अग्नि पुराण — पृष्ठ 261–270
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 261–270
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षट्षष्टितमोऽध्यायः शेषहोमं ततः कृत्वा दद्यात्पूर्णाहुतित्रयम् प्रणवेन स्वशब्दान्ते कृत्वा पात्रे तु पैप्पले । त्रयोदशो गुरुस्तत्र तेभ्यो दद्यात् त्रयोदश । सुवस्त्रहेममाल्याढ्यान्व्रतपूर्त्यै त्रयोदश । इति गोपथमुत्सृज्य यूपं तत्र निवेशयेत् । गृहे च होममेवं तु कृत्वा सर्वं यथाविधि । अनिवारितमन्नाद्यं सर्वेष्वेतेषु कारयेत् । आरामं कारयेद्यस्तु नन्दिने सुचिरं वसेत् ।
प्रपादानाद्वारुणेन संक्रमण वसेद्दिवि ।
नियमव्रतकृद्विष्णुः कृच्छ्रकृत्सर्वपापहा (? ) ॥
समुदायप्रतिष्ठेष्टा शिवादीनां गृहात्मनाम् २५७ । ' युञ्जतेत्यनुवाकं तु जप्त्वा प्राश्वी ( श्नी ) तवैचरुम् ॥ २२ ॥
ततो मासाधिपानां तु विप्रान्द्वादश भोजयेत् ॥ २३ ॥
कुम्भान्स्वाद्वम्बुसंयुक्तान्सच्छ्त्रोपानहान्वितान् ॥२४ ॥
गावः प्रीतिं समायान्तु प्रचरन्तु प्रहर्षिताः ॥२५ ॥
दशहस्तं प्रपाराममठसंक्रमणादिषु ॥२६ ॥
पूर्वोक्तेन विधानेन प्रविशेच्च गृहं गृही ॥ २७ ॥
द्विजेभ्यो दक्षिणा देया यथाशक्ति विचक्षणैः ॥ २८ ॥
मठप्रदानात्स्वर्लोके शक्रलोके वसेत्ततः ॥ २ ९ ॥ इष्टकासेतुकारी च गोलोके मार्गकृद्गवाम् ॥३० । गृहं दत्त्वा वसेत्स्वर्गे यावदाभूतसंप्लवम् ॥ ॥३१ ३१ ॥ ॥ ॥३२ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये देवतासामान्यप्रतिष्ठाकथनं नाम षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
फिर शेष होम करके तीन पूर्णाहुति दे । ' युञ्जते ' आदि अनुवाक का जप करके मन्त्र के आदि में स्वकर्तृक मन्त्रोच्चारण के पश्चात् पीपल के पत्ते आदि के पास में रखकर चरु का प्राशन करे । प्रणव से युक्त देवता के नाम से अर्थात् ‘ ॐ अमुकाय स्वाहा ' इत्यादि मन्त्र का उच्चारण करके पीपल के बने पात्र में चरु रखकर बारह मासाधिपतियों के निमित्त बारह ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए || २२-२३ ॥ इन मासाधिपतियों के अतिरिक्त तेरहवाँ गुरु का स्थान है । उनको मधुर जल से पूर्ण तेरह कलश, उत्तम छत्र, पादुका सहित दान दे || २४ || साथ ही अच्छे - अच्छे तेरह वस्त्र, सोना, विभिन्न प्रकार की उत्तम मालाओं के साथ तेरह गायों को व्रत की पूर्ति के लिए दान करे । ' गायें प्रसन्नतापूर्वक आयें - जायें — इस वाक्य से गौओं के आने - जाने का मार्ग छोड़ दे तथा दस हाथ लम्बा यूप जल पीने के स्थान पर उपवन, मठ और सेतु मार्ग पर गाड़ दे ॥२५-२६ ॥ इस प्रकार विधिपूर्वक गृह में भी हवन करके पूर्वोक्त विधान से गृह में प्रवेश करे । इन कृत्यों में सब अतिथियों को अन्न और वस्त्र आदि दान दे तथा ब्राह्मणों को यथाशक्ति दक्षिणा भी दे ॥२७-२८ ॥ जो आराम ( बगीचा ) लगवाता है, वह स्वयं नन्दन वन में निवास करता है, मठ प्रदान करने से दाता स्वर्गलोक को जाता है और इन्द्रलोक में निवास करता है ॥ २ ९ ॥ प्याऊ बैठानेवाला व्यक्ति वरुण लोक में और सेतु का निर्माता स्वर्ग में निवास करता है । ईंटों का पुल बनवानेवाला भी स्वर्गलोक में निवास करता है । गायों के लिए प्रशस्त मार्ग बनवानेवाला गोलोक को जाता है ॥३० ॥ नियम और व्रतों का पालक स्वयं विष्णु हो जाता है । कृच्छ्र व्रतों का आचरण ( पालन ) करनेवाला सब
पापों से मुक्त हो जाता है । गृह - दानकर्त्ता व्यक्ति कल्पपर्यन्त स्वर्ग में निवास करता है । गृहस्थ मनुष्यों को शिव आदि देवताओं की समुदाय प्रतिष्ठा करनी चाहिए ॥३१-३२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में देवताओं की सामान्य प्रतिष्ठाविधि - वर्णन नामक छाछठवाँ अध्याय समाप्त ॥६६ ॥
१ युञ्जते वै चरुम् क ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । २ ख. वाकाद्यं ' ज ' । १७ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् २५८ अथ सप्तषष्टितमोऽध्यायः जीर्णोद्धारविधिः श्रीभगवानुवाच जीर्णोद्धारविधिं वक्ष्ये भूषितां स्नपयेद्गुरुः । अचलां विन्यसेद्गेहे अतिजीर्णा परित्यजेत् ॥ १ ॥
व्यङ्गां भग्नां च शैलाढ्यां न्यसेदन्यां च पूर्ववत् । संहारविधिना तत्र तत्त्वान्संहृत्य देशिकः ॥ २ ॥ ।
सहस्त्रं नारसिंहेन हुत्वा तामुद्धरेद्गुरुः । दारवीं दाहयेद्वह्रौ शैलजां प्रक्षिपेज्जले || ३ || धातुजां रत्नजां वाऽपि अगाधे वा जलेऽम्बुधौ । यानमारोप्य जीर्णाङ्गं छाद्य वस्त्रादिना नयेत् ॥४ ॥
वादित्रैः प्रक्षिपेत्तोये गुरवे दक्षिणां ददेत् । यत्प्रमाणा च यद्द्द्रव्या तन्मानां स्थापयेद्दिने ॥५ ॥
कूपवापीतडागादेर्जीर्णोद्धारे महाफलम् ॥६ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये जीर्णोद्धारविधिकथनं नाम सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥
अध्याय ६७ जीर्णोद्धार - विधि श्री भगवान् बोले- - अब मैं जीर्णोद्धार - विधि का वर्णन कर रहा हूँ । गुरु अलङ्कृत मूर्ति को स्नान कराकर उसको घर में प्रतिष्ठित करे, अतिजीर्ण प्रतिमा का परित्याग करे ॥१ ॥ विकृत, भग्न अथवा शिलामात्रावशिष्ट
प्रतिमा को छोड़ दे । आचार्य उसके स्थान पर पूर्ववत् देवगृह में नवीन प्रतिमा की स्थापना करे । आचार्य वहाँ पर ( भूतशुद्धि प्रकरण से युक्त ) संहार - विधि से उस प्रतिमा में तत्त्वों का आरोपण करके नरसिंह मन्त्र से एक हजार बार हवन करके उस प्रतिमा का उद्धार करे ॥२-२३ ॥ काठ की बनी भग्नमूर्ति को जला दे, धातु या रत्न की प्रतिमा को अगाध जल अथवा समुद्र में डुबो दे । जीर्ण - शीर्ण प्रतिमा को सवारी पर चढ़ाकर उसके जीर्णाङ्गों को वस्त्र से ढक दे । इस प्रकार उसको बाजे - गाजे के साथ समारोहपूर्वक ले जाकर जल में छोड़ दे । तदनन्तर गुरु को दक्षिणा दे । जिस परिमाण की, जितने मूल्य की वह जीर्ण मूर्ति हो, उतने ही परिमाण और मूल्य की मूर्ति का निर्माण करके दिन में उसकी पुनः प्रतिष्ठा करे । कुआँ, बावली और तालाब आदि का जीर्णोद्धार करने से भी महान् फल प्राप्त होता है ॥३-६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में जीर्णोद्धार विधि - वर्णन नामक सरसठवाँ अध्याय समाप्त ॥६७ ॥
१ व्यङ्गां पूर्ववत् क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अष्टषष्टितमोऽध्यायः २५ ९ अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः उत्सवविधिकथनम् श्रीभगवानुवाच वक्ष्ये विधिं चोत्सवस्य स्थापिते तु सुरे चरेत् । तस्मिन्दिने ' वैकरात्रं त्रिरात्रं चाष्टरात्रकम् ॥१॥
उत्सवेन विना यस्मात्स्थापनं निष्फलं भवेत् । अयने विषुवे चापि शयनोपवने गृहे ॥२ ॥
कारकस्यानुकूलो वा यात्रां देवस्य कारयेत् । मङ्गलाङकुररोपैस्तु गीतनृत्यादिवाद्यकैः ॥३ ॥
शरावघटिकापाली स्वाङ्कुरारोहणे हिता ' । यवाञ्शालस्तिलान्मुद्गान्गोधूमान्सितसर्षपान् ॥४ ॥
कुलत्थमाषनिष्पावान्क्षालयित्वा तु वापयेत् ' । पूर्वादौ तु बलिं दद्याद्भ्रमन्दीपैः पुरं निशि ॥५ ॥
इन्द्रादेः कुमुदादेश्च सर्वभूतेभ्य एव च । अनुगच्छन्ति ते तत्र प्रतिरूपधरा पुनः ॥ ६ ॥
पदे पदेऽश्वमेधस्य फलं तेषां न संशयः । आगत्य देवतागारं देवं विज्ञापयेद्गुरुः ॥७ ॥ तीर्थयात्रा त्वया ' " देव श्वः कर्तव्या सुरोत्तम । तस्या ( दा ) रम्भमनुज्ञातुमर्हः १२ सर्वज्ञ सर्वदा ॥८ ॥
अध्याय ६८ उत्सवविधि - वर्णन श्री भगवान् बोले - मैं तुम्हें देवता की प्रतिष्ठा के अनन्तर होनेवाले उत्सव की विधि बतला रहा हूँ । स्थापना के वर्ष में ही एक रात, तीन रात या आठ रात तक उत्सव मनाना चाहिए ॥ १ ॥ उत्सव के बिना देव प्रतिष्ठा व्यर्थ - सी हो जाती है,
अत: उत्सव अवश्य कराना चाहिए । वह उत्सव अयनकाल में, विषुव काल में, घर पर या उपवन में या शयन - कक्ष में करना चाहिए ॥२ ॥ अथवा कर्त्ता को जब अनुकूल समय मिले, तब देवता का यात्रोत्सव करे । उत्सव के समय मङ्गल अङ्कर ( का
आरोप ), गीत, नृत्य और बाजे आदि अवश्य रखने चाहिए । अङ्कुर आरोपण के लिए शराव, घटिका, पाली उपयुक्त पात्र हैं । अङ्कुर उगाने की विधि यह है कि यव, धान, तिल, मूँग, गेहूँ, पीली सरसों, कुलथी, उड़द और निष्पाव को पछोरकर धो ले और ऊपर कहे हुए पात्रों में मिट्टी रखकर बो दे ॥३-४३ ॥ पूर्व आदि दिशाओं में इन्द्र आदि दिक्पाल, कुमुद आदि दिग्गज और सब भूतों को बलि देकर, रात्रि में दीपक हाथ में लेकर नगर में घूमे । ऐसा करने पर वे इन्द्रादि देवता भी विभिन्न रूप धारण करके उस महोत्सव में पीछे - पीछे चलते हैं । इस उत्सव को करनेवाले व्यक्तियों को पग - पग पर अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है, इनमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥५-६३ ॥ तत्पश्चात् गुरु देवागार में आकर भगवान् से प्रार्थना करे । ' हे सुरोत्तम! कल आपको तीर्थयात्रा करनी है, इसलिए हे सर्वज्ञ! उसको आरम्भ करने का आप आदेश प्रदान करें । ' इस प्रकार देवता को सम्बोधित करके आगे का कार्य आरम्भ करे । पहले अङ्कुर और कलश में सुशोभित वेदी का निर्माण कराकर १ क. ङ. च. स्मिन्नब्दे ' चैक ' । २ च. ' त्र चतुरष्टक ' । ३ क. ङ. चन्तराष्टक । ४ क. ङ. च. मिष्यजं । ५ क. ङ. च. ' यने स्थापने । ६ क. ङ. च ' कूले वा । ७ ख. ग. ' लीस्त्वङ्कु । ८ ख. ग. हिताः । ९ क. ङ. मापयेत् । च. मायया । १० क. च. ये । ११ ख. ग. घ. मया । १२ क. च. ' मर्हसे देव स ' । ख. ग. घ. मर्हसे देवसर्वथा दे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२६० अग्निपुराणम् देवमेवं सु विज्ञप्य ततः कर्म समारभेत् । चतुःस्तम्भां तु तन्मध्ये स्वस्तिकं प्रतिमां न्यसेत् । वैष्णवैः सह कुर्वीत घृताभ्यङ्गं तु मूलतः । दर्पणं दय ' नीराजगीतवाद्यैश्च ' मङ्गलम् । हरिद्रामुक्तकाश्मीरशुक्लचूर्णादि ' मूर्धनि । स्थापयित्वा समभ्यर्च्य यात्राबिम्बं रथे स्थितम् । निम्नगा ( गां ) योजनादर्वाक्तत्र वेदीं तु कारयेत् । चरुं च ४ श्रपयेत्तत्र पायसं होमयेत्ततः आपो हि ष्ठोपनिषदैः (? ) पूजयेदर्घ ( र्घ्य ) मुख्यकैः स्नायान्महाजनैर्विप्रैर्वेद्यामुत्तार्य " तं न्यसेत् पूजयेत्पावकस्थं ॰ तु गुरुः स्याद्भुक्तिमुक्तिकृत् प्ररोहघटिकाढ्यां तु वेदिकां भूषितां व्रजेत् ॥९ ॥
काम्यार्थ लेख्य चित्रेषु स्थाप्य तत्राधिवासयेत् ॥१० ॥
घृतधाराभिषेकं वा सकलां शर्वरीं बुधः ॥ ११ ॥
बी ( वी ) जनं पूजनं दीपगन्धपुष्पादिभिर्यजेत् ॥१२ ॥
प्रतिमायाश्च भक्तानां सर्वतीर्थफलं ' ( ले? ) धृते ॥१३ ॥
नयेद्गुरुर्नदीं नादैश्छत्राद्यै " राष्ट्रपालिकाम् ॥१४ ॥
वाहनादवतार्यैनां तस्यां वेद्यां निवेशयेत् ॥ १५ ॥
। अब्लिङ्गैवैदिकै " र्मन्त्रैस्तीर्थान्यावाहयेत्ततः ॥ १६ ॥
। पुनर्देवं समादाय तोये कृत्वाऽघमर्षणम् ॥१७ ॥
॥ पूजयित्वा तदह्ना " च प्रासादं तु नयेत्ततः ॥ १८ ॥
॥१९ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये उत्सवविधिकथनं नामाष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
वहाँ जाय और उस वेदी के चारों कोणों पर चार स्तम्भ गाड़े । उसके मध्य में स्वस्तिक बनाकर उस पर देव प्रतिमा स्थापित करे ॥७ - - ९ ९ ३ ॥ काम्य अर्थ को लिखकर चित्रों से स्थापित करके अधिवासन करे । पुनः देव - प्रतिमा का संस्कार आदि करे । अनेक वैष्णवजनों के साथ मूलमंत्र से देव - प्रतिमा में घी का लेप करे अथवा रात भर घी की धारा में उसका अभिषेक करे ॥१०-११ ॥ दर्पण दिखाकर नीराजन प्रदान करे और मङ्गलगीत, वाद्य आदि से पूजन, वीजन और आरती आदि करे । उसके बाद दीप, धूप, गन्ध अर्पित करे । देव - प्रतिमा के सिर पर हल्दी, कपूर, केसर और श्वेत- चन्दन के चूर्ण को लगावे तथा उत्सव में सम्मिलित होनेवाले वैष्णवजनों को टीका लगावे । ऐसा करने से यजमान सब तीर्थों का फल प्राप्त कर लेता है ॥१२-१३ ॥ उसके बाद प्रतिमा को स्नान कराकर और पूजन करके उसको रथ पर स्थापित करे । गुरु इस यात्रादल को छत्र, चामर, बाजे आदि के साथ अपने प्रान्त की विशिष्ट नदी की ओर ले चले जो कि वहाँ से एक योजन से अधिक दूर न हो । यहाँ पर वेदी बनावे, रथ से प्रतिमा को उतारकर उस वेदी पर स्थापित करे || १४-१५ ॥ वहाँ चरु - पाक बनाकर खीर का हवन करे । तदनन्तर वरुण देवता सम्बन्धी वैदिक मन्त्रों से सब तीर्थों का आवाहन करे । ' आपो हि ष्ठा ' इत्यादि मन्त्र से या उपनिषद्-मन्त्रों से अर्घ्य आदि प्रदान करे । पुनः देवता को जल के मध्य ले जाकर अघमर्षण करे, स्वयं महाजनों और भक्तों के साथ स्नान करे और प्रतिमा को पुनः वेदी पर प्रतिष्ठित करे । उस दिन वहीं पर उनकी पूजा करने के बाद देवमन्दिर में ले जाय । जो गुरु अग्नि के मध्य में स्थित ( विष्णु ) देव की इस प्रकार पूजा करता है, वह भुक्ति - मुक्ति का अधिकारी होता है ॥१६-१९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में उत्सवविधि - वर्णन नामक अरसठवाँ अध्याय समाप्त ॥६८ ॥
१ क. ङ. च. “ वदेवं । २ ख. ग. घ. ' का स्वर्णवे । ३ क. ङ. ' त् । कर्मार्थान्ते पवित्रे ' । च. ' त् । कर्मार्थाल्लेप्यचि ' । ४ च । ५ क. ख. ग. घ. दर्शनी । ६ ख. ' राजं गी । ७ क. ख. ग. घ. च. दीपं ग ° । ८ क. ङ. च. र्णानि यू । ९ क. ङ. च. फलैर्वृते । १० क. ङ. च. स्नापयित्वा । ११ ख. ग. घ. दैश्छात्रा । १२ ख. ग. घ. ' त्विकाः । नि ० । १३ क. ङ. च. “ र्यैव त ’ । १४ ख. ग. घ. वै । १५ अबिलंगै नाहयेत्ततः कः ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति १६ च. ' येद्दर्भमु । १७ च. ' ये दत्वाऽघ ' । १८ क. च. ‘ जलैर्वि ’ CC । - १ 0. ९ JK क Sanskrit . च. ' Academy ' दङ्गा, च Jammmu प्रा ।. ङ Digitized . ' दङ्गाच्च by S3 Foundation प्रा । २० USA ख ग. घ. ' कस्तं तु गु ' ।
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नवषष्टितमोऽध्यायः २६१ अथ नवषष्टितमोऽध्यायः स्नपनोत्सवविस्तारकथनम् अग्निरुवाच ब्रह्मञ्शृणु प्रवक्ष्यामि स्नपनोत्सवविस्तरम् । कुर्याद्ध्यानार्चनं होमं हरेरादौ च कर्मणि । स्नानद्रव्याण्यथाऽऽहृत्य कलशांश्चापि विन्यसेत् । चतुरस्त्रं पुरं कृत्वा ' रुद्रैस्तं प्र ( स्तत्प्र ) विभावयेत् ।
शालिचूर्णादिनापूर्य पूर्वादिनवकेषु च ।
पुण्डरीकाक्षमन्त्रेण दर्भास्तांस्तु विसर्जयेत् ॥
यवव्रीहितिलांश्चैव नीवाराञ्श्यामकान्क्रमात् ।
ऐन्द्रे तु नवके मध्ये घृतपूर्णं घटं न्यसेत् ।
जम्बूशमीकपित्थानां त्वक्कषायैर्घटाष्टकम् ॥
प्रासादस्याग्रतः कुम्भान्मण्डपे ' मण्डले न्यसेत् ॥१ ॥
सहस्त्रं वा शतं वाऽपि होमयेत्पूर्णया सह ॥२ ॥
अधिवास्य सूत्रकण्ठान्धारयेन्मण्डितो घटान् ॥३ ॥
मध्ये तु नवकं स्थाप्य पार्श्वपङ्क्ति प्रमार्जयेत् ॥४ ॥
कुम्भमुद्रां ततो बद्ध्वा घटं तत्राऽऽनयेद्बुधः ॥५ ॥
अद्भिः पूर्णं सर्वरत्नयुतं मध्ये न्यसेद्घटम् ॥६
॥ ६ ॥
॥
कुलित्थमुद्गसिद्धार्थान्मुक्त्वाऽन्यानष्टदिक्षु च ॥७ ॥
पलाशाश्वत्थन्यग्रोधबिल्वोदुम्बरशी ( क्ष ) रिणाम् ॥८ ॥
आग्नेयनवके मध्ये मधुपूर्णं घटं न्यसेत् ॥९ ॥
अध्याय ६ ९ स्नपनोत्सव - कथन अग्निदेव बोले- ब्रह्मन्! सुनिये, अब मैं स्नपनोत्सव विधि का विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ । प्रासाद के आगे एक मण्डप बनाकर उस मण्डप - -भूमि पर मण्डल बनाकर कलशों को स्थापित करे । सबसे पहले वहाँ हरि का ध्यान, अर्चन, होम आदि करे । पूर्णाहुति के साथ एक सौ या एक हजार आहुतियाँ दे ॥१-२ ॥ स्नानोपयोगी द्रव्यों को लाकर रखे, कलशों के कण्ठ में सूत्र लपेटकर उनको वहाँ मण्डल बनाकर स्थापित करे । वहाँ एक चौकोना पुर ( उत्सव-मण्डप ) बनाकर उसे ग्यारह रेखाओं द्वारा विभाजित कर दे । मध्य में नव कलशों को स्थापित करके इधर - उधर की पंक्ति को भी शुद्ध करे ॥३-४ ॥ कुशल व्यक्ति चावल के चूर्ण या यवचूर्ण आदि से पूर्व के नव घटों को भर दे, फिर कुम्भ मुद्रा के द्वारा एक घट को लाये ॥५ ॥ पहले पृथ्वी पर पुण्डरीकाक्ष मन्त्र से कुशों को बिछा दे । उन कुशों
पर सब रत्नों से युक्त और जल से परिपूर्ण कलश को रख दे ॥६ ॥ यव, धान्य, तिल, नीवार, श्यामाक ( साँवाँ ),
कुल्थी, मूँग और सरसों को क्रमशः आठों दिशाओं में छिड़क दे || ७ || उन नौ कलशों के मध्य में पूर्व दिशा में घी से भरे हुए एक कलश को रखे । पलाश, पीपल, वट, श्रीफल, गूलर आदि तथा जामुन, शमी, कैंथ आदि के वल्कल से युक्त कषाय जल से भरे आठ कलशों को रखे । नौ कलशों के मध्य अग्निकोण में मधु पूर्ण कलश रखे ॥८ - ९ ॥ गौ १ ख. ग. घ. मण्डलं । २ क. ङ. च. कर्मसु । ३ ङ. ' येन्मण्डले पुटा ' । ४ क. ङ. च. रुद्रेऽस्त्रं प्रविभाजये ' । ५ ख. ग. घ. ° ध्येन तु चरुस्था ' । ६ क. ङ. च. पङ्क्तीः प्रसर्ज । ७ ख. ग. घ. “ रसारिकाम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२६२ अग्निपुराणम् गोशृङ्गनगगङ्गाम्बुगजेन्द्रदर्शनेषु ' च । याम्ये तु नवके मध्ये तिलतैलघटं न्यसेत् । नारिकेलं न्यसेत्पूगं दाडिमं पनसं फलम् । कुङ्कुमं नागपुष्पं च चम्पकं मालतीक्रमात् । पुष्पाणि चान्ये ( न्य ) नवके मध्ये वै नारिकेलकम् । वर्षजं हिमतोयं च नैर्झरं गाङ्गमेव च । सहदेवीं कुमारीं च सिंहीं व्याघ्रीं तथाऽमृताम् । पूर्वादौ सौम्यनवके मध्ये दधिघटं न्यसेत् । लतां कस्तूरिकां चैव कृष्णागरुमनुक्रमात् । चन्द्रतारं क्रमाच्छुक्ला ' गिरिसारं त्रपु न्यसेत् । घृतेनाभ्यज्य " चोद्वर्त्य स्नपयेन्मूलमन्त्रतः बलिं च सर्वभूतेभ्यो भोजयेद्दत्तदक्षिणः १३ तीर्थक्षेत्र खलेष्वष्टौ मृत्तिकाः स्युर्घटाष्टके ॥ १० ॥
नारङ्गमथ जम्बीरं खर्जूरं मृद्विका ( कां ) क्रमात् ॥११ ॥
नैर्ऋते नवके मध्ये क्षीरपूर्णं घटं न्यसेत् ॥१२ ॥
मल्लिकामथ पुंनागं करवीरं महोत्पलम् ॥ १३ ॥
नादेयमथ सामुद्रं सारसं कौप्यमेव च ॥ १४ ॥
उदकान्यथ वायव्ये " नवके कदलीजलम् ॥ १५ ॥
विष्णुपर्णी शतनिभां वचां दिव्यौषधीर्न्यसेत् ॥ १६ ॥
पत्रमेलां त्वचं कुष्ठं बालकं चन्दनद्वयम् ॥१७ ॥
सिद्धद्रव्याणि पूर्वादौ शान्तितोयमथैकतः ॥१८ ॥
घोषसारं तथा सीसं " पूर्वादौ रत्नमेव च ॥ १ ९ ॥ । गन्धाद्यैः पूजयेद्वह्नौ हुत्वा " पूर्णाहुतिं चरेत् ॥ २० ॥
। देवैश्च मुनिभिर्भूपैर्देवं संस्नाप्य ४ चेश्वराः १५ ॥२१ ॥
के सींग से उखाड़ी हुई, पर्वत, गङ्गाजल, गज, यज्ञस्थल, तीर्थक्षेत्र और खलिहान से लायी हुई मृत्तिका आठ घड़ों में देनी चाहिए || १० || दक्षिण दिशा के नवम घट को तिल के तैल से भर दे । नैर्ऋत दिशा के नव घटों में से आठ में नारङ्ग, जम्बीर ( नींबू ), खर्जूर, अंगूर, नारियल, सुपारी, अनार और कटहल रखे । नवम घट दूध से भरा हुआ रखे ॥११-१२ ॥ पश्चिम दिशा के नव घटों में से आठ घंटों में कुङ्कुम, नागकेशर, चम्पक, मालती, मल्लिका, पुंनाग, करवीर और कमल आदि पुष्पों को रखे ॥ १३ ॥ पश्चिमीय नवक में नारिकेल - जल से पूर्ण
कलश में नदी, समुद्र, सरोवर, कूप, वर्षा, हिम, निर्झर तथा देवनदी का जल छोड़े । वायव्यकोणवर्ती नवक में कदली जलपूरित कुम्भ रखे ॥१४-१५ ॥ उत्तर दिशा के नौ घटों में से आठ में सहदेवी, कुमारी, सिंही, व्याघ्री, अमृता, विष्णुपर्णी, शतनिभा, वच आदि ओषधियों को छोड़े || १६ || नवम घट को दही से भरकर रखे । ऐशान्य नवक में से आठ में इलायची, त्वच, कुट, बालछड़, दोनों चन्दन, लता, कस्तूरी और कृष्ण अगरु आदि भी रखे । नवम कलश में अन्य सिद्ध ( द्रव्य ) और शान्ति जल को रखे ॥१७-१८ ॥ शुक्ल चन्द्रतार, गिरिसार ( शिलाजीत ), त्रपु ( राँगा ), घोषसार, सीसा और रत्न, पूर्व आदि दिशाओं में रखे । इस प्रकार कलशों को स्थापित करके, देवताओं को घी से आप्लावित करके भलीभाँति मले और मूलमन्त्र से नहलाये । गन्ध आदि से पूजन करके हवन करे और पूर्णाहुति दे ॥१९ -२० ॥ सब भूतों को बलि - प्रदान करके ब्राह्मण भोजन कराये और दक्षिणा दे । देवता, मुनि और राजगण इस प्रकार देवता ( हरि ) को स्नान कराकर शक्तिशाली हो गये ॥२१ ॥ इस प्रकार
१ क. ङ. ‘ गरङ्गासुग ° । च. ' गमङ्गासुग । २ ङ. ' त्रवरे मुष्टौ । ३ क. च. ' खरेष्वष्टौ । ४ क. ङ. च. तिकाश्च घटा ' । ५ क. ङ. च. रं पूर्विकाः क्र ' । ६ क. ङ. च. नालिकेरं । ७ क. ङ. च. वा मध्ये न । ८ क. ङ. च. ' पत्रीं श ' । ९ क. ष्ट. च. माद्गुल्फ गि । १० ख. ग. घ. शीर्षं । ११ क. ङ. च. ' नाऽऽसह्य चो ' । १२ क. ङ. च. कृत्वा । १३ ख. ग. घ ' क्षिणाम् । दे ' । १४ ख. ग. घ. संस्थाप्य । १५ क. ' श्वरः । बभूव स्रा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्ततितमोऽध्यायः २६३ बभूवुः: ' स्नापयित्वेत्थं स्नपनोत्सवकं चरेत् । अष्टोत्तरसहस्त्रेण घटानां सर्वभाग्भवेत् ॥२२ ॥
यज्ञावभृथस्नाने च पूर्णसंस्नापनं कृतम् । गौरीलक्ष्मीविवाहादि चोत्सवं स्नानपूर्वकम् ॥२३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये स्नपनोत्सवविधिकथनं नाम नवषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६ ९ ॥ अथसप्ततितमोऽध्यायः पादपप्रतिष्ठाविधिः श्रीभगवानुवाच प्रतिष्ठा पादपानां च वक्ष्येऽहं भुक्तिमुक्तिदाम् । सर्वोषध्यो ( ध्यु ) दकैर्लिप्तान्पिष्टातकविभूषितान् ॥१ ॥
वृक्षान्माल्यैरलङ्कृत्य वासोभिरभिवेष्टयेत् । सूच्या सौवर्णया कार्यं सर्वेषां कर्णवेधनम् ॥२ ॥
हेमशलाकयाऽञ्जनं वेद्यां तु फलसप्तकम् । अधिवासयेच्च प्रत्येकं घटान्बलिं निवेदयेत् ॥३ ॥
इन्द्रादेरधिवासेऽथ होमः कार्यो वनस्पतेः । ऋग्यजुः साममन्त्रैश्च वारुणैर्मत्तभैरवैः ॥४ ॥
वृक्षवेदिककुम्भैश्च स्नपनं द्विजपुंगवाः । तरुणां यजमानस्य कुर्युश्च यजमानकः ॥५ ॥
देवता को नहलाकर स्नपनोत्सव करे । एक हजार आठ घटों से स्नान कराने पर मनुष्य सब फलों को प्राप्त करता है ॥२२ ॥ यज्ञों में अवभृथ - स्नान करने पर पूर्ण स्नान अवश्य करना चाहिए । गौरी और लक्ष्मी आदि के विवाहोत्सव
में इस प्रकार स्नानोत्सव अवश्य करना चाहिए ॥२३ ॥
श्री अग्निमहापुराण में स्नपनोत्सव विधि - वर्णन नामक उनहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥६९ ॥
अध्याय ७० वृक्ष - प्रतिष्ठा भगवान् बोले - अब भुक्ति और मुक्ति प्रदान करनेवाली वृक्ष - प्रतिष्ठा की विधि बतलाऊँगा । सब ओषधियों के जल से वृक्ष को सींचकर सुगन्धित चूर्ण वृक्षों पर डाले॥१ ॥ माला से वृक्षों को सुसज्जित करके वस्त्रों से
आवेष्टित कर दे । सोने की सुई से सबका कर्णभेदन करे, सुवर्ण की शलाका से अञ्जन लगाये, वेदी पर सात प्रकार के फल रखे । प्रत्येक की विधिवत् पूजा करके घट और बलि प्रदान करे ॥२-३ ॥ इन्द्र आदि का पूजन हो जाने पर वनस्पतियों का हवन करे । ऋक्, यजुः, साम अथवा वरुण मन्त्रों से या मत्त भैरव मन्त्रों से वृक्ष के समीप बनी हुई वेदी के कलशों से उत्तम ब्राह्मणों, वृक्षों और यजमानों को नहलाये ॥४-५ ॥ यजमान स्नान १ ख. ग. घ. “ वुः स्थापं । २ क. ङ. च. थ संस्थाने पू ' । ३ क. ङ. च. पने कृते । गौ । ४ क. ङ. च. कैर्दीप्ता । ५ क. ङ. च. ' कं कुम्भान्व ' । ६ ख. ग. घ. ' दनम् । इ । ७ एतस्मादनन्तरं वृक्षमध्यादुत्सृजेत्गां य । ततोऽभिषेकं च मन्त्रतः इत्यर्धमधिकं ख. ग. घ. पुस्तकेषु । ८ ख. ग. घ. ' र्मङ्गलै र ' । ९ क. ङ. च. कुर्याच्च CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२६४ अग्निपुराणम् भूषितो दक्षिणां दद्याद्गोभूभूषणवस्त्रकम् । क्षीरेण भोजनं दद्याद्यावद्दिनचतुष्टयम् ॥६ ॥
होमस्तिलाज्यैः ' कार्यस्तु पलाशसमिधैस्तथा । आचार्ये द्विगुणं दद्यात्पूर्ववन्मण्डपादिकम् ॥७ ॥
पापनाशः परा सिद्धिर्वृक्षारामप्रतिष्ठया । स्कन्दायेशो यथा प्राह प्रतिष्ठाद्यं सूर्येशगणशक्त्यादेः परिवारस्य वै हरे: इत्यादिमहापुराण आग्नेये पादपप्रतिष्ठाविधिकथनं नाम सप्ततितमोऽध्यायः अथैकसप्ततितमोऽध्यायः गणपतिपूजाविधिः ईश्वर उवाच गणपूजां प्रवक्ष्यामि निर्विघ्नायाखिलार्थदाम् । गणाय स्वाहा हृदयमेकदंष्ट्राय गजकर्णिने ' च शिखा गजवक्त्राय चर्मं च । महोदराय सुदण्डहस्तायाक्षि गणो गुरुः पार्श्वका ' च शक्त्यनन्तौ च धर्मकः " । मुख्यास्थिमण्डलं ' चाधश्चोर्ध्व ( र्ध्वं तथा शृणु || ८ || ॥९ ॥
॥ ७० ॥
वै शिरः ॥ १ ॥
तथाऽस्त्रकम् ॥२ ॥
) छदनमर्चयेत् ॥३ ॥
के अनन्तर सब प्रकार के आभूषणों से आभूषित होकर गुरु को गाय, वस्त्र, आभूषण आदि दक्षिणा में दे । चार दिनों तक ब्राह्मणों को दुग्ध पान कराये ॥६ ॥ तिल, घी और पलाश समिधा का हवन करे । आचार्य को दुगुनी दक्षिणा
दे । मण्डप आदि का निर्माण पूर्ववत् करे || ७ || इस प्रकार वृक्ष और आराम ( बगीचा ) की प्रतिष्ठा करने से पापों का नाश होता है और उत्कृष्ट सिद्धि प्राप्त होती है । स्कन्द को शिव जी ने सूर्य, ईश, गण, शक्ति और विष्णु परिवार की जो प्रतिष्ठा - विधि बतायी गयी है, उसे ध्यान से सुनिये ॥८ - ९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में पादपप्रतिष्ठाविधि - वर्णन नामक सत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥७० ॥
अध्याय ७१ गणपति - पूजाविधि श्री महादेव बोले - अब मैं अखिल मनोरथों को प्रदान करनेवाली गणेश पूजा विधि को बतलाऊँगा, जिसके अनुष्ठान से विघ्न का नाश होता है । ' गणाय स्वाहा ' कहकर हृदय - स्पर्श करे, ' एकदंष्ट्राय स्वाहा ' कहकर सिर, ‘ गजकर्णिने स्वाहा ' कहकर शिखा, ' गजवक्त्राय स्वाहा ' से कवच, ' महोदराय स्वाहा ' से नेत्र - त्रय, और ' सुदण्डहस्ताय स्वाहा ' कहकर अस्त्राय फट् कहे । इस प्रकार षडङ्गन्यास करके गणेश गुरु हैं, शक्ति, अनन्त और धर्मक में पार्श्वक हैं । नीचे के मुख्य अस्थि - मण्डल और ऊपर के आवरण की भी पूजा करनी चाहिए, ॥१-३ ॥ पद्मकर्णिक के बीज, १ क. ख. घ. च. लाढ्यैः का ' । २ क. ङ. च. द्यात्पुरोव ' । ३ ग. ' घ्नामिश्व ' । ४ च ' लापदा ' । ५ च. लम्बकर्णिने । ६ च. वर्म । ७ ख. ग. पादुका । ८ क. च. कर्मकः । ९ क. च. ' स्वयास्त्रि म ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्विसप्ततितमोऽध्यायः २६५ पद्मकर्णिकं ' बीजं ' च ' ज्वालिनी ' नन्दयार्चयेत् । सूर्येशा कामरूपा च उदया कामवर्तिनी ॥४ ॥
सत्या च विघ्ननाशा च आसनं गन्ध ' मृत्तिका ' । वंशो घोरं च दहनं प्लवो लम्बं तथा स्मृतम् ॥ ५ ॥
लम्बोदराय विद्महे महोदराय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥६ ॥
गणपतिर्गणाधिपो गणेशो गणनायकः । गणक्रीडो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्रो महोदरः ॥७ ॥
गजवक्त्रो लम्बकुक्षिर्विकटो विघ्ननाशकः । धूम्रवर्णो महेन्द्राद्याः पूज्या गणपतेः स्मृताः ॥८ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये गणपतिपूजाविधिकथनं नामैकसप्ततितमोऽध्यायः ॥७१ ॥
अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः स्नानविधिः ईश्वर उवाच वक्ष्यामि स्कन्द नित्याद्यं स्नानं पूजां प्रतिष्ठया । स्नात्वा ' शिलां समुद्धृत्य मृदमष्टाङ्गुलां ' ततः॥१ ॥
सर्वात्मना समुद्धृत्य पुनस्तेनैव पूजयेत् " । शिरसा पयसस्तीरे निधायास्त्रेण शोधयेत् || २ || तृणादि शिखयोद्धृत्य ब्रह्मणा विभजेत्रिधा " । एकया नाभिपादान्तं प्रक्षाल्य पुनरन्यया ॥३ ॥
ज्वालिनी और नन्दा की भी पूजा करे । सूर्येशा, कामरूपा, उदया, कामवर्तिनी, सत्या और विघ्ननाशा को आसन, गन्ध और मृत्तिका प्रदान करे । यं, रं, लं, वं - ये चार बीज क्रमशः शोषण, दाहन, आप्लावन तथा अमृतीकरण की प्रक्रिया पूरी करते हैं । ‘ लम्बोदराय विद्महे महोदराय धीमहि, तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ' यह गणेश गायत्री मन्त्र है ॥४-६ ॥ गणपति, गणाधिप, गणेश, गणनायक, गणक्रीड, वक्रतुण्ड, एकदंष्ट्र, महोदर, गजवक्त्र, लम्बकुक्षि, विकट, विघ्ननाशक, धूम्रवर्ण और महेन्द्र आदि पूज्य देवता हैं, जो गणपति के पूजन में अङ्गरूप में पूजित होते हैं || ७-८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में गणेशपूजाविधि - वर्णन नामक इकहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥७१ ॥
अध्याय ७२ स्नान - विधि बोले - हे स्कन्द! मैं नित्य, नैमित्तिक आदि स्नान - प्रतिष्ठा सहित पूजा की विधि बतला रहा हूँ । पहले महादेव एक शिला ( टुकड़ा ) उखाड़ ले ॥१ ॥ उसको भलीभाँति यत्नपूर्वक लाकर पूजा करे ।
स्नान करके आठ अङ्गुल की - मन्त्र से उसे शुद्ध करे ॥२ ॥ ब्राह्मण तृण आदि को शिखा मन्त्र से उखाड़कर
सिर से नदी तीर पर रखकर अस्त्र भाग को नाभि से लेकर पैर तक लगाये ॥३ ॥
कवच मन्त्र से उस मिट्टी के टुकड़े को तीन भाग में बाँट दे । एक ज्वा ' । २ क. च. ' बीजांश्च जालि ' । ३ ङ. च जालि ' । ४ ख. ग. घ. ' लिनी नन्दनार्च स ° ' । १ ख. ग. घ. ॰णिकाबीजाश्च ६ क. च. ' का । यं ' का. यं शोषणं च दहनं नष्टवो वितथाऽमृतम् । ७ ख. ' त्वाऽसिना ५ क. ङ. च. ' न्धमूर्तिका । प्रमष्टेनै । १० ख. पूरयेत् । ११ क. ङ. च. ' जेद्विधा । ८ ख, ग, ङ. ' ङ्गुलं त ° । ९ क. समाहृत्य CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२६६ अग्निपुराणम् अस्त्राभिलब्धया ' लक्ष्मीदीप्तया सर्वविग्रहम् । निमज्याऽऽसीत ह्यद्यस्त्रं स्मरन्कालानलप्रभम् । अस्त्रसंध्यामुपास्याथ विधिस्नानं समाचरेत् । हृदाऽऽकृष्य तथाऽऽस्थाप्य पुनः संहारमुद्रयां । वामपाणितले कुर्याद्भागत्रयमुदङ्मुखः । शिवेन दशधा सौम्यं यजेद्भागत्रयं क्रमात् । कुर्याच्छिवेन सौम्येन शिवतीर्थेन तु क्रमात् । दक्षिणेन समालभ्य " पठन्नङ्गचतुष्टयम् । शिवं स्मरन्निमज्जेत हरिं गङ्गेति वा स्मरन् । कुम्भपात्रेण रक्षार्थं पूर्वादौ विक्षिपेज्जलम् । स्नात्वा चोत्तीर्य तत्तीर्थं संहारिण्योपसंहरेत् निवृत्त्यादिविशुद्धेन भस्मना स्नानमाचरेत् निरुध्याऽऽस्याक्षि ' पाणिभ्यां प्राणान्संयम्य वारिणि ॥४ ॥
मलस्नानं विधायेत्थं समुत्थाय जलान्तरात् ॥ ५ ॥
सारस्वतादितीर्थानामेकमङ्कुशमुद्रया ॥६ ॥
शेषं मृद्भागमादाय प्रविश्याऽऽनाभि वारिणि ॥७ ॥
अङ्गैर्दक्षिणमेकाद्यं पूर्वमस्त्रेण ' सप्तधा ॥८ ॥
सर्वदिक्षु ° क्षिपेत्पूर्वं हुंफडन्तगवाणुना ' ॥१ ॥
सर्वाङ्गमङ्गजप्तेन मूर्धादि चरणावधि ॥ १० ॥
पिधाय खानि सर्वाणि सम्मुखीकरणेन च ॥ ११ ॥
वौषडन्तषडङ्गेन के कुर्यादभिषेचनम् ॥१२ ॥
स्नात्वा राजोपचारेण सुगन्धामलकादिभिः ॥१३ ॥
। अथातो विधिशुद्धेन संहितामन्त्रितेन च ॥ १४ ॥
। शिरसः पादपर्यन्तं " हुंफडन्त? २ गवा रेणुना १४ ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् उसे धोकर, अस्त्रमन्त्र द्वारा अभिमन्त्रित हुई दूसरे भाग की दीप्तिमती मृत्तिका के द्वारा शेष सम्पूर्ण शरीर को अनुलिप्त करके, दोनों हाथों से कान - नाक आदि इन्द्रियों के छिद्रों को बन्दकर, साँस रोककर, मन - ही - मन कालाग्नि के समान तेजोमय अस्त्र का चिन्तन करते हुए पानी में डुबकी लगाकर स्नान करे । यह मल ( शारीरिक मैल ) को दूर करनेवाला स्नान कहलाता है । इस प्रकार जल के भीतर से निकल आवे और सन्ध्या करके विधि - स्नान करे ॥४-५३॥ पहले अंकुश - मुद्रा के द्वारा सारस्वत आदि तीर्थों को हृदय - मन्त्र ( नमः ) से आकृष्ट करके संहारमुद्रा के द्वारा स्थापित करे । शेष मिट्टी को लेकर नाभि तक जल में घुस जाय ॥६-७ ॥ मिट्टी को बायीं हथेली पर रखकर उत्तराभिमुख होकर उसको तीन भागों से विभक्त कर दे । प्रथम भाग को अस्त्र आदि मन्त्रों से सात भागों में बाँटकर दाहिने अंगों में लगावे || ८ || दूसरे को शिव मन्त्र ( ॐ नमः शिवाय ) से अभिमन्त्रित करके दस भागों में बाँट दे और ' हुं फट् ' मन्त्र से उत्तर से प्रारम्भ करके सब दिशाओं में उन भागों को फेंक दे ॥९ ॥ उसको शिवमन्त्र से शिवतीर्थ के द्वारा
सिर से लेकर पैर तक सर्वाङ्ग में लगाये ॥१० ॥ दक्षिण अङ्ग में भी मृत्तिका लगाकर अङ्गचतुष्टय का पाठ करते
हुए इन्द्रियों को बन्द करके सम्मुखीकरण करे ॥११ ॥ शिव, हरि और गङ्गा का स्मरण करते हुए डुबकी लगाये और
वौषडन्त षडङ्ग - मन्त्र से अभिषेक करे ॥१२ ॥ रक्षा के लिए घड़े में जल भरकर पूर्वादि चारों दिशाओं में गिरावे ।
इस प्रकार मृत्तिका- -स्नान करने के पश्चात् सुगन्धित द्रव्यों और आँवला आदि से स्नान करे ॥१३ ॥ स्नान के पश्चात्
नदी से निकलकर संहारिणी ( संहिता ) से उपसंहार करे । तदनन्तर विधिपूर्वक शुद्ध किये हुए, ( संहिता ) से अभिमन्त्रित, निवृत्ति आदि से परिष्कृत भस्म से ' ॐ हुं फट् ' मन्त्र से सिर से पैर तक स्नान करे ॥१४-१५ ॥ इस प्रकार विधिवत् १ ख. ' स्त्रादि लब्धमारभ्य दी ' । २ ख. ग. ' ध्याक्षाणि पा ° । ३ ख. ग. वारिणा । ४ ख. ' थाऽऽस्नाप्य । ५ ख. ग. ' मन्त्रेण । ६ ख. ग. ' भ्यं जपेद्भा ' । ७ ङ् ' क्षु यचेत्पू ' । ८ ख. ग. न्तशराणु । ९ क. च. ' तीर्थं रुजक्र । ख. ' तीर्थं ' भुजक्र ' । १० क. ङ. च. समारभ्य । ११ क. ङ. न्तं हूं फ ' । ख. ग. न्तं हूं फ ' । १२ ख. ग. न्तशराणु । १३ क. च वानना । १४ ङ ' ना । तै कृत्वाऽऽचमनस्ना ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA