अग्नि पुराण — पृष्ठ 111–120

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

अग्नि पुराण, पृष्ठ 111 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षोडशोऽध्यायः १०७ दस्यवः शीलहीनाश्च वेदो वाजसनेयकः धर्मकञ्चुकसंवीता अधर्मरुचयस्तथा कल्कि विष्णुयशः पुत्रो याज्ञवल्क्य पुरोहितः । स्थापयिष्यति मर्यादां चातुर्वर्ण्ये यथोचिताम् । कल्किरूपं परित्यज्य हरिः स्वर्गं गमिष्यति । वर्णाश्रमाश्च धर्मेषु स्वेषु स्थास्यन्ति सत्तम । अवतारा असङ्ख्याता अतीतानागतादयः । सोऽवाप्तकामो विमलः सकुलः स्वर्गमाप्नुयात् । ६ अवतीर्णः स जगतः सर्गादेः कारणं हरिः दश पञ्च च शाखा ' वै प्रमाणेन भविष्यति (? ) ॥६ ॥

मानुषाद् भक्षयिष्यन्ति म्लेच्छाः पार्थिवरूपिणः ॥७ ॥

उत्सादयिष्यति म्लेच्छान् गृहीतास्त्रः कृतायुधः ॥८ ॥

आश्रमेषु च सर्वेषु प्रजा सद्धर्मवर्त्मनि ॥ ९ ॥

ततः कृतयुगं नाम पुरावत्सम्भविष्यति ॥१० ॥

एवं सर्वेषु कल्पेषु सर्वमन्वन्तरेषु च ॥ ११ ॥

विष्णोर्दशावतारांशान्यः ५ पठेच्छृणुयान्नरः ॥ १२ ॥

धर्माधर्मव्यवस्थानमेवं वै कुरुते हरिः ॥ १३ ॥

॥१४ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये बुद्धावतारवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६ ॥

शीलविहीन हो जायँगे । वेदों में केवल वाजसनेय ( यजुर्वेद ) और केवल दस - पाँच शाखाओं की ही मान्यता रह जायगी (? ) ॥६ ॥ धर्म का चोला पहने हुए और अधर्म में रुचि रखनेवाले राजारूपधारी म्लेच्छ मनुष्यों

का भक्षण करेंगे ॥७ ॥ तदनन्तर भगवान् कल्कि का अवतार होगा । वे विष्णुयश के पुत्र होंगे । याज्ञवल्क्य उनके

पुरोहित होंगे । वे अस्त्र - शस्त्र धारण करके म्लेच्छों का संहार कर डालेंगे || ८ || भगवान् कल्कि चारों वर्णों और सभी आश्रमों में शास्त्रीय मर्यादा स्थापित करेंगे । वे सभी प्रजाजनों को सद्धर्म में लगायेंगे || ९ || इस प्रकार ( धर्म की स्थापना करके ) भगवान् कल्कि अपने रूप को छोड़कर स्वर्ग चले जायँगे । तत्पश्चात् पहले की भाँति कृतयुग पुनः प्रारम्भ होगा ॥१० ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! कृतयुग ( सत्ययुग ) आने पर सभी अपने वर्ण और आश्रम के धर्मों का पालन

करने लगेंगे । इसी प्रकार सब कल्पों और मन्वन्तरों में असंख्य अवतार अतीत में भी हुए हैं और भविष्य में भी होते रहेंगे ॥११-११ ॥ जो मनुष्य विष्णु के दस अंशावतारों का पाठ करेगा या उसे सुनेगा वह अपने सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त करके सकुटुम्ब स्वर्ग को प्राप्त कर लेगा ॥ १२-१२३ ॥ संसार की सृष्टि आदि के आधारभूत भगवान् विष्णु इस प्रकार अवतार लेकर धर्म और अधर्म की व्यवस्था किया करते हैं ॥१३-१४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में बुद्धावतार नामक सोलहवाँ अध्याय समाप्त ॥१६ ॥

१ ग. शाला वै प्रायेणैव भ ° । २ क. उच्छेद । ३ च. ' दा भविष्यति पृथक् - पृथक् । वर्णाश्रमाश्च धर्मेषु स्वेषु स्थास्यन्ति सत्तम । आश्र ' । ४ क. यथेरिताम् । ५ ख. घ. ' ताराख्यान्यः । ६ घ. ' तीर्णश्च स गतः स । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 112

अग्नि पुराण, पृष्ठ 112 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् १०८ अथ सप्तदशोऽध्यायः जगत्सर्गवर्णनम् अग्निरुवाच जगत्सर्गादिकां ' क्रीडां विष्णोर्वक्ष्येऽधुना शृणु । स्वर्गादिकृत्स सर्गादिः सृष्ट्यादिः सगुणोऽगुणः ॥ १ ॥

ब्रह्माव्यक्तं सदग्रेऽभून्नखं रात्रिदिनादिकम् ॥ प्रकृतिं पुरुषं विष्णुं प्रविश्याक्षोभयत्ततः ॥ २ ॥

सर्गकाले महत्तत्त्वमहङ्कारस्ततोऽभवत् । वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः ॥३ ॥

। स्पर्शमात्रोऽनिलस्तस्माद्रूपमात्रोऽनलस्ततः ॥४ ॥

अहङ्काराच्छब्दमात्रमाकाशमभवत्ततः रसमात्रा आप इतो गन्धमात्रा धरित्र्यभूत् । अहङ्कारात्तामसात्तु तैजसानीन्द्रियाणि च ॥५ ॥

वैकारिकादश देवा मन एकादशेन्द्रियम् । ' ततः स्वयम्भूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ॥ ६ ॥

अप एव ससर्जाऽऽदौ तासु वीर्यमवासृजत् । आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ॥७ ॥

अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः । हिरण्यवर्णमभवत्तदण्डमुदकेशयम् ॥८ ॥

अध्याय १७ जगत्सर्ग वर्णन अग्नि बोले - अब मैं भगवान् विष्णु की क्रीडा - संसार की सृष्टि आदि का वर्णन कर रहा हूँ । उसे सुनो! स्वर्ग आदि के निर्माता विष्णु सृष्टि के आदि हैं । वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी ॥१ ॥ सर्वप्रथम सत्स्वरूप ब्रह्म ही थे । उस

समय न आकाश था, न रात्रि थी और न दिन ही थे । तत्पश्चात् पुरुष विष्णु ने प्रकृति के अन्दर प्रविष्ट होकर उसको क्षुब्ध कर दिया ॥२ ॥ सृष्टि के समय सर्वप्रथम ( अव्यक्त प्रकृति से ) महत्तत्त्व हुआ । महत्तत्त्व से अहङ्कार हुआ । अहङ्कार

के तीन भेद हैं - वैकारिक ( सात्त्विक ), तैजस ( राजस ) और भूतादिरूप ( तामस ) ॥३ ॥ तामस अहङ्कार से शब्दतन्मात्र,

फिर शब्दतन्मात्र से आकाश उत्पन्न हुआ । फिर स्पर्शतन्मात्र से वायु और रूपतन्मात्र से अग्नि उत्पन्न हुआ ॥४ ॥ रसतन्मात्रा

से जल और गन्ध तन्मात्रा से पृथ्वी उत्पन्न हुई । राजस ( तैजस ) अहङ्कार से इन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं ॥५ ॥ दस इन्द्रियों के

अधिष्ठाता दस देवता तथा ग्यारहवाँ मन - ये वैकारिक अर्थात् सात्त्विक अहङ्कार से उत्पन्न हुए । तत्पश्चात् नाना प्रकार की प्रजाओं को उत्पन्न करने की इच्छावाले भगवान् स्वयम्भू ने सर्वप्रथम जल की ही सृष्टि की और उसमें अपने वीर्य को निहित कर दिया । अप् - जल को नार कहा गया है और उसे ही नरसूनु भी कहा गया है । पहले वही भगवान् का अयन ( आश्रम, स्थान ) था अतः भगवान् को नारायण कहते हैं ॥ ६-७३ ॥ उस जल से ही हिरण्यवर्ण ( सुनहला ) अण्डा उत्पन्न हुआ । उससे साक्षात् ब्रह्म की उत्पत्ति हुई, जो ' स्वयम्भू ' नाम से विख्यात हैं ॥८-८३ ॥ भगवान् हिरण्यगर्भ ५. इत १ क आरभ्याध्यायपरिसमाप्तिपर्यन्तः . ख. ग. ङ. च. जगत्सर्गादिकी । २ क. ङ. च. ब्रह्म व्यक्त । ३ घ. सदाग्रे । ४ ग. ' कृतिं पुरुषो विष्णुः प्र ० ।

श्लोका महाभारतान्तर्गत - हरिवंशपर्वस्थद्वितीयाध्यायत उद्धृता इति गम्यते

श्लोकानामक्षरश: उभयत्र पाठसाम्यात् । ६ क. पूर्ण ।

CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 113

अग्नि पुराण, पृष्ठ 113 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तदशोऽध्यायः तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा स्वयम्भूरिति नः श्रुतम् तदण्डमकरोद् द्वैधं दिवं भुवमथापि च अप्सु पारिप्लवां पृथ्वीं दिशश्च दशधा दधे ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां स्त्रष्टुमिच्छन्प्रजापतिः वयांसि च ससर्जादौ पर्जन्यं चाथ वक्त्रतः । साध्यास्तैरयजन्देवान्भूतमुच्चावचं भुजात् ' । मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । सप्तैते जनयन्ति स्म प्रजा रुद्राश्च सत्तम । अर्धेन नारी तस्यां स ब्रह्मा वै चासृजत्प्रजाः १० ९ । हिरण्यगर्भो भगवानुषित्वा परिवत्सरम् ॥९ ॥

। तयोः शकलयोर्मध्य आकाशमसृजत्प्रभुः ॥१० ॥

। तत्र कालं मनो वाचं कामं क्रोधमथो रतिम् ॥११ ॥

। विद्युतोऽशनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च ॥१२ ॥

ऋचो यजूंषि सामानि निर्ममे यज्ञसिद्धये ॥१३ ॥

सनत्कुमारं रुद्रं च ससर्ज क्रोधसम्भवम् ॥१४ ॥

वसिष्ठं ' मानसान्सप्त ब्राह्मणानिति निश्चितम् ॥१५ ॥

द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् ॥१६ ॥

॥१७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये जगत्सर्गवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

एक वर्ष तक उसी अण्डे में अवस्थित रहे । तदनन्तर उसको दो भागों में विभक्त कर स्वर्ग और भूलोक की सृष्टि की । फिर परमेश्वर ने उन दोनों खण्डों के मध्य में आकाश की सृष्टि की ॥९ -१० ॥ उन्होंने जल में तैरती हुई पृथ्वी को और दस दिशाओं को यथोचित स्थान पर रख दिया । फिर काल, मन, वाणी, काम, क्रोध, रति आदि को भी उत्पन्न किया । फिर सृष्टि करने की इच्छा से प्रजापति ने तदनुकूल ही सृष्टि करना प्रारम्भ किया । सबसे पहले विद्युत्, वज्र, मेघ, रोहित, इन्द्रधनुष, पक्षियों और पर्जन्य की सृष्टि की । तदनन्तर प्रजापति ने यज्ञानुष्ठान के लिए मुख से ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का निर्माण किया ॥११-१३ ॥ उन ( वेदों ) के द्वारा साध्यगणों ने देवताओं का यजन किया । फिर ब्रह्मा जी ने अपनी भुजा से ऊँचे तथा नीचे ( या छोटे - बड़े ) भूतों को उत्पन्न किया । फिर सनत्कुमार को पैदा किया तथा क्रोध से पैदा होनेवाले रुद्र को उत्पन्न किया ॥१४ ॥ ब्रह्मा जी ने मन से मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और

वसिष्ठ नामक सप्त ऋषियों को उत्पन्न किया ॥१५ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! इन सप्तर्षियों से तथा रुद्रों से ही प्रजाओं की सृष्टि

होती है । सृष्टि - वृद्धि की इच्छा से ब्रह्मा ने अपने शरीर के दो भाग किये - आधे भाग से वे पुरुष हुए और दूसरे आधे भाग से स्त्री बन गये । फिर उस नारी के गर्भ से ब्रह्मा ने प्रजाओं की सृष्टि की । ( ये स्वायम्भुव मनु और शतरूपा मानवीय सृष्टि के आदि हैं ) ॥१६-१७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में जगत्सर्ग वर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥१७ ॥

१ क. न्यं वर्षचक्रतः । २ च. ह्यजात् । ३ घ. ' नसाः सप्त । ४ घ. ब्रह्माण इति । ५ घ. निश्चिताः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 114

अग्नि पुराण, पृष्ठ 114 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् ११० अथाष्टादशोऽध्यायः स्वायम्भुवमनुवंशवर्णनम् अग्निरुवाच ' प्रियव्रतोत्तानपादौ मनोः स्वायम्भुवात् सुतौ । काम्या कर्दमकन्याऽतः सम्राट् कुक्षिर्विराट्प्रभुः । सुनीत्यां च ध्रुवः पुत्रस्तपस्तेपे सुकीर्तये । तस्मै प्रीतो हरिः प्रादान्मुन्यग्रे स्थानकं स्थिरन् । अहोऽस्य तपसो वीर्यमहो श्रुतमहोऽद्भुतम् । तस्माद् ' वृद्धिश्च भव्यश्च ध्रुवाच्छम्भुर्व्यजायत रिपुं रिपुञ्जयं पुष्यं वृकसं वृकतेजसम् अजीजनत्पुष्करिण्यां वीरिण्यां चाक्षुषो मनुम् ऊरु: " पूरुः १२ शतद्युम्नस्तपस्वी सत्यवाक्कविः अजीजनत् सुतां रम्यां शतरूपा तपोऽन्विता ॥१ ॥

सुरुच्यामुत्तमो जज्ञे पुत्र उत्तानपादतः ॥२ ॥

ध्रुवो वर्षसहस्राणि त्रीणि दिव्यानि हे मुने ॥ ३ ॥

श्लोकं पपाठ ह्युशना वृद्धिं दृष्ट्वा स तस्य च ॥४

॥ ॥

यमद्य पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः ॥ ५ ॥

। वृद्धेराधत्त सुच्छाया पञ्च पुत्रानकल्मषान् ॥६ ॥

॥ रिपोराधत्त बृहती चाक्षुषं सर्वतेजसम् ॥७ ॥

। ( ' मनोरजायन्त दश नड्वलायां सुतोत्तमाः ) । ८ ॥

। अग्निष्टुदतिरात्रश्च १३ सुद्युम्नश्चातिमन्युकः ॥ ९ ॥

अध्याय १८ स्वायम्भुव मनुवंश का वर्णन अग्नि बोले- स्वायम्भुव मनु ने तपस्विनी भार्या शतरूपा से प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र और एक सुन्दरी कन्या को उत्पन्न किया ॥१ ॥ वह सुन्दरी कन्या कर्दम ऋषि की पत्नी हुई, जिससे चक्रवर्ती सम्राट् कुक्षि

उत्पन्न हुए । सुरुचि नाम की भार्या से उत्तानपाद का पुत्र उत्तम उत्पन्न हुआ तथा सुनीति नाम की ( दूसरी भार्या से ) ध्रुव पैदा हुए । हे मुने! सुयश प्राप्त करने के लिए ध्रुव ने तीन हजार दिव्य वर्षों तक तपस्या की ॥२-३ ॥ उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर विष्णु ने ध्रुव को ( सप्तर्षि - मण्डल के ) ऋषियों के आगे एक स्थिर स्थान प्रदान कर दिया । ध्रुव के अभ्युदय को देखकर शुक्राचार्य ने ( उसकी प्रशंसा में ) यह श्लोक पढ़ा || ४ || “ अहो! इस ध्रुव की तपस्या में कितना बल है । इसका ज्ञान अद्भुत है जिसे आगे करके आज सप्तर्षि भी स्थित हैं ॥५ ॥ ध्रुव से वृद्धि, भव्य और शम्भु

नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए । सुच्छाया ने वृद्धि से पाँच पुण्यात्मा पुत्रों को प्राप्त किया ॥६ ॥ ( उन पुत्रों के नाम हैं- ) रिपु,

रिपुञ्जय, पुष्य, वृक और वृकतेजस । रिपु से बृहती ने अत्यन्त तेजस्वी चाक्षुष नामक पुत्र को उत्पन्न किया ॥७ ॥ चाक्षुष

ने वीरण की पुत्री पुष्करिणी से मनु को उत्पन्न किया । नड्वला से मनु को दस पुत्र उत्पन्न हुए ॥८ ॥ वे दस पुत्र थे-ऊरु, पुरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवाक्, कवि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र, सुद्युम्न और अतिमन्युक ॥९ ॥

१ अयमप्यध्यायः पूर्वाध्यायवद्बहुशो हरिवंशस्थश्लोकपाठसदृश एव । २ घ. कन्या ' । ३ घ. शतरुपां । ४ क. ख. घ. ' मभार्याऽतः । ५ क. घ. ' स्माच्छिष्टि च भव्यं च ध्रु ' । ६ क. ' त । घ. ' त । शिष्टेरा ' । ७ ख. ग. पुत्रं । घ. रिप्रं । च. पुष्पं । ८ ख. ग. घ. वृकलं । ९ करिण्यां । ग. वारुण्यां । च. वारिण्यां । १० मनोरजायन्त " सुतोत्तमाः क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । ११ च. उरूः । १२ च पुरुः । १३ क. ङ. रात्रिश्च । ख. ग. श्चाभिम । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 115

अग्नि पुराण, पृष्ठ 115 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अष्टादशोऽध्यायः १११ ऊरोरजनयत्पुत्रान्षडाग्नेयी महाप्रभान् । अङ्गात्सुनीथापत्यं वै वेणमेकं व्यजायत । प्रजार्थमृषयोऽथास्य ममन्थुर्दक्षिणं करम् । तं दृष्ट्वा मुनयः प्राहुरेष वै मुदिताः प्रजाः । स धन्वी कवची जातस्तेजसा निर्दहन्निव । राजसूयाभिषिक्तानामाद्यः स पृथिवीपतिः । तत्स्तोत्रं चक्रतुर्वीरौ, राजाऽभूज्ञ्जनरञ्जनात् सह देवैर्मुनिगणैर्गन्धर्वैश्चाप्सरोगणैः । तेषु तेषु च पात्रेषु दुह्यमाना वसुन्धरा । पृथोः पुत्रौ तु धर्मज्ञौ जज्ञातेऽन्तर्धिपालितौ हविर्धाना ( षडाग्नेयी * धिषणाजनयत्सुतान् प्राचीनाग्रा: " कुशास्तस्य पृथिव्यां यजतो यतः सवर्णाऽधत्त सामुद्री दश प्राचीनबर्हिषः अङ्गं सुमनसं स्वातिं क्रतुमङ्गिरसं गयम् ॥१० ॥

अरक्षकः पापरतः स हतो मुनिभिः कुशैः ॥११ ॥

वेणस्य मथिते पाणौ सम्बभूव पृथुर्नृपः ॥ १२ ॥

करिष्यति महातेजा यशश्च प्राप्स्यते महत् ॥१३ ॥

पृथुर्वेण्यः प्रजाः सर्वा ररक्ष क्षत्रपूर्वजः ॥१४ ॥

तस्माच्चैव समुत्पन्नौ निपुणौ सूतमागधौ ॥ १५ ॥

। दुग्धा गौस्तेन सस्यार्थ प्रजानां जीवनाय च ॥ १६ ॥

पितृभिर्दानवैः सर्वैर्वीरुद्भिः पर्वतैर्जनैः ॥१७ ॥

प्राद्याद्यथेप्सितं क्षीरं तेन प्राणानधारयन् ॥१८ ॥

। शिखण्डिनी हविर्धानमन्तर्धानाद् व्यजायत ॥१९ ॥

। प्राचीनबर्हिषं शुक्रं गयं कृष्णं व्रजाजिनौ ॥२० ॥

। प्राचीनबर्हिर्भगवा ) न्महानासीत्प्रजापतिः ॥२१ ॥

1 । सर्वे प्रचेतसी नाम धनुर्वेदस्य पारगाः ॥ २२ ॥

आग्नेयी ने ऊरु से छह महातेजस्वी पुत्रों को उत्पन्न किया, जिनके नाम थे - अंग, सुमनस, स्वाति, क्रतु, अंगिरा और गय ॥१० ॥ अंग से सुनीथा ने वेण नामक पुत्र प्राप्त किया, जो राजा होते हुए भी प्रजारक्षक न था और सदा पापकर्म

ही किया करता था । इसलिए मुनियों ने उसे कुशों से मार डाला || ११ || उन्होंने प्रजा की रक्षा के लिए उसके दाहिने हाथ को मथना प्रारम्भ किया । वेण का हाथ मथने पर उससे राजा पृथु उत्पन्न हुआ ॥१२ ॥ उसको देखकर ऋषियों

ने कहा– “ यह राजा अवश्य अपने न्यायाचरण से प्रजाओं को सुखी बनाकर महान् यश प्राप्त करेगा ” ॥१३ ॥ उसने

धनुष और कवच धारण किया । वह मानो तेज से दहक रहा था । क्षत्रियों के पूर्वज उस राजा पृथु ने अपने पिता वेण की सारी प्रजाओं की रक्षा की ॥१४ ॥ राजसूय यज्ञ करनेवाले राजाओं में वे सबसे पहले राजा थे । उस राजसूय से उत्पन्न

हुए, स्तुति करने में चतुर सूतों और मागधों ने उनकी स्तुति की ॥ १५ ॥ प्रजा का अनुरञ्जन करने के कारण वह ( यथार्थ

में ) राजा कहलाया । उसने प्रजा का पालन तथा अन्न उपजाने के लिए पृथ्वी का दोहन किया ॥१६ ॥ देवता, मुनिजन,

गन्धर्व, अप्सरा, पितृगण, दानव, सर्प, लता, पर्वत और मनुष्यों के सहयोग से दुही जानेवाली पृथ्वी से उन - उन पात्रों में यथेष्ट दूध दिया, जिससे सब प्राण धारण किये ॥१७-१८ ॥ पृथु के दो पुत्र हुए- अन्तर्धि और पालित । दोनों ही धर्मात्मा थे । अन्तर्धान अर्थात् अन्तर्धि से ( उसकी पत्नी ) शिखण्डिनी ने हविर्धान को उत्पन्न किया ॥१ ९ ॥ अग्नि की पुत्री धिषणा ने हविर्धान से इन छह पुत्रों को उत्पन्न किया - प्राचीनबर्हिष्, शुक्र, गय, कृष्ण, ब्रज और अजिन ॥२० ॥ भगवान् प्राचीनबर्हि महान् प्रजापति थे । क्योंकि यज्ञ करते समय वे पूरब की ओर नोक किये कुशों को

फैलाते थे, अतः उनका नाम प्राचीनबर्हिः पड़ गया था ॥ २१ ॥ प्राचीनबर्हि की सजातीया सामुद्री ने प्राचीनबर्हि से दस

प्रचेताओं को जन्म दिया, जो धनुर्वेद में पारंगत थे ॥ २२॥ वे एक प्रकार का ही धर्मपालन करते थे । उन्होंने दस हजार

१ घ. क्ष क्षेत्रपू । २ पुत्राविति शेषः । ३ क. ङ. च. सस्यानि । ४ त्षडाग्नेयी भगवान् ख. पुस्तके नास्ति । ५ क. ङ. च. ' गाः । सपृ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 116

अग्नि पुराण, पृष्ठ 116 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् ११२ अपृथग्धर्मचरणास्तेऽतप्यन्त महत्तपः । प्रजापतित्वं सम्प्राप्य तुष्टा विष्णोश्च निर्गताः । मुखजाग्निमरुद्भ्यां च दृष्ट्वा ' चाथ द्रुमक्षयम् । कोपं यच्छत दास्यन्ति कन्यां वो मारिषां वराम् । भविष्यं जानता सृष्टा भार्या वोऽस्तु कुलङ्करी । प्रचेतसस्तां जगृहुर्दक्षोऽस्यां च ततोऽभवत् । स सृष्ट्वा मनसा दक्षः ) पश्चादसृजत स्त्रियः । सप्तविंशति ( तिं ) सोमाय चतस्त्रोऽरिष्टनेमिने । तासु देवाश्च नागाद्या मैथुनान् मनसा पुरा विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यान्व्यजायत भानोस्तु भानवः पुत्रा मुहूर्तास्तु मुहूर्तजाः पृथिवीविषयं सर्वं मरुत्वत्यां व्यजायत आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः दश वर्षसहस्राणि समुद्रसलिलेशयाः ॥२३ ॥

भूः खं व्याप्तं हि तरुभिस्तांस्तरूनदहंश्च ते ॥२४ ॥

उपगम्याब्रवीदेतान् राजा सोमः प्रजापतीन् ॥२५ ॥

तपस्विनो मुनेः कण्डोः प्रम्लोचायां मयैव च ॥ २६ ॥

अस्यामुत्पत्स्यते दक्षः ( ' प्रजाः संवर्धयिष्यति ॥ २७ ॥

अचरांश्च चरांश्चैव द्विपदोऽथ चतुष्पदः ॥ २८ ॥

ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ॥ २ ९ ॥ द्वै चैव बहुपुत्राय द्वे चैवाङ्गिरसे ह्यदात् ॥ ३० ॥

। धर्मसर्गं प्रवक्ष्यामि दशपत्नीषु धर्मतः ॥ ३१ ॥

। मरुत्वत्या मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवोऽभवन् ॥ ३२ ॥

। लम्बाया धर्मतो घोषो नागवीथी च यामिजा ॥ ३३ ॥

। सङ्कल्पायास्तु सङ्कल्पा इन्दोर्नक्षत्रतः सुताः ॥३४ ॥

। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च ' वसवोऽष्टौ च नामतः ॥ ३५ ॥

वर्षों तक समुद्र - जल में रहकर घोर तपस्या की || २३ || फलस्वरूप भगवान् विष्णु से प्रजापतित्व का वरदान पाकर सन्तुष्ट होकर जल से बाहर निकले । उस समय प्रायः समस्त भूमण्डल और आकाश वृक्षों से व्याप्त थे । प्रचेताओं ने उन वृक्षों को जला दिया । इस प्रकार वनस्पतियों का विनाश होता हुआ देखकर महाराज सोम ने उन प्रजापति प्रचेताओं के पास जाकर कहा ॥२४-२५ ॥ आप लोग अपने क्रोध को शान्त करें । ये वृक्ष आप लोगों को मारिषा नाम की श्रेष्ठ कन्या देंगे । इस कन्या को तपस्वी मुनि काण्डु से प्रम्लोचा नाम की अप्सरा में मैंने ही भविष्य को जानते हुए उत्पन्न किया । वह आपके कुल को बढ़ानेवाली भार्या होगी । इसके गर्भ से दक्ष उत्पन्न होंगे जिनके द्वारा प्रजा की वृद्धि होगी ॥२६-२७ ॥ प्रचेताओं ने उस कन्या का पाणिग्रहण किया । उस ( मारिषा ) के गर्भ से दक्ष उत्पन्न हुए । दक्ष ने पहले चराचर, द्विपदों और चतुष्पदों की मन से सृष्टि की । इसके बाद उन्होंने स्त्रियों को उत्पन्न किया । उन स्त्रियों में से दस स्त्रियाँ धर्म को, तेरह कश्यप को दी गयीं ॥२८-२९ ॥ सत्ताईस स्त्रियाँ चन्द्रमा को, चार अरिष्टनेमि को, दो बहुपुत्र को और दो अङ्गिरा को दीं ॥३० ॥

पूर्वकाल में संकल्प - मात्र से मानसिक सृष्टि होती थी । बाद में उन दक्ष कन्याओं में मैथुन द्वारा देवता और नाग उत्पन्न हुए । अब मैं धर्म की दस पत्नियों से उत्पन्न होनेवाली धर्म की सृष्टि का वर्णन करूँगा ॥ ३१ ॥ विश्वा से वे विश्वेदेव,

साध्या से साध्यगण, मरुत्वती से मरुत्वान् लोग तथा वसु से वसुगण उत्पन्न हुए ॥३२ ॥ भानु से भानु पुत्र रूप में उत्पन्न

हुए, मुहूर्ता से मुहूर्त, धर्म के द्वारा लम्बा से घोष और नागवीथी से यामिज नामक पुत्र उत्पन्न हुए ॥३३ ॥ मरुत्वती के

गर्भ पृथिवी से सम्बद्ध सभी प्राणी उत्पन्न हुए । संकल्पा से संकल्प उत्पन्न हुए । चन्द्रमा ने अपनी नक्षत्ररूपिणी पत्नियों से इन पुत्रों को उत्पन्न किया ॥३४ ॥ आप, ध्रुव, सोम, घर, अनिल, अनल, प्रत्यूष, प्रभास और आठ वसुगण ॥ ३५ ॥

१ च. ° ष्ट्वाऽनाथ । २ क. ङ. च. कण्ड्वोः । ३ प्रजाः दक्षः च. पुस्तके नास्ति । ४ ख. ग. घ. च. अदात । ५ खःनान्मानसाः पु ' । ६ च. भूमिजा । ७ घ. सर्वमरुन्धत्यां । ८ घ. प्रभाषश्च । च. प्रभावश्च । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 117

अग्नि पुराण, पृष्ठ 117 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अष्टादशोऽध्यायः सापस्य पुत्रो वैतण्ड्यः श्रमः शान्तो मुनिस्तथा । धरस्य पुत्रो द्रविणो हुतहव्यवहस्तथा । पुरोजवोऽनिलस्यासीदविज्ञातोऽनलस्य च । तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठतः । प्रत्यूषाद्देवलो जज्ञे विश्वकर्मा प्रभासतः । मनुष्याश्चोपजीवन्ति शिल्पं वै भूषणादिकम् । महादेवप्रसादेन तपसा भाविता सती । त्वष्टुश्चैवात्मजः ' श्रीमान् विश्वरूपो महायशाः । वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा । रुद्राणां च शतं लक्षं यैर्व्याप्तं सचराचरम् ११३ ध्रुवस्य कालो लोकान्तो वर्चाः सोमस्य वै सुतः ॥ ३६ ॥

मनोहरायाः शिशिरः प्राणोऽथ ' रमणस्तथा ॥३७ ॥

अग्निपुत्रः कुमारश्च शरस्तम्बे व्यजायत ॥ ३८ ॥

कृत्तिकातः कार्तिकेयो यतिः सनत्कुमारकः ॥ ३ ९ ॥ कर्त्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वर्धकिः ॥४० ॥

सुरभी कश्यपाद्रुद्रानेकादश विजनुषी ॥ ४१ ॥

अजैकपादहिर्बुध्न्यस्त्वष्टा रुद्रश्च सत्तम ॥४२ ॥

हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः ॥४३ ॥

मृगव्याधश्च सर्पश्च कपाली दश चैककः ॥ ४४ ॥

॥४५ ॥

इत्यादि महापुराण आग्नेये स्वायम्भुवमनुवंशवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८ ॥

आप के पुत्र वैतण्ड्य, श्रम, शान्त और मुनि हुए, ध्रुव के काल और लोकान्त, और सोम के वर्चा पुत्र हुए ॥ ३६ ॥ मनोहरा

के गर्भ से घर के पुत्र द्रविण, हुतहव्यवह, शिशिर, प्राण और रमण हुए || ३७ || अनिल के पुत्र पुरोजव और अनल ( अग्नि ) के पुत्र अविज्ञात हुए । अग्नि के पुत्र कुमार शरस्तम्ब ( सरपत ) से पैदा हुए || ३८ || बाद को अग्नि के तीन और पुत्र उत्पन्न हुए - शाख, विशाख और नैगमेय । कृत्तिका से कार्तिकेय और यति सनत्कुमार उत्पन्न हुए ॥ ३ ९ ॥ प्रत्यूष से देवल और प्रभास से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए, जो सहस्रों प्रकार के शिल्पों के आचार्य और देवताओं के बढ़ई हैं ॥ ४० ॥

उन्हीं के आविष्कार किये हुए शिल्प और आभूषण - निर्माण - कला को अपनाकर मनुष्य अपनी जीविका चलाते हैं । कश्यप से सुरभी ने ग्यारह रुद्रों को उत्पन्न किया ॥४१ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! महादेव जी की कृपा से युक्त होकर सती ने इन चार

पुत्रों को उत्पन्न किया - अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, त्वष्टा और रुद्र ॥४२ ॥ त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप हुए, जो श्रीसम्पन्न तथा

महान् यशस्वी थे । ( ग्यारह ) रुद्र ये हैं - हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, सर्प और कपाली । ऐसे तो सैकड़ों - लाखों रुद्र हैं जिनसे यह चराचरात्मक ( सम्पूर्ण ) जगत् व्याप्त है ॥४३-४५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में स्वायम्भुव मनुवंश वर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१८ ॥

१ क. ग. ङ. ' थ मरणस्त । २ घ. प्रभापतः । ३ ङ. वर्धकः । ४ ख. ग. ' वानुजः । ८ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 118

अग्नि पुराण, पृष्ठ 118 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् ११४ अथैकोनविंशोऽध्यायः कश्यपवंशवर्णनम् अग्निरुवाच बदे सर्गमदित्यादिषु हे मुने । चाक्षुषे तुषिता देवास्तेऽदित्यां कश्यपात्पुनः ॥ १ ॥

कश्यपस्य त्वष्टा धाता तथार्यमा । पूषा ' विवस्वान् सविता मित्रोऽथ वरुणो भगः ॥२ ॥

आसन् विष्णुश्च शक्रश्च

द्वादशादित्या आसन् वैवस्वतेऽन्तरे । अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ॥३ ॥

अंशुश्च विदुषश्चतस्त्रः विद्युतः स्मृता । प्रत्यङ्गिरसजाः श्रेष्ठाः कृशाश्वस्य सुरायुधाः || ४ || बहुपुत्रस्य उदयास्तमने सूर्ये तद्वदेते युगे युगे । हिरण्यकशिपुर्दित्यां हिरण्याक्षश्च कश्यपात् ॥५ ॥

सिंहिका चाभवत्कन्या विप्रचित्तेः परिग्रहः । राहुप्रभृतयस्तस्यां सैंहिकेया इति श्रुताः ५ ॥ ६ ॥

हिरण्यकशिपोः पुत्राश्चत्वारः प्रथितौजसः । अनुह्लादश्च ह्रादश्च प्रह्लादश्चातिवैष्णवः ॥७ ॥

संह्रादश्च चतुर्थोऽभूद् ह्रादपुत्रो ह्रदस्तथा । संह्रादपुत्र आयुष्माञ्शिविर्बाष्कल एव च ॥ ८ ॥

( विरोचनस्तु प्राह्रादिर्बलिर्जज्ञे विरोचनात् ) । बलेः पुत्रशतं त्वासीद् ' बाणज्येष्ठं महामुने ॥९ ॥

अध्याय १ ९ कश्यपवंश का वर्णन अग्नि बोले- हे मुने! अब मैं कश्यप की अदिति आदि पत्नियों से उत्पन्न सृष्टि के बारे में कहूँगा । चाक्षुष मन्वन्तर में तुषित नामक देवता थे, जो अदिति से कश्यप के पुत्र थे । वे ही इस वैवस्वत मन्वन्तर में बारह आदित्य हुए - विष्णु, शक्र ( इन्द्र ), त्वष्टा, धाता, अर्यमा, पूषा, विवस्वान्, सविता, मित्र, वरुण, भग और अंशु । अरिष्टनेमि की पत्नियों से सोलह सन्तानें उत्पन्न हुईं ॥१-३ ॥ विद्वान् बहुपुत्र की चार पुत्रियाँ थीं - चारों बिजलियाँ । अङ्गिरा मुनि से श्रेष्ठ ऋचाएँ उत्पन्न हुईं और कृशाश्व ऋषि से दिव्य आयुध उत्पन्न हुए ॥४ ॥ जिस प्रकार आकाश में सूर्य का उदय और अस्त होता

रहता है उसी प्रकार युग - युग में ये देवता उत्पन्न और विनष्ट होते रहते हैं । दिति से कश्यप के दो पुत्र हुए- हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष तथा एक कन्या भी हुई जिसका नाम था सिंहिका । सिंहिका विप्रचित्ति की पत्नी हुई । उस सिंहिका से उत्पन्न राहु आदि सैंहिकेय कहे जाते हैं ॥५-६ ॥ हिरण्यकशिपु के चार ओजस्वी पुत्र हुए- अनुहाद, हाद और परमवैष्णव प्रह्लाद - उसका चौथा पुत्र था संहाद । हाद का पुत्र था ह्रद । संहाद के तीन पुत्र थे - आयुष्मान्, शिवि और बाष्कल ॥।७-८ ॥ प्रह्लाद का पुत्र विरोचन और विरोचन का पुत्र बलि था । हे मुनिश्रेष्ठ! बलि के सौ पुत्र थे जिनमें बाण सबसे ज्येष्ठ थे ॥९ ॥

१ क, ङ. च. वृषा । २ घ सुताः । ३ द्र. कल्याण - हरिवंश ३-६५ - प्रत्यङ्गिरसजाः श्रेष्ठा ऋचो ब्रह्मर्षिसात्कृताः । कुशाश्वस्य तु राजर्षेर्देव - प्रहरणानि च ॥ ४. द्रष्टव्य हरिवंश - ' एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि । सर्वदेवगणास्तात त्रयस्त्रिंशत्तु कामजाः ॥३.६६ तथा मत्स्यपुराण १६-७ ॥ ५ क. ङ. च. स्मृताः । ६ क. ङ. च. हृदस्य पुत्र । ' ७ विरोचनस्तु विरोचनात् । ८ ख. ग. घ. ' प्रणश्रेष्ठं । क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 119

अग्नि पुराण, पृष्ठ 119 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकोनविंशोऽध्यायः ११५ पुराकल्पे हि ' बाणेन प्रसाद्योमापतिं प्रभुम् । हिरण्याक्षसुताः पञ्च शम्बरः शकुनिस्त्विति । स्वर्भानोः सुप्रभा कन्या पुलोम्नस्तु शची स्मृता । पुलोमा कालका चैव वैश्वानरसुते उभे । प्रह्लादस्य चतुष्कोट्यो निवातकवचाः कुले । राधिका च शुचिग्रवा ताभ्यः काकादयोऽभवन् । बिनतायाः सहस्त्रं तु सर्पाश्च सुरसाभवाः दंष्ट्रिणः क्रोधवशगा धरायाः पक्षिणो जले । खसायां यक्षरक्षांसि मुनेरप्सरसोऽभवन् । एषां पुत्रादयोऽसङ्ख्या देवैर्वै दानवा जिताः पुत्रमिन्द्रप्रहर्तारमिच्छती प्राप कश्यपात्

छिद्रमन्विष्य चेन्द्रस्तु ते देवा मरुतोऽभवन् ।

पार्श्वतो विहरिष्यामि इत्येवं प्राप्त ईश्वरात् ॥१० ॥

द्विमूर्धा ' शङ्कुरार्यश्च शतमासन्दनोः सुताः ॥ ११ ॥

उपदानवी हयशिरा शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥१२ ॥

कश्यपस्य तु भार्ये द्वे तयोः पुत्राश्च कोटयः ॥१३ ॥

ताम्रयाः षट्सुताः स्युश्च काकी श्येनी च भास्यपि ॥१४ ॥

अश्वाश्चोष्ट्राश्च ताम्राया अरुणो गरुडस्तथा ॥ १५ ॥

। काद्रवेयाः सहस्त्रं तु शेषवासुकितक्षकाः ॥१६ ॥

सुरभ्यां गोमहिष्यादि इरोत्पन्नास्तृणादयः ॥१७ ॥

अरिष्टायास्तु गन्धर्वाः कश्यपाद्धिः स्थिरं चरम् ॥१८ ॥

। दितिर्विनष्टपुत्रा वै तोषयामास कश्यपम् ॥१९ ॥

। पादाप्रक्षालनात्सुप्ता तस्या गर्भ जघान ह ॥ २० ॥

शक्रस्यैकोनपञ्चाशत्सहाया दीप्ततेजसः ॥२१ ॥

पूर्वकल्प में बाण ने उमापति भगवान् शंकर को ( अपनी तपस्या से ) प्रसन्न करके यह वर प्राप्त कर लिया था कि " मैं आपके पास ही विचरण करता रहूँगा ॥ " ॥१० ॥ हिरण्याक्ष के पाँच पुत्र थे- शम्बर, शकुनि, द्विमूर्धा, शङ्कु और आर्य ।

दनु के सौ पुत्र थे ॥ ११ ॥ स्वर्भानु की कन्या थी सुप्रभा और पुलोमा की कन्या थी शची । वृषपर्वा की तीन कन्याएँ थीं-उपदानवी, हयशिरा और शर्मिष्ठा ॥१२ ॥ वैश्वानर की पुलोमा और कालका नाम की दो कन्याएँ थीं जो कश्यप की

दो पत्नियाँ हुईं । इन दोनों के करोड़ों पुत्र हुए ॥ १३ ॥ प्रह्लाद के कुल में चार करोड़ असुर थे जो निवात कवच कहलाये ।

ताम्रा की छह पुत्रियाँ हुईं - काकी, श्येनी, भासी, गृध्रिका, शुचि और ग्रीवा । इन्हीं से कौए आदि उत्पन्न हुए ॥१४-१४३ ॥ ताम्रा से घोड़े और ऊँट पैदा हुए । विनता से अरुण और गरुड़ । सुरसा से हजारों दाँतोंवाले और क्रोधी साँप उत्पन्न हुए । कद्रू से हजारों शेष, वासुकि और तक्षक नाग उत्पन्न हुए । धरा के गर्भ से जल में रहनेवाले पक्षी उत्पन्न हुए । सुरभि से गाय और भैंस आदि तथा इरा से तृण उत्पन्न हुए ॥१५-१७ ॥ खसा से यक्ष और राक्षस उत्पन्न हुए । मुनि नामक पत्नी से अप्सराएँ उत्पन्न हुईं । अरिष्टा से गन्धर्व उत्पन्न हुए । इस प्रकार कश्यप से स्थावर और जंगम जगत् की सृष्टि हुई ॥ १८ ॥

कश्यप की इन सन्तानों से असंख्य सन्ततियाँ उत्पन्न हुईं । ( कुछ काल बाद ) देवताओं ने दानवों को हरा दिया । पुत्रों के नष्ट हो जाने से दिति ने ( अपनी सेवा से ) कश्यप जी को सन्तुष्ट किया ॥ १ ९ ॥ इन्द्र को मारनेवाले पुत्र की इच्छा करती हुई दिति ने कश्यप से ( अभिमत वर ) प्राप्त किया । एक दिन दिति पैरों को धोये बिना ही सो गयी । इन्द्र ने दोष पाकर उसके गर्भ को काट डाला । वह कटा हुआ गर्भ ही मरुत् देवों के रूप में उत्पन्न हुआ । वे तेजस्वी उनचास मरुत् इन्द्र की सहायता करनेवाले हुए ॥२०-२१ ॥ ब्रह्मा और विष्णु ने इस सम्पूर्ण संसार ( के राज्य ) में पृथु का राज्याभिषेक १ क. ङ. च. हिरण्येन । २ घ. वरः । ३ क. ङ. च. ' कुनिः स्रुतिः । द्वि । ४ ख. शम्बराद्याश्च । ५ क. च. घरोत्थाः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 120

अग्नि पुराण, पृष्ठ 120 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् ११६

हरिर्ब्रह्मा अभिषिच्य पृथुं नृपम् । ददौ क्रमेण राज्यानि अन्येषामधिपो हरिः ॥ २२ ॥

एतत्सर्वं द्विजौषधीनां चन्द्रस्तु अपां तु वरुणो नृपः । राज्ञां वैश्रवणो राजा सूर्याणां विष्णुरीश्वरः ॥ २३ ॥

वसूनां पावको राजा मरुतां वासवः प्रभुः । प्रजापतीनां दक्षोऽथ प्रह्लादो दानवाधिपः ॥ २४ ॥

पितॄणां च यमो राजा भूतादीनां हरः प्रभुः । हिमवांश्चैव शैलानां नदीनां सागरः प्रभुः ॥ २५ ॥

गन्धर्वाणां चित्ररथो नागानामथ वासुकिः । सर्पाणां तक्षको राजा गरुडः पक्षिणामथ ॥ २६ ॥

ऐरावतो गजेन्द्राणां गोवृषोऽथ गवामपि । मृगाणामथ शार्दूलः प्लक्षो वनस्पतीश्वरः ॥ २७ ॥

उच्चैःश्रवास्तथाश्वानां सुधन्वा पूर्वपालकः । दक्षिणस्यां शङ्खपदः केतुमान् पालको जले || २८ || हिरण्यरोमकः सौम्ये प्रतिसर्गोऽयमीरितः ॥२९ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये प्रतिसर्गे कश्यपवंशवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः जगत्सर्गवर्णनम् अग्निरुवाच प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणस्तु सः । तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गो हि स स्मृतः ॥१ ॥

कर दिया । भगवान् विष्णु ने अन्य राज्यों को भी क्रमशः बाँट दिया ॥ २२ ॥ ब्राह्मणों और ओषधियों के राजा चन्द्रमा

हुए । जल के स्वामी वरुण हुए । राजाओं के ( भी ) राजा कुबेर हुए और भगवान् विष्णु द्वादश सूर्यों के स्वामी हो गये ॥२३ ॥ वसुओं के राजा अग्नि और मरुतों के स्वामी वासव हो गये । प्रजापतियों के स्वामी दक्ष तथा दानवों

के अधिपति प्रह्लाद हुए || २४ || पितरों के राजा यम और भूतों के अधिपति शङ्कर हुए । हिमालय शैलाधिराज हो गया और नदियों का स्वामी सागर हुआ ॥ २५ ॥ गन्धर्वों के स्वामी चित्ररथ और नागों के स्वामी वासुकि हुए । सर्पों

के तक्षक और पक्षियों के स्वामी गरुड़ बने ॥२६ ॥ हाथियों के अधिनायक ऐरावत और गौवों के राजा गोवृष हुए

तथा मृगों के शार्दूल और वनस्पतियों का स्वामी पाकड़ हुआ ॥ २७ ॥ अश्वों का स्वामी उच्चैःश्रवा हुआ । पूर्व का

स्वामी सुधन्वा तथा दक्षिण का शंखपद स्वामी बना । जल का रक्षक केतुमान् हुआ ॥२८ ॥ उत्तर दिशा का रक्षक

हिरण्यरोमक हुआ । यह प्रतिसर्ग का वर्णन किया गया ॥२९ ॥

श्री अग्निमहापुराण में कश्यपवंशवर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ १ ९ ॥ अध्याय २० जगत्सर्ग वर्णन अग्नि बोले- ( प्रकृति से ) महत्तत्त्व की सृष्टि हुई, इसे ब्रह्मा की सृष्टि समझनी चाहिए । दूसरी सृष्टि तन्मात्राओं की है, इसे भूतसर्ग कहा जाता है ॥१ ॥ तीसरा वैकारिक ( सात्त्विक ) सर्ग है जिसे ऐन्द्रियक सर्ग कहते हैं । यह प्रकृति

१ अत्र किञ्चित् त्रुटितमिवाभाति । २ क. ङ. च. ' तानां च ह । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA