अग्नि पुराण — पृष्ठ 301–310
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 301–310
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एकोनाशीतितमोऽध्यायः आत्मतत्त्वे प्रकृत्यन्ते पालिते पद्मयोनिना विद्यातत्त्वे ' च विद्यान्ते ' विष्णुकारणपालिते शिवान्ते शिवतत्त्वे च रुद्रकारणपालिते सर्वकारणपालेषु शिवमुच्चार्य सुव्रत आत्मविद्याशिवैः प्रोक्तं मुमुक्षूणां पवित्रकम् स्वाहान्तं वा नमोन्तं वा मन्त्रमेषामुदीरयेत् ॐ हामात्मतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा ॐ हौं शिवतत्त्वाधिपतये ' शिवाय स्वाहा नत्वा " गङ्गावतारं तु प्रार्थयेत्तं " कृताञ्जलिः अन्तश्चारेण भूतानां द्रष्टा त्वं परमेश्वर मन्त्रहीनं क्रियाहीनं द्रव्यहीनं च यत्कृतम् अकृतं वाक्यहीनं च तत्पूरय महेश्वर त्वया पवित्रितं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् २ ९ ७ । मूलं लयान्तमुच्चार्य पवित्रेणार्चयेच्छ्विम् ॥११ ॥
। ईश्वरान्तं समुच्चार्य पवित्रमधिरोपयेत् ॥१२ ॥
। शिवान्तं मन्त्रमुच्चार्य तस्मै देयं पवित्रकम् ॥१३ ॥
॥ मूलं लयान्तमुच्चार्य दद्याद्गङ्गावतारकम् ' ॥१४ ॥
। विनिर्दिष्टं बुभुक्षूणां शिवतत्त्वात्मभिः ' क्रमात् ॥ १५ ॥
॥१६ ॥
। ॐ हां विद्यातत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा ॥ । ॐ हौं सर्वतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा ॥१७ ॥
। त्वं गतिः सर्वभूतानां संस्थितिस्त्वं चराचरे ॥ १८ ॥
। कर्मणा मनसा वाचा त्वत्तो नान्या गतिर्मम ॥ १ ९ ॥ । जपहोमार्चनैर्हीनं कृतं नित्यं मया तव ॥ २० ॥
। सुपूतस्त्वं परेशान पवित्रं पापनाशनम् ॥२१ ॥
। खण्डितं यन्मया देव व्रतं वैकल्ययोगतः ॥ २२ ॥
आत्मतत्त्व में लयान्त मूल का उच्चारण करके पवित्रक प्रदान करे । विष्णु से पालित विद्यातत्त्व में तथा विद्या के अन्त में ईश्वरान्त विष्णु - मन्त्र का उच्चारण करके पवित्रक चढ़ावे । रुद्र से पालित शिवान्त शिव - तत्त्व को शिव - मन्त्र का उच्चारण करके पवित्रक समर्पित करे । अये सुव्रत! सब कारणों के पालक के विषय में शिव का उच्चारण करके गङ्गावतारक प्रदान करे ॥११-१४ ॥ आत्मविद्या और शिव के क्रम से आचार्यों ने मुमुक्षुजनों के लिए पवित्रकविधि का वर्णन किया है और शिव, शक्ति और आत्मा के क्रम से भोग की इच्छा रखनेवालों के लिए पवित्रक का विधान है । इनका मन्त्र स्वाहान्त ( शिवाय स्वाहा ) या नमोऽन्त ( नमः शिवाय ) कहा गया है ॥१५-१६ ॥ ' ॐ हामात्मतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा ॐ हौं सर्वतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा ' - ये पवित्रक प्रदान के मन्त्र हैं ॥१७ ॥ गङ्गावतार पवित्रक को नमस्कार करके हाथ
जोड़कर प्रार्थना करे– “ परमेश्वर! तुम सब भूतों की एकमात्र गति हो । तुम चराचर की स्थिति हो ॥१८ ॥ तुम सब प्राणियों
के अन्त: करण में रहकर उनकी गतिविधि को देखते हो । मैं कार्य, मन और वाणी से तुमको ही अपना एकमात्र गति समझता हूँ, अन्य को नहीं ॥ १ ९ ॥ हे परमेश्वर! मैंने जो कुछ मन्त्रहीन, क्रियाहीन, द्रव्यहीन ( दक्षिणाहीन ) कर्म किये पूजन से या वाक्य से हीन जो कुछ मैंने तुम्हारी पूजा की है, उसको तुम पूर्ण करो । अये परेश! हैं, जप, होम और विधिवत् तुमने सारे स्थावर - जङ्गम को पवित्र कर दिया है । देव! विह्वलता या अभाव तुम अति पवित्र हो, पवित्र और पापनाशन हो । एक हो जाय ” ॥२०-२२३ ॥ भक्त, के कारण मेरा जो व्रत खण्डित हो गया है, वह तुम्हारी आज्ञारूपी सूत से गुँथकर क. ङ. च. ' तत्त्वं च । २ ख. ' वविद्यादिभिः । ३ ख. शिवान्तं । ४ क. ङ. च. ' षु सर्वतत्त्वेषु सु । ५ क. ङ. च. रणम् ' । १ । ७ ॐ हौं “ शिवाय स्वाहा ख. ग. पुस्तकयोरन्यथा ग्रन्थः स यथा -- " ॐ हां बलतत्त्वाधिपतये शिवाय ६ ख. ' वविद्यादिभिः. ङ. च. ' धिपाय शि । ९ क. ङ. च. ' धिपाय शि । १० क. ख. ग. ङ. च. दत्त्वा । ११ ख. ' येत्तु कृ ' । स्वाहा " इति । ८ क १२ ङ. " नं विधिही । च. नं भक्ति ही । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२ ९ ८ अग्निपुराणम् एकी भवतु तत्सर्वं तवाऽऽज्ञासूत्रगुम्फितम् । नत्वा तु गुरुणाऽऽदिष्टं गृहणीयान्नियमं नरः । प्रणम्य क्षमयित्वेशं गत्वा कुण्डान्तिकं व्रती । समारोप्य समभ्यर्च्य पुष्पधूपाक्षतादिभिः प्रविश्यान्तः शिवं स्तुत्वा सप्रणामं क्षमापयेत् शनैः पूर्णाहुतिं दत्त्वा वह्निस्थं विसृजेच्छिवम् अग्न्यादिभ्यस्ततो दद्यादाहुतीनां चतुष्टयम् सिद्धान्तपुस्तके दद्यात्सप्रमाणं पवित्रकम् ॐ हां भूः स्वाहा । ॐ हां भुवः स्वाहा होमं व्याहृतिभिः कृत्वा दत्त्वाऽऽहुतिचतुष्टयम् जपं निवेद्य देवस्य भक्त्या स्तोत्रं विधाय च ॥ २३ ॥
चतुर्मासं त्रिमासं वा त्र्यहमेकाहमेव च ॥ २४ ॥
पावकस्थे शिवेऽप्येवं पवित्राणां चतुष्टयम् ॥२५ ॥
। अन्तर्बलिं पवित्रं च रुद्रादिभ्यो निवेदयेत् ॥ २६ ॥
। प्रयश्चित्तकृतं होमं कृत्वा हुत्वा च पायसम् ॥२७ ॥
। होमं व्याहृतिभिः कृत्वा रुन्ध्यान्निष्ठुरयाऽनलम् ॥२८ ॥
। दिक्पतिभ्यस्ततो दद्यात्सपवित्रं बहिर्बलिम् ॥२९ ॥
॥३० ॥
। ॐ हां स्वः स्वाहा । ॐ हां भूर्भुवः स्वः स्वाहा ॥३१ ॥
॥३२ ॥
ॐ हां अग्नये स्वाहा । ॐ हां सोमाय स्वाहा ।
हां अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा । ॐ हामग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥३३ ॥
गुरुं शिवमिवाभ्यर्च्य वस्त्रभूषादिविस्तरैः । समग्रं सफलं तस्य क्रियाकाण्डादि वार्षिकम् || ३४ || यस्य तुष्टो गुरुः सम्यगित्याह परमेश्वरः । इत्थं गुरोः समारोप्य हृदालम्बि पवित्रकम् ॥३५ ॥
द्विजादीन्भोजयित्वा तु भक्त्या वस्त्रादिकं ददेत् । दानेनानेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥ ३६ ॥
जप को शिवार्पण और स्तुति करके गुरु को प्रणाम करे और उनके आदेश से व्रत नियम स्वीकार करे । यह व्रत चार या तीन मास, तीन दिन या एक दिन का होना चाहिए ॥२३ - २४ ॥ व्रतान्त में व्रती ईश को प्रणामकर क्षमाप्रार्थना करे । तदनन्तर कुण्ड के समीप जाकर अग्नि में स्थित शिव को चार पवित्रक प्रदान करे । पुष्प, धूप, अक्षत आदि से पूजन कर अन्तर्बलि पवित्रक रुद्र आदि देवों को समर्पित करे ॥ २५-२६ ॥ मण्डप में प्रवेश कर शिव की स्तुति करके प्रणामपूर्वक क्षमायाचना करके खीर की आहुति दे और पूर्णाहुति प्रदान करके अग्निस्थ शिव का विसर्जन करे । व्याहृति के द्वारा हवन का निष्ठुर मुद्रा से अग्नि का अवरोध करे ॥२७-२८ ॥ इसके अनन्तर अग्न्यादि देवों को चार आहुतियाँ देनी चाहिए । दिक्पालों को पवित्रक सहित बहिर्बलि, सिद्धान्त - पुस्तक पर विहित प्रमाणानुरूप पवित्रक समर्पित करे ॥ २ ९ -३० ॥ “ ॐ हां भूः स्वाहा, ॐ हां भुवः स्वाहा, ॐ हां स्वः स्वाहा, ॐ हां भूर्भुवः स्वाहा ” –इन व्याहृतियों से हवन करने के पश्चात् चार आहुतियाँ दे । मन्त्र ये हैं– “ ॐ हामग्नये स्वाहा, ॐ हां सोमाय नमः स्वाहा, ॐ हामग्नीषोमाभ्यां स्वाहा, ॐ हामग्नये स्विष्टकृते स्वाहा । ” शिव की भाँति वस्त्र, आभूषण, आसन आदि से गुरु की भी पूजा करे । परमेश्वर ने कहा है कि इस प्रकार गुरु की पूजा करने से गुरु के सन्तुष्ट हो जाने पर मनुष्य के सम्पूर्ण क्रियाकाण्डादि वार्षिक कार्य सफल हो जाते हैं ॥ ३१-३४ ॥ इस प्रकार गुरु का पूजन करके उन्हें हृदय तक लटकता हुआ पवित्रक धारण करावे तथा ब्राह्मण आदि को भोजन कराकर भक्तिपूर्वक उन्हें वस्त्रादि दे । हे देवेश! मेरे द्वारा दिये हुए इस दान से शिव प्रसन्न होवें ॥ ३५-३६ ॥ १ क. ङ. च. ' त्वा कन्या विष्टर ' । २ ख. दत्त्वा सप ' । ३ ख. स्वाहेति । गु ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकोनाशीतितमोऽध्यायः भक्त्या स्नानादिकं प्रातः कृत्वा शंभो: समाहरेत् । नित्यं नैमित्तिकं कृत्वा विस्तरेण यथा पुरा । प्रायश्चित्तं ततोऽस्त्रेण हुत्वा पूर्णाहुतिं यजेत् । त्वत्प्रसादेन कर्मेदं ममास्तु फलसाधकम् । वह्निस्थं नाडीयोगेन शिवं संयोजयेच्छिवे । समाचम्य प्रविश्यान्तः कुम्भानुगतसंवरान् । विसृज्य लोकपालादीनादायेशात्पवित्रकम् । तन्निर्माल्यादिकं तस्मै सपवित्रं समर्पयेत् । यत्किंचिद्वार्षिकं कर्म कृतं न्यूनाधिकं मया । इति विज्ञाप्य देवेशं नत्वा स्तुत्वा विसर्जयेत् । पञ्चयोजनसंस्थोऽपि पवित्रं गुरुसन्निधौ २ ९९ पवित्राण्यष्टपुष्पैस्तं पूजयित्वा विसर्जयेत् ॥ ३७ ॥
पवित्राणि समारोप्य प्रणम्याग्नौ शिवं यजेत् ॥ ३८ ॥
भुक्तिकामः शिवायाथ कुर्यात्कर्मसमर्पणम् ॥ ३ ९ ॥ मुक्तिकामस्तुकर्मेदं माऽस्तु मे नाथ बन्धकम् ॥४० ॥
हृदि न्यस्याणुसंघातं पावकं च विसर्जयेत् ॥४१ ॥
शिवं संयोज्य साक्षेपं क्षमस्वेति विसर्जयेत् ॥४२ ॥
सति चण्डेश्वरे पूजां कृत्वा दत्वा पवित्रकम् ॥४३ ॥
अथवा स्थण्डिले चण्डं विधिना पूर्ववद्यजेत् ॥ ४४ ॥
तदस्तु परिपूर्णं मे चण्ड नाथ तवाज्ञया ॥ ४५ ॥
त्यक्तनिर्माल्यकः शुद्धः स्नापयित्वा शिवं यजेत् ॥।४६ ॥ इत्यादि महापुराण आग्नेये पवित्रारोहणविधिकथनं नामैकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥७९ ॥
प्रात: काल स्नान करके भक्तिपूर्वक शम्भु की पूजा करे और पुनः आठ पुष्पों से युक्त पवित्रकों से पूजन कर विसर्जन करे ॥३७ ॥ पहले की ही भाँति विस्तारपूर्वक नित्य और नैमित्तिक कर्मों को करके पवित्रकों को समर्पित कर प्रणाम
करे और अग्नि में पूजा करे ॥ ३८ ॥ प्रायश्चित्त हवन करके पूर्णाहुति दे । भक्ति की कामना करनेवाले व्यक्ति को
अपने किये हुए कर्मों को - " नाथ! तुम्हारी कृपा से मेरा यह कर्म फल देनेवाला हो, मुमुक्षुजन को मेरे लिये यह कर्म - बन्धन न बने " -मन्त्र से शिवार्पण कर देना चाहिए ॥ ३ ९ -४० ॥ नाड़ी योग से अग्निस्थ शिव को शिव में संयुक्त करे । हृदय में अणु समूह का न्यास करके अग्नि को विसर्जित कर दे । तत्पश्चात् आचमन कर मण्डप में प्रवेश करे और कलश के जल से शिव को स्नान कराकर अपने प्रति आक्षेपयुक्त बातें कहकर, ' क्षमा करो ', कहकर विसर्जन करे ॥४१-४२ ॥ लोकपाल आदि का विसर्जन कर शिव को अर्पित किये हुए पवित्रक को लेकर चण्डेश्वर की पूजा करे । उनको पवित्रक अर्पित करके पवित्रक सहित निर्माल्य आदि अर्पित करे ॥४३-४३३ ॥ अथवा किसी वेदी पर चण्डी की विधिवत् पूजा करके प्रार्थना करे कि “ हे नाथ! हे चण्ड! मेरे किये हुए वार्षिक कृत्य में जो कुछ कमी या अधिकता हुई हो, तुम्हारी आज्ञा से वह परिपूर्ण हो जाय । " इस प्रकार विज्ञापित कर देवेश को नमस्कार कर और स्तुति करके उसका विसर्जन करे ॥४४-४५३ ॥ सब निर्माल्य को पृथक् करके शुद्ध होकर शिव को कराकर उनका पूजन करे । पाँच योजन दूर रहने पर भी गुरु के समीप जाकर पवित्रक को अर्पण करके स्नान पूजन करे || ४६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में पवित्रारोहण - विधि - वर्णन नामक उन्यासीवाँ अध्याय समाप्त ॥७९ ॥
१ क. ङ. च. ' स्वाश्वसं । घ. स्याग्निसं । २ क. ख. ङ. सापेक्षा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ३०० अथाशीतितमोऽध्यायः दमनकारोहणविधिः ईश्वर उवाच वक्ष्ये दमनकारोहविधिं पूर्ववदाचरेत् ॥ हरकोपात्पुरा जातो भैरवो दमिताः सुराः || १ || तेनाथ शप्तो विटपो भवेति त्रिपुरारिणा । प्रसन्नेनेरितं चेदं पूजयिष्यन्ति ये नराः ॥ २ ॥
परिपूर्ण फलं तेषामन्यथा न भविष्यति । सप्तम्यां वा त्रयोदश्यां दमनं संहिताणुभिः ' १ || ३ || संपूज्य बोधयेदवृक्षं भववाक्येन मन्त्रवित् । हरप्रसादसंभूत त्वमत्र संनिधी भव || ४ || शिवकार्यं समुद्दिश्य नेतव्योऽसि शिवाज्ञया । गृहेऽप्यामन्त्रणं कुर्यात्सायाह्ने चाधिवासनम् ॥५ ॥
यथाविधि समभ्यर्च्य सूर्यशंकरपावकान् । देवस्य पश्चिमे मूलं दद्यात्तस्य मृदायुतम् ॥६ ॥
वामेन शिरसा वाऽथ नालं धात्रीं तथोत्तरे । दक्षिणे ' भग्नपत्र च ' प्राच्या ' पुष्पं च धावनम् ' ॥७ ॥
पुटिकास्थं फलं मूलमथैशान्यां यजेच्छिवम् । पञ्चाङ्गमञ्जलौ कृत्वा आमन्त्र्य शिरसि न्यसेत् || ८ || आमन्त्रितोऽसि देवेश प्रातःकाले मया प्रभो । कर्तव्यस्तपसोलाभः पूर्णं सर्वं तवाज्ञया ॥९ ॥
अध्याय ८० दमनकारोहण - विधि महेश्वर बोले - अब मैं दमनकारोहण - विधि को बतला रहा हूँ । पहले अध्यायों में बतायी हुई विधि के अनुसार पूजन करना चाहिए । प्राचीनकाल में शङ्कर के क्रोध से भैरव उत्पन्न हुए, उन्होंने देवताओं का दमन किया ॥ १ ॥ । त्रिपुरारि
ने उसको शाप दिया कि तुम वृक्ष हो जाओ - अनुनय - विनय से प्रसन्न होकर कहा कि जो मनुष्य तुम्हारी पूजा करेंगे, उनके मनोरथ पूर्ण होंगे, उनकी आशा विफल न होगी ।२ - २३ ॥ पूजन विधि इस प्रकार है कि सप्तमी या त्रयोदशी के दिन संहिता - मन्त्रों के द्वारा दमन की पूजा करके मन्त्रज्ञ व्यक्ति शिव की आज्ञा से वृक्ष को लगावे - ' हे शिव के प्रसाद से उत्पन्न होनेवाले! तुम इस वृक्ष में वास करो, तुमको शिव की आज्ञा से शिब कार्य के लिए जाना है । ' सायंकाल अपने घर पर भी आमन्त्रित करके अधिवासन करे ॥३-५ ॥ सूर्य, शङ्कर और अग्नि की यथाविधि पूजा करके देवता के पश्चिम और मिट्टी से युक्त मूल रख दे || ६ || वाम अथवा शिर ( मन्त्र ) से उत्तर दिशा में नाल या आँवले को रखे, दक्षिण में भग्नपत्र तथा पूर्व में धावन तथा पुष्प रखे । ईशानकोण में पुटिका में पुष्प फल रखकर शिव की पूजा करे । अञ्जलि में पञ्चाङ्ग ( मूल, पत्र, फूल, फल, वल्कल ) रखकर आमंत्रित करे और सिर पर चढ़ा दे ॥७-८ ॥ उस समय यह प्रार्थना करे कि ' हे देवेश! प्रातःकाल के लिए आपको आमन्त्रित करता हूँ । तुम्हारी आज्ञा से मेरी १ घ. ' तात्मभिः । २ क. ' हेष्वाम ' । ३ क. च. लं गं धं तस्य च शाश्वतम् । ङ. ' लं गत्वा तस्य च शाश्वतम् । ४ ख. फलं । ५ ङ. ' पणेऽम्भसः प ' । ६ ख. च. भस्म प ० । ७ ङ. च. पुष्पं च दन्तधावनम् । ८ क. च. पुष्पं । ९ ख. धावलम् । घ. धारणम् । १० क. ङ. च. कारक फ ' । ख. कास्त्रफ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकाशीतितमोऽध्यायः ३०१ मूलेन शेषं पात्रस्थं पिधायाथ पवित्रकम् । प्रातः स्नात्वा जगन्नाथं गन्धपुष्पादिभिर्यजेत् ॥१० ॥
नित्यं नैमित्तिकं कृत्वा दमनैः पूजयेत्ततः । शेषमञ्जलिमादाय आत्मविद्याशिवात्मभिः ' ॥११ ॥
मूलाद्यैरीश्वरान्तैश्च चतुर्थाञ्जलिना ततः ॥१२ ॥
' हौं महेश्वराय ' मखं पूरय पूरय शूलपाणये नमः ॥१३ ॥
शिवं वह्निं च सम्पूज्य गुरुं प्रार्च्याथ बोधयेत् । भगवन्नतिरिक्तं वा हीनं वा यन्मया कृतम् ॥१४ ॥
सर्वं तदस्तु सम्पूर्णं यच्च दामनकं मम । सकलं चैत्रमासोत्थं फलं प्राप्य दिवं व्रजेत् ॥ १५ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये दमनकारोहणविधिकथनं नामाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
अथैकाशीतितमोऽध्यायः समयदीक्षाविधिः ईश्वर उवाच वक्ष्यामि भोगमोक्षार्थं दीक्षां पापक्षयंकरीम् । मलमायादिपाशानां विश्लेषः क्रियते यया ॥१ ॥
ज्ञानं च जन्यते शिष्ये सा दीक्षा भुक्तिमुक्तिदा । विज्ञातकलनामैको ' द्वितीयः प्रलयाकलः ॥२ ॥
सारी कर्त्तव्यविधियाँ पूर्णरूप से लाभप्रद हों । ' मूल मन्त्र से वस्तुओं के ऊपर पवित्रक रखकर ढक दे और प्रातः काल स्नान के पश्चात् गन्ध - पुष्प आदि से जगन्नाथ की पूजा करे ॥ ९ -१० ॥ तदनन्तर नित्य और नैमित्तिक कार्य को समाप्त करके दमन से पूजा करे । शेष अञ्जलि को हाथ में लेकर आत्म, विद्या और शिवतत्त्वों से मूलादि और ईश्वरान्त मन्त्रों से चौथी अञ्जलि प्रदान करे ॥११-१२ ॥ उसका मन्त्र यह है - ' ॐ हौं महेश्वराय मखं पूरय पूरय शूलपाणये नमः । ' शिव और अग्नि की पूजा करे । तत्पश्चात् भगवान् की प्रार्थना करके क्षमाप्रार्थना करे कि ' हे भगवन्! इस विधि में जो त्रुटि या अधिकता हुई हो, उससे उत्पन्न दोष दूर हो जाय । मेरा यह दमन - पूजा पूर्ण फल दे । ' इस प्रकार हवन की पूजा करने से मनुष्य चैत्रमास व्रत के सब फल को प्राप्तकर स्वर्ग को जाता है ॥१३-१५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में दमनकारोहण - विधि वर्णन नामक अस्सीवाँ अध्याय समाप्त ॥८० ॥
अध्याय ८१ समयदीक्षाविधि का वर्णन महादेव बोले - मैं आपसे भोग और मोक्ष की प्राप्ति के लिए पाप को नष्ट करनेवाली उस दीक्षा को कहूँगा, जो कि माया आदि मल और पाशों से मनुष्य को छुड़ा देती है ॥१ ॥ यह दीक्षा शिष्य को ज्ञानी बनाकर उसे भुक्ति - मुक्ति
प्रदान करती है । शास्त्र में दीक्षा प्रदान करने के योग्य अनुग्राह्य जीव तीन प्रकार के माने गये हैं - पहला विज्ञानाकल, १ क. ' वाणुंभिः । २ क. ङ. च. ॐ हौ मग्नेश्व ' । ३ घ. मखेश्व ' । ४ ख. शोधयेत् । ५ ख. ' तकाल ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ३०२ तृतीयः सकलः शास्त्रेऽनुग्राह्यस्त्रिविधो मतः । कलादिभूमिपर्यन्तं स्तम्बैस्तु सकलो मतः । निराधारा द्वयोस्तेषां साधारा सकलस्य तु । तीव्रशक्तिनिपातेन निराधारेति सा स्मृता । शक्त्या यां कुरुते शंभुः सा साधिकरणोच्यते । साधिकाराऽनधिकारा तदभिधीयते निर्बीजा ' त्वसमर्थानां समयाचारवर्जिता साधिकारा भवेद्दीक्षा साधकाचार्ययोरतः ' नित्यमात्राऽधिकारत्वाद्दीक्षा ' (? ) निरधिकारिका एका क्रियावती तत्र कुण्डमण्डलपूर्विका इत्थं लब्धाधिकारेण दीक्षाऽऽचार्येण साध्यते प्रणवार्घ्यं कराम्भोजः कृतद्वाराधिपार्चनः १२ तत्राऽऽद्यो मलमात्रेण मुक्ताऽन्यो मलकर्मभिः ॥ ३ ॥
निराधाराऽथ साधारा दीक्षाऽपि द्विविधा मता ॥ ४ ॥
आधारनिरपेक्षेण क्रियते शंभुचर्या ॥ ५ ॥
आचार्यमूर्तिमास्थाय मायातीव्रादिभेदया ॥ ६ ॥
इयं चतुर्विधा प्रोक्ता सबीजा बीजवर्जिता ॥ ७ ॥
। समयाचारसंयुक्ता सबीजा जायते नृणाम् ॥ ८ ॥
। नित्ये नैमित्तिके काम्ये यतः " स्यादधिकारिता ॥९ ॥
। निर्बीजा दीक्षितानां तु तथा समयि पुत्रयोः ॥ १० ॥
। द्विविधेयं द्विरूपा ० हि प्रत्येकमुपजायते ॥ ११ ॥
। मनोव्यापारमात्रेण या सा ज्ञानवती मता ॥१२ ॥
। स्कन्ददीक्षां गुरुः कुर्यात्कृत्वा ११ नित्यक्रियां ततः ॥ १३ ॥
। विघ्नानुत्सार्यं देहल्यां न्यस्यास्त्रं स्वासने स्थितः ॥१४ ॥
दूसरा प्रलयाकल, तीसरा सकल ॥२-२३ ॥ इनमें पहला जीव मल नामक पाश से मुक्त होता है । दूसरा मल और कर्म से, तीसरा कला से लेकर भूमिपर्यन्त सभी से अर्थात् मल, माया और कर्म से बँधा रहता है - ऐसा शास्त्रों में प्रतिपादित है । दीक्षा भी निराधार और साधार भेद से दो प्रकार की होती है ॥ ३-४ ॥ निराधार दीक्षा दो प्रकार ( विज्ञानाकल तथा प्रलयाकल ) जीवों के लिए, साधार सकल के लिए उपयुक्त मानी गयी हैं । केवल शम्भु की पूजा से जो आधार निरपेक्ष और तीव्र शक्ति के निपात से सम्पन्न की जाती है उस दीक्षा को निराधार कहते हैं ॥५-५ ॥ आचार्य की मूर्ति प्रतिष्ठा करके मन्द, तीव्र आदि शक्तिपात के भेद से जिस दीक्षा को शम्भु कहते हैं, उसको साधारा कहते हैं । यह चार प्रकार की है - सबीजा, निर्बीजा, साधिकारा और निरधिकारा । इसकी जो परिभाषा है, उसे कह रहा हूँ । मनुष्यों को समयानुकूल आचार से संसक्त दी जानेवाली दीक्षा सबीजा कही जाती है ॥६-८ ॥ असमर्थों के समाचार से वर्जित दी जानेवाली दीक्षा निर्बीजा है । नित्य, नैमित्तिक और काम्यकार्यों में जिसके द्वारा साधक और आचार्य को अधिकार प्राप्त होता है, उसे साधिकारा कहते हैं । निर्वाण - दीक्षा तो समयी और पुत्रक नामक शिष्यों के लिए हुआ करती है ।९ -१० ॥ निरधिकारा दीक्षा से नित्य कर्मों अथवा ऐसे कर्मों के करने की योग्यता प्राप्त होती है, जिनको करने से मनुष्य को कुछ लाभ तो नहीं होता, किन्तु जिन्हें न करने से उसके गुणों का ह्रास हो जाता है । यह द्विविध दीक्षा दो रूपों में सम्पन्न की जाती है ॥११ ॥ एक क्रियावती, जो कुण्ड और मण्डल आदि
से सम्पन्न की जाती है और दूसरी, केवल मानसिक भावना से सम्पन्न की जानेवाली ज्ञानवती मानी जाती है ॥१२ ॥
हे स्कन्द! इस प्रकार आचार्य के द्वारा दीक्षा दी जानी चाहिए । गुरु नित्य - क्रिया करने के पश्चात् ही दीक्षा दे || १३ || पहले अपने कमलवत् हाथों में अर्घ्य - जल से ॐ कार के उच्चारणपूर्वक द्वाराधिप की पूजा करे । विघ्नों का अपसारण करके देहली पर अस्त्र का न्यास करके अपने आसन पर बैठ जाय ॥१४ ॥ नियम के अनुसार मन्त्रयोग
१ ख. ' ण युक्तोऽ । २ घ. स्तवैस्तु । ३ ख. युतः । ४ क. घ. ' बींजत्वे स ' । ५ क. ङ. च. यत्र । ६ क. ङ. च. गी चरे । नि । ७ ख. तु यथा सदपि पु । घ. तु यदा स मम पु ' । ८ च. ' मात्माविकारित्वा ' । ९ क. ङ. ' त्राविकारित्वा ' । १० क. ङ. च. ' रूपाऽपि प्र dy कृतत्तित्यक्रियोनृपः । प्र ०१०२ क. ङ. च. ' रा ( र ) विपर्ययः । वि ' ।
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एकाशीतितमोऽध्यायः कुर्वीत भूतसंशुद्धिं मन्त्रयोगं यथोदितम् । सयवक्षीरनीरं च विशेषार्घ्यमिदं ततः । पूजनं मन्त्रशुद्धिं च पञ्चगव्यं च पूर्ववत् । विकिराञ्शुद्धलाजां ' स्तान्सधूपानस्त्रमन्त्रितान् । नानाप्रहरणाकारान्विघ्नौघविनिवारकान् । सप्तजप्तं शिवास्त्रेण वेणीं बोधासिमुत्तमम् । निष्कलं च शिवं न्यस्य शिवोऽहमिति भावयेत् । गन्धमण्डनकं स्वीये विदध्याद्दक्षिणे करे । विन्यस्य शिवमन्त्रेण भास्वरं निजमस्तके ।
मण्डले कर्मणां साक्षी कलशे यज्ञरक्षकः ।
स्वात्मन्यन्यगृहीतेति षडाधारो य ईश्वरः ॥
ज्ञानखड्गकरः स्थित्वा नैर्ऋत्या ( त्य ) भिमुखो नरः । ३०३ तिलतण्डुलसिद्धार्थकुशदूर्वाक्षतोदकम् ॥१५ ॥
तदम्बुना द्रव्यशुद्धिं तिलकं स्वासनात्मनोः ॥१६ ॥
लाजचन्दनसिद्धार्थभस्मदूर्वाक्षतं कुशान् ॥१७ ॥
शस्त्राम्बुप्रोक्षितानेतान्कवचेनावगुण्ठितान् ॥१८ ॥
दर्भाणां तालमानेन कृत्वा षट्त्रिंशतादलैः ॥ १ ९ ॥ शिवमात्मनि विन्यस्य सृष्ट्याधारमभीप्सितम् ॥२० ॥
उष्णीषं शिरसि न्यस्य अलं कुर्यात्स्वदेहकम् ॥२१ ॥
विधिनाऽत्रार्चयेदीशमित्थं स्याच्छिवहस्तकम् ' ॥२२ ॥
शिवादभिन्नमात्मानं कर्तारं भावयेद्यथा ॥२३ ॥
होमाधिकरणं " वह्नौ शिष्ये पाशविमोचकः ॥ २४ ॥
सोऽहमेवेति कुर्वीत भावं? स्थिरतरं पुनः ॥ २५ ॥
सार्घ्याम्बुपञ्चगव्याभ्यां प्रोक्षयेद्यागमण्डपम् ॥२६ ॥
से भूत - शुद्धि करे । तिल, अक्षत, सरसों, कुश, दूब, जल, यव और दूध मिला हुआ जल विशेषार्घ्य कहा जाता है ॥१५-१५ ३ ॥ विशेषार्ध्य के अनन्तर उपर्युक्त मिश्रित जल से द्रव्यशुद्धि, अपनी और आसन की शुद्धि और तिलक करे । फिर पूर्ववत् पूजन, मन्त्रशोधन तथा पञ्चगव्य - प्राशन आदि कार्य करने चाहिए । क्रमशः लावा, चन्दन, सरसों, भस्म, दूर्वा, अक्षत, कुश और अन्त में पुनः शुद्ध लावा - ये सब ' विकिर ' ( बिखरने योग्य द्रव्य ) कहे गये हैं । इन सब वस्तुओं को एकत्र करके सात बार अस्त्र - मन्त्र से अभिमन्त्रित करे । अस्त्र - मन्त्र से अभिमन्त्रित जल से इनका प्रोक्षण करके फिर कवच - मन्त्र ( हुम् ) से अवगुण्ठन करे ॥ १६-१८ ॥ विघ्नों को दूर करने के लिए कुशों के छत्तीस दलों से एक बालिश्त अनेक शस्त्रों के आकार की वस्तु बनाये । शिवास्त्र का सात बार जप करके उत्तम वेणी और ज्ञान खड्ग बनाये । अपने शरीर पर अभीप्सित सृष्ट्याधार शिव का न्यास करके, निष्कल शिव का न्यास करे तथा अपने में ' मैं शिव हूँ ' ऐसी भावना करे । सिर पर पगड़ी बाँधकर अपने को आभूषण और उत्तम वस्त्रों से अलंकृत करे ॥१९ -२१ ॥ अपने दाहिने हाथ में सुगन्धित लेप आदि लगाकर विधिपूर्वक दाहिने हाथ पर शिव की पूजा करे । ऐसा करने से वह दाहिना हाथ शिवहस्तक ( शुभहस्त ) हो जाता है ॥२२ ॥ आचार्य शिवमन्त्र से अपने मस्तक पर भास्वर ( तेज ) का न्यास करके अपने में
शिव से अभिन्नकर्त्ता की भावना करे ॥२३ ॥ मण्डल में अपने - आप में उस ईश्वर की भावना करे जो कर्म के साक्षी,
कलश पर यज्ञरक्षक, अग्नि में हवन का आधार, शिष्य में पाशविमोचक और अपनी आत्मा में अनुगृहीत होने से षडाधार है ॥२४-२५ ॥ ज्ञानखड्ग को हाथ में लेकर नैर्ऋत्याभिमुख होकर बैठ जाना चाहिए । अर्घ्यजल और पञ्चगव्य से ज्ञानमण्डप का प्रोक्षण ( सिञ्चन ) करे, चतुष्पथान्त संस्कार और ईक्षण आदि से अग्नि का संस्कार करे ॥ २६-२६३ ॥ उस यागमण्डप १ क. ङ. च. ' न्त्रसंशुद्धिं प । २ क. ङ. च. ' लाजास्थान्स ' । ३ ख. ' नू भस्त्रा । ४ ख. ' मात्रेण कृ । ५ क. ख. ङ. च. कृतां । ६ क. ख. ङ. च. ण्डलकं । ७ ख. घ. ' वमस्त ' । ८ ख. ' स्तके । वि ' । ९ क. ङ. च. ' भास्करं । १० ख. ' मादिक ' । ११ क. च. ' वं च सुस्थिरं पु ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ३०४ चतुष्पथान्तरसंस्कारैः संस्कुर्यादीक्षणादिभिः । तानीशदिशि वर्धन्यामासनायोपकल्पयेत् । आज्ये ' रत्नैः ' पूरयन्तीं हृदा मण्डपरूपिणीम् । ऐशे कुम्भे यजेच्छम्भुं शक्ति कुम्भस्य दक्षिणे । दिक्षु शक्रादिदिक्पालान्विष्ण्वन्तान्प्रणवासनान् ' । प्रथमं तान्समादाय कुम्भस्याग्राभिगामिनीम् । शिवाज्ञां लोकपालानां श्रावयेन्मूलमुच्चरन् । ततः स्थिरासने कुम्भे साङ्गं सम्पूज्य शङ्करम् । ॐ हः, ५ अस्त्रासनाय हूं फट् । ॐ हूं फट्, पाशुपतास्त्राय नमः । ॐ श्रीं शिरसे हूं फट्, नमः ॐ गूं ° कवचाय हूं फट् नमः चतुर्वक्त्रं सदंष्ट्रं च स्मरेदस्त्रं सशक्तिकम् विक्षिप्य विकिरांस्तत्र कुशकूर्योपसंहरेत् ॥२७ ॥ २७ ॥ ॥
नैर्ऋते वास्तुगीर्वाणान्द्वारे लक्ष्मीं प्रपूजयेत् ॥ २८ ॥
साम्बुवस्त्रे सरत्ने च धान्यस्थे पश्चिमानने ॥२९ ॥
पश्चिमस्यां ( मायां ) तु सिंहस्थां वर्धनीं खड्गरूपिणीम् ॥३० ॥
वाहनायुधसंयुक्तान्हृदाऽभ्यर्च्य स्वनामभिः ॥ ३१ ॥
अविच्छिन्नपयोधारां भ्रामयित्वा प्रदक्षिणम् ॥ ३२ ॥
संरक्षत यथायोगं कुम्भं धृत्वाऽथ तां धरेत् ॥ ३३ ॥
विन्यस्य शोध्यमध्वानं वर्धन्यामस्त्रमर्चयेत् ॥३४ ॥
ॐ ओमस्त्रमूर्तये नमः । ॐ ॐ हृदयाय हूं फट्, नमः ।
। ॐ यं शिखायै हूं फट्, नमः ।
। ॐ ११ फट्, अस्त्राय हुं फट् नमः ॥ ३५ ॥
। समुद्गुरत्रिशूलासिं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥३६ ॥
में अक्षतों को बिखेरकर कुश की बनी कूँची से उसको बटोर ले । उनको ईशानकोण में वर्धनी पर आसन के लिए रख दे । नैर्ऋतकोण में वास्तु और देवताओं की और लक्ष्मी की विधिवत् पूजा करे ॥ २७-२८ ॥ घृत - पात्र में उनकी स्थापना करके हृद् - मन्त्र से मण्डपरूपिणी रत्नों से परिपूर्ण करनेवाली पश्चिमाभिमुख वस्त्र से आवेष्टित, पञ्चरत्नयुक्त तथा . जल से परिपूर्ण लक्ष्मी की पूजा करे ॥ २ ९ ॥ ईशानकोण में जल, वस्त्र, रत्नयुक्त कलश को धान्यराशि पर रखकर पश्चिम की ओर उसे उन्मुख करे, उस पर शम्भु की पूजा करे । कलश के दक्षिण में पश्चिमाभिमुख, सिंहारूढ़, वर्धनी और खड्गरूपिणी - शक्ति की पूजा करे || ३० || सब दिशाओं में इन्द्र से लेकर विष्णु - पर्यन्त उन देवों का हृद् - मन्त्र से तत्तद् देवताओं के नामों का निर्देश करते हुए पूजन करे, जो प्रणवासन पर स्थित हों और अपने वाहन तथा अस्त्र से युक्त हों । प्रथम उन देवताओं को लेकर कलश के आगे की ओर से अविच्छिन्न जलधारा चारों ओर घुमाये और प्रदक्षिणा करे ॥३१-३२ ॥ मूल मन्त्र का उच्चारण करता हुआ लोकपालों को शिव का आदेश सुनाये कि “ आप लोग यथोचित रूप से यज्ञ - कुम्भ की रक्षा करें, इसके अनन्तर शक्ति देवी को धारण करें और कलश को स्थिर करके उसके ऊपर शङ्कर की साङ्गोपाङ्ग पूजा करें " ॥३३-३३३ ॥ वर्धनी पर शोध्य अध्वा का न्यास करके अस्त्र की पूजा करे । न्यास और अस्त्र - पूजन के मन्त्र ये हैं - ‘ ॐ हः अस्त्रासनाय हूं फट् ', ' ॐ अस्त्रमूर्तये नमः ', ' ॐ हूं फट्, पाशुपतास्त्राय नमः ', ‘ ॐ हृदयाय हूं फट् नमः, ’ ‘ ॐ श्रीं शिरसे हूं फट् नमः ', ' ॐ यं शिखायै हूँ फट् नमः ', ' ॐ गूं कवचाय हूं फट् नमः, ‘ ॐ फट् अस्त्राय हूं फट् नमः ॥३४-३५ ॥ पूजा के समय चतुर्मुख, बड़े - बड़े दाँतोंवाले, शक्तियुक्त, मद्गर, त्रिशूल और शङ्ख को धारण करनेवाले तथा कोटिसूर्य के समान प्रभावशाली अस्त्रदेवता का स्मरण करे || ३६ || लिङ्गमुद्रा के १ ख. आद्ये । २ क. ङ. बलिः । ३ क. ङ. च. ' न्विष्कम्भान्प्र ' । ४ च. ग्रानुवर्तिनी । ५ क. ङ. च. ॐ अहः । ६ क. ङ. च ' य. फ ' । ७ क. ङ. च. ॐ अं ॐ - अस्त्र ' । ८ क. ङ. च. ॐ यं रूं हूं । ९ क. च. ग्लां । १० क. च. श्रृं । ११ क. च. ॐ हूं फ " । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकाशीतितमोऽध्यायः भगलिङ्गसमायोगं विदध्याल्लिङ्गमुद्रया । भुक्तये मुक्तये त्वादौ मुष्टिना वर्धनीं स्पृशेत् । शस्त्रं च मूलमन्त्रस्य शतकुम्भे निवेशयेत् । यथेदं कृत ( त ) (? ) यत्नेन भगवन्मखमन्दिरम् । प्रणवस्थं चतुर्बाहुं वायव्ये गणमर्चयेत् । निविष्टो मन्त्रतुष्ट्यर्थं अर्घ्यगन्धघृतादिकम् । कुण्डवह्निस्स्रुगाज्यादि प्राग्वत्संस्कृत्य भावयेत् । स्वमूर्ती शिवकुम्भे सृष्टिन्यासेन विन्यस्य कुण्डमानं मुखं ध्यात्वा हृदाहुतिभिरीप्सितम् । विरेफावन्तिमौ वर्णो रेफषष्ठखरान्वितौ । हिरण्या, कनका -रक्ता कृष्णा तदनुसुप्रभा । ३०५ अंगुष्ठेन स्पृशेत्कुम्भं हृदा मुष्ट्याऽस्त्रवर्धनीम् ॥ ३७ ॥
कुम्भस्य मुखरक्षार्थं ज्ञानखड्गं समर्पयेत् ॥ ३८ ॥
तद्दशांशेन वर्धन्यां रक्षां विज्ञापयेत्ततः ॥ ३ ९ ॥ रक्षणीयं जगन्नाथ सर्वाध्वरधर त्वया ॥ ४० ॥
स्थण्डिले शिवमभ्यर्च्य सार्घ्यः कुण्डं व्रजेन्नरः ॥४१ ॥
वामे सव्ये तु विन्यस्य समिद्दर्भतिलादिकम् ॥४२ ॥
मुख्यतामूर्ध्ववक्त्रस्य हृदि वह्नौ शिवं यजेत् ॥ ४३ ॥
च स्थण्डिले त्वग्निशिष्ययोः ।
( स्याऽऽ ) शोध्याध्वानं यथाविधिः ॥ ४४ ॥
बीजानि सप्तजिह्वानामग्नेर्होमाय भण्यते ॥ ४५ ॥
इन्दुविन्दुशिखायुक्तौ ' जिह्वाबीजाद्यनुक्रमात् ॥४६ ॥
अतिरिक्ता बहुरूपा रुद्रेन्द्राग्न्याप्यदिङ्मुखाः (? ) ॥४७ ॥
द्वारा भग और लिङ्ग का संयोग करे । अँगूठे से कुम्भ का स्पर्श करे । हृद् मन्त्र का उच्चारण करके मुट्ठी से अस्त्र और वर्धनी का स्पर्श करना चाहिए || ३७ || सर्वप्रथम भुक्ति और मुक्ति दोनों के लिए मुट्ठी से वर्धनी का स्पर्श करना चाहिए । कुम्भ- मुख की रक्षा के लिए ज्ञान- खङ्ग को समर्पित करे । मूलमन्त्र का उच्चारण करके शस्त्र को शत- कुम्भ में प्रविष्ट कर दे । उसके दसवें भाग वर्धनी पर रक्षा के लिए निवेदन करे ॥३८-३९ ॥ इतनी क्रिया समाप्त हो जाने पर हे भगवन्! हे जगन्नाथ! जिस प्रकार यत्न से इस यज्ञ मण्डप का निर्माण हुआ है, अखिल यज्ञों के एकमात्र धारक! आप इसकी रक्षा करें । इस प्रार्थना - मन्त्र से यज्ञमण्डप की रक्षा के लिए यज्ञपति विष्णु की प्रार्थना करे । वायव्यकोण में प्रणव पर स्थित चतुर्बाहु गण की अर्चना करे । यजमान को वेदी पर शिव की पूजा करके अर्घ्य के सहित कुण्ड के निकट जाना चाहिए । वहाँ आसन पर बैठकर मन्त्रतुष्टि के लिए अर्घ्य, गन्ध, घृत आदि बायें भाग में तथा समिधा, कुश एवं तिल आदि दाहिने भाग में रखे ॥४०-४२ ॥ कुण्ड, वह्नि, स्रुक् और घृत आदि का संस्कार करके हृदय में ऊर्ध्वमुख ( अग्नि ) की प्रधानता की भावना करे । अग्नि में शिव की पूजा करे । स्वमूर्ति, शिवकुम्भ और वेदी पर अग्नि और शिष्य का सृष्टिन्यास कर, यथाविधि शोध्य अध्वा का न्यास करे ॥४३-४४ ॥ कुण्ड के परिमाण में मुख का ध्यान कर हृद्मन्त्र से आहुतियों को प्राप्तकर अभीष्ट - सिद्धि प्राप्त होती है । अग्नि की सप्तजिह्वाओं के बीज अग्नि में होम के लिए कहे जाते हैं ॥४५ ॥ वर्णमाला के रेफ को छोड़कर सात वर्ण यदि रकार और छठें स्वर ( ऊ ) पर आरूढ़ हों, विन्दु और
इन्द्रशिखा से युक्त हों तो ये ही सात वह्निजिह्वा के बीज हैं- ( रूँ, रूँ, रूँ, श्रू, स्रूँ, श्रूरूँ, रूँ ) आदि । अग्नि की सात जिह्वाओं के नाम हैं - हिरण्या, कनका, रक्ता, कृष्णा, सुप्रभा, अतिरिक्ता और बहुरूपा । ये सभी अग्निदेह के विभिन्न कोणों को व्याप्त किये रहती हैं ॥४६-४७ ॥ शान्ति और पौष्टिक कर्मों में दुग्ध आदि मधुर पदार्थों का हवन करना चाहिए । १ ख. ' दा पुष्ट्याऽ ° । २ घ. ' त्रतृप्त्यर्थ ' । ३ ख. ' मौ रे । ४ ख. ' ष्ठसुरक्षितौ । ५ ख. ' शिवायु ' । ६ ज ' जानुपंक्र ' । २० CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३०६ अग्निपुराणम् क्षीरादिमधुरैर्होमं कुर्याच्छान्तिकपौष्टिके । लवणैराजिकातक्रकटुतैलैश्च कण्टकैः । कदम्बकलिकाहोमाद्यक्षिणी सिद्ध्यति ध्रुवम् । बिल्वं राज्याय लक्ष्म्यर्थं पाटलांश्चम्पकानपि । दूर्वा व्याधिविनाशाय सर्वसत्त्ववशीकृते । मृत्युञ्जयो मृत्युजित्स्याद् ' वृद्धिः स्यात्तिलहोमतः । आहुत्यष्टशतैर्मूलमङ्गानि तु दशांशतः तथा शिष्यप्रवेशाय प्रतिशिष्यं शतं जपेत् । शतद्वयं च होतव्यं मूलमन्त्रेण पूर्ववत् । शिखासंपुटितैर्बीजैर्हृफण्डन्तैश्च ' दीपनम् अभिचारे तु पिण्याकसक्तुकञ्चुककाञ्जिकैः ॥४८ ॥
समिद्भिरपि वक्त्राभिः क्रुद्धो भाष्याणना यजेत् ॥ ४ ९ ॥ बन्धूककिंशुकादीनि वश्याकर्षाय होमयेत् ॥ ५० ॥
पद्मानि चक्रवर्तित्वे भक्ष्यभोज्यानि संपदे ॥ ५१ ॥
प्रियंगुपाटलीपुष्पं चूतपत्रं ज्वरान्तकम् ॥५२ ॥
रुद्रशान्तिः सर्वशान्त्या अथ प्रस्तुतमुच्यते ॥५३ ॥
। संतर्पयेत् ' मूलेन दद्यात्पूर्णा यथा पुरा ॥५४ ॥
दुर्निमित्तापसाराय सुनिमित्तकृते तथा ॥ ५५ ॥
मूलाद्यष्टास्त्रमन्त्राणां स्वाहान्तैस्तर्पणं सकृत् ॥ ५६ ॥
। ॐ ह्रौं शिवाय स्वाहा इत्यादिमन्त्रैश्च तर्पणम् ॥ ५७ ॥
ॐ हरूं ह्रौं ह्रीं शिवाय हरु फडित्यादि ( च ) दीपनम् ।
ततः शिवाम्भसा स्थालीं क्षालितां वर्मगुण्ठिताम् ॥५८ ॥
चन्दनादिसमालब्धां बध्नीयात्कटकं गले ॥ वर्मास्त्रजप्तसद्दर्भपत्राभ्यां चरुसिद्धये ॥ ५ ९ ॥ अभिचार में पिण्याक ( तिल की खली ), सत्तू, सर्प की केंचुल, सिरका, लवण, राई, तक्र, कडुआ तेल, कँटीली समिधाओं की आहुतियाँ मुखमुद्रा के द्वारा क्रोध की अभिव्यक्ति करते हुए, भाष्यमन्त्र का उच्चारण करके देनी चाहिए ॥४८-४९ ॥ कदम्ब की कली का हवन करने से निश्चित रूप से यक्षिणी सिद्ध होती है । गुलदुपहरिया तथा पलाश के फूलों के हवन करने से वशीकरण तथा आकर्षण होता है ॥५० ॥ राज्यप्राप्ति के लिए बेल का, धनप्राप्ति
के लिए पाटल और चम्पक का, चक्रवर्ती बनने की इच्छा से कमल का तथा विभव - प्राप्ति के लिए भक्ष्य और भोज्य पदार्थ का हवन करना चाहिए ॥ ५१ ॥ रोगनाश के लिए दूब की, सब जीवों को वश में करने के लिए प्रियङ्गु
और पाटलीपुष्प की आहुति श्रेष्ठ है । आम की पत्तियों के हवन से ज्वर नष्ट होता है, तिल के होम से मृत्यु पर विजय - प्राप्ति होती है और होता की वैभव वृद्धि होती है । सब प्रकार की शान्ति के लिए रुद्र - शान्ति का विधान है । अब प्रस्तुत प्रसंग पुनः प्रारम्भ किया जा रहा है ॥५२-५३ ॥ मूलमन्त्र से एक सौ आठ आहुतियाँ देकर अङ्गों के दशांश तर्पण करे, पुनः मूलमन्त्र से पूर्णाहुति दे ॥५४ ॥ पहले की ( दीक्षाविधि की ) भाँति शिष्यों के प्रवेश के
लिए प्रत्येक शिष्य के अनुसार सौ - सौ बार मन्त्रों का जप करे । अमङ्गल को हटाने तथा शुभ वातावरण उत्पन्न करने के लिए मूल मन्त्र से दो सौ बार आहुतियाँ देनी चाहिए । स्वाहान्त मूल आदि आठ अस्त्र मन्त्रों से एक बार तर्पण करे ॥५५-५६ ॥ शिखा से सम्पुटित ' हुं फट् ' इत्यादि मन्त्रों से दीपन करे । ' ॐ हौं शिवाय स्वाहा ' ’ – आदि मन्त्रों से तर्पण और ‘ ॐ ह्रूं ह्रौं ह्रीं शिवाय हूं फट् - इत्यादि से दीपन करना चाहिए । तदनन्तर पवित्र जल से स्थाली का प्रक्षालन करके कवच से उसे अवगुण्ठित कर दे ॥५७-५८ ॥ चन्दन आदि का लेप लगाकर उसके गले में ट नामक आभूषण - विशेष बाँध दे । चरु को वर्म और अस्त्र से अभिमन्त्रित करके अच्छे कुश और पत्र से ढक दे ॥ ५ ९ ॥ १ ख. ' त्स्याद्विष्टिः स्या ” । २ ख. ' तर्प्य प्लुत ' । ३ ख. ' प्रदेशा ' । ४ ख. जैरूफ ' । ५ ख. ' प्तसंदर्भ प ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA