अग्नि पुराण — पृष्ठ 271–280
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 271–280
पृष्ठ 271
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्विसप्ततितमोऽध्यायः २६७ तेन कृत्वा मलस्नानं विधिस्नानं समाचरेत् । क्रमेणोद्वर्तयेन्मूर्ध्नि वस्त्रहृद्गुह्यविग्रहान् । सुप्त्वा भुक्त्वा पयः पीत्वा कृत्वा चाऽऽवश्यकादिकम् । स्नानमाग्नेयकं स्पृष्ट्वा शुच्यम्बुचुलकं चरेत् । माहेन्द्रं स्नानमैशेन कार्यं सप्तपदावधि । पावनं मूलमन्त्रेण स्नानं तद्धर्मणाऽथवा । मन्त्रस्नानं भवेदेवं वारुणाग्नेययोरपि । कुर्वीत मानसं स्नानं सर्वत्र विहितं च यत् । सन्ध्याविधिं प्रवक्ष्यामि मन्त्रैर्भिन्नैः समं गुह । स्वधान्तैरात्मतत्त्वाद्यैस्ततः खानि स्पृशेन्मृदा । त्रिः समावर्तयेन्मन्त्री मनसा शिवसंहितम् ४ । हंसपद्मासनां रक्तां चतुर्वक्त्रां चतुर्भुजाम् " । तार्क्ष्यपद्मासनां ध्यायेन्मध्याह्ने वैष्णवीं सिताम् । चाहिए । तदनन्तर ईष, तत्पुरुष, अघोर, ईषतत्पुरुषाघोरगुह्यकाजातसंवरैः ’ ॥१६ ॥
संध्यात्रये निशीथे च वर्षापूर्वावसानयोः ॥ १७ ॥
स्त्रियं नपुंसकं शूद्रं बिडालशवमूषिकम् ॥१८ ॥
सूर्यांशुवर्षसंपर्के प्राङ्मुखेनोर्ध्वबाहुना ॥१९ ॥
गोसंघमध्यगः कुर्यात्खुरोत्खातकरेणुभिः ' ॥२० ॥
सद्योजातादिभिर्मन्त्रैरम्भोभिरभिषेचनम् ॥२१ ॥
मनसा मूलमन्त्रेण प्राणायामपुरःसरम् ॥२२ ॥
वैष्णवादौ च तन्मन्त्रैरेवं स्नानानि " कारयेत् ॥ २३ ॥
संवीक्ष्य त्रिः पिबेदम्बु ब्रह्मतीर्थेन शंकरैः १३ ॥ २४ ॥
सकलीकरणं कृत्वा प्राणायामेन संस्थितः ॥ २५ ॥
आचम्य न्यस्य संध्यां च ब्राह्मीं प्रातः स्मरेन्नरः ॥ २६ ॥
अङ्गाक्षमालिनीं दक्षे वामे दण्डकमण्डलुम् ॥२७ ॥
शङ्खचक्रधरां वामे दक्षिणे सगदाभयाम् ॥ २८ ॥
गुह्यक, अजात और संवर मन्त्र से क्रमशः वस्त्र, हृदय, गुह्यस्थान स्नान करना सन्ध्याओं में, आधी रात को, वर्षा के पूर्व और अन्त में उद्वर्तन करे ॥१६-१७ ॥ शयन, भोजन, और अन्य अङ्गों में, तीन स्त्री, नपुंसक, शूद्र, बिल्ली, शव, चूहे आदि से स्पर्श हो जाने पर पयःपान और अन्य आवश्यक कार्य करने के पश्चात् वर्षा से सम्पर्क होने पर पूर्वाभिमुख होकर अग्नि की आँच में शरीर सेंककर एक चुल्लू जल पी ले । सूर्य - किरण और से उठी से माहेन्द्रस्नान करे । अथवा गायों के झुण्ड में सात पद तक जाय और उनके खुरों बाहु ऊपर उठाकर ईश मन्त्र हो जाय या धूपस्नान करे अथवा ' सद्योजात ' आदि मन्त्रों द्वारा हुई धूल ले मूलमन्त्र का उच्चारण करके स्नानकर पवित्र और आग्नेय - स्नान भी होते हैं । पहले प्राणायाम कर जल से अभिषेक करे ॥१८-२१ ॥ इसी प्रकार मन्त्रों द्वारा वारुण में विहित है । इसी प्रकार वैष्णव कार्यों मूलमन्त्र से मानस - स्नान भी करना चाहिए । यह मानस - स्नान सर्वत्र सब कार्यों के सहित सन्ध्या - विधि का कराना चाहिए ॥२२-२३ ॥ हे गुह! अब मैं भिन्न - भिन्न मन्त्रों में भी वैष्णव - मन्त्र से स्नान - मन्त्रों से तीन बार जल पीना चाहिए ॥२४ ॥ तदनन्तर स्वधान्त
वर्णन कर रहा हूँ । सूर्य की ओर देखकर ब्रह्म - तीर्थ एवं शङ्कर प्राणायाम करे ॥ २५ ॥ इसके बाद मन्त्र - साधक
आत्म - तत्त्व आदि मन्त्रों से इन्द्रियों का स्पर्श करे । सकलीकरण के पश्चात् कर ब्राह्मी ' ' सन्ध्या का प्रातःकाल पुरुष मन - ही - मन तीन बार शिवसंहिता की आवृत्ति करे । आचमनान्तर सन्ध्या समाप्त हों, जिनके वामभाग में दण्ड, कमण्डलु स्मरण करे, जो चतुर्भुज, चार मुखबाली, रक्तवर्ण, हंसासन और पद्मासन पर आरूढ़ की, गरुड़ और पद्मासन पर आसीन वैष्णवी हो ॥२६-२७ ॥ मध्याह्न - काल में श्वेत - वर्ण और दाहिने हाथ में अक्षमाला ४ क. ङ. च. द्रं वितानश । ५ क. ङ. च. शुचाबुद्धन्नं च ' । १ क. च. मतं स्ना ' । २ ख. संबरैः । ३ क. ङ. च. हुत्वा ॥ ९ ख. ग. ' नं नवमं । १० ख. ग. तत्कर्म । ११ क. ख. ग. ६ क. ङ. च. ' मैशान । का । ७ च. गोहंसम ' । ८ र्यातच्छरो. संवरैः । १४ क. च. संमिताम् । ङ. संमितम् । १५ ख. ' म् ॥ १२ क. ङ. च. समन्ततः । सं । १३ क. ङ. च च. स्नानादि प्रस्कन्दमा ' । ग. ' म् । शङ्खपद्मान्वितां द । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 272
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६८ अग्निपुराणम् रौद्रीं ध्यायेदवृषाब्जस्थां त्रिनेत्रां शशिभूषिताम् । साक्षिण्यः ' कर्मणां सन्ध्या आत्मानं तत्प्रभानुगम् । हृद्विन्दुब्रह्मरन्ध्रेषु अरूपा तु परे स्थिता । पैत्रं मूले प्रदेशिन्याः कनिष्ठायाः प्रजापतेः । सव्यपाणितले वह्नेस्तीर्थं सोमस्य वामतः । ततः शिवात्मकैर्मन्त्रैः कृत्वा तीर्थं शिवात्मकम् । वामपाणिपतत्तोययोजनं * सव्यपाणिना । नीत्वा तदुपनासाग्रं दक्षपाणिपुटस्थितम् । तत्पापं कज्जलाभासं पिङ्गयाऽऽरिच्य ' मुष्टिना । स्वाहान्तशिवमन्त्रेण कुशपुष्पाक्षतान्वितम् तर्पणं संप्रवक्ष्यामि देवतीर्थेन मन्त्रकात् त्रिशूलाक्षधरां दक्षे वामे साभयशक्तिकाम् ॥ २ ९ ॥ चतुर्थी ज्ञानिनः सन्ध्या निशीथादौ विभाव्यते ॥ ३० ॥
शिवे ' चैव परो यस्तु ना सन्ध्या परमोच्यते ॥ ३१ ॥
ब्राह्ममङ्गुष्ठमूलस्थं तीर्थं दैवं कराग्रतः ॥ ३२ ॥
ऋषीणां तु समग्रेषु अङ्गुलीपर्वसन्धिषु ॥३३ ॥
मार्जनं संहितामन्त्रैस्तत्तो येन समाचरेत् ॥ ॥३४ ३४ ॥ ॥ उत्तमाङ्गे ” क्रमान्मन्त्रैर्मार्जनं समुदाहृतम् ॥३५ ॥
बोधरूपं शिवं तोयं वाममाकृष्य स्तम्भयेत् ॥ ३६ ॥
क्षिपेद्वज्रशिलायां ' यत्तद्भवेदघमर्षणम् ॥३७ ॥
। शिवायार्घ्याञ्जलिं दत्त्वा गायत्री शक्तितो यजेत् ॥ ३८ ॥
। तर्पयेद्द्द्वौ शिवायेति स्वाहाऽन्यान्स्वाहया सुतान् ॥३९ ॥
सन्ध्या करे, जिसके बायें हाथ में शङ्ख, चक्र और दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और गदा हो । सायंकाल बैल पर कमलासन लगाये बैठी हुई, द्वितीया के चन्द्रमा से सुशोभित, त्रिनेत्र, दाहिने हाथ में त्रिशूल और अक्षमाला धारण करनेवाली, बायें में अभय और शक्ति धारण करनेवाली रौद्री सन्ध्या का ध्यान करे । ये तीनों सन्ध्याएँ सन्ध्या करनेवाले व्यक्तियों के कर्म की साक्षिणी हैं । एक चौथी सन्ध्या भी है, जिनका अनुष्ठान विज्ञजन आधी रात में करते हैं । हृदय, विन्दु, ब्रह्मरन्ध्रों में वह चौथी अरुण सन्ध्या परम शिव - स्थान में स्थित है ॥२८-३१ ॥ तर्जनी के मूल को पैत्रतीर्थ, कनिष्ठा के मूल में प्रजापति, अँगूठे के मूल में ब्रह्मा, अँगुलियों के अग्रभाग को दैव, दाहिनी हथेली को वह्नि, बायीं हथेली को सोमतीर्थ और सब अँगुलियों के पोरों की सन्धियों को ऋषितीर्थ कहा जाता है ॥ ३२-३३ ॥ इसके पश्चात् शिवमन्त्रों से शिवतीर्थ ( जल ) की भावना कर उस जल से संहिता मन्त्रों द्वारा मार्जन करे । बायें हाथ से गिरते हुए जल को दायें हाथ में लेकर मन्त्रों से सिर आदि पर छिड़कना ' मार्जन ' कहा जाता है || ३४-३५ ॥ दाहिने हाथ की हथेली पर जल रखकर नासिका के अगले भाग के समीप खींच ले जाय, बोधरूप शिवतत्त्व जल में आकृष्ट कर वामभाग में स्थापित करे । पिङ्गला नाड़ी से शरीरस्थ पाप को खींचकर मुट्ठी में ग्रहण करे और उसे वज्रशिला पर पटक दे । इस विधि को ' अघमर्षण ' कहते हैं ॥३६-३७ ॥ स्वाहान्त शिव - मन्त्र से अर्थात् ' नमः शिवाय ' इस मन्त्र से कुश, पुष्प, अक्षत युक्त जल की शिव को अर्ध्याञ्जलि देकर शक्ति के अनुसार गायत्री - जप करे ॥ ३८ ॥ अब तर्पण की
विधि कहूँगा । देवतीर्थ से उनके नाम मन्त्र के उच्चारणपूर्वक तर्पण करे । ' ॐ हूं शिखाय स्वाहा ' ऐसा कहकर शिव को तर्पण प्रदान करे । इसी प्रकार अन्य देवताओं को भी उनके स्वाहान्त मन्त्र से तर्पण प्रदान करना चाहिए ॥३९ ॥
१ क. ङ. च. साक्षिणः । २ ख. ग. शिवरोधः प । ३ क. ङ. च. परे यस्तु सामर्थ्यात्पर । ४ क. ङ. च. णिषु ' त ' । ५ ख. ग. ‘ माङ्गैः क्र ’ । ६ ख. ग. सित ० । ७ क. ङ. च. ' या दिव्यमु ' । ख. ' याऽऽविध्य मु ' । ८ ख. ग. ' यां तु उत्तरेद ' । ९ ख. स्वनात् । ग. स्वतान् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 273
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्विसप्ततितमोऽध्यायः २६ ९ हं ' हृदयाय हां ' शिरसे हुँ ' शिखायै हैं कवचाय ' । हां ( तु ) वसुभ्यो रुद्रेभ्यो विश्वेभ्यश्चैव मरुद्भ्यः अत्रयेऽथ वशिष्ठाय नमश्चाथ पुलस्तये प्रचेतसे मनुष्यांश्च सनकाय वषट् तथा सनत्कुमाराय वषट् कपिलाय तथा वषट् सर्वेभ्यो भूतेभ्यो वषड् भूतान्देवपितृनथ । कव्यवाहानलायाथ अर्यम्णे चाग्निसोमाय आज्यपाय च सोमाय विशेषसुरवत्पितॄन् ० शान्तप्रपितामहाय १३ तथा प्रेतपितॄंस्तथा अस्त्रायाष्टौ देवगणान्हृदाऽऽदित्येभ्य एव च ॥ ४० ॥
। भृगुभ्यो हामङ्गिरोभ्य ऋषीन्कण्ठोपवीत्यथ ॥४१ ॥
। क्रतवे भारद्वाजाय विश्वामित्राय वै नमः ॥ ४२ ॥
। हां सनन्दायाथ वषट् सनातनाय वै वषट् ॥४३ ॥
। पञ्चशिखाय ' द्युभवे संलग्नकरमूलतः ॥४४ ॥
। दक्षस्कन्धोपवीती च कुशमूलाग्रतस्तिलैः ' ॥ ४५ ॥
सोमाय च यमाय च ।
बर्हिषद्भ्यः ' स्वधायुतान् ( तम् ) ॥४६ ॥
। ॐ हामीशानाय पित्रे ' २ स्वधा दद्यात्पितामहे ॥४७ ॥
। पितृभ्यः पितामहेभ्यः स्वधाऽथ प्रपितामहे ॥४८ ॥
‘ ॐ हां हृदयाय नमः । ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा । ॐ हूं शिखायै वषट् । ॐ हैं कवचाय हुम् । ॐ हौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ हः अस्त्राय फट् ' । इन वाक्यों को क्रमशः पढ़कर हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र एवं अस्त्र - विषयक न्यास करना चाहिए । आठ देवगणों को उनके नाम के अन्त में ' नमः ' पद जोड़कर तर्पणार्थ जल अर्पित करना चाहिए । यथा – ‘ ॐ हां आदितेभ्यो नमः । ॐ हां वसुभ्यो नमः । ॐ हां रुद्रेभ्यो नमः । ॐ हां विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । ॐ हां मरुद्भ्यो नमः । ॐ हां भृगुभ्यो नमः । ॐ हां अङ्गिरोभ्यो नमः । ' तत्पश्चात् जनेऊ को कण्ठ में माला की भाँति धारण करके ऋषियों का तर्पण करे । ॐ हां अत्रये नमः । ॐ हां वशिष्ठाय नमः । ॐ हां पुलस्त्याय नमः । ॐ हौं क्रतवे नमः । ॐ हां भरद्वाजाय नमः । ॐ हां विश्वामित्राय नमः । ॐ हां प्रचेतसे नमः । ॐ हां मरीचये नमः । ' इन मन्त्रों को पढ़ते हुए अत्रि आदि ऋषियों को ( ऋषितीर्थ ) से एक - एक अञ्जलि जल दे । तत्पश्चात् सनकादि मनुष्यों को ( दो - दो अञ्जलि ) जल देते हुए निम्नाङ्कित मन्त्र - वाक्य पढ़े ।- ‘ ॐ हां सनकाय वषट् । ॐ हां सनन्दनाय वषट् । ॐ हां सनातनाय वषट् । ॐ हां सनत्कुमाराय वषट् । वषट् । ॐ हां पञ्चशिखाय वषट् । ॐ हां ऋभवे वषट् ' इन मन्त्रों द्वारा जुड़े हाथों की कनिष्ठिका के ॐ हां कपिलाय चाहिए । ' ॐ हां सर्वेभ्यो भूतेभ्यो वषट् । ' इस मन्त्र से वषट् - स्वरूप भूतगणों का तर्पण करे । मूल भाग से जलाञ्जलि देनी मुड़े हुए कुश के मूल और अग्रभाग से तिल सहित जल की तीन-तत्पश्चात् यज्ञोपवीत को दाहिने कन्धे पर करके दुहरे स्वधा । ॐ हां अनलाय स्वधा । ॐ हां सोमाय तीन अञ्जलियाँ दिव्य पितरों के लिए अर्पित करे । ' ॐ हां कव्यवाहनाय स्वधा । ' इत्यादि स्वधा । ॐ हां यमाय स्वधा । ॐ हां अर्यम्णे स्वधा । ॐ हां अग्निष्वात्तेभ्यः स्वधा । ॐ हां सोमपेभ्यः हां ईशानाय देवताओं की भाँति दिव्यपितरों को जलाञ्जलि से तृप्त करना चाहिए । ' ॐ मन्त्रों का उच्चारण कर विशिष्ट स्वधा ' कहकर पितामह को तथा ' ॐ हां शान्तप्रपितामहाय स्वधा ' पित्रे स्वधा । ' कहकर पिता को, ' ॐ हां पितामहाय तर्पण करे । यथा - ' ॐ हां पितृभ्यः स्वधा । कहकर प्रपितामह को भी तृप्त करे । इसी प्रकार समस्त प्रेत - पितरों का हां मातृभ्यः स्वधा । स्वधा । ॐ हां प्रपितामहेभ्यः स्वधा । ॐ हां वृद्धप्रपितामहेभ्यः स्वधा । ॐ ॐ हां पितामहेभ्यः. ह्रीं । ३ ख. ग. हूं । ४ ख. ग. हैं । ५ क. ङ. च. ' य च । अ ' । ६ क. ङ. च. १ क. च. हां । ख. ग. ॐ । २ ख. ग ' । ९ क. ङ. च. ' द्म्यः स्रुचा यु ' । १० ङ ' शेषः सुरसन्पित । प्रनष्टये । ७ क. ङ. च. ' य ह्यम ' । ८ क. च. ' लैः । हव्य त्रे पृषदाज्याय पिता ' । १३ क. ङ. च. ' य अथ प्रे । क. च. ' षसुरसन्पि ' । ११ ख. ग. ॐ ह्रामी । १२ क. ङ. च. CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 274
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२७० अग्निपुराणम् वृद्धप्रपितामहेभ्यो मातृभ्यश्च स्वधा तथा । हां मातामहेभ्यः स्वधा हां ' प्रमातामहेभ्यश्च ॥४९ ॥
वृद्धप्रमातामहेभ्यः सर्वेभ्यः पितृभ्यस्तथा । सर्वेभ्यः स्वधा ज्ञातिभ्यः सर्वाचार्येभ्य एव च ॥ ५० ॥
दिशां दिक्पतिसिद्धानां मातॄणां ग्रहरक्षसाम् ॥५१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये स्नानादिविधिकथनं नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥७२ ॥
अथ त्रिसप्ततितमोऽध्यायः सूर्यपूजाकथनम् ईश्वर उवाच वक्ष्ये सूर्यार्चनं स्कन्द कराङ्गन्यासपूर्वकम् । अहं तेजोमयः सूर्य इति ध्यात्वाऽर्घ्यमर्चयेत् ॥१ ॥
पूरयेद्रक्तवर्णेन ललाटाकृष्टविन्दुना । तं सम्पूज्य रवेरङ्गैः कृत्वा रक्षावगुण्ठनम् ॥२ ॥
संप्रोक्ष्य तज्जलैर्द्रव्यं पूर्वास्यो भानुमर्चयेत् । ॐ अं हृद्बीजादि सर्वत्र पूजनं दण्डिपिङ्गलौ ॥३ ॥
द्वारिदक्षे वामपार्श्व ईशाने अङ्गणाय च । अग्नौ गुरुं पीठमध्ये प्रभूतं चाऽऽसनं यजेत् ॥४ ॥
अग्न्यादौ विमल ' सारमाराध्यं परमं सुखम् । सितरक्तंपीतनीलवर्णान्सिंहनिभान्यजेत् ॥५ ॥
ॐ हां मातामहेभ्यः स्वधा । ॐ हां प्रमातामहेभ्यः स्वधा । ॐ हां वृद्धप्रमातामहेभ्यः स्वधा । ॐ हां सर्वेभ्यः पितृभ्यः स्वधा । ॐ हां सर्वेभ्यः ज्ञातिभ्यः स्वधा । ॐ हां सर्वाचार्येभ्यः स्वधा । ॐ हां दिग्भ्यः स्वधा । ॐ हां दिक्पतिभ्यः स्वधा । ॐ हां सिद्धेभ्यः स्वधा । ॐ हां मातृभ्यः स्वधा । ॐ हां ग्रहेभ्यः स्वधा । ॐ हां रक्षोभ्यः स्वधा । ' इन वाक्यों को पढ़ते हुए क्रमशः पितरों, पितामहों, वृद्ध प्रमातामहों, सभी पितरों, सभी ज्ञातिजनों, सभी आचार्यों, सभी दिशाओं, दिक्पतियों, सिद्धों, मातृकाओं, ग्रहों और राक्षसों को जलाञ्जलि प्रदान करे ॥४०-५१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में स्नानादि विधि - वर्णन नामक बहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥७२ ॥
अध्याय ७३ सूर्यपूजावर्णन शंकर बोले - हे स्कन्द! अब मैं करन्यास और अङ्गन्यासपूर्वक सूर्यपूजन की विधि बतला रहा हूँ । “ मैं तेजोमय सूर्य हूँ ' ऐसा ध्यान करते हुए अर्घ्य प्रदान करना चाहिए और यह कल्पना करनी चाहिए कि वह अर्घ्य देवता के मस्तक पर छिड़के हुए जल से रक्त - वर्ण का हो गया है । मन्त्रों से सूर्य के अङ्गों की पूजा करके रक्षार्थ चारों ओर आवरण - वृत्त घेर देना चाहिए ॥१-२ ॥ पूर्वाभिमुख होकर जल से सब सामग्री को शुद्ध करके सूर्य की पूजा करे । ' ॐ अं हृदयाय नमः ' इस प्रकार आदि में स्वर बीज लगाकर सर्वत्र पूजन करे । द्वार के दाहिने और बायें पार्श्व में दण्डि और पिङ्गल का, ईशानकोण में गणपति और अग्निकोण में गुरु और पीठमध्य में अन्य आसन ( देवासन ) का पूजन करे ॥३-४ ॥ अग्नि आदि कोणों में विमल, आराध्य परम सुखप्रद तत्त्वों का और श्वेत, रक्त, पीत, नीलवर्ण के सिंह के समान आकृतिवाले देवों की पूजा करे ॥५ ॥
१ ख. ग. हां । २ ख. ग. हां । ३ क. ख. ग. घ. ङ. च. ' त्वाऽर्घम ' । ४ क. च. गुरुर्मठ । ५ ख. मलासा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 275
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः २७१ पद्ममध्ये रां च दीप्तां रीं सूक्ष्मां रुं जयां क्रमात् । रों रौं ( च ) विद्युता शक्ति पूर्वाद्याः सर्वतोमुखाः । ॐ हं खं ' खशोल्कायेति यजेदावाह्य भास्करम् । ह्रीं ह्रीं सः सूर्याय नमो मुद्रयाऽऽवाहनादिकम् । पद्ममुद्रां बिम्बमुद्रां प्रदर्श्याग्नौ हृदीरितम् । भूर्भुवः स्वः सुरेशाय शिखायै नैर्ऋते यजेत् । वः ' अस्त्रायेति पूर्वादौ ततो मुद्राः प्रदर्शयेत् । अस्त्रस्य त्रासनी योज्या ग्रहाणां च नमस्क्रिया । दले पूर्वादिकेऽग्न्यादौ अं ( भं ) भौमं शं शनैश्चरम् । मूलं जप्त्वाऽर्घ्यपात्राम्बुं दत्त्वा सूर्याय संस्तुतिः । पद्म - मण्डल के मध्य दीप्त रां, सूक्ष्म रीं, रुं, जया विद्युता को रौं और पूर्वा आदि को सर्वतोमुखरूप तं भद्रां रें विभूतीश्च विमलां रैममोघया ॥६ ॥
रं मध्ये अर्कासनं स्यात्सूर्यमूर्ति ' षडक्षरम् ॥७ ॥
ललाटाकृष्टमञ्जल्यां ' ध्यात्वा रक्तं न्यसेद्रविम् ॥८ ॥
विधाय प्रीतये बिम्बमुद्रां गन्धादिकं ददेत् ॥९ ॥
ॐ आं हृदयाय नमः अर्काय शिरसे तथा ॥१० ॥
' हुं कवचाय वायव्ये हां ' नेत्रायेति मध्यतः ॥११ ॥
धेनुमुद्रा हृदादीनां गोविषाणा च नेत्रयोः ॥ १२ ॥
सों सोमं बुं बुधं बृं च जीवं भं भार्गवं यजेत् ॥१३ ॥
रं राहुं " कें केतवे च गन्धाद्यैश्च खशोल्किना " ॥१४ ॥
नत्वा पराङ्मुखं चार्क " क्षमस्वेति ततो वदेत् ॥ १५ ॥
, भद्रा को रूं, विभूति को रें, विमला को रैं, अमोघा को रों, में ' ' और षडक्षर सूर्यमूर्ति का न्यास करे ॥६-७ ॥ ' ॐ हं खं खशोल्काय नमः ' इत्यादि मन्त्र से सूर्य का आवाहन करके उनका पूजन करे । अञ्जलि को ललाट से लगाकर रक्तवर्ण सूर्य का ध्यान करे ॥८ ॥ ' ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्याय नमः ' इत्यादि मन्त्र से सूर्यमुद्रा के द्वारा आवाहन कर
सूर्य की प्रसन्नता के लिए बिम्बमुद्रा दिखाये और गन्ध आदि समर्पित करे ॥९ ॥ पद्ममुद्रा और बिम्बमुद्रा को
विभिन्न दिशाओं में षडङ्गन्यास करना चाहिए । ' अं आं हृदयाय नमः ', ' अर्काय शिरसे स्वाहा ', ' भूर्भुवः दिखाकर शिखायै ' मन्त्रों से नैर्ऋतकोण में यज्ञ करे । ' हुं कवचाय नम: ' इस मन्त्र से वायव्य में ' हां नेत्राय ’ स्वः सुरेशाय में और ' वः अस्त्राय ' मन्त्र से पूर्व आदि दिशाओं में पूजन करे, अनन्तर मुद्राएँ लगाये । हृदय आदि मन्त्र से मध्य को त्रासनी मुद्रा और ग्रहों को नमस्कारमुद्रा दिखाये, ' सों सोमाय पर धेनुमुद्रा, नेत्रों पर गोविषाणमुद्रा, अस्त्र नमः ' से बृहस्पति का, ' भं भार्गवाय नमः ' नमः ' मन्त्र से सोम का, ' बुं बुधाय नमः ' से बुध का, ' बृं बृहस्पतये । पद्ममण्डल की पंखुड़ियों पर पूर्व आदि दिशाओं में और अग्नि आदि कोणों से शुक्र का पूजन करे ॥१०-१३ नमः ' और ' कें केतवे नमः ' मन्त्रों से गन्ध आदि से इन में ‘ भं भौमाय नमः ', ‘ शं शनैश्चराय नमः ', ' रं राहवे अर्घ्य नामक भगवान् सूर्य का पूजन करना चाहिए || १४ || मूल मन्त्र का जप करके ग्रहों के साथ खखोल्की नमस्कार करके ' क्षमा कीजिये ' ऐसा कहे ॥१५ ॥
पात्र से अर्घ्य देकर सूर्य की स्तुति करे और सूर्य का पराङ्मुख मूर्तिष ' । २ घ. खं खोल्का ' । ३ क. खसोल्का । च. खषोल्का । ४ क. च. ' ञ्जन्यां ध्या ' । ५ क. ङ. च. १ ख. ग. ° शि ' । ६ ख. सुरं कालिनि शि । ७ क. ङ. च. हूं । ख. ग. हूं । ८ क. ख. “ वः स्वरे कालिनि शि ’ । खः ' वः स्वरो कालिनि ग. ङ. च. कं । ११ क. च. खषोल्कि ' । ग. खसोल्कि ' । घ. खखोल्कय । मू । ग, ङ. च. भां । ९ क. रः । १० क. ख. ' । १३ क. ख. ग. ङ. च. चार्घं क्ष । ङ. खखोल्कि ' । १२ क. ख. ग. ङ. च. ' त्वाऽर्घपा CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 276
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अग्निपुराणम् २७२ शराणुना फडन्तेन समाहृत्याणु संहृतिम् ' । हृत्पद्मे शिव सूर्येति संहारिण्योपसंस्कृतिम् ॥१६ ॥
योजयेत्तेजश्चण्डाय रविनिर्माल्यमर्पयेत् । अभ्यर्येशजपाद्ध्यानाद्धोमात्सर्वं रवेर्भवेत् ॥ १७ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये सूर्यपूजाविधि - कथनं नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥७३ ॥
अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः शिवपूजाकथनम् ईश्वर उवाच शिवपूजां प्रवक्ष्यामि आचम्य प्रणवार्घ्यवान् । द्वारमस्त्राम्बुना प्रोक्ष्य होमादिद्वारपान्यजेत् ॥१ ॥
गणं सरस्वतीं लक्ष्मीमूर्ध्वोदुम्बरके यजेत् । नन्दिगङ्गेदक्षशाख ' ( खा ) स्थिते वामगते यजेत् || २ || महाकालं च यमुनां दिव्यदृष्टिनिपाति ( त ) तः । उत्सार्य दिव्यान्विघ्नांश्च पुष्पक्षेपान्तरिक्षगान् ॥३ ॥
दक्षपाणित्रिभिर्घातैर्भूमिष्ठान्यागमन्दिरम् । देहलीं लङ्घयेद्वामशाखामाश्रित्य वै विशेत् || ४ || प्रविष्य दक्षपादेन विन्यस्यास्त्रमुदुम्बरे । ॐ हां वास्त्वधिपतये ब्रह्मणे मध्यतो यजेत् || ५ || तत्पश्चात् ‘ अस्त्राय फट् ' इस मन्त्र से शराणु से अणुसंहति को इकट्ठा करके हृदय - कमल पर ' शिव और सूर्य का आवाहन करके अन्तिम बार पूजा करे । प्रचण्ड सूर्य को तेज से युक्त करके सूर्य को निर्माल्य अर्पित करे । ' हे ईश! इस प्रकार सूर्य का पूजन करके जप, ध्यान और हवन करने से सब प्रकार के मनोरथ सिद्ध होते हैं ॥१६-१७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में सूर्यपूजा विधान - वर्णन नामक तिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥७३ ॥
अध्याय ७४ शिवपूजा विधि - वर्णन शिव बोले- -अब मैं शिवपूजन के सम्बन्ध में बतलाऊँगा । सर्वप्रथम आचमन करके मन में प्रणव का जप करके अस्त्र मन्त्रों से पवित्र रत्न के द्वारा मन्दिर के द्वार का प्रोक्षण करे तथा होम एवं अन्य द्वारपालों का अर्चन करे ॥१ ॥ तदनन्तर लक्ष्मी और
सरस्वती तथा गणपति का पूजन दरवाजे की चौखट पर करना चाहिए । दक्षिण की ओर नन्दी और गङ्गा तथा बायीं ओर महाकाल और यमुना की अर्चना करनी चाहिए । उस समय यजमान को अपने - आपको दिव्यदृष्टि से युक्त समझना चाहिए । अन्तरिक्ष में पुष्पों को फेंककर अंतरिक्षगत विघ्नों को दूर कर देना चाहिए ॥२-३ ॥ दाहिने पैर की एड़ी से तीन बार भूमि पर आघात करे । इस क्रिया द्वारा भूतलवर्ती समस्त विघ्नों के निवारण की भावना करे । तत्पश्चात् यज्ञमण्डप की देहली को लाँघे । वाम शाखा का आश्रय लेकर भीतर प्रवेश करे । दाहिने पैर से मण्डप के भीतर प्रविष्ट हो उदुम्बर वृक्ष में अस्त्र का न्यास करे तथा मण्डप के मध्य भाग में पीठ की आधार भूमि में ' ॐ हां वास्त्वधिपतये ब्रह्मणे नमः ' इस मन्त्र से वास्तुदेवता की पूजा करे 118-411 १ ख ‘ हृतिः । व ' । २ ख. ग. संहृतम् । ३ क. ख. ग. ङ. च. ' वार्धवा ' । ४ ख. ग. ' पान्यसेत् । ५ घ. दक्षिणेऽथ स्थि ' । ६ घ. पुष्पाक्षे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 277
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः २७३ निरीक्षणादिभिः शस्त्रैः शुद्धानादाय गड्डुकान् ' ॥ पवित्राङ्गः प्रजप्तेन वस्त्रपूतेन वारिणा । गन्धकाक्षतपुष्पादिसर्वद्रव्यसमुच्चयम् । देवदक्षे ततो न्यस्य सौम्यास्यश्च शरीरतः । भोग्यकर्मोपभोगार्थं पाणिकच्छपिकाख्यया । शोधयेत्पञ्चभूतानि संचिन्त्य सुषिरं तनौ ।
शक्ति हृद्व्यापिनीं पश्चाद्धङ्कारे पावकप्रभे ।
निवेशयेद्रेचकान्ते फडन्तेनाथ तेन च ॥
ग्रन्थीन्निर्भिद्य ' हुंकारं मूर्ध्नि विन्यस्य जीवनम् । हूं शिखोपरि विन्यस्य शुद्धं विन्द्वात्मकं स्मरेत् ।
रेचकेन बीजवृत्त्या शिवे लीनोऽथ शोधयेत् ।
लब्धानुज्ञः शिवान्मौनी गङ्गादिकमनुव्रजेत् ॥६ ॥
पूरयेदम्बुधौ तांस्तान्गायत्र्या हृदयेन वा ॥७ ॥
सन्निधीकृत्य पूजार्थं भूतशुद्ध्यादि कारयेत् ॥ ८ ॥
संहारमुद्रयाऽऽदाय मूर्धिन मन्त्रेण धारयेत् ॥९ ॥
हृदम्बुजे निजात्मानं द्वादशान्तपदेऽथ वा ॥१० ॥
चरणाङ्गुष्ठयोर्युग्मान्सुषिरान्तर्बहिः स्मरेत् ॥ ११ ॥
रन्ध्रमध्ये स्थिते कृत्वा प्राणरोधं हि चिन्तकः ॥१२ ॥
हृत्कण्ठतालुभ्रूमध्यब्रह्मरन्ध्रे विभिद्य च ॥१३ ॥
संपुटं हृदयेनाथ पूरकाहितचेतनम् ॥१४ ॥
कृत्वाऽथ कुम्भकं शंभावेकोद्घातेन योजयेत् ॥ १५ ॥
प्रतिलोमं स्वदेहे तु विन्द्वन्तं तत्र विन्दुकम् ॥ १६ ॥
निरीक्षण आदि शस्त्रों द्वारा शुद्ध किये हुए गडुओं को हाथ में लेकर, भावना द्वारा भगवान् शिव से आज्ञा प्राप्त करके साधक मौन हो गङ्गा आदि नदी के तट पर जाय ॥६ ॥ वहाँ अपने शरीर को पवित्र करके गायत्री - मन्त्र का जप करते
हुए वस्त्र से छाने हुए जल के द्वारा जलाशय में उन गड्डुओं को भरे अथवा हृदय - बीज ( नमः ) का उच्चारण करके जल भरे ॥७ ॥ सुगन्धित द्रव्यों, अक्षत और पुष्प इत्यादि समस्त सामग्रियों को इकट्ठा करके पूजा के लिए भूतशुद्ध्यादि कराना
चाहिए ॥८ ॥ देवता के दायीं तथा बायीं ओर न्यास करके मन्त्रपाठ करते हुए संहार - मुद्रा के द्वारा सिर से न्यास करना
चाहिए ॥९ ॥ तत्पश्चात् भोग्यकर्मों के उपयोग के लिए पाणिकच्छपिका ( कूर्ममुद्रा ) का प्रदर्शन करके द्वादश दलों से
युक्त हृदय - कमल में अपने आत्मा का चिन्तन करे ॥१० ॥ तदनन्तर शरीर में शून्य का चिन्तन करते हुए पाँच भूतों का
क्रमशः शोधन करे । पैरों के दोनों अँगूठों को पहले बाहर और भीतर से छिद्रमय ( शून्यरूप ) देखे । फिर कुण्डलिनी-को मूलाधार से उठाकर हृदय - कमल से संयुक्त करके इस प्रकार चिन्तन करे “ हृदय - रन्ध्र में स्थित अग्नि - तुल्य तेजस्वी शक्ति ' हूं ' बीज में कुण्डलिनी शक्ति विराज रही है । " उस समय चिन्तन करनेवाला साधक प्राणवायु का अवरोध ( कुम्भक ) करके उसका रेचक ( निःसारण ) करने के पश्चात् ' हुं फट् ' के उच्चारणपूर्वक क्रमशः उत्तरोत्तर चक्रों का उस कुण्डलिनी को हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य में ले जाकर स्थापित करे । इन ग्रन्थियों का भेदन करके भेदन करता हुआ - कमल से ब्रह्म- रन्ध्र में आये ' हूं ' बीजस्वरूप जीव को वहीं मस्तक में स्थापित कर दे । हृदय-कुण्डलिनी के साथ हृदय जीव में पूरक प्राणायाम द्वारा चैतन्य भाव जाग्रत किया गया है । शिखा के ऊपर स्थित ' हूं ' बीज से सम्पुटित हुए उस चैतन्य गुण ' हूं ' का न्यास करके शुद्ध विन्दुस्वरूप जीव का चिन्तन करे । फिर कुम्भक प्राणायाम करके उस एकमात्र को शिव के साथ संयुक्त कर दे ॥११-१५ ॥ इस प्रकार शिव में लीन होकर रेचक बीजवृत्ति द्वारा अपने-से युक्त जीव शरीर में प्रतिलोम रूप से विद्वन्त तक विन्दु को ले जाना चाहिए । पृथ्वी और वायु, जल आपको शुद्ध करके अपने क. ङ. च. शत्रुकान् । २ क. च. ' र्थ याने कच्छापकाक्षया । ङ. र्थ जने कच्छापकाक्षया । ३ क. ङ १. ख च. चन्द्रमध्ये गन्त्वगान् ॥ ४ क. च. ' त्वा प्रणवे वह्निचि ' । ५ क. च. न्निर्वर्त्य हुं का ० । ख. ग. न्निर्वर्ण्य हूं । ६ ख.काइत ० । ७ ख. ह्रूं । ८ ख. ग. शुद्धि विद्वानुक । ९ प्रतिलोमं " बिन्दुकम् क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । १८ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 278
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२७४ अग्निपुराणम् लयं नीत्वा महीवातौ ' जलवनी परस्परम् । पार्थिवं मण्डलं पीतं कठिनं वज्रलाञ्छितम् । पादादारभ्य मूर्धान्तं विचिन्त्य चतुरस्त्रकम् । अर्धचन्द्रं द्रवं सौम्यं शुभ्रमम्भोजलाञ्छितम् संयुक्तं राममन्त्रेण पुरुषान्तमकारणम् ' । आग्नेयं मण्डलं त्र्यस्त्रं रक्तं स्वस्तिकलाञ्छितम् । घोराणुत्रिभिरुद्घातैर्जलभूतं विशोधयेत् " कृष्ण " हेमिति बीजेन जातं शान्तिकलामयम् नमो विन्दुमयं वृत्तं विन्दुशक्तिविभूषितम् ' हौंकारेण फडन्तेन शान्त्यतीतकलामयम् आप्याययेत्ततः सर्वं मूलेनामृतवर्षिणा हृदाऽऽसनमिदं ध्यात्वा ( ' मूर्तिमावाहयेत्ततः द्वौ द्वौ साध्यौ तथाऽऽकाशमविरोधेन तच्छृणु ॥ १७ ॥
हौमित्यात्मीयबीजेनरे तन्निवृत्तिकलामयम् ॥१८ ॥
उद्घातपञ्चकेनैव वायुभूतं विचिन्तयेत् ॥ १ ९ ॥ । ह्रीमित्यनेन बीजेन प्रतिष्ठारूपतां गतम् ॥ २० ॥
। अर्घ्यं चतुर्भिरुद्घातैर्वह्निभूतं विशोधयेत् ॥ ॥२१ २१ ॥ ॥ हृमित्यनेन बीजेन विद्यारूपं विभावयेत् ॥२२ ॥
1 । षडस्त्रं मण्डलं वायोर्विन्दुभिः षड्भिरङ्कितम् ॥ २३ ॥
॥ संचिन्त्योद्घातयुग्मेन पृथ्वीभूतं विशोधयेत् ॥ ॥२४ २४ || ॥ । व्योमाकारं सुवृत्तं च शुद्धस्फटिकनिर्मलम् ॥२५ ॥
। ध्यात्वैकोद्घातयोगेन सुविशुद्धं विभावयेत् ॥ २६ ॥
। आधाराख्या ( ख्य ) मनन्तं च धर्मज्ञानादिपङ्कजम् ॥ २७ ॥
। सृष्ट्या शिवमयं तस्यामात्मानं द्वादशान्ततः ॥२८ ॥
तथा अग्नि एवं आकाश - इन सब में दो - दो को परस्पर अविरोध से लीन कर देना चाहिए ॥१६-१७ ॥ पार्थिव - मण्डल पीला, कठोर एवं वज्र चिह्नित हुआ करता है । ' हां ' इस बीजमन्त्र से युक्त तथा ' निवृत्ति ' कला से सम्पन्न है ॥१८ ॥ इस
प्रकार पैरों से लेकर मूर्धापर्यन्त शरीर को चौकोर रूप में समझना और उसे उद्घात - पञ्चक से वायुमय बनाना चाहिए ॥१९ ॥ जलीय मण्डल अर्धचन्द्र आकार, द्रव, शुभ्र और पद्मचिह्नित होता है । ' ह्रीं ' इस बीजमन्त्र से वह प्रतिष्ठा
कला में परिणत हो जाती है ॥२० ॥ वह वामदेव तथा तत्पुरुष मन्त्रों से संयुक्त जलतत्त्व चार गुणों से युक्त है । उसे इस
प्रकार ( घुटने से नाभि तक जल का ) चिन्तन करते हए उस जलतत्त्व का वह्नि - स्वरूप में लीन करके शोधन करे ॥२१ ॥
आग्नेय मण्डल त्रिकोण, लाल और स्वस्तिक से चिह्नित होता है । ' हूँ ' इस बीजमन्त्र से उसे विद्यारूप समझना चाहिए ॥२२ ॥ उसे जल के रूप में तीन उद्घातों से शुद्ध करना चाहिए । वायुमण्डल षट्कोण होता है और वह छह
विन्दुओं से चिह्नित रहा करता है ॥२३ । उसका वर्ण कृष्ण रहता है तथा ' हैं ' इस बीजमन्त्र से वह ' शान्ति ' कला युक्त रहता है । इसे पृथ्वी के रूप में कल्पित करके दो उद्घातों से शुद्ध करना चाहिए । नभोवृत्त विन्दुमय तथा विन्दुशक्ति से विभूषित हुआ करता है । वह व्योमाकार, सुवृत्त और शुद्ध स्फटिक के समान निर्मल रहा करता है ॥२४-२५ ॥ वह ' हौं ' इस मन्त्र से “ शान्त्यतीतकला ' से युक्त होता है । एक उद्घात के द्वारा उसका ध्यान करते हुए उसे सुविशुद्ध समझना चाहिए ॥२६ ॥ तदनन्तर आधार नामक अनन्तधर्मज्ञानादि पङ्कज को अमृतवर्षी मूल से आप्यायित करना चाहिए ।
हृदयरूपी इस आसन का विचार करते हुए उसमें शिवमय मूर्ति और द्वादशान्त से आत्ममूर्ति का आवाहन करना चाहिए ॥२७-२८ ॥ इसके बाद उस मूर्ति को वौषट् से अन्त होनेवाले शक्ति मन्त्र से आप्लावित करके सकलीकरण १ ख. स्वहेतौ तु विद्धं तं त ० ख. महीपाती । २ ख. ग. लाच्छनम् । ३ क. ङ. च.० त्यार्थीय ० ख. त्यात्याय । ४ हीमित्यनेन गतम् क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । ५ ख. न्तसका ' । ६ क. च. कृष्ट हौमि । ङ. कृष्टं हैमि । ७ ख. ग. ष्णं मि ० । ८ क. ' विशेषि । ९ मूर्तिमानाह्येत्ततः नास्ति ङ. पुस्तके । १० क. च. ' माघानं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 279
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः अथ तां शक्तिमन्त्रेण वौषडन्तेन सर्वतः । हृदयादिकरान्तेषु ) कनिष्ठाद्यङ्गुलीषु च । अस्त्रेण ( णाऽऽ ) रक्ष्य प्राकारं तनुत्रेणाथ ' तद्बहिः । आपादमस्तकं यावद्भावपुष्पैः शिवं हृदि । शिवमन्त्रैर्नाभिकुण्डे तर्पयेत शिवानलम् । एकं * स्वर्णादिपात्राणां पात्रमस्त्राम्बुशोधितम् । हृदाऽऽपूर्व्यं षडङ्गेन पूजयित्वाऽभिमन्त्रयेत् ' । रचयित्वाऽर्घ्यमष्टाङ्ग ११ सेचयेद्धेनुमुद्रया । तत्रस्थं यागसंभारं १२ प्रोक्षयेदस्त्रवारिणा । दर्शयित्वाऽमृतां मुद्रां पुष्पं दत्त्वा निजासने । स्नाने देवार्चने होमे भोजने यागयोगयोः । नादान्तोच्चारणान्मन्त्रं शोधयित्वा सुसंस्कृताम् " । ब्रह्मपञ्चकमावर्त्य माल्यमादाय लिङ्गतः । २७५ दिव्यामृतेन ' संप्लाव्य कुर्वीत सकलीकृतम् ॥२९ ॥
हृदादिमन्त्रविन्यासः सकलीकरणं मतम् ॥ ३० ॥
शक्तिजालमधश्चोर्ध्वं महामुद्रां प्रदर्शयेत् ॥ ३१ ॥
पद्मे यजेत्पूरकेण आकृष्टामृतसद्घृतैः ॥३२ ॥
ललाटे विन्दुरूपं च चिन्तयेच्छुभविग्रहम् ॥३३ ॥
विन्दुप्रसूतपीयूषरूपतौयाक्षतादिना ॥३४ ॥
संरक्ष्य हेतिमन्त्रेण ' कवचेनावगुण्ठयेत् " ॥३५ ॥
अभिषिञ्चेदथाऽऽत्मानं मूर्ध्नि तत्तोयबिन्दुना ॥ ३६ ॥
अभिमन्त्र्य हृदा पिण्डैस्तनुत्राणेन वेष्टयेत् ॥३७ ॥
विधाय तिलकं मूर्ध्नि पुष्पं मूलेन योजयेत् ॥ ३८ ॥
आवश्यके जपे धीरः सदा वाचं यमो भवेत् ॥ ३ ९ ॥ पूजामभ्यर्च्य " गायत्र्या सामान्यार्घ्यमुपाहेत् " ॥४० ॥
ऐशान्यां दिशि चण्डाय हृदयेन निवेदयेत् ॥४१ ॥
करना चाहिए । हृदय से लेकर हाथ तक और कनिष्ठा आदि अँगुलियों में हृदयादि मन्त्र का न्यास सकलीकरण कहा गया है ॥२९ -३० ॥ अस्त्र से प्राकार की रक्षा करके कवच से उसके बाहर की रक्षा करनी चाहिए । नीचे की ओर शक्तिजल और ऊपर की ओर महामुद्रा का प्रदर्शन करना चाहिए ॥३१ ॥ हृदय में कमल के ऊपर भावना के पुष्पों से आपादमस्तक
शिव की अर्चना करनी चाहिए । शिव मन्त्रों के द्वारा नाभिकुण्ड में शिवाग्नि का तर्पण करना चाहिए और मस्तक में विन्दु रूप में सुन्दर शरीरवाले शिव का चिन्तन करना चाहिए ॥३२-३३ ॥ स्वर्णादि पात्रों में एक पात्र को अस्त्राम्बु से शुद्ध करके विन्दु से उत्पन्न होनेवाले अमृतमय जल और अक्षत इत्यादि के षडङ्ग से पूजा करके, अभिमन्त्रण करके अस्त्र मन्त्र से उसकी रक्षा करके, उसे कवच से अवगुण्ठित कर देना चाहिए ॥ ३४-३५ ॥ तदनन्तर अष्टाङ्ग अर्घ्य बनाकर धेनु मुद्रा से उसका सेचन करना चाहिए और उस जल के विन्दु से अपने मस्तक का अभिषेक करना चाहिए ॥३६ ॥
वहाँ पर रखे यज्ञ सम्भार का अस्त्र - जल से प्रोक्षण करके विन्दुओं से अभिमन्त्रित करके कवच से आवेष्टित कर देना चाहिए ॥३७ ॥ अमृत मुद्रा का प्रदर्शन करके अपने आसन के ऊपर एक पुष्प रख देना चाहिए और अपने मस्तक पर
तिलक लगाकर मूलमन्त्र से एक पुष्प चढ़ा देना चाहिए ॥३८ ॥ धीर मनुष्य को स्नान, देवार्चन, होम, भोजन, याग और
आवश्यक जप में सदा मूक ही रहना चाहिए ॥ ३ ९ ॥ मन्त्र के अन्त में नाद ( ॐ ) मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए और गायत्री मन्त्र से पूजन करके सामान्य अर्घ्य को ठीक करना चाहिए ॥४० ॥ ब्रह्मपञ्चक की अवृत्ति करके लिङ्ग से माल्य
को लेकर पूर्वोत्तर कोण की ओर उसे चण्ड नामक देवता को हृदय - मन्त्र से निवेदित कराना चाहिए ॥४१ ॥ अस्त्र-१ दिव्यामृतेन " करान्तेषु च. पुस्तके नास्ति । २ क. घ. ङ. च. तन्मन्त्रेणा । ३ क. ङ. च. ' त संवृतैः । ४ ख. ग. एवं ।
५ ख. ग. ' शोभितं । ६ क. ङ. च. प्रस्तुत । ७ ख. ग. ' पूज्य ष ' । च. षडंशेन । ८ ख. ग. ' यित्वा निम ' । ९ ख. ग. ' चेन ' विलुण्ठ ' । ' चेन विगुण्ठ । १० क. ङ. च. ' त् । वर्धयित्वाऽर्धम । ११ क. ङ. च. ' ङ्ग रोपये । ख. ग. ' ङ्ग. रेचये । १२ क. ङ. च. ' संस्कारं । १३ क. ङ. च. ' त्वा पुरा कृतम् । १४ घ. ' स्कृतम् । १५ घ. पूजनेऽभ्य ' । १६ क. ख. ग. ङ. च. न्यार्घ मु ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 280
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२७६ अग्निपुराणम् प्रक्षाल्य पिण्डिकालिङ्गे अस्त्रतोये ततो हृदा । आत्मद्रव्यमन्त्रलिङ्गशुद्धौ सर्वान्सुरान्यजेत् । आधारशक्तिमङ्कुरनिभां कूर्मशिलास्थिताम् । विचित्रकेसरि प्रख्यानन्योन्यं पृष्ठदर्शिनः । धर्मं ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं चाग्निदिङ्मुखान् । पद्मं च कर्णिकामध्ये ' पूर्वादौ मध्यतो नव वामा ' ज्येष्ठा च रौद्री च काली कलविकारिणी ' हां सर्वभूतदमनी केसराग्रे मनोन्मनी । न्यसेत्सिंहासने देवं शुक्लं पञ्चमुखं विभुम् । शक्त्यृष्टिशूलखट्वाङ्गवरदं वामकैः करैः द्वात्रिंशल्लक्षणोपेतां शैवीं " मूर्ति तु मध्यतः अर्घ्यपात्राम्बुना सिञ्चेदिति लिङ्गविशोधनम् ॥४२ ॥
वायव्ये गणपतये हां गुरुभ्योऽर्चयेच्छिवे ॥४३ ॥
यजेद्ब्रह्मशिलारूढं शिवस्यानन्तमासनम् ॥४४ ॥
कृतत्रेतादिरूपेण शिवस्याऽऽसनपादुकाम् ' ॥ ४५ ॥
कर्पूरकुङ्कुमस्वर्णकज्जलाभान्यजेत्क्रमात् ॥४६ ॥
। वरदाभयहस्ताश्च शक्तयो धृतचामराः ॥४७ ॥
। बलविकार ( रि ) णी पूज्या बलप्रमथनी क्रमात् ॥४८ ॥
। क्षित्यादिशुद्धविद्यां तु तत्त्वव्यापकमासनम् ॥४९ ॥
दशबाहुं च खण्डेन्दुं दधानं दक्षिणैः करैः ॥ ५० ॥
। डमरुं बीजपूरं च नीलाब्जं सूत्रमुत्पलम् ॥५१ ॥
। हां हं हां शिवमूर्तये स्वप्रकाशं शिवं स्मरन् ॥५२ ॥
मन्त्र तथा हृद्मन्त्र से पवित्र जल के द्वारा पिण्डिका और लिङ्ग का प्रक्षालन करके अर्घ्यपात्र के जल से लिङ्ग को सिञ्चित करना ही लिङ्ग - शोधन कहलाता है ॥४२ ॥ आत्मा, द्रव्य ( पूजा - सामग्री ), मन्त्र और लिङ्ग की शुद्धि के
बाद सभी देवताओं का यजन करना चाहिए और पश्चिमोत्तर दिशा की ओर ' हां गणपतये ', ' हां गुरुभ्यो ' मन्त्रों से शिवार्चना करनी चाहिए ॥ ४३ ॥ कूर्म - शिला के ऊपर रखे हुए अङ्कर के समान आधार शक्ति और ब्रह्मशिला
ऊपर रखे हुए शिव के अनन्त आसन का यजन करना चाहिए || ४४ ॥ विचित्र सिंह की - सी आकृति से सुशोभित सिंहासन है । वे सिंह मण्डलाकार में स्थित होकर अपने आगेवाले पृष्ठ भाग को ही देखते हैं तथा सत्ययुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग - इन चार युगों के प्रतीक हैं । तत्पश्चात् शिव की आसनपादुका की पूजा करे ॥४५ ॥ धर्म, ज्ञान,
वैराग्य तथा ऐश्वर्य को जो कि कर्पूर, केसर, स्वर्ण और कज्जल के समान हैं, और दक्षिण दिशा की ओर मुखवाले हैं, क्रमशः यजन करना चाहिए ॥४६ ॥ पद्म के बीच कर्णिका के मध्य में नव शक्तियों का पूजन करना चाहिए जो कि एक
हाथ में चामर तथा दूसरे हाथ में अभयमुद्रा धारण किये हुए हैं ॥४७ ॥ जिनके नाम हैं - वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली,
कलविकारिणी, बलविकारिणी, बलप्रमथनी, सर्वभूतदमनी और मनोन्मनी । तदनन्तर पृथ्वी आदि अष्टमूर्ति तथा शुद्ध विद्या का चिन्तन एवं अर्चना करनी चाहिए ॥४८-४९ ॥ सिंहासन के ऊपर शुक्ल वर्णवाले पञ्चमुख, दस बाहु तथा दाहिने हाथों से चन्द्रखण्ड को धारण करनेवाले देवता की स्थापना करनी चाहिए ॥५० ॥ देवता के बायें हाथों में शक्ति,
ऋष्टि, शूल, खट्वाङ्ग, डमरू, बीजपूर, नलीकमल और सूत्र रहते हैं । मध्य में बत्तीस लक्षणों से युक्त शिव की मूर्ति को स्थापित करना चाहिए और ' हां हं हां शिवमूर्त्तये ' मन्त्र से स्वप्रकाश शिव का स्मरण करते रहना चाहिए ॥५१-५२ ॥ ' णिकां १ ग ° ख ।. ५ केशविप्राख्या ङ. ॰ध्यतोऽथ ” । वा " केशप्राख्यानमन्यो । ' व । ६ क. ङ. ' च ।. २ ' तो क. नवा ख. । ङ. च. ' कान् ध ० । ३ क. ङ. च, ङमुखाः । ' क । ४ ख.का ' व । ख. गतो ' न. च । व ' । ७ ख. रामा । ८ क. ङ. च. का तथा । पू ० । ९ शक्त्यृष्टि करैः क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । १० क. ङ. च. गौरी । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA