अग्नि पुराण — पृष्ठ 121–130

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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विंशोऽध्यायः ११७ वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः । इत्येष प्राकृतः सर्गः सम्भूतो बुद्धिपूर्वकः || २ || मुख्यः सर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः । तिर्यक्त्रोतास्तु यः ' प्रोक्तस्तैर्यग्योन्यस्ततः स्मृतः ॥३ ॥

तथोर्ध्वस्स्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विकस्तामसश्च यः प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमस्तथा ख्यात्याद्या दक्षकन्यास्तु भृग्वाद्या उपयेमिरे प्राकृतो, दैनन्दिनीयादान्तरप्रलयादनु देवा धाताविधातारौ भृगोः ख्यातिरसूयत धातुर्विधातुद्वौ पुत्रौ क्रमात्प्राणो मृकण्डुकः पौर्णमासश्च सम्भूत्यां मरीचेरभवत्सुतः राका चानुमतिश्चात्रेरनसूयाप्यजीजनत् प्रीत्यां पुलस्त्यभार्यायां दत्तोलिस्तत्सुताऽभवत् सन्नत्यां च क्रतोरासन् बालखिल्या महौजसः । ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः ॥४ ॥

। पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृताश्च त्रयः स्मृताः ॥५ ॥

। ब्रह्मतों नव सर्गास्तु जगतो मूलहेतवः ॥ ६ ॥

। नित्यो नैमित्तिकः सर्गस्त्रिधाऽथ कथितो जनैः ॥७ ॥

। जायन्ते यत्रानुदिनं नित्यसर्गो हि सः स्मृतः ॥८ ॥

। श्रियं च पत्नी विष्णोर्या स्तुता शक्रेण वृद्धये ॥ ९ ॥

। मार्कण्डेयो मृकण्डोश्च " जज्ञे वेदशिरास्तथा ॥ १० ॥

। स्मृत्यामाङ्गिरसः पुत्राः सिनीवाली कुद्दूस्तथा ॥ ११ ॥

। सोमं दुर्वाससं पुत्रं दत्तात्रेयं च योगिनम् ॥१२ ॥

। ११ क्षमायां पुलहाज्जातः सहिष्णुः सर्वपादिकः १२ ॥१३ ॥

। अङ्गुष्ठपर्वमात्रास्ते ये हि षष्टिसहस्त्रिणः ॥ १४ ॥

से होनेवाली सृष्टि है जिसमें बुद्धि ( महत्तत्त्व सबसे पहले उत्पन्न हुई || २ || चौथा सर्ग मुख्य सर्ग है । मुख्य कहते हैं स्थावर ( वृक्ष, पर्वत आदि ) को । ( पाँचवाँ ) जो तिर्यक्त्रोत ( पशु, पक्षी आदि ) कहा गया है, वह तैर्यग्योन्य सर्ग कहा जाता है ॥३ ॥

छठा सर्ग ऊर्ध्वरेता प्राणियों का है जिसे देवसर्ग कहते हैं । तदनन्तर अघोरेता प्राणियों के सातवें सर्ग का निर्माण हुआ जिसे मानुषसर्ग कहते हैं ॥४ ॥ आठवाँ सर्ग अनुग्रह सर्ग है जो सात्त्विक और तामस भेद से दो प्रकार का है । इनमें से पहले के

तीन सर्ग प्राकृत सर्ग और शेष पाँच सर्ग वैकृत सर्ग हैं ॥५ ॥ ( तीन ) प्राकृत, ( पाँच ) वैकृत ( ये आठ ) तथा नवाँ कौमार सर्ग—

ये.सब सर्ग ब्रह्मा के द्वारा निर्मित तथा संसार के मूल कारण हैं || ६ || भृगु आदि ऋषियों ने ख्याति आदि दक्ष की कन्याओं से विवाह किया । कुछ लोग तीन प्रकार की सृष्टि मानते हैं - नित्य, नैमित्तिक और प्राकृत || ७ || नित्य सर्ग उसे कहते हैं, जो प्रतिदिन होनेवाले अवान्तर प्रलय के बाद प्रतिदिन जन्म होते रहते हैं || ८ || भृगु से उनकी पत्नी ख्याति ने धाता और विधाता नामक दो देवताओं को जन्म दिया तथा लक्ष्मी नाम की कन्या को उत्पन्न किया जो विष्णु की पत्नी हुई तथा जिसकी स्तुति इन्द्र ने अभ्युदय के लिए किया ॥९ ॥ धाता और विधाता के क्रमशः प्राण और मृकण्डु नामक दो पुत्र हुए । मृकण्डु के पुत्र

मार्कण्डेय और मार्कण्डेय के पुत्र वेदशिरा हुए || १० || मरीचि ने सम्भूति नामक पत्नी से पौर्णमास को उत्पन्न किया । अंगिरा ने स्मृति नामक पत्नी से अनेक पुत्र तथा सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति नामक चार कन्याओं को उत्पन्न किया । अत्रि से अनुसूया ने सोम, दुर्वासा और योगी दत्तात्रेय को जन्म दिया ॥११- १२ ॥ पुलस्त्य की पत्नी प्रीति से उनके पुत्र दत्तोलि का जन्म हुआ । पुलह ने क्षमा के गर्भ से सहिष्णु और सर्वपादिक को जन्म दिया || १३ || क्रतु ने सन्नति से महान् ओजस्वी बालखिल्यों को उत्पन्न किया । उन बालखिल्यों की संख्या साठ हजार थी और वे अँगूठे के एक पोर के बराबर थे ॥१४ ॥

१ क. ङ. च. इत्येवं । २ इन्द्रिय सम्बन्धी । ३ ग. ' क्स्रोतस्तु । ४ ख. ग. ' क्तस्निर्य ' । ५ तिर्यग्योनि सम्बन्धी । ६ ग. ब्रह्मणो । ७ ख. ग. ' धा प्रक ' । ८ ख. संमतः । ९ ख. ग. मृकण्डकः । १० ख. ग. मृकण्डाच्च । ११ क. ङ. च. कुमार्या । १२ ख. ग. सर्ववादिकः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 122

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अग्निपुराणम् ११८ ऊर्जायां च वसिष्ठाच्च ' राजा गात्रोर्ध्वबाहुकः । पावकः पवमानोऽभूच्छछ्चिः स्वाहाग्नितोऽभवत् । पितृभ्यश्च स्वधायां च मेना वैधारिणी सुते । कन्या निकृतिस्ताभ्यां भयं नरकमेव च । तयोर्जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम् । मृत्योर्व्याधिजराशोकतृष्णाक्रोधाश्च जज्ञिरे । भवं शर्वमथेशानं तथा पशुपतिं द्विज दक्षकोपाच्च तद्भार्या देहं तत्याज सा सती ऋषिभ्यो नारदाद्युक्ताः पूजा: स्नानादिपूर्विकाः स्वायम्भुवाद्यास्ताः कृत्वा विष्ण्वादेर्भुक्तिमुक्तिगाः सवनश्चानघः शुक्रः सुतपाः सप्त चर्षयः ॥ १५ ॥

अग्निष्वात्ता बर्हिषदोऽनग्नयः साग्नयो जात् ॥१६ ॥

हिंसा भार्या त्वधर्मस्य तयोर्जज्ञे तथानृतम् ॥१७ ॥

माया च वेदना चैव मिथुनं त्विदमेतयोः ॥ १८ ॥

वेदना च सुतं चापि दुःखं जज्ञेऽथ रौरवात् ॥१९ ॥

ब्रह्मणश्च रुदञ्जातो रोदनाद्रुद्रनामकः ॥ २० ॥

। भीममुग्रं महादेवमुवाच स पितामहः ॥२१ ॥

। हिमवदुहिता भूत्वा पत्नी शम्भोरभूत् पुनः ॥ २२ ॥

॥।२३ ॥ इत्यादिमहापुराण आग्नेये जगत्सर्गवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥

वसिष्ठ - भार्या ऊर्जा ने राजा, गात्र, ऊर्ध्वबाहुक, सवन, अनघ, शुक्र और सुतपा - इन सात ऋषियों को जन्म दिया ॥१५ ॥ अग्नि ने स्वाहा से पावक, पवमान और शुचि को उत्पन्न किया । अज से अग्निष्वात्ता, बर्हिषद्, अनग्नि और

साग्नि उत्पन्न हुए ॥१६ ॥ पितरों ने स्वधा से मेना और वैधारिणी नामक दो कन्याओं को उत्पन्न किया । अधर्म की

भार्या थी हिंसा । अधर्म और हिंसा से अनृत की उत्पत्ति हुई । उन्हीं से निकृति नाम की कन्या भी उत्पन्न हुई । भय और नरक भी इन्हीं से उत्पन्न हुए । क्रमशः माया और वेदना इनकी पत्नियाँ हुईं ॥ १७ - १८ ॥ इन दोनों में से माया ने ( भय से ) जीवों का संहार करनेवाले मृत्यु को उत्पन्न किया । और वेदना ने नरक के संयोग से दुःख नामक पुत्र को उत्पन्न किया ॥१९ ॥ मृत्यु से व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोध का जन्म हुआ । ब्रह्मा के रुद्र नामक पुत्र हुए ।

वे रोते हुए ही पैदा हुए इसलिए रोने के कारण ही उनका नाम रुद्र पड़ा || २० || हे ब्राह्मण! पितामह ने महादेव को भव, शर्व, ईशान, भीम और उग्र- इन नामों से पुकारा ॥ २१ ॥ दक्ष के क्रोध से महादेव की पत्नी सती ने अपने शरीर

का परित्याग कर दिया । सती ने ही हिमालय की कन्या पार्वती के रूप में जन्म लेकर पुनः शंकर जी की पत्नी हुई ॥२२ ॥ नारद के कथनानुसार ऋषियों द्वारा स्नानादिपूर्वक पूजाविधि का वर्णन किया, जिनके करने से स्वायम्भुव

आदि विष्णु आदि को प्रसन्न करके भुक्ति और मुक्ति के अधिकारी बन गये ॥२३ ॥

श्री अग्निमहापुराण में जगत्सर्गवर्णन नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२० ॥

१ क. ङ. रजो गात्रौर्ध्वबाहुकः । २ घ. श्चालघुः शु ' । ३ घ. ' ग्निजोऽभ । ४ क. ङ. च. चेदमतयोः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 123

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एकविंशोऽध्यायः ११ ९ अथैकविंशोऽध्यायः विष्ण्वादिदेवानां सामान्यपूजाविधानम् नारद उवाच सामान्यपूजां विष्ण्वादेर्वक्ष्ये मन्त्रांश्च सर्वदान् । धात्रे विधात्रे गङ्गायै यमुनायै निधी तथा । पृथिवीं धर्मकं ज्ञानं वैराग्यैश्वर्यमेव च । ऋग्वेदाद्यं कृताद्यं च सत्त्वाद्यर्कादिमण्डलम् । प्रह्वी सत्या तथेशा चानुग्रहामलमूर्तिका । हृदयं च शिरश्चूडां वर्म नेत्रमथास्त्रकम् । वनमालां श्रियं पुष्टिं गरुडं गुरुमर्चयेत् । ईशानं तमजं चास्त्र वाहनं कुमुदादिकम् । शिवपूजार्थ सामान्या पूर्वं नन्दिनमर्चयेत् । गिरं, श्रियं, गुरुं, वास्तुं शक्त्यादीन् धर्मकादिकम् ।

बलविकारिणी चापि बलप्रमथिनी क्रमात् ।

समस्तपरिवाराय अच्युताय नमो यजेत् ॥ १ ॥

द्वारश्रियं वास्तुनरं शक्ति कूर्ममनन्तकम् ॥२ ॥

अधर्मादीन् कन्दनालपद्मकेसरकर्णिकाः ॥३ ॥

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगा च ता यजेत् ॥४ ॥

दुर्गां गिरं गणं क्षेत्रं वासुदेवादिकं यजेत् ॥५ ॥

शङ्खं चक्रं गदां पद्मं श्रीवत्सं कौस्तुभं यजेत् ॥ ६ ॥

इन्द्रमग्नि यमं रक्षो जलं वायुं धनेश्वरम् ॥७ ॥

विष्वक्सेनं मण्डलादौ सिद्धिः पूजादिना भवेत् ॥८ ॥

महाकालं यजेद् दुर्गां यमुनां च गणादिकम् ॥९ ॥

वामा, ज्येष्ठा तथा रौद्री काली, कलविकारिणी ॥१० ॥

सर्वभूतदमनी च ' मदनोन्मादिनी शिवा ॥११ ॥

अध्याय २१ विष्णु आदि देवों का सामान्य पूजा - विधान नारद बोले- - अब मैं विष्णु इत्यादि देवताओं की सामान्य पूजा तथा सब कुछ देनेवाले मन्त्रों के सम्बन्ध में बतलाऊँगा । पूरे परिवार के साथ अच्युत को नमस्कार करके यजन करना चाहिए ॥१ ॥ धाता, विधाता, दोनों निधियाँ

( शंखनिधि और पद्मनिधि ), द्वारलक्ष्मी, वास्तु - पुरुष, शक्ति, कूर्म, अनन्त, पृथ्वी, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म इत्यादि, कन्द, नाल, पद्म, केसर, कर्णिका, ऋग् आदि वेद, कृत आदि युग, सत्त्व इत्यादि गुण, सूर्य आदि मण्डल तथा विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया और योगा- इनका यजन करना चाहिए ॥२-४ ॥ प्रही, सत्या, ईशा, अनुग्रहा, निर्मलमूर्ति, दुर्गा, वाणी, गण, क्षेत्र और वासुदेव आदि का यजन करना चाहिए ॥५ ॥ हृदय, सिर, चूडा ( शिखा ), कवच, नेत्र, अस्त्र, शंख, चक्र,

गदा, कमल, श्रीवत्स और कौस्तुभ का यजन करना चाहिए ॥६ ॥ वनमाला, लक्ष्मी, पुष्टि, गरुड़ और गुरु की अर्चना करनी

चाहिए । इन्द्र, अग्नि, यम, राक्षस, जल, वायु, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अस्त्र, वाहन, कुमुद, विष्वक्सेन की पूजा मण्डल आदि में करने से सिद्धि होती है ॥७-८ ॥ सामान्यरूप से शिवपूजा के पहले नन्दी की पूजा करनी चाहिए । महाकाल, दुर्गा, यमुना, ( शिव के ) गण, सरस्वती, श्री, गुरु, वास्तु, शक्ति, धर्म आदि तथा वामा, ज्येष्ठ, रौद्री, काली, कलविकारिणी, बलविकारिणी, बलप्रमथिनी, सब भूतों का दमन करनेवाली, मदन को उन्मत्त करनेवाली शिवा की पूजा करनी चाहिए ॥९ -११ ॥ १ खं. ग. हृदाद्य ' । २ क. ङ. च. च मन्वाद्य ' । ३ क. ङ. च. राज्यं । ४ क. ङ. च. वास्तुं । ५ क. ङ च. ततो । ६ क. ङ. च. वाऽपि । ७ क. ख. ग. च. मनोन्मानी शिवासनम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 124

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१२० अग्निपुराणम् हां हूं हां शिवमूर्तये ' साङ्गवक्त्रं शिवं यजेत् । ह्रीं गौरीं गंगणः शक्रमुखाश्चण्डो हृदादिकाः । उच्चैःश्रवाचारुणश्च प्रभूतं विमलं यजेत् । दीप्ता सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिर्विमला तथा । अर्कासनं हि हं खं खं सोल्कायेति च मूर्तिकम् । अर्काय शिरसे तद्वदग्नीशाश्रयवायुगान् । भां नेत्रं रस्तथार्कास्त्रं राज्ञी शक्तिश्च निःस्वका । राहुः केतुस्तेजश्चण्डः सङ्क्षेपादथ पूजनम् । विष्ण्वासनं विष्णुमूर्ते रां श्रीं श्रीं श्रीधरो हरिः ।

क्लीं हृषीकेशो हूं विष्णुः स्वरैर्दीर्धैर्हृदादिकम् ।

हौं शिवाय हौमित्यादि हामीशानादिवक्त्रकम् ॥१२ ॥

क्रमात्सूर्यार्चने ' मन्त्रा दण्डी पूज्यश्च पिङ्गलः ॥ १३ ॥

सोमं सन्ध्ये परसुखं स्कन्दाद्यं मध्यतो यजेत् ॥१४ ॥

' अमोघा विद्युता चैव पूज्याथो सर्वतोमुखी ॥ १५ ॥

ह्वां ह्रीं सः सूर्याय नम आं नमो हृदयाय च ॥ १६ ॥

भूर्भुवः स्वरे ज्वालिनी शिखा हूं कवचं स्मृतम् ॥१७ ॥

सोमोऽङ्गारकोऽथ बुधो जीवः शुक्रः शनिः क्रमात् ॥ १८ ॥

आसनं मूर्त्तयो मूलं हृदाद्यं परिचारकः ॥१९ ॥

ह्रीं सर्वमूर्तिमन्त्रोऽयमिति त्रैलोक्यमोहनः ' ॥ २० ॥

समस्तैः पञ्चमी पूजा सङ्ग्रामादौ जयादिदा ॥ २१ ॥

“ हां हूं हां शिवमूर्तये ” –इस मन्त्र से शिव के मुख तथा सभी अंगों की पूजा करनी चाहिए । “ हौं शिवाय हौं ” इत्यादि मन्त्र से शिव की पूजा करनी चाहिए । ' हां ' इत्यादि मन्त्र से ( शिव के ) ईशान आदि पाँच मुखों की पूजा करनी चाहिए । ( - हां ईशानाय नमः, हीं वामदेवाय नमः, हूं सद्योजाताय नमः, हैं अघोराय नमः, हौं तत्पुरुषाय नमः । ईशान, वामदेव, सद्योजात, अघोर और तत्पुरुष ये शिव के पाँच मुख हैं । ) " ह्रीं गौर्यै नमः " इस मन्त्र से गौरी का, " गं गणाय नमः ” इस मन्त्र से शिवगणों का पूजन करना चाहिए । इसी प्रकार इन्द्र आदि तथा चण्ड और हृदय आदि की भी पूजा करनी चाहिए । इसी क्रम से सूर्यार्चन के भी मन्त्र हैं । इनमें दण्डी सबसे पहले पूज्य है । इसके बाद पिंगल, उच्चैःश्रवा और अरुण की पूजा करनी चाहिए । प्रभूत, विमल, सोम, दोनों सन्ध्याकाल, परसुख स्कन्द आदि की मध्य में पूजा करनी चाहिए ॥१२-१४ ॥ तत्पश्चात् दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता और सर्वतोमुखी - इन नौ शक्तियों की पूजा करनी चाहिए ॥१५ ॥ “ हं खं " इस मन्त्र से सूर्य के आसन की, “ खं सोल्काय " से सूर्य - मूर्ति की, तथा “ ह्वां ह्वीं सः

सूर्याय नमः ” इस मन्त्र से सूर्य की पूजा करनी चाहिए । " आं नमो हृदयाय च " इस मन्त्र से हृदय की पूजा करनी चाहिए ॥१६ ॥ “ अर्काय नमः ” इस मन्त्र से सिर की पूजा करनी चाहिए । इसी प्रकार अग्नि, ईशा और वायु में अधिष्ठित सूर्य

की पूजा करनी चाहिए । “ भूर्भुवः स्वरे ज्वालिनी शिखा हूं " -इसको कवच कहा गया है ॥१७ ॥ " भां ” कहकर नेत्र की

और “ र: ” से अर्कास्त्र की पूजा की जाती है । राज्ञी, शक्ति, निःस्वका, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, तेज और चण्ड की क्रमशः पूजा करनी चाहिए । अब संक्षेप में पूजन बतलाते हैं ॥१८-१८३ ॥ देवता के आसन, मूर्ति, मूल, हृदय आदि और परिचारक इनकी पूजा होती है । भगवान् विष्णु के आसन की पूजा- " रां श्रीं श्रीं श्रीधरो हरिः " इस मन्त्र से करनी चाहिए । यह ह्रीं सर्वमूर्तिमन्त्र है । इसे त्रैलोक्यमोहन भी कहते हैं ॥ १ ९ -२० ॥ भगवान् हृषीकेश की पूजा “ ॐ क्लीं हृषीकेशाय नमः ” इस मन्त्र से तथा भगवान् विष्णु की पूजा “ ॐ हूं विष्णवे नमः ” इस मन्त्र से करनी चाहिए । सम्पूर्ण दीर्घ स्वरों के द्वारा हृदय आदि की पूजा करनी चाहिए ( जैसे “ ॐ आं हृदयाय नमः ” इससे हृदय की पूजा करनी चाहिए ) । पाँचवीं अर्थात् परिचारकों की पूजा संग्राम आदि में विजय देनेवाली है ॥२१ ॥ क्रमशः चक्र, गदा, शंख, मुसल,

१ ख. ग. साङ्गं वक्त्रं । २ अत्र ख. ग. पुस्तकयोः ' शिवपूजाक्रमः ' इत्यधिकं वर्तते । ३ क. घ. ङ. च. साराराध्यौ परसुखं । ४ क. ङ. च. अयोध्या । ५ घ. ' शासुरवा ' । ६ क. च. निर्मता । घ. निष्कुम्भा । ७ क. ङ. च. परिवारिकः । ख. परिचालकः । ८ ङ. च. ' हनम् । क्लीं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 125

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एकविंशोऽध्यायः १२१ चक्रं गदां क्रमाच्छङ्खं ' मुसलं ' खङ्गशार्ङ्गकम् । पाशाङ्कुशौ च श्रीवत्सं कौस्तुभं वनमालया ॥२२ ॥

श्रीं श्रीर्महालक्ष्मीस्तार्क्ष्यो गुरुरिन्द्रादयोऽर्चनम् । सरस्वत्यासनं मूर्ति रों ह्रीं देवी सरस्वती ॥२३ ॥

हृदाद्या लक्ष्मीर्मेधा च कला तुष्टिश्च पुष्टिका । गौरी प्रभा मतिर्दुर्गा गणो गुरुश्च क्षेत्रपः ॥ २४ ॥

तथा गं गणपतये च ह्रीं गौर्यै च श्रीं श्रियै । ह्रीं त्वरितायै ऐं क्लीं सौं त्रिपुरा चतुर्थ्यन्ता नमोन्तका ॥ २५ ॥

प्रणवाद्याश्च नामाद्यमक्षरं विन्दुसंयुतम् । ॐ युता वा सर्वमन्त्राः पूजनाज्जपतः स्मृताः ॥२६ ॥

होमस्तिलघृताद्यैश्च धर्मकामार्थमोक्षदाः । पूजामन्त्रान्पठेद्यस्तु भुक्तभोगो दिवं व्रजेत् ॥ २७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये विष्ण्वादिदेवतासामान्यपूजाविधानवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥

खड्ग, शार्ङ्ग, पाश, अंकुश, श्रीवत्स, कौस्तुभ और वनमाला ( की पूजा करनी चाहिए ) || २२ || ' श्रीं ' इस मन्त्र से श्री, महालक्ष्मी, गरुड़, गुरु, इन्द्र आदि और सरस्वती के आसन तथा मूर्ति की पूजा करनी चाहिए । ( इनके पूजन के लिए सर्वप्रथम प्रणव तब नाम के प्रथम वर्ण में अनुस्वारयुक्त अक्षर और फिर चतुर्थी विभक्ति सहित नाम के बाद ' नमः ' – यह पद जोड़ना चाहिए । जैसे– “ ॐ चं चक्राय नमः ”, “ ॐ गं गदायै नमः " इत्यादि । ) सरस्वती के आसन की पूजा में, “ ॐ ऐं देव्यै सरस्वत्यै नमः ” इस मंत्र का और उनकी मूर्ति की पूजा में, “ ॐ ह्रीं देव्यै सरस्वत्यै नमः ” इस मन्त्र का उपयोग करना चाहिए । इस · तरह हृदय आदि, लक्ष्मी, मेधा, कला, तुष्टि, पुष्टि, गौरी, प्रभा, मति, दुर्गा, गण, गुरु और क्षेत्रपाल की पूजा करनी चाहिए ॥२३-२४ ॥ गणेश की पूजा “ ॐ गं गणपतये नमः ” इस मन्त्र से; गौरी की पूजा – “ ॐ ह्रीं गौर्यै नमः " - इस मन्त्र से; श्री की पूजा “ ॐ श्रीं श्रियै नमः ” इस मन्त्र से; त्वरित की पूजा- “ ॐ ह्रीं त्वरितायै नमः ” इस मन्त्र से और त्रिपुरा की पूजा “ ॐ ऐं क्लीं सौं त्रिपुरायै नम: " इस मन्त्र से करनी चाहिए । इस प्रकार “ त्रिपुरा ” शब्द चतुर्थ्यन्त हो और फिर “ नमः ” शब्द का प्रयोग हो । ( देवताओं की पूजा का मन्त्र बनाने का नियम- ) सभी मन्त्रों में पहले प्रणव फिर अनुस्वारयुक्त नाम का पहला अक्षर ( फिर चतुर्थ्यन्त नाम और अन्त में ' नम: ' इस पद का प्रयोग होता है । ) पूजा और जप में प्रायः सभी मन्त्र ॐकार से युक्त बतलाये गये हैं । ( पूजा की समाप्ति पर - ) तिल और घी से होम करना चाहिए । इस प्रकार ये देवता धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाले होते हैं । जो मनुष्य पूजा के मन्त्रों को पढ़ता है, वह ( सभी ) भोगों को भोगकर स्वर्ग चला जाता है ॥२५-२७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में विष्णु आदि देवताओं के सामान्य - पूजा - विधान - वर्णन नामक इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२१ ॥

१ क. ङ. च. ‘ मात्खड्गं मु ' । २ क. ङ. च. शङ्खशार्ङ्गकम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 126

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१२२ अग्निपुराणम् अथ द्वाविंशोऽध्यायः पूजाधिकारार्थं सामान्यस्नानविधिः नारद उवाच वक्ष्ये स्नानं क्रियाद्यर्थं नृसिंहेन तु मृत्तिकाम् । ( ' गृहीत्वा तां द्विधा कृत्वा मलस्नानमथैका ॥ १ ॥

निमज्ज्याचम्य विन्यस्य सिंहेन कृतरक्षकः । विधिस्नानं ततः ) कुर्यात् प्राणायामपुरः सरम् ॥२ ॥

हृदि ध्यायन् " हरिं देवं मन्त्रेणाष्टाक्षरेण हि । त्रिधा पाणितले मृत्सां दिग्बन्धं सिंहजप्ततः ॥ ३ ॥

वासुदेवप्रजप्तेन तीर्थं सङ्कल्प्य चालभेत् । गात्रं वेदादिमन्त्रैश्च ' सम्मार्ज्याराध्वमूर्तिगम् ॥४ ॥

स्मृत्वाघमर्षणं वस्त्रं परिधाय समाचरेत् । विन्यस्य मन्त्रैर्निर्मार्ज्ड पाणिस्थं जलमेव च ॥५ ॥

नारायणेन संयम्य वायुमाघ्राय चोत्सृजेत् । जलं ध्यायन्हरिं पश्चाद् दत्त्वार्घ्यं द्वादशाक्षरम् ॥६ ॥

जप्त्वाऽन्यान्भक्तितस्तर्प्य योगपीठादितः क्रमात् । मन्त्रान् दिक्पालपर्यन्तानृषीन् पितृगणानपि ॥ । ७ ॥ अध्याय २२ पूजा अधिकार के लिए सामान्य स्नानविधि नारद बोले- किसी धार्मिक कृत्य से पूर्व स्नान करने के लिए स्नानविधि का वर्णन कर रहा हूँ । पहले नृसिंह का नाम लेकर मिट्टी ले । उसे दो भागों में बाँटकर एक भाग से ( शरीर के ) मल ( को दूर करने ) के लिए स्नान करे । फिर डुबकी लगाकर स्नान करे और आचमन करके “ ॐ नृसिंहाय नमः " -इस मन्त्र से अंगन्यास और शरीर की रक्षा करे । तत्पश्चात् विधिपूर्वक स्नान के बाद हृदय में भगवान् विष्णु का ध्यान करते हुए- “ ॐ नमो नारायणाय ' इस अष्टाक्षर मन्त्र से प्राणायाम करे ॥१-२३ ॥ हाथ में मिट्टी लेकर उसके तीन भाग करे । फिर नृसिंह मंत्र के जपपूर्वक ( उन तीनों भागों से तीन बार ) दिग्बन्ध करे ( हर दिशा में वहाँ के विघ्न करनेवाले भूतों को भगाने की दृष्टि से मिट्टी बिखेरने को दिग्बन्ध कहते हैं । ) ॥३ ॥ तत्पश्चात् “ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " इस वासुदेव मन्त्र से जप करके फिर संकल्प करके

तीर्थ - जल का स्पर्श करना चाहिए । इसके बाद वेद आदि के मन्त्रों से अपने शरीर का और आराध्य देवता की मूर्ति का सम्मार्जन करना चाहिए || ४ || तदनन्तर अघमर्षण मन्त्र का जप करके वस्त्र पहनकर फिर आगे का कार्य करे-अंग - न्यास करके मन्त्रों से मार्जन करना चाहिए । हाथ में जल लेकर नारायण मन्त्र से प्राण - संयम करके जल को सूँघने के बाद भगवान् हरि का ध्यान करते हुए पानी गिरा दे । इसके बाद अर्घ्य देकर “ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " इस द्वादशाक्षर मन्त्र का जप करना चाहिए ॥५-६ ॥ अन्य देवताओं का भक्तिपूर्वक तर्पण करना चाहिए । फिर योगपीठ आदि के क्रम से दिक्पाल तक के मन्त्रों का, ऋषियों, पितरों, मनुष्यों और स्थावर पर्यन्त सभी प्राणियों का तर्पण करके आचमन १ गृहीत्वा " ततः ग. पुस्तके नास्ति । २ घ. मनःस्ना ' । ३ ख, ' या । विमृज्याऽऽच ' । ४ क. ख. घ. ङ. च. न्हरिज्ञानं म ' । ५ क. ख. ग. घ. ' दिना मन्त्रैः सम्मार्ज्याऽऽरध्यमूर्तिना । ६ घ. न्याञ्शतशस्तं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 127

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त्रयोविंशोऽध्यायः १२३ मनुष्यान् सर्वभूतानि स्थावरान्तान्यथाचमेत् । न्यस्य चात्मनि संहृत्य मन्त्रान् ' यागगृहं व्रजेत् ॥८ ॥

एवमन्यासु पूजासु मूलाद्यैः स्नानमाचरेत् ॥९ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये सामान्यपूजाविधिवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥

अथ त्रयोविंशोऽध्यायः मूर्त्यादिदेवानांसामान्यपूजाविधिः नारद उवाच वक्ष्ये पूजाविधिं विप्रा यं कृत्वा सर्वमाप्नुयात् । प्रक्षालिताङ्घ्रिराचम्य वाग्यतः कृतरक्षणः ॥१ ॥

प्राङ्मुखः स्वस्तिकं बद्ध्वा पद्माद्यपरमेव च । यं बीजं नाभिमध्यस्थं धूम्रं चण्डानिलात्मकम् ॥२ ॥

' विश्लेषयेदशेषं तु ध्यायन् कायात्तु कल्मषम् । क्षौं हृत्पङ्कजमध्यस्थं बीजं तेजोनिधिं स्मरन् ॥३ ॥

अधोर्ध्वतिर्यग्गाभिस्तु ज्वालाभिः कल्मषं दहेत् । शशाङ्काकृतिवद्ध्यायेदम्बरस्थं सुधाम्बुभिः ॥४ ॥

हृत्पद्यव्यापिभिर्देहं “ स्वकमाप्लावयेत्सुधीः । सुषुम्नायोनिमार्गेण सर्वनाडीविसर्पिभिः ॥५ ॥

करे । तत्पश्चात् न्यास करके हृदय में मन्त्रों का उपसंहार करके यज्ञ - गृह में प्रवेश करे । इसी प्रकार अन्य पूजाओं में भी मूल आदि मन्त्रों से स्नान करना चाहिए ॥७ - ९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में सामान्यपूजाविधिवर्णन नामक बाईसवाँ अध्याय समाप्त ॥२२ ॥

अध्याय २३ मूर्त्यादिदेवताओं की सामान्य पूजाविधि नारद ने कहा - हे ब्रह्मर्षियो! अब मैं उस पूजाविधि का वर्णन करूँगा जिसको करके सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है । पहले पादप्रक्षालन करके आचमन करे, फिर मौन होकर शरीर की रक्षा करे ॥१ ॥ पूर्वाभिमुख होकर

स्वस्तिकासन या पद्मासन या अन्य आसन लगाकर बैठे । फिर नाभि के मध्य भाग में स्थित धुएँ की तरह वर्णवाले प्रचण्ड वायुरूप ' यं ' बीज का ध्यान करते हुए अपने शरीर से सभी पापों को दूर कर दे । हृदय - कमल में स्थित तेज के आधारभूत ‘ क्षौं ' बीज का स्मरण करते हुए नीचे, ऊपर और इधर - उधर फैलनेवाली ज्वालाओं से अपने पापों को जला डालना चाहिए ॥२-३३ ॥ ( इस प्रकार पापों को जला डालने के पश्चात् ) बुद्धिमान् पुरुष को चाहिए कि आकाश में स्थित चन्द्रमा के समान अमृत बरसानेवाली पिण्डाकृति का ध्यान करके हृदय - कमल को व्याप्त करने-वाली और सुषुम्ना नाड़ी से होकर सब नाड़ियों में फैलनेवाली अमृत की धाराओं से अपने शरीर को आप्लावित करे ॥४-५ ॥ ( इस प्रकार तत्त्वों को ) शुद्ध करके उनका न्यास करे ( शरीर के विभिन्न अंगों को विभिन्न देवताओं १ च न्त्रान्योग ' । २ ख. ग. घ. ङ. च. प्रा यत्कृत्वा । ३ घ. विशेष । ४ ख. ग. च. ध्यायेत्काया । ५ क. ङ. च. “ महाह्लादये । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१२४ अग्निपुराणम् शोधयित्वा न्यसेत्तत्वं ' करशुद्धिरथास्त्रकम् । मूलं देहे द्वादशाङ्गं न्यसेन्मन्त्रैर्द्विषट्ककैः । उदरं च तथा पृष्ठं बाहूरू जानुपादकम् । वामे तु वर्द्धनीं न्यस्य पूजाद्रव्यं तु दक्षिणे । चैतन्यं सर्वगं ज्योतिरस्त्रजप्तेन ' वारिणा । धर्मं ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं वह्निदिङ्मुखान् । कूर्मं पीठे ह्यनन्तं च पद्मं सूर्यादिमण्डलम् । पूर्वं स्वहृदये ध्यात्वा आवाह्यार्चेच्च मण्डले । स्नानं वस्त्रोपवीतं च भूषणं गन्धपुष्पकम् ।

यजेदङ्गानि पूर्वादौ द्वारि पूर्वे परेऽण्डजम् ।

व्यापकं हस्तयोरादौ दक्षिणाङ्गुष्ठतोऽङ्गकम् ॥६ ॥

हृदयं च शिरश्चैव शिखावर्मास्त्रलोचने ॥ ७ ॥

मुद्रां दत्त्वा स्मरेद् विष्णुं जप्त्वाष्टशतमर्चयेत् ॥८ ॥

प्रक्षाल्यास्त्रेण चार्श्वेऽथ गन्धपुष्पान्विते न्यसेत् ॥ ९ ॥

फडन्तेन तु संसिच्य हस्ते ध्यात्वा हरिं परम् ॥१० ॥

अधर्मादीनि गात्राणि पूर्वादा ' योगपीठके ॥११ ॥

विमलात्ताः केसरस्था " ग्रहाः कर्णिकसंस्थिताः ॥ १२ ॥

अर्घ्यं पाद्यं तथाचामं मधुपर्कं पुनश्च तत् ॥ १३ ॥

धूपदीपनैवेद्यानि पुण्डरीकाक्षविद्यया ॥१४ ॥

दक्षे चक्रं गदां सौम्ये कोणे शङ्खं धनुर्न्यसेत् ॥१५ ॥

को समर्पित करने को न्यास कहते हैं । ) फिर हाथों को शुद्ध करे । इसके बाद अस्त्रों का न्यास करे । फिर व्यापक करे । दाहिने अँगूठे से प्रारम्भ करके ( अन्य ) अंगों में व्यापक करना चाहिए । ( अब व्यापक के बारे में विस्तृत विवरण दिया जाता है । ) - अपने शरीर में द्वादशाक्षर मूल मन्त्र “ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " का बारह मन्त्रवाक्यों से न्यास करे । हृदय, सिर, शिखा, कवच, अस्त्र, नेत्र, उदर, पीठ, बाहु, ऊरु, घुटना, पैर - ये शरीर के बारह स्थान हैं । इन बारह अंगों में द्वादश मन्त्र के एक - एक वर्ण का न्यास करना चाहिए । ( जैसे- ॐ नमो हृदये ”, “ ॐ नं नमः शिरसि ”, “ ॐ मों नमः शिखायाम् " इत्यादि । ) फिर मुद्रा का समर्पण करके भगवान् विष्णु का स्मरण करना चाहिए । फिर अष्टोत्तरशत ( १०८ ) मन्त्र का जप करके पूजा करनी चाहिए ॥ ६-८ ॥ बायीं तरफ जलपात्र और दाहिनी ओर पूजन-सामग्री रखकर ( उनका ) मन्त्र से प्रक्षालन करके सुगन्धित पदार्थ और पुष्पों को दो पूजा - पात्रों में रखे || ९ || ' फट् ’ में अन्त होनेवाले अस्त्र मन्त्र - " अस्त्राय फट् " से अभिमन्त्रित जल से सर्वव्यापक चैतन्यस्वरूप ज्योतिर्मय परमेश्वर को हाथ में जल लेकर नहलाये । फिर परमेश्वर श्रीहरि का ध्यान करके योगपीठ पर धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अग्नि, दिक्पाल, अधर्म आदि के विग्रह की स्थापना पूर्व आदि दिशाओं के क्रम से करना चाहिए । उस पीठ पर कच्छप, अनन्त, पद्म, सूर्य आदि मण्डल और विमला आदि शक्तियों की कमल के केसरस्थ ग्रहों की कर्णिका में स्थापना करनी चाहिए ॥१०-१२ ॥ पहले देवता का हृदय में ध्यान करे, फिर मण्डल में आवाहन करके उसकी पूजा करे । तदनन्तर ( क्रम से ) अर्घ्य, पाद्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि को पुण्डरीकाक्षविद्या ( “ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " ) इस मन्त्र से अर्पित करे । इसके अनन्तर मण्डल के पूर्व आदि दिशाओं में भगवान् के पार्षदों की पूजा करे । श्रेष्ठ पूर्व दरवाजे पर गरुड़ की, दक्षिण द्वार पर चक्र की, उत्तर द्वार पर गदा, ईशान तथा अग्निकोण में शंख एवं धनुष की स्थापना करनी चाहिए । भगवान् के बायें और दाहिने १ ख. ग. घ. ‘ द्धिरथा ' । २ ख. ग. ' न्त्रैर्विसर्गकैः । ३ क. ङ. च. पादजानुकम् । ४ वर्द्धनीजलपात्रम् । ५ घ. रष्टज ६ क. घ. ङ. च. परे । ख. पढ़े । ७ क. ख. ग. घ. च. ' मुखाः । अ ' । ८ ङ. सप्ताऽऽदौ । ९ घ. यमं ' ॥ १० क. घ. ङ. च. ° स्थानुग्रहा कर्णिकास्थिता । पू । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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त्रयोविंशोऽध्यायः १२५ देवस्य वामतो दक्षे चेषुधि खड्गमेव च । वनमालां च श्रीवत्सकौस्तुभो दिक्पतीन् बहिः । व्यस्तेन च समस्तेन अङ्गैर्बीजेन वै यजेत् । हृदये विन्यसेद्ध्यात्वा अहं ब्रह्म हरिस्त्विति । एवमष्टाक्षराद्यैश्च ' पूजाः.३ कृत्वा विमुक्तिभाक् । अङ्गुष्ठकद्वये न्यस्य वासुदेवं बलादिकान् । हृन्नाभिगुह्यजान्वङ्घ्रौ मध्ये पूर्वादिकं यजेत् ।

नवाब्जे नवमूर्त्या च नवव्यूहं च पूर्ववत् ।

वामे चर्म श्रियं दक्षे पुष्टिं वामेऽग्रतो न्यसेत् ॥ १६ ॥

स्वमन्त्रैः पूजयेत्सर्वान् ' विष्णोरर्चावसानतः ॥१७ ॥

जप्त्वा प्रदक्षिणीकृत्य जप्त्वार्य्यं च समर्प्य च ॥ १८ ॥

आगच्छावाहने योज्यं क्षमस्वेति विसर्जने ॥ १ ९ ॥

एकमूर्त्यर्चनं प्रोक्तं नवव्यूहार्चनं शृणु ॥ २० ॥

तर्जन्यादौ शरीरेऽथ शिरोललाटवक्त्रके ॥२१ ॥

एकपीठं नवव्यूहं नवपीठं च पूर्ववत् ॥ २२ ॥

पद्ममध्ये च तत्स्थानि वासुदेवं च पूजयेत् ॥२३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये आदिमूर्त्यादिपूजाविधिर्नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

भाग की दो तूणीर, बायें भाग में तलवार और चर्म ( ढाल ), दाहिने भाग में लक्ष्मी और बायें भाग में पुष्टि देवी की स्थापना करनी चाहिए ॥१३-१६ ॥ भगवान् के सामने वनमाला, श्रीवत्स और कौस्तुभ की स्थापना करनी चाहिए । दिक्पालों को मण्डल के बाहर स्थापित करना चाहिए । सभी ( पार्षदों और देवताओं की ) पूजा उनके मन्त्रों से होनी चाहिए । सबके अन्त में भगवान् विष्णु की पूजा करनी चाहिए || १७ || अङ्गों के साथ अलग - अलग ( व्यस्त ) और एक साथ ( समस्त रूप से ) मन्त्रों को पढ़कर भगवान् की पूजा करनी चाहिए । क्रम से जाप, प्रदक्षिणा और स्तुति करके अर्घ्य समर्पित करना चाहिए । फिर “ मैं ब्रह्म - स्वरूप विष्णु हूँ ', ऐसा ध्यान करके हृदय में भगवान् हरि की स्थापना करनी चाहिए ॥१८-१८३ ॥ आवाहन - मन्त्र में “ आगच्छ ”! ( भगवान्! “ आइये ” ) इस शब्द को जोड़ना चाहिए और विसर्जन - मन्त्र में " क्षमस्व " ( त्रुटियों को क्षमा कीजिये ) - यह शब्द जोड़ देना चाहिए ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार अष्टाक्षर आदि मन्त्रों से पूजा करके मनुष्य मोक्ष का भागी होता है । यह भगवान् के एक विग्रह का पूजन कहा गया । अब नौ व्यूहों के पूजन की विधि सुनो || २० || दोनों अँगूठों में और तर्जनी आदि में वासुदेव और बलभद्र आदि का न्यास करना चाहिए । फिर शरीर में अर्थात् सिर, ललाट, मुख, हृदय, नाभि, गुह्य अंग, जानु और चरण आदि अंगों में ( पूर्ववत् ) अन्य देवताओं की स्थापना करके उनका पूजन करे । फिर मध्य में और पूर्व आदि दिशाओं में पूजन करे । इस प्रकार एक पीठ पर एक व्यूह के क्रम से नौ व्यूहों के लिए नौ पीठों की स्थापना करनी चाहिए । नौ कमलों में नौ मूर्तियों के द्वारा पहले की तरह नौ व्यूहों की पूजा करनी चाहिए । कमल के मध्यभाग में जो भगवान् का स्थान है, उसमें वासुदेव की पूजा करनी चाहिए ॥२१-२३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में आदिमूर्त्यादिपूजाविधि नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३ ॥

१ क. ङ. च. ' न्विष्णवोर्घावसानतः घ. ' न्विष्णुरर्घोव ' । २ क. ङ. च. ' राद्याश्च । ३ ग. घ. पूजां । ४ क. ङ. च. मध्यपू । ५ ख. ग. घ. ' त् । इष्टं म ' । ६ ख. ग. घ. ° ध्ये ततः स्था । ७ ख. ग. घ. ' वं च पूज ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१२६ अग्निपुराणम् अथ चतुर्विंशोऽध्यायः अथ कुण्डनिर्माणाग्निकार्यादिविधिः नारद उवाच अग्निकार्यं प्रवक्ष्यामि येन स्यात्सर्वकामभाक् । चतुरभ्यधिकं विंशमङ्गुलं चतुरस्रकम् ॥१ ॥

सूत्रेण सूत्रयित्वा तु क्षेत्रं तावत् खनेत्समम् । खातस्य मेखलाः कार्यास्त्यक्त्वा चैवाङ्गुलद्वयम् ॥२ ॥

सत्त्वादिसञ्ज्ञाः पूर्वास्या ं द्वादशाङ्गुलमुच्छ्रिताः । अष्टाङ्गुलाद्व्यङ्गुलाथ चतुरङ्गलविस्तृता ॥३ ॥

योनिर्दशाङ्गुला रम्या षट्चतुद्वयङ्गुलोच्छ्रिताः ' । क्रमान्निम्ना तु कर्तव्या पश्चिमाशाव्यवस्थिता ॥४ ॥

अश्वत्थपत्रसदृशी किञ्चित्कुण्डे निवेशिता । तुर्याङ्गुलायतं नालं पञ्चदशाङ्गुलायतम् ॥५ ॥

मूलन्तु त्र्यङ्गुलं योन्या अग्रं तस्याः षडङ्गुलम् ॥ लक्षणं चैकहस्तस्य द्विगुणं द्विकरादिषु ॥६ || ६ || ॥ एकत्रिमेखलं कुण्डं वर्तुलादि वदाम्यहम् । कुण्डार्द्धे तु स्थितं सूत्रं कोणे यदतिरिच्यते ॥७ ॥

तदर्द्धदिशि संस्थाप्य भ्रामितं वर्तुलं भवेत् । कुण्डार्द्ध कोणभागार्द्धं दिशि चोत्तरतो बहिः ॥८ ॥

अध्याय २४ कुण्डनिर्माण एवं अग्नि की कार्यविधि नारद बोले - महर्षियो! अब मैं उस अग्निकार्य का वर्णन करूँगा जिससे मनुष्य को सभी मनोवाञ्छित वस्तुओं की प्रप्ति हो जाती है । चौबीस अङ्गुल की चौकोर ( २४ x ४ ) भूमि को सूत से नापकर उस क्षेत्र को ( सभी ओर से ) बराबर खोदना चाहिए । उस खोदे हुए कुण्ड के चारों ओर दो अंगुल भूमि छोड़कर एक मेखला ( सी ) बना लेनी चाहिए ॥१-२ ॥ ये मेखलाएँ - सत्त्व, रजस्, तमस् नाम ( संख्या में तीन होती हैं । ) मेखलाओं की ऊँचाई बारह अंगुल होती है । इन मेखलाओं की चौड़ाई क्रम से आठ, दो और चार अंगुल की होती है ॥३ ॥ ( कुण्ड से ) पश्चिम दिशा की ओर दस अंगुल लम्बी सुन्दर

योनि बनायी जाय । उस योनि को इस क्रम से आगे की ओर नीचा बनाना चाहिए अर्थात् सबसे पिछला भाग छह अंगुल, फिर उसके आगे का भाग चार अंगुल, फिर उसके भी आगे का भाग दो अंगुल ऊँचा होना चाहिए || ४ || योनि की आकृति पीपल के पत्ते की - सी होनी चाहिए । उसका कुछ भाग कुण्ड के अन्दर प्रविष्ट होना चाहिए । योनि का आयाम चार अंगुल का हो तथा नाल फैलाव पन्द्रह अंगुल होना चाहिए । योनि का मूल भाग तीन अंगुल एवं उसका अग्रभाग छह अंगुल विस्तृत होना चाहिए । यह एक हाथ लम्बे - चौड़े कुण्ड का लक्षण कहा गया । दो हाथ या तीन हाथ लम्बे - चौड़े कुण्ड में सभी नाप दुगुने या तिगुने हो जायँगे ॥५-६ ॥ अब मैं एक या तीन मेखलावाले वर्तुल आदि आकारवाले कुण्डों का वर्णन करता हूँ । चौकोर कुण्ड के आधे भाग अर्थात् ठीक बीच में सूत रखकर उसे किसी एक कोण की सीमा तक ले जाना चाहिए । मध्य विन्दु से कोण विन्दु तक सूत को ले जाने में सामान्य दिशाओं की अपेक्षा वह सूत जितना बढ़ जाय उसके आधे भाग १ च. विंशं मण्डलं । २ ख. ग. घ. पूर्वाशा । च. पूर्वासा । ३ क. घ. गुलग्रगा । क्र ' । ङ. ' गुला यथा । क्र । ४ घ. तुर्याङ्गुलायता । ५ घ. दिशाश्चोत्त ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA