अग्नि पुराण — पृष्ठ 191–200

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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द्विचत्वारिंशोऽध्यायः १८७ देवागारं करोमीति मनसा यस्तु चिन्तयेत् । तस्य कायगतं पापं तदह्ना हि प्रणश्यति ॥३३ ॥

कृते तु किं पुनस्तस्य प्रासादे विधिनैव तु । अष्टेष्टकासमायुक्तं यः कुर्याद् देवतालयम् ॥३४ ॥

न तस्य फलसम्पत्तिर्वक्तुं शक्येत केनचित् । अनेनैवानुमेयं हि फलं प्रासादविस्तरात् ॥३५ ॥

ग्राममध्ये च पूर्वस्यां प्रत्यग्द्वारं प्रकल्पयेत् । विदिशासु च सर्वासु ग्रामप्रत्यङ्मुखं भवेत् ॥ ३६ ॥

दक्षिणे चोत्तरे चैव पश्चिमे प्राङ्मुखं भवेत् ॥३७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये सर्वशिलाविन्यासविधानादिकथनं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४१ ॥

अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः प्रासादलक्षणकथनम् हयग्रीव उवाच प्रासादं सम्प्रवक्ष्यामि सर्वसाधारणं शृणु । चतुरस्त्रीकृतं क्षेत्रं भजेत्षोडशधा बुधः ॥ १ ॥

मध्ये तस्य चतुर्भिस्तु कुर्यादायसमन्वितम् । द्वादशैव तु भागांश्च भित्त्यर्थं परिकल्पयेत् ॥२ ॥

‘ मैं देवमन्दिर बनवा रहा हूँ ' - ऐसा जो मन से चिन्तन भी करता है, उसका शारीरिक पाप उसी दिन नष्ट हो जाता है ॥३३ ॥- तो जो विधान के अनुकूल मन्दिर बनवा देता है उसके विषय में क्या कहा जाय? जो व्यक्ति अष्ट

इष्टका से युक्त मन्दिर ( भी ) बनवाता है उसके पुण्य - फल का तो कोई वर्णन करने में समर्थ ही नहीं हो सकता । इसी से देव प्रासाद - निर्माण के विस्तृत फल - सम्पत्ति का अनुमान कर लेना चाहिए ॥३४-३५ ॥ गाँव के बीच में अथवा गाँव के पूरब में बने हुए मन्दिर के द्वार का मुख पश्चिम की ओर होना चाहिए । सभी दिक्कोणों में बने हुए मन्दिरों के द्वार पश्चिमाभिमुख होने चाहिए । दक्षिण, उत्तर और पश्चिम में बने मन्दिरों का द्वार पूरब की ओर होना चाहिए ॥३६-३७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में सर्वशिलाविन्यासविधान वर्णन नामक इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥४१ ॥

अध्याय ४२ प्रासादलक्षण - वर्णन हयग्रीव बोले - अब मैं सर्वसाधारण प्रासाद ( निर्माण - विधि ) के विषय में बतला रहा हूँ, उसे सुनो । बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिए कि वह एक चौकोर भूभाग को सोलह भागों में विभक्त करे । इनमें से बीच के चार भागों को आय सहित गर्भ ( मन्दिर के भीतरी भाग की रिक्त भूमि ) निश्चित करे तथा शेष बारह भागों को दीवार उठाने के लिए नियत करे ॥१-२ ॥ उक्त बारह भागों में से चार भाग की जितनी लम्बाई है, उतनी ही ऊँचाई प्रासाद के दीवारों १ ख. ग. घ. पूर्वे च । ङ. च. मध्ये च । २ घ. ग्रामे प्रत्यङ्मुखी भ ' । ३ घ. प्राङ्मुखो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 192

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१८८ अग्निपुराणम् जङ्घोच्छ्रायस्तु कर्तव्यश्चतुर्भागेण चायतः तुर्यभागेण मञ्जर्याः कार्यः सम्यक्प्रदक्षिणः शिखरेण समं कार्यमग्रे जगति विस्तरम् विस्तारान्मण्डपस्याग्रे गर्भसूत्रद्वयेन तु प्रासादगर्भमानं वा कुर्वीत मुखमण्डपम् शुकान्प्राग्द्वारविन्यासे ( ` पादान्तः स्थान्यजेत् सुरान् ) सर्वसाधारणं चैतत् प्रासादस्य च लक्षणम् प्रतिमायाः प्रमाणेन कर्तव्या पिण्डिका शुभा भित्तेरायाममानेन उत्सेधं तु प्रकल्पयेत् शिखरस्य तु तुर्येण भ्रमणं परिकल्पयेत् अष्टमांशेन गर्भस्य रथकानां तु निर्गमः तत्तृतीयेन वा कुर्याद्रथकानां तु निर्गमः । जङ्घाया द्विगुणोच्छ्रायो मञ्जर्याः कल्पयेद् बुधः ॥३ ॥

। तन्माननिगमः कार्य उभयोः पार्श्वयोः समः ॥ ४ ॥

। द्विगुणेनापि कर्तव्यं यथाशोभानुरूपतः ॥ ५ ॥

। दैर्ध्यात्पादादिकं कुर्यान्मध्यस्तम्भैर्विभूषितम् ॥ ६ ॥

। एकाशीतिपदैर्वास्तुं पश्चान्मण्डपमारभेत् ॥७ ॥

। तथा प्राकारविन्यासे यजेद् द्वात्रिंशदन्तगान् ॥ ८ ॥

। मानेन प्रतिमाया वा प्रासादमपरं शृणु ॥९ ॥

। गर्भस्तु पिण्डिकार्धेन गर्भमानास्तु भित्तयः ॥ १० ॥

। भित्युच्छ्रायात्तु द्विगुणं शिखरं कल्पयेद् बुधः ॥ ११ ॥ शिखरस्य चतुर्थेन अग्रतो मुखमण्डपम् ॥ १२ ॥

। परिधेर्गुणभागेन रथकांस्तत्र कल्पयेत् ॥१३ ॥

। वामत्रयं स्थापनीयं रथकत्रितये सदा ॥ १४ ॥

शिखरार्थं हि सूत्राणि चत्वारि विनिपातयेत् । शुकनासोर्ध्वतः सूत्रं तिर्यग्भूतं निपातयेत् ॥ १५ ॥

की होनी चाहिए । विद्वान् पुरुष दीवारों की ऊँचाई से दुगुनी शिखर की ऊँचाई रखे || ३ || शिखर के चौथे भाग की ऊँचाई के अनुसार मन्दिर की परिक्रमा की ऊँचाई रखे । उसी मान के अनुसार दोनों पार्श्व भागों में निकलने का मार्ग ( द्वार ) बनाना चाहिए । वे द्वार एक - दूसरे के समान होने चाहिए || ४ || मन्दिर के सामने के भूभाग का विस्तार भी शिखर ( की ऊँचाई ) के बराबर करना चाहिए । सुन्दरता के अनुसार उसका विस्तार दुगुना भी किया जा सकता है ॥५ ॥ मन्दिर के आगे सभामण्डप विस्तार में मन्दिर के गर्भसूत्र से दूना होना चाहिए । मन्दिर के पाद - स्तम्भ आदि

भित्ति के बराबर ही बनाये जायँ । वे मध्यवर्ती स्तम्भों से विभूषित हों || ६ || अथवा मन्दिर के गर्भ का जो मान है, वही उसके मुखमण्डप ( सभामण्डप या जगमोहन ) का भी रखे । तत्पश्चात् इक्यासी पदों ( स्थानों ) से युक्त वास्तु-मण्डप का आरम्भ करे || ७ || अग्र द्वार पर शुकों का, निर्गत द्वार पर देवताओं का और चारों ओर की दीवारों पर बत्तीस अन्तगों का पूजन होना चाहिए || ८ || यह तो रहा प्रासादों का सर्वसाधारण लक्षण । अब मैं प्रतिमा के मान से बनाये जानेवाले अन्य प्रासादों के सम्बन्ध में बताता हूँ, उसे भी सुनो ॥९ ॥ जितनी बड़ी प्रतिमा हो, उतनी बड़ी

सुन्दर पिण्डी बनाये । पिण्डी के आधे मान से गर्भ का निर्माण करे और गर्भ के मान के ही अनुसार भित्तियाँ उठाये ॥१० ॥ भीतों की लम्बाई के अनुसार ही उनकी ऊँचाई रखे । विद्वान् पुरुष भीत की ऊँचाई से दुगुनी शिखर की ऊँचाई

कराये ॥११ ॥ शिखर की ऊँचाई की चौथाई के बराबर परिक्रमा का निर्माण कराये और इसी प्रमाण का मुखमण्डप

भी होना चाहिए ॥१२ ॥ गर्भ के अष्टमांश से रथकों का निर्गम बनाना चाहिए । अथवा रथकों का निर्गम परिधि के

तृतीयांश से भी बनाया जा सकता है ॥१३ ॥ अथवा उनके भी तृतीय भाग के माप का उन रथों के निकलने के मार्ग

( द्वार ) का निर्माण करावे । तीन रथकों पर सदा तीन वामों की स्थापना करे ॥१४ ॥ शिखर के लिए चार सूत्रों का

निपातन करे । शुकनासा के ऊपर से सूत को तिरछा गिरावे ॥ १५ ॥ शिखर के आधे भाग में सिंह की प्रतिमा का

१ क. ङ. च. कार्या । २ क. ङ. च. क्षिणा । ' त । ३ च. पुस्तके पादान्त सुरान् नास्ति । ४ ख. ॰न्तकान् । ५ क. ख. च. शिखरार्थं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 193

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द्विचत्वारिंशोऽध्यायः शिखरस्यार्धभागस्थं सिंहं तत्र तु कारयेत् अपरे च तथा पार्श्वे तद्वत्सूत्रं विधारयेत् ' स्कन्धभग्नं न कर्तव्यं विकरालं तथैव च विस्ताराद् द्विगुणं द्वारं कर्तव्यं तु सुशोभनम् द्वारस्य तु चतुर्थांशे कार्यौ चण्डप्रचण्डकौ । दिग्गजैः स्नाप्यमानां तां घटैः साब्जां सुरूपिकाम् । प्रासादात्पादहीनं तु गोपुरस्योच्छ्रयो भवेत् । गारुडं मण्डपं चाग्रे एकं भौमादिधाम च । पूर्वे वराहं दक्षे च नृसिंहं श्रीधरं जले । नैर्ऋत्यां रामकं वायौ वामनं वासुदेवकम् । द्वारस्य चाष्टमाद्यंशं त्यक्त्वा वेधो न दोषभाक् १८ ९ । शुकनासां स्थिरीकृत्य मध्यसन्धौ विधारयेत् ॥ १६ ॥

। तदूर्ध्वं तु भवेद्वेदी सकण्ठासनसारकम् ॥१७ ॥

। ऊर्ध्वं तु वेदिकामानात्कलशं परिकल्पयेत् ॥१८ ॥

। उदुम्बरौ तदूर्ध्वं च न्यसेच्छाखां सुमङ्गलैः ॥१९ ॥

विष्वक्सेनो वत्सदण्डो शाखार्थोदुम्बरे श्रियम् ॥२० ॥

प्रासादस्य चतुर्थांशैः प्राकारस्योच्छ्रयो भवेत् ॥ २१ ॥

पञ्चहस्तस्य देवस्य एकहस्ता तु पीठिका ॥ २२ ॥

कुर्याद् द्विप्रतिमायामं दिक्षु चाष्टासु चोपरि ॥२३ ॥

उत्तरे तु हयग्रीवमाग्नेय्यां जामदग्न्यकम् ॥२४ ॥

ईशे प्रासादरचना देया वस्वर्ककादिभिः ॥ २५ ॥

॥२६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये प्रासादादीनां लक्षण - वर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४२ ॥

निर्माण करावे । शुकनासा पर सूत को स्थिर करके उसे मध्य सन्धि तक ले जाय || १६ || इसी प्रकार दूसरे पार्श्व में भी सूत्रपात करे । शुकनासा के ऊपर वेदी हो और वेदी के ऊपर आसनसार नामक कण्ठ सहित कलश का निर्माण कराया जाय ॥१७ ॥ ( सिंह के ) ऊपर स्कन्ध का भंग नहीं होना चाहिए और न ही उसे विकराल बनाना चाहिए । वेदी के मान

से ऊपर ही कलश की कल्पना करनी चाहिए || १८ || मन्दिर के द्वार की जितनी चौड़ाई हो, उससे दुगुनी उसकी ऊँचाई रखनी चाहिए । द्वार को बहुत ही सुन्दर और शोभायमान बनाना चाहिए । द्वार के ऊपरी भाग में सुन्दर मंगलमय वस्तुओं के साथ गूलर की दो शाखाएँ स्थापित करे ( खुदवाये ) ॥१९ ॥ द्वार के चतुर्थांश में चण्ड, प्रचण्ड, विष्वक्सेन और वत्सदण्ड

इन चार द्वारपालों की मूर्तियों का निर्माण करना चाहिए । गूलर की शाखा के अर्ध - भाग में लक्ष्मी देवी के श्रीविग्रह को अंकित करे ॥२० ॥ ( उस लक्ष्मी को ) दिग्गज कलश के द्वारा नहला रहे हों, उसके हाथ में कमल हो और वह सुन्दर

रूपवाली हो । मन्दिर के परकोटे की ऊँचाई उसके चतुर्थांश के बराबर हो ॥ २१ ॥ प्रासाद की ऊँचाई गोपुर की होती है ।

पाँच हाथ ऊँचे देवता की पीठिका एक हाथ ऊँची होती है ॥२२ ॥ विष्णु मन्दिर के सामने एक गरुड़ - मण्डप तथा भौमादि-धाम का निर्माण करे । भगवान् के श्रीविग्रह के सब ओर आठों दिशाओं के ऊपरी भाग में भगवत्प्रतिमा से दुगुनी अवतारों

की मूर्तियाँ बनावे ॥२३ ॥ पूर्व दिशा में वराह, दक्षिण में नृसिंह, पश्चिम में श्रीधर, उत्तर में हयग्रीव और अग्निकोण में

परशुराम की मूर्ति का निर्माण करना चाहिए || २४ || नैर्ऋत्यकोण में श्रीराम, वायव्यकोण में वामन तथा ईशानकोण में वासुदेव की मूर्ति का निर्माण करे । प्रासाद - रचना, आठ, बारह आदि सम संख्यावाले स्तम्भों द्वारा करनी चाहिए ॥२५ ॥

द्वार के अष्टम आदि अंश को छोड़कर जो वेध होता है वह दोषकारक नहीं होता ॥२६ ॥

श्री अग्निमहापुराण में प्रासादलक्षण - वर्णन नामक बयालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥४२ ॥

१ थ. च. निधापयेत् । २ ख. ' ण्ठासनसारकम् । घ. ण्ठर्धं मनं । ३ घ. शिखोर्ध्वोदुम्बरे । ४ थ. कुर्याद्धि प्रतिमायां तु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 194

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अग्निपुराणम् १ ९ ० अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः प्रासाददेवतास्थापनभूतशान्त्यादिकथनम् हयग्रीव उवाच प्रासादे देवताः स्थाप्या वक्ष्ये ब्रह्मञ्शृणुष्व मे । पञ्चायतनमध्ये तु वासुदेवं वामनं नृहरिं चाश्वशीर्षं तद्वच्च शूरकम् । आग्नेये नैर्ऋते चैव वायव्ये अथ नारायणं मध्ये ह्याग्नेय्यामम्बिकां न्यसेत् । नैर्ऋत्यां भास्करं वायौ ब्रह्माणं अथवा रुद्ररूपं तु अथवा नवधामसु । वासुदेवं न्यसेन्मध्ये पूर्वादौ इन्द्रादींल्लोकपालांश्च अथवा नवधामसु । पञ्चायतनकं कुर्यान्मध्ये तु निवेशयेत् ॥१ ॥

चेशगोचरे || २ || लिङ्गमीशके || ३ || रामरामकान् ' ॥४ ॥

पुरुषोत्तमम् ॥५ ॥

लक्ष्मीवैश्रवणौ पूर्वे दक्षे मातृगणं न्यसेत् । स्कन्दं गणेशमीशानं सूर्यादीन्पश्चिमे ग्रहान् ॥ ६ ॥

उत्तरे दश मत्स्यादीनाग्नेय्यां चण्डिकां तथा । नैर्ऋत्यामम्बिकां स्थाप्य वायव्ये तु सरस्वतीम् || ७ || पदमामैशे वासुदेवं मध्ये नारायणं च वा । त्रयोदशालये मध्ये विश्वरूपं न्यसेद्धरिम् || ८ ॥ अध्याय ४३ प्रासाददेवतास्थापन एवं भूतशान्तिविधान हयग्रीव बोले - ब्रह्मन्! अब मैं मन्दिर में स्थापित करने योग्य देवताओं का वर्णन करूँगा, आप सुनें । पञ्चायतन मन्दिर में जो बीच का प्रधान मन्दिर हो, उसमें भगवान् वासुदेव को स्थापित करे । शेष चार मन्दिरों में से अग्निकोणवाले मन्दिर में भगवान् वामन की, नैर्ऋत्यकोण में नरसिंह की, वायव्यकोण में हयग्रीव की और ईशानकोण में वराह भगवान् की स्थापना करे ॥१-२ ॥ अथवा यदि बीच में भगवान् नारायण की स्थापना करे तो अग्निकोण में दुर्गा की, नैर्ऋत्यकोण में सूर्य की, वायव्यकोण में ब्रह्मा की और ईशानकोण में लिङ्गमय शिव की स्थापना करे । अथवा ईशान में रुद्र रूप की स्थापना करे । अथवा एक - एक आठ दिशाओं में और एक बीच में- इस प्रकार कुल नौ मन्दिर बनवाये । उनमें से बीच में वासुदेव की स्थापना करे और पूर्वादि दिशाओं में परशुराम - राम आदि नौ अवतारों की तथा इन्द्र आदि लोकपालों की स्थापना करनी चाहिए । अथवा कुल नौ धामों में पाँच मन्दिर मुख्य बनवाये । इनके मध्य में भगवान् पुरुषोत्तम की स्थापना करे ॥३-५ ॥ पूर्व दिशा में लक्ष्मी और कुबेर की, दक्षिण में मातृकागण, स्कन्द, गणेश और शिव की, पश्चिम में सूर्य आदि नौ ग्रहों की तथा उत्तर में मत्स्य आदि दस अवतारों की स्थापना करे, इसी प्रकार अग्निकोण में चण्डी की, नैर्ऋत्यकोण में अम्बिका की, वायव्यकोण में सरस्वती की और ईशानकोण में लक्ष्मी जी की स्थापना करनी चाहिए । मध्यभाग में वासुदेव अथवा नारायण की स्थापना करे । अथवा तेरह कमरोंवाले देवालय के मध्य में विश्वरूप भगवान् विष्णु की स्थापना करे ॥६-८ ॥ पूर्व आदि दिशाओं में केशव आदि द्वादश विग्रहों १ ख. ग. घ. वामवामकान् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 195

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त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः १ ९ १ पूर्वादौ केशवादीन्वा अन्यधामस्वयं हरिः ' । मृन्मयी दारुघटिता लोहजा रत्नजा तथा ॥९ ॥

शैलजा गन्धजा चैव कौमी सप्तधा स्मृता । कौसुमी गन्धजा चैव मृन्मयी प्रतिमा तथा ॥१० ॥

तत्कालपूजिताश्चैताः सर्वकामफलप्रदाः । अथ शैलमयीं वक्ष्ये शिला यत्र च गृह्यते ॥११ ॥

पर्वतानामभावे च गृह्णीयाद्भूगतां शिलाम् । पाण्डुरा ह्यरुणा पीता कृष्णा शस्ता तु वर्णिनाम् ॥१२ ॥

न यदा लभ्यते सम्यग्वर्णिनां वर्णतः शिला । वर्णाद्यापादनं तत्र जुहुयात्सिंहविद्यया॥१३ ॥

शिलायां शुक्लरेखाग्य्रा कृष्णाग्ग्रा सिंहहोमतः । कांस्यघण्टानिनादा स्यात्पुंल्लिङ्गा विस्फुलिङ्गका ॥१४ ॥

तन्मन्दलक्षणा स्त्री स्यद्रूपाभावान्नपुंसका । दृश्यते मण्डलं यस्यां सगर्भा तां विवर्जयेत् ॥१५ ॥

प्रतिमार्थं धनं दत्त्वा वनयागं समाचरेत् । तत्र खात्वोपलिप्याथ मण्डपे तु हरिं यजेत् ॥ १६ ॥

बलिं दत्त्वा कर्मशस्त्रं टङ्कादिकमथार्चयेत् । हुत्वाथ शालितोयेन अस्त्रेण प्रोक्षयेच्छिलाम् ॥१७ ॥

रक्षां कृत्वा नृसिंहेन मूलमन्त्रेण पूजयेत् । हुत्वा पूर्णाहुतिं दद्यात्ततो भूतबलिं गुरुः ॥ १८ ॥

को स्थापित करे तथा इनसे अतिरिक्त गृहों में साक्षात् श्रीहरि ही विराजमान होते हैं । भगवान् की प्रतिमा मिट्टी, लकड़ी, लोहा, रत्न, पत्थर, चन्दन और फूल - इन सात वस्तुओं की बनी हुई सात प्रकार की मानी जाती है । फूल, मिट्टी तथा चन्दन की बनी हुई प्रतिमाएँ बनने के बाद तुरन्त पूजी जाती हैं ( अधिक काल के लिए नहीं होतीं । ) । पूजन करने पर ये समस्त कामनाओं को पूर्ण करती हैं । अब मैं शैलमयी प्रतिमा का वर्णन करता हूँ, जहाँ प्रतिमा बनाने में शिला ( पत्थर ) का उपयोग किया जाता है ॥९ -११ ॥ उत्तम तो यह है कि किसी पर्वत का पत्थर लाकर प्रतिमा बनवाये । पर्वतों के अभाव में जमीन से निकले हुए पत्थर का उपयोग करे । ब्राह्मण आदि चारों वर्णवालों के लिए क्रमशः सफेद, लाल, पीला और काला पत्थर उत्तम माना गया है । यदि ब्राह्मण आदि वर्णवालों को उनके वर्ण के अनुकूल उत्तम शिला न मिले तो उसमें आवश्यक वर्ण की कमी की पूर्ति करने के लिए नरसिंह - मन्त्र से हवन करना चाहिए । यदि शिला में सफेद रेखा हो तो वह बहुत ही उत्तम है, अगर काली रेखा हो तो वह नरसिंह-मन्त्र से हवन करने पर उत्तम होती है । यदि शिला से काँसे के बने हुए घण्टे की - सी आवाज निकलती हो और काटने पर उससे चिनगारियाँ निकलती हों तो वह पुंल्लिङ्ग है, ऐसा समझना चाहिए । यदि उपर्युक्त चिह्न उसमें कम दिखायी दें; तो उसे स्त्रीलिङ्ग समझना चाहिए और पुंल्लिङ्ग - स्त्रीलिङ्ग - बोधक कोई रूप न होने पर उसे नपुंसक समझना चाहिए । तथा जिस शिला में कोई मण्डल का चिह्न दिखायी दे उसे सगर्भा समझकर त्याग देना चाहिए ॥१२-१५ ॥ प्रतिमा बनाने के लिए वन में जाकर वनयाग आरम्भ करना चाहिए । वहाँ कुण्ड खोदकर और उसे लीपकर मण्डप में भगवान् विष्णु का पूजन करना चाहिए तथा उन्हें बलि समर्पण कर कर्म में उपयोगी टंक आदि शास्त्रों की भी पूजा करनी चाहिए । फिर हवन करने के बाद अगहनी के चावल के जल से अस्त्र - मन्त्र ( अस्त्राय फट् ) के उच्चारणपूर्वक उस शिला को सींचना चाहिए । नरसिंह - मन्त्र से उसकी रक्षा करके मूल - मन्त्र ( ॐ नमो नारायणाय ) से पूजन करे । फिर पूर्णाहुति होम करके आचार्य भूतों के लिए बलि समर्पित करे । वहाँ जो भी अव्यक्त १ घ. हरिम् । ङ. भुवि । २ ङ. कौमुदी दशधा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 196

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१ ९ २ अग्निपुराणम् अत्र ये संस्थिताः सत्त्वा यातुधानाश्च गुह्यकाः । प्रतिबिम्बार्थमस्माकं यात्रैषा केशवाज्ञया । अनेन बलिदानेन प्रीता भवत सर्वथा । एवं प्रबोधिता मुक्त्वा यान्ति तृप्ता यथासुखम् । ॐ नमः सकललोकाय विष्णवे प्रभविष्णवे । आचक्ष्व देव देवेश प्रसुप्तोऽस्मि तवान्तिकम् । ॐ ॐ हुं फट् विष्णवे स्वाहा । प्रातरर्घ्यं शिलायां तु दत्त्वास्त्रेणास्त्रकं यजेत् । आत्मानं चिन्तयेद्विष्णुं शिल्पिनं विश्वकर्मिणम् जितेन्द्रियष्टङ्कहस्तः शिल्पी तु चतुरस्रकाम् रथे स्थाप्य समानीय सवस्त्रां कारुवेश्मनि सिद्धादयो वा ये चान्ये तान्सम्पूज्य क्षमापयेत् ' ॥१९ ॥

विष्ण्वर्थं यद् भवेत्कार्यं युष्माकमपि तद्भवेत् ॥२० ॥

क्षेमेण गच्छतान्यत्र मुक्त्वा स्थानमिदं त्वरात् ॥ २१ ॥

शिल्पिभिश्च चरुं प्राश्य स्वप्नमन्त्रं जपेन्निशि ॥२२ ॥

विश्वाय विश्वरूपाय स्वप्नाधिपतये नमः ॥ २३ ॥

स्वप्ने सर्वाणि कार्याणि हृदिस्थानि तु यानि मे ॥ २४ ॥

शुभे स्वप्ने शुभं सर्वं ह्यशुभे सिंहहोमतः ॥ २५ ॥

कुद्दालटङ्कशस्त्राद्यं मध्वाज्याक्तमुखं चरेत् ॥ २६ ॥

। शस्त्रं विष्ण्वात्मकं दद्यान्मुखपृष्ठादि दर्शयेत् ॥ २७ ॥

। शिलां कृत्वा पिण्डिकार्थं किञ्चिन्यूनां तु कल्पयेत् ॥२८ ॥

। पूजयित्वाथ घटयेत् प्रतिमां स तु कर्मकृत् ॥ २ ९ ॥ इत्यादिमहापुराण आग्नेये प्रासाददेवतास्थापनभूतशान्तिशिलालक्षणप्रतिमानिर्माणादिनिरूपणं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४३ ॥

रूप रहनेवाले जन्तु - यातुधान ( राक्षस ), गुह्यक और सिद्ध आदि हों अथवा और जो भी हों, उन सबका पूजन करके इस प्रकार क्षमा - प्रार्थना करनी चाहिए ॥ १६-१९ ॥ ' भगवान् केशव की आज्ञा से प्रतिमा के लिए हम लोगों की यह यात्रा हुई है । भगवान् विष्णु के लिए जो कार्य हो, वह आप लोगों का भी कार्य है । अतः हमारे दिये हुए इस बलिदान से आप लोग सर्वथा तृप्त हों और शीघ्र ही यह स्थान छोड़कर कुशलपूर्वक अन्यत्र चले जायँ ॥२०-२१ ॥ इस भाँति प्रार्थना करने पर वे सभी जीव प्रसन्न हो सुखपूर्वक उस स्थान को छोड़कर चले जाते हैं । तदनन्तर शिल्पियों के सहित चरु को खाकर रात में ( सोते समय ) इस स्वप्न - मन्त्र का जप करे ॥ २२ ॥ जो समस्त प्राणियों के निवास-स्थान हैं, व्यापक हैं, सबको उत्पन्न करनेवाले हैं, स्वयं विश्वरूप हैं और सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, उस स्वप्न

के अधिपति भगवान् श्रीहरि को नमस्कार है ॥२३ ॥ देव! देवेश्वर! मैं आपके निकट सो रहा हूँ । मेरे मन में जिन

कार्यों का संकल्प है, उन सबके सम्बन्ध में मुझे बताइये ॥ २४ ॥ ' ॐ ॐ हुं फट् विष्णवे स्वाहा ' इस मन्त्र का जप

करके सो जाने पर शुभ स्वप्न देखने पर सब शुभ होता है और अशुभ स्वप्न भी नृसिंह होम से शुभ हो जाते हैं ॥२५ ॥ प्रातःकाल शिला पर शस्त्र अर्घ्य देकर अस्त्र - मन्त्र से अस्त्रों की पूजा करे । कुद्दाल, छेनी, टंक और शस्त्र

आदि के मुख पर घी और मधु लगाकर पूजन करना चाहिए ॥२६ ॥ अपने - आपको विष्णु रूप से चिन्तन करे । कारीगर

को विश्वकर्मा माने और शस्त्र को भी विष्णु होने की ही भावना करे । फिर शस्त्र कारीगर को दे और उसका मुख, पृष्ठ आदि उसे दिखा दे ॥२७ ॥ जितेन्द्रिय शिल्पी उस चौकोर शिला को छेनी से काटकर पिण्डिका के लिए काट-छाँटकर कुछ न्यून कर दे ॥२८ । इसके बाद शिला को वस्त्र में लपेटकर रथ पर रखे और शिल्पशाला में लाकर

पुनः उस शिला का पूजन करे । इसके बाद कारीगर प्रतिमा बनाये ॥ २ ९ ॥

श्री अग्निमहापुराण में प्रासाददेवतास्थापन एवं भूतशान्ति विधान - वर्णन नामक तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त || ४३ || १ घ. ' त् । विष्णुबि । २ क. ङ. च. प्रपन्नोऽस्मि । ३ ख. घ. कर्मकम् । ४ चिन्मूलं तु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 197

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वासुदेवादिप्रतिमालक्षणं संस्थाप्य पूज्य च बलिं सूर्यभक्ते ' शिलायां तु चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः १ ९ ३ अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः वासुदेवादिप्रतिमानां लक्षणानि हयग्रीव उवाच प्रवदामि ते । प्रासादस्योत्तरे पूर्वमुखीं वा चोत्तराननाम् ॥१ ॥

दत्त्वाथो मध्यसूत्रकम् । शिलां शिल्पी तु नवधा विभज्य नवमेंऽशके ॥२ ॥

भागं स्वाङ्गुलमुच्यते । द्व्यङ्गुलं गोलकं नाम्ना कलानेत्रं तदुच्यते ॥३ ॥

भागमेकं त्रिधा कृत्वा पाणिभागं प्रकल्पयेत् । भागमेकं तथा जानौ ग्रीवायां भागमेव च ॥४ ॥

मुकुटं तालमात्रं स्यात् तालमात्रं तथा मुखम् । तालेनैकेन कण्ठं तु तालेन हृदयं तथा ॥ ५ ॥

नाभिमेदान्तरं तालं द्वितालावूरुकौ तथा । तालद्वयेन जङ्घा स्यात् सूत्राणि शृणु साम्प्रतम् || ६ || कार्यं सूत्रद्वयं पादे जङ्घामध्ये तथापरम् I । जानौ सूत्रद्वयं कार्यमूरुमध्ये तथापरम् ॥७ ॥

मेढ़े तथापरं कार्यं कट्यां सूत्रं तथापरम् । मेखलाबन्धसिद्ध्यर्थं नाभ्यां चैवापरं तथा ॥८ ॥

हृदये च तथा कार्यं कण्ठे सूत्रद्वयं तथा । ललाटे चापरं कार्यं मस्तके च तथापरम् ॥९ ॥

मुकुटोपरि कर्तव्यं सूत्रमेकं विचक्षणैः । सूत्राण्यूर्ध्वं प्रदेयानि सप्तैव कमलोद्भव ॥ १० ॥

अध्याय ४४ वासुदेव आदि प्रतिमाओं का लक्षण हयग्रीव बोले - अब मैं वासुदेव प्रतिमा का लक्षण बता रहा हूँ । सुनो! मन्दिर के उत्तर भाग में शिला को पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख रखकर उसकी पूजा करे और उसे बलि अर्पित करके कारीगर शिला के बीच में सूत लगाकर उसका नौ भाग करे । नवें भाग को भी बारह भागों में विभाजित करने पर एक - एक भाग अपने अंगुल से एक अंगुल का होता है । दो अंगुल का गोलक होता है जिसे कलानेत्र भी कहते हैं ॥ १-३ ॥ उक्त नौ भागों में से एक भाग के तीन हिस्से करके उसमें पाणि - भाग की कल्पना करे । एक भाग घुटने के लिए तथा एक भाग कण्ठ के लिए निश्चित रखे । मुकुट को एक बित्ता रखे । मुँह का भाग भी एक बित्ते का होना चाहिए । इसी प्रकार एक बित्ते का कण्ठ और एक बित्ते का हृदय हो । नाभि और लिङ्ग के बीच में एक बित्ते का अन्तर होना चाहिए । दोनों ऊरु दो बित्ते के हों । जंघा भी दो बित्ते की हो । अब सूत्रों का माप सुनो ॥४-६ ॥ | दो सूत पैर में और दो सूत जंघा में लगाये । घुटनों में दो सूत तथा दोनों ऊरुओं में भी दो सूत का प्रयोग करे । लिङ्ग में दूसरे दो सूत तथा कटि में भी कमरबन्ध ( करधन ) बनाने के लिए दूसरे दो सूतों का योग करे । नाभि में भी दो सूत काम में लाये । इसी प्रकार हृदय और कण्ठ में दो सूत का उपयोग करे । ललाट में दूसरे और मस्तक में दूसरे दो सूतों का उपयोग करे । बुद्धिमान् कारीगरों को मुकुट के ऊपर एक सूत करना चाहिए । १ क. ङ. च. सूर्येभक्ते । थ. सूर्यभक्तैः । २ थ. कालनेत्रं । १३ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१ ९ ४ अग्निपुराणम् कक्षात्रिकान्तरेणैव षट् सूत्राणि प्रदापयेत् । ललाटं नासिका ' वक्त्रं कर्तव्यं चतुरङ्गुलम् । द्व्यङ्गुले हनुके कार्ये विस्ताराच्चिबुकं तथा । परेण द्व्यङ्गुलौ शङ्खौ कर्तव्यावलकान्विती । द्व्यङ्गुलौ पृथुकौ कर्णौ कर्णापाङ्गार्धपञ्चमे । विद्धं षडङ्गुलं कर्णमविद्धं चतुरङ्गुलम् गन्धपात्रं तथावर्तं शष्कुलीं कल्पयेत्तथा अर्धाङ्गुलं तथा ' नेत्रं वक्त्रं तु चतुरङ्गुलम् । नासावंशसमुच्छ्रायं मूले त्वेकाङ्गुलं मतम् अन्तरं चक्षुषोः कार्यं चतुरङ्गुलमानतः तारा नेत्रत्रिभागेण दृक्तारा पञ्चमांशिका तत्प्रमाणा भ्रुवोर्लेखा भ्रुवौ चैव समे मते मध्यसूत्रं तु सन्त्यज्य सूत्राण्येव निवेदयेत् ॥११ ॥

ग्रीवाकर्णौ तु कर्तव्यावायामाच्चतुरङ्गुलम् ॥१२ ॥

अष्टाङ्गुलं ललाटं तु विस्तारेण प्रकीर्तितम् ॥१३ ॥

चतुरङ्गुलमाख्यातमन्तरं कर्णनेत्रयोः ॥१४ ॥

भ्रूसमेन तु सूत्रेण कर्णस्त्रोतः प्रकीर्तितम् ॥१५ ॥

। चिबुकेन समं विद्धमविद्धं वा षडङ्गुलम् ॥ १६ ॥

। अङ्गुलेनाधरः कार्यस्तस्यार्धेनोत्तराधरः ॥१७ ॥

आयामेन तु वैपुल्यात्सार्धमङ्गुलमुच्यते ॥ १८ ॥

। उच्छ्रायाद् द्वयङ्गुलं चाग्रे करवारोपमा स्मृता ॥ १ ९ ॥ । द्व्यङ्गुलं चाक्षिकोशं च द्व्यङ्गुलं चान्तरं तयोः ॥ २० ॥

। त्र्यङ्गुलं ( लो ) नेत्रविस्तारं ( रो ) द्रोणी चार्घाङगुलामता ॥ २१ ॥

। भ्रूमध्यं द्व्यङ्गुलं कार्यं भ्रूदैर्घ्यं चतुरङ्गुलम् ॥२२ ॥

ब्रह्मन्! ऊपर सात ही सूत देने चाहिए । तीन कक्षाओं के अन्तर से ही छह सूत दिलावे । फिर मध्य सूत्र को त्याग दे और केवल सूत्रों को ही निवेदित करे ॥७-११ ॥ ललाट, नासिका और मुख का विस्तार चार अंगुल का करना चाहिए । गला और कान का भी चार - चार अंगुल का विस्तार करना चाहिए । दोनों ओर की हनु ( ठोढ़ी ) दो - दो अंगुल हो और चिबुक ( ठोढ़ी के बीच का भाग ) भी दो अंगुल का हो । पूरा विस्तार छह अंगुल का होना चाहिए । इसी प्रकार ललाट भी विस्तार में आठ अंगुल का बताया गया है । दोनों ओर के शंख दो - दो अंगुल के बीच बनाये जायँ और उन पर बल भी हों । कान और नेत्र के बीच में चार अंगुल का अन्तर रहना चाहिए । दो - दो अंगुल के कान और पृथुक बनाये । कान और अपाङ्ग ढाई - ढाई अंगुल का बनाये । भौंहों के समान सूत्र के माप को कान का स्रोत कहा गया है । बिंधा हुआ कान छह अंगुल का हो और बिना बिंधा हुआ चार अंगुल का । अथवा बिंधा हुआ या बिना बिंधा, सब चिबुक के समान छह अंगुल का होना चाहिए ॥१२-१६ ॥ गन्धपात्र, आवर्त तथा शष्कुली ( कान का पूरा घेरा ) भी बनावे । एक अंगुल में नीचे का ओंठ और आधे अंगुल में ऊपर का ओंठ बनावे । नेत्र का विस्तार आधा अंगुल का हो और मुख का विस्तार चार अंगुल का हो । मुख की चौड़ाई डेढ़ अंगुल की होनी चाहिए । नाक की ऊँचाई एक अंगुल हो और ऊँचाई से आगे केवल लम्बाई दो अंगुल की रहे । करवीर कुसुम के समान उसकी आकृति होनी चाहिए । दोनों नेत्रों के बीच चार अंगुल का अंतर हो । दो अंगुल तो आँख के घेरे में आ जाता है, सिर्फ दो अंगुल अन्तर रह जाता है । पूरे नेत्र का तीन भाग करके एक भाग के बराबर तारा ( काली पुतली ) बनावे और पाँच भाग करके, एक भाग के बराबर दूक्तारा ( छोटी पुतली ) बनावे । नेत्र का विस्तार दो अंगुल का हो और द्रोणी आधे अंगुल की । उतना ही प्रमाण भौंहों की रेखा का हो । दोनों ओर की भौंहें बराबर रहनी चाहिए । भौंहों का मध्य दो अंगुल का और विस्तार चार अंगुल का होना चाहिए ॥१७-२२ ॥ १ घ. ' सिकाव ' । २ क. ख. ग. ङ. च. ' था गोजी व ' । ३ ग. ' कोणं च । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः षड्विंशदङ्गुलायामं मस्तकस्य तु वेष्टनम् पञ्चनेत्रा त्वधोग्रीवा विस्ताराद्वेष्टनं पुनः ग्रीवात्रिगुणमायामं ग्रीवावक्षोन्तरं भवेत् सप्तनेत्री स्मृतौ बाहू प्रबाहू षोडशाङ्गुलौ । बाहुदण्डोर्ध्वतो ज्ञेयः परिणाहः कला नव । कूर्परस्य भवेन्नाहस्त्रिगुणः कमलोद्भव । अग्रहस्ते परीणाहो द्वादशाङ्गुल उच्यते । दैर्घ्यं सप्ताङ्गुलं कार्यं मध्या पञ्चाङ्गुला मता । कनिष्ठाङ्गुष्ठकौ कार्यौ चतुरङ्गुलसम्मितौ । सर्वासां पर्वणोऽर्धेन नखमानं विधीयते । अङ्गुलैका भवेन्नाभिर्वेधेन च प्रमाणतः । नाभिमध्ये परीणाहो द्विचत्वारिंशदङ्गुलैः । चूचुकौ यवमानौ तु मण्डलं द्विपदं भवेत् । १ ९ ५ । मूर्तीनां केशवादीनां द्वात्रिंशद्वेष्टनं भवेत् ॥२३ ॥

। त्रिगुणं तु भवेदूर्ध्वं विस्तृताष्टाङ्गुलं पुनः ॥२४ ॥

। स्कन्धावष्टाङ्गुलौ कार्यों त्रिकलावंशकौ शुभौ ॥ २५ ॥

त्रिकलौ ' विस्तृतौ बाहू प्रबाहू चापि तत्समौ ॥ २६ ॥

सप्तदशाङ्गुलो मध्ये कूर्परोऽर्धे च षोडश ॥ २७ ॥

नाहः प्रबाहुमध्ये तु षोडशाङ्गुल उच्यते ॥ २८ ॥

विस्तारेण करतलं कीर्तितं तु षडङ्गुलम् ॥ २ ९ ॥ तर्जन्यनामिका चैव तस्मादर्धाङ्गुलं विना ॥ ३० ॥

द्विपर्वोऽङ्गुष्ठकः कार्यः शेषाङ्गुल्यस्त्रिपर्विकाः ॥ ३१ ॥

वक्षसो यत्प्रमाणं तु जठरं तत्प्रमाणतः ॥३२ ॥

ततो मेदान्तरं कार्यं तालमात्रं प्रमाणतः ॥ ३३ ॥

अन्तरं स्तनयोः कार्यं तालमात्रं प्रमाणतः ॥३४ ॥

चतुष्षष्ट्यङ्गुलं कार्यं वेष्टनं वक्षसः स्फुटम् ॥३५ ॥

भगवान् केशव आदि की मूर्तियों के मस्तक का पूरा घेरा छब्बीस अंगुल का हो अथवा बत्तीस अंगुल का । नीचे ग्रीवा ( गला ) पाँच नेत्र ( अर्थात् दस अंगुल ) की हो और इसके तीन गुना अर्थात् तीस अंगुल उसका वेष्टन ( चारों ओर का घेरा ) हो । नीचे से ऊपर की ओर ग्रीवा का विस्तार आठ अंगुल का हो । ग्रीवा और छाती के बीच का अन्तर ग्रीवा के तीन गुने विस्तारवाला होना चाहिए । दोनों ओर के कंधे आठ - आठ अंगुल के और सुन्दर अंश तीन - तीन अंगुल के हों । सात नेत्र ( यानी चौदह अंगुल ) की दोनों बाँहें और सोलह अंगुल की दोनों प्रबाहुएँ हों । बाहुओं की चौड़ाई छह अंगुल की हो । प्रबाहुओं की भी इनके समान ही होनी चाहिए । बाहुदण्ड का चारों ओर का घेरा कुछ ऊपर से लेकर नौ कला अथवा सत्रह अंगुल समझना चाहिए । आधे पर बीच में कोहनी है । कोहनी का घेरा सोलह अंगुल का होता है । ब्रह्मा जी! प्रबाहु के मध्य में उसका विस्तार सोलह अंगुल का हो । हाथ के अग्रभाग का विस्तार बारह अंगुल का हो और उसके बीच करतल का विस्तार छह अंगुल कहा गया है । हाथ की चौड़ाई सात अंगुल की करे । हाथ के मध्यमा अँगुली की लम्बाई पाँच अंगुल की हो और तर्जनी तथा अनामिका की लम्बाई उससे आधा अंगुल कम अर्थात् ४३ अंगुल की करे । कनिष्ठा और अँगूठे की लम्बाई चार अंगुल की करे । अँगूठे में दो पोरु बनावे और बाकी सभी अँगुलियों में तीन-तीन पोरु बनावे । सभी अँगुलियों के एक - एक पोरु के आधे भाग के बराबर प्रत्येक अँगुली के नख की नाप समझनी चाहिए । छाती की जितनी नाप हो, पेट की उतनी ही रखे । एक अंगुल की छेदवाली नाभि हो । नाभि से लिङ्ग के बीच का अन्तर एक बित्ता होना चाहिए ॥२३-३३ ॥ नाभि - मध्याङ्ग ( उदर ) का घेरा बयालीस अंगुल का हो । दोनों स्तनों के बीच का अन्तर एक बित्ता होना चाहिए । स्तनों का अग्रभाग चूचुक यव के बराबर बनाये । दोनों स्तनों का घेरा दो पदों के बराबर हो । छाती १ च. त्रिकले । २ च. त्वनयोः । ३ ख. ग. चिबुकौ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१ ९ ६ अग्निपुराणम् चतुर्मुखं च तदधो वेष्टनं परिकीर्तितम् । विस्तारश्चोरुमूले तु प्रोच्यते द्वादशाङ्गुलैः । विस्तृताष्टाङ्गुलं जानु त्रिगुणा परिणाहतः । त्रिगुणः परिधिश्चास्य जङ्गाग्रं पञ्च विस्तरात् । आयामादुत्थितौ पादौ चतुरङ्गुलमेव च । त्रिकलं विस्तृतौ पादौ त्र्यङ्गुलो गुह्यकः स्मृतः । अष्टमाष्टांशमध्योनाः शेषाङ्गुल्यः क्रमेण तु । तदेव द्विगुणं कार्यमङ्गुष्ठस्य नखं तथा । त्र्यङ्गुलौ वृषणौ कार्यों में तु चतुरङ्गुलम् षडङ्गुलपरिणाहौ वृषणौ परिकीर्तितौ अनयैव दिशा कार्यं लोके दृष्ट्वा तु लक्षणम् परिणाहस्तथा कद्याश्चतुष्पञ्चदशाङ्गुलैः ॥३६ ॥

तस्मादभ्यधिकं मध्ये ततो निम्नतरं क्रमात् ॥ ३७ ॥

जङ्घामध्ये तु विस्तारः सप्ताङ्गुल उदाहृतः ॥ ३८ ॥

त्रिगुणः परिधिश्चास्य पादौ तालप्रमाणकौ ॥ ३ ९ ॥ गुल्फात्पूर्वं तु कर्तव्यं प्रमाणाच्चतुरङ्गुलम् ॥ ४० ॥

पञ्चाङ्गुलस्य नाहोऽस्य दीर्घा तद्वत्प्रदेशिनी ॥ ४१ ॥

सपादाङ्गुलमुत्सेधमङ्गुष्ठस्य प्रकीर्तितम् ॥ ४२ ॥

अर्धाङ्गुलं तथान्यासं क्रमान्यूनं तु कारयेत् ॥ ४३ ॥

। परिणाहोऽत्र कोषाग्रं कर्तव्यं चतुरङ्गुलम् ॥४४ ॥

। प्रतिमा भूषणाढ्या स्यादेतदुद्देशलक्षणम् ॥४५ ॥

। दक्षिणे तु करे चक्रमधस्तात् पद्ममेव च ॥ ४६ ॥

का घेरा चौंसठ अंगुल का बनावे । उसके नीचे और चारों ओर का घेरा वेष्टन कहा गया है । इसी प्रकार कमर का घेरा चौवन अंगुल का होना चाहिए । ऊरुओं के मूल का विस्तार बारह - बारह अंगुल का हो । इसके ऊपर मध्य भाग का विस्तार अधिक रखना चाहिए । मध्य भाग से नीचे के अंगों का विस्तार क्रमशः कम होना चाहिए । घुटनों का विस्तार आठ अंगुल का करे और उसके नीचे जंघा का घेरा तीन गुना अर्थात् चौबीस अंगुल का हो । जंघा के मध्य का विस्तार सात अंगुल का होना चाहिए और उसका घेरा तीन गुना अर्थात् इक्कीस अंगुल का हो । जंघा के अग्रभाग का विस्तार पाँच अंगुल और उसका घेरा तीन गुना - पन्द्रह अंगुल का हो । चरण एक - एक बित्ते लम्बे होने चाहिए । विस्तार से उठे हुए पैर अर्थात् पैरों की ऊँचाई चार अंगुल की हो । गुल्फ ( घुट्टी ) से पहले का हिस्सा भी चार अंगुल का ही हो । दोनों पैरों की चौड़ाई छह अंगुल की, गुह्यभाग तीन अंगुल का और उसका पंजा पाँच अंगुल का होना चाहिए । पैरों में प्रदेशिनी अर्थात् अँगूठा चौड़ा होना उचित है । शेष अँगुलियों के मध्यभाग का विस्तार क्रमश: पहली अँगुली आठवें - आठवें भाग के बराबर कम होना चाहिए । अँगूठे की ऊँचाई सवा अंगुल बतायी गयी है । इसी प्रकार अँगूठे के नख का प्रमाण - और अँगुलियों से दूना रखना चाहिए । दूसरी अँगुली के नख का विस्तार आधा अंगुल तथा अन्य अँगुलियों के नखों का विस्तार क्रमशः जरा - जरा - सा कम कर देना चाहिए ॥ ३४-४३ ॥ दोनों अण्डकोश तीन - तीन अंगुल लम्बे बनावे और लिंग चार अंगुल लम्बा करे । इसके ऊपर का भाग चार अंगुल कर रखे । अण्डकोशों का पूरा घेरा छह - छह अंगुल का होना चाहिए । इसके सिवा भगवान् की प्रतिमा सब प्रकार के भूषणों से भूषित करनी चाहिए । यह लक्षण संक्षेप से बताया गया ॥४४-४५ ॥ इसी प्रकार लोक में देखे जानेवाले अन्य लक्षणों को भी दृष्टि में रखकर प्रतिमा में उसका निर्माण करना चाहिए । दाहिने हाथों में से ऊपरवाले हाथ में चक्र और नीचेवाले हाथ में पद्म धारण करावे । बायें हाथों में से ऊपरवाले हाथ में शंख और नीचेवाले. १ ख. शेषं गुल्फक्रमे । २ ध ' म् । यवोनमङ्गुलं का ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA