अग्नि पुराण — पृष्ठ 221–230
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 221–230
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चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः २१७ मूलेऽङ्गुल्यग्रविस्तारमग्रे त्र्यंशेन त्र्यंशेन चार्धतः । ईषन्निम्नं तु कुर्वीत खातं तच्चोत्तरेण वै ॥२२ ॥
पिण्डिकासहितं लिङ्गमेतत्साधारणं स्मृतम् ॥२३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये लिङ्गादिलक्षणवर्णनं नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
अथ चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः लिङ्गमानव्यक्ताव्यक्तलक्षणादिकथनम् श्रीभगवानुवाच वक्ष्याम्यन्यप्रकारेण लिङ्गमानादिकं शृणु । वक्ष्ये लवणजं लिङ्गं घृतजं बुद्धिवर्धनम् ॥१ ॥
भूतये वस्त्रलिङ्गं तु लिङ्गं तात्कालिकं विदुः । पक्वापक्वं मृन्मयं स्यादपक्वात्पक्वजं परम् ॥२ ॥
ततो दारुमयं पुण्यं दारुजाच्छैलजं वरम् । शैलाद्वरं तु मुक्ताजं ततो लौहं सुवर्णजम् ॥३ ॥
राजतं ' कीर्तितं ताम्रं पैत्तलं भुक्तिमुक्तिदम् । रत्नजं रसलिङ्गं च भुक्तिमुक्तिप्रदं वरम् || ४ || रसजं रजलोहादिरत्नगर्भ तु बन्धयेत् । मानादि लौष्टे सिद्धादिस्थापितेऽथ स्वयंभुवि ॥ ५ ॥
का षष्ठांश होना चाहिए और उनका ढाल कुछ - कुछ नीचे की ओर होना चाहिए । यह पिण्डिका से युक्त साधारण लिङ्ग कहा जाता है ॥२२-२३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में लिङ्गादिलक्षणवर्णन नामक तिरपनवाँ अध्याय समाप्त ॥५३ ॥
अध्याय ५४ लिङ्ग के मानादि का व्यक्ताव्यक्त लक्षण - वर्णन श्री भगवान् बोले - अब मैं लिङ्ग के मानादि के सम्बन्ध में अन्य प्रकार से कह रहा हूँ, उसे सुनो । नमक और घी का बना हुआ लिङ्ग बुद्धिवर्द्धक होता है तथा वस्त्र का बना हुआ लिङ्ग सम्पत्ति को बढ़ानेवाला हुआ करता है । ये लिङ्ग पूजा के लिए तत्काल बना लिये जाते हैं । मिट्टी के लिङ्ग दो प्रकार के होते हैं - पक्व और अपक्व । अपक्व की अपेक्षा पक्व लिङ्ग उत्तम होता है ॥१-२ ॥ मिट्टी से बने हुए लिङ्ग की अपेक्षा काष्ठलिङ्ग अधिक पुण्यप्रद होता है । काष्ठलिङ्ग से , प्रस्तरलिङ्ग से मौक्तिकलिङ्ग और मौक्तिकलिङ्ग से लौहलिङ्ग अधिक श्रेष्ठ होता है । किन्तु स्वर्णलिङ्ग लौहलिङ्ग प्रस्तरलिङ्ग फल देनेवाला हुआ करता है ॥३ ॥ चाँदी, ताँबा, पीतल, राँगा और रस ( पारद ) के बने हुए लिङ्ग श्रेष्ठ और
से भी अधिक हुआ करते हैं ॥४ ॥ रस ( पारद ) के लिङ्ग को राँगा, लोहा ( सुवर्ण, ताँबा ) आदि के भीतर
भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले चाहिए । सिद्ध आदि के द्वारा स्थापित हुए अथवा स्वयंभू लिङ्ग में मान का विचार नहीं रत्नादि से जटित कर स्थापित करना १ क. ङ. च. तारज ' । २ ख. ग. घ. रङ्गजं । ३ ख. ग. घ. रसलो । ४ ख. ग. घ. मानादिनेष्टं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२१८ अग्निपुराणम्
बाणे ' च स्वेच्छया तेषां पीठप्रासादकल्पना ।
पूज्यो हरस्तु सर्वत्र लिखे पूर्णार्चनं भवेत् ॥
चलमङ्गुलमानेन द्वारगर्भकरैः स्थिरम् । द्वारमानात्त्रिसंख्याकं नवधागर्भमानतः । एवं लिङ्गानि षट्त्रिंशज्ज्ञेयानि ज्येष्ठमानतः । इत्थमैक्येन लिङ्गानां शतमष्टोत्तरं भवेत् । षडादिदशपर्यन्तं चललिङ्गं चललिङ्गं च च मध्यमम् । षडङ्गुलं महारत्नैरत्नैरन्यैर्नवाङ्गुलम् । षोडशांशे च वेदांशे युगं लुप्तोर्ध्वदेशतः । चतुर्निवेशनात्कण्ठो विंशतिस्त्रियुगैस्तथा धाम्नो युगर्तुनागांशैर्द्वारमानोनितं क्रमात् पूजयेत्सूर्यबिम्बस्थं दर्पणे प्रतिबिम्बितम् ॥६ ॥
हस्तोत्तरोच्छ्रितं शैलं दारुजं तद्वदेव हि ॥७ ॥
अङ्गुलाद्गृहलिङ्गं स्याद्यावत्पञ्चदशाङ्गुलम् ॥८ ॥
नवधागर्भमानेन लिङ्गं धानि च पूजयेत् ॥ ९ ॥
मध्यमानेन षट्त्रिंशत्षत्रिंशदधमेन च ॥१० ॥
एकाङ्गुलादि पञ्चान्तं कनिष्ठं ' चलमुच्यते ॥११ ॥
एकादशाङ्गुलादि स्याज्ज्येष्ठं पञ्चदशान्तिकम् ॥१२ ॥
। ' रविभिर्हेमतारोत्थं लिङ्गं शेषैस्त्रिपञ्चभिः ॥ १३ ॥
द्वात्रिंशत्षोडशांशाश्च कोणयोस्तु विलोपयेत् ॥१४ ॥
। पार्श्वभ्यां विलुप्ताभ्यां चललिङ्गं भवेद्वरम् ॥ १५ ॥
॥ लिङ्गे द्वारोछ्यादर्वाग्भवेत्पादोनितं क्रमात् ॥ ॥१६ १६ ॥ ॥ है । यही बात बाण लिङ्ग ( नर्मदेश्वर ) के सम्बन्ध में भी है । शिवलिङ्गों के पीठ और प्रासाद की कल्पना इच्छानुसार कर लेनी चाहिए । सूर्य बिम्ब में स्थित लिङ्ग की पूजा दर्पण में प्रतिबिम्बित करनी चाहिए ॥५-६ ॥ । वैसे तो शिव की पूजा सर्वत्र की जा सकती है, किन्तु लिङ्ग के रूप में शिवार्चन करने से पूजा पूर्ण मानी जाती है - पत्थर और काष्ठ का बना हुआ लिङ्ग एक हाथ ऊँचा होना चाहिए || ७ || चलशिवलिङ्ग का स्वरूप अङ्गुलमान के अनुसार निर्मित करना चाहिए तथा स्थिर लिङ्ग का द्वारमान गर्भमान तथा हस्तमान से । गृह में स्थापित चललिङ्ग की ऊँचाई एक अंगुल से लेकर पन्द्रह अंगुल तक होनी चाहिए ॥८ ॥ द्वारमान से लिङ्ग के तीन भेद हैं । इनमें से प्रत्येक के गर्भाधान के अनुसार नौ - नौ भेद हैं । इस प्रकार कुल सत्ताईस
हुए । इसके अतिरिक्त करमान से नौ लिङ्ग और हैं । इनकी देवालय में पूजा करनी चाहिए ॥९ ॥ इस प्रकार सबको एक में
जोड़ने पर छत्तीस लिङ्ग जानने चाहिए । ये ज्येष्ठमान के अनुसार हैं । मध्यममान से छत्तीस प्रकार और अधममान से छत्तीस प्रकार के लिङ्ग होने से सब मिलाकर एक सौ आठ प्रकार के लिङ्ग होते हैं । चललिङ्ग का प्रमाण एक अंगुल से लेकर पाँच अंगुल तक होता है । यह सबसे छोटा प्रमाण है ॥१०-११ ॥ छह अंगुल से दस अंगुल तक मध्यममान होता है । और ग्यारह अंगुल से पन्द्रह अंगुल तक का मान ज्येष्ठमान कहा जाता है || १२ || महारत्नों का बना हुआ लिङ्ग छह अंगुल का, अन्य रत्नों का बना हुआ लिङ्ग नौ अंगुल का, स्वर्णभार का बना हुआ लिङ्ग बारह अंगुल का तथा शेष वस्तुओं से बना हुआ लिङ्ग पन्द्रह अंगुल का होना चाहिए || १३ || लिङ्ग शिला के षोडशांश और चतुर्थांश में ऊपर से दो भाग करके दोनों कोणों के बत्तीस और सोलह अंशों में मिटा देना चाहिए || १४ || तत्पश्चात् उसमें चार भाग और जोड़ देने से ' कण्ठ ' बनता है । दोनों पार्श्वों के बाहर अंशों को मिटा देने से ज्येष्ठ चललिङ्ग बन जाता है । प्रासाद की ऊँचाई को सोलह भागों में विभक्त करके उसमें चार, छह और आठ अंशों द्वारा क्रमशः हीन, मध्यम और उत्तम द्वार बन जाते हैं । द्वार की ऊँचाई की एक चौथाई कम कर देने से जो ऊँचाई शेष रहती है वही लिङ्ग की ऊँचाई होती है ॥ १५-१६ ॥ लिङ्ग शिला के गर्भ की आधी ऊँचाईका १ ख. ग. घ. वामे । ङ. च. बाणवत्स्वेच्छया । २ ख. ग. ' तिचिह्नित ' । ३ घ. हस्तोत्तरविधं । ४ ख. ग. घ. स्थितम् ५ क. ङ. च. नाद्विसं ' । ६ क. ङ. च. वाऽग्नि । ७ क. ख. ग. घ. ङ. च. कन्यसंवलमु ' । ८ घ । . ' मभारो ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः २१ ९ गर्भार्धेनाधमं लिङ्गं भूतांशैः स्यात्त्रिभिर्वरम् । एवं स्युर्नवसूत्राणि भूतसूत्रैश्च मध्यमम् । हस्ताद्विवर्धते हस्तो यावत्स्युर्नव पाणयः । एकैकलिङ्गमध्येषु त्रीणि त्रीणि च पादशः । स्थिरदीर्घ प्रमाणैस्तु द्वारगर्भकरात्मिका । चत्वारि लिङ्गरूपाणि विष्कम्भेण तु लक्षयेत् । चतुरष्टाष्टवृत्तं च तत्त्वत्रयगुणात्मकम् । ध्वजाद्यायैः सुरैर्भूतैः शिखिभिर्वा हरेत्कृती । ध्वजाद्या ध्वजसिंहेभवृषः श्रेष्ठाः परेऽशुभाः । भूतेषु च शुभा भूः स्यादग्निश्चाऽऽहवनीयकः ।
रसभूतांशषष्ठांशत्र्यंशाधिकशरैर्भवेत् ।
तयोर्मध्ये सूत्राणि सप्त सम्पातयेत्समम् ॥१७ ॥
द्वयन्तरो वामवा ( भाग ) श्च लिङ्गानां दीर्घता नव ॥१८ ॥
हीनमध्योत्तमं लिङ्गं त्रिविधं त्रिविधात्मकम् ॥१९ ॥
लिङ्गानि घटयेद्धीमान्षट्सु चाष्टोत्तरेषु च ॥ २० ॥
भागेशं चाऽऽप्यमीशं च देवेशं तुल्यसंज्ञितम् ॥२१ ॥
दीर्घमायान्वितं कृत्वा लिङ्गं कुर्यात्त्रिरूपकम् ॥२२ ॥
लिङ्गानामीप्सितं दैर्घ्यं तेन कृत्वाऽङ्गुलानि वै ॥२३ ॥
तान्यङ्गुलानि यच्छेषं लक्षयेच्च शुभाशुभम् ॥२४ ॥
स्वरेषु षड्जगान्धारपञ्चमाः शुभदायकाः ॥२५ ॥
उक्तायामस्य चार्धांशे नागांशैर्भाजिते क्रमात् ॥२६ ॥
आद्यानाद्यसुरे ज्यार्क तुल्यानां चतुरस्त्रता ॥ २७ ॥
शिवलिङ्ग अधम और तीन भूतांशों की ऊँचाई का शिवलिङ्ग ज्येष्ठ माना जाता है । इन दोनों के बीच में सात स्थानों पर सूत्रों के द्वारा रेखाएँ बना देनी चाहिए || १७ || इस प्रकार सूत्र के द्वारा बनी हुई रेखाओं की संख्या नौ हो जाती है । इन नौ सूत्रों में पाँच सूत्रों की ऊँचाई के बराबर शिवलिङ्ग मध्यम कहलाता है । लिङ्गों की लम्बाई क्रमशः दो - दो अंशों में अन्तर से होने के कारण लिङ्गों की सम्पूर्ण संख्या नौ होगी । नव लिङ्गों का निर्माण यदि हाथों से नापकर किया जाय तो पहला लिङ्ग एक हाथ का बनाकर उत्तरोत्तर लिङ्ग की लम्बाई ( ऊँचाई ) में एक - एक हाथ की वृद्धि करते हुए नवाँ लिङ्ग नौ हाथ की ऊँचाई का हो जाता है । पहले हीन, मध्यम और ज्येष्ठ भेद से तीन प्रकार के जो लिङ्ग बताये गये हैं उनमें भी तीन - तीन भेद होते हैं ॥१८-१९ ॥ बुद्धिमान् व्यक्ति को एक - एक लिङ्ग में विभागशः तीन - तीन लिङ्गों का निर्माण करना चाहिए । स्थिर लिङ्ग का निर्माण तीन परिमाणों का होता है जिन्हें क्रमशः द्वारमान, गर्भमान तथा हस्तमान कहना चाहिए । उपर्युक्त परिमाणों के आधार पर ही इन लिङ्गों के तीन नाम हैं - भागेश, जलेश और देवेश ॥२०- २१ ॥ विस्तार के अनुसार लिङ्गों का लक्षण चार प्रकार का होता है । लिङ्ग को आय आदि से युक्त करके लम्बा और तीन रूपों में बनाना चाहिए ॥२२ ॥ इन तीनों प्रकार के लिङ्गों की लम्बाई चार या आठ हाथ होनी चाहिए । यही लिङ्ग का तत्त्वत्रय रूप है । जो
लिङ्ग जितने अंगुल ऊँचा होता है उन अंगुलों को आठ, सात, पाँच और तीन संख्याओं से भाग देने पर जो शेष बचता है शुभाशुभ फल माना जाता है ॥२३-२४ ॥ ध्वज आदि आयों में श्रेष्ठ - श्रेष्ठ आय हैं - ध्वज, सिंह, गज और उसी के अनुसार आय अशुभ माने जाते हैं । स्वरों में षड्ज, गान्धार और पञ्चम शुभ फल देनेवाले हुआ करते हैं ॥२५ ॥
वृषभ । अन्य चार शुभ मानी गयी है । लिङ्ग की लम्बाई को आधा करके और उसे आठ से भाग देने भूतों में पृथ्वी तथा अग्नि में आहवनीय आढ्य, दैवेज्य, अनाढ्य और अर्कतुल्य माना जाता पर सात, छह, पाँच और तीन से अधिक शेष रहने पर लिङ्ग क्रमशः है । यह चारों प्रकार के लिङ्ग चौकोर होते हैं ॥२६-२७ ॥ व्यास की अपेक्षा नाह दीर्घ होने के कारण पाँचवें प्रकार का लिङ्ग १ ख. घ. प्रमेयात्तु द्वा ' । २ ख. घ. ' त्कृतिम् । ता । ३ घ. आढ्यानाढ्यसु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२२० अग्निपुराणम् पञ्चमं वर्धमानाख्यं व्यासान्नाहप्रवृद्धितः आद्यादीनां त्रिधा स्थौल्यादवधूतं तथाऽष्टधा पञ्चविंशतिलिङ्गानि नाद्ये देवार्चिते तथा चतुर्दशसहस्राणि चतुर्दशशतानि च तेषां कोणार्धकोणस्थैश्छिन्द्यात्कोणानि सूत्रकैः विभागादूर्ध्वमष्टास्त्रो द्वयष्टास्त्रः स्याच्छिवांशकः मूर्धान्तो भूतभागेशो व्यक्तेऽव्यक्ते च तद्वति छत्राभं कुक्कुटाभं वा ' बालेन्दुपुरुषाकृतिः लिङ्गमस्तक विस्तारं वसुभक्तं तु कारयेत् चत्वारि तत्र सूत्राणि भागभागानुपातनात् । द्विधा भेदा बहून्यत्र वक्ष्यन्ते विश्वकर्मतः ॥ २८ ॥
। त्रिधा हस्ताज्जिनाख्यं च युक्तं सर्वसमेन च ॥ २ ९ ॥ । पञ्चसप्तभिरेकत्वाज्जिनैर्भक्तैर्भवन्ति हि ॥३० ॥
। एवमष्टाङ्गुलविस्तारो नवैककरगर्भतः ॥ ३१ ॥
। विस्तारं मध्यतः कृत्वा स्थाप्यं वा मध्यतस्त्रयम् ॥३२ ॥
। पादाज्जान्वन्तको ब्रह्मा नाभ्यन्तो विष्णुरित्यतः ॥ ३३ ॥
। पञ्चलिङ्गव्यवस्थायां शिरो वर्तुलमुच्यते ॥३४ ॥
। एकैकस्य चतुर्भेदैः कामभेदात्फलं वदे ॥ ३५ ॥
। आद्यभागं चतुर्धा तु विस्तारोच्छ्रायतो भजेत् ॥ ३६ ॥
। पुण्डरीकं तु भागेन विशालाख्यं विलोपनात् ॥ ३७ ॥
त्रिशातनात्तु श्रीवत्सं शत्रुकृद्वेदलोपनात् । शिरः सर्वसमे श्रेष्ठं कुक्कुटाभं सुराह्वये ॥ ३८ ॥
वर्धमान नाम से जाना जाता है । इन लिङ्गों के भी दो भेद होते हैं - एक तो वह जिसमें व्यास से नाह बड़ा होता है और दूसरा वह जिसमें नाह से व्यास बड़ा होता है । विश्वकर्मा के मतानुसार इसके बहुत से भेदों के सम्बन्ध में बताया जायगा ॥२८ ॥
आढ्य इत्यादि लिङ्गों के स्थूलत्व के कारण तीन भेद और हो जाते हैं । इन तीनों भेदों में से एक यव की वृद्धि से सब लिङ्ग आठ प्रकार के हो जाते हैं । तदनन्तर हस्तमान से बने ' जिन ' संज्ञक लिङ्ग के भी तीन भेद हो जाते हैं । उसे सर्वसमलिङ्ग से युक्त कर देना चाहिए ॥२९ ॥ अनाढ्य तथा देवार्चित लिङ्गों के पचीस भेद हो जाते हैं । ये सभी एक - एक, जिन और भक्त
दोनों से पचहत्तर प्रकारों के हो जाते हैं ॥ ३० ॥ इन सब भेदों को मिलाकर शिवलिङ्ग के कुल पन्द्रह हजार चार सौ ( १५,४०० )
हो जाते हैं । इसी प्रकार आठ अंगुल का लिङ्ग भी एकाङ्गुल मान, हस्तमान और गर्भमान के अनुसार नौ भेदों से युक्त है ॥ ३१ ॥
इनके कोणों का छेदन कोणस्थ और अर्धकोणस्थ सूत्रों के द्वारा करना चाहिए । लिङ्ग के मध्य भाग के विस्तार को ही प्रमाण मानकर उसके अनुसार ऊर्ध्व और निम्न भागों की स्थापना करनी चाहिए ॥ ३२ ॥ मध्यम भाग से ऊपर अष्टकोण तथा षोडश
कोणवाला विभाग शिवांश कहलाता है । लिङ्ग का पाद से लेकर जानुपर्यन्त जो भाग होता है वह ब्रह्मा का अंश माना जाता है तथा जानु से नाभिपर्यन्त जो भाग होता है उसे विष्णु का अंश माना जाता है || ३३ || लिङ्ग का मूर्धान्त भूतभागेश्वर का होता है । यह बात व्यक्त और अव्यक्त सभी लिङ्गों में सम्बन्धित है । पञ्चलिङ्ग व्यवस्था से युक्त शिवलिङ्ग का सिर वर्तुलाकार कहा गया है ॥३४ ॥ वह वर्तुल ( गोलाई ) छत्राकार, कुक्कुट ( के अण्डे ) के आकारवाला, चन्द्राकार और पुरुषाकार हो
सकता है । इस प्रकार एक - एक के चार - चार भेद हो जाते हैं । कामनाओं के भेद के अनुसार उनके फलों को बताया जा रहा है ॥३५ ॥ लिङ्ग के मस्तक के विस्तार को आठ भाग में करना चाहिए । इनमें से प्रथम भाग को विस्तार की ऊँचाई से चार
भाग में विभक्त कर देना चाहिए || ३६ || उसमें प्रत्येक भाग में अनुपात से चार भाग हो जाते हैं । एक भाग को अलग कर देने से जो लिङ्ग बनता है, उसे ' पुण्डरीक ' कहते हैं । दो भागों के लोप से बना हुआ लिङ्ग ' विशाल ', तीन भागों का उच्छेद कर देने पर ' श्रीवत्स ' संज्ञक लिङ्ग तथा चार भागों के लोप से बना हुआ लिङ्ग ' शत्रुकृत ' कहा जाता है । सभी ओर से समसिर श्रेष्ठ होता है और सुर नामक लिङ्ग में वह कुक्कुट ( के अण्डे ) के समान होता है ॥३७-३८ ॥ चार भागों १ घ. आद्यादीनां । २ ख. ल्यादाद्यवृद्ध्या त । ३ घ. ' दुप्रतिमाकृ । च. " न्दुत्रपुषां । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः २२१ चतुर्भागात्मके लिङ्गे त्रपुषं द्वयलोपनात् । अंशात्प्रान्ते युगांशैश्च द्वैकहान्याऽमृताक्षकम् । चतुस्त्रिरेखं वदनं मुखलिङ्गमतः शृणु । अर्काशं पूर्ववत्त्यक्त्वा षट्स्थानानि च वर्तयेत् । वदनं चिबुकं ग्रीवा युगभागैर्भुजाक्षिभिः । मुखं प्रति समः कार्यो विस्तारादष्टमांशतः । कर्णपादाधिकास्तस्य ललाटादीनि निर्दिशेत् । विस्तारादष्टमांशेन मुखानां प्रतिनिर्गमः । ललाटनासिकावक्त्रग्रीवायां च विवर्तयेत् ।
विस्तारस्य षडंशेन मुखैर्निर्गमनं हितम् ।
अनाद्यस्य शिरः प्रोक्तमर्धचन्द्रं शिरः शृणु ॥ ३ ९ ॥
पूर्णबालेन्दुकुमुदं पूजाभागः प्रकर्त्तव्यो शिरोन्नतिः प्रकर्तव्या कराभ्यां मुकुलीकृत्य चतुर्युगं मया प्रोक्तं भुजौ चतुर्भिर्भागैस्तु एकवक्त्रं तथा कार्यं भुजाच्च पञ्चमांशेन द्वित्रिवेदक्षयात्क्रमात् ॥४० ॥
मूर्त्यग्निपदकल्पितः ॥४१ ॥
ललाटं नासिका ततः ॥ ४२ ॥
प्रतिमायाः प्रमाणतः ॥४३ ॥
त्रिमुखं चोच्यते शृणु ॥ ४४ ॥
कर्तव्यौ पश्चिमोर्जितौ ॥४५ ॥
पूर्वास्यं सौम्यलोचनम् ॥४६ ॥
भुजहीनं विवर्तयेत् ॥ ४७ ॥
सर्वेषां मुखलिङ्गानां त्रपुषं वाऽथ कुक्कुटम् ॥४८ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये लिङ्गमानव्यक्ताव्यक्तलक्षणादिकथनं नाम चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
से युक्त लिङ्ग में दो भागों का लोप कर देने से ' त्रपुष ' नामक लिङ्ग बन जाता है । इसे अनाद्य नामक शिवलिङ्ग का सिर कहा जाता है । अब अर्धचन्द्र नामक सिर के सम्बन्ध में सुनिये ॥ ३ ९ ॥ शिवलिङ्ग के प्रान्त भाग में चार अंशों में से एक भाग को हटा देने से लिङ्ग का नाम अमृताक्ष पड़ जाता है । दो, तीन तथा चार अंशों के लोप से बननेवाले लिङ्गों के नाम हैं - पूर्णेन्दु, बालेन्दु और कुमुद ॥४० ॥ यह क्रमशः चतुर्मुख, त्रिमुख और द्विमुख होते हैं । अब मुखलिङ्ग के सम्बन्ध में बताया जा रहा
है, उसे सुनो । पूजा भाग की कल्पना तीन प्रकार से करनी चाहिए - मूर्तिपूजा, अग्निपूजा और पदपूजा ॥४१ ॥ पहले के समान
द्वादशांश का परित्याग करके छह भागों के द्वारा छह स्थानों की अभिव्यक्ति करनी चाहिए । सर्वप्रथम सिरोन्नति करनी चाहिए और उसके बाद ललाट और नासिका को उठाना चाहिए ॥४२ ॥ इसी प्रकार मुख, चिबुक और ग्रीवा को भी स्पष्ट करना
चाहिए । दो भागों द्वारा दोनों भुजाओं तथा नेत्रों के साथ प्रतिमा के प्रमाणानुसार मुकुलाकार हाथों का निर्माण करके विस्तार के अष्टमांश से चारों मुखों को बनाना चाहिए । ये मुख सभी ओर से समान होते हैं । इस प्रकार चार मुखवाले लिङ्ग के सम्बन्ध में बताया गया है । अब त्रिमुख लिङ्ग के सम्बन्ध में बताया जा रहा है, इसे भी सुनिये ॥४३-४४ ॥ त्रिमुख लिङ्ग में चतुर्मुख लिङ्ग की अपेक्षा कान और पेट बड़े होते हैं, किन्तु ललाट इत्यादि पूर्ववत् ही रहते हैं । चार अंशों में से दो भुजाओं का निर्माण चाहिए जिनका पिछला भाग परिपुष्ट हो । मुखों का निर्गम लिङ्ग के विस्तार के अष्टमांश से होना चाहिए । इसी प्रकार करना लिङ्ग का निर्माण भी करना चाहिए जिसमें मुख पूर्व की ओर हो और जिसके नेत्र अत्यन्त सौम्य हों ॥४५-एक मुखवाले के ललाट, नासिका, मुख और ग्रीवा में उभार होना चाहिए । इन भागों को मुद्रा के पञ्चमांश से बनाना चाहिए, ४६ ॥ इस लिङ्ग से हीन ही रखना चाहिए || ४७ || इसमें विस्तार के षडंश से मुख का निर्माण करना चाहिए । इन सभी किन्तु इसे भुजाओं का अथवा कुक्कुट ( के अण्डे ) के आकार का हुआ करता है ॥४८ ॥
लिङ्गों का मुख त्रपुष के आकार श्री अग्निमहापुराण में लिङ्ग के मानादि का व्यक्ताव्यक्त लक्षणवर्णन नामक चौवनवाँ अध्याय समाप्त ॥५४ ॥
१ घ. पूर्वस्यां । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् २२२ अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः पिण्डिकालक्षणम् श्रीभगवानुवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिमानां तु पिण्डिकाम् । दैर्येण प्रतिमा तुल्या उच्छ्रिताऽऽयामतोऽर्थेन सुविस्ताराऽर्धभागतः । तृतीयेन तु वा तुल्यां खातं च तत्प्रमाणं तु किञ्चिदुत्तरतो नतम् । विस्तारस्य चतुर्थेन पिण्डिकार्थेन वा तुल्यं दैर्घ्यमीशस्य ' कीर्तितम् । ऐशं वा तुल्यदीर्घं च ( उच्छ्रायं पूर्ववत्कुर्याद्भागषोडशसंख्यया । अधः षट्कं द्विभागं तु तदर्धेन तु विस्तृता ॥ १ ॥
तत्त्रिभागेन मेखलाम् ॥२ ॥
तोयमार्गं तु कारयेत् ॥ ॥३ ३ ॥ ॥ ज्ञात्वा सूत्र प्रकल्पयेत् ॥४ ॥
कण्ठे ' कुर्यात्त्रिभागकम् ॥५ ॥
शेषास्त्वेकैकशः कार्याः प्रतिष्ठा निर्गमस्तथा । पट्टिका पिण्डिका चेयं सामान्यप्रतिमासु च || ६ || प्रासादद्वारमानेन ' प्रतिमाद्वारमुच्यते । गजव्यालकसंयुक्ता प्रभास्यात्प्रतिमासु च ॥७ ॥
पिण्डिकाऽपि यथाशोभं कर्तव्या सततं हरेः ) । सर्वेषामेव देवानां विष्णूक्तं मानमुच्यते ॥८ || ८ || ॥ देवीनामपि सर्वासां लक्ष्म्युक्तं मानमुच्यते ॥९ ॥
इत्यादि महापुराण आग्नेये पिण्डिकालक्षणवर्णनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
अध्याय ५५ पिण्डिका - लक्षण श्री भगवान् बोले- इसके अनन्तर मैं प्रतिमा की पिण्डिका ( पीठ ) के सम्बन्ध में बताऊँगा । पीठिका, लम्बाई में प्रतिमा के बराबर होनी चाहिए परन्तु चौड़ाई उसकी आधी होनी चाहिए || १ || ऊँचाई और लम्बाई के आधे से और चौड़ाई के आधे से अथवा तिहाई के बराबर पीठिका और उसकी तिहाई के बराबर मेखला बनानी चाहिए ॥२ ॥ उसी परिमाण के बराबर प्रतिमा
से उत्तर की ओर एक गड्ढा खोदना चाहिए जो आगे की ओर कुछ झुका हुआ रहे । उसके विस्तार के चौथाई भाग से जल के निकलने का मार्ग ( प्रणाल ) बनाना चाहिए || ३ || मूलभाग में उसका विस्तार पूर्व के ही बराबर हो, परन्तु आगे चलकर वह आधा हो जाय । पिण्डिका के विस्तार के एक तिहाई भाग के बराबर वह जलमार्ग हो । पिण्डिका के परिमाण के बराबर प्रतिमा की लम्बाई होनी चाहिए । उसी के बराबर ईश की प्रतिमा का परिमाण जानकर सूत्र को बनाना चाहिए ॥४ ॥ सोलह
भाग की संख्या के बराबर ऊँचाई अधोभाग बारह के बराबर और तीन भाग के बराबर कण्ठ बनाना चाहिए । प्रतिष्ठा निर्गम और पट्टिका एक - एक भाग के बराबर बनाना उत्तम होता है । यह सामान्य प्रतिमाओं में पिण्डिका का लक्षण बताया गया है ॥५-६ ॥ प्रासाद द्वार के मान के बराबर प्रतिमा का द्वार होता है । प्रतिमा के चारों ओर हाथी और व्याल से युक्त प्रभामण्डल अवश्य रहना चाहिए ॥७ ॥ विष्णु की पिण्डिका भी सुशोभित होनी चाहिए । सब देवों की प्रतिमा के लिए विष्णु की प्रतिमा
का परिमाण और सब देवियों की प्रतिमा के लिए लक्ष्मी की प्रतिमा का परिमाण उपयुक्त होता है ॥८ - ९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में पिण्डिका का लक्षणवर्णन नामक पचपनवाँ अध्याय समाप्त ॥५५ ॥
१ ख. घ्यंकुश ' । ङ. च. ' र्घ्यदेश ' । २ ख. ङ. च. कुशं । ३. ङ. च. पुत्र ' । ४ उच्छू " सततं हरेः ख. ग. पुस्तकयोर्नास्ति । ५ घ. कण्ठं । ६ ङ. च. ' मा द्रव्यगु ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः २२३ अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः दशदिक्पालयागकथनम् श्रीभगवानुवाच प्रतिष्ठापञ्चकं वक्ष्ये प्रतिमात्मा तु पूरुषः । प्रकृतिः पिण्डिका लक्ष्मीः प्रतिष्ठा योगकस्तयोः ॥१ ॥
इच्छाफलार्थिभिस्तस्मात्प्रतिष्ठा क्रियते नरैः । गर्भसूत्रं तु निःसार्य प्रासादस्याग्रतो गुरुः ॥ २ ॥
अष्टषोडशविंशान्तं मण्डपं चाधमादिकम् । स्नानार्थं कलशार्थं च यागद्रव्यार्थमर्धतः ॥३ ॥
त्रिभागेणार्धभागेन वेदिं कुर्यात्तु शोभनाम् । कलशैर्घटिकाभिश्च वितानाद्यैर्विभूषयेत् ॥४ ॥
पञ्चगव्येन संप्रोक्ष्य सर्वद्रव्याणि धारयेत् । अलङ्कृतो गुरुर्विष्णुं ध्यात्वा तं च प्रपूजयेत् ॥५ ॥
अङ्गुलीयप्रभृतिभिर्मूर्तिपान्प्रार्थनादिभिः । कुण्डे कुण्डे स्थापयेच्च मूर्तिपांस्तत्र पारगान् ॥ ६ ॥
चतुष्कोणे चार्धकोणे वर्तुले पद्मसंनिभे । पूर्वादौ तोरणार्थं तु पिप्पलोदुम्बरौ वटः ॥७ ॥
प्लक्षः सुशोभनं पूर्वं सुभद्रं दक्षतोरणम् ॥ सुकर्माणं सुहोत्रं च आप्ये सौम्ये समुच्छ्रयम् ॥८ ॥
अध्याय ५६ दसदिक्पालयाग - वर्णन श्री भगवान् बोले- अब मैं प्रतिष्ठा के पाँच अङ्गों ( मण्डप निर्माण, तोरण - स्तम्भ, कलशध्वजस्थापन, दसदिक्पालपूजन ) के विषय में बतला रहा हूँ । पुरुष प्रतिमा की आत्मा है, पिण्डिका प्रकृति या लक्ष्मी है । प्रतिष्ठा, प्रकृति और पुरुष को संयुक्त करती है ॥१ ॥ इसलिए अपने मनोरथ को पूर्ण करने की इच्छा से मनुष्य अवश्य प्रतिमा
की प्रतिष्ठा करते हैं । गुरु को प्रासाद के आगे गर्भ - सूत्र को निकालकर आठ, सोलह या बीस हाथ लम्बा मण्डप बनाना चाहिए । ये तीन प्रकार के मण्डप अधम, मध्यम तथा उत्तम कोटि के कहे जाते हैं । मण्डप के आधे भाग में यज्ञीय द्रव्य और स्नान के लिए कलश रखना चाहिए ॥२-३ ॥ मण्डप के तीसरे या आधे भाग में उत्तम वेदी बनानी चाहिए । वेदी को कलश, छोटी - छोटी घण्टियों और वितानों से सुसज्जित करना चाहिए ॥४ ॥ सब यज्ञ-सामग्रियों को पञ्चगव्य छिड़ककर पवित्र कर देना चाहिए । आचार्य को नवीन वस्त्र पहनकर विष्णु का ध्यान और
उनका विधिवत् पूजन करना चाहिए || ५ || प्रत्येक यज्ञ - कुण्ड के निकट अँगूठी, नवीन वस्त्र और मन्त्रों के द्वारा विद्वान् को चारों कोणों पर, अर्धकोण पर तथा प्रत्येक दिशा में वृत्ताकार या पद्माकार कुण्डों के ऊपर मूर्तिपालक विद्वानों की पूजा करके उन्हें बैठाना चाहिए । तोरण के लिए पिप्पल, गूलर, वट और पाकड़ के पत्तों का प्रयोग उत्तम माना गया है ॥६-७ ॥ पूर्व दिशा का द्वार ' सुशोभन ', दक्षिण दिशा का ' सुभद्र ', पश्चिम का ' सुकर्मा ' और उत्तर का द्वार ' सुहोत्र ' १ ख. म. मण्डलं । २ च. ' र्थयागद्रव्यार्थमर्धतः कलशाय च । त्रि । ३ क. ङ. च. सुवर्ण । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् २२४
स्योना पृथिवीति पूजयेत् । तोरणस्तम्भमूले तु कलशान्मङ्गलान्कुरु ' ॥९ ॥
पञ्चहस्तं तु संस्थाप्य ध्वजः कार्यो विचक्षणैः ॥ १० ॥
कुर्याच्चक्रं सुदर्शनम् । पञ्चहस्तप्रमाणस्तु प्रदद्यादुपरिष्टाच्च चास्य कुर्याद्दण्डं सुरोत्तम ॥११ ॥
वैपुल्यं चास्य कुर्वीत षोडशाङ्गुलसंमितम् । सप्तहस्तोच्छ्रितं वर्णाः क्रमाद्ध्वजे ॥ १२ ॥
अरुणोऽग्निनिभश्चैव कृष्णः शुक्लोऽथ पीतकः । कुमुदः कुमुदाक्षश्च पुण्डरीकोऽथ वामनः । पूज्या कोटिगुणैर्युक्ताः पूर्वाद्या ध्वजदेवताः । अष्टाविंशाधिकशतं कालदण्डेन वर्जिताः ।
घटाः स्थाप्याश्च पूर्वादौ वेदिकायाश्च कोणगा: ' ।
कुम्भेष्वावाह्य शक्रादीन्पूर्वादौ पूजयेत्क्रमात् ॥
पूर्वद्वारं च मे रक्ष देवैः सह नमोऽस्तु ते । आगच्छाग्रे शक्तिहस्त छागस्थ बलसंयुतः । अग्निर्मूर्धेति ' मन्त्रेण यजेद्वा अग्नये नमः । रक्तवर्णस्तथा ' श्वेतश्चैते शङ्कुकर्णः सर्वनेत्रः सुमुखः सुप्रतिष्ठितः ॥ १३ ॥
जलाढकसुपूरास्तु पक्वबिम्बोपमाघटाः ॥१४ ॥
सहिरण्या वस्त्रकण्ठाः सोदकास्तोरणाद्बहिः ॥१५ ॥
चतुरः स्थापयेत्कुम्भानाजिघ्रेति समन्ततः ॥ १६ ॥
इन्द्राऽऽवागच्छ देवराज वज्रहस्त गजस्थित ॥१७ ॥ १७ ॥॥
त्रातारमिन्द्रमन्त्रेण अर्चयित्वा यजेद्बुधः ॥ १८ ॥
रक्षाऽऽग्नेयी दिशः देवैस्त्वं समरुद्भि नमोऽस्तु ते ॥१९ ॥
महिषस्थ यमाऽऽगच्छ दण्डहस्त महाबल ॥२० ॥
नाम से प्रसिद्ध है । ये सभी तोरण - स्तम्भ पाँच हाथ लम्बे होने चाहिए । इनकी स्थापना करके ' स्योना पृथिवी ' आदि मन्त्र से पूजन करना चाहिए । तोरण - स्तम्भ के मूल में मांगलिक कलश ( आम्र पल्लव, यवाङ्कर आदि से युक्त ) की स्थापना करनी चाहिए ॥८ - ९ ॥ इन मङ्गल कलशों के ऊपर सुदर्शन - चक्रों का निर्माण करना चाहिए । विद्वान् आचार्य वहाँ पर पाँच हाथ ऊँचा एक ध्वज भी गाड़ दे || १० ॥ अये सुरोत्तम! ध्वज की लम्बाई सोलह अंगुल की और डण्डे की ऊँचाई सात हाथ की होनी चाहिए || ११ || पूर्वादि दिशाओं में ध्वजाओं का वर्ण क्रमशः अरुण, अग्नि के समान, काला, शुक्ल, पीत, रक्त, श्वेतवर्ण होना चाहिए । इनमें कुमुद, कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शङ्कुकर्ण, सर्वनेत्र, सुमुख और सुप्रतिष्ठित कोटिगुणों से युक्त इन ध्वज देवताओं की पूजा करनी चाहिए ॥१२-१३३ ॥ पके हुए बिम्बफल के समान रक्तवर्ण के कलश जिनकी संख्या एक सौ अट्ठाईस ( १२८ ) हो, वे एक - एक आढक जल से पूर्णतः भरे हों । ' कालदण्ड ' नामक योग से रहित समय में इनकी स्थापना करनी चाहिए । सभी कलशों में सुवर्ण डालकर वस्त्र से कण्ठ तक ढककर जलपूर्ण कलश तोरण से बाहर स्थापित करने चाहिए ॥१४-१५ ॥ वेदी के पूर्व आदि दिशाओं तथा कोणों में भी कलश स्थापित करने चाहिए । चारों ओर चार कलशों को ' आजिघ्रकलशम् ' इत्यादि मन्त्र से स्थापित करे ॥१६ ॥ पूर्व आदि दिशाओं
में उन कलशों पर क्रमश: इन्द्र आदि देवताओं का आवाहन करके क्रमशः उनकी पूजा करे । हे ऐरावत! हाथी पर विराजमान इन्द्र! देवराज! वज्रहस्त! आइये । इस पूर्व द्वार में देवों के सहित स्थित होकर मेरी रक्षा कीजिये, आपको नमस्कार • है । इस प्रकार विद्वान् व्यक्ति रक्षक इन्द्र की ' त्रातारमिन्द्र ' इत्यादिक मन्त्र से पूजा करे || १७-१८ ॥ शक्तिहस्त, छागवाहन, बलशाली, हे आग्ने! आप आग्नेय दिशा की रक्षा करें, मेरी इस पूजा को स्वीकार करें, आपको नमस्कार है ॥१९ ॥
‘ अग्निर्मूर्घादिव ' इत्यादि मन्त्र से अथवा ' अग्नये नमः ' आदि मन्त्र से अग्नि की पूजा करे । हे महिषस्थ! दण्डहस्त, महाबल, १ क. ' लाङ्करान् । प्र । २ ख. नैपुण्यं चास्य । ३ क. ख. घ. ङ. च. ' र्यात्कुण्डं । ४ घ. श्वेतः श्वेत ' वर्णादिकक्रमात् । कु ' । ५ घ. “ लमण्डनवार्जिताः । ६ घ. ङ. कोणगान् । ७ त्रातारमिन्द्र " यजेद्बुधः च पुस्तके नास्ति । ८ ख. ' ति अर्ध्याद्यैर्यजे ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः २२५ रक्षस्व दक्षिणं द्वारं वैवस्वत नमोऽस्तु ते नैर्ऋताऽऽगच्छ खड्गाढ्य बलवाहनसंयुत एष ते नैर्ऋतेत्यादि यजेदर्घ्यादिभिर्नरः आगच्छ पश्चिमं द्वारं रक्ष रक्ष नमोऽस्तु ते आगच्छ वायो सबल ध्वजहस्तसवाहन वात इत्यादिभिश्चार्चेदोन्नमो वायवेऽपि वा रक्षत्वमुत्तरं द्वारं सकुबेर नमोऽस्तु ते आगच्छेशान सबल शूलहस्त वृषस्थित ईशानमस्येति यजेदीशानाय नमोऽपि वा सलोकोर्ध्वां दिशं रक्ष यज्ञस्याज नमोऽस्तु ते अनन्तागच्छ चक्राढ्य कूर्मस्था हि गणेश्वर नमोऽस्तु सर्पेति यजेदनन्ताय नमोऽपि वा । वैवस्वतं संगमनमित्यनेन यजेद्यमम् ॥ २१ ॥
। इदमर्घ्यमिदं पाद्यं रक्षत्वं नैर्ऋतीं दिशम् ॥२२ ॥
। मकरारूढ वरुण पाशहस्त महाबल ॥२३ ॥
। उरुं हि राजा वरुण यजेदर्घ्यादिभिर्गुरुः ॥२४ ॥
। वायव्यं रक्ष देवैस्त्वं समरुद्भिर्नमोऽस्तु ते ॥२५ ॥
। अगच्छ सोम सबल गदाहस्त सवाहन ॥२६ ॥
1 । सोमं राजानमिति वा यजेत्सोमाय वै नमः ॥ २७ ॥
। यज्ञमण्डपस्यैशानीं दिशं रक्ष नमोऽस्तु ते ॥ २८ ॥
। ( ब्रह्मन्नागच्छ हंसस्थ स्रुक्स्रुवव्यग्रहस्तक ॥२९ ॥
। हिरण्यगर्भेतियजेन्नमस्ते ब्रह्मणेऽपि वा ) ॥ ३० ॥
1 । अधोदिशं रक्ष रक्ष अनन्तेश नमोऽस्तु ते ॥ ३१ ॥
॥३२ ॥
इत्यादि महापुराण आग्नेये दशदिक्पालयागकथनं नाम षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥
सूर्यपुत्र, यम, आप दक्षिण दिशा की रक्षा कीजिये, आपको नमस्कार है । यम का आवाहन कर ' वैवस्वतं संगमन ' इत्यादि मन्त्र से उनकी पूजा करे ॥२०- २१ ॥ हे नैर्ऋत, खड्गहस्त, बलवाहनसंयुत, आपको यह पाद्य और अर्घ्य प्रदान कर रहा हूँ । आप नैर्ऋत दिशा में मेरी रक्षा करें ॥२२ ॥ इस प्रकार आवाहन करके ' एष ते नैर्ऋत ' इत्यादि मन्त्र से अर्घ्य
आदि दें । हे महाबल, मकरारूढ़, पाशहस्त, वरुण! आइये, पश्चिम द्वार की रक्षा करें । ' आपको नमस्कार है - इस मन्त्र से आवाहन करके ' उरु हि राजा वरुण ' इत्यादि मन्त्र से आचार्य को वरुण की अर्ध्यादि से पूजा करनी चाहिए ॥२३-२४ ॥ हे वायु, सबल, ध्वजहस्त, वाहनयुक्त आप मरुत आदि देवों के साथ आइये और वायव्य दिशा में मेरी रक्षा करें । इस मन्त्र से आवाहन करके ' ॐ नमो वायवे ' इत्यादि मन्त्र से या ' वात ' इत्यादि मन्त्र से वायु की पूजा करे ॥२५-२५ ॥ हे सोम, सबल, गदाहस्त! वाहनयुक्त आप कुबेर सहित उत्तर दिशा में हमारी रक्षा करें । आपको नमस्कार है । ' सोमाय नमः ' इस मन्त्र से या ' सोमं राजानम् ' इत्यादि तन्त्र से सोम की पूजा करे ॥ २६-२७ ॥ हे ईशान, वृषस्थित, शूलहस्त, सबल, आपको नमस्कार है । आप यज्ञ - मण्डप के ईशानकोण में हमारी रक्षा करें, इस मन्त्र से आवाहन करके ' ईशान मस्य ' इत्यादि मन्त्र से ईशान की पूजा करे ॥२८-२८३ ॥ ब्रह्मा का आवाहन ' हे ब्रह्मन्! हंसस्थ! स्रुक् और स्रुव को अपने हाथ में धारण करनेवाले अज! आपको नमस्कार है । आप इस यज्ञ की रक्षा करें - इस मन्त्र से आवाहन करके ' हिरण्यगर्भ ' इत्यादि अथवा ' नमस्ते ब्रह्मणे ' इत्यादि मन्त्र से ब्रह्मा की पूजा करे ॥२९ -३० ॥ हे अनन्त, कूर्मस्थ, अहिगणों के ईश्वर, चक्राढ्य, अनन्तेश! आपको नमस्कार है । अधो दिशा की आप रक्षा करें - इस मन्त्र से आवाहन करके ‘ नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ' अथवा ' अनन्ताय नमः ' इत्यादि मन्त्र से अनन्त देव की पूजा करे ॥३१-३२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में दसदिक्पालयाग कथन नामक छप्पनवाँ अध्याय समाप्त ॥५६ ॥
१ क. ख. घ. ऋतमन्त्रेण य ' । २ ब्रह्मन्नागच्छ ब्रह्मणेऽपि वा ङ. च. पुस्तकयोर्नास्ति । १५ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२२६ अग्निपुराणम् अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः कलशाधिवासविधिकथनम् श्रीभगवानुवाच भूमेः परिग्रहं कुर्यात्क्षिपेवीहींश्च सर्षपान् । भूमिं घटे तु सम्पूज्य ' सरले साङ्गकं हरिम् । अच्छिन्नधारया सिञ्चन्न्रीहीन्संस्कृत्य धारयेत् । सवस्त्रे कलशे भूयः पूजयेदच्युतं श्रियम् । कुशोपरि तूलिकां च शय्यायां दिग्विदिक्षु च । वामनं दिक्षु वहन्यादौ श्रीधरं च हृषीकेशम् । अभ्यर्च्य पश्चादैशान्यां चतुष्कुम्भे सवेदिके । स्नानकुम्भेषु कुम्भांस्तांश्चतुर्दिक्ष्वधिवासयेत् वटोदुम्बरकाश्वत्थांश्चम्पकाशोकश्रीद्रुमान् पल्लवांस्तु समानीय पूर्वकुम्भे विनिक्षिपेत् नारसिंहेन रक्षोघ्नान्प्रोक्षयेत्पञ्चगव्यतः ॥ १ ॥
अस्त्रमन्त्रेण करकं तत्र चाष्टशतं यजेत् ॥ २ ॥
प्रदक्षिणं परिभ्राम्य कलशं विकिरोपरि ॥ ३ ॥
योगे योगेति मन्त्रेण न्यसेच्छय्यां तु मण्डले ॥ ४ ॥
विद्याधिपान्यजेद्विष्णुं मधुघातं त्रिविक्रमम् ॥५ ॥
पद्मनाभं दामोदरमैशान्यां स्नानमण्डपे ॥६ ॥
स्नानमण्डपके सर्वद्रव्याण्यानीय निक्षिपेत् ॥ ॥७ ७ ॥ ॥ । कलशाः स्थापनीयास्तु अभिषेकार्थमादरात् ॥८ ॥
। पलाशार्जुनप्लक्षांस्तु कदम्बबकुलाम्रजान् ॥९ ॥
। पद्मकं रोचनां दूर्वां दर्भपिञ्जलमेव च ॥ १० ॥
अध्याय ५७ कलशाधिवासन वर्णन श्री भगवान् बोले - भूमि का संस्कार करके रक्षोघ्न व्रीहि तथा सरसों को नारसिंह मन्त्र पढ़कर चारों ओर छीटे और पञ्चगव्य को सब पूजन - सामग्रियों के ऊपर छिड़के ॥१ ॥ रत्न के साथ घट पर भूमि और हरि की अङ्ग - देवताओं
के साथ पूजा करके अस्त्र - मन्त्र से एक सौ आठ कारकों की पूजा करे ॥२ ॥ व्रीहि ( धान्य ) को निरन्तर जलधार से
सींचकर या धोकर एक ओर रख ले । तदनन्तर प्रदक्षिणा करके धान्य को पृथ्वी पर बिखेरकर उस पर कलश को रखे ॥३ ॥ कलश पर वस्त्र लपेटकर उस पर अच्युत और श्री की पूजा करे । ' योगे - योगे ' इत्यादि मन्त्र से मण्डल में शय्या
लगाकर रखे ॥४ ॥ कुश के ऊपर रूई रखकर शय्या पर प्रत्येक दिशाओं और कोणों में विद्याधीशों की मधुसूदन,
त्रिविक्रम, हरि और वामन की चारों दिशाओं में पूजा करे । वह्नि आदि कोण में श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ और दामोदर का अर्चन करे । तदनन्तर ईशानकोणों में वेदी पर चतुष्कुम्भ रखकर और उसकी पूजा करके स्नानमण्डप में लायी हुई सब प्रकार की सामग्रियों को उन कलशों में छोड़ दे ॥५-७ ॥ स्नान - कलशों को चारों दिशाओं में रखे और स्नानार्थ कलश को चारों दिशाओं में आदर के साथ स्थापित करना चाहिए । बरगद, गूलर, पीपल, चम्पक, अशोक, श्रीद्रुम ( बिल्व ), पलाश, अर्जुन, पाकड़, कदम्ब, मौलश्री ( बकुल ) और आम्र के पल्लवों को लाकर पूर्व दिशा में स्थापित कलश पर छोड़े ॥८ - ९ ३ ॥ कमल, रोचना, दूर्वा, कुश, हरिद्रा, मालती, कुन्दपुष्प, चन्दन, रक्तचन्दन, १ ख. संग्राह्य । २ ख. " संत्यज्य धा ' । ङ. च. ' न्संहृत्य था । ३ घ. वाय्वादौ । ४ घ. प्रकान् । ५ ङ. च. पूर्णकुम्भे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA