अग्नि पुराण — पृष्ठ 141–150
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 141–150
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षड्विंशोऽध्यायः १३७ अथ षड्विंशोऽध्यायः मुद्रालक्षणानि नारद उवाच मुद्राणां लक्षणं वक्ष्ये सान्निध्यादिप्रकारकम् । अञ्जलिः ' प्रथमा मुद्रा वन्दनी हृदयानुगा ॥१ ॥
वाममुष्टिदक्षिणाङ्गुष्ठबन्धनः । सव्यस्य तस्य चाञ्गुष्ठो यस्य चोर्ध्व ' प्रकीर्तितः ॥२ ॥
तिस्रः साधारणा व्यूहे अथासाधारणा इमाः । कनिष्ठादिविमोकेन अष्टौ मुद्रा यथाक्रमम् ॥३ ॥
( अष्टानां पूर्वबीजानां क्रमशस्त्ववधारयेत् ) । अङ्गुष्ठेन कनिष्ठान्तं नामयित्वाङ्गुलित्रयम् ॥४ ॥
ऊर्ध्वं कृत्वा सम्मुखं च बीजाय नवमाय वै । वामहस्तमथोत्तानं कृत्वोर्ध्वं नामयेच्छनैः ॥५ ॥
अध्याय २६ मुद्रा के लक्षण नारद जी बोले - हे मुनियो! अब मैं मुद्राओं का लक्षण कहूँगा । सान्निध्य आदि, मुद्राओं के भेद हैं । पहली मुद्रा अञ्जलि है, दूसरी वन्दनी है तथा तीसरी हृदयानुगा है ॥१ ॥ दोनों हाथों के अँगूठे ऊपर की ओर उठे रहें
तथा बायें हाथ की मुट्ठी से दाहिने हाथ के अँगूठे को बाँध लें और बायें हाथ के अँगूठे को ( दायें हाथ के अँगूठे के साथ ) ऊपर की ओर उठाये ही रहें तो यह हृदयानुगा मुद्रा है । ( इसी मुद्रा को अन्य ग्रन्थों में संरोधिनी या निष्ठुरा नाम दिया गया है ) । ( उपर्युक्त ) तीन साधारण मुद्राएँ हैं । अब आगे ये असाधारण- ( -विशेष- ) मुद्राएँ कही जा रही हैं । ( दोनों हाथों की अँगुलियों को नवाने के बाद ) कनिष्ठा आदि अँगुलियों को क्रम से मुक्त करने से आठ मुद्राएँ बनती हैं ॥ २ - ३ || ' अ क च ट त प य श ' - इन आठ वर्गों के पूर्व बीज ‘ अं कं चं टं ’ आदि को क्रम से सूचित करनेवाली पूर्वोक्त आठ मुद्राएँ हैं - ऐसा निश्चय करना च पर उठाकर सम्मुख करने से जो नवीं मुद्रा बनती है, वह नवम बीज ' क्षं ' के लिए है । बायें हाथ को ( दाहिने हाथ के ऊपर उत्तान करके १ ( क ) ' आदि ' पद से अन्य ग्रन्थों में वर्णित ' आवाहनी ' आदि मुद्राओं को समझना चाहिए । ( ख ) दोनों हाथों के अँगूठों को ऊपर करके फिर मुट्ठी बाँधकर दोनों मुट्ठियों को परस्पर सटाकर नमस्कार करने को सान्निध्य या सन्निधारिनी मुद्रा कहते हैं । २ अञ्जलि ही अञ्जलिमुद्रा है- ' अञ्जल्यञ्जलिमुद्रा स्यात् - मन्त्रमहार्णव । ३ वन्दनी - हाथ जोड़कर नमस्कार करना वन्दनी मुद्रा है-" वद्ध्वाञ्जलिं पङ्कजकोशकल्पं यद्दक्षिणज्येष्ठिकया तु वामाम् । ज्येष्ठां समक्रम्य तु वन्दनीयं मुद्रा नमस्कारविधौ प्रयोज्या ॥ " - ईशानशिवगुरुदेवपद्धति ४ क. ङ. च. ॰न्धनम् । सन्यस्य । ५ घ. चोर्थ्ये । ६ म. ङ. प्रकीर्तितम् । ७ अष्टानां " अवधारयेत् क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । ८ घ. कृत्वाऽर्व । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१३८ अग्निपुराणम् वराहस्य स्मृता मुद्रा अङ्गानां च क्रमादिमाः । एकैकां मोचयेन्मुद्रां वाममुष्टौ तथाङ्गुलीम् ॥६ ॥
आकुञ्चयेत्पूर्वमुक्तां ' दक्षिणेऽप्येवमेव च । ऊर्ध्वाङ्गुष्ठो वाममुष्टिर्मुद्रासिद्धिस्ततो भवेत् ॥ ७ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये मुद्रालक्षणवर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
अथ सप्तविंशोऽध्यायः शिष्येभ्यो दीक्षादानविधिः नारद उवाच वक्ष्ये दीक्षां सर्वदा च मण्डलेऽब्जे हरिं यजेत् । दशम्यामुपसंहृत्य ' यागद्रव्यं समस्तकम् ॥१ ॥
विन्यस्य नारसिंहेन सम्मन्त्र्य शतवारकम् । सर्षपांस्तु फडन्तेन रक्षोघ्नान्सर्वतः क्षिपेत् ॥२ ॥
शक्तिं सर्वात्मिकां तत्र न्यसेत्प्रासादरूपिणीम् । सर्वौषधीः समाहृत्य विकिरानभिमन्त्रयेत् || ३ || शतवारं शुभे पात्रे वासुदेवेन साधकः । संसाध्य पञ्चगव्यं तु पञ्चभिर्मूलमूर्तिभिः ॥४ ॥
धीरे - धीरे नीचे की ओर झुकना चाहिए । इसको वराह की मुद्रा माना गया है । ये क्रम से अंगों की मुद्राएँ हैं । बायीं मुट्ठी में बँधी हुई एक - एक अँगुली को क्रम से मुक्त करना चाहिए ( और ) पहले से मुक्त हुई अँगुली को फिर सिकोड़ लेना चाहिए । इसी तरह से दाहिने हाथ में भी करना चाहिए । बायें हाथ के अँगूठे को ऊपर की ओर उठाये रखना चाहिए । ऐसा करने से मुद्रा सिद्ध होती है ॥४-७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में मुद्रालक्षणवर्णन नामक छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२६ ॥
अध्याय २७ शिष्यों के लिए दीक्षा दान - विधि नारद बोले - अब मैं कुछ देनेवाली दीक्षा का वर्णन करूँगा । कमलाकार मण्डल में भगवान् श्रीहरि का यजन करना चाहिए । दशमी तिथि को यज्ञसंबंधी सारी वस्तुओं का संग्रह करके रख लेना चाहिए । फिर नरसिंह बीज-मन्त्र ' क्षौँ ' से उनको सौ बार अभिमन्त्रित करना चाहिए । इस मन्त्र के अन्त में ' फट् ' लगाकर ( बोलते हुए ) राक्षसों का नाश करनेवाले सरसों को सब ओर छींटना चाहिए ॥१-२ ॥ तदनन्तर वहाँ सर्वस्वरूपवाली प्रासादरूपिणी शक्ति का न्यास करना चाहिए । सभी ओषधियों को इकट्ठा करके बिखेरने के काम में आनेवाली सरसों आदि वस्तुओं को पवित्र पात्र में रखकर साधक को वासुदेव- -मन्त्र से उनको सौ बार अभिमन्त्रित करना चाहिए । तदनन्तर से लेकर नारायणपर्यन्त पूर्वोक्त पाँच मूर्तियों ( वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और नारायण वासुदेव से पञ्चगव्य तैयार करना चाहिए । फिर कुशाग्र से पञ्चगव्य पर जल छिड़ककर ) के मूलमन्त्रों उस भूमि का प्रोक्षण करना चाहिए । १ घ. मुद्रां ' द । २ ख. ग. संस्कृत्य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तविंशोऽध्यायः १३ ९ नारायणान्तैः सम्प्रोक्ष्य कुशाग्रैस्तेन तां भुवम् । त्रिधा पूर्वामुखस्तिष्ठन् ध्यायन् विष्णुं तदा हृदि । शतवारं मन्त्रयित्वा त्वस्त्रेणैव च वर्धनीम् । कलशं पृष्ठतो नीत्वा स्थापयेद्विकिरोपरि सवस्त्रे ' पञ्चरत्नाढ्ये स्थण्डिले पूजयेद्धरिम् प्रक्षाल्य पुण्डरीकेण विलिप्यान्तः सुगन्धिना आबोड्य वासुदेवेन ततः सङ्कर्षणेन च । प्रद्युम्नेन समालोड्य दर्व्या सङ्घट्टयेच्छनैः । प्रक्षाल्यालिप्य तत्कुर्यादूर्ध्वपुण्ड्रं तु भस्मना । भागमेकं तु देवाय कलशाय द्वितीयकम् शिष्यैः सह चतुर्थं तु गुरुरद्याद्विशुद्धये । ( ` दन्तकाष्ठं भक्षयित्वा त्यक्त्वा ज्ञात्वा ' स्वपातकम् ) विकिरान्वासुदेवेन क्षिपेत्तानपाणिना ॥५ ॥
वर्धन्या सहिते कुम्भे साङ्गं विष्णुं प्रपूजयेत् ॥६ ॥
अच्छिन्नधारया सिञ्चन्नैशान्यन्तं ' नयेच्च ताम् ॥७ ॥
। संहृत्य विकिरान्दर्भैः कुम्भेशं कर्करीं यजेत् ॥८ ॥
। अग्नावपि समभ्यर्च्य मन्त्रैः सन्तर्प्य पूर्ववत् ॥ ९ ॥
। उखामाज्येन सम्पूर्य गोक्षीरेण तु साधकः ॥ १० ॥
तण्डुलानाज्यसंसृष्टान् क्षिपेत् क्षीरे सुसंस्कृते ॥ ११ ॥
पक्वमुत्तारयेत्पश्चादनिरुद्धेन देशिकः ॥ १२ ॥
हारायणेन पार्श्वेषु चरुमेवं सुसंस्कृतम् ॥१३ ॥
। तृतीयेन तु भागेन प्रदद्यादाहुतित्रयम् ॥१४ ॥
नारायणेन सम्मन्त्र्य सप्तधा क्षीरवृक्षजम् ॥ १५ ॥
। ऐन्द्राग्न्युत्तरकैशानीमुखः स्नातो ह्यनुत्तमम् ॥१६ ॥
फिर हाथ उत्तान करके वासुदेव - मन्त्र से बिखेरी जानेवाली वस्तुओं को बिखेरना चाहिए ॥३-५ ॥ इसके बाद पूरब की ओर मुँह करके तीन बार हृदय में भगवान् विष्णु का ध्यान करते हुए वर्धनीयुक्त कलश पर पार्षद - सहित भगवान् विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए || ६ || सौ बार अस्त्र - मन्त्र पढ़कर वर्धनी को जल की अविच्छिन्न धार से सींचे और ईशानकोण में स्थापित करे || ७ || कलश को पीछे की ओर ले जाकर विकिरों के ऊपर स्थापित कर दे । कुशा से विकिरों को इकट्ठा करके कुम्भेश और कर्करी की पूजा करनी चाहिए ॥८ ॥ वस्त्र और पञ्चरत्नों से भूषित भूमि पर विष्णु का पूजन
करके अग्नि में भी पूर्ववत् मन्त्रों द्वारा अर्चना करनी चाहिए ॥९ ॥
पुण्डरीक मन्त्र- " ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
( इस मन्त्र ) से बटलोई को धोकर उसको भीतर से सुगन्धयुक्त घी से पोंछ देना चाहिए । इसके बाद साधक उसमें गाय का दूध भरकर वासुदेव - मन्त्र से उसको आलोडित ( कलछुली से चलाना चाहिए ) करके इसके बाद संकर्षण - मन्त्र पढ़कर उसमें घी मिले हुए चावल को छोड़ देना चाहिए ॥ १०-११ ॥ प्रद्युम्न - मन्त्र पढ़कर कलछुली से उसका आलोडन करके उसको धीरे-धीरे चलाना चाहिए । खीर के पक जाने पर आचार्य अनिरुद्ध - मन्त्र पढ़कर उसे ( आग से नीचे ) उतार दे ॥ १२॥ उस पर जल
छिड़क करके घी से लेप करना चाहिए । फिर नारायण - मन्त्र से ( ललाट एवं ) पार्श्व - भागों में भस्म से ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाना चाहिए । इस प्रकार से सुसंस्कृत चरु का ( चार भाग करना चाहिए ) || १३ || चरु के एक भाग को देवताओं को अर्पित करे । दूसरा भाग कलश में छोड़ दे । तीसरे भाग की तीन आहुतियाँ ( अग्नि में ) छोड़े ॥ १४ ॥ चरु के चौथे भाग को शिष्यों के साथ गुरु को आत्मशुद्धि
के लिए रखना चाहिए । ( दूसरे ) दिन एकादशी तिथि को प्रात: काल सात बार नारायण - मन्त्र से अभिमन्त्रित करके दूधवाले वृक्ष के दातून करके उसे फेंक दे । अपने पापों का स्मरण करते हुए पूर्व, अग्निकोण, उत्तर या ईशानकोण की ओर मुँह करके स्नान करना १ ख. घ. ‘ ञ्चन्नीशानान्तं । २ ख. घ. च. सवस्त्रं पञ्चरत्नाढ्यं । ३ घ. मन्त्रान् सञ्जप्य पू । ४ क. ख. घ. च. आलोक्य । ५ दन्तकाष्ठं " स्वपातकम् क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । ६ ख. ग. ज्ञात्वोप पा ' । ७ ख. ग. घ. ङ. च. मुखं पतितमुत्त ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१४० शुभं सिद्धमिति ज्ञात्वाचम्य प्राणान्नियम्य च । संसारार्णवमग्नानां पशूनां पाशमुक्तये देवदेवानुजानीहि प्राकृतैः पाशबन्धनैः इति विज्ञाप्य देवेशं सम्प्रविश्य पशूंस्ततः संस्कृत्य, मूर्त्या संयोज्य नेत्रे बद्ध्वा प्रदर्शयेत् अमन्त्रमर्चनं तत्र पूर्ववत्कारयेत् क्रमात् शिखान्तसम्मितं सूत्रं पादाङ्गुष्ठादि षड्गुणम् यस्यां संलीयते विश्वं यतो विश्वं प्रसूयते तेन प्रकृतिकान् पाशान् ग्रथित्वा तत्त्वसङ्ख्यया ततस्तत्त्वानि सर्वाणि ध्यात्वा शिष्यतनौ न्यसेत् त्रेधा वा पञ्चधा वा स्याद् दशद्वादशधापि च अङ्गैः पञ्चभिरस्त्रान्तं निखिलं प्रकृतिक्रमात् प्रकृतिर्लिङ्गशक्तिश्च कर्ता बुद्धिस्तथा मनः अग्निपुराणम् पूजागारं विशेन्मन्त्री प्रार्थ्य ' विष्णुं सदक्षिणम् ॥१७ ॥
। त्वमेव शरणं देव! सदा त्वं भक्तवत्सलः ॥१८ ॥
। पाशितान् मोचयिष्यामि त्वत्प्रसादात्पशूनिमान् ॥१९ ॥
। धारणाभिस्तु संशोध्य पूर्ववज्ज्वलनादिना ॥ २० ॥
। पुष्पपूर्णाञ्जलींस्तत्र क्षिपेत्तन्नाम योजयेत् ॥ २१ ॥
। यस्यां मूर्ती पतेत्पुष्पं तस्य तन्नाम निर्विशेत् ॥ २२ ॥
। कन्यया ' कर्तितं रक्तं पुनस्तत् त्रिगुणीकृतम् ॥ २३ ॥
। प्रकृतिं प्रक्रियाभेदैः संस्थितां तत्र चिन्तयेत् ॥ २४ ॥
। कृत्वा शरावे तत्सूत्रं कुण्डपार्श्वे निधाय तु ॥ २५ ॥
। सृष्टिक्रमात् प्रकृत्यादिपृथिव्यन्तानि देशिकः ॥ २६ ॥
। दातव्यः सर्वभेदेन ग्रथितस्तत्त्वचिन्तकैः ॥२७ ॥
। तन्मात्रात्मनि संहृत्य मायासूत्रे पशोस्तनौ ॥ २८ ॥
। पञ्चतन्मात्रबुद्ध्याख्यं कर्माख्यं भूतपञ्चकम् ॥२९ ॥
चाहिए । स्नान से अपने को पवित्र, सिद्ध और उत्तम समझकर आचमन करे और प्राणायाम कर शुद्ध होकर मन्त्रदाता गुरु पूजागृह में जाय और विष्णु की प्रार्थना करके प्रदक्षिणा करे ॥ १५-१७ ॥ प्रार्थना मन्त्र - संसार - सागर में डूबनेवाले जीवों को मायाबन्धन से छुड़ानेवाले केवल आप ही हैं । हे देव! आप सदा भक्तों भर वात्सल्यभाव रखते हैं ॥१८ ॥ देवाधिदेव! मुझे अनुमति दीजिये,
मैं आपकी कृपा से नैसर्गिक माया - बन्धनों से बँधे हुए इन जीवों को मुक्त करूँगा ॥१९ ॥ इस प्रकार देवेश्वर श्रीहरि से प्रार्थना
करके पूजागृह में प्रवेश करके फिर शिष्यभूत समस्त पशुओं को अग्नि आदि की धारणाओं से सम्यक् रूप से शोधन करके संस्कार करना चाहिए । फिर शिष्यों का वासुदेवादि मूर्तियों से संयोग कराकर उनके नेत्र बाँधकर उन्हें मूर्तियों की ओर उन्मुख होने के लिए निर्देश करे । शिष्य उन मूर्तियों की ओर पुष्पों की पुष्पाञ्जलि फेंके । तदनुसार मूर्तियों के साथ शिष्यों का नाम जोड़ना चाहिए । पहले की भाँति शिष्यों के द्वारा क्रम से मूर्तियों का मन्त्ररहित पूजन करना चाहिए । जिस मूर्ति पर शिष्य की पुष्पाञ्जलि गिरे उस शिष्य का वही नाम रखना चाहिए । २०-२२ ॥ इसके अनन्तर कन्या के हाथ का कता हुआ लाल रंग का सूत लेकर उसे छह गुना बट देना चाहिए । उस छह गुने सूत की लम्बाई शिष्य के अँगूठे से लेकर चोटी तक होनी चाहिए । फिर उसको तिगुना कर देना चाहिए । उस त्रिगुणित सूत्र में प्रक्रिया - भेद से स्थित उस प्रकृति देवी का चिन्तन करना चाहिए जिसमें सारा विश्व लीन हो जाता है और जिससे सारा विश्व उत्पन्न होता है । उस सूत्र में प्राकृतिक पाशों को तत्त्व की संख्या के अनुसार ग्रथित करे अर्थात् २४ गाँठें लगाये । उनको प्राकृतिक पाशों का प्रतीक समझना चाहिए । फिर उस ग्रन्थियुक्त सूत को कसोरे में रखकर कुण्ड के पास स्थापित कर देना चाहिए ॥२३-२५ ॥ तत्पश्चात् सब तत्त्वों का ध्यान करता हुआ गुरु सृष्टिक्रम के अनुसार प्रकृति - तत्त्व से प्रारम्भ करके पृथ्वीतत्त्व तक शिष्य के शरीर पर न्यास करे ॥ २६ ॥ तत्त्वचिन्तक यह क्रिया तीन, पाँच, दस या बारह बार
करे और साथ - साथ प्रत्येक तत्त्व के अनुसार सूत में गाँठें भी देता जाय ॥ २७ ॥ प्रकृति- -क्रम ( अर्थात् कारण तत्त्व
में कार्य - तत्त्व के लय के क्रम ) से हृदय से लेकर अस्त्र - पर्यन्त पाँच अंग सम्बन्धी मन्त्रों को पढ़कर सभी पञ्चभूतों को तन्मात्रास्वरूप १ ख. ग. ‘ भं निंहशतं हुत्वा ' । २ ख. ग. घ. त्वा आचम्याथ प्रविश्य च । ३ ख. ग. घ. ' रं न्यसेन्म ' । ४ ख. ग. प्राच्या ' । ५ क. ख. ग. घ. भक्तवत्सल । ६ ख. ग. ' खानुसं । ७ ख. ग. ' ष्ठात्रिष ' । ८ ख. ग. घ. कन्यासुक ' । ९ क. ङ. च. पञ्चाङ्ग ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तविंशोऽध्यायः १४१ ध्यायेच्च द्वादशात्मानं सूत्रे देहे तथेच्छया । एकैकं शतहोमेन दत्त्वा पूर्णाहुतिं ततः । अधिवास्य यथान्यायं भक्तं शिष्यं तु दीक्षयेत् ।
अन्यदप्युपयोगि स्यात्सर्वं वामगोचरे ।
नमो भूतेभ्यश्च बलिः कुशे देयः स्मरन्हरिम् ॥
मण्डलेऽथ यजेद्विष्णुं ततः सन्तर्प्य पावकम् । सम्प्रोक्ष्य विष्णुहस्तेन मूर्धानं स्पृश्य वै क्रमात् । सृष्टिमाध्यात्मिकींकृत्वा हृदि तां संहरेत्क्रमात् । ततः सम्प्रार्थ्य कुम्भेशं सूत्रं संस्कृत्य देशिकः । मूलमन्त्रेण सृष्टीशमाहुतीनां शतेन तम् । शुक्लं रजः समादाय मूलेन शतमन्त्रितम् ।
वियोगपदसंयुक्तैर्बीजैः पादादिभिः क्रमात् ।
हुत्वा सम्पातविधिना सृष्टेः सृष्टिक्रमेण तु ॥३० ॥
शरावे सम्पुटीकृत्य कुम्भेशाय निवेदयेत् ॥ ३१ ॥
करणीं कर्तरीं चापि रजांसि खटिकामपि ॥ ३२ ॥
संस्थाप्य मूलमन्त्रेण परामृश्याधिवासयेत् ॥३३ ॥
मण्डपं भूषयित्वाथ वितानघटलड्डुकैः ॥३४ ॥
आहूय दीक्षयेच्छिष्यान्बद्धपद्मासनस्थितान् ॥ ३५ ॥
प्रकृत्यादिविकृत्यन्तां साधिभूताधिदेवताम् ॥ ३६ ॥
तन्मात्रभूतां सकलां जीवेन समतां गताम् ॥ ३७ ॥
अग्नेः समीपमागत्य पार्श्वे तं सन्निवेश्य तु ॥ ३८ ॥
उदासीनमथासाद्य पूर्णाहुत्या च देशिकः ॥ ३ ९ ॥
सन्ताड्य हृदयं तेन हुम्फट्कारान्तसंयुतैः ॥४० ॥
पृथिव्यादीनि तत्त्वानि विश्लिष्य जुहुयात्ततः ॥४१ ॥
में लीन करके उस मायामय सूत्र में और पशु ( शिष्य रूपी जीव ) के शरीर में भी प्रकृति, लिङ्गशक्ति, कर्त्ता, बुद्धि और मन— इनका उपसंहार करे । फिर पञ्चतन्त्रमात्र, बुद्धि, कर्म और पञ्चमहाभूत- इस द्वादशात्मा का सूत्र और शिष्य के शरीर में भी ध्यान करे । तत्पश्चात् इच्छानुसार सृष्टि की सम्पात - विधि से हवन करके एक - एक को सौ - सौ आहुतियाँ देकर पूर्णाहुति देनी चाहिए । कसोरे में रखे हुए ग्रथित सूत्र को सम्पुट ( ढक ) करके उसे कुम्भेश को समर्पित करना चाहिए ॥२८-३१ ॥ तदनन्तर यथोचित रीति से अधिवासन करके भक्त शिष्य को दीक्षा देनी चाहिए । दीक्षा के समय शिष्य के वाम भाग में करनी, कर्तरी ( कतरनी, कैंची ), धूल या बालू, खड़िया मिट्टी तथा अन्य उपयोगी वस्तुएँ भी रहनी चाहिए । सम्यक् स्थापना करने के बाद मूलमन्त्र से उनका स्पर्श करके अधिवासित करना चाहिए ॥३२-३३ ॥ भगवान् विष्णु का स्मरण करते हुए ' नमो भूतेभ्यः ' मन्त्र से कुश पर बलि देना चाहिए । एक सुसज्जित मण्डप बनाकर उसमें चंदोवा टाँग दे और कलश स्थापित कर मोदक आदि भोज्य सामग्री भर दे ॥३४ ॥ इसके अनन्तर उस मण्डप में विष्णु की प्रतिष्ठा कर पूजा करे और अग्नि में आहुति देकर शिष्यों को
बुलावे । शिष्य पद्मासन लगाकर बैठें और गुरु उनको दीक्षा दे ॥ ३५ ॥ बारी - बारी से शिष्यों का प्रोक्षण ( जल छिड़क )
करके विष्णुहस्त से उनके मस्तक का स्पर्श करना चाहिए । प्रकृति से विकृतिपर्यन्त अधिभूत और अधिदैवत सहित सारी सृष्टि को आध्यात्मिक करके अर्थात् सबको अपने आत्मा में स्थित मानकर हृदय में क्रमशः उनका संहार करे । इस प्रकार तन्मात्र - स्वरूप सारी सृष्टि जीव के समान हो जाते हैं ॥३६-३७ ॥ इसके बाद आचार्य कुम्भेश से प्रार्थना करके सूत्र का संस्कार करे, फिर अग्नि के समीप आकर अपने पास शिष्य को बैठाये । फिर मूलमन्त्र से सृष्टि के स्वामी ब्रह्मा के लिए सौ आहुतियाँ दे । इसके बाद उदासीन भाव से स्थित शिष्य के पास आचार्य पूर्णाहुति के साथ आये । श्वेत रेणु लेकर उसे मूलमन्त्र से सौ बार अभिमन्त्रित करना चाहिए । फिर उससे शिष्य के हृदय पर ताड़न करना चाहिए । उस समय वियोगवाची क्रियापद से युक्त बीजमन्त्रों एवं क्रमशः पादादि इन्द्रियों से घटित ' हुं फट् ' का उच्चारण करना चाहिए ॥३८-४१ ॥ १ ख. ग. घ. ' द्वायुगो ' । २ ख. ग. घ. कुशे शेते । ३ क. ङ. च. विश्लेष्य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् १४२ व्याहृते ' हरौ ॥ नीयमानं क्रमात्सर्वं तत्त्वाधारं स्मरेद् बुधः ॥ ४२ ॥
वह्नावखिलतत्त्वानामालये जुहुयाद्यथोक्ते जातवेदसि ॥ ४३ ॥
ताडनेन वियोज्यैवमादायापाद्य साम्यताम् । प्रकृत्याहृत्य
जातकर्म भोगं चैव लयं तथा । कृत्वाष्टौ तत्र तत्रैव ततः शुद्धं तु होमयेत् ॥ ४४ ॥
गर्भाधानं तु देशिकः । सन्धयेद्धि परे तत्त्वे यावदव्याकृतं क्रमात् ॥४५ ॥
शुद्धं तत्त्वं समुद्धृत्य पूर्णाहुत्या
ज्ञानयोगेन विलाप्य परमात्मनि । विमुक्तबन्धनं जीवं परस्मिन्नव्यये पदे ॥ ४६ ॥
तत्परं शुद्धे बुद्धे स्मरेद् बुधः । दद्यात् पूर्णाहुतिं पश्चादेवं दीक्षा समाप्यते ॥ ४७ ॥
निर्वृत्तं परमानन्दे प्रयोगमन्त्रान् वक्ष्यामि यैर्दीक्षाहोमसंल्लयः । ॐ यं भूतानि विशुद्धं हुं फट् ॥४८ ॥
अनेन ताडनं कुर्याद् वियोजनमिह द्वयम्
ॐ यं भूतान्यापातयेऽहम् आदानं कृत्वा चानेन प्रकृत्या योजनं शृणु ।
ॐ यं भूतानि पुंश्चाहो होममन्त्रं प्रवक्ष्यामि ततः पूर्णाहुतेर्मनुम् ॥४९ ॥
ॐ भूतानि संहर स्वाहा यथा - ‘ ॐ रां ( नमः ) कर्मेन्द्रियाणि वियुङ्क्ष्व हुं फट् ' । ' ॐ णं ( नमः ) भूतानि वियुङ्क्ष्व ' सारे प्राकृतिक तत्त्वों का ( इस प्रकार अर्थात् कार्यतत्त्वों का कारण- -तत्त्वों में ) लय करने के बाद उन तत्त्वों का उनके मूल आलय ( लय - स्थान ) भगवान् श्रीहरि में लय करना चाहिए । विद्वान् पुरुष क्रम से भगवान् श्रीहरि में सभी तत्त्वों का लय हो जाने पर सभी तत्त्वों के अधिष्ठान ( भगवान् विष्णु ) का स्मरण करे । पूर्वोक्त रीति से ताड़न द्वारा भूतों और इन्द्रियों को पृथक् करके शुद्ध हुए शिष्य को अपनावे और प्रकृति से उसकी समता करे । फिर पूर्वोक्त अग्नि में उसके प्राकृतभाव का भी हवन करे ॥४२-४३ ॥ तदनन्तर गर्भाधान, जातकर्म, भोग और लय का अनुष्ठान करके उस कर्म के निमित्त वहाँ आठ बार शुद्धि के लिए हवन करना चाहिए ॥४४ ॥ इसके बाद आचार्य पूर्णाहुति के द्वारा शुद्ध तत्त्व का उद्धार करके अव्याकृत
प्रकृति - पर्यन्त सम्पूर्ण जगत् का क्रमानुसार परम - तत्त्व में लय कर दे ॥ ४५ ॥ उस परम तत्त्व को ज्ञानयोग के द्वारा
परमात्मा में विलीन करके बन्धन से छूटे हुए जीव को अविनाशी परमात्मपद पर प्रतिष्ठित करे । फिर विद्वान् आचार्य यह स्मरण करे कि शिष्य शुद्ध बुद्ध परमानन्द में कृतकृत्य हो चुका है । बाद को पूर्णाहुति देनी चाहिए । इस प्रकार दीक्षा समाप्त होती है ॥४६-४७ ॥ अब मैं उन प्रयोग - सम्बन्धी मन्त्रों को कहूँगा जिनसे दीक्षा, होम और संल्लय का सम्पादन होता है । “ ॐ यं भूतानि विशुद्धं हुं फट् " इस मन्त्र से ताड़न करना चाहिए । वियोजन के दो मन्त्र हैं । एक पहले कहा जा चुका है । दूसरा इस प्रकार है- “ ॐ यं भूतान्यापातयेऽहम् ' इस मन्त्र से आपातन ( प्रकृति से वियोजन ) करके पुनः प्रकृति से योजन करने का मन्त्र यह है- “ ॐ यं भूतानि पुंश्च " । अब मैं होम करने का मन्त्र कहूँगा और उसके बाद पूर्णाहुति का मन्त्र बतलाऊँगा । “ ॐ भूतानि संहर स्वाहा ” यह होम - मन्त्र है । “ ॐ ॐ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय १ क. ङ. च. व्याहृतौ । २ ख. ग. घ. शाम्यताम् । ३ विशुद्धं मनुम् क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । ४ घ. ' पुंश्चाहो । हो ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तविंशोऽध्यायः १४३ ॐ अं ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अं वौषट् । पूर्णाहुत्यन्तरं तु तत्त्वे शिष्यं तु सन्धयेत् ॥५० ॥
एवं तत्त्वानि सर्वाणि क्रमात् संशोधयेद् बुधः । नमोन्तेन स्वबीजेन ताडनादिपुरःसरम् ' ॥५१ ॥
ॐ रां कर्मेन्द्रियाणि, ॐ दें बुद्धीन्द्रियाणि ( च ) । यं बीजेन समानं तु ताडनादिप्रयोगकम् ॥५२ ॥
२ ॐ सुगन्धतन्मात्रे बिम्बं युङ्क्ष्व हुं फट् । ॐ सं पाहि हां ॐ स्वं युङ्क्ष्व प्रकृत्या ॥५३ ॥
अं जं हुं गन्धतन्मात्रे संहर स्वाहा । ततः पूर्णाहुतिश्चैवमुत्तरेषु प्रयुज्यते । ॐ रां रसतन्मात्रे । ॐ तें रूपतन्मात्रे । ॐ वं स्पर्शतन्मात्रे । ॐ यं शब्दतन्मात्रे । ॐ भं नमः । ॐ मौ अहङ्कारः ॐ नं बुद्धौ । ॐ एकमूर्तावयं प्रोक्तो दीक्षायोगः समासतः । दग्ध्या परिस्मिन् सन्दध्यान्निर्वाणे प्रकृतिं नरः । बुद्धयक्षाण्यथ तन्मात्रं मनो ज्ञानमहङ्कृतिम् । पुरुषं प्राकृतं शुद्धमैश्वरे धाम्नि संस्थितम् । ध्यायेत्पूर्णाहुतिं दद्याद्दीक्षेयं त्वधिकारदा । क्रमादेवं विशोध्यान्ते सर्वसिद्धिसमन्वितम् ।
ॐ ॐ प्रकृतौ ।
एवमेव प्रयोगस्तु नवव्यूहादिके स्मृतः ॥५४-५८ ॥
शोधयित्वाथ भूतानि कर्माक्षाक्षि विशोधयेत् ॥५९ ॥
लिङ्गात्मानं विशोध्यान्ते प्रकृतिं शोधयेत्पुनः ॥ ६० ॥
स्वगोचरीकृताशेषभोगं मुक्तौ कृतास्पदम् ॥६१ ॥
अङ्गैराराध्य मन्त्रस्य नीत्वा तत्त्वगणं समम् ॥६२ ॥
ध्यायन् पूर्णाहुतिं दद्याद्दीक्षेयं साधके स्मृता ॥ ६३ ॥
अं वौषट् ” यह पूर्णाहुति का मन्त्र है । पूर्णाहुति के पश्चात् शिष्य को तत्त्व में संयुक्त करना चाहिए ॥४८-५० ॥ इसी प्रकार बुद्धिमान् गुरु सभी तत्त्वों का क्रम से शोधन करे । तत्त्वों के अपने - अपने बीज के अन्त में ' नमः ' पद जोड़कर ताड़नादिपूर्वक तत्त्वशुद्धि का सम्पादन किया जाना चाहिए ॥ ५१ ॥ ' ॐ रां ( नमः ) कर्मेन्द्रियाणि ' । ' ॐ दें ( नमः )
बुद्धीन्द्रियाणि'- ' -इन पदों के अन्त में ' वियुङ्क्ष्व हुं फट् ' जोड़ देना चाहिए । पूर्वोक्त ' यं बीज की तरह प्रस्तुत मन्त्र से भी ताड़न आदि प्रयोग होता है ॥ ५२ ॥ संयोजन और होम के मन्त्र क्रम से इस प्रकार हैं- “ ॐ सुगन्धतन्मात्रे बिम्बं
युङ्क्ष्व हुं फट् ”, “ ॐ सं पाहि हां ॐ स्वं युङ्क्ष्व प्रकृत्या अं जं हुं गन्धतन्मात्रे संहर स्वाहा ” ॥५३ ॥ तत्त्व - संशोधन
के अनन्तर ‘ ॐ रां रसतन्मात्रे ', ' ॐ तें रूपतन्मात्रे ', ' ॐ वं स्पर्शतन्मात्रे ', ' ॐ यं शब्दतन्मात्रे ', ' ॐ भं नमः ', ' ॐ मौ अहङ्कारः, ’ ‘ ॐ नं बुद्धौ ', ' ॐ ॐ ॐ प्रकृतौ ', इन मन्त्रों से पूर्णाहुति प्रदान करे । संक्षेप में एक मूर्ति के विषय में यह दीक्षाविधि कही गयी है । इसी प्रकार नवव्यूहादि में भी दीक्षा का प्रयोग शास्त्रसम्मत कहा गया है ॥५४-५८ ॥ जीव ( शिष्य ) को इस प्रकार शुद्ध कर पर ( ब्रह्म ) में युक्त करना चाहिए । भूत - शुद्धि के अनन्तर कर्मेन्द्रियों का विशोधन करना चाहिए ॥५९ ॥
बुद्धि, इन्द्रियाँ, तन्मात्रा, मन, ज्ञान, अहं तत्त्व का संशोधन करे और पुनः प्रकृति का विशोधन करे - यही उपयुक्त विधि है ॥६० ॥ ईश्वरीय प्रकाश में स्थित, शुद्ध, प्राकृत - पुरुष और अपने प्रभाव से सम्पूर्ण भोगों को भोगनेवाले, मुक्ति में अपना
स्थान बनानेवाले अर्थात् मुक्त ब्रह्म का ध्यान कर पूर्णाहुति दे । ऐसी ही दीक्षा यथार्थ अधिकार को प्रदान करनेवाली है । मन्त्र के प्रत्येक अंग से आराधना करके और तत्त्वगणों के साथ क्रमशः सबका संशोधन करके अन्त में सब प्रकार की सिद्धियों की देनेवाले पुरुष ( ब्रह्म ) का ध्यान करते हुए पूर्णाहुति दे । इस विधि से दी हुई दीक्षा इष्ट को सिद्ध करनेवाली मानी गयी है ॥६१-६३ ॥ यदि शिष्य के पास धन की कमी हो या किसी प्रकार की असमर्थता हो तो गुरु सब प्रकार की सामग्रियों को जुटाकर द्वादशी १ दिप्रयोगकम् । २ थ. ॐ तन्सात्रे वियुङ्क्ष्व हुं । ३ क. भुक्त्वा । ४ क. ङ. च. ' यं साधके स्मृता । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् १४४ द्रव्यस्य वा न सम्पत्तिरशक्तिर्वात्मनो यदि । सद्योऽधिवास्य द्वादश्यां दीक्षयेद्देशिकोत्तमः । शिष्यो नातिधनी यस्तु स्थण्डिलेऽभ्यर्च्य दीक्षयेत् । सृष्टिक्रमेण शिष्यस्य देहे ध्यात्वा तु देशिकः । स्वमन्त्रैर्वासुदेवादीञ् ' ज्वलनादीन् ' विसर्जयेत् । यानि सूत्राणि बद्धानि मुक्त्वा कर्माणि देशिकः । अग्नौ प्राकृतिके विष्णौ लयं नीत्वाधिदैविके । शिष्ये प्रकृतिमापन्ने दग्ध्वा प्राकृतिकान्गुणान् । अथान्यां शक्तिदीक्षां वा कुर्याद् भावे स्थितो गुरुः । सम्पूज्य स्थण्डिले विष्णुं पार्श्वस्थं स्थाप्य पुत्रकम् । अध्वानं निखिलं ध्यात्वा पर्वभिः स्वैर्विकल्पितम् । ध्यानयोगेन सञ्चिन्त्य पूर्ववत्ताडनादिना ।
ताडनेन वियोज्याथ गृहीत्वात्मनि तत्पुनः ।
इष्ट्वा देवं यथापूर्वं सर्वोपकरणान्वितः ॥६४ ॥
भक्तो विनीतः शारीरैर्गुणैः सर्वैः समन्वितः ॥ ६५ ॥
अध्वानं निखिलं दैवं भौतं वाध्यात्मिकीकृतम् ॥६६ ॥
अष्टाष्टाहुतिभिः पूर्वं क्रमात्सन्तर्प्य सृष्टिमान् ॥६७ ॥
होमेन शोधयेत् पश्चात् संहारक्रमयोगतः ॥६८ ॥
शिष्यदेहात्समाहृत्य क्रमात्तत्त्वानि शोधयेत् ॥ ॥६९
६ ९ ॥ ॥
शुद्धं तत्त्वमशुद्धेन पूर्णाहुत्या तु सन्धयेत् ॥ ७० ॥
मोचयेदधिकारे वा नियुञ्ज्याद्देशिकः शिशून् ॥७१ ॥
भक्त्या सम्प्रतिपन्नानां यतीनां निर्धनस्य च ॥ ७२ ॥
देवताभिमुखः शिष्यस्तिर्यगास्यः स्वयं स्थितः ॥ ७३ ॥
शिष्यदेहे तथा देवमाधिदैविकयाजनम् ॥७४ ॥
क्रमात्तत्त्वानि सर्वाणि शोधयेत्स्थण्डिले हरौ ॥ ७५ ॥
देवे संयोज्य संशोध्य गृहीत्वा तत्स्वभावत: ॥७६ ॥
के दिन इष्ट देवता की पूजा करके दीक्षा प्रदान करे ॥६४-६४३ ॥ जो शिष्य अत्यन्त धनी न हो परन्तु वह विनीत, भक्त और सब प्रकार के शारीरिक गुणों से युक्त हो तो वेदी पर ही देवस्थापना करके उसे दीक्षा दे देनी चाहिए ॥६५ - ६५३ ॥ पहले गुरु सृष्टि के क्रम से शिष्य पर अखिल अध्वान समस्त देव, भौतिक और आध्यात्मिक गुणों की प्रतिष्ठा करके और उसका ध्यान करके आठ - आठ आहुतियों से हवन करके प्रतिष्ठापित देवों को तृप्त करना चाहिए । फिर उन - उन देवों के मन्त्रों से वासुदेव आदि देवों और अग्नि का विसर्जन करे और हवन के द्वारा संहार - क्रम से संशोधन करे ॥६६-६८ ॥ जो सूत बाँधे गये थे, गुरु उनको खोल दे और शिष्य की देह से सबको खींचकर तत्त्वों का क्रमशः शोधन करे ॥६९ ॥ और उस सूत्र को प्राकृतिक और आधिदैविक
विष्णुरूप अग्नि में सबको विलीन कर पूर्णाहुति के द्वारा शुद्ध तत्त्व को अशुद्ध तत्त्व के साथ संयुक्त करके अशुद्ध को भी शुद्ध करे ।७० ॥ जब शिष्य के प्राकृतिक गुण नष्ट हो जायँ और वह प्रकृतिस्थ हो जाय अर्थात् अपने साधारण गुणों को छोड़कर दीक्षा द्वारा उत्तम गुणों को ग्रहण कर ले तो गुरु उसको अन्य शिशुओं को पढ़ाने या उपदेश देने का अधिकार दे ॥७१ ॥ गुरु उपर्युक्त
प्रकार की दीक्षा के अतिरिक्त शक्ति - दीक्षा भी स्वयं अपनी इच्छा के अनुसार दे सकता है । उसकी विधि इस प्रकार है कि भक्तिपूर्वक शरण में आये हुए यतियों और निर्धन भक्तों को गुरु अपने समीप पुत्र की भाँति बैठावे ॥७२ ॥ वेदी पर विष्णु की पूजा करके
भक्त शिष्य को देवताभिमुख बैठावे और स्वयं कुछ तिरछा होकर बैठे || ७३ || शिष्य के शरीर पर अपने पर्वों के विकल्पित अखिल अध्वान का ध्यान कर आधिदैविक देव की पूजा करावे और पूर्वकथित नियम के अनुसार ध्यानयोग से चिन्तन कर ताड़न आदि के द्वारा क्रमशः सब तत्त्वों को उस वेदी पर विष्णु के समीप ही शुद्ध करे ॥७४-७५ ॥ ताड़न के द्वारा उन तत्त्वों को वहाँ ( वेदी ) से पृथक् कर अपने में संयुक्त करे । फिर देव में उनको संयुक्त कर शोधन करे और स्वभावानुसार उनका ग्रहण भी करे ॥७६ ॥
१ ख. ग. घ. ‘ दीञ्जनना ° । २ ख. ग. ' न्विवर्ज । ३ ख. ग. घ. ' तः । योनिसू । ४ क. ङ. च. संनयेत् । घ. साधयेत् । ५ ङ. सतीनां । ६ ख. ग. घ. ' याचन ' । ७ घ. तत्परः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अष्टविंशोऽध्यायः १४५ आनीय शुद्धतत्त्वे सन्धयित्वा क्रमेण तु । शोधयेद्ध्यानयोगेन सर्वत्रोत्तानमुद्रया ॥७७ ॥
शुद्धेषु सर्वतत्त्वेषु प्रधाने चेश्वरे स्थिते । दग्ध्वा निर्वापयेच्छिष्यान् पदे चैशे नियोजयेत् निनयेत् सिद्धिमार्गेण साधकं देशिकोत्तमः ॥ एवमेवाधिकारस्थो गृही आत्मानं शोधयंस्तिष्ठेद्यावद्रागक्षयो भवेत् । क्षीणरागमथात्मानं ज्ञात्वा आरोप्य पुत्रे शिष्ये वा ह्यधिकारं तु संयमी । दग्ध्वा मायामयं पाशं प्रव्रज्य शरीरपातमाकाङ्क्षन्नासीताव्यक्तलिङ्गवान् ॥७८ ॥
कर्माण्यतन्द्रितः ॥ ७ ९ ॥ संशुद्धकिल्विषः ॥८० ॥
स्वात्मनि स्थितः ॥ ॥८१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये सर्वदीक्षाविधिकथनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥२७ ॥
अथाष्टविंशोऽध्यायः आचार्याभिषेकविधानम् नारद उवाच अभिषेकं प्रवक्ष्यामि यथा कुर्यात्तु पुत्रकः । सिद्धिभावसाधको येन रोगी रोगात्प्रमुच्यते ॥ १ ॥
क्रमशः इस प्रकार उनको खींचकर लावे और शुद्ध तत्त्वों से मिलाकर ध्यानयोग से उत्तान - मुद्रा के द्वारा सर्वत्र शोधन करे ॥७७ ॥ सब तत्त्वों की शुद्धि हो जाने और प्रधान ईश्वर - तत्त्व से स्थित हो जाने पर शिष्यों के सब अशुद्ध तत्त्वों
को जलाकर उनको शुद्ध कर दे और ईश्वरीय स्थान पर नियुक्त करे ॥७८ ॥ उत्तम गुरु का कर्त्तव्य है कि वह साधक
को सिद्धि - मार्ग से ले जाय । इस प्रकार दीक्षित होकर गृहस्थ सजग भाव से अपने कर्मों का और अपना तब तक संशोधन करे जब तक रागक्षय न हो जाय । जब गृहस्थ अपने को निष्पाप जान ले कि वह रागों से मुक्त हो गया है तब वह संयमी शिष्य या पुत्र को अपना अधिकार सौंपकर मायापाश को तोड़कर संन्यास ग्रहण कर ले और आत्मस्थ होकर सर्वदा शरीर - पात की आकांक्षा करे । किन्तु उसे अपनी विशेषताओं अर्थात् बाह्य मुद्राओं द्वारा अपने को व्यक्त न करे ॥७९ -८१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में सर्वदीक्षाविधि वर्णन नामक सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त ॥२७ ॥
अध्याय २८ आचार्य के अभिषेक का विधान नारद ने कहा - अब मैं उस विधि को बतला रहा हूँ जिस विधि से पुत्र या शिष्य को आचार्य का अभिषेक करने से साधक मनोवाञ्छित सिद्धि प्राप्त करता है और रोगी रोग से मुक्त हो जाता है ॥१ ॥ इन सम्पूर्ण मलों को
१ घ. शुद्धभावेन । २ क. च. ' ष्यान्यादवेशे । ३ क. ख. ग. घ. ङ. र्गे वा सा ° । ४ ख. ग. घ. ' थाऽऽचार्यस्तु पुत्रकः । सि ' । १० CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् १४६ राज्यं राजा सुतं ' स्त्री च प्राप्नुयान्मलनाशनम् ' । मृत्साकुम्भान्सुरत्नाढ्यान् मध्यपूर्वादितो न्यसेत् || २ || शतवर्तितान् । मण्डपे मण्डले विष्णुं प्राच्यैशान्योश्चर पीठके ॥ ३ ॥
सहस्त्रावर्तितान् कुर्यादथवा निवेश्य सङ्कलीकृत्य पुत्रं साधकादिकम् । अभिषेकं समभ्यर्च्य कुर्याद् गीतादिपूर्वकम् ॥४ ॥
दद्याच्च योगपीठादींस्त्वनुग्राह्यास्त्वया नराः । गुरुश्च समयान् ब्रूयाद् ' गुरुः शिष्योऽथ सर्वभाक् ॥५ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये आचार्याभिषेकविधिवर्णनं नामाष्टविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः मन्त्रसाधनविधिः सर्वतोभद्रादिमण्डललक्षणानि च नारद उवाच साधकः साधयेन्मन्त्रं देवतायतनादिके । शुद्धभूमौ गृहे प्रार्च्य मण्डले हरिमीश्वरम् ॥१ ॥
चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे मण्डलादीनि वै लिखेत् । रसबाणाक्षिकोष्ठेषु सर्वतोभद्रमालिखेत् ॥२ ॥
षट्त्रिंशत्कोष्ठकैः पद्मं पीठे ' पङ्क्त्या बहिर्भवेत् । द्वाभ्यां तु वीथिका तस्माद् द्वाभ्यां द्वाराणि दिक्षु च ॥३ ॥
नष्ट कर देनेवाले अभिषेक के द्वारा राजा राज्य को और पुत्र अभिलाषिणी स्त्री पुत्र को प्राप्त करती है । सबसे पहले मिट्टी के कलशों को रत्नों से भरकर मध्यकेन्द्र से पूर्व की ओर रखे ॥२ ॥ उन कलशों को हजार बार या सौ बार
सूत या कपड़े से लपेटे । मण्डप के मण्डल में पूर्व और ईशानकोण की ओर पीठ पर विष्णु को स्थापित करे || ३ || सब पुत्र, पौत्र आदि और साधक को वहाँ एकत्र कर अभिषेक करके मंगल - गान आदि करे || ४ || अभिषेक के अनन्तर योगपीठ का दान करे । उस समय गुरु को यह कहना चाहिए कि " हे ईश्वर! तुम इन भक्तों पर अनुग्रह करो । ” इस प्रकार अभिषेक करने से गुरु और शिष्य सब प्रकार के मनोरथ प्राप्त करते हैं ॥५ ॥
श्री अग्निमहापुराण में आचार्याभिषेक वर्णन नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त ॥२८ ॥
अध्याय २ ९ मन्त्रसाधनविधि तथा सर्वतोभद्रादिमण्डल के लक्षण नारद बोले - साधक को देवतायतन आदि में शुद्ध भूमि पर मण्डल में भगवान् विष्णु की अर्चना करके मन्त्र की साधना करनी चाहिए ॥१ ॥ एक वर्गाकार भूमि पर मण्डलाकार चित्र को बनाकर उसके ऊपर नवें, पाँचवें और
दूसरे कोष्ठकों में सर्वतोभद्र का चित्रण करना चाहिए || २ || इसके बाहर छत्तीस कोष्ठकों को बनाना चाहिए । दो पंक्तियों में बनाये हुए इन कोष्ठकों में दोनों ओर दो द्वारों का निर्माण करना चाहिए ॥३ ॥ बाहर की ओर पद्माकार
१ ख. ग. पतिं । २ क. घ. ङ. च. ' म् । मूर्तिकु ' । ख. म् । मृद्भिः कु । ३ ख. ग. घ. च. शान्यां च पी । ४ क. ख. ङ. च. सकलीकृत्य । घ. शकलीकृत्य । ५ घ. याद् गुप्ताशि । ६ क. ' तुरः स्त्रीकृ । ७ ख. ग. षड्विंश । ८ ख. घ. पीठं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA