अग्नि पुराण — पृष्ठ 201–210
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 201–210
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पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः १ ९ ७ वामे शङ्खं गदाधस्ताद् वासुदेवस्य लक्षणात् । श्रीपुष्टी चापि कर्तव्ये पद्मवीणाकरान्विते॥ ४७ ॥
ऊरुमात्रोच्छ्रितायामे मालाविद्याधरौ तथा । प्रभामण्डलसंस्थौ तौ प्रभा हस्त्यादिभूषणा॥४८ ॥
पद्माभं पादपीठं तु प्रतिमास्वेवमाचरेत् ॥४९ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये वासुदेवादिप्रतिमालक्षणकथनं नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४४ ॥
अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः पिण्डिकादिलक्षणम् हयग्रीव उवाच पिण्डिकालक्षणं वक्ष्ये दैर्येण प्रतिमासमा । उच्छ्रायः प्रतिमार्धं तु चतुःषष्टिपुटां च ताम् ॥१ ॥
त्यक्त्वा पङ्क्तिद्वयं चाधस्तदूर्ध्वं यत्तु कोष्ठकम् । समन्तादुभयोः पार्श्वे अन्तस्थं परिमार्जयेत् ॥२ ॥
ऊर्ध्वं पङ्क्तिद्वयं त्यक्त्वा अधस्ताद्यत्तु कोष्ठकम् । अन्तः सम्मार्जयेद्यत्नात्पार्श्वयोरुभयोः समम् ॥३ ॥
तयोर्मध्यगतौ तत्र चतुष्कौ मार्जयेत्ततः । चतुर्धा भाजयित्वा तु ऊर्ध्वपङ्क्तिद्वयं बुधः ॥४ ॥
मेखला भागमात्रा स्यात् खातं तस्यार्धमानतः । भागं भागं परित्यज्य पार्श्वयोरुभयोः समम् ॥५ ॥
हाथ में गदा बनावे । यह वासुदेव श्रीकृष्ण का चिह्न है, अतः उन्हीं की प्रतिमा में रहना चाहिए । भगवान् के निकट हाथ में कमल लिये हुए लक्ष्मी तथा वीणा धारण किये पुष्टि देवी की भी प्रतिमा बनावे । इनकी ऊँचाई ( भगवद्विग्रह के ) ऊरुओं के बराबर होनी चाहिए । इनके अलावा प्रभामण्डल में स्थित मालाधर और विद्याधर का विग्रह बनावे । प्रभा हस्ती आदि से भूषित होती है । भगवान् के चरणों के नीचे का भाग अर्थात् पादपीठ कमल के आकार का बनावे । इस प्रकार देव - प्रतिमाओं में उक्त लक्षणों का समावेश करना चाहिए ॥४६-४९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में वासुदेव प्रतिमा लक्षण वर्णन नामक चौवालीसवाँ अध्याय ४५ पिण्डिका - लक्षण हयग्रीव बोले - अब मैं पिण्डिका का लक्षण बता रहा हूँ । पिण्डिका लम्बाई में उसकी ऊँचाई प्रतिमा की आधी होती है । प्रतिमा को चौंसठ पुटों ( पदों या कोष्ठकों ) से दे और उसके ऊपर का जो कोष्ठ है, उसे चारों ओर दोनों पाश्र्व में भीतर की ओर से दो पंक्तियों को त्यागकर उसके नीचे का जो एक कोष्ठ ( या पंक्ति ) है, उसे भीतर की अध्याय समाप्त ॥४४ ॥
प्रतिमा के समान ही होती है, परन्तु युक्त करके नीचे की दो पंक्ति छोड़ साफ कर दे । इसी तरह ऊपर की ओर से साफ कर ले । दोनों पाश्र्व में समानरूप से यह क्रिया करे ॥१-३ ॥ दोनों पाश्र्व के मध्यगत जो चौक है, उसका भी मार्जन कर दे । तदनन्तर उसे चार भागों में बाँटकर विद्वान् पुरुष ऊपर की दो पंक्तियों की मेखला माने । मेखला - भाग की जो मात्रा है, उसके आधे मान के अनुसार उसमें खात खुदावे । फिर दोनों पार्श्वभागों में समानरूप से एक - एक भाग को त्यागकर बाहर की ओर का एक पद CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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१ ९ ८ अग्निपुराणम् दत्त्वा चैकं पदं बाह्ये प्रणालं कारयेद् बुधः । नानाप्रकारभेदेन भद्रेयं पिण्डिका शुभा । भ्रुवौ यवाधिके कार्ये यवहीना तु नासिका । आयते नयने कार्ये त्रिभागोनैर्यवैस्त्रिभिः कर्णपाशोऽधिकः कार्यः सृक्कणी समसूत्रतः ग्रीवा सार्धकला कार्या तद्विस्तारोपशोभिता अङ्घ्रिपृष्ठौ स्फिचौ कट्यां यथायोगं प्रकल्पयेत् नेत्रैकवर्जितायामा जङ्घोरुश्च तथा कटिः तालमात्रौ स्तनौ कार्यौ कटिः सार्धकलाधिका वामे बिल्वं स्त्रियौ पार्श्वे शुभे चामरहस्तके इत्यादिमहापुराणआग्नेये पिण्डिकादीनां त्रिभागेण च भागस्याग्रे स्यात्तोयविनिर्गमः ॥ ६ ॥
अष्टताला तु कर्त्तव्या देवी लक्ष्मीस्तथा स्त्रियः ॥७ ॥
गोलकेनाधिकं वक्त्रमूर्ध्वं तिर्यग्विवर्जितम् ॥८ ॥
। तदर्थेन तु वैपुल्यं नेत्रयोः परिकल्पयेत् ॥ ९ ॥
। नम्र कलाविहीनं तु कुर्याद्वंशद्वयं तथा ॥१० ॥
। नेत्रं विना तु विस्तारौ ऊरू जानू च पिण्डिका ॥ ११ ॥
। सप्तांशोनास्तथाङ्गुल्यो दीर्घविष्कम्भनाहतः ॥ १२ ॥
। मध्यपार्श्वं च तद्वृत्तं घनं पीनं कुचद्वयम् ॥ १३ ॥
। लक्ष्म शेषं पुरावत्स्याद्दक्षिणे चाम्बुजं करे ॥ १४ ॥
। दीर्घघोणस्तु गरुडश्चक्राङ्गाद्यानथो वदे ॥ १५ ॥
लक्षणवर्णनं नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
नाली बनाने के लिए दे दे । विद्वान् पुरुष उसमें नाली बनवाये । फिर तीन भाग में जो एक भाग है उसके आगे जल निकलने का मार्ग रहे ॥४-६ ॥ नाना प्रकार के भेद से यह शुभ पिण्डिका भद्रा कही गयी है । लक्ष्मी देवी की प्रतिमा ताल ( हथेली ) के माप से आठ ताल की बनायी जानी चाहिए । अन्य देवियों की प्रतिमा भी ऐसी ही हो । दोनों भौंहों को नासिका की अपेक्षा एक - एक जौ अधिक बनावे और नासिका को उनकी अपेक्षा एक जौ कम । मुख नेत्र गोलक से कुछ अधिक प्रमाण का ऊपर की ओर बनाना चाहिए । वह ऊँचा और टेढ़ा - मेढ़ा न हो । आँखें बड़ी - बड़ी बनानी चाहिए । उनका माप सवा तीन जौ के बराबर हो । नेत्रों की चौड़ाई उनकी लम्बाई की अपेक्षा आधी करे । मुख के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक की जितनी लम्बाई है, उसके बराबर सूत से नापकर कर्णपाश ( कान का पूरा घेरा ) बनावे । उसकी लम्बाई उक्त सूत से कुछ अधिक ही रखे । दोनों कन्धों को कुछ झुका हुआ और एक कला से रहित बनावे । ग्रीवा की लम्बाई डेढ़ कला रखनी चाहिए । वह उतनी ही चौड़ाई से भी सुशोभित हो । दोनों ऊरुओं का विस्तार ग्रीवा की अपेक्षा एक नेत्र कम होगा । जानु ( घुटने ), पिण्डली, पैर, पीठ, नितम्ब तथा कटिभाग – इन सबकी यथायोग्य कल्पना करे ॥ ७-११३ ॥ हाथ की अँगुलियाँ बड़ी हों । वे परस्पर अवरुद्ध न हों । बड़ी अँगुली की अपेक्षा छोटी अँगुलियाँ सातवें अंश से रहित हों । जंघा, ऊरु और कटि - इनकी लम्बाई क्रमशः एक - एक नेत्र कम हो । शरीर के मध्यभाग के आसपास का अंग गोल हो । दोनों कुच घने ( परस्पर सटे हुए ) और पीन ( उभरे हुए ) हों । स्तनों का माप हथेली के बराबर हो । कटि उनकी अपेक्षा डेढ़ कला अधिक बड़ी हो । शेष चिह्न पूर्ववत् रहें । लक्ष्मी जी के दाहिने हाथ में कमल और बायें हाथ में बिल्वफल हो । उनके पार्श्व भाग में हाथ में चँवर लिये दो सुन्दरी स्त्रियाँ खड़ी हों । सामने बड़ी नाकवाले गरुड़ की स्थापना करे । अब मैं चक्राङ्कित ( शालग्राम ) मूर्ति आदि का वर्णन करता हूँ ॥१२-१५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में पिण्डिका - लक्षण वर्णन नामक पैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥४५ ॥
१ ख. ग. घ. प्रमाणं CC - 0. JK । Sanskrit २. क. Academy ङ. च., Jammmu सक्कण्यां . Digitized स । by खु S3 Foundation USA
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षट्चत्वारिंशोऽध्यायः १ ९९ अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः शालग्राममूर्तीनां लक्षणानि हयग्रीव उवाच शालग्रामादिमूर्तीश्च वक्ष्येऽहं भुक्तिमुक्तिदाः । वासुदेवः ' सितो द्वारि शिलालग्नद्विचक्रकः ॥१ ॥
ज्ञेयः सङ्कर्षणो लग्नद्विचक्रो रक्त उत्तमः । सूक्ष्मचक्रो बहुच्छिद्रः प्रद्युम्नो नीलदीर्घकः ॥२ ॥
पीतोऽनिरुद्धः पद्माङ्को वर्तुलो द्वित्रिरेखवान् । कृष्णो नारायणो नाभ्युन्नत: ' सुषिरदीर्घवान् ॥३ ॥
परमेष्ठी साब्जचक्रः पृष्ठच्छिद्रश्च विन्दुमान् । स्थूलचक्रोऽसितो विष्णुर्मध्ये रेखा गदाकृतिः ॥४ ॥
नृसिंहः कपिलः स्थूलचक्रः स्यात्पञ्चविन्दुकः । वराहः शक्तिलिङ्गः स्यात्तच्चक्रौ विषम स्मृतौ ॥५ ॥
इन्द्रनीलनिभः स्थूलस्त्रिरेखालाञ्छितः शुभः । कूर्मस्तथोन्नतः पृष्ठे वर्तुलावर्तकोऽसितः ॥६ ॥
हयग्रीवोऽङ्कुशाकाररेखो नीलः सविन्दुकः । वैकुण्ठ एकचक्रोऽब्जी मणिभः पुच्छरेखकः ॥७ ॥
अध्याय ४६ शालग्राम मूर्ति के लक्षण हयग्रीव बोले- - अब मैं शालग्रामगत भगवन्मूर्तियों का वर्णन आरम्भ करता हूँ जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं । जिस शालग्राम - शिला के द्वार में दो चक्र के चिह्न हों और जिसका वर्ण श्वेत हो उसकी ' वासुदेव ' संज्ञा है । जिस उत्तम शिला का रंग लाल हो और जिसमें दो चक्र के चिह्न संलग्न हों उसे भगवान् संकर्षण का श्री - विग्रह समझना चाहिए । जिसमें चक्र का सूक्ष्म चिह्न हो, अनेक छिद्र हों, नील वर्ण हो और आकृति बड़ी दिखायी देती हो वह प्रद्युम्न की मूर्ति है । जहाँ कमल का चिह्न हो, जिसकी आकृतियाँ गोल और रंग पीला हो तथा जिसमें दो - तीन रेखाएँ शोभा पा रही हों वह अनिरुद्ध का श्रीअङ्ग है । जिसकी कान्ति काली, नाभि उन्नत हो और जिसमें बड़े - बड़े छिद्र हों, उसे नारायण का स्वरूप समझना चाहिए । जिसमें कमल और चक्र का चिह्न हो, पृष्ठ भाग में छिद्र हो और जो विन्दु से युक्त हो, वह शालग्राम ' परमेष्ठी ' नाम से प्रसिद्ध है । जिसमें चक्र का स्थूल चिह्न हो, जिसकी कान्ति श्याम हो और मध्य में गदा जैसी रेखा हो उस शालग्राम की विष्णु संज्ञा है ॥१४ ॥ नृसिंह - विग्रह में चक्र का
स्थूल चिह्न होता है । उसकी कान्ति कपिल वर्ण की होती है और उसमें पाँच विन्दु सुशोभित होते हैं । वराह - विग्रह में शक्ति नामक अस्त्र का चिह्न होता है । उसमें दो चक्र होते हैं जो परस्पर विषम ( समानता से रहित ) होते हैं ॥५ ॥ इन्द्रनील
के समान वर्णवाला, स्थूल और त्रिरेखा से समन्वित शुभ माना गया है । जिसका पृष्ठभाग ऊँचा हो, जो गोलाकार आवर्त चिह्न से युक्त एवं श्याम हो, उस शालग्राम की ' कूर्म ' ( कच्छप ) संज्ञा है || ६ || जो अंकुश की - सी रेखा से सुशोभित, नीलवर्ण एवं विन्दुयुक्त हो, उस शालग्राम शिला को हयग्रीव कहते हैं । जिसमें एक चक्र और कमल का चिह्न हो, जो मणि के समान प्रकाशमान तथा पुच्छाकार रेखा से सुशोभित हो उस शालग्राम को ' वैकुण्ठ ' समझना चाहिए । १ घ. ' देवोऽसि । २ घ. द्वारे । ३ ख. रक्तच्छिद्रः । ४ ङ. च. ' तः । शिशिर ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२०० अग्निपुराणम् मत्स्यो दीर्घस्त्रिविन्दुः स्यात्काचवर्णस्तु पूरितः । श्रीधरो वनमालाङ्कः पञ्चरेखस्तु वर्तुलः ॥८ || ८ || ॥ वामनो वर्तुलश्चातिह्रस्वो नीलः सविन्दुकः । श्यामस्त्रिविक्रमो दक्षरेखो वामेन रिक्तकः ' ॥ ९ ॥
अनन्तो नागभोगाङ्को नैकाभो नैकमूर्तिमान् । स्थूलो दामोदरो मध्यचक्रोऽधः सूक्ष्मविन्दुकः ॥ १० ॥
सुदर्शनस्त्वेकचक्रो लक्ष्मीनारायणो द्वयात् । त्रिचक्रश्चाच्युतो देवस्त्रिचक्रो वा त्रिविक्रमः ॥ ११ ॥
जनार्दनश्चतुश्चक्रो वासुदेवश्च पञ्चभिः । षट्चक्रश्चैव प्रद्युम्नः सङ्कर्षणश्च सप्तभिः ॥ १२ ॥
पुरुषोत्तमोष्टचक्रो नवव्यूहो नवाङ्कितः । दशावतारो दशभिर्दशैकेनानिरुद्धकः ॥
द्वादशात्मा द्वादशभिरत ऊर्ध्वमनन्तकः ॥१३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये शालग्रामादिमूर्तिलक्षणकथनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४६ ॥
अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः शालग्रामादिपूजाकथनम् हयग्रीव उवाच शालग्रामादिचक्राङ्कपूजाः ' सिद्ध्यै वदामि ते । त्रिविधा स्याद्धरेः पूजा काम्याकाम्योभयात्मिका ॥१ ॥
जिसकी आकृति बड़ी हो, जिसमें तीन विन्दु शोभा पाते हों, जो काँच के समान श्वेत तथा भरा - पूरा हो वह शालग्राम शिला मत्स्यावतारधारी भगवान् की मूर्ति मानी जाती है । जिसमें वनमाला का चिह्न और पाँच रेखाएँ हों उस गोलाकार शालग्राम - शिला को ‘ श्रीधर ' कहते हैं ॥ ७-८ ॥ गोलाकार, अत्यन्त छोटी, नीली एवं विन्दुयुक्त शालग्राम - शिला की ' वामन ' संज्ञा है । जिसकी कान्ति श्याम हो, दक्षिण भाग में हार की रेखा और बायें भाग में विन्दु का चिह्न हो, उस शालग्राम-शिला को ' त्रिविक्रम ' कहते हैं ॥९ ॥ जिसमें सर्प के शरीर का चिह्न हो, अनेक प्रकार की आभाएँ दीखती हों तथा जो
अनेक मूर्तियों से मण्डित हो, वह शालग्राम - शिला ' अनन्त ' ( शेषनाग ) कही गयी है । जो स्थूल हो, जिसके मध्यभाग में चक्र का चिह्न हो तथा अधोभाग में सूक्ष्म विन्दु शोभा पा रहा हो, उस शालग्राम की ' दामोदर ' संज्ञा है । एक चक्रवाले शालग्राम को ' सुदर्शन ' कहते हैं, दो चक्र होने से उसकी ' लक्ष्मीनारायण ' संज्ञा होती है । जिसमें तीन चक्र हों, वह शिला भगवान्‘अच्युत ’ अथवा ‘ त्रिविक्रम ' है, चार चक्रों से युक्त शालग्राम को ' जनार्दन ', पाँच चक्रवाले को ' वासुदेव ', छह चक्रवाले को ' प्रद्युम्न ' तथा सात चक्रवाले को ' संकर्षण ' कहते हैं । आठ चक्रवाले शालग्राम की ' पुरुषोत्तम ' संज्ञा है । नौ चक्रवाले को ' नवव्यूह ' कहते हैं । दस चक्रों से युक्त शिला की ' दशावतार ' संज्ञा है । ग्यारह चक्रों से युक्त होने पर उसे ' अनिरुद्ध ', द्वादश चक्रों से चिह्नित होने पर ' द्वादशात्मा ' तथा इससे अधिक चक्रों से युक्त होने पर उसे ' अनन्त ' कहते हैं ॥१०-१३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में शालग्रामादिमूर्ति - लक्षण वर्णन नामक छियालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥४६ ॥
अध्याय ४७, शालग्राम की पूजा का कथन हयग्रीव बोले - अब मैं तुम्हारे सम्मुख पूर्वोक्त चक्रांकित शालग्राम विग्रहों की पूजा का वर्णन करता हूँ जो सिद्धि प्रदान करनेवाली है । श्रीहरि की पूजा तीन प्रकार की होती है - काम्या, अकाम्या और उभयात्मिका । मत्स्य आदि १ घ. विन्दुकः । २ क. च. ' पूजां सि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः २०१ मीनादीनां तु पञ्चानां काम्यार्था ' वोभयात्मिका चक्रादीनां त्रयाणां तु शालग्रामार्चनं शृणु । मध्यमा मूर्तिपूजा स्याच्चक्राब्जे चतुरस्रके । कृतमुद्रात्रयश्चक्राद्बहिः पूर्वे गुरुं यजेत् । विधातारं च कर्तारं हर्तारं दक्षसौम्ययोः । ऋगादिवेदान्प्रागादावाधारानन्तकं भुवम् आसनं द्वादशान्तेन ' तत्र स्थाप्य शिलां यजेत् । पूर्वादावथ वेदाद्यैर्गायत्रीभ्यां जितादिना । विष्वक्सेनस्य चक्रस्य क्षेत्रपालस्य दर्शयेत् । पूर्ववत्षोडशारं च सपद्मं मण्डलं लिखेत् । पूर्वेसौम्ये धनुर्बाणान् वेदाद्यैरासनं ददेत् ॥ वराहस्य नृसिंहस्य वामनस्य च मुक्तये ॥२ ॥
उत्तमा निष्कला ' पूजा कनिष्ठा सकलार्चना ' ॥३ ॥
प्रणवं हृदि विन्यस्य षडङ्गं करदेहयोः ॥४ ॥
आप्ये गणं वायवे च धातारं नैर्ऋते यजेत् ॥५ ॥
विष्वक्सेनं यजेदीश आग्नेये क्षेत्रपालकम् ॥६ ॥
। पीठं पद्मं चार्कचन्द्रब्रह्माख्यं मण्डलत्रयम् ॥७ ॥
व्यस्तेन च समस्तेन स्वबीजेन यजेत्क्रमात् ॥८ ॥
प्रणवेनार्चयेत्पश्चान्मुद्रास्तिस्रः प्रदर्शयेत् ॥९ ॥
शालग्रामस्य प्रथमा पूजाऽथो निष्कलोच्यते ॥१० ॥
शङ्खचक्रगदाखङ्गैर्गुर्वाद्यं पूर्ववद्यजेत् ॥११ ॥
शिलां न्यसेद् द्वादशार्णैस्तृतीयं पूजनं शृणु ॥१२ ॥
पाँच विग्रहों की पूजा काम्या अथवा उभयात्मिका हो सकती है । पूर्वोक्त चक्रादि से सुशोभित वराह, नृसिंह और वामन-इन तीनों की पूजा मुक्ति के लिए करनी चाहिए ॥१-२ ॥ अब शालग्राम - पूजन के विषय में सुनो, जो तीन प्रकार की होती है । इनमें निष्कला पूजा उत्तम, सकला पूजा कनिष्ठ और मूर्तिपूजा को मध्यम माना गया है । चौकोर मण्डल में स्थित कमल पर पूजा की विधि इस प्रकार है - हृदय में प्रणव का न्यास करते हुए षडङ्गन्यास करे । फिर करन्यास और व्यापक न्यास करके तीन मुद्राओं का प्रदर्शन करे । तत्पश्चात् चक्र के बाह्यभाग में पूर्व दिशा की ओर गुरुदेव का पूजन करे । पश्चिम दिशा में गण का, वायव्यकोण में धाता का एवं नैर्ऋत्यकोण में विधाता का पूजन करे । दक्षिण और उत्तर दिशा में क्रमशः कर्त्ता और हर्त्ता की पूजा करे । इसी प्रकार ईशानकोण में विष्वक्सेन और अग्निकोण में क्षेत्रपाल की पूजा करे । फिर पूर्वादि दिशाओं में ऋग्वेदादि चारों वेदों की पूजा करके आधारशक्ति, अनन्त, पृथिवी, योगपीठ, पद्म, सूर्य, चन्द्र और ब्रह्मात्मक अग्नि - इन तीनों के मण्डलों का यजन करे । तदनन्तर द्वादशाक्षर - मन्त्र से आसन पर शिला की स्थापना करके पूजन करे । फिर मूल मन्त्र का विभाग करके एवं सम्पूर्ण मन्त्र से क्रमपूर्वक पूजन करे । फिर प्रणव से पूजन करने के पश्चात् तीन मुद्राओं का प्रदर्शन करे ॥३ - ९ ॥ विष्वक्सेन, चक्र और क्षेत्रपाल को ( ये मुद्राएँ ) दिखाये । इस प्रकार यह शालग्राम की प्रथम पूजा निष्कला कही जाती है । पूर्ववत् षोडशदलकमल से युक्त मण्डल को अङ्कित करे । उसमें शंख, चक्र, गदा और खड्ग - इन आयुधों की तथा गुरु आदि की पहले की भाँति पूजा करे । पूर्व और उत्तर दिशाओं में क्रमशः धनुष और बाण की पूजा करे । प्रणवमन्त्र से आसन समर्पण करे और द्वादशाक्षर - मन्त्र से शिला का न्यास करना चाहिए । अब तीनों प्रकार की कनिष्ठ पूजा का वर्णन करता हूँ, सुनो । १ घ. ' म्याद्यो वो ' । ख. ' म्यार्थे वो । २ घ. निष्फला । ३ घ. सफला । ४ घ. ' द्रवन्याख्यं । ५ घ. द्वादशार्णेन । ६ घ. निष्फलो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२०२ अग्निपुराणम् अष्टारमब्जं विलिखेद् गुर्वाद्यं पूर्ववद् यजेत् । अष्टार्णेनासनं दत्त्वा तेनैव च शिलां न्यसेत् ॥ १३ ॥
पूजयेद् दशधा तेन गायत्रीभ्यां जितं ततः ' ॥१४ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये शालग्रामादिपूजाकथनं नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः चतुर्विंशतिमूर्तिस्तोत्रकथनम् श्रीभगवानुवाच
ओंरूपः केशवः पद्मशङ्खचक्रगदाधरः । नारायणः शङ्खपद्मगदाचक्री प्रदक्षिणम् ॥ १ ॥
ततो गदी माधवोऽरिशङ्खपद्मी नमामि तम् । चक्रकौमोदकीपद्मशङ्खी गोविन्द ऊर्जितः ॥२ ॥
मोक्षदः श्रीगदी पद्मी शङ्खी विष्णुश्च चक्रधृक् 1 । शङ्खचक्राब्जगदिनं मधुसूदनमानमे ॥३ ॥
भक्त्या त्रिविक्रमः पद्मगदी चक्री च शङ्ख्यपि । शङ्खचक्रगदापद्मी वामनः पातु मां सदा ॥ ४ ॥
गतिदः श्रीधरः पद्मी चक्रशार्ङ्ग च शंख्यपि । हृषीकेशो गदी चक्री पद्मी शङ्खी च पातु नः ॥५ ॥
अष्टदलकमल अंकित करके उस पर पहले के समान गुरु आदि की पूजा करे । फिर अष्टाक्षर - मन्त्र से आसन देकर उसी से शिला का न्यास करे । उसी मन्त्र से दस बार पूजन करे और दो बार गायत्री से न्यास करे ॥१०-१४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में शालग्रामादि पूजन वर्णन नामक सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥४७ ॥
अध्याय ४८ चतुर्विंशतिमूर्तिस्तोत्र कथन श्री भगवान् बोले - ओंकारस्वरूप केशव अपने हाथों में पद्म, शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले हैं । नारायण शंख, पद्म, गदा और चक्र धारण करते हैं । मैं प्रदक्षिणापूर्वक उनके चरणों में नतमस्तक होता हूँ । माधव गदा, चक्र, शंख और पद्म धारण करनेवाले हैं । मैं उनको नमस्कार करता हूँ । गोविन्द अपने हाथों में क्रमशः चक्र, गदा, पद्म और शंख धारण करनेवाले तथा बलशाली हैं । श्रीविष्णु गदा, पद्म, शंख और चक्र धारण करते हैं, वे मोक्ष देनेवाले हैं । मधुसूदन शंख, चक्र, पद्म और गदा धारण करते हैं । मैं उनके सामने भक्ति - भाव से नतमस्तक होता हूँ । त्रिविक्रम क्रमशः पद्म, गदा, चक्र एवं शंख धारण करते हैं । भगवान् वामन के हाथों में शंख, चक्र, गदा एवं पद्म शोभा पाते हैं, वे सदा मेरी रक्षा करें ॥१-४ ॥ श्रीधर कमल, चक्र, शार्ङ्ग धनुष एवं शंख धारण करते हैं । वे सबको सद्गति प्रदान करनेवाले हैं । हृषीकेष गदा, चक्र, पद्म एवं शंख धारण करते हैं । वे हमारी रक्षा करें । वरदायक भगवान् पद्मनाभ १ घ. तथा । २ घ. तथा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः २०३ वरदः पद्मनाभस्तु शङ्खाब्जारिगदाधरः ॥ दामोदरः पद्मशङ्खगदाचक्री नमामि तम् ॥६ ॥
तेने ' गदी शङ्खचक्री वासुदेवोऽब्जभृज्जगत् । सङ्कर्षणो गदी शङ्खी पद्मी चक्री च पातु वः ॥७ ॥
गदी चक्री शङ्खगदी प्रद्युम्नः पद्मभृत्प्रभुः । अनिरुद्धश्चक्रगदी शङ्खी पद्मी च पातु नः ॥८ ॥
सुरेशोऽर्यब्जशङ्खाढ्यः श्रीगदी पुरुषोत्तमः । अधोक्षजः पद्मगदी शङ्खचक्री च पातु वः ॥९ ॥
देवो नृसिंहश्चक्राब्जगदी शङ्खी नमामि तम् । अच्युतः श्रीगदी पद्मी चक्री शङ्खी च पातु वः ॥१० ॥
बालरूपी शङ्खगदी उपेन्द्रश्चक्रपद्भ्यपि । जनार्दनः पद्मचक्री शङ्खधारी गदाधरः ॥ ११ ॥
शङ्खी पद्मी च चक्री च हरिः कौमोदकीधरः । कृष्णः शङ्खी गदी पद्मी चक्री मे भुक्तिमुक्तिदः ॥१२ ॥
आदिमूर्तिर्वासुदेवस्तस्मात् सङ्कर्षणोऽभवत् । सङ्कर्षणाच्च प्रद्युम्नः प्रद्युम्नादनिरुद्धकः ॥१३ ॥
केशवादिप्रभेदेन एकैकः स्यात्त्रिधा क्रमात् ॥।१४ ॥ द्वादशाक्षरकं स्तोत्रं चतुर्विंशतिमूर्तिमत् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि निर्मलः सर्वमाप्नुयात् ॥१५ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये चतुर्विंशतिमूर्तिस्तोत्रकथनं नामाष्टाचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४८ ॥
शंख, पद्म, चक्र और गदा धारण करते हैं । दामोदर के हाथों में पद्म, शंख, गदा और चक्र शोभा पाते हैं, मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ । गदा, शंख, चक्र और पद्म धारण करनेवाले वासुदेव ने ही सम्पूर्ण जगत् का विस्तार किया है । गदा, शंख, पद्म और चक्र धारण करनेवाले संकर्षण आप लोगों की रक्षा करें ॥५-७ ॥ वाद- ( युद्ध ) कुशल भगवान् प्रद्युम्न चक्र, शंख, गदा और पद्म धारण करते हैं । अनिरुद्ध चक्र, गदा, शंख और पद्म धारण करनेवाले हैं । वे हम लोगों की रक्षा करें । सुरेश्वर पुरुषोत्तम चक्र, कमल, शंख और गदा धारण करते हैं, भगवान् अधोक्षज पद्म, गदा, शंख और चक्र धारण करनेवाले हैं, वे आप लोगों की रक्षा करें । नृसिंह देव चक्र, कमल, गदा और शंख धारण करनेवाले हैं, मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ । श्रीगदा, पद्म, चक्र और शंख धारण करनेवाले अच्युत आप लोगों की रक्षा करें । शंख, गदा, चक्र और पद्म धारण करनेवाले बालबटुकरूपधारी वामन, पद्म, चक्र, शंख और गदा धारण करनेवाले जनार्दन, शंख, पद्म, चक्र और गदाधारी यज्ञस्वरूप श्रीहरि तथा शंख, गदा, पद्म एवं चक्र धारण करनेवाले श्रीकृष्ण मुझे भोग और मोक्ष देनेवाले हों ॥८-१२ ॥ आदिमूर्ति भगवान् वासुदेव हैं । उनसे संकर्षण प्रकट हुए । संकर्षण से प्रद्युम्न और प्रद्युम्न से अनिरुद्ध का प्रादुर्भाव हुआ । इनमें से एक - एक क्रमशः केशव आदि मूर्तियों के भेद से तीन - तीन रूपों में अभिव्यक्त हुआ । चौबीस मूर्तियों की स्तुति से युक्त इस द्वादशाक्षर स्तोत्र का जो पाठ अथवा श्रवण करता है वह निर्मल होकर सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त कर लेता है ॥१३-१५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में चतुर्विंशतिमूर्ति स्तोत्र कथन नामक अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥४८ ॥
१ क. च. ततो । ख. ग. वामे । २ क. ख. ग. ङ. च. ' ब्जजो जग ' । ३ क. ख. च. माम् । ४ ख. ग. घ. ' कैकस्य त्रिधा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२०४ अग्निपुराणम् अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः मत्स्यादिदशावतारप्रतिमालक्षणवर्णनम् श्रीभगवानुवाच दशावतारं मत्स्यादिलक्षणं प्रवदामि ते । मत्स्याकारस्तु मत्स्यः स्यात्कूर्मः कूर्माकृतिर्भवेत् ॥ १ ॥
नराङ्गो वाथ कर्तव्यो भूवराहो गदारिभृत् । दक्षिणे वामके शङ्खं लक्ष्मीर्वा पद्ममेव वा ॥ २ ॥
श्रीर्वामकूर्परस्था तु क्ष्मानन्तौ चरणानुगौ । वराहस्थापनाद्राज्यं भवाब्धितरणं भवेत् ॥३ ॥
नरसिंहो विवृतास्यो वामोरुधृतदानवः । तद्वक्षो दारयन्माली स्फुरच्चक्रगदाधरः ॥४ ॥
छत्री दण्डी वामनः स्यादथवा स्याच्चतुर्भुजः । रामः चापेषुहस्तः स्यात्खड्गी परशुनान्वितः ॥ ५ ॥
रामश्चापी शरी खड्गी शङ्खी वा द्विभुजः स्मृतः । गदालाङ्गलधारी च रामो वाथ चतुर्भुजः ॥ ६ ॥
वामार्धे ' लाङ्गलं दद्यादधः शङ्खं सुशोभनम् । मुसलं दक्षिणार्धे ' तु चक्रं चाधः सुशोभनम् ॥७ ॥
शान्तात्मा लम्बकर्णश्च गौराङ्गश्चाम्बरावृतः । ऊर्ध्वं पद्मस्थितो बुद्धो वरदाभयदायकः ॥८ ॥
अध्याय ४ ९ मत्स्यादि दशावतार प्रतिमा लक्षण का वर्णन श्री हयग्रीव भगवान् बोले- अब मैं तुम्हें मत्स्य आदि दस अवतार - विग्रहों का लक्षण बताता हूँ । मत्स्य भगवान् की आकृति मत्स्य के समान और कूर्म भगवान् की प्रतिमा कूर्म के आकार की होनी चाहिए । पृथ्वी के उद्धारक भगवान् वराह को मनुष्याकार बनाना चाहिए । वे दाहिने हाथ में गदा और चक्र धारण करते हैं । उनके बायें हाथ में शंख और पद्म शोभा पाते हैं । अथवा पद्म के स्थान पर बायें भाग में पद्मा देवी सुशोभित होती हैं । लक्ष्मी उनके बायें कोहनी का सहारा लिये रहती हैं । पृथ्वी तथा अनन्त चरणों के अनुगत होती हैं । भगवान् वराह की स्थापना से राज्य की प्राप्ति होती है और मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है । नरसिंह का मुँह खुला हुआ है । उन्होंने अपनी बायीं जाँघ पर दानव हिरण्यकशिपु को दबा रखा है और उस दैत्य के वक्ष को विदीर्ण करते दिखायी देते हैं । उनके गले में माला है और हाथों में चक्र एवं गदा प्रकाशित हो रहे हैं ॥ १-४ ॥ वामन का विग्रह छत्र एवं दण्ड से सुशोभित होता है अथवा उनका विग्रह चतुर्भुज बनाया जाय । परशुराम के हाथों में धनुष और बाण होना चाहिए । वे खड्ग और फरसे से भी शोभित होते हैं । श्री रामचन्द्र जी के श्रीविग्रह को धनुष, बाण, खड्ग और शंख से सुशोभित करना माने गये हैं । बलराम जी गदा एवं हल धारण करनेवाले हैं अथवा चाहिए! अथवा वे द्विभुज के ऊपरवाले हाथ में हल धारण कराये और नीचेवाले उन्हें भी चतुर्भुज बनाना चाहिए । उनके बायें भाग धारण कराये और नीचेवाले में सुन्दर शोभावाला शंख, दायें भाग के ऊपरवाले हाथ में मुसल हाथ में शोभायमान सुदर्शन चक्र ॥५-७ ॥ बुद्धदेव की प्रतिमा का लक्षण यों है - बुद्ध ऊँचे १ क. ङ. च. ' तारम ' । २ क. ङ. च. नृबराहो । ३ ख. ग. घ. ' दादिभृ ५ ख. ग. घ. वामोर्ध्वे । ६ ख. दक्षिणार्थेन । घ. दक्षिणोवें । ' । ४ ख. ग. घ. ङ. च. ' रुक्षत ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः धनुस्तूर्णान्वितः कल्की म्लेच्छोत्सादकरो द्विजः । लक्षणं वासुदेवादिनवकस्य वदामि ते । ब्रह्मेशौ पार्श्वगौ नित्यं वासुदेवोऽस्ति पूर्ववत् ' । लाङ्गली मुसली राम्रो गदापद्मधरः स्मृतः । गदाधन्वावृत: ५ प्रीत्या प्रद्युम्नो वा धनुःशरी । चतुर्मुखश्चतुर्बाहुर्बृहज्जठरमण्डलः । दक्षिणे चाक्षसूत्रं च स्रुचो वामे तु कुण्डिकाः । विष्णुरष्टभुजस्ता करे खड्गस्तु दक्षिणे । चक्रशङ्खौ चतुर्बाहुर्नरसिंहश्चतुर्भुजः । चतुर्बाहुर्वराहस्तु शेषः पाणितले धृतः । २०५ अथवाश्वस्थितः खड्गी शङ्खचक्रगदान्वितः ॥९ ॥
दक्षिणार्धे गदा वामे वामार्धे चक्रमुत्तमम् ॥१० ॥
शङ्खी सवरदो वाथ द्विभुजो वा चतुर्भुजः ॥ ११ ॥
प्रद्युम्नो दक्षिणे चक्रं शङ्खं वामे धनुः करे ॥१२ ॥
चतुर्भुजोऽनिरुद्धः स्यात्तथा नारायणो विभुः ॥१३ ॥
लम्बकूर्चो जटायुक्तो ब्रह्मा हंसाग्रवाहनः ॥१४ ॥
आज्यस्थाली सरस्वती सावित्री वामदक्षिणे ॥ १५ ॥
गदाधरश्च वरदो वामे कार्मुकखेटके ॥१६ ॥ १६ ॥ ॥
शङ्खचक्रधरो वापि विदारितमहासुरः ॥१७ ॥
धारयन् बाहुना पृथ्वीं वामनः कमलामधः ॥१८ ॥
पद्ममय आसन पर बैठे हैं । उनके एक हाथ में वरद और दूसरे में अभय की मुद्रा है । वे शान्तस्वरूप हैं । उनके शरीर का रंग गोरा और कान लम्बे हैं । वे सुन्दर पीत वस्त्र से आवृत हैं । कल्कि भगवान् धनुष और तूणीर से सुशोभित हैं । म्लेच्छों के संहार में लगे हैं । वे ब्राह्मण हैं । अथवा उनकी आकृति इस प्रकार बनाये - वे घोड़े की पीठ पर बैठे हैं और अपने चार हाथों में खड्ग, शंख, चक्र एवं गदा धारण किये हैं ॥८ - ९ ॥ अब मैं तुम्हें वासुदेवादि नौ मूर्तियों के लक्षण बताता हूँ । दाहिने भाग के ऊपरवाले हाथ में उत्तम चक्र - यह वासुदेव की मुख्य पहचान है । उनके एक पार्श्व में ब्रह्मा और दूसरे भाग में महादेव जी सदा विराजमान रहते हैं । वासुदेव की शेष बातें पूर्ववत् हैं । वे शंख अथवा वरद की मुद्रा धारण करते हैं । उनका स्वरूप द्विभुज अथवा चतुर्भुज होता है । बलराम की चार भुजाएँ हैं । वे दायें हाथ में हल और मुसल तथा बायें हाथ में गदा और पद्म धारण करते हैं । प्रद्युम्न दायें हाथ में चक्र और शंख तथा बायें हाथ में धनुष-बाण धारण करते हैं । अथवा द्विभुज प्रद्युम्न के एक हाथ में गदा और दूसरे में धनुष है । वे प्रसन्नतापूर्वक इन अस्त्रों को धारण करते हैं । या उनके एक हाथ में धनुष और दूसरे में बाण है । अनिरुद्ध और भगवान् नारायण का विग्रह चतुर्भुज होता है । ब्रह्मा जी हंस पर आरूढ़ होते हैं । उनके चार मुख और चार भुजाएँ हैं । उदरमण्डल विशाल है । लम्बी दाढ़ी और सिर पर जटा - यही उनकी प्रतिमा का लक्षण है ॥१०-१४ ॥ वे दाहिने हाथों में अक्षसूत्र और स्रुवा एवं बायें हाथों में कुण्डिका और आज्यस्थाली धारण करते हैं । उनके वाम भाग में सरस्वती और दक्षिण भाग में सावित्री हैं । विष्णु की आठ भुजाएँ हैं । वे गरुड़ पर आरूढ़ हैं । उनके दाहिने हाथ में खड्ग, गदा, बाण और वरद की मुद्रा है । बायें हाथ में धनुष, खेट, चक्र और शंख हैं । अथवा उनका विग्रह चतुर्भुज भी है । नृसिंह की चार भुजाएँ हैं । उनकी दो भुजाओं से वे महान् असुर हिरण्यकशिपु का वक्ष विदीर्ण कर रहे हैं ॥ १५-१७ ॥ वराह के चार भुजाएँ हैं । उन्होंने शेषनाग को अपने करतल में धारण कर रखा है । वे बायें हाथ से पृथ्वी को और वाम भाग में लक्ष्मी को धारण करते हैं । जब लक्ष्मी १ घ. दक्षिणो । २ घ. वामोर्ध्वे । ३ ख. ' र्वतः । श ' । ४ घ. वज्रं । ५ घ. दानभ्यावृ । ६ घ. ' स्तार्क्षे क ' । ७ घ. कमलाधरः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् २०६ पादलग्ना धरा कार्या यदा लक्ष्मीर्व्यवस्थिता । चक्रं शखं च मुसलमङ्कुशं वामके करे । लक्ष्मीः सरस्वती कार्ये विश्वरूपोऽथ दक्षिणे । मुद्गरं च तथा पाशं शक्तिशूलं शरं करे । लाङ्गलं परशुं दण्डं छुरिकां चर्म ' चोत्तमम् । त्रिनेत्रो वामपार्श्वेऽपि शयितो जलशाय्यपि । नाभिपद्मे चतुर्वक्त्रो हरेः, शङ्करको हरिः । रुद्रकेशवलक्ष्माङ्गो गौरीलक्ष्मीसमन्वितः । वामपादो धृतः शेषे दक्षिणः कूर्मपृष्ठगः । विष्वक्सेनश्चक्रगदी हलशखी हरेर्गणः इत्यादि महापुराण आग्नेये त्रैलोक्यमोहनस्तार्क्ष्य ह्यष्टबाहुस्तु दक्षिणे ॥ १ ९ ॥ शङ्ङ्खशार्ङ्गगदापाशान् पद्मवीणासमन्विते ॥ २० ॥
चक्रं खड्गं च मुसलमङङ्कुशं पट्टिशं क्रमात् ॥ २१ ॥
वामे शङ्खं च शार्ङ्गं च गदां पाशं च तोमरम् ॥ २२ ॥
विंशद्बाहुश्चतुर्वक्त्रो दक्षिणस्थोऽथ वामके ॥ २३ ॥
श्रिया धृतैकचरणो विमलाद्याभिरीडितः ॥ २४ ॥
सूलर्ष्टिधारी दक्षेच गदाचक्रधरोऽपरे ॥ २५ ॥
शङ्खचक्रगदावेदपाणिश्चाश्वशिरा हरिः ॥२६ ॥
दत्तात्रेयो द्विबाहुः स्याद्वामोत्सङ्गे श्रिया सह ॥ २७ ॥
॥२८ ॥
मत्स्यादिदशावतारप्रतिमालक्षणवर्णनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४ ९ ॥ उनके साथ हों, तब पृथ्वी को उनके चरणों में संलग्न बनाना चाहिए । त्रैलोक्यमोहनमूर्ति श्रीहरि गरुड़ पर आरूढ़ हैं । उनके आठ भुजाएँ हैं । वे दाहिने हाथों में चक्र, शंख, मुसल और अंकुश धारण करते हैं । उनके बायें हाथों में शंख, शार्ङ्गधनुष, गदा और पाश शोभा पाते हैं । वाम भाग में कमलधारिणी कमला और दक्षिण भाग में वीणाधारिणी सरस्वती की प्रतिमाएँ बनानी चाहिए । भगवान् विश्वरूप का विग्रह बीस भुजाओं से सुशोभित है । वे दाहिने हाथों में क्रमशः चक्र, खड्ग, मुसल, अंकुश, पट्टिश, मुद्गर, पाश, शक्ति, शूल तथा बाण धारण करते हैं । बायें हाथों में शंख, शार्ङ्गधनुष, गदा, पाश, तोमर, हल, फरसा, दण्ड, छुरी और उत्तम ढाल लिये रहते हैं । उनके दाहिने भाग में चतुर्भुज ब्रह्मा तथा बायें भाग में त्रिनेत्रधारी महादेव विराजमान हैं । जलशायीं जल में शयन करते हैं । इनकी मूर्ति शेष- शय्या पर सोयी हुई बनानी चाहिए । भगवती लक्ष्मी उनके एक चरण की सेवा में लगी हैं । विमला आदि शक्तियाँ उनकी स्तुति करती हैं । उन श्रीहरि के नाभि - कमल पर चतुर्भुज ब्रह्मा विराजमान रहे हैं । हरिहर मूर्ति इस प्रकार बनानी चाहिए ॥१८-२४३ ॥ वे दाहिने हाथ में शूल और शक्ति धारण करते हैं तथा अन्य बायें हाथ में गदा और चक्र । इस प्रकार शरीर के दाहिने भाग में रुद्र के चिह्न हैं और वाम भाग में केशव के । दाहिने पार्श्व में गौरी तथा वाम पार्श्व में लक्ष्मी विराज रही हैं । भगवान् हयग्रीव के चार हाथों में क्रमशः शंख, चक्र, गदा और वेद शोभा पाते हैं । उन्होंने अपना बायाँ पैर शेषनाग पर और दाहिना पैर कच्छप की पीठ पर रख छोड़ा है । दत्तात्रेय के दो बाँहें हैं । उनके वामांक में लक्ष्मी शोभा पाती हैं । भगवान् के पार्षद विष्वक्सेन अपने चार हाथों में क्रमशः चक्र, गदा, हल और शंख धारण करते हैं ॥२५-२८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में मत्स्यादिदशावतार प्रतिमालक्षण वर्णन नामक उनचासवाँ अध्याय समाप्त॥४९ ॥
१ ख. ग. घ. चर्मक्षेपणम् । २ घ. ' श्वे॑न श ' । ३ घ. ' पदे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA