अग्नि पुराण — पृष्ठ 151–160

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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एकोनत्रिंशोऽध्यायः वर्तुलं भ्रामयित्वा तु पद्मक्षेत्रं पुरोदितम् । विभज्य भ्रामयेच्छेषं चतुषक्षेत्रं तु वर्तुलम् । तृतीयं दलसन्धीनां दलाग्राणां चतुर्थकम् । निधाय केसराग्रे तु दलसन्धींस्तु लाञ्छयेत् । दलमध्यान्तरालं तु मानं मध्ये निधाय तु । तदन्तरालं तत्पार्श्वे कृत्वा बाह्यक्रमेण च । पद्मलक्ष्मैतत्सामान्यं तद् द्विषड्दलमुच्यते । तत्पार्श्वे भ्रमयोगेण कुण्डल्यः षड् भवन्ति हि । पञ्चपत्रादिसिद्ध्यर्थं मत्स्यैः कृत्वैवमब्जकम् । त्रीणि कोणेषु पादार्थं द्विद्विकान्यपराणि तु । ततः पङ्क्तिद्वयं दिक्षु वीथ्यर्थं तु विलोपयेत् । द्वाराणां पार्श्वतः शोभा अष्टौ कुर्याद् विचक्षणः । समीप उपशोभानां कोणास्तु परिकीर्तिताः । पद्मार्थे भालयित्वा तु प्रथमं कर्णिकाक्षेत्रं प्रसार्य कोणसूत्राणि पातयित्वाथ सूत्राणि दलाग्रं भ्रामयेत्तेन केसरौ तु लिखेद् द्वौ १४७ भागं द्वादशमं ( कं ) बहिः ॥४ ॥

केसराणां द्वितीयकम् ॥५ ॥

कोणदिङ्मध्यमं ततः ॥६ ॥

तत्र पत्राष्टकं लिखेत् ॥७ ॥

तदग्रं तदनन्तरम् ॥८ ॥

द्वौ दलमध्ये ततः पुनः ॥९ ॥

कर्णिकार्थेन मानेन प्राक्संस्थं भ्रामयेत्क्रमात् ॥१० ॥

एवं द्वादश मत्स्याः स्युर्द्विषट्कदलकं च तैः ॥११ ॥

व्योमरेखाबहिः पीठं तत्र कोष्ठानि मार्जयेत् ॥१२ ॥

चतुर्दिक्षु विलिप्तानि पत्रकाणि भवन्त्युत ॥१३ ॥

द्वाराण्याशासु कुर्वीत चत्वारि चतसृष्वपि ॥१४ ॥

तत्पार्श्व उपशोभास्तु तावत्यः परिकीर्तिताः ॥१५ ॥

चतुर्दिक्षु ततो द्वे द्वे चिन्तयेन्मध्यकोष्ठकैः ॥१६ ॥

मण्डल बनाकर उस पद्म के अर्ध भाग में बारह कोष्ठकों का निर्माण करना चाहिए || ४ || इस प्रकार विभाजन करके एक - दूसरे पर चार मण्डलों का चित्रण करना चाहिए । उसमें से पहला है कर्णिका क्षेत्र, दूसरा है केसर क्षेत्र, तीसरा है दलसन्धि क्षेत्र और चौथा है दलाग्र क्षेत्र । तदनन्तर त्रिकोण के विन्दुओं को एक तागे से जोड़ देना चाहिए ॥५-६ ॥ केसर के अग्रभाग में सूत रखकर दलसन्धियों को चिह्नित करे, फिर सूत्रों को गिराकर अष्टदलों का निर्माण करे ॥७ ॥ तत्पश्चात् मण्डल के अन्दर दलों में अन्तराल का निर्माण करना चाहिए और एक के बाद दूसरे दलाग्रों

को बनाना चाहिए ॥८ ॥ इन्हें मण्डल के पार्श्व तथा बाहर की ओर भी बना देना चाहिए । दो दलों के बीच में केसरों

का चित्रण करना चाहिए ॥९ ॥ यही बासठ दलोंवाला साधारण पद्ममण्डल है । इस मण्डल के पूर्व की ओर उपयुक्त

मात्रा में कर्णिकार्द्ध का चित्र बनाना चाहिए ॥ १० ॥ उसी के पार्श्व में मण्डलाकार छह कुण्डलियाँ बना देनी चाहिए ।

बासठ दल कमल में बारह मत्स्याकृतियों को बना देना चाहिए || ११ || अनुष्ठान में सिद्धि प्राप्त करने के लिए पाँच कमलदलों से एक अखण्डित मत्स्याकृति बनानी चाहिए । पीठिका के बाहर की ओर व्योमरेखा खींचकर कोष्ठकों का सम्मार्जन करना चाहिए || १२ || तीनों कोनों में चरणों के लिए दो - दो रेखाओं को खींच देना चाहिए । पद्म के सभी दल सभी दिशाओं में फैले रहते हैं || १३ || एक पंक्ति में मीन - पक्षों को बनाकर चारों दिशाओं में चार द्वारों का निर्माण कर देना चाहिए || १४ || बुद्धिमान् व्यक्ति को द्वारों के पार्श्व भाग में आठ शोभाकृतियों का निर्माण करके उनके समीप उतनी ही उपशोभाओं को बना देना चाहिए || १५ || इन उपशोभाओं के समीप कोणों का निर्माण बताया गया है । चारों दिशाओं में मध्य - कोष्ठकों में दो - दो आकृतियाँ बनायी जाती हैं || १६ || पीठिका के बाहर की ओर १ क. घ. ङ. च. ' न्यं द्विषट्कद ' । २ ख. ग. ‘ वन्त्यतः । त ’ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 152

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अग्निपुराणम् १४८ चत्वारि बाह्यतो मृज्यादेकैकं पार्श्वयोरपि तद्वद्विपर्यये कुर्यादुपशोभां ततः परम् एवं षोडशकोष्ठं स्यादेवमन्यत्तु मण्डलम् एका पङ्क्तिः पराभ्यां तु द्वारशोभादि पूर्ववत् द्विहस्ते हस्तमात्रं स्याद् वृद्ध्या ' द्वारेण चाचरेत् पद्मर्धं नवभिः प्रोक्तं नाभिस्तु तिसृभिः स्मृता त्रिधा विभज्य च क्षेत्रमन्तर्द्वाभ्यामथाङ्कयेत् इन्दीवरदलाकारानथ वा मातुलुङ्गवत् भ्रामयित्वा बहिर्नेमावरसन्ध्यन्तरे स्थितः अरमध्ये स्थितो मध्यमराणां भ्रामयेत्समम् विभज्य सप्तधा क्षेत्रं चतुर्दशकरं समम् काष्ठकानि चतुर्भिस्तैर्मध्ये भद्रं समालिखेत् कमलानि पुनर्वीथ्यै परितः परिमृज्य तु । शोभार्थं पार्श्वयोस्त्रीणि त्रीणि लुम्पेद् दलस्य तु ॥१७ ॥

। कोणस्यान्तर्बहिस्त्रीणि चिन्तयेन्निर्विभेदतः ॥ १८ ॥

। द्विषट्कभागे षड्विंशत्पदं पद्म तु वीथिका ॥ १ ९ ॥ । द्वादशाङ्गुलिभिः पद्ममेकहस्ते तु मण्डले ॥ ॥२० २० || ॥ । अपीठं चतुरस्त्रं स्याद् द्विकरं चक्रपङ्कजम् ॥२१ ॥

। अष्टाभिस्त्वारकान् कुर्यान्नेमिं तु चतुरङ्गुलैः ॥ २२ ॥

। पञ्चान्तस्त्वारसिद्ध्यर्थं तेष्वास्फाल्य लिखेदरान् ॥ २३ ॥

। पद्मपत्रायतान्वापि लिखेदिच्छानुरूपतः ॥ २४ ॥

। भ्रामयेदरमूलं तु सन्धिमध्ये व्यवस्थितः ॥ २५ ॥

। एवं सिध्यन्त्यराः सम्यङ्मातुलिङ्गनिभाः समाः ॥२६ ॥

। त्रिधा कृते शतं ह्यत्र षण्णवत्यधिकानि तु ॥ २७ ॥

। परितो विसृजेद् वीथ्यै तथा दिक्षु समालिखेत् ॥ २८ ॥

। द्वे द्वे मध्यकोष्ठे तु ग्रीवार्थं दिक्षु लोपयेत् ॥ २ ९ ॥ चार - चार और पार्श्व में एक - एक आकृति बनायी जाती है । उसमें शोभा के लिए दलों के पार्श्व में तीन - तीन आकृतियाँ और बना दी जाती हैं ॥१७ ॥ इसी प्रकार विपरीत में भी तीन उपशोभाकृतियों का निर्माण किया जाता है किन्तु कोणों के बीच में

तनिक भी स्थान नहीं छोड़ा जाता है || १८ || इस प्रकार सोलह कोष्ठकों से युक्त एक अन्य मण्डल का भी निर्माण किया जाता है । पद्म के अन्दर उसके बासठवें भाग में छब्बीस दलों का चित्रण किया जाता है ॥१९ ॥ द्वार की शोभा के लिए पूर्व की

भाँति एक पंक्ति का भी निर्माण किया जाता है । एक हाथ के विस्तार के मण्डल में बारह अँगुलियों से एक पद्म का चित्रण किया जाता है ॥२० ॥ अँगूठे से एक हाथ के क्षेत्रफल के द्वारा चित्रण करा देना चाहिए । तदनन्तर चार वेदिकाओं का निर्माण

करना चाहिए और उसमें दो अंगुल परिधि का एक चक्राकार पद्म भी चित्रित करना चाहिए ॥२१ ॥ पद्म का आधा भाग

नौ अंगुल, नाभि तीन अंगुल, द्वार आठ अंगुल और परिधि चार अंगुल होना चाहिए ॥ २२ ॥ क्षेत्र को तीन भागों में विभाजित

करके बीच में दो अँगुलियों से चिह्नित करना चाहिए । अपने अभीष्ट को सिद्ध करने के लिए पद्म के बीच में पाँच ह्रस्व स्वरों को लिखकर अर्द्धव्यास खींच देना चाहिए || २३ || तदनन्तर साधक को अपनी इच्छानुसार पद्मदलों, नींबू अथवा पद्मपत्रों के आकार का चित्रण करना चाहिए || २४ || अरों की सन्धियों के बीच में सूत रखकर उसे बाहर की नेमि तक ले जाय और चारों ओर घुमावे । अरे के मूल भाग को उसके सन्धिस्थान में सूत रखकर घुमावे || २५ || अर्द्धव्यास तथा परिधि के बीच के स्थान में मध्यम अरों को झुका देना चाहिए । इस प्रकार अरों की सिद्धि हो जाती है ॥२६ ॥ इसके बाद क्षेत्र को चौदह - चौदह अंगुल

के सात कोष्ठकों में विभक्त करके दो सौ छियानबे कोष्ठकों को बनाकर उसमें ' भद्र ' शब्द लिख देना चाहिए । इन कोष्ठकों को दिशाओं के नामों से अंकित पंक्तियों के द्वारा घेर देना चाहिए ॥२७-२८ ॥ तदनन्तर इन सभी पंक्तियों के ऊपर पद्मों की आकृतियाँ बना दी जाती हैं । बीच कोष्ठक में सभी दिशाओं में ग्रीवाओं का चित्रण करना चाहिए ॥२९ ॥ बाहर की ओर चार

१ ख. स्याद् बुद्ध्याधारे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 153

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एकोनत्रिंशोऽध्यायः चत्वारि बाह्यतः पश्चात्त्रीणि त्रीणि तु लीपयेत् विसृज्य बाह्यकोणेषु सप्तान्तस्त्रीणि मार्जयेत् पञ्चविंशतिकव्यूहं मण्डलं विश्वरूपगम् एवं कृते चतुर्विंशत्यधिकं तु सहस्त्रकम् भद्रकं परिलिख्याथ पार्श्वे पङ्क्ति विसृज्य तु ततोऽपि पङ्क्ति सम्मृज्य तद्वत्षोडशभद्रकम् द्वारद्वादशकं दिक्षु त्रीणि त्रीणि यथाक्रमम् ' चत्वार्यन्तर्बहिर्द्धे तु शोभार्थं परिमृज्य तु । परिमृज्य तथा शोभां पूर्ववत्परिकल्पयेत् । पञ्चविंशतिकव्यूहे परं ब्रह्म यजेत् कजे । वाराहं पूजयित्वा तु पूर्वपद्मे ततः क्रमात् । ( ' यथोक्तं व्यूहमखिलमेकस्मिन् ' मण्डले क्रमात् । सत्यस्तु मूर्तिभेदेन विभक्तं मन्यतेऽच्युतम् । १४ ९ । ग्रीवापार्श्वे बहिस्त्वेकः शोभा सा परिकीर्तिता ॥ ३० ॥

। मण्डलं नवनालं स्यान्नवव्यूहं हरिं यजेत् ॥ ३१ ॥

। द्वात्रिंशदहस्तकं क्षेत्रं भक्तं द्वात्रिंशता समम् ॥३२ ॥

। कोष्ठकानां समुद्दिष्टं मध्ये षोडशकोष्ठकैः ॥ ३३ ॥

। ततः षोडशभिः कोष्ठैर्दिक्षु भद्राष्टकं लिखेत् ॥ ३४ ॥

। लिखित्वा परितः पङ्क्ति विमृज्याथ प्रकल्पयेत् ॥३५ ॥

। षड्बहिः परिलुप्यान्तर्मध्ये चत्वारि पार्श्वयोः ॥ ३६ ॥

उपद्वारप्रसिद्ध्यर्थं त्रीण्यन्तः पञ्च बाह्यतः ॥ ३७ ॥

बहिः कोणेषु सप्तान्तस्त्रीणि कोष्ठानि मार्जयेत् ॥ ३८ ॥

मध्ये पूर्वादितः पद्ये वासुदेवादयः क्रमात् ॥ ३ ९ ॥ व्यूहान् सम्पूजयेत्तावद्यावत् षट्विंशगो भवेत् ॥ ४० ॥

यष्टव्यमिति मन्त्रेण प्रचेता मन्यतेऽध्वरम् ) ॥४१ ॥

चत्वारिंशत्करं क्षेत्रं ह्युत्तरं विभजेत्क्रमात् ॥४२ ॥

आकृतियों को बनाकर पंक्तियों के ऊपर एक - एक आकृति बना देनी चाहिए और बाहर की ओर ग्रीवा के पास में शोभाकृति का निर्माण कर देना चाहिए || ३० || बाह्यकोण के सात छोरों पर तीन - तीन बार जल छिड़कना चाहिए । इस प्रकार पीठिका का निर्माण कर लिया जाता है, जिसके ऊपर भगवान् विष्णु का पूजन किया जाता है ॥ ३१ ॥ यही पचीस व्यूहों से युक्त मण्डलाकार

पीठिका है जिसके ऊपर विश्वरूप भगवान् विष्णु का पूजन होता है । साधक को अपने हाथ से बत्तीस हाथ क्षेत्र नाप लेना चाहिए ॥३२ ॥ उसमें बने हुए सोलह बड़े - बड़े कोष्ठकों के अन्दर एक हजार चौबीस छोटे - छोटे कोष्ठक बना लिये जाते

हैं || ३३ || ' भद्र ' लिखकर और पार्श्व में पंक्ति का विसर्जन करके सभी दिशाओं में सोलह कोष्ठकों से आठ भद्रकों का चित्रण करना चाहिए ॥३४ ॥ तत्पश्चात् पंक्ति मिटाकर पुनः सोलह भद्रमण्डल लिखे । तत्पश्चात् सब ओर की एक - एक पंक्ति मिटाये

॥३५ ॥ साधक को सभी दिशाओं में तीन - तीन करके बारह द्वारों का निर्माण करके बाहर की ओर छह तथा किनारे, बीच में

और सभी दिशाओं में चार - चार द्वार बना देने चाहिए ॥ ३६ ॥ इस आकृति को सुशोभित करने के लिए बाहर और भीतर दो-दो करके चार छोरों पर तीन और बाहर की ओर पाँच द्वारों को बनाना चाहिए || ३७ || तदनन्तर पूर्व की भाँति बाह्य कोणों में

सात और किनारे की ओर तीन शोभाकृतियों को चित्रित करना चाहिए || ३८ || साधक को परब्रह्म की अर्चना पचीस व्यूह से युक्त पद्म कर करनी चाहिए और मध्य पद्म में पूर्वादि से क्रमशः वासुदेव आदि देवताओं का पूजन करना चाहिए ॥३९ ॥ प्रथम

पद्म के ऊपर वाराहावतार का यजन करके पचीसों व्यूहों की अर्चना करनी चाहिए । यह क्रम तब तक चलता रहे जब तक छब्बीसवें तत्त्व - परमात्मा का पूजन न हो ॥४० ॥ पद्म के सभी व्यूहों का पूजन सावधानीपूर्वक करना चाहिए । तदनन्तर साधक

को यज्ञ के रूप में प्रचेतस् की कल्पना करनी चाहिए ॥४१ ॥ इसे यह कल्पना करनी चाहिए कि अच्युत ही सत्य आदि रूपों

में विभक्त है । उसके बाद चालीस अंगुल क्षेत्र अलग कर लेना चाहिए ॥४२ ॥ उसे पहले सात भागों में विभाजित करके

१ घ. ‘ वभागं ह ° । २ ङ. ' म् । यवहिः परिलुप्यन्ते मध्ये । ३ क. ङ. ' जेत्कुजे । च. ' जत्कुले म ' । ४ घ. ' त्वत्रिंशगो भ ' । ५ यथोक्त " अध्वरम् ङ. पुस्तके नास्ति । ६ घ. स्मिन् पङ्कजे क्र ' । ७ क. घ. च यत्नेन । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 154

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अग्निपुराणम् १५० एकैकं सप्तधा भूयस्तथैकैकं द्विधा पुनः । कोष्ठकानां समुद्दिष्टं मध्ये षोडशकोष्ठकैः । षोडशाब्जान्यथो वीथी चतुर्विंशतिपङ्कजम् । चत्वारिंशत्ततो वीथी शेषपङ्क्तित्रयेण तु । द्विचतुष्षद्वारसिद्ध्यै चतुर्दिक्षु विलोपयेत् द्वाराणां पार्श्वयोरन्तः षट्चत्वारि च मध्यतः एकस्यां दिशि सङ्ख्याः स्युश्चतस्रः परिसङ्ख्यया पञ्च पञ्च तु कोणेषु पङ्क्तौ पङ्क्तौ क्रमात् सृजेत् चतुःषष्ट्युत्तरं सप्त शतान्येकं सहस्त्रकम् ॥४३ ॥

पार्श्वे वीथीं ततश्चाष्टभद्राण्यथ च वीथिका ॥४४ ॥

वीथीपद्यानि द्वात्रिंशत् पङ्क्तिवीथीकजान्यथ ॥ ४५ ॥

द्वारशोभोपशोभाः स्युर्दिक्षु मध्ये विलोप्य च ॥ ४६ ॥

। पञ्चत्रीण्येककं बाह्ये शोभोपद्वारसिद्धये ॥ ४७ ॥

। द्वे द्वे लुम्पेदेवमेव षड् भवन्त्युपशोभिकाः ॥४८ ॥

। एकैकस्यां दिशि त्रीणि द्वाराण्यपि भवन्त्यतः ॥ ४ ९ ॥ । कोष्ठकानि भवेदेवं सतीष्टं मण्डलं शुभम् ॥ ५० ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये सर्वतोभद्रादिमण्डलवर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ तत्पश्चात् दो, चार, छह, सात, एक सौ और एक हजार भागों में विभक्त कर देना चाहिए || ४३ || कोष्ठकों में लिखित ' भद्र ' शब्द को इनमें से सोलह कोष्ठकों से आवृत करके ' भद्र ' के निकट किनारे की ओर रेखाएँ खींच देनी चाहिए ॥४४ ॥ सोलह दल के कमल और वीथी का निर्माण करे, तत्पश्चात् चौबीस दल के कमल, वीथी, बत्तीस दल के

कमल और वीथी बनावे ॥४५ ॥ सभी दिशाओं में चालीस रेखाओं और तीन पंक्तियों से द्वारों की मुख्य तथा गौण

( मध्य भाग को छोड़कर ) शोभाकृतियाँ बना देनी चाहिए ॥ ४६ ॥ सभी दिशाओं में दो, चार या छह द्वारों का निर्माण

करना चाहिए और बाहर की ओर शोभा के लिए पाँच अथवा तीन द्वारों को बना देना चाहिए ॥४७ ॥ द्वारों के किनारे

अथवा उनके पार्श्व में छह शोभाकृतियाँ बनायी जानी चाहिए जिनमें से चार मध्य में हों और वहीं पर छह गौण शोभाकृतियों का चित्रण कर देना चाहिए ॥४८ ॥ इन सभी आकृतियों को एक ओर ही बनाना चाहिए । संख्या में

चार शोभाएँ होती हैं । प्रत्येक ओर तीन द्वार होने चाहिए ॥ ४ ९ ॥ पाँच कोणों में पाँच द्वारों का निर्माण होना चाहिए । इस प्रकार इस मण्डलाकार पवित्र वेदी में आठ कोष्ठक होते हैं ॥ ५० ॥

श्री अग्निमहापुराण में सर्वतोभद्रमण्डल वर्णन नामक उनतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२९ ॥

१ च. वीर्यं । २ घ. मत्येंष्ट्य ( ष्टं ) । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 155

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त्रिंशोऽध्यायः १५१ अथ त्रिंशोऽध्यायः सर्वतोभद्रमण्डलादिविधिकथनम् नारद उवाच मध्ये पद्मे यजेद् ब्रह्म साङ्गं पूर्वेऽब्जनाभकम् । पुरुषाद् दक्षिणे वह्निं नैर्ऋते वारुणेऽनिलम् इन्द्रादींश्च द्वितीयायां पद्मे षोडशके तथा । पृथिवीं च मनश्चैव श्रोत्रं त्वक्चक्षुरर्चयेत् । महर्जनस्तपः सत्यं तथाग्निष्टोममेव च । अतिरात्रं च सम्पूज्य तथाप्तोर्याममर्चयेत् 1 । रसं गन्धं च पद्मेषु चतुर्विंशतिषु क्रमात् 1 । वासुदेवादिमूर्तीश्च तथा चैव दशात्मकम् । घ्राणं वाक्पाणिपादं च द्वात्रिंशद्वारिजेष्विमान् ।

पायूपस्थौ च सम्पूज्य मासानां द्वादशाधिपान् ।

आग्नेयेऽब्जे च प्रकृतिं याम्येऽब्जे पुरुषं यजेत् ॥ १ ॥

। आदित्यमैन्दवे पद्ये ऋग्यजुश्चैश ' पद्मके ॥ २ ॥

सामाथर्वाणमाकाशं वायुं तेजस्तथा जलम् ॥ ३ ॥

रसनां च तथा घ्राणं भूर्भुवश्चैव षोडशम् ॥४ ॥

अत्यग्निष्टोमकं चोक्थं षोडशीं वाजपेयकम् ॥५ ॥

मनो बुद्धिमहङ्कारं ( शब्दं स्पर्शं च रूपकम् ॥६ ॥

जीवं मनो धियं चाहं प्रकृतिं ) शब्दमात्रकम् ॥७ ॥

मनः श्रोत्रं त्वचं प्रार्च्य चक्षुश्च रसनं तथा ॥ ८ ॥

चतुर्थावरणे पूज्याः साङ्गाः सपरिवारकाः ॥९ ॥

पुरुषोत्तमादिषड्विंशान् बाह्यावरणके यजेत् ॥१० ॥

अध्याय ३० सर्वतोभद्रमण्डल विधि - वर्णन नारद बोले - सर्वतोभद्रमण्डल के बने कमल के मध्य में ब्रह्मा की और पूर्वभाग में पद्मनाभ ( विष्णु ) की सांगोपांग पूजा करनी चाहिए । अग्निकोण के कमल पर प्रकृति की ओर दक्षिण ओर के कमल पर पुरुष की पूजा करनी चाहिए ॥१ ॥ पुरुष के दक्षिण ओर नैर्ऋत्यकोण में अग्नि की, पश्चिम ओर वायु की, सौम्य पद्म पर आदित्य की, ईश - पद्म

पर ऋग्यजुष् की और द्वितीय पंक्ति पर इन्द्रादि देवताओं की तथा सोलह पंखुड़ियोंवाले पद्म पर साम, अथर्व, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, मन, श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना, नासिका और भूः, भुवः स्वः आदि सोलह पदार्थों की पूजा करनी चाहिए ॥२-४ ॥ पुनः मह, जन, तप, सत्य, अग्निष्टोम, उक्थ, षोडशी, वाजपेयक और अतिरात्र की पूजा कर आप्तोर्याम की चौबीस कमलों पर पूजा करे । क्रमश: मन, बुद्धि, अहङ्कार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध को जीव, मन, धी, अहंकार, प्रकृति, शब्दतन्मात्रा, वासुदेव आदि की मूर्तियों और मन, श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना, नासिका, वाणी, पाणि, पाद आदि दस इन्द्रियों की बत्तीस कमलों पर अर्चना करे । चौथे आवरण में अंग और परिवार के सहित इन उपर्युक्त वस्तुओं की पूजा करनी चाहिए ॥५ - ९ ॥ पायु ( गुदा ) और उपस्थ ( लिङ्ग ) की पूजा करने के अनन्तर बारह मासाधिपतियों का और पुरुषोत्तम आदि छब्बीस देवों का बाह्य आवरण ( कोष्ठक ) में पूजन करना चाहिए ॥१० ॥ चक्र

१ क. ख. ग. ङ. च. ' श्चैव प ° । २ शब्द " प्रकृतिं च. पुस्तके नास्ति । ३ ख. ग. ' रिचार ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 156

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१५२ अग्निपुराणम् चक्राब्जे तेषु सम्पूज्या मासानां पतयः क्रमात् । रजःपातं ततः कुर्याल्लिखिते मण्डले शृणु ।

द्विहस्तेऽङ्गुष्ठमात्राः स्युर्हस्ते बाहुसमाः सिताः ।

केसराः रक्तपीताः स्युः कोणान् रक्तेन पूरयेत् ॥

लतावितानपत्राद्यैर्वीथिकामुपशोभयेत् । उपशोभाश्च नीलेन कोणशङ्खांश्च वै सितान् । त्रिकोणं सितरक्तेन कृष्णेन च विभूषयेत् । अरकान्पीतरक्ताभिः श्यामान्नेमिस्तु रक्ततः । शालिपिष्टादि शुक्लं स्याद्रक्तं कौसुम्भकादिकम् । शमीपत्रादिकैः श्यामं बीजानां लक्षजाप्यतः ।

अयुतं वृद्धविद्यानां स्तोत्राणां च सहस्रकम् ।

अष्टौ प्रकृतयः षड्वा पञ्च वा चतुरोऽपरे ॥११ ॥

कर्णिका पीतवर्णा स्याद्रेखाः सर्वाः सिताः समाः ॥१२ ॥

पद्मं शुक्लेन सन्धींस्तु कृष्णेन श्यामतोऽथ वा ॥१३ ॥

भूषयेद्योगपीठं तु यथेष्टं सार्ववर्णिकैः ॥ १४ ॥

पीठद्वारे तु शुक्लेन शोभा रक्तेन पूरिताः ॥१५ ॥

भद्रके पूरणं प्रोक्तमेवमन्येषु पूरणम् ॥ १६ ॥

द्विकोणं रक्तपीताभ्यां नाभिं कृष्णेन चक्रके ॥१७ ॥

सितश्यामारुणाः कृष्णाः पीता रेखास्तु बाह्यतः ॥१८ ॥

हरिद्रया च हारिद्रं कृष्णं स्याद्दग्धधान्यतः ॥१९ ॥

चतुर्लक्षैस्तु मन्त्राणां विद्यानां लक्षसाधनम् ॥२० ॥

पूर्वमेवाथ लक्षेण मन्त्रशुद्धिस्तथात्मनः ॥२१ ॥

कमल में उन कोष्ठकों में क्रमशः बारह मासाधिपतियों, आठ प्रकृतियों, छह, पाँच या चार प्रकृतियों का पूजन दूसरे कमल पर करना चाहिए || ११ || अब उन बने हुए कोष्ठकों अथवा कमल - कोष्ठकों पर किस प्रकार रँगा हुआ चूर्ण छोड़ना चाहिए, उसे भी सुनिये । कर्णिका पर पीले रंग का चूर्ण और सब रेखाओं को श्वेत चूर्ण से रँगना चाहिए ॥१२ ॥

दो हाथ की मण्डल रेखाएँ अँगूठे के बराबर होनी चाहिए । एक हाथ के मण्डल में उनकी मोटाई आधे अँगूठे के समान रखनी चाहिए । रेखाएँ श्वेत बनायी जायँ । कमल को श्वेतवर्ण से और सन्धिरेखाओं को काले अथवा श्याम रंग से बनाना चाहिए ॥१३ ॥ केसर को रक्त और पीत वर्ण से तथा कोणों को केवल लाल रंग से भरना चाहिए । योगपीठ को तो इच्छा

के अनुसार अनेक रंगों से रँग दे ॥१४ ॥ इसी प्रकार लता - वितान, पत्तियों और वीथियों को रंग से रँगकर सुशोभित

कर देना चाहिए । पीठ द्वार को श्वेत और रक्त चूर्ण से पूर्ण करके सजा देना चाहिए ॥ १५ ॥ नीले रंग से उपशोभा को

और कोण पर बने हुए शंखों को श्वेत वर्ण का बनाना चाहिए । इस प्रकार सर्वतोभद्र मण्डल में रंग भरा जाता है ॥१६ ॥

मण्डल में बने हुए त्रिकोण को श्वेत, रक्त और कृष्ण वर्ण से, द्विकोण को रक्त और पीत वर्ण से तथा चक्र की नाभि को काले रंग से रँगना चाहिए ॥१७ ॥ चक्र की अराओं को पीत, रक्त और श्याम वर्ण से तथा नेमि ( पुठिया ) को रक्त

वर्ण से रँगना चाहिए । बाहर की रेखाओं को श्वेत, श्याम, अरुण, कृष्ण और पीत - वर्ण से बनाना चाहिए ॥१८ ॥ श्वेत

रंग के लिए चावल के चूर्ण का, रक्त वर्ण के लिए कुसुम्भ के रंग का, पीले के लिए हल्दी के चूर्ण का और काले रंग के जले हुए धान्य की राख का प्रयोग करना चाहिए ॥१९ ॥ शमी की पत्तियों को श्याम रंग के उपयोग में लाना चाहिए ।

बीज - मन्त्रों का एक लाख बार जप करने से, मन्त्रों का चार लाख बार जपने से और विद्याओं को एक लाख बार जपने से सिद्धि प्राप्त होती है ॥२० ॥ वृद्ध विद्याओं को दस हजार और स्तोत्रों को एक हजार बार जपने से सिद्धि प्राप्त होती

है । पहले एक लाख जप करने से मन्त्रशुद्धि और आत्मशुद्धि होती है ॥२१ ॥ तथा अन्य एक लाख बार जपने से मन्त्र

१ ख. वाऽप्यृतवोप ' । २ घ. चार्थसमाः । ३ घ ङ. च. पीततः । ४ च. वर्णलक्षैस्तु । ५ घ. बुद्धविद्यानां । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 157

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त्रिंशोऽध्यायः १५३ तथापरेण लक्षेण मन्त्रः क्षेत्रीकृतो भवेत् । पूर्वसेवासमो होमो बीजानां सम्प्रकीर्तितः पूर्वसेवादशांशेन मन्त्रादीनां प्रकीर्तिता भुवि न्यसेद्वामपादं न गृह्णीयात्प्रतिग्रहम् मन्त्रध्यानं प्रवक्ष्यामि येन स्यान्मन्त्रजं फलम् सूक्ष्मं ज्योतिर्मयं रूपं हार्दं चिन्तामयं भवेत् वाराहसिंहशक्तीनां स्थूलं रूपं प्रधानतः ' इतरेषां स्मृतं रूपं हार्दं चिन्तामयं सदा चिन्तया रहितं रूपमैश्वरं परिकीर्तितम् बीजं जीवात्मकं ध्यायेत् कदम्बकुसुमाकृतिम् संहतः केवलस्तिष्ठेदेवं मन्त्रेश्वरो हृदि । प्रसरन्ति बहिस्तद्वन्नाडीभिर्बीजरश्मयः ।

हृदयात्प्रस्थिता नाड्यो ' दर्शनेन्द्रियगोचराः ।

सम्यगुद्धातयोगेन जित्वा देहसमीरणम् ॥। २२ ॥

। पुरश्चर्या तु मन्त्रेण मासिकं व्रतमाचरेत् ॥ २३ ॥

। एवं द्वित्रिगुणेनैव मध्यमोत्तमसिद्धयः ॥२४ ॥

। स्थूलं शब्दमयं रूपं विग्रहं बाह्यमिष्यते ॥२५ ॥

। चिन्तया रहितं यत्तु तत्परं परिकीर्तितम् ॥२६ ॥

। चिन्तया रहितं रूपं वासुदेवस्य कीर्तितम् ॥२७ ॥

। स्थूलं वैराजमाख्यातं सूक्ष्मं वै ' लिङ्गितं भवेत् ॥२८ ॥

। हृत्पुण्डरीकनिलयं चैतन्यं ज्योतिरव्ययम् ॥२९ ॥

। कुम्भान्तरगतो दीपो निरुद्धप्रसवो यथा ॥ ३० ॥

अनेकसुषिरे कुम्भे तावन्मात्रा गभस्तयः ॥ ३१ ॥

अन्त्रावभासका दैवीमात्मीकृत्य तनुं स्थितः ॥ ३२ ॥

द्वेऽग्नीसोमात्मिके तासां नाड्यौ नासाग्रसंस्थिते ॥३३ ॥

जपध्यानरतो मन्त्री मन्त्रजं फलमश्नुते ॥ ३४ ॥

का क्षेत्रीकरण होता है । बीज - मन्त्रों का पहले जितना जप किया गया हो उतना ही उनके लिए होम का भी विधान है ॥२२ ॥

अन्य मन्त्रादि के होम की संख्या पूर्व जप के दशांश के तुल्य बतायी गयी है । मन्त्रों से पुरश्चरण करने पर एक मास का व्रत करना चाहिए ॥२३ || पृथ्वी पर पहले अपना बायाँ पैर रखे और किसी का दिया दान न ले । इस प्रकार दो - तीन बार व्रत और पुरश्चरण करने से मध्यम और उत्तम श्रेणी की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं || २४ || इसके अनन्तर मन्त्रध्यान की विधि बतला रहा हूँ जिससे मन्त्र का पूर्ण फल प्राप्त होता है । मन्त्र का स्थूल शब्दमय रूप बाह्य विग्रह है ॥ २५ ॥ सूक्ष्म, ज्योतिर्मय,

चिन्तामय रूप, हार्द ( अन्तःकरण सम्बन्धी ) रूप है । चिन्ता से रहित जो रूप है वही मन्त्र का उत्कृष्ट रूप है । वराह, नृसिंह और शक्तियों के स्थूल रूप की प्रधानता रहती है । वासुदेव का रूप चिन्तारहित माना गया है ॥ २६-२७ ॥ इतर देवों को सदैव चिन्तामय हार्द रूप ही कहा गया है । स्थूल रूप को वैराज और सूक्ष्म को लिङ्गित कहा गया है ॥२८ ॥ हृत्कमल में रहनेवाले

अव्यय, चैतन्य ज्योति का जो चिन्तारहित रूप है, वही ईश्वर का रूप है ॥२९ ॥ कदम्ब के कुसुम की आकृति जो जीवात्मक

बीज है उसका ध्यान करना चाहिए । जिस प्रकार घड़े के मध्य में रखे हुए दीप की शिखा वायु - प्रवेश न होने के कारण निश्चल रहती है उसी प्रकार मन्त्रेश्वर हृदय में निश्चल और संहत भाव से रहना चाहिए । अनेक छिद्रवाले घड़े के मध्य में स्थापित दीप की किरणें छिद्रों से जिस प्रकार फैलती रहती हैं उसी प्रकार नाड़ियों से बीच की किरणें फूटकर बिखरती रहती हैं । अँतड़ियों से स्पष्ट उद्भासित होनेवाली ये बीज किरणें दैवी - प्रभा से युक्त होकर शरीर में स्थित रहती हैं ॥३०-३२ ॥ हृदय से इधर-उधर जानेवाली जो नाड़ियाँ आँख से दिखायी पड़ती हैं उनमें से दो अग्नि और सोम नाड़ियाँ नासिका के अग्र भाग में स्थित हैं ॥३३ ॥ भली - भाँति सिद्ध किये हुए योग के द्वारा शरीर की प्राणवायु को जीतकर सर्वदा जप के ध्यान में मग्न रहनेवाला

साधक मन्त्र के सम्पूर्ण फल को पाता है ॥३४ ॥ सकाम भाव से योग का अभ्यास करनेवाला योगी सम्पूर्ण भूतों और

१ क. ङ. च. विधानतः । २ ङ. त्वालिङ्गितं । ३ ख. ग. घ. च. अथावभासतो । ४ क. ङ. च. दशमेन्द्रि । ख. ग. दशनेन्द्रि ' । ५ ख. ग. ' राः येऽग्नी ' । घ. ' राः । अग्नी । ६ क. ङ. च. ' सानुसं । ७ घ. ' म्यग्गुह्येन यो ' । ८ घ. ' त्रद्धक्षणम ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 158

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अग्निपुराणम् १५४ संशुद्धभूततन्मात्रः सकामो योगमभ्यसन् । अणिमादिमवाप्नोति विरक्तः प्रविलङ्घ्य च ' ॥३५ ॥

चिदात्मको ' भूतमात्रान् मुच्यते चेन्द्रियग्रहात् ॥३६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये सर्वतोभद्रमण्डलादिविधिकथनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

अथैकत्रिंशोऽध्यायः अपामार्जनविधानम् अग्निरुवाच रक्षां स्वस्य परेषां च वक्ष्येऽपामार्जनाह्वयाम् । यथा विमुच्यते दुःखैः सुखं च प्राप्नुयान्नरः || १ ||

ॐ नमः परमार्थाय पुरुषाय महात्मने । अरूपबहुरूपाय व्यापिने परमात्मने ॥२ ॥

( " निष्कल्मषाय शुद्धाय ध्यानयोगरताय च । ) नमस्कृत्य प्रवक्ष्यामि यत्तत् सिध्यतु मे वचः ॥ ३ ॥

वराहाय नृसिंहाय वामनाय महात्मने । नमस्कृत्य प्रवक्ष्यामि यत्तत् सिध्यतु मे वचः || ४ || त्रिविक्रमाय रामाय वैकुण्ठाय नराय च । नमस्कृत्य प्रवक्ष्यामि यत्तत् सिध्यतु मे वचः ॥ ५ ॥

गुणों को शुद्ध करके अणिमादि सिद्धियों को प्राप्त करता है । इसके विपरीत विरक्त ( निष्काम ) योगी चित्स्वरूप होकर समस्त इच्छाओं से ऊपर उठकर इन्द्रियविषयों और तन्मात्राओं ( शब्द, रूप, रस आदि ) से मुक्त होकर चैतन्य रूप को प्राप्त कर लेता है ॥३५-३६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में सर्वतोभद्रमण्डलविधि - वर्णन नामक तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३० ॥

अध्याय ३१ अपामार्जन विधान अग्निदेव बोले - अब मैं अपनी तथा दूसरों की रक्षा करनेवाली अपामार्जन विधि को बतलाऊँगा । इसके द्वारा मनुष्य दुःखों से मुक्त होकर सुख प्राप्त करता है ॥१ ॥ ॐ महात्मा, अरूप, बहुरूप, निष्पाप, शुद्ध, ध्यानयोगरत,

सर्वव्यापक, परमार्थ, पुरुष परमात्मा को नमस्कार है । आज मैं ( अपामार्जनकर्त्ता ) भगवान् को नमस्कार करके जिस तत्त्व को कह रहा हूँ उससे मेरी वाणी सफल हो ॥२-३ ॥ वराह, नृसिंह और महात्मा वामन को नमस्कार कर जो कुछ बोल रहा हूँ, वह सार्थक हो ।४ ॥ त्रिविक्रम, राम, वैकुण्ठ और नर को नमस्कार करके जिस वाणी का उच्चारण कर रहा हूँ वह वाणी सिद्धिप्रदायिनी हो ॥५ ॥ हे वराह, नृसिंह, ईश, वामनेश, त्रिविक्रम, हयग्रीवेश, सर्वेश, हृषीकेश! आप

१ क. ङ. च. ' विलाप्य च । २ घ. देवात्मको । ३ क. ङ. च. ' क्ष्ये सम्मार्जनाह्व ' । घ. ' क्ष्ये तां मार्ज ' । ४ क. ङ. च. “ खं ब्रह्माप्नु ” । ५ निष्कल्मषाय " ध्यानयोगरताय च ङ. पुस्तके नास्ति । ६ ख. ग. महामुने । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 159

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एकत्रिंशोऽध्यायः वराह नरसिंहेश वामनेश त्रिविक्रम अपराजितचक्राद्यैश्चतुर्भिः परमायुधैः हरामुकस्य दुरितं सर्वं च कुशलं कुरु पराभिध्यानसहितैः प्रयुक्तं चाभिचारिकम् ॐ नमो वासुदेवाय नमः कृष्णाय खड्गिने नमः कमलकिञ्जल्कपीतनिर्मलवाससे दंष्ट्रोद्धृतक्षितिभृते त्रयीमूर्तिमते नमः । तप्तहाटककेशान्त ज्वलत्पावकलोचन । काश्यपायातिह्रस्वाय ऋग्यजुः सामभूषिणे । वराहाशेषदुष्टानि सर्वपापफलानि वै । नारसिंह करालास्य दन्तप्रान्तानलाज्ज्वल । ऋग्यजुःसामगर्भाभिर्वाग्भिर्वामनरूपधृक् । ऐकाहिकं द्वयाहिकं च तथा त्रिदिवसं ज्वरम् । १५५ । हयग्रीवेश सर्वेश हृषीकेश हराशुभम् ॥६ ॥

। अखण्डितानुभावैस्त्वं सर्वदुष्टहरो भव ॥७ ॥

। मृत्युबन्धार्तिभयदं दुरिष्टस्य च यत्फलम् ॥८ ॥.

। गरस्पर्शमहारोगप्रयोगं जरया जर ॥९ ॥

। नमः पुष्करनेत्राय केशवायादिचक्रिणे ॥१० ॥

। महाहयरिपुस्कन्धधृष्टचक्राय * चक्रिणे ॥११ ॥

महायज्ञवराहाय शेषभागाङ्कशायिने ॥१२ ॥

वज्राधिकनखस्पर्श दिव्यसिंह नमोऽस्तु ते ॥ १३ ॥

तुभ्यं वामनरूपायाक्रमते गां नमो नमः ॥ १४ ॥

मर्द मर्द महादंष्ट्र मर्द मर्द च तत्फलम् ॥१५ ॥

भञ्ज भञ्ज निनादेन दुष्टान् पश्यार्तिनाशन ' ॥ १६ ॥

प्रशमं सर्वदुःखानि नयत्वस्य जनार्दनः ॥१७ ॥

चातुर्थिकं तथात्युग्रं तथैव सततं ज्वरम् ॥ १८ ॥

अब हमारे अमङ्गल नाश कीजिये || ६ || अपने चक्र आदि चारों परमायुधों के कारण अपराजित आप अपने व्यापक और नित्य अनुभावों से सब दुष्टों का संहार करें ॥७ ॥ अमुक व्यक्ति के दुर्योगों और पापों को नष्ट कर उसे कुशल करें । मृत्युबन्धन

तथा अनिष्ट से भयप्रद फल, दुर्देयों के फल, दूसरों के द्वारा प्रयुक्त हुए अभिचार तथा विषस्पर्श एवं महारोग से उत्पन्न होनेवाले फल को शीघ्र ही जरा से जीर्ण कर दें ॥८ - ९ ॥ ॐ वासुदेव को नमस्कार है । खड्गधारी कृष्ण को नमस्कार है । कमलनेत्र केशव और चक्रधर को नमस्कार है ॥१० ॥ कमल - किञ्जल्क के समान पीत और निर्मल वस्त्र को धारण करनेवाले, रण

में शत्रुओं के गर्दन को काट देनेवाले और चक्र धारण करनेवाले को नमस्कार है ॥११ ॥ अपने दाँतों पर पाताल से उठायी

हुई पृथ्वी को धारण करनेवाले ( वराह ) और त्रिमूर्तिमान् को नमस्कार है । महायज्ञ वराह और शेषनाग के फनों पर शयन करनेवाले ( भगवान् विष्णु ) को नमस्कार है || १२ || तप्त स्वर्ण के समान सुनहले केशोंवाले, जलती हुई अग्नि के समान नेत्रवाले, वज्र से भी कठोर नख को धारण करनेवाले हे अलौकिक सिंह! आपको नमस्कार है ॥१३ ॥ अति लघु रूप धारण

करनेवाले, ऋक्, यजु और साम से सुशोभित तथा पृथ्वी को अपने पगों से नापनेवाले वामनरूपधारी आपको बार - बार नमस्कार है ॥१४ ॥ हे वराह! सम्पूर्ण अशुभों और पापफलों को नष्ट कीजिये, नष्ट कीजिये । हे महादंष्ट्र! उन पापफलों को रौंद दो,

रौंद दो ॥१५ ॥ हे नृसिंह! करालमुख! दन्त - पंक्तियों की उज्ज्वल प्रभा से प्रभावित! हे पीड़ा - भंजक! देखिये! आप अपने

गम्भीर गर्जन से इन दुष्ट शत्रुओं को नष्ट कीजिये, नष्ट कीजिये ॥१६ ॥ वामनरूपधारिन् जनार्दन! अपनी ऋक्, यजुः और

सामगर्भित वाणी से इस व्यक्ति के सब दुःखों को शान्त कर दीजिये || १७ || गोविन्द! एक दिन बाद आनेवाले, दो दिन बाद आनेवाले अथवा तीन दिनों के बाद आनेवाले ज्वर को, चार दिन के बाद आनेवाले उग्र ज्वर को, सदा रहनेवाले ज्वर १ ख. ग. दुरितस्य । २ घ. गदस्थ । ३ ख. मो भगवते वा । ४ घ. हरिरिपुस्कन्दसृष्ट ' । ५ घ. ' शाग्रज्व ' । ६ क. ख. ग. ङ. च. ' पायसृजते । ७ ङ. नर्द । ८ क. घ. ङ. च. ' ष्टानस्यातिं । ९ क. ङ. ' नार्दितान् । ऋ । १० ङ. ' र्वदुष्टानि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 160

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१५६ अग्निपुराणम् दोषोत्थं सन्निपातात्थं तथैवागन्तुकं ज्वरम् नेत्रदुःखं शिरोदुःखं दुःखं चोदरसम्भवम् गुदघ्राणाङ्घ्रिरोगांश्च कुष्ठरोगांस्तथा क्षयम् भगन्दरातिसारांश्च मुखरोगांश्च वल्गुलीम् ये वातप्रभवा रोगा ये च पित्तसमुद्भवा आगन्तुकाश्च ये रोगा लूताविस्फोटकादयः विलयं यान्तु ते सर्वे विष्णोरुच्चारणेन च अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् स्थावरं जङ्गमं वापि कृत्रिमं चापि यद् विषम् लूतादिप्रभवं यच्च विषमन्यत्तु दुःखदम् ग्रहान् प्रेतग्रहांश्चापि तथा वै डाकिनीग्रहान् । शकुनीपूतनाद्यांश्च तथा वैनायकान्ग्रहान् । वृद्धिकाख्यान् ग्रहांश्चोग्रांस्तथा मातृग्रहानपि वृद्धाश्च ये ग्रहाः केचिद्ये च बालग्रहाः क्वचित् सटाकरालवदनो ' नारसिंहो महाबलः नरसिंह महासिंह ज्वालामालोज्ज्वलानन ॥ शमं नयाशु गोविन्द छिन्धि छिन्ध्यस्य वेदनाम् ॥१९ ॥

। अनिश्वासमतिश्वासं परितापं सवेपथुम् ॥२० ॥

। कामलादींस्तथा रोगान् प्रमेहांश्चातिदारुणान् ॥ २१ ॥

। अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रांश्च रोगानन्यांश्च दारुणान् ॥ २२ ॥

। कफोद्भवाश्च ये केचिद्ये चान्ये सान्निपातिकाः ॥ २३ ॥

। ते सर्वे प्रशमं यान्तु वासुदेवस्य कीर्तनात् ॥२४ ॥

। क्षयं गच्छन्तु चाशेषास्ते चक्राभिहता हरेः ॥ २५ ॥

। नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥२६ ॥

। दन्तोद्भवं नखभवमाकाशप्रभवं विषम् ॥२७ ॥

। शमं नयतु तत् सर्वं वासुदेवस्य कीर्तनम् ॥२८ ॥

वेतालांश्च पिशाचांश्च गन्धर्वान् यक्षराक्षसान् ' ॥२९ ॥

मुखमण्डी तथा क्रूरां रेवतीं वृद्धरेवतीम् ॥ ३० ॥

। बालस्य विष्णोश्चरितं हन्तु बालग्रहानिमान् ॥ ३१ ॥

। नरसिंहस्य ते दृष्ट्या दग्धा ये चापि यौवने ॥ ३२ ॥

। ग्रहानशेषान्निःशेषान्करोतु जगतो हितः ॥३३ ॥

ग्रहानशेषान् सर्वेश खाद खादाग्निलोचन ॥ ३४ ॥

को, दोष - ज्वर, सन्निपात - ज्वर और भविष्य में आनेवाले ज्वर को शीघ्र शान्त कीजिये । इस व्यक्ति की सब वेदनाओं का हरण कर लीजिये ॥१८ - १ ९ ॥ नेत्रपीड़ा, सिर- पीड़ा, उदर- पीड़ा, साँस रुक - रुककर आना, दमा, कम्पन, परिताप, गुदा, नासिका और पैर के रोग, कुष्ठादि रोग तथा क्षय रोग, कामादि रोग, प्रमेह आदि दारुण रोग, भगन्दर, अतिसार, मुखरोग, वल्गुली, अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, और अन्यान्य रोग, वातजन्य और पित्तजन्य व्याधियों अथवा कफजन्य रोग, सान्निपातिक रोग, लूता, विस्फोटक आदि आगन्तुक रोग वासुदेव के नाम - कीर्त्तन से शीघ्र ही दूर हो जायँ ॥२०- २४ ॥ ये सब रोग विष्णु के नामोच्चारण से नष्ट हो जायँ और विष्णुचक्र के प्रहार से भी रोग नष्ट हो जायँ ॥ २५ ॥ मैं सच - सच कहता हूँ कि अच्युत, अनन्त और गोविन्द

नामोच्चारणरूपी ओषधि से सब रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ २६ ॥ स्थावर, जंगम या कृत्रिम विष को दाँत, नख या आकाश

से उत्पन्न होनेवाले या अन्य दुःखदायी विषों को वासुदेव का नाम - कीर्त्तन शान्त कर दे ॥ २७-२८ ॥ ग्रह, प्रेतग्रह, डाकिनीग्रह, बेताल, पिशाच, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, शकुनी, पूतना आदि, वैनायक, ग्रह, मुखमण्डी, क्रूर रेवती, वृद्ध रेवती, उग्र वृद्धिक नाम के ग्रह तथा उग्र मातृग्रह इन बालग्रहों को बालक रूपधारी विष्णु का चरित्र ( कृष्णलीला ) नष्ट करे ॥२९ -३१ ॥ जो कोई वृद्धग्रह, बालग्रह अथवा नरसिंह की अग्निदृष्टि से यौवन में ही भस्म होनेवाले ग्रह हैं उनको अपनी सटा ( केसर ) से विकराल वदनवाले महाबली नृसिंह संसार के कल्याण के लिए नष्ट कर दें ॥३२-३३ ॥ हे नरसिंह! महासिंह ज्वाला - माला से प्रकाशपूर्ण आननवाले अग्निलोचन! सर्वेश! सब अशुभ ग्रहों को खा जाइये, खा जाइये ॥३४ ॥ इसके जितने

ख. ग. १ पुस्तकयोरधिकं घ. अन्तःश्वा । २ क. देवस्य चाज्ञया । वि । ३ अत्र भगन्दरातिसारांश्च कुष्ठरोगांस्तथा क्षयम् । इत्येतच्छ्लोकार्द्धं ७ क. ङ. च. ' हांश्चान्यांस्त वर्तते ॥ ४ ८ क घ.. सदा ख. ग क. ' घ ।. ९ च. ङ. कीर्तितोऽस्य हरिः । जनार्दनः । ५ क. ङ. ' न् । वासुकीपू ' । ६ घ. वृद्धका । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA