अग्नि पुराण — पृष्ठ 211–220
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 211–220
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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः चण्ड्यादिदेवताप्रतिमालक्षणानि श्रीभगवानुवाच चण्डी विंशतिबाहुः स्याद् बिभ्रती दक्षिणैः करैः । शूलासिशक्तिचक्राणि डमरुं शक्तिकां वामैर्नागपाशं च खेटकम् । कुठाराङ्कुशपाशांश्च २०७ पाशखेटायुधाभयम् ॥१ । घण्टायुधगदास्तथा ॥२ ॥
आदर्शमुद्गरान्हस्तैश्चण्डी वा दशबाहुका ॥ तदधो महिषश्छिन्नमूर्ध्ना पातितमस्तकः ॥३ ॥
शस्त्रोद्यतकरः क्रुद्धस्तद्ग्रीवासम्भवः पुमान् । शूलहस्तो वमद्रक्तो रक्तस्त्रमूर्धजेक्षणः ॥४ ॥
सिंहेनास्वाद्यमानस्तु पाशबद्धो गले भृशम् । याम्याङ्घ्रयाक्रान्तसिंहा च सव्याङ्घिर्नीचगासुरे ॥५ ॥
चण्डिकेयं त्रिनेत्रा च सशस्त्रा रिपुमर्दिनी । नवपद्मात्मके स्थाने पूज्या दुर्गा स्वमूर्तितः ' ॥ ६ ॥
आदौ मध्ये तथेन्द्राद्या नवतत्त्वात्मभिः ' क्रमात् । अष्टादशभुजैका तु दक्षे मुण्डं च खेटकम् ॥७ ॥
आदर्शं तर्जनीं चापं ध्वजं डमरुकं तथा । पाशं वामे बिभ्रती च शक्तिमुद्गरशूलकम् ॥८ ॥
अध्याय ५० चण्डी आदि देवताप्रतिमाओं के लक्षण श्री भगवान् बोले - चण्डी बीस भुजावाली हो जो अपने दक्षिण हाथों में शूल, खड्ग, शक्ति, चक्र, पाश, खेट, आयुध, अभय, डमरू और शक्ति धारण करती हो । बायें हाथों में नागपाश, खेटक, कुठार, अंकुश, पाश, घंटा, आयुध, गदा, दर्पण और मुद्गर लिये हो अथवा चण्डी की प्रतिमा दस भुजाओं से युक्त होनी चाहिए । उसके चरणों के नीचे कटे हुए मस्तकवाला महिष हो । उसका मस्तक अलग गिरा हुआ हो । वह हाथों में शस्त्र उठाये हो । उसकी ग्रीवा से एक पुरुष प्रकट हो गया हो जो अत्यन्त कुपित हो । उसके हाथ में शूल हो, वह मुँह से रक्त उगल रहा हो । उसके गले की माला, सिर के बाल और दोनों नेत्र लाल दिखायी देते हों । देवी का वाहन सिंह उसके रूप का आस्वादन कर रहा हो । उस महिषासुर के गले में खूब कसकर पाश बाँधा गया हो । देवी का दाहिना पैर सिंह पर और बायाँ पैर नीचे महिषासुर के शरीर पर हो ॥१-५ ॥ वे चण्डी देवी त्रिनेत्रधारिणी हैं तथा शस्त्रों से सम्पन्न रहकर शत्रुओं का मर्दन करनेवाली हैं । नवकमलात्मक पीठ पर दुर्गा की प्रतिमा में उनकी पूजा करनी चाहिए । पहले कमल के नौ दलों में तथा मध्यवर्तिनी कर्णिका में इन्द्र आदि दिक्पालों की तथा नौ तत्त्वात्मिका शक्तियों के साथ दुर्गा की पूजा करे ॥६-६३ ॥ दुर्गा की एक प्रतिमा अट्ठारह भुजाओं की होती है । वह दाहिने भाग के हाथों में मुण्ड, खेटक, दर्पण, तर्जनी, धनुष, ध्वज, डमरू, ढाल और पाश धारण करती हैं तथा वाम भाग की भुजाओं में शक्ति, मुद्गर, १ क. ङ. च. स्वरूपतः । २ क. ङ. च. त्वाणुभिः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२०८ अग्निपुराणम् देवी शलाकया । एतैरेवायुधैर्युक्ताः शेषाः षोडशबाहुकाः ॥ ९ ॥
वज्रखङ्गाङ्कुशशरांश्चक्रं तर्जनीं त्यक्त्वा रुद्रचण्डादयो नव । रुद्रचण्डा प्रचण्डा च चण्डोग्रा चण्डनायिका ॥ १० ॥
डमरुं चण्डा चण्डवती चैव चण्डरूपातिचण्डिका । उग्रचण्डा च मध्यस्था रोचनाभारुणासिता ॥ ११ ॥
नीला शुक्ला धूम्रिका च पीता श्वेता च सिंहगा । महिषोत्थः पुमाञ्शस्त्री तत्कचग्रहमुष्टिका ॥ १२ ॥
आलीढा नव दुर्गाः स्युः स्थाप्याः पुत्रादिवृद्धये । तथा गौरी चण्डिकाद्या कुण्ड्यक्षररदाग्निधृक् ॥१३ ॥
सैव रम्भा वने सिद्धाऽग्निहीना ललिता तथा । स्कन्धमूर्धकरा वामे द्वितीये धृतदर्पणा ॥ १४ ॥
याम्ये ' कलाङ्गुलिहस्ता सौभाग्या तत्र चर्द्धिका ' । लक्ष्मीर्याम्यकराम्भोजा वामे श्रीफलसंयुता ॥१५ ॥ १५ ॥ ॥
पुस्ताक्षमालिका हस्ता वीणाहस्ता सरस्वती । कुम्भाब्जहस्ता श्वेताभा मकरे वापि जाह्नवी ॥ १६ ॥
कूर्मगा यमुना कुम्भकरा श्यामा च पूज्यते । सवीणस्तुम्बुरुः शस्त: शूली मात्रग्रतो वृषे ॥ १७ ॥
गौरी चतुर्मुखी ब्राह्मी अक्षमालास्स्रुगन्विता । कुण्डाक्षपात्रिणी वामे हंसगा शाङ्करी स्थिता ॥ १८ ॥
शूल, वज्र, खड्ग, अंकुश, बाण, चक्र और शलाका लिये रहती हैं । सोलह बाँहवाली दुर्गा की प्रतिमा भी इन्हीं आयुधों में युक्त होती है । अठारह में से दो भुजाओं तथा डमरू और तर्जनी- इन दो आयुधों को छोड़कर शेष सोलह हाथ उन पूर्वोक्त आयुधों से ही सम्पन्न होते हैं । रुद्रचण्डा आदि नौ दुर्गाएँ इस प्रकार हैं - रुद्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा, अतिचण्डिका और उग्रचण्डा । ये पूर्वादि आठ दिशाओं में पूजित होती हैं और नवीं उग्रचण्डा मध्यभाग में स्थापित एवं पूजित होती हैं । रुद्रचण्डा आदि आठ देवियों की अंगकान्ति क्रमशः गोरोचना के सदृश पीली, अरुणवर्णा, काली, नीली, शुक्लवर्णा, धूमवर्णा, पीतवर्णा और श्वेतवर्णा है । वे सब - की - सब सिंहवाहिनी हैं । महिषासुर के कण्ठ से प्रकट हुआ जो पुरुष है वह शास्त्रधारी है और ये पूर्वोक्त देवियाँ अपनी मुट्ठी में उसका केश पकड़े रहती हैं ॥७-१२ ॥ । ये नौ दुर्गाएँ ' आलीढा ' आकृति की होनी चाहिए । पुत्र - पौत्र आदि की वृद्धि के लिए इनकी स्थापना ( एवं पूजा ) करना उचित है । गौरी ही चण्डिका आदि देवियों के रूप में पूजित होती हैं । वे ही हाथों में कुण्डी, अक्षमाला, गदा और अग्नि धारण करके ' रम्भा ' कहलाती हैं । वे ही वन में ' सिद्धा ' कही गयी हैं । सिद्धावस्था में वे अग्नि से रहित होती हैं । ' ललिता ' भी वे ही हैं । उनका परिचय इस प्रकार है - उनके एक बायें हाथ में गर्दन सहित मुण्ड है और दूसरे में दर्पण । दाहिने हाथ में कलाङ्गुलि है और उससे ऊपर के हाथ में सौभाग्य की गदा ॥१३-१४३ ॥ लक्ष्मी के दायें हाथ में कमल और बायें हाथ में श्रीफल होता है । सरस्वती के दो हाथों में पुस्तक और अक्षमाला शोभा पाती है और शेष दो हाथों में वे वीणा धारण करती हैं । गङ्गा जी की अङ्गकान्ति श्वेत है । वे मकर पर आरूढ़ हैं । उनके एक हाथ में कलश है और दूसरे में कमल । यमुना देवी कछुए पर आरूढ़ हैं । उनके दोनों हाथों में कलश है और वे श्यामवर्णा हैं । इसी रूप में इनकी पूजा होती है । तुम्बुरु की प्रतिमा वीणासहित होनी चाहिए । उनकी अङ्गकान्ति श्वेत है । शूलपाणि शंकर वृषभ पर आरूढ़ हो मातृकाओं के आगे - आगे चलते हैं । ब्रह्मा जी की प्रिया सावित्री गौरवर्णा एवं चतुर्मुखी हैं । उनके दाहिने हाथ में अक्षमाला और स्रुक् शोभा पाते हैं और बायें हाथ में वे कुण्ड एवं अक्षपात्र लिये रहती हैं । उनका वाहन हंस है । शंकर - प्रिया पार्वती वृषभ पर आरूढ़ होती हैं । १ ख. ग. त्रयो । २ घ. म्ये फला ' । ३ घ. चोविका । ४ घ. शुक्लः । ५ क. ङ. च. सिता । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः शरचापौ दक्षिणेऽस्या वामे चक्रं धनुर्वृषौ शङ्खचक्रधरा सव्ये वामे लक्ष्मीर्गदाब्जधृक् ऐन्द्री गजे ' वज्रहस्ता सहस्राक्षी तु सिद्धये निर्मांसा अस्थिसारा वा ऊर्ध्वकेशी कृशोदरी शूलं कर्त्री दक्षिणे स्याच्छवारूढास्थिभूषणा बृहच्छुण्डो ह्यपवीती मुखं सप्तकलं भवेत् कला द्वादश नाडी तु ग्रीवा सार्धकलोच्छ्रिता नाभिरूरू द्वादशं च जङ्घे पादे तु दक्षिणे सुमुखी च विडालाक्षी ' पार्श्वे स्कन्दो मयूरग: दक्षे शक्तिः कुक्कुटेऽथ एकवक्त्रोऽथ षण्मुखः शक्तीषुपाशनिस्त्रिंश ' गदासत्तर्जनीयुतः उनके दाहिने हाथ में धनुष - बाण और बायें हाथ में चक्र २० ९ । कौमारी शिखिगा रक्ता शक्तिहस्ता द्विबाहुका ॥१९ ॥
। दण्डशङ्खारिगदया ' वाराही महिषस्थिता ॥२० ॥
। चामुण्डा कोटराक्षी स्यान्निर्मांसा तु · त्रिलोचना ॥ २१ ॥
। द्वीपिचर्मधरा वामे कपालं पट्टिशं करे ॥ २२ ॥
। विनायको नराकारो बृहत्कुक्षिर्गजाननः ॥२३ ॥
। विस्ताराद् दैर्ध्यतश्चैव शुण्डं ' षट्त्रिंशदलङ्गुलम् ॥२४ ॥
। षट्त्रिंशदङ्गुलः कण्ठो गुह्यमध्यर्धमङ्गुलम् ॥२५ ॥
। स्वदन्तं परशुं वामे लड्डुकं चोत्पलं शये ॥ २६ ॥
। स्वामी शाखो विशाखश्च द्विभुजो बालरूपधृक् ॥२७ ॥
। षड्भुजो वा द्वादशभिर्ग्रामेऽरण्ये द्विबाहुकः ॥ २८ ॥
। शक्त्या दक्षिणहस्तेषु षट्सु वामे करे तथा ॥ २ ९ ॥ - धनुष शोभित होते हैं । कौमारी शक्ति मोर पर आरूढ़ होती है । उनकी अङ्गकान्ति लाल होती है । उनके दो हाथ हैं और वे अपने हाथों में शक्ति धारण करती हैं ॥ १५-१९ ॥ लक्ष्मी अपने दायें हाथ में चक्र और शंख धारण करती हैं तथा बायें हाथ में गदा एवं कमल लिये रहती हैं । वाराही शक्ति भैंसे पर आरूढ़ होती है । उनके हाथ दण्ड, शंख, चक्र और गदा से सुशोभित होते हैं । ऐन्द्री शक्ति ऐरावत पर आरूढ़ होती है । उनके सहस्र नेत्र हैं तथा उनके हाथों में वज्र शोभा पाता है । ऐन्द्री देवी पूजित होने पर सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं । चामुण्डा की आँखें वृक्ष के खोखले की भाँति गहरी होती हैं । उनका शरीर मांसरहित - कंकाल दिखायी देता है । उनके तीन नेत्र हैं । मांसहीन शरीर में अस्थिमात्र ही सार है । केश ऊपर की ओर उठे हुए हैं । पेट सटा हुआ है । हाथी का चमड़ा पहनती हैं । उनके बायें हाथ में कपाल और पट्टिश है तथा दायें हाथ में शूल और कटार है । वे शव पर आरूढ़ होती हैं और हड्डियों के गहनों से अपने शरीर को विभूषित करती हैं ॥२०- २२३ ॥ विनायक की आकृति मनुष्य के समान है किन्तु उनका पेट बहुत बड़ा है । मुख हाथी के समान है और सूँड़ लम्बी है । वे यज्ञोपवीत धारण करते हैं । उनके मुख की चौड़ाई सात कला है और सूँड़ की लम्बाई छत्तीस अंगुल । उनकी नाड़ी ( गर्दन के ऊपर की हड्डी ) बारह कला विस्तृत और गर्दन डेढ़ कला ऊँची होती है । उनके कण्ठभाग की लम्बाई छत्तीस अंगुल है और गुह्यभाग का घेरा डेढ़ अंगुल ॥२३-२५ ॥ नाभि और ऊरु का विस्तार बारह अंगुल है । जाँघों और पैरों का भी यही माप है । वे दाहिने हाथों में गजदन्त और फरसा धारण करते हैं तथा बायें हाथों में लड्डू एवं उत्पल लिये रहते हैं ॥ २६ ॥ स्कन्द स्वामी मयूर पर आरूढ़ हैं ।
उनके उभय पार्श्व में सुमुखी और विडालाक्षी मातृका तथा शाख और विशाख अनुज खड़े हैं । उनके दो भुजाएँ हैं । वे बालरूपधारी हैं । उनके दाहिने हाथ में शक्ति शोभा पाती है और बायें हाथ में कुक्कुट । उनके एक या छह मुख बनाने चाहिए । कौमारी शक्ति की छहों दाहिनी भुजाओं में शक्ति, बाण, पाश, खड्ग, गदा और तर्जनी ( मुद्रा ) -ये अस्त्र रहने चाहिए १ क. ङ. च. ' खादिग ' । २ ख. ग. घ. वामे । ३ क. ङ. च. बृहद्दण्डो । ४ क. कुण्ड । ५ घ. बिडालाक्षी । ६ ङ. षड्दन्तो । ७ ख. ग. ' शस्तत्रदोस्तर्ज ' । १४ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२१० अग्निपुराणम्
शिखिपिच्छं धनुः खेटं पताकाभयकुक्कुटे । कपालकर्तरीशूलपाशभृद्याम्यसौम्ययोः ॥३० ॥
( ' गजचर्मभृदूर्ध्वास्यपादा स्याद्रुद्रचर्चिका ) । सैव चाष्टभुजा देवी शिरोडमरुकान्विता ॥३१ ॥
तेन सा रुद्रचामुण्डा ' नाटेश्वर्यथ नृत्यती । इयमेव महालक्ष्मीरूपविष्टा चतुर्मुखी || ३२ || नृवाजिमहिषेभांश्च खादन्ती च करे स्थितान् । दशबाहुस्त्रिनेत्रा च शस्त्रासिडमरुत्रिकम् ॥३३ ॥
बिभ्रती दक्षिणे हस्ते वामे घण्टां च खेटकम् । खट्वाङ्गं च त्रिशूलं च सिद्धचामुण्डिकाह्वया ॥३४ ॥
सिद्धयोगेश्वरी देवी सर्वसिद्धिप्रदायिका । एतद्रूपा भवेदन्या पाशाङ्कुशयुतारुणा ॥ ३५ ॥
भैरवी रूपविद्या तु भुजैर्द्वादशभिर्युता । एताः श्मशानजा रौद्रा ' अम्बाष्टकमिदं स्मृतम् ॥३६ ॥
क्षमा शिवावृता वृद्धा द्विभुजा विवृतानना । दन्तुरा क्षेमकारी स्याद् भूमौ जानुकरा स्थिता ॥ ३७ ॥
यक्षिण्यः स्तब्धदीर्घाक्ष्यः शाकिन्यो वक्रदृष्टयः । पिङ्गाक्ष्यः स्युर्महारम्या रूपिण्योऽप्सरसः सदा ॥३८ ॥
साक्षमालस्त्रिशूली ' च नन्दीशो द्वारपालकः । महाकालोऽसिमुण्डी स्याच्छूलखेटकरस्तथा ॥ ३ ९ ॥ कृशो भृङ्गी च नृत्यन्वै कूष्माण्डस्थूलखर्ववान् । गजगोकर्णवक्त्राद्या वीरभद्रादयो गणाः ॥ ४० ॥
घण्टाकर्णोऽष्टादशदोः पापरोगं पापरोगं विदारयन् । वज्रासिदण्डचक्रेषु मुसलाङ्कुशमुद्गरान् ॥४१ ॥
और छह बायें हाथों में मोरपंख, धनुष, खेट, पताका, अभयमुद्रा तथा कुक्कुट होने चाहिए । रुद्रचर्चिका देवी हाथी के चर्म धारण करती हैं । उनके मुख और एक पैर ऊपर की ओर उठे हैं । वे बायें - दायें हाथों में क्रमश: कपाल, कर्तरी, शूल और पाश धारण करती हैं । वे ही देवी - ' अष्टभुजा ' के रूप में चर्चित होती हैं - वे मुण्डमाला और डमरू से सुशोभित होती हैं ॥२७-३१ ॥ इसी ( अर्थात् डमरू और मुण्डमाला से युक्त होने के कारण से वे ही रुद्रचामुण्डा कही गयी हैं । वे नृत्य करती हैं, इसलिए नाट्येश्वरी कहलाती हैं । ये ही आसन पर बैठी हुई चतुर्मुखी ' महालक्ष्मी ' ( की तामसी मूर्ति ) कही गयी हैं, जो अपने हाथों में पड़े हुए मनुष्यों, घोड़ों, भैंसों और हाथियों को खा रही हैं । सिद्धचामुण्डा देवी के दस भुजाएँ और तीन नेत्र हैं । ये दाहिने भाग के पाँचों हाथों में शस्त्र, खड्ग तथा तीन डमरू धारण करती हैं और बायें भाग के हाथों में घण्टा, खेटक, खट्वाङ्ग, त्रिशूल ( और ढाल ) लिये रहती हैं । सिद्धयोगेश्वरी देवी सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं । इन्हीं देवी की स्वरूपभूता एक दूसरी शक्ति हैं, जिनकी अंगकान्ति अरुण है । ये अपने दो हाथों में पाश और अंकुश धारण करती हैं तथा भैरवी नाम से विख्यात हैं । रूपविद्या बारह भुजाओं से युक्त कही गयी हैं । ये सब की सब श्मशान - -भूमि १ में प्रकट होनेवाली तथा भयंकर हैं । इन आठों देवियों को अम्बाष्टक कहते हैं ॥ ३२-३६ ॥ क्षमादेवी - शृगालियों से आवृत हैं । वे एक बूढ़ी स्त्री के रूप में स्थित हैं । उनके दो भुजाएँ हैं । मुँह खुला हुआ है, दाँत निकले हुए हैं तथा ये धरती पर घुटनों और हाथ का सहारा लेकर बैठी हैं । उनके द्वारा उपासकों का कल्याण होता है । यक्षिणियों की आँखें एकटक देखनेवाली और बड़ी होती हैं । शाकिनियाँ वक्रदृष्टि से देखनेवाली होती हैं । अप्सराएँ सदा ही अत्यन्त रमणीय एवं सुन्दर रूपवाली होती हैं । इनकी आँखें भूरी होती हैं ॥३७-३८ ॥ भगवान् शंकर के द्वारपाल नन्दीश्वर एक हाथ में अक्षमाला और दूसरे में त्रिशूल लिये रहते हैं । महाकाल के एक हाथ में तलवार, दूसरे में कटा हुआ सिर, तीसरे में शूल और चौथे में खेट होना चाहिए । भृङ्गी का शरीर कृश होता है । वे नृत्य की मुद्रा में देखे जाते हैं । उनका मस्तक कूष्माण्ड के समान स्थूल और गंजा होता है । वीरभद्र आदि गण हाथी और गाय के समान कान और मुखवाले होते हैं । वे पाप और रोग का विनाश करनेवाले हैं । वे बायें भाग के आठों हाथों में वज्र, खड्ग, दण्ड, चक्र, बाण, मुसल, अंकुश और मुद्गर तथा दायें भाग में आठ हाथों में तर्जनी, खेट, शक्ति, १ गजचर्म चर्चिका क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । २. क. ङ. च. भद्रचामुण्डा । ३ च. नाटेश्व ' । ४ आद्याष्टकमिति कुत्रचित्पुस्तके पाठः । ५ ख. ग. ' क्षपात्रा त्रिशू । ६ घ. ' कवांस्त ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २११ दक्षिणे तर्जनीं खेटं शक्ति मुण्डं च पाशकम् । चापं घण्टां कुठारं च द्वाभ्यां चैव त्रिशूलकम् ॥४२ ॥
घण्टामालाकुलो देवो विस्फोटकविमर्दनः ॥४३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये चण्ड्यादिदेवताप्रतिमालक्षणनिरूपणं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सूर्यादिग्रहदेवताप्रतिमालक्षणानि श्रीभगवानुवाच ससप्ताश्वे सैकचक्रे रथे सूर्यो द्विपद्मधृक् । मषीभाजनलेखन्यौ ' बिभ्रद्दण्डी ' तु दक्षिणे ॥१ ॥
वामे तु पिङ्गलो द्वारि दण्डभृत्स रवेर्गणः । बालव्यजनधारिण्यौ पार्श्वे राज्ञी च निष्प्रभा ॥ २ ॥
अथवाश्वसमारूढः कार्य एकस्तु भास्करः । वरदा द्व्यब्जिनः सर्वे दिक्पाः शस्त्रकराः क्रमात् ॥३ ॥
मुद्गरशूलचक्राब्जभृतोऽग्न्यादिविदिविस्थताः । सूर्यार्यमादिरक्षोऽन्ताश्चतुर्हस्ता द्विषड्दले ॥४ ॥
मुण्ड, पाश, धनुष, घण्टा और कुठार धारण करते हैं । शेष दो हाथों में त्रिशूल लिये रहते हैं । घण्टी की माला से अलंकृत देव घण्टाकर्ण विस्फोटक ( फोड़े आदि ) का निवारण करनेवाले होते हैं ॥ ३ ९ -४३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में चण्डी आदि देवप्रतिमालक्षण वर्णन नामक पचासवाँ अध्याय समाप्त ॥५० ॥
अध्याय ५१ सूर्यादिग्रहदेवताओं की प्रतिमाओं के लक्षण श्री भगवान् हयग्रीव बोले- - स सात अश्वों से जुते हुए एक पहियेवाले रथ पर विराजमान सूर्यदेव की प्रतिमा को स्थापित करना चाहिए । भगवान् सूर्य अपने दोनों हाथों में दो कमल धारण करते हैं । उनके दाहिने भाग में दावात और कलम लिये दण्डी खड़े हैं और वाम भाग में हाथ में दण्ड लिये द्वार पर पिङ्गल विद्यमान हैं । ये दोनों सूर्यदेव के पार्षद हैं । भगवान् सूर्यदेव के उभय पार्श्व में चँवर लिये राज्ञी तथा निष्प्रभा खड़ी हैं । अथवा घोड़े पर चढ़े हुए एकमात्र सूर्य की ही प्रतिमा बनानी चाहिए । समस्त दिक्पाल हाथों में वरद मुद्रा, दो - दो कमल तथा शस्त्र लिये क्रमशः पूर्वादि दिशाओं में स्थित दिखाये जाने चाहिए ॥१-३ ॥ बारह दलों का एक कमल चक्र बनावे । उसमें सूर्य, अर्यमा आदि नामवाले बारह आदित्यों का क्रमशः बारह दलों में स्थापना करे । यह स्थापना वरुण दिशा एवं वायव्यकोण से आरम्भ करके नैर्ऋत्यकोण के अन्त तक दलों में होनी चाहिए । उक्त आदित्यगण चार - चार हाथवाले हों और उन हाथों में मुद्गर, शूल, चक्र एवं कमल धारण किये हों । अग्निकोण से लेकर नैर्ऋत्य तक, नैर्ऋत्य से वायव्य तक, वायव्य से ईशान तक और वहाँ से अग्निकोण तक के दलों में उक्त आदित्यों की स्थिति जाननी चाहिए ॥४ ॥
१ घ. मसीभा ' । २ घ. ' भ्रत्कुण्डी । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२१२ अग्निपुराणम् वरुणः सूर्यनामा च सहस्त्रांशुस्तथापरः । रविश्चैवाथ पर्जन्यस्त्वष्टा मित्रोऽथ विष्णुकः । कृष्णो रक्तो मनाग्रक्तः पीतः पाण्डरकः सितः । धूम्रो नीलः क्रमाद्वर्णाः शक्तयः केसराग्रगाः । प्रहर्षिणी महाकाली कपिला च प्रबोधिनी । वरुणादेश्च तद्वर्णा केसराग्रेषु विन्यसेत् । कुण्डिकाजप्यमालीन्दुः कुजः शक्त्यक्षमालिकः । शुक्रः कुण्ड्यक्षमाली स्यात्किङ्किणीसूत्रवाञ्शनिः । अनन्तस्तक्षकः कर्कः पद्मो महाब्जः शङ्खकः । इन्द्रोवज्री गजारूढच्छागगोऽग्निश्च शक्तिमान् ।
मकरे वरुणः पाशी वायुर्वज्रधरो मृगे ।
द्विबाहवो लोकपाला विश्वकर्माक्षसूत्रभृत् ॥
धाता तपनसञ्ज्ञश्च सविताऽथ गभस्तिकः ॥५ ॥
मेषादिराशिसंस्थाश्च मार्गादिकार्तिकान्तकाः ॥६ ॥
कपिलः पीतवर्णश्च शुकाभो धवलस्तथा ॥ ७ ॥
इडा सुषुम्ना विश्वार्चिरिन्दुसञ्ज्ञा प्रमर्दिनी ॥८ ॥
नीलाम्बरा वनान्तस्था ' अमृताख्या च शक्तयः ॥९ ॥
तेजश्चण्डो महावक्त्रो द्विभुजः पद्मखड्गभृत् ॥१० ॥
बुधश्चापाक्षपाणिः स्याज्जीवः कुण्ड्यक्षमालिकः ॥ ११ ॥
अर्धचन्द्रधरो राहुः केतुः खड्गी च दीपभृत् ॥ १२ ॥
कुलिकः सूत्रिणः सर्वे फणवक्त्रा महाप्रभाः ॥ १३ ॥
यमो दण्डी च महिषे नैर्ऋतः खड्गवान्नरे ॥१४ ॥
गदी कुबेरो मेषस्थ ईशानश्च जटी वृषे ॥ १५ ॥
हनुमान् वज्रहस्तः स्यात् पद्भ्यां सम्पीडितासुरः ॥१६ ॥
बारह आदित्यों के नाम इस प्रकार हैं - वरुण, सूर्य, सहस्रांशु, धाता, तपन, सविता, गभस्तिक, रवि, पर्जन्य, त्वष्टा, मित्र और विष्णु । वे मेष आदि बारह राशियों में स्थित होकर जगत् को ताप एवं प्रकाश देते हैं । ये वरुण आदि आदित्य क्रमशः मार्गशीर्ष मास ( वृश्चिक राशि ) से लेकर कार्तिक मास ( तुला राशि ) तक के मासों ( अथवा राशियों ) में स्थित होकर अपना कार्य करते हैं । इनकी अङ्गकान्ति क्रमश: काली, लाल, कुछ लाल, पीली, पाण्डु, श्वेत, कपिल, पीला, तोते के समान हरा, धवल, धूम्र और नीला है । शक्तियाँ द्वादश - दल कमल के केसराग्रों में स्थित होती हैं ॥५-७३ ॥ शक्तियों के नाम ये हैं- इड़ा, सुषुम्ना, विश्वार्ची, इन्दु, प्रमर्दिनी, प्रहर्षिणी, महाकाली, कपिला, प्रबोधिनी, नीलाम्बरा, वनान्तस्था और अमृता ॥८ - ९ ॥ वरुण आदि की जो अंगकान्ति है, वही इन शक्तियों की भी है । केसरों के अग्रभाग में इनकी स्थापना करनी चाहिए । सूर्यदेव का तेज प्रचण्ड और मुख विशाल है । उनके दो भुजाएँ हैं । वे अपने हाथों में कमल और खड्ग धारण करते हैं ॥१० ॥ चन्द्रमा, कुण्डिका और अक्षमाला से युक्त होते हैं । मंगल
शक्ति और अक्षमाला धारण करते हैं । बुध के हाथों में धनुष और अक्षमाला होती है । बृहस्पति कुण्डी और अक्षमालाधारी होते हैं । शुक्र के हाथों में भी कुण्डिका और अक्षमाला होती है । शनि किङ्किणी - सूत्र धारण करते हैं । राहु अर्धचन्द्रधारी हैं तथा केतु के हाथों में खड्ग और दीपक शोभा पाते हैं । अनन्त, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक आदि सभी मुख्य नागगण सूत्रधारी होते हैं । फन ही इनके मुख हैं । वे सब महान् प्रभापुञ्ज से उद्भासित होते हैं । इन्द्र वज्रधारी हैं । ये हाथी पर आरूढ़ होते हैं । अग्नि का वाहन बकरा है । अग्नि देवशक्ति धारण करते हैं । यम दण्डधारी हैं और भैंसे पर आरूढ़ होते हैं । निर्ऋति खड्गधारी हैं और मनुष्य उनका वाहन है । वरुण मकर पर आरूढ़ हैं और पाश धारण करते हैं । वायु वज्रधारी हैं और मृग उनका वाहन है । कुबेर मेष पर चढ़ते और गदा धारण करते हैं । ईशान जटाधारी हैं और वृषभ उनका वाहन है ॥११-१५ ॥ समस्त लोकपाल द्विभुज हैं । विश्वकर्मा अक्षसूत्र धारण करते हैं । हनुमान् जी के हाथ में वज्र है । उन्होंने अपने दोनों पैरों से असुर को दबा रखा है । किन्नर-१ घ. घनान्तस्था । २ ख. ग. ङ. ' क्षसाली स्या ' । ३ घ. वान्करे । ४ ' ताश्रयः । वी ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २१३ वीणाहस्ताः किन्नराः स्युर्मालाविद्याधराश्च खे । दुर्बलाङ्गाः पिशाचाः स्युर्वेताला विकृताननाः ॥ १७ ॥
क्षेत्रपालाः शूलवन्तः प्रेता महोदराः कृशाः ॥१८ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये सूर्यादिग्रहदेवताप्रतिमालक्षणवर्णनं नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः चतुःषष्टियोगिनीप्रतिमालक्षणानि श्रीभगवानुवाच योगिन्यष्टाष्टकं वक्ष्ये इन्द्रादीशान्ततः क्रमात् । अक्षोभ्यां रुक्षकर्णी च राक्षसी क्षपणा ' क्षमा ॥१ ॥
पिङ्गाक्षी चाक्षया ' क्षेमा इला नीलालया तथा । लोला रक्तार बलाकेशा लालसा विमला पुनः ॥ २ ॥
दुर्गा ' सा च विशालाक्षी ह्रींकारा ' वडवामुखी । महाक्रूरा क्रोधना तु सर्वज्ञा तरला तारा ऋग्वेदा तु हयानना । साराख्या रससङ्ग्राही रक्ताक्षी सुप्रसिद्धा तु विद्युज्जिह्वा करङ्किणी । मेघनादा प्रचण्डोग्रा चण्डा ' चण्डवती ' चैव प्रपञ्चा प्रलयान्तिका । शिशुवा पिशाची मूर्तियाँ हाथ में वीणा लिये हुए हों और विद्याधर माला धारण किये आकाश में के शरीर दुर्बल कंकालमात्र हों । वेतालों के मुख विकराल हों । क्षेत्रपाल शूलधारी और कृश हों ॥ १६-१८ ॥ भयङ्करी महानना ॥ ३ ॥
शबरा तालजङ्घका ॥४ ॥
कालकर्णी वरप्रदा ॥ ५ ॥
पिशितासवलोलुपा ॰ ॥६ ॥
स्थित दिखाये जायँ । पिशाचों बनाये जायँ । प्रेतों के पेट लम्बे श्री अग्निमहापुराण में सूर्यादिग्रहदेवताओं की प्रतिमाओं का लक्षणवर्णन नामक इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त ॥५१ ॥
अध्याय ५२ चतुःषष्टियोगिनी - प्रतिमालक्षण श्री भगवान् बोले - अब मैं चौंसठ योगिनियों का वर्णन करूँगा । इनका स्थान क्रमशः पूर्व दिशा से ईशान - पर्यन्त है । इनके नाम इस प्रकार हैं- १. अक्षोभ्या, २. रुक्षकर्णी, ३. राक्षसी, ४. क्षपणा, ५. क्षमा, ६. पिङ्गाक्षी, ७. अक्षया, ८. क्षेमा, ९. इला, १०. नीलालया, ११. लोला, १२. रक्ता, १३. बलाकेशा, १४. लालसा, १५. विमला, १६. दुर्गा ( अथवा हुताशा ), १७. विशालाक्षी, १८. ह्रींकारा ( अथवा हुंकारा ), १ ९. अश्वमुखी, २०. महाक्रूरा, २१. क्रोधना, २२. भयङ्करी, २३. महानना, २४. सर्वज्ञा, २५. तरला, २६. तारा, २७. ऋग्वेदा, २८. हयानना, २ ९. सारा, ३०. रससङ्ग्राही, ३१. शबरा, ३२. तालजङ्घा, ३३. रक्ताक्षी, ३४. सुप्रसिद्धा, ३५. विद्युज्जिह्वा, ३६. करङ्किणी, ३७. मेघनादा, ३८. प्रचण्डा, ३ ९. उग्रा, ४०. कालकर्णी, ४१. वरप्रदा, ४२. चण्डा, ४३. चण्डवती, ४४. प्रपञ्चा, ४५ प्रलयान्तिका, ४६. शिशुमुखी, ४७. पिशाची, ४८. पिशितासवलोलुपा, १ घ. कृपणाक्षया । २ घ च क्षया । ३ घ. लक्ता । ४ घ. हुताशा । ५ घ. हुङ्कारा । ६ क. च. सुसङ्ग्राही । ग. घ. रुद्रसङ्ग्राही । ७ ख. घ. सम्बरा । ८ ख. ग. घ. चन्द्रा । ९ ख. ग. घ. चन्द्रावली । १० घ. ' ताशा चलो ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२१४ अग्निपुराणम् धमनी तपनी चैव रागिणी ' विकृतानना ।
यमजिह्वा जयन्ती च दुर्जया च जयन्तिका ।
अष्टहस्ताश्चतुर्हस्ता इच्छास्त्राः सर्वसिद्धिदाः ॥
खट्वाङ्कुशकठोरेषुविश्वाभयभृदेकतः । गजचर्मधरो द्वाभ्यां कृत्तिवासोऽहिभूषितः । अविलोमाग्निपर्यन्तं दीर्घाष्टकैकभेदितम् । मन्दिराग्निदलारूढं सुवर्णरसनान्वितम् । वीरभद्रो वृषारूढो मातृग: ' स चतुर्भुजः त्रिशूलकुण्डिकाकुण्डिवरहस्ता चतुर्भुजा चण्डिकादशहस्ता स्यात्खड्गशूलारिशक्तिधृक् धनुः सिंहे च महिषः शूलेन प्रहतोग्रतः वायुवेगा बृहत्कुक्षिर्विकृता विश्वरूपिका ॥७ ॥
बिडाली रेवती चैव पूतना विजयान्तिका ॥ ८ ॥
भैरवश्चार्कहस्तः स्याद्दन्तुरास्यो ' जटेन्दुभृत् ॥९ ॥ ९ ॥ ॥
चापत्रिशूलखट्वाङ्गपाशकार्धवरोद्यतः ४ ॥१० ॥
प्रेतासनो ' मातृमध्ये पूज्यः पञ्चाननोऽथवा ॥११ ॥
तत्षडङ्गानि जात्यन्तैरन्वितं च क्रमाद्यजेत् ॥१२ ॥
नादविन्द्विन्दुसंयुक्तं मातृनाथाङ्गदीपितम् ॥१३ ॥
1 । गौरी तु द्विभुजा त्र्यक्षा शूलिनी दर्पणान्विता । । १४ ॥ । अब्जस्था ललिता स्कन्दगणादर्शशलाकया ॥१५ ॥
। दक्षे वामे नागपाशं चर्माङ्कुशकुठारकम् ॥१६ ॥
॥१७ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये चतुःषष्टियोगिनीप्रतिमालक्षणवर्णनं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५२ ॥
४ ९. धमनी, ५०. तपनी, ५१. रागिणी, ५२. विकृतवदना, ५३. वायुवेगा, ५४. बृहत्कुक्षि, ५५. विकृता, ५६. विश्वरूपिका, ५७. यमजिह्वा, ५८. जयन्ती, ५ ९. दुर्जया, ६०. जयन्तिका, ६१. विडाली, ६२. रेवती, ६३. पूतना, ६४. विजयान्तिका ॥१-८ ॥ ये अष्टहस्ता, चतुर्हस्ता और इच्छा के अनुसार शस्त्रों को धारण करनेवाली और सब सिद्धियों को देनेवाली हैं । भैरव के बारह भुजाएँ होती हैं । उनके दाँत मुख से बाहर निकले हुए होते हैं और वे सिर पर जटा और चन्द्रमा को धारण किये रहते हैं || ९ || एक ओर के हाथों में खट्वा ( एक अस्त्र ), अङ्कुश, कुठार, बाण और अभय ( मुद्रा ) को धारण करते हैं तो दूसरी ओर के हाथों में धनुष, त्रिशूल, खट्वाङ्ग, पाश और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं । इनके अवशिष्ट दो हाथों में गजचर्म रहता है और वह स्वयं गजचर्म पहने रहते हैं । शरीर पर साँप लपेटे रहते हैं अथवा भैरव की आकृति पञ्चमुखी होती है, वे मातृकाओं के बीच प्रेतासन पर विराजमान रहते हैं और सबसे पूज्य हैं ॥१०-११ ॥ पूर्व दिशा से लेकर अग्नि दिशा तक अविलोमक्रम से दीर्घाष्टक के एक - एक मन्त्र से जात्यन्त से युक्त उनके षडङ्गों की पूजा करनी चाहिए || १२ || मन्दिर के अग्निदल पर आरूढ़, स्वर्ग की करधनी पहने, नाद, विन्दु और बालचन्द्रमा से संयुक्त तथा मातृनाथ की अङ्गशोभा से दीप्त भैरव की पूजा भलीभाँति होनी चाहिए || १३ || चतुर्भुज वीरभद्र मातृगणों के मध्य में बैल पर सवार रहते हैं । गौरी जी के दो भुजाएँ और तीन नेत्र होते हैं । वह एक हाथ में शूल और दूसरे में दर्पण लिये रहती हैं || १४ || चार भुजावाली ललिता के हाथों में त्रिशूल, गगरी, कमण्डलु और वरद मुद्रा रहती है । वह कमलासन पर विराजमान और स्कन्दगणों से सुशोभित रहती हैं ॥१५ ॥ चण्डिका के दस हाथ होते
हैं, जिसमें दाहिने हाथों में खड्ग, शूल, चक्र, शक्ति, और बायें हाथों में नागपाश, चर्म, अंकुश, कुठार और धनुष रहते हैं । वह सिंह पर आरूढ़ होकर शूल से महिषासुर के ऊपर प्रहार करती हैं ॥ १६-१७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में चतुःषष्टि योगिनी प्रतिमालक्षण वर्णन नामक बावनवाँ अध्याय समाप्त ॥५२ ॥
१ क. वामनी । २ ख. ग. घ. स्यात् कूर्परा । ३ क. घ. खङ्गाङ्कुश । ४ ङ च. ' र्धघरोद्यतः । ५ घ. ‘ ताशनो । ६ मण्डलाग्निदलारूढमिति क्वचित् पुस्तके पाठः । ७ घ. ' सकान्चि ' । ८ ग. घ. मात्रग्रे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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लिङ्गादिलक्षणं वक्ष्ये विष्कम्भं भूतभागैस्तु ब्रह्मविष्णुशिवांशेषु अष्टाग्रो वैष्णवो भागः चतुःषष्ट्यस्त्रकं कृत्वा विस्तारमथलिङ्गस्य त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २१५ अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः लिङ्गादिलक्षणम् श्रीभगवानुवाच कमलोद्भव तच्छृणु । दैर्ध्यार्द्धं वसुभिर्भक्त्वा त्यक्त्वा भागत्रयं ततः॥१ ॥
चतुरस्त्रं तु कारयेत् । आयाममृतुभिर्भक्त्वा ' एकद्वित्रिक्रमान्न्यसेत् ॥ २ ॥
वर्धमानोऽयमुच्यते । चतुरस्त्रोऽस्य कर्णार्धं गुह्यकोणेषु लाञ्छयेत् ॥३ ॥
सिद्धत्येव न संशयः । षोडशास्त्रं ततः कुर्याद्द्वात्रिंशास्त्र ततः पुनः ॥४ ॥
वर्तुलं साधयेत्ततः । कर्तयेदथ लिङ्गस्य शिरो वै देशिकोत्तमः ॥५ ॥
अष्टधा संविभाजयेत् । भागार्धार्धं तु संत्यज्य च्छत्राकारं शिरो भवेत् ॥ ६ ॥
त्रिषु भागेषु सदृश आयामो यस्य विस्तरः । तद्विभागसमं लिङ्गं सर्वकामफलप्रदम् ॥७ ॥
दैर्घ्यस्य तु चतुर्थेन विष्कम्भं देवपूजिते । सर्वेषामेव लिङ्गानां लक्षणं शृणु साम्प्रतम् ॥८ ॥
मध्यसूत्रं समासाद्य ब्रह्मरुद्रान्तिकं बुधः । षोडशाङ्गुललिङ्गस्य षड्भागैर्भाजितो यथा ॥ ९ ॥
अध्याय ५३ लिङ्गादिलक्षण श्री भगवान् बोले - अये ब्रह्मन्! अब मैं लिङ्गादि का लक्षण बतलाऊँगा, उसे सुनो । पहले एक चौकोर प्रस्तर-खण्ड को लेकर उसे लम्बाई से दो भागों में विभक्त कर देना चाहिए । उसमें से नीचेवाले भाग के आठ बराबर भाग कर देना चाहिए । इसके तीन भागों को छोड़कर शेष पाँच भागों में से चौकोर विष्कम्भ का निर्माण कराये । फिर लम्बाई के छह भाग करके उनको एक, दो और तीन के क्रम से अलग रखिये ॥ १-२ ॥ इनमें से प्रथम भाग ब्रह्मभाग, दूसरा विष्णुभाग और तीसरा शिवभाग कहलाता है । यह शिवभाग शेष दो भागों की अपेक्षा बड़ा होता है । यह वर्धमान कहलाता है । विष्णुभाग को अष्टभुजा के रूप में बना लिया जाता है । तत्पश्चात् उसकी बत्तीस और चौंसठ भुजाएँ बनाकर गोलाकार बना लेना चाहिए । तदनन्तर शिल्पी को लिङ्ग का सिर काटना चाहिए और लिङ्ग के विस्तार को आठ भागों में विभक्त करके उसके सिर को छत्राकार बना लेना चाहिए || ३ - ६ || जिसकी लम्बाई - चौड़ाई तीन भागों में समान हो वह समभागवाला लिङ्ग सभी कामनाओं को प्रदान करनेवाला कहा जाता है ॥७ ॥ इस लिङ्ग का विष्कम्भ पूरी लिङ्ग की
लम्बाई का चतुर्थांश होता है और देवोपासना में इसी प्रमाण को स्वीकार किया जाता है । अब मैं सभी लिङ्गों का सामान्य लक्षण बताऊँगा, उसे सुनो ॥८ ॥ बुद्धिमान् व्यक्ति को सोलह अङ्गुल लिङ्ग को छह भागों में इस प्रकार से विभक्त करना
चाहिए कि मध्यसूत्र ब्रह्म और रुद्र भागों से होता हुआ जाय । इस प्रकार सूत्रों से बने हुए भागों में पहले दो भागों का १ ख. ङ. च. ' यामं मूर्तिभि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२१६ अग्निपुराणम् तद्वैयमनसूत्राभ्यां मानमन्तरमुच्यते । अर्चाभागं त्रिधा कृत्वा ह्यूर्ध्वमेकं परित्यजेत् । ऊर्ध्वं तु पञ्चमाद्भागाद्भ्राम्यलेखां प्रलम्बयेत् । एतत्साधारणं प्रोक्तं लिङ्गानां लक्षणं मया । ब्रह्मभागप्रवेशं च ज्ञात्वा लिङ्गस्य चोच्छ्रयम् । तथा समुच्छ्रयं ज्ञात्वा पिण्डिकां प्रविभाजयेत् । त्रिभागं मध्यतः खातं कृत्वा पीठं विभाजयेत् । बाहुल्यस्य त्रिभागेण मेखलामथ कल्पयेत् । मेखलाषोडशांशेन खातं वा तत्प्रमाणतः । भूमौ प्रविष्टमेकं तु भागेनैकेन पिण्डिका द्वयंशेन चोर्ध्वपट्टं तु एकांशाः शेषपट्टिकाः निर्गमं भागमेकं तु यावद्वैशेषपट्टिका यवाष्टमुत्तरे कार्यं शेषाणां यवहानित: ॥१० ॥
अष्टधा तद्वयं कृत्वा ऊर्ध्वं भागत्रयं त्यजेत् ॥ ११ ॥
भागमेकं परित्यज्य संगमं कारयेत्तयोः ॥१२ ॥
सर्वसाधारणं वक्ष्ये पिण्डिकान्तं निबोध मे ॥ १३ ॥
न्यसेद्ब्रह्मशिलां विद्वान् सम्यक्कर्म शिलोपरि ॥ १४ ॥
द्विभागमुच्छ्रितं पीठं विस्तारे लिंगसम्मितम् ॥ १५ ॥
स्वमानार्धत्रिभागेण बाहुल्यं परिकल्पयेत् ॥१६ ॥
खातं स्यान्मेखलातुल्यं क्रमान्निम्नं तु कारयेत् ॥१७ ॥
उच्छ्रायं तस्य पीठस्य विकाराङ्गं तु कारयेत् ॥ १८ ॥
। कण्ठं भागैस्त्रिभिः कार्यं भागेनैकेन पट्टिका ॥ १ ९ ॥ । भागं भागं प्रविष्टं तु यावत्कण्ठं ततः पुनः ॥ २० ॥
। प्रणालस्य त्रिभागेण निर्गमस्तु त्रिभागतः ॥ २१ ॥
विस्तार आठ यव होता है और उसके बाद प्रत्येक वर्ग अपने पूर्व वर्ग की अपेक्षा एक यव कम होता है ॥९ -१० ॥ उसके ऊपर के भाग को छोड़कर नीचे के भाग को तीन भागों में विभक्त कर देना चाहिए और शेष दो भागों को आठ खण्डों में विभक्त करके ऊपर के तीन भागों को अलग कर देना चाहिए ॥११ ॥ पाँचवें भाग के ऊपर घूमती हुई एक लम्बी रेखा बनावे
और एक भाग को छोड़कर बीच में उन दो रेखाओं का संगम करावे || १२ || यह मैंने लिङ्गों का साधारण लक्षण बताया है, अब मैं पिण्डिकान्त के सम्बन्ध में साधारण रूप से बताऊँगा, इसे भी समझिये || १३ || ब्रह्मभाग में प्रवेश तथा लिङ्ग की ऊँचाई ज्ञात करके विद्वान् व्यक्ति को कर्मशिला के ऊपर ब्रह्मशिला को स्थापित करना चाहिए । पिण्डिका के विभिन्न भागों को उसकी ऊँचाई के अनुसार ही बनाना चाहिए । पीठ की ऊँचाई ऐसे दो भागों के बराबर होनी चाहिए और उसकी लम्बाई लिङ्ग की लम्बाई के अनुसार होनी चाहिए | १४-१५ ॥ पीठ के मध्य भाग में खात ( गड्ढा ) करके उसे तीन भागों में विभाजित करे । अपने मान के त्रिभाग से बाहुल्य की कल्पना करे ॥१६ ॥ बाहुल्य के तृतीय भाग से
मेखला बनावे और मेखला के ही तुल्य खात ( गड्ढा ) तैयार करे । उसे क्रमशः निम्न ( नीचे झुका हुआ ) रखे ॥१७ ॥
मेखला के सोलहवें अंश से खात निर्माण करे और उसी के माप के अनुसार उस पीठ की ऊँचाई बनवाये । पीठ का एक भाग भूमि में रहेगा और एक भाग से पिण्डिका बनेगा । तीन भागों से कण्ठ और एक भाग से उसकी पट्टिका का निर्माण करना चाहिए । इसी प्रकार उसके दो अंशों से ऊर्ध्व पट्ट और एक - एक अंश से शेष पट्टिकाओं का निर्माण करना चाहिए ॥१८-१९ ॥ प्रत्येक पट्ट इतना चौड़ा होना चाहिए जिससे क्रमशः कण्ठ तक पहुँचा जा सके । तत्पश्चात् पुनः एक भाग से निर्गम ( जल निकालने का मार्ग ) बनाया जाय । यह शेष पट्टिकों तक रहे । प्रणाल ( नाली ) के तृतीय भाग से निर्गम बनाना चाहिए ॥२०-२१ ॥ उसके आधार की चौड़ाई एक ओर किनारे की चौड़ाई अङ्गुल १ क. घ. ' कान्तान्निबो ० । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA