली बुद्धि राजसी और इन दोनों से विपरीत रहनेवाली बुद्धि तामसी कहलाती है । मानसिक धैर्य बुद्धि सात्त्विक, प्रीति की इच्छा करनेवाली राजसी और शोक आदि में रहनेवाली बुद्धि तामसी है, सात्त्विक सुख आदि से अन्त तक रहता है ॥५१-५५ ॥ राजसिक कर्म अन्त में सुखकारी होता है और तामसिक कर्म आदि और अन्त दोनों में दुःखदायी होता है । इसलिए प्राणियों की प्रवृत्ति सात्त्विक कर्मों में ही होनी चाहिए उसी प्रवृत्ति से यह सब - कुछ व्याप्त है । अपने धर्म से विष्णु की आलोचना करके मनुष्य को सिद्धि प्राप्त होती है जो व्यक्ति मन, वचन और कर्म से सभी अवस्थाओं और सभी कालों में ब्रह्म से लेकर अणुपर्यन्त इस जगत् और विष्णु को जानता है वह भगवद्भक्त निश्चय ही सिद्धि को प्राप्त कर लेता है ॥५६-५८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में गीतासार - निरूपण नामक तीन सौ इक्यासीवाँ अध्याय समाप्त ॥३८१ ॥

१ ख. ग. ' व विज्ञातमु । २ क. ङ. संन्यासो मोहा । ख. ग. ' संत्यागो मोहा । ३ क. ग. ' र्यादिधीरा ' । ४ ख. ग. ङ. ' त्वाद्य उत्तमः । सु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1194

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११ ९ ० अग्निपुराणम् अथ द्वयशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः यमगीता अग्निरुवाच यमगीतां प्रवक्ष्यामि उक्ता या ' नाचिकेतसे । पठतां शृण्वतां भुक्त्यै मुक्त्यै मोक्षार्थिनां सताम् ॥१ ॥

यम उवाच

आसनं शयनं यानं परिधानगृहादिकम् । वाञ्छत्यहो ऽतिमोहेन सुस्थिरं स्वयमस्थिरः ॥२ ॥

भोगेषु श ( ष्वस ) क्तिः सततं तथैवाऽऽत्मावलोकनम् । श्रेयः परं मनुष्याणां कपिलोद्गीतमेव हि ॥ ३ ॥

सर्वत्र समदर्शित्वं निर्ममत्वमसङ्गता । श्रेयः परं मनुष्याणां गीतं पञ्चशिखेन हि || ४ || आगर्भजन्मबाल्यादिवयोऽवस्थादिवेदनम् | श्रेयः परं मनुष्याणां गङ्गाविष्णुप्रगीतकम् ॥५ ॥

आध्यात्मिकादिखुःखानामाद्यन्तादिप्रतिक्रिया । श्रेयः परं मनुष्याणां जनकोद्गीतमेव च ॥ ६ ॥

अभिन्नयोर्भेदकरः प्रत्ययो यः परात्मनः । तच्छान्तिपरमं श्रेयो ब्रह्मोद्गीतमुदाहृतम् ॥७ ॥

कर्तव्यमिति यत्कर्म ऋग्यजुः सामसंज्ञितम् । कुरुते श्रेयसेऽसङ्गाज्जैगीषव्येण गीयते ॥८ ॥

हानिः सर्वविधित्सानामात्मनः सुखहैतुकी । श्रेयः परं मनुष्याणां देवलोद्गीतमीरितम् ॥९ ॥

अध्याय ३८२ यमगीता अग्निदेव बोले - अब मैं वह यमगीता सुनाऊँगा जो नचिकेता को सुनायी गयी थी जिसके पढ़ने और सुनने से मुमुक्षु सज्जनों को भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥१ ॥

यम बोले - ये मनुष्य स्वयं अस्थिर होते हुए भी मोहवश स्थिर रहनेवाले आसन, शयन, यान, परिधान और गृह आदि की इच्छा करते हैं - यह कितने आश्चर्य की बात है । कपिल ने पहले ही बताया है कि भोगों में अनासक्ति तथा निरन्तर आत्मदर्शन ही मनुष्यों का परम कल्याण है । पंचशिख ने भी यही कहा है कि सर्वत्र समदर्शित्व, निर्ममत्व और असंगता मनुष्यों के परम कल्याण का साधन है । गर्भ से लेकर जन्म और बाल्य आदि अवस्थाओं मनुष्यों के परम कल्याण का हेतु है - यह गंगाविष्णु का गान है । जनक के द्वारा बताया गया मनुष्यों का ज्ञान इसमें है कि वह आध्यात्मिक आदि दुःखों को क्षणिक समझकर धैर्यपूर्वक का परम कल्याण अभिन्न हैं । इनमें भेद की प्रतीति का निवारण सहन करे । ' जीवात्मा और परमात्मा वस्तुतः के अनुसार करना परम कल्याण का हेतु है'- यह ब्रह्मा का सिद्धान्त है । जैगीषव्य अनासक्त भाव से कल्याण के लिए ऋक्, यजु और साम के द्वारा बताये गये कर्म को करना कल्याणकारक है ॥२-८ ॥ देवल के द्वारा वर्णित है कि सब प्रकार से अपने द्वारा किये जानेवाले कर्मों का नाशही सभी सुखों १ छ. माचिकेतसे । २ सर्वत्र विसङ्गत नास्ति वः पुस्तकें Foundation । " USA

पृष्ठ 1195

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द्वयशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११ ९ १ कामत्यागात्तु विज्ञानं सुखं ब्रह्म परं पदम् प्रवृत्तं च निवृत्तं च कार्यं कर्म परोऽब्रवीत् पुमांश्चाधिगतज्ञानो भेदं नाऽऽप्नोति सत्तमः । ज्ञानं विमानमास्तिक्यं सौभाग्यं रूपमुत्तमम् । नास्ति विष्णुसमं ध्येयं तपो नानशनात्परम् । न सोऽस्ति बान्धवः कश्चिद्विष्णुं मुक्त्वा जगद्गुरुम् । इत्येव संस्मरन्प्राणान्यस्त्यजेत्स हरिर्भवेत् । अग्राह्यकमनिर्देश्यं सुप्रतिष्ठं च यत्परम् । यज्ञेशं यज्ञपुरुषं केचिदिच्छन्ति तत्परम् । इन्द्रादिनामभिः केचित्सूर्यं सोमं च कालकम् । स विष्णुः परमं ब्रह्म यतो नाऽऽवर्तते पुनः । ध्यानैर्व्रतैः पूजया च धर्मश्रुत्या ' तदाप्नुयात् । बुद्धि तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ कामिनां नहि विज्ञानं सनकोद्गीतमेव तत् ॥१० ॥

। श्रेयसां श्रेय एतद्धि नैष्कर्म्यं ब्रह्म तद्धरिः ॥ ११ ॥

ब्रह्मणा विष्णुसंज्ञेन परमेणाव्ययेन च ॥१२ ॥

तपसा लभ्यते सर्वं मनसा यद्यदिच्छति ॥१३ ॥

नास्त्यारोग्यसमं धन्यं नास्ति गङ्गासमा सरित् ॥१४ ॥

अधश्चोर्ध्वं हरिश्चाग्रे देहेन्द्रियमनोमुखे ॥१५ ॥

यत्तद्ब्रह्म यतः सर्वं यत्सर्वं तस्य संस्थितम् ॥१६ ॥

परापरस्वरूपेण विष्णुः सर्वहृदिस्थितः ॥१७ ॥

केचिद्विष्णुं हरं केचित्केचिद्ब्रह्माणमीश्वरम् ॥ १८ ॥

ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगद्विष्णुं वदन्ति च ॥ १ ९ ॥ सुवर्णादिमहादानपुण्यतीर्थावगाहनैः ॥२० ॥

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ॥ २१ ॥

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांश्चेति गोचरान् ॥ २२ ॥

यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ॥ २३ ॥

का हेतु है । सनक के द्वारा कामियों का जो विज्ञान बताया गया है वह है कामनाओं का परित्याग जो कि सुख और परब्रह्म के समान है । कर्म दो प्रकार के होते हैं - प्रवृत्त कर्म और निवृत्त कर्म । इनमें से निवृत्त कर्म सर्वश्रेष्ठ और कल्याणों में भी परमकल्याण तथा ब्रह्मरूप विष्णु है । ज्ञानी पुरुष विष्णुसंज्ञक और अव्यय ब्रह्म से कभी भेद को नहीं प्राप्त होता है । तपस्या के द्वारा मनुष्य ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य, सौभाग्य, श्रेष्ठरूप तथा अन्य मनोवांछित कामनाओं को प्राप्त कर लेता है ॥९ -१३ ॥ विष्णु के समान कोई ध्येय नहीं है, उपवास से बढ़कर कोई तप नहीं है, नीरोग के समान कोई धन्य नहीं है और गंगा के समान कोई नदी नहीं है । जगद्गुरु विष्णु को छोड़कर अन्य कोई बान्धव नहीं है । भगवान् विष्णु ही नीचे, ऊपर, आगे, शरीर में, इन्द्रिय में, मन में और सुख में हैं । इस प्रकार स्मरण करते हुए जो व्यक्ति अपने प्राणों को छोड़ता है वह विष्णु हो जाता है । ब्रह्म से ही सब - कुछ उत्पन्न होता है और उसी में स्थित रहता है । वह ब्रह्म जो अग्राह्य, अनिर्देश्य, सुप्रतिष्ठित और सर्वश्रेष्ठ है वही परस्पर रूप से विष्णु के रूप में सभी के हृदय में स्थित रहता है । कुछ लोग यज्ञेश की इच्छा करते हैं और कुछ लोग यज्ञपुरुष की इच्छा करते हैं । कुछ लोग विष्णु की, कुछ लोग शिव की और कुछ ब्रह्मा की कामना करते हैं ॥१४- १८ ॥ कुछ लोग इन्द्र इत्यादि नामों से सूर्य, सोम, काल, ब्रह्म से लेकर अणु तक सम्पूर्ण जगत् को और विष्णु को सम्बोधित करते हैं । वही विष्णु और वही परब्रह्म है जिससे पुनरावृत्ति नहीं होती है । उसे सुवर्ण इत्यादि महादान से, पुण्यतीर्थों में स्नान करने से, ध्यान और व्रतों से तथा पूजा और धर्मोपदेश सुनने से प्राप्त किया जा सकता है । आत्मा को रथी समझिये, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी और मन को रस्सी । इन्द्रियों को घोड़े और विषयों को चाबुक कहा गया है । बुद्धिमानों ने आत्मा, इन्द्रिय और मन से युक्त रहनेवाले को भोक्ता कहा है । जो ज्ञानवान् तथा विरक्त नहीं होता है वह मोक्ष पद को प्राप्त नहीं करता है और संसार में लौट आता है किन्तु जो व्यक्ति ज्ञानवान् होता है और जिसका मन परब्रह्म में निरत १ ख. ग. तमाप्नु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1196

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११ ९ २ अग्निपुराणम् न सत्पदमवाप्नोति संसारं चाधिगच्छति स तत्पदमवाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते सोऽध्वानं परमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः दृश्यते त्वग्र ( ग्य ) या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेच्छान्त आत्मनि अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ स्वाध्यायेश्वरपूजा च आसनं पद्मकादिकम् शुभे ह्येकत्र विषये चेतसो यत्प्रधारणम् पौनः पुण्येन तत्रैव विषयेष्वेव धारणा घटध्वंसाद्यथाऽऽकाशमभिन्नं नभसा भवेत् आत्मानं मन्यते ब्रह्म जीवो ज्ञानेन नान्यथा । यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ॥ २४ ॥

। विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः ॥ २५ ॥

। इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ॥ २६ ॥

। महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ॥२७ ॥

। एषु सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा न प्रकाशते ॥ २८ ॥

। यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञानमा ( न आ ) त्मनि ॥ २ ९ ॥ । ज्ञात्वा ब्रह्मात्मनोर्योगं यमाद्यैर्ब्रह्म सद्भवेत् ॥ ३० ॥

। यमाश्च नियमाः पञ्च शौचं सन्तोषसत्तपः ॥ ३१ ॥

। प्राणायामो वायुजयः प्रत्याहारः स्व ( ख ) निग्रहः ॥ ३२ ॥

। निश्चलत्वात्तु धीमद्भिर्धारणा द्विज कथ्यते ॥ ३३ ॥

। ध्यानं स्मृतं समाधिस्तु अहंब्रह्मात्मसंस्थितिः ॥३४ ॥

। मुक्तो जीवो ब्रह्मणैवं सद्ब्रह्म ब्रह्म वै भवेत् ॥ ३५ ॥

। जीवो ह्यज्ञानतत्कार्यमुक्तः स्यादजरामरः ॥३६ ॥

रहता है वह उस परमपद को प्राप्त कर लेता है जहाँ से उसे फिर इस संसार में आना नहीं पड़ता है ॥ १ ९ -२ -२३३ ॥ ज्ञानरूपी सारथी और मनरूपी रस्सियों से युक्त मनुष्य उस मार्ग को प्राप्त करता है जो विष्णु का परमपद कहा गया है । इन्द्रियों से परे विषय है, विषयों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है और बुद्धि से परे आत्मा है । उस आत्मा से परे अव्यक्त और अव्यक्त से भी परे परमपुरुष है । उस परमपुरुष से परे कुछ भी नहीं है । वही सबकी पराकाष्ठा और परमगति है । इन सभी प्राणियों में गूढ़ रूप से रहनेवाली आत्मा प्रकाशित नहीं होती है । वह तो केवल सूक्ष्मद्रष्टा लोगों के द्वारा सूक्ष्म और अग्रबुद्धि के द्वारा देखी जाती है । विद्वान् को अपनी वाणी और मन पर नियन्त्रण करना चाहिए और आत्मा में ज्ञान को नियन्त्रित करना चाहिए क्योंकि यम आदि से ब्रह्म और आत्मा का योग जान लेने से मनुष्य सब्रह्म हो जाता है ॥२४-३० ॥ यम पाँच हैं - अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह । नियम भी पाँच हैं - शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर - पूजा । पद्म आदि आसन प्राणायाम वायु से उत्पन्न होता है और प्रत्याहार कहते हैं आत्मनिग्रह को । हे ब्राह्मण! किसी शुभ वस्तु में निश्चल हैं । रूप से चित्त के लगाने को ही बुद्धिमानों ने धारणा कहा है । उन्हीं विषयों में पुनः - पुनः मन लगाना गया है । ' मैं ब्रह्म हूँ'- -इस प्रकार की स्थिति समाधि कहलाती है । जिस प्रकार घड़े के ध्यान कहा प्रतिबिम्बित होनेवाला ) आकाश आकाश टूट जाने पर ( उसमें में मिल जाता है उसी प्रकार ब्रह्म से युक्त होने पर जीव ब्रह्म ही हो जाता है क्योंकि वह ब्रह्मस्वरूप ही है । ब्रह्म ही आत्मा है जिसे अज्ञान के कारण जीव अज्ञान तथा उसके कार्यों से मुक्त अजर और अमर है ३६ ndation USA जीव समझा जाता है । यह

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त्र्यशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११ ९ ३ अग्निरुवाच वशिष्ठ यमगीतोक्ता पठतां भुक्तिमुक्तिदा । आत्यन्तिको लयः प्रोक्तो वेदान्तब्रह्मधीमयः ॥ ३७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये यमगीताकथनं नाम द्वयशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३८२ ॥

अथ त्र्यशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः आग्नेयमहापुराणमाहात्म्यम् अग्निरुवाच आग्नेयं ब्रह्मरूपं ते पुराणं कथितं मया । सप्रपञ्चं निष्प्रपञ्चं विद्याद्वयमयं महत् ॥१ ॥

ऋग्यजुः सामाथर्वाख्या विद्या विष्णुर्जगज्जनिः । छन्दः शिक्षाव्याकरण ( ण ) निघण्टुज्योतिराख्यकाः ॥२ ॥

निरुक्तधर्मशास्त्रादिमीमांसान्यायविस्तराः । आयुर्वेद पुराणाख्या धनुर्गन्धर्वविस्तराः ॥३ ॥

` विद्या सैवार्थशास्त्राख्या वेदान्तान्या (? ) हरिर्महान् । इत्येषा चापरा विद्या परविद्याऽक्षरं परम् ॥४ ॥

यस्य भावोऽखिलं विष्णुस्तस्य नो बाधते कलिः । अनिष्ट्वा तु महायज्ञानकृत्वाऽपि पितृस्वधाम् ॥५ ॥

कृष्णमभ्यर्चयन्भक्त्या नैनसो भाजनं भवेत् । सर्वकारणमत्यन्तं विष्णुं ध्यायन्न सीदति ॥६ ॥

अन्यतन्त्रादिदोषोत्थो विषयाकृष्टमानसः । कृत्वाऽपि पापं गोविन्दं ध्यायन्पापैः प्रमुच्यते ॥७ ॥

अग्निदेव बोले - हे वशिष्ठ! मैंने जिस यमगीता को कहा है उसका पाठ करने से भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है । यही आत्यन्तिक लय कहा गया है और यही वेदान्तियों की बुद्धि से युक्त रहता है ॥ ३७ ॥

श्री अग्निमहापुराण में यमगीता - कथन नामक तीन सौ बयासीवाँ अध्याय समाप्त ॥३८२ ॥

अध्याय ३८३ अग्निमहापुराण- माहात्म्य अग्निदेव बोले - मैंने तुमसे ब्रह्मरूप अग्निपुराण कह दिया है । यह सप्रपञ्च और निष्प्रपञ्च ( परा ) दोनों विद्याओं से युक्त है । प्रथम प्रकार की विद्या के अन्तर्गत आनेवाले विषय हैं - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, छन्दःशास्त्र, शिक्षा, व्याकरण, निघण्टु, ज्योतिष, निरुक्त, धर्मशास्त्र, मीमांसा, न्याय, आयुर्वेद, पुराण, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थशास्त्र । द्वितीय प्रकार की विद्या में आनेवाला है वेदान्त दर्शन तथा वह ज्ञान जो ब्रह्म - साक्षात्कार करा देता है । जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक विष्णु का चिन्तन करता रहता है उसे कलि पीड़ित नहीं करता है । चाहे वह महायज्ञों का अनुष्ठान न करे या पितरों को बलि न दे ॥१-५ ॥ भक्तिपूर्वक कृष्ण की अर्चना करने से मनुष्य पाप का भागी नहीं होता है । सभी के कारणभूत विष्णु का ध्यान करने से मनुष्य किसी दुःख में नहीं फँसता है । जो व्यक्ति गोविन्द ( कृष्ण ) का ध्यान करता है, वह सभी पापों से छुटकारा पा जाता है । चाहे उनमें अन्य प्रकार के तन्त्रों से उत्पन्न होनेवाले १ विद्ध्यद्व । २ ख. ग. ' द्यश्चैिव खगः ताद्या ह rized by S3 Foundation USA

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११ ९ ४ अग्निपुराणम् तद्ध्यानं यत्र गोविन्दः सा कथा यत्र केशवः । न तत्पिता तु पुत्राय न शिष्याय गुरुर्द्विजः । संसारे भ्रमता लभ्यं पुत्रदारधनं वसु । किं पुत्रदारैर्मित्रैर्वा किं मित्रक्षेत्रबान्धवैः ।

द्विविधो ' भूतसर्गोऽयं दैव आसुर एव च ।

एतत्पवित्रमारोग्यं धन्यं दुःस्वप्ननाशनम् ॥

येषां गृहेषु लिखितमाग्नेयं हि पुराणकम् । किं तीर्थैर्गोप्रदानैर्वा किं यज्ञैः किमुपोषितैः यो ददाति तिलप्रस्थं सुवर्णस्य च माषकम् । अध्याय पठनं चास्य गोप्रदानाद्विशिष्यते कपिलानां शते दत्ते यद्भवेज्ज्येष्ठपुष्करे प्रवृत्तं च निवृत्तं च धर्मं विद्याद्वयात्मकम् पठन्नाग्नेयकं नित्यं शृण्वन्वाऽपि पुराणकम् तत्कर्म यत्तदर्थीयं किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥८ ॥

परमार्थं परं ब्रूयाद्यदेतत्ते मयोदितम् ॥९ ॥

सुहृदश्च तथैवान्ये नोपदेशो द्विजेदृशः ॥१० ॥

उपदेशः परो बन्धुरीदृशो यो विमुक्तये ॥ ११ ॥

विष्णुभक्तिपरो दैवो विपरीतस्तथाऽऽसुरः ॥ १२ ॥

सुखप्रीतिकरं नृणां मोक्षकृद्यत्तवेरितम् ॥१३ ॥

पुस्तकं स्थास्यति सदा तत्र नेशुरुपद्रवाः ॥१४ ॥

। आग्नेयं ये हि शृण्वन्ति अहन्यहनि मानवाः ॥ १५ ॥

शृणोति श्लोकमेकं च आग्नेयस्य तदाप्नुयात् ॥१६ ॥

। अहोरात्रकृतं पापं श्रोतुमिच्छोः प्रणश्यति ॥ १७ ॥

। तदाग्नेयं पुराणं हि पठित्वा फलमाप्नुयात् ॥ १८ ॥

। आग्नेयस्य पुराणस्य शास्त्रस्यास्य समं न हि ॥ १ ९ ॥ । भक्तो वशिष्ठ मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥२० ॥

दोष हों, चाहे उसका मन विषयों में आसक्त हो अथवा वह पापकर्म ही क्यों न करता है । अधिक कहने से क्या लाभ? वही ध्यान है जिसमें गोविन्द हों, वही कथा है जिसमें केशव हों और वही कर्म है जो उन ( कृष्ण ) के उद्देश्य से किया गया हो । मैंने तुमसे जिस परमार्थ की बात की है उसे न तो कोई पिता अपने पुत्र से करता है और न कोई गुरु अपने शिष्य से । हे द्विज! इस संसार में भटकनेवाला व्यक्ति पुत्र, कलत्र, धन, मित्र तथा अन्य वस्तुओं को तो प्राप्त कर लेता है किन्तु उसे ऐसा उपदेश कभी भी प्राप्त नहीं होता है ॥ ६-१० ॥ पुत्रों, स्त्रियों और मित्रों से क्या लाभ? मित्रों, क्षेत्रों और बन्धनों से भी क्या? इस प्रकार का उपदेश ही बन्धु है जो मोक्ष को प्रदान करनेवाला है । प्राणियों की सृष्टि दो प्रकार की है - दैवी और आसुरी । विष्णु की भक्ति में लीन रहनेवाले लोग दैवी तथा उनसे भिन्न आसुरी सृष्टि के अन्तर्गत आते हैं । मैंने तुम्हें जो उपदेश दिया है वह पवित्र, नीरोग करनेवाला, शुभ, दुःस्वप्नों का नाशक, मनुष्यों में सुख और प्रीति को उत्पन्न करनेवाला तथा मोक्षप्रद है । जिनके घर में लिखा हुआ अग्निपुराण विद्यमान रहता है वहाँ सदैव उपद्रव नष्ट हो जाते हैं । जो मनुष्य प्रतिदिन अग्निपुराण सुनते हैं उनके लिए तीर्थों से क्या, गोदानों से क्या, यज्ञों से क्या और उपवासों से क्या? एक प्रस्थ तिल तथा एक माशा सोना देने से वही फल प्राप्त होता है जो फल अग्निपुराण का एक श्लोक सुनने से प्राप्त होता है ॥ ११-१६ ॥ अग्निपुराण के एक अध्याय का पाठ गोदान से भी बढ़कर होता है । इसके सुनने की इच्छामात्र से ही रात - दिन के पापों का नाश हो जाता है । अग्निपुराण का पाठ करने से वही फल प्राप्त होता है जो ज्येष्ठ पुष्कर क्षेत्र में सौ कपिला गायों के दान से होता है । धर्म दो प्रकार का होता है - प्रवृत्त और निवृत्त । उन दोनों प्रकार के धर्मों की समता अग्निपुराण से नहीं सकती है । हे वशिष्ठ! अग्निपुराण का पाठ और श्रवण करनेवाला सभी पापों से मुक्त हो जाता है । जिस घर में अग्निपुराण की जा १ क. छ. ' तमार्गोऽ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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त्र्यशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११ ९ ५ नोपसर्गा न चानर्था न चौरारिभयं गृहे । न गर्भहारिणी भीतिर्न च बालग्रहा गृहे । शृण्वन्विप्रो वेदविस्त्यात्क्षत्रियः पृथिवीपतिः । यः पठेच्छृणुयान्नित्यं समदृग्विष्णुमानसः । दिव्यान्तरी ( रि ) क्षभौमाद्या दुःस्वप्नाद्यभिचारकाः । पठतः शृण्वतः पुंसः पुस्तकं यजतो महत् । प्रपूज्य गन्धपुष्पाद्यैरग्निष्टोमफलं लभेत् । ग्रीष्मे तु वाजपेयस्य राजसूयस्य वर्षति । आग्नेयं हि पुराणं ' यो भक्त्याऽग्रे पठतो हरेः । यस्याऽऽग्नेयपुराणस्य पुस्तकं तस्य वै जयः । इति कालाग्निरूपेण गीतं मे हरिणा पुरा । विद्याद्वयं वशिष्ठेदं भक्तेभ्यः कथयिष्यसि तस्मिन्स्याद्यत्र चाऽऽग्नेयपुराणस्य हि पुस्तकम् ॥२१ ॥

यत्राऽऽग्नेयं पुराणं स्यान्न पि ( पै ) शाचादिकं भयम् ॥२२ ॥

ऋद्धिं प्राप्नोति वैश्यश्च शूद्रश्चाऽऽरोग्यमृच्छति ॥ २३ ॥

ब्रह्माऽऽग्नेयं पुराणं सत्तत्र नश्यन्त्युपद्रवाः ॥ २४ ॥

यच्चान्यदुरितं किंचित्तत्सर्वं हन्ति केशवः ॥ २५ ॥

आग्नेयं श्रीपुराणं हि हेमन्ते यः शृणोति वै ॥ २६ ॥

शिशिरे पुण्डरीकस्य वसन्ते चाश्वमेधजम् ॥ २७ ॥

गो सहस्त्रस्य शरदि फलं तत्पठतो ह्यतौ ॥२८ ॥

सोऽर्चयेच्च वशिष्ठेह ज्ञानयज्ञेन केशवम् ॥ २ ९ ॥ लिखितं पूजितं गेहे भक्तिर्मुक्तिः करेऽस्ति हि ॥३० ॥

आम्नायं हि पुराणं वै ब्रह्मविद्याद्वयास्पदम् ॥ ॥३१ ॥

वशिष्ठ उवाच व्यासाऽऽग्नेयपुराणं ते रूपं विद्याद्वयात्मकम् । कथितं ब्रह्मणो विष्णोरग्निना कथितं यथा ॥३२ ॥

की पुस्तक होती है उस घर में न रोग, न अनर्थ, न चोरों का भय और न तो गर्भपात का भय होता है, न बालकों को सतानेवाले ग्रह होते हैं और न वहाँ पिशाचादि का भय रहता है ॥१७-२२ ॥ जो व्यक्ति प्रतिदिन अग्निपुराण को पढ़ता और सुनता है वह समदर्शी और विष्णुप्रिय हो जाता है । जहाँ अग्निपुराण रहता है वहाँ सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं । ( अग्निपुराण का अध्ययन करने से ) भगवान् श्रीकृष्ण दिव्य, अन्तरिक्ष में होनेवाले तथा पृथ्वी से सम्बद्ध दुःस्वप्न इत्यादि अभिचार तथा अन्य सभी प्रकार के पापों का नाश करते हैं । हेमन्त ऋतु में अग्निपुराण का पाठ और श्रवण करने से मनुष्य को यज्ञ से भी महान् फल प्राप्त होता है । सुगन्धित पदार्थों और पुष्प इत्यादि से शिशिर ऋतु में भगवान् कृष्ण का पूजन करने से अग्निष्टोम का फल प्राप्त होता है तथा वसन्त ऋतु में ऐसा करने से अश्वमेध का फल प्राप्त होता है । ग्रीष्म ऋतु में ऐसा करने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है और वर्षा ऋतु में इसके करने से राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है । शरद् ऋतु में इस ( अग्निपुराण ) का पाठ करनेवाले को एक हजार गायें प्राप्त होती हैं । जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णु के सम्मुख अग्निपुराण का पाठ करता है, हे वशिष्ठ! वह तो ज्ञानयज्ञ के द्वारा भगवान् कृष्ण की ही पूजा करता है ॥ २६-२९ ॥ जिसके पास अग्निपुराण की पुस्तक होती है उसकी ( सर्वत्र ) विजय होती है और जिसके घर में उसका लेखन और पूजन होता है उसके घर में भोग और मोक्ष दोनों ही आ जाते हैं । मैंने प्राचीनकाल में अग्नि के रूप में भगवान् विष्णु के लिए कहा था क्योंकि यह अग्निपुराण दोनों ब्रह्मविद्याओं का स्थान है । हे वशिष्ठ! इन दोनों विद्याओं को भक्तों से ही कहना चाहिए ॥३०-३१ ॥ वशिष्ठ बोले - अये व्यास! दोनों प्रकार की विद्याओं से युक्त इस अग्निपुराण को आपने ब्रह्मा से वैसे ही १ ख. णं वै ब्रह्मविद्याद्वयास्पदम् । सो ७ ° १२ कापकम् by S3 Foundation USA "

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११ ९ ६ अग्निपुराणम् सार्धं देवैश्च मुनिभिर्मह्यं सर्वार्थदर्शकम् । पुराणमग्निना गीतमाग्नेयं ब्रह्मसंमितम् ॥३३ ॥

यः पठेच्छृणुयाद्व्यास लिखेद्वा लेखयेदपि । श्रावयेत्पाठयेद्वाऽपि पूजयेद्धारयेदपि || ३४ || सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्तकामो दिवं व्रजेत् । लेखयित्वा पुराणं यो दद्याद्विप्रेभ्य उत्तमम् || ३५ || स ब्रह्मलोकमाप्नोति कुलानां शतमुद्धरेत् । एकं श्लोकं पठेद्यस्तु पापपङ्काद्विमुच्यते ॥ ३६ ॥

तस्माद् व्यास सदा श्राव्यं शिष्येभ्यः सर्वदर्शनम् । शुकाद्यैर्मुनिभिः सार्धं श्रोतुकामैः पुराणकम् ॥ ३७ ॥

आग्नेयं पठितं ध्यातं शुभं स्याद्भुक्तिमुक्तिदम् । अग्नये तु नमस्तस्मै येन गीतं पुराणकम् ॥३८ ॥

व्यास उवाच वशिष्ठेन पुरागीतं सूतैतत्ते मयोदितम् । परा विद्याऽपरा विद्या स्वरूपं परमं पदम् ॥ ३ ९ ॥ आग्नेयं दुर्लभं रूपं प्राप्यते भाग्यसंयुतैः । ध्यायन्तो ब्रह्म चाऽऽग्नेयं पुराणं हरिमागताः ॥ ४० ॥

विद्यार्थिनस्तथा विद्यां राज्यं राज्यार्थिनो गताः । अपुत्राः पुत्रिणः सन्ति नाश्रया आश्रयं गताः ॥ ४१ ॥

सौभाग्यार्थी च सौभाग्यं मोक्षं मोक्षार्थिनो गताः । लिखन्तो लेकयन्तश्च निष्पापाश्च श्रियं गताः ॥४२ ॥

शुकपैलमुखैः सूत आग्नेयं तु पुराणकम् । रूपं चिन्तय यातासि भुक्तिं मुक्तिं न संशयः ॥४३ ॥

श्रावय त्वं च शिष्येभ्यो भक्तेभ्यश्च पुराणकम् ॥४४ ॥

कहा है जैसे अग्नि ने विष्णु से कहा था । देवताओं और मुनियों के साथ अग्नि ने मुझे इस पुराण को सुनाया है जो सर्वार्थदर्शी तथा ब्रह्मसम्मित हैं । अये व्यास! जो व्यक्ति इस पुराण को पढ़ता या सुनता है, लिखता या लिखवाता है, दूसरे को सुनवाता या दूसरे से पढ़वाता है, इसका पूजन करता है या इसको धारण करता है वह सभी पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक को चला जाता है । इस उत्तम पुराण को लिखवाकर जो व्यक्ति ब्राह्मणों को देता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त कर लेता है और अपने सौ कुलों का उद्धार कर देता है । इसका एक श्लोक पढ़नेवाला पाप से छुटकारा पा जाता है । इसलिए हे व्यास! इसे सुननेवाले शुक आदि मुनियों के साथ इस पुराण को सभी शिष्यों को सुनाना चाहिए क्योंकि यह पुराण सर्वदर्शी है । इस शुभ अग्निपुराण का पाठ और ध्यान भोग और मोक्ष देनेवाला हुआ करता है, इसलिए मैं उस अग्निदेव को नमस्कार करता हूँ जिन्होंने इस पुराण का गान किया है ॥३२-३८ ॥ व्यास बोले - हे सूत! मैंने जो कुछ कहा है वह वशिष्ठ के द्वारा पहले ही कहा जा चुका है । यही परा और अपरा विद्या है और परमपद का स्वरूप भी । अग्निपुराण का दुर्लभ रूप भाग्यवानों को ही प्राप्त होता है । अग्निपुराण और ब्रह्म का ध्यान करने से विष्णु की प्राप्ति हो जाती है । विद्यार्थियों को विद्या, राज्य की इच्छा करनेवालों राज्य, पुत्रहीनों को पुत्र, निराश्रयों को आश्रय, सौभाग्य की कामना करनेवालों को सौभाग्य और मोक्षार्थियों को प्राप्त हो जाता है । इसके लिखने और लिखाने से मनुष्य निष्पाप होकर लक्ष्मी को मोक्ष अग्निपुराण शुक और को प्राप्त कर लेते हैं । हे सूत! यह पैल के मुखों से सुनाया गया है । तुम इसके रूप का चिन्तन करो जिससे तुम्हें निश्चय ही भोग और मोक्ष प्राप्त होगा । तुम भी अपने शिष्यों और भक्तों को यह पुराण सुनाओं ॥३९-४४ ॥