अग्नि पुराण — पृष्ठ 1201–1208
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1201–1208
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त्र्यशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ११ ९ ७ सूत उवाच व्यासप्रसादादाग्नेयं पुराणं श्रुतमादरात् भवन्तो नैमिषारण्ये यजन्तो हरिमीश्वरम् अग्निना प्रोक्तमाग्नेयं पुराणं वेदसंमितम् नास्मात्परतरः सारो नास्मात्परतरः सुहृत् नास्मात्परतरं शास्त्रं नास्मात्परतरा श्रुतिः । नास्मात्परो ह्यागमोऽस्ति नास्माद्विधा पराऽस्ति हि । नास्मात्परोऽस्ति वेदान्तः पुराणं परमं त्विदम् । आग्नेये हि पुराणेऽस्मिन्सर्वविद्याः प्रदर्शिताः । हरिवंशो भारतं च नवसर्गाः प्रदर्शिताः । पवित्रारोहणादीनि प्रतिमालक्षणादिकम् । शैवागमस्तदर्थश्च शाक्तेयः सौर एव च । प्रतिसर्गश्चानुगीतो ब्रह्माण्डपरिमण्डलम् ॥ आग्नेयं ब्रह्मरूपं हि मुनयः शौनकादयः ॥४५ ॥
। तिष्ठन्तः श्रद्धया युक्तास्तस्माद्वः समुदीरितम् ॥४६ ॥
। ब्रह्मविद्याद्वयोपेतं भुक्तिदं मुक्तिदं महत् ॥ ४७ ॥
। नास्मात्परतरो ग्रन्थो नास्मात्परतरा गतिः ॥४८ ॥
नास्मात्परतरं ज्ञानं नास्मात्परतरा स्मृतिः ॥४९ ॥
नास्मात्परः स्यात्सिद्धान्तो नास्मात्परममङ्गलम् ॥५० ॥
नास्मात्परतरं भूमौ विद्यते वस्तु दुर्लभम् ॥ ५१ ॥
सर्वे मत्स्यावताराद्या गीता रामायणं त्विह ॥५२ ॥
आगमो वैष्णवो गीतः पूजा दीक्षा प्रतिष्ठया ॥५३ ॥
प्रासादलक्षणाद्यं च मन्त्रा वै भुक्तिमुक्तिदाः ॥५४ ॥
मण्डलानि च वास्तुश्च मन्त्राणि विविधानि च ॥ ५५ ॥
द्वीपो भुवनकोषश्च द्वीपवर्षादिनिम्नगाः ॥ ५६ ॥
सूत बोले - शौनक आदि मुनिवरो! मैंने श्री व्यास जी की कृपा से शृद्धापूर्वक अग्निपुराण का श्रवण किया है । यह अग्निपुराण ब्रह्मस्वरूप है । आप सब लोग श्रद्धायुक्त होकर इस नैमिषारण्य में भगवान् श्री हरि का यजन करते हुए निवास करते हैं अतः ( आपको सर्वोत्तम अधिकारी समझकर मैंने आपसे इस पुराण का वर्णन किया है । ‘ अग्निदेव ' इस पुराण के वक्ता हैं, अतएव यह ' आग्नेय पुराण ' कहलाता है । इसे वेदों के तुल्य माना गया है । यह ' ब्रह्म ' और ' विद्या ’ - दोनों से युक्त है । भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला श्रेष्ठ साधन है । इससे बढ़कर सर्वोत्तम सार, इससे उत्तम सुहृद्, इससे श्रेष्ठ ग्रन्थ तथा इससे उत्कृष्ट कोई गति नहीं है । इस पुराण से बढ़कर शास्त्र नहीं है, इससे उत्तम श्रुति नहीं है, इससे श्रेष्ठ ज्ञान नहीं है तथा इससे उत्कृष्ट कोई स्मृति नहीं है । इससे श्रेष्ठ आगम, इससे श्रेष्ठ विद्या, इससे श्रेष्ठ सिद्धान्त और इससे श्रेष्ठ मंगल नहीं है । इससे बढ़कर वेदान्त भी नहीं है । यह पुराण सर्वोत्कृष्ट है । इस पृथ्वी पर अग्निपुराण से बढ़कर श्रेष्ठ और दुर्लभ वस्तु कोई नहीं है ॥४५-५१ ॥ इस अग्निपुराण में सब विद्याओं का प्रदर्शन ( परिचय ) कराया गया है । भगवान् के मत्स्य आदि सम्पूर्ण अवतार, गीता और रामायण का भी इससे वर्णन है । ' हरिवंश ' और ' महाभारत ' का भी परिचय है । नौ प्रकार की सृष्टि का भी दिग्दर्शन कराया गया है । वैष्णव आगम का भी गान किया गया है । देवताओं की स्थापना के साथ ही दीक्षा तथा पूजा का उल्लेख किया गया है । पवित्रारोहण आदि की विधि, प्रतिमा के लक्षण आदि तथा मन्दिर के लक्षण आदि का वर्णन है । साथ ही भोग और मोक्ष देनेवाले मन्त्रों का उल्लेख है । शैव आगम और उनके प्रयोजन, शाक्त आगम, सूर्य सम्बन्धी आगम, मण्डल, वास्तु और भाँति - भाँति के मन्त्रों का वर्णन है । प्रतिसर्ग का परिचय कराया गया है । ब्रह्माण्ड - मण्डल तथा भुवनकोश का भी वर्णन है । द्वीप, वर्ष आदि और नदियों का भी उल्लेख है । गया, गङ्गा तथा प्रयाग आदि तीर्थों की १ ख. ' स्मात्सार ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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११ ९ ८ अग्निपुराणम् गयागङ्गाप्रयागादितीर्थमाहात्म्यमीरितम् । मन्वन्तरादयो गीता धर्मा वर्णादिकस्य च । राजधर्मा दानधर्मा व्रतानि विविधानि च । सूर्यवंश: सोमवंशा धुनर्वेदश्च वैद्यकम् । पुराणसंख्यामाहात्म्यं छन्दो व्याकरणं स्मृतम् । नैमित्तिकः प्राकृतिको लय आत्यन्तिकः स्मृतः । स्तोत्रं पुराणमाहात्म्यं विद्या ह्याष्टादश स्मृताः । सप्रपञ्चं निष्प्रपञ्चं ब्रह्मणो रूपमीरितम् देवेलोके दैवतैश्च पुराणं पठ्यते सदा सर्वं ब्रह्मेति जानीध्वं मुनयः शौनकादयः लिखेल्लिखापयेद्वाऽपि पूजयेत्कीर्तयेदपि गोभूहिरण्यदानाद्यैर्वस्त्रालंकारतर्पणैः ज्योतिश्चक्रं ज्योतिषादि गीतो युद्धजयार्णवः ॥ ५७ ॥
अशौचं द्रव्यशुद्धिश्च प्रायश्चित्तं प्रदर्शितम् ॥ ५८ ॥
व्यवहाराः शान्तयश्च ऋग्वेदादिविधानकम् ॥५९ ॥
गान्धर्ववेदोऽर्थशास्त्रं मीमांसा न्यायविस्तरः ॥ ६० ॥
अलंकारो निघण्टुश्च शिक्षाकल्प इहोदितः ॥ ६१ ॥
वेदान्तं ब्रह्मविज्ञानं योगो ह्यष्टाङ्ग ईरितः ॥ ६२ ॥
ऋग्वेदाद्याः परा ह्यत्र परा विद्याऽक्षरं परम् ॥ ६३ ॥
। इदं पञ्चदशसाहस्त्रं शतकोटिप्रविस्तरम् ॥६४ ॥
। लोकानां हितकामेन संक्षिप्योद्गीतमग्निना ॥ ६५ ॥
। शृणुयाच्छ्रावयेद्वाऽपि यः पठेत्पाठयेदपि ॥६६ ॥
। ( पुराणपाठकं चैव पूजयेत्प्रयतो नृपः ॥ ६७ ॥
तं सम्पूज्य लभेच्चैव पुराणश्रवणात्फलम् ॥ ६८ ॥
महिमा का वर्णन किया गया है । ज्योतिश्चक्र ( नक्षत्र - मण्डल ), ज्योतिष आदि विद्या तथा युद्ध जयार्णव का भी निरूपण है । मन्वन्तर आदि का वर्णन तथा वर्ण और आश्रम आदि के धर्मों का प्रतिपादन किया गया है । साथ ही अशौच, द्रव्यशुद्धि तथा प्रायश्चित्त का भी ज्ञान कराया गया है ॥५२-५८ ॥ राजधर्म, दानधर्म, भाँति - भाँति के व्रत, व्यवहार, शान्ति तथा ऋग्वेद आदि के विधान का भी वर्णन है । सूर्यवंश, सोमवंश, धनुर्वेद, वैद्यक, गान्धर्व वेद, अर्थशास्त्र, मीमांसा, न्यायविस्तर, पुराण - संख्या, पुराण - माहात्म्य, छन्द, व्याकरण, अलंकार, निघण्टु, शिक्षा और कल्प आदि का भी इसमें निरूपण किया गया है ॥ ५ ९ -६१ ॥ नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यन्तिक लय का वर्णन है । वेदान्त, ब्रह्मज्ञान और अष्टाङ्ग योग का निरूपण है । स्तोत्र, पुराण - महिमा और अष्टादश विद्याओं का प्रतिपादन है । ऋग्वेद आदि अपरा विद्या, परा विद्या तथा परम अक्षर तत्त्व का भी निरूपण है । इतना ही नहीं, इसमें ब्रह्म के सप्रपञ्च ( सविशेष ) और निर्विशेष ( निष्प्रपञ्च ) रूप का वर्णन है । यह पुराण पन्द्रह हजार श्लोकों का है । देवलोक में इसका विस्तार एक अरब श्लोकों में है । देवता सदा इस पुराण का पाठ करते हैं । सम्पूर्ण लोकों का हित करने के लिए अग्निदेव ने इसका संक्षेप में वर्णन किया है । शौनकादि मुनियो! आप इस सम्पूर्ण पुराण को ब्रह्ममय ही समझें । जो इसे सुनता या सुनाता, पढ़ता या पढ़ाता, लिखता या लिखवाता तथा इसका पूजन और कीर्त्तन करता है, वह परम शुद्ध हो सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त करके कुलसहित स्वर्ग को जाता है ॥६२-६६३ ॥ राजा को चाहिए कि संयमशील होकर पुराण के वक्ता का पूजन करे । गौ, भूमि तथा सुवर्ण आदि का दान दे, वस्त्र और आभूषण आदि से तृप्त करते हुए वक्ता का पूजन करके मनुष्य पुराण - श्रवण का पूरा - पूरा फल पाता है । १ ख. ग. " दं चतुर्दश ' । ङ. ' दं द्वादश ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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त्र्यशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः पुराणान्ते च वै कुर्यादवश्यं द्विजभोजनम् ) । निर्मलः प्राप्तसर्वार्थः शरयन्त्रं पुस्तकाय सूत्रं वै पत्रसंचयम् । पट्टिकाबन्धवस्त्रादि यो दद्याद् ब्रह्मलोकी स्यात्पुस्तकं यस्य वै गृहे । तस्योत्पातभयं नास्ति यूयं स्मरत आग्नेयं पुराणं रूपमैश्वरम् । सूतो गतः पूजितस्तैः ११ ९९ सकुलः स्वर्गमाप्नुयात् ॥६९ ॥
दद्याद्यः स्वर्गमाप्नुयात् ॥ ७० ॥
भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् ॥७१ ॥
शौनकाद्या हरिं ययुः ॥ ७२ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये आग्नेयपुराणमाहात्म्यकथनं नाम त्र्यशीत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३८३ ॥
पुराण - श्रवण के पश्चात् निश्चय ही ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए । जो इस पुस्तक के लिए शरयन्त्र ( पेटी ), सूत, पत्र ( पन्ने ), काठ की पट्टी, उसे बाँधने की रस्सी तथा वेष्टनवस्त्र आदि दान करता है, वह स्वर्गलोक को जाता है । जो अग्निपुराण की पुस्तक का दान करता है, वह ब्रह्मलोक में जाता है । जिसके घर में यह पुस्तक रहती है, उसके यहाँ उत्पात का भय नहीं रहता है । वह भोग और मोक्ष को प्राप्त करता है । मुनियो! आप लोग इस अग्निपुराण को ईश्वर रूप मानकर सदा इसका स्मरण रखें ॥६७-७२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अग्निपुराण- माहात्म्य - कथन नामक तीन सौ तिरासीवाँ अध्याय समाप्त ॥ ३८३ ॥
श्रीमद्द्द्वैपायनमुनिप्रणीत अग्निपुराण समाप्त । आदि से अन्त तक समस्त श्लोकों की संख्या ११४५७ ॐ श्री कृष्णाय नमः ॐ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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कर्म सिहं अमर सिंह विक्रेता, पुस्तक हरिद्वार- 249401 दूरभाष 0133 425619 CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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