अग्नि पुराण — पृष्ठ 291–300
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 291–300
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सप्तसप्ततितमोऽध्यायः २८७ गोभूहिरण्यवस्त्रादिमणिहेमादिभूषणम् । विहाय शेषनिर्माल्यं चण्डेशाय निवेदयेत् ॥१० ॥
लेह्यचोष्याद्यन्नवरं ताम्बूलं स्त्रग्विलेपनम् 1 । निर्माल्यं भोजनं तुभ्यं प्रदत्तं तु शिवाज्ञया ॥ ११ ॥
सर्वमेतत्क्रियाकाण्डं मया चण्ड तवाज्ञया । न्यूनाधिकं कृतं मोहात्परिपूर्णं सदाऽस्तु
इति विज्ञाप्य देवेशं दत्त्वाऽर्घ्यं तस्य संस्मरन् । संहारमूर्तिमन्त्रेण मे ॥१२ ॥
शनैः संहारमुद्रया ॥१३ ॥
पूरकान्वितमूलेन मन्त्रानात्मनि योजयेत् ॥ निर्माल्यापनयस्थानं लिम्पेद्गोमयवारिणा ॥१४ ॥
प्रोक्ष्यार्घ्यादि ' विसृज्याथ आचान्तोऽन्यत्समाचरेत् ॥१५ ॥
इत्याग्नेये महापुराणे चण्डपूजाकथनं नाम षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
अथ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः कपिलापूजनम् ईश्वर उवाच कपिलापूजनं वक्ष्ये एभिर्मन्त्रैर्यजेच्च गाम् । ॐ कपिले नन्दे नमः ' कपिले भद्रिके नमः ॥१ ॥
कपिले सुशीले नमः कपिले सुरभिप्रभे । ॐ कपिले सुमनसे भुक्तिमुक्तिप्रदे नमः ॥ २ ॥
वस्त्र, मणि और स्वर्ण के आभूषण को छोड़कर शेष निर्माल्य चण्डेश को अर्पित कर दे । अर्पण मन्त्र यह है- मैं चाटने-चूसने और अन्य प्रकार के भोजन पदार्थों को ताम्बूल, माला, लेप, निर्माल्य और भोजन को शिव की आज्ञा से आपको प्रदान कर रहा हूँ । हे चण्ड, जो कुछ यह कर्मकाण्ड आपसे आज्ञा लेकर मैंने किया है, इसमें अज्ञानवश जो कुछ न्यूनता या अधिकता हुई वह सब - कुछ परिपूर्ण हो जाय ' ॥ १०-१२ ॥ इस प्रकार देवेश चण्ड से निवेदन करके अर्घ्य प्रदान करे । देवता का स्मरण करता हुआ संहारमूर्ति मन्त्र से धीरे - धीरे संहारमुद्रा के द्वारा पूरक प्राणायाम से युक्त मूल मन्त्र से मन्त्रों को आत्मा में युक्त करे । निर्माल्य जहाँ चढ़ाया गया हो वहाँ से उसको हटाकर गोबर से लीप दे । उसके ऊपर शुद्ध जल छिड़ककर अर्घ्य आदि दे और आचमन के अनन्तर अन्य कार्यों को करे ॥१३-१५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में चण्डपूजा वर्णन नामक छिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥७६ ॥
अध्याय ७७ कपिला - पूजन शिव बोले - अब मैं कपिला - पूजन का वर्णन कर रहा हूँ । इन मन्त्रों से गाय की पूजा करे - ' ॐ कपिले नन्दे नमः ', ' कपिले भद्रिके नमः ', ' कपिले सुशीले नम: ', ' कपिले सुरभिप्रभे ', ' ॐ कपिले भुक्तिमुक्तिप्रदे नमः ॥१-२ ॥ १ क. ङ. तासां । च तोयं । २ ख. ' र्ध्याथ विमृज्या ' । ३ ख. ग. घ. ' नम ॐ क ' । ४ ख. घ. ' मः ॐ क । ५ घ. ' से नम ॐ भु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् २८८
जगन्मातर्देवानाममृतप्रदे । गृहाण वरदे ग्रासमीप्सितार्थं च देहि मे ॥ ३ ॥
सौरभेय वन्दिताऽसि वशिष्ठेन विश्वामित्रेण धीमता । कपिले हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम् ॥४ ॥
गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च । गावो मे हृदये चापि गवां मध्ये वसाम्यहं ॥५ ॥
दत्तं गृहाण मे ग्रासं जप्त्वाऽस्यां निर्मलः शिवः । प्रार्च्य विद्यापुस्तकानि गुरुपादौ नमेन्नरः ॥ ॥६ ६ ॥ ॥ यजेत्स्नात्वा तु मध्याह्ने अष्टपुष्पिकया शिवम् । पीठमूर्तिशिवाङ्गानां पूजा पूजा स्यादष्टपुष्पिका ॥७ ॥
मध्याह्ने भोजनागारे सुलिप्ते पाकमानयेत् । ततो मृत्युञ्जयेनैव वौषडन्तेन सप्तधा ॥८ ॥
जप्तैः सदर्भशङ्खस्यैः सिञ्चेत्तं वारिविन्दुभिः । सर्वपाकाग्रमुद्धृत्य शिवाय विनिवेदयेत् ॥९ ॥
अथार्ध चुल्लिकाहोमे विधानायोपकल्पयेत् । विशोध्य विधिना चुल्लीं तद्वह्निं पूरकाहुतिम् ॥१० ॥
हुत्वा नाभ्यग्निना चैकं ततो रेचकवायुना । वह्निबीजं समादाय कादिस्थानगतिक्रमात् ॥११ ॥
शिवाग्निस्त्वमिति ध्यात्वा चुल्लिकाग्नौ निवेशयेत् । ॐ हामग्नये ( च ) नमो वै हां सोमाय वै नमः ॥१२ ॥
सूर्याय बृहस्पतये प्रजानां पतये नमः । सर्वेभ्यश्चैव देवेभ्यः सर्वविश्वेभ्य ' एव च ॥ १३ ॥
हामऽग्नये स्विष्टकृते पूर्वादावर्चयेदिमान् । स्वाहान्तमाहुतिं दत्त्वा क्षमयित्वा विसर्जयेत् ॥१४ ॥
चुल्ल्या दक्षिणवह्नौ च यजेद्धर्माय वै नमः । वामबाहावधर्माय काञ्जिकादिकभाण्डके ॥१५ ॥
अयि सौरभेयि, जगन्मातः! देवों को अमृत देनेवाली, वरदे, इस ग्रास को ग्रहण करो और मेरे अभीष्ट को दो ॥३ ॥
बुद्धिमान् विश्वामित्र और वशिष्ठ ने तुम्हारी वन्दना की है । कपिले! मेरे पापों और किये हुए दुष्कर्मों को नष्ट करो || ४ || गायें सदा मेरे आगे और पीछे रहें, मेरे हृदय में रहें और मैं सर्वदा गौओं के मध्य में ही रहूँ || ५ || मेरे द्वारा दिये हुए इस ग्रास को ग्रहण करो । गो - मन्त्र का जप करके निर्मल शिव हो जाऊँ । तदनन्तर विद्यापुस्तकों की पूजा करके गुरुचरणों की वन्दना करे || ६ || दोपहर को स्नान करके अष्टपुष्पिका से शिव की पूजा करे । पीठमूर्ति और शिवाङ्ग को अष्टपुष्पिका कहते हैं || ७ || मध्याह्न में भलीभाँति लिपे - पुते भोजनागार में पकायी हुई भोजन - सामग्री लाये । तदनन्तर वौषडन्त मृत्युञ्जय मन्त्र का सात बार जप करके शङ्ख में कुश और जल रखकर उन पाकों के ऊपर जल छिड़क दे । सब सामग्रियों में से थोड़ा - थोड़ा निकालकर शिव को अर्पित करे । आधा भाग चुल्हिका - विधान के लिए अलग कर ले । पहले विधिपूर्वक चूल्हे को शुद्ध कर ले । उसमें अग्नि को प्रज्वलित करके पूर्णाहुति दे ॥८-१० ॥ नाभ्यग्नि से पुनः रेचकवायु से वह्निबीज को लेकर गतिक्रम से शिवाग्नि के रूप में उसका ध्यान करते हुए उसे चुल्हिका की अग्नि में स्थापित कर दे ॥११-११३ ॥ ॐ हामनग्नये नमो, हां सोमाय नमः, सूर्याय बृहस्पतये, प्रजानां पतये नमः, सर्वेभ्यश्च देवेभ्यः, सर्वविश्वेभ्यो नमः, हामग्नये स्विष्टकृते नमः - इन मन्त्रों से पूर्व आदि दिशाओं में इन देवों की पूजा करके ‘ अग्नये स्वाहा ' ' सोमाय स्वाहा ' - आदि मन्त्रों से हवन करे । तत्पश्चात् क्षमा- -प्रार्थना करके देवताओं का विसर्जन करना चाहिए ॥१२-१४ ॥ चूल्ही के दक्षिण और ' धर्माय वै नमः ' मन्त्र से धर्म की पूजा करे । बाय और सिरका आदि के पात्र पर अर्घ्य की, जलाशय में ' रसपरिवर्तमानाय वरुणाय नमः ' इस मन्त्र से वरुण को गृहद्वार १ क. ङ. च. जह्नुना । २ क. घ. ङ. च. गृहणन्तु । ३ क. ङ. च. ' वेदये । ४ क. ङ. च. सर्वशश्चै । ५ क. ङ. त्र. ' श्वेश ग ' । ६ क. ङ. च. ते ' सर्वदादयर्च्य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तसप्ततितमोऽध्यायः रसपरिवर्तमानाय वरुणाय जलाश्रये । ॐ रौद्रिके गिरिके च नमश्चोलूखले यजेत् । सम्मार्जन्यां देवतोक्ते कामाय शयनीयके । भुञ्जीत पात्रे सौवर्णे पद्मिन्यादिदलादिके । ' वटाश्वत्थार्कवातारिसर्जभल्लातकांस्त्यजेत् ' । स्वाहान्ते चाऽऽहुतीः पञ्च दत्त्वाऽऽदीप्योदरानलम् । एतेभ्य उपवायुभ्यः स्वाहाऽऽपोशा ( श ) नवारिणा । अमृतोपस्तरणमसि प्राणाहुतीस्ततो ददेत् । उदानाय च व्यानाय भुक्त्वा ' चुल्ल ( ल ) कमाचरेत् । इत्यादि महापुराण आग्नेये २८ ९ ` विघ्नराजे गृहद्वारे प्रेषण्यां सुभगे नमः ॥ १६ ॥
बलिप्रियायाऽऽयुधाय नमस्ते मुसले यजेत् ॥ १७ ॥
मध्यस्तम्बे च स्कन्दाय दत्त्वा वास्तुबलिं ततः ॥ १८ ॥
आचार्यः साधकः पुत्रः समयी मौनमास्थितः ॥१९ ॥
आपोशा ( श ) नं ° पुराऽऽदाय प्राणाद्यैः प्रणवान्वितैः ॥ २० ॥
नागः कूर्मोऽथ कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः ॥ २१ ॥
भक्तादिकं निवेद्याथ पिवेच्छेषोदकं नरः ॥ २२ ॥
प्राणाय स्वाहाऽपानाय समानाय ततस्तथा ॥ २३ ॥
अमृतापिधानमसीति ' शरीरेऽन्नादनाय च ॥२४ ॥
कपिलापूजनादिविधिकथनं नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥७७ ॥
पर विघ्नराज विनायक की और चक्की पर सुभगा की पूजा करनी चाहिए ॥ १५-१६ ॥ ओखली पर ' ॐ रौद्रिके गिरिके नमः ' मन्त्र से रौद्रिका और गिरिका की पूजा करे । मुसल पर ' बलप्रियाय आयुधाय नमः ' मन्त्र से मुसल की, झाडू और पलँग पर कामदेव की पूजा करे, मध्य स्तम्भ पर स्कन्द की पूजा करके वास्तुबलि प्रदान करे ॥१७-१८ ॥ तदनन्तर सोने के पात्र या कमल के पत्ते पर स्वयं भोजन करे । आचार्य, पुत्रक, साधक और समयी - चारों मौन होकर भोजन करें ॥१९ ॥ वट, पीपल, मदार, वातारि, सर्ज और भल्लातक को छोड़ दें । पहले आपोशान जल को लेकर प्रणव से युक्त
प्राण आदि को स्वाहान्त कर अर्थात् ॐ प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, आदि मन्त्रों से पाँच आहुतियाँ देकर उदरानल को प्रज्वलित करे ॥२०- २० ३। नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय - इन पाँच उपवायुदेवों का नाम लेकर ‘ एतेभ्य उपवायुभ्यः स्वाहा ' मन्त्र से आपोशान के जल सहित भात आदि अर्पित कर ' अमृतोपस्तरणमसि ' इत्यादि कहते हुए बचे हुए जल को पी जाय ॥२१-२२ ॥ तदनन्तर प्राणाय ' स्वाहा ', ' अपानाय स्वाहा ', ' समानाय स्वाहा ', ' उदानाय स्वाहा ', ' व्यानाय स्वाहा ' – मन्त्रों से प्राणाहुति प्रदान कर, भोजन करके, कुल्ला करने के बाद ' अमृतापिधानमसि ' इत्यादि मन्त्र का उच्चारण करे । ऐसा शरीर में अन्न को आच्छादित करने या पचाने के लिए किया जाता है ॥२३-२४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में कपिलापूजन - विधि - वर्णन नामक सतहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥७७ ॥
१ घ. ' लाग्नये । २ घ. ' राजो गृः । ३ विघ्नराजे नमः क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । ४ घ. ' के नमो गि । ५ ख. तानि स ' । घ. ताविस । ६ क. ङ. च. ' तु । अपो । ७ ख. ग. ' न ' सुरेशाय । ८ ङ. भुक्त्वाऽऽचनमा । ९ अमृतापिधान " शरीरेऽन्नादाय च । क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । १ ९ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२ ९ ० पवित्रारोहणं वक्ष्ये आषाढादिचतुर्दश्यामथ अग्निपुराणम् अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः पवित्राधिवासनविधिकथनम् ईश्वर उवाच क्रियार्चादिषु ' पूरणम् ॥ नित्यं तन्नित्यमुद्दिष्टं श्रावणभाद्रयोः । सितासितासु कर्तव्यं नैमित्तिकमथापरम् ॥१ ॥
चतुर्दश्यष्टमीषु तत् ॥ २ ॥
कुर्यादा कार्तिकीं यावत्तिथौ प्रतिपदादिके । वह्निब्रह्माम्बिकेभास्यनागस्कन्दा र्कशूलिनाम् ॥३ ॥
दुर्गायमेन्द्रगोविन्दस्मरशंभुसुधाभुजाम् । सौवर्ण राजतं ताम्रं कृतादिषु यथाक्रमम् ॥४ ॥
कलौ कार्पासजं वाऽपि पट्टपद्मादिसूत्रकम् । प्रणवश्चन्द्रमा वह्निर्बह्या नागो गुहो हरिः ॥ ५ ॥
सर्वेशः सर्वदेवाः स्युः क्रमेण नवतन्तुषु । अष्टोत्तरशताद्य ( ध्य ) र्धं तदर्ध ' चोत्तमादिकम् ॥६ ॥
एकाशीत्याऽथवा सूत्रैस्त्रिंशताऽप्यष्टयुक्तया । पञ्चाशता वा कर्तव्यं तुल्यग्रन्थ्यन्तरालकम् ॥७ ॥
द्वादशाङ्गुल मानानि व्यासादष्टाङ्गुलानि च । लिङ्गविस्तारमानानि चतुरङ्गुलिकानि वा || ८ || तथैव पिण्डिकास्पर्शं चतुर्थं सार्वदैवतम् । गङ्गावतारकं कार्यं प्रजातेन सुधौतकम् ॥९ ॥
अध्याय ७८ पवित्राधिवासन - विधि भगवान् महेश्वर बोले - अब मैं देवपूजन आदि कर्मों को पूर्ण करनेवाले पवित्रारोहण विधि का वर्णन कर रहा हूँ । नित्य किये जानेवाले सन्ध्या आदि कर्म के अङ्गभूत कर्म को नित्य कहते हैं । किसी निमित्तवश किये हुए अन्य कर्मों के अंगभूत कर्म को नैमित्तिक कहते हैं । नैमित्तिक कर्म आषाढ़ की चतुर्दशी, श्रावण, भादों के कृष्ण और शुक्लपक्ष की अष्टमी और चतुर्दशी को करना चाहिए ॥१-२ ॥ अथवा कार्तिक तक प्रतिपदा आदि तिथियों को अग्नि, ब्रह्मा, अम्बिका, गणेश, नाग, स्कन्द, सूर्य, शिव, दुर्गा, यम, इन्द्र, गोविन्द, काम, शंभु और अमृतपायी देवों की पूजा करनी चाहिए । कृतादि युगों में क्रमशः स्वर्ण, रजत और ताँबे के सूत्र का पवित्रक होता था, किन्तु कलि में उसे, कपास, पट्टसूत्र या कमलसूत्र का होना चाहिए ॥३-४ ३-४३ ॥ प्रणव, चन्द्रमा, अग्नि, ब्रह्मा, नाग, गुह, हरि, सर्वेश और सब देव क्रमशः नवतन्तुओं में निवास करते हैं । एक सौ आठ, इसके आधे व चौथाई परिमाण का सूत्र क्रमशः उत्तम, मध्यम और अघम का होता है ॥५-६ ॥ इक्यासी या अड़तीस या पचास के परिमाणवाला सूत्र बीच - बीच में बराबर दूरी पर, ‘ गाँठें ' लगाकर बनाया जाता है || ७ || द्वादश अङ्गुल का या व्यास से आठ या चार अङ्गुल का लिङ्ग विस्तार के मान का यह होना चाहिए ॥८ ॥ इसी प्रकार पिण्डिका के परिमाण का चौथा सार्वदैवत पवित्र
' बनता है । यह ' गङ्गावतारक ' नाम से कहा जाता है । इसे ' सद्योजात ' मन्त्र से अच्छी तरह धोना चाहिए । वाम मन्त्र १ क. ङ. च. ' यार्थादि ' । २ ख. नित्ये । ३ ख, ' तात्पूर्व ' त ' । ४ ख. ' र्ध चारुमासिक ' । ५ क. ङ. च. कार्यमजा । ६ घ. सुजातेन । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ग्रन्थि कुर्याच्च वामेन अघोरेणाथ शोधयेत् कस्तूरीरोचनाचन्द्रैर्हरिद्रागैरिकादिभिः अन्तरं वा यथाशोभमेकद्विचतुरङ्गुलम् जयाऽन्या विजया षष्ठी अजिता च सदाशिवा कार्या वा ' चन्द्रवह्न्यर्कपवित्रं शिववद्धृदि स्यादेकैकं तथा द्वारदिक्पालकलशादिषु अष्टाविंशतितो वृद्धं दशभिर्दशभिः क्रमात् ग्रन्थयो मानमप्येषां लिङ्गविस्तारसंमितम् भूषयेत्पुष्पवस्त्राद्यैः सायाह्ने यागमन्दिरम् । परिगृहीते भूभागे पवित्रे सूर्यमर्चयेत् द्वाराण्यस्त्रेण संप्रोक्ष्य पूर्वादिक्रमतोऽर्चयेत् निवृत्तिकलाद्वाराय प्रतिष्ठाख्यकलात्मने २ ९ १ । रञ्जयेत्पुरुषेणैव रक्तचन्दनकुङ्कुभिः ॥१० ॥
। ग्रन्थयो दश कर्तव्या अथ वा तन्तुसंख्यया ॥११ ॥
। प्रकृतिः पौरुषी वीरा चतुर्थी त्वपराजिता ॥१२ ॥
। मनोन्मनी सर्वमुखी ग्रन्थयोऽभ्यधिकाः शुभाः ॥१३ ॥
। एकैकं निजमूर्ती वारे पुस्तके गुरुके ' गणे ॥१४ ॥
। हस्तादिनवहस्तान्तं लिङ्गानां स्यात्पवित्रकम् ॥१५ ॥
1 । द्वयङ्गुलाभ्यन्तरास्तत क्रमादेकाङ्गुलान्तराः ॥१६ ॥
। सप्तम्यां वा त्रयोदश्यां कृतनित्यक्रियः शुचिः ॥१७ ॥
कृत्वा नैमित्तिकीं सन्ध्यां विशेषेण च तर्पणम् ॥१८ ॥
। आचम्य सकलीकृत्य प्रणवार्घ्यकरो गुरुः ॥ १ ९ ॥ । हां शान्तिकलाद्वाराय तथा विद्याकलात्मने ॥ २० ॥
। तच्छाखयोः प्रतिद्वारं द्वौ द्वौ द्वाराधिपौ यजेत् ॥ २१ ॥
से ग्रन्थि लगावे तथा अघोर मन्त्र से शोधन करके पुरुष मन्त्र से रक्त, चन्दन, कस्तूरी, गोरोचन, कर्पूर, हल्दी और गेरू आदि से उनको रंग दे । दस ग्रन्थियों अथवा तन्तुओं की संख्या के बराबर उनमें गाँठें लगावे ॥९ -११ ॥ गाँठों के बीच की दूरी शोभा की दृष्टि से एक, दो या चार अङ्गुल होनी चाहिए । प्रकृति, पौरुषी, वीरा, अपराजिता, जया, विजया, अजिता, सदाशिवा, मनोन्मनी और सर्वमुखी - ये ग्रन्थियाँ अधिष्ठात्री देवियाँ हैं । सूत्र में दस से भी अधिक ग्रन्थियाँ लगायी जा सकती हैं ॥१२-१३ ॥ पवित्रक के चन्द्रमण्डल, अग्निमण्डल, सूर्यमण्डल से युक्त होने की भावना करके उसे साक्षात् शिव के तुल्य मानकर हृदय में धारण करे । शिव स्वरूप से भावित अपने स्वरूप को, पुस्तक को तथा गुरु गण को एक - एक पवित्रक अर्पण करे । इसी प्रकार द्वारपाल, दिक्पाल और कलश आदि पर भी एक - एक पवित्रक चढ़ाया जाता है । एक हाथ से लेकर नौ हाथ तक का पवित्रक शिवलिङ्ग के लिए होता है ॥१४-१५ ॥ एक हाथ के पवित्रक में अट्ठाईस ग्रन्थियाँ होती हैं । इसके बाद प्रत्येक हाथ में दस ग्रन्थियाँ बढ़ती जाती हैं । इस तरह नौ हाथवाले पवित्रक में एक सौ आठ गाँठें होती हैं । ये ग्रन्थियाँ क्रमशः एक - एक, दो - दो अँगुलियों के अन्तर पर होती हैं ॥१६ ॥ ये
ग्रन्थियाँ क्रमशः एक - एक, दो - दो अँगुलियों के अन्तर पर होती हैं । सप्तमी या त्रयोदशी के दिन नित्यक्रिया आदि समाप्त करके पवित्र होकर, सायंकाल पुष्प, वस्त्र आदि से यज्ञ - मन्दिर को सजा दे । उस दिन विशेष रूप से नैमित्तिकी सन्ध्या और विशेष तर्पण करके परिष्कृत और निर्वाचित पवित्र भूभाग पर सूर्य की पूजा करे । गुरु आचमन और सकलीकरण करने के बाद प्रणव के द्वारा अर्घ्य प्रदान करे ॥१७-१९ ॥ सब द्वारों के ऊपर जल छिड़ककर पूर्व की ओर से क्रमशः उनकी पूजा करे । पूजा - मन्त्र है - ' हां शान्तिकलाद्वाराय ', ' विद्याकलात्मने ', ' निवृत्तिकलाद्वाराय ', ‘ प्रतिष्ठाख्यकलात्मने ’ इत्यादि । प्रत्येक द्वार की दोनों शाखाओं पर दो - दो द्वारपतियों की पूजा करनी चाहिए । २०-२१ ॥ १ क. ख. ग. ङ. च. चण्डव । २ क. ङ. च. ' वत्यापि । ए ' । ख. ' क्त्वया । ए । ३ ख. ग. वा सप्तके गुरवे ग । ४ क. ङ. च. गुरवे ग ° । ५ क. ङ. च. शय्यां । ६ क. ख. ग. ङ. च सूत्रिते । ७ क. ख. ग. ङ. च. हा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् २ ९ २ नन्दिने महाकालाय ' भृङ्गिणेऽथ गणाय च । नित्यं च द्वारपालादीन्प्रविश्य ' द्वारि पश्चिमे । प्रोक्षणाद्यं विधायाथ यज्ञसंस्कारकृन्नरः । शिवहस्तं विधायेत्थं स्वशिरस्यधिरोपयेत् । अत्यर्थ भावयेद्देवं ज्ञानखङ्गकरो गुरुः अर्ध्याम्बु पञ्चगव्यं च समन्तान्मखमण्डपे विक्षिप्य विकिरांस्तत्र कुशकूर्योपसंहरेत् नैर्ऋते वास्तुगीर्वाणा ( न् ) द्वारे लक्ष्मीं प्रपूजयेत् प्रणवेन वृषारूढं सिंहस्थां वर्धनीं ततः दिक्षु शक्रादिदिक्पालान्विष्णुब्रह्मशिवादिकान् शिवाज्ञां श्रावयेन्मत्री पूर्वादीशानगोचरम् समन्ताद्भ्रामयेदेनां रक्षार्थं शस्त्ररूपिणीम् समग्रासनके कुम्भे यजेद्देवं स्थिरासने वृषभाय च स्कन्दाय देव्यै चण्डाय च क्रमात् ॥ २२ ॥
इष्ट्वा वास्तुं भूतशुद्धिं विशेषार्घ्यकरः शिवः ॥ २३ ॥
मन्त्रयेद्दर्भदूर्वाद्यै: ' पुष्पाद्यैश्च हृदादिभिः ॥२४ ॥
शिवोऽहमादिः सर्वज्ञो मम यज्ञप्रधानता ॥ २५ ॥
। नैर्ऋतीं दिसमासाद्य प्रक्षिपेदुदगाननः ॥ २६ ॥
। चतुष्पथान्तसंस्कारैर्वीक्षणाद्यैः सुसंस्कृतैः ॥ २७ ॥
। तानीशदिशि वर्धन्यामासनायोकल्पयेत् ॥ २८ ॥
। पश्चिमाभिमुखं कुम्भं सर्वधान्योपरिस्थितम् ॥२९ ॥
। कुम्भे साङ्गं शिवं देवं वर्धन्यामस्त्रमर्चयेत् ॥ ३० ॥
। वर्धनीं सम्यगादाय ' घटपृष्ठानुगामिनीम् ॥ ३१ ॥
। अविच्छिन्नपयोधारां मूलमन्त्रमुदीरयेत् ॥३२ ॥
। पूर्वं कलशमारोप्य शस्त्रार्थं तस्थु वामतः ॥ ३३ ॥
। वर्धन्यां प्रणवस्थायामायुधं यदनु द्वयोः ॥ ३४ ॥
नन्दी, महाकाल, भृङ्गी, गण, वृषभ, स्कन्द, देवी और चण्ड - आठ द्वाराधिपतियों की पूजा नित्य प्रति करे || २२ || घर में घुसकर पश्चिम द्वार पर वास्तु की पूजा करके भूतशुद्धि करे । विशेषार्घ्य प्रदान करने से विशेष कल्याण होता है । जल से सिञ्चन आदि करने के बाद यज्ञ - संस्कार करनेवाला व्यक्ति कुश, दूब, फूल, हृद् आदि से देवों को आमन्त्रित करे ॥२३-२४ ॥ इस प्रकार शिव - हस्त को बनाकर अपने सिर पर रखे । ' मैं आदि सर्वज्ञ शिव हूँ, यज्ञ में मेरी ही प्रधानता है - इस प्रकार ज्ञानरूपी कृपाण को हाथ में लेनेवाला गुरु विशेष रूप से अपने देवता की भावना करे । नैर्ऋतकोण में जाकर गुरु उत्तराभिमुख होकर अर्घ्यजल और पञ्चगव्य को यज्ञ - मण्डप में चारों ओर छिड़के ॥२५-२६३ ॥ चतुष्पथान्त संस्कारों और निरीक्षण आदि से भली - भाँति संस्कार करके विखेरने योग्य वस्तुओं को फेंक दे । एक दर्भपिञ्जल लेकर उसको ईशानकोण में रखी हुई बढ़नी ( झाडू ) के ऊपर आसन के निमित्त फैला दे ॥२७-२८ ॥ नैर्ऋतकोण में वास्तु और सरस्वती की तथा द्वार पर लक्ष्मी की पूजा करे । सर्वधान्य के ऊपर रखे हुए पश्चिमाभिमुख कलश का पूजन करे ॥ २ ९ ॥ प्रणव से वृषारूढ़ शिव और सिंहस्थवर्धनी की पूजा करके कुम्भ पर अङ्ग सहित शिव की और वर्धनी पर अस्त्र की पूजा करे || ३० || दिशाओं में इन्द्रादि दिक्पालों तथा विष्णु, ब्रह्मा और अस्त्र की पूजा करे । घट के पृष्ठ भाग में स्थापित वर्धनी को सँभालकर हाथ में ले ले और मन्त्रोच्चारण करता हुआ पूर्व आदि दिशाओं की ओर क्रमशः मुँह करके शिव की आज्ञा को सुनावे । मूल मन्त्र उच्चारण करता हुआ अपनी रक्षा के लिए निरन्तर जल की धारा को शस्त्र रूप समझकर चारों ओर गिरा दे । पहले शस्त्र के लिए कलश स्थापन करके उसके बायें भाग में स्थिर आसन पर स्थापित समग्रासन कलश पर देव की पूजा करे ॥३१-३३३ ॥ तत्पश्चात् प्रणवस्थ वर्धनी पर आयुध की पूजा करे - लिङ्ग मुद्रा से कलश पर भग और १ ख. ' य शङ्गि । २ ख. ग. द्वारमध्यमे । घ. द्रारप ' । ३ घ. " संभार । ४ क. ङ. च. मण्डपे दर्भकृद्वाच्यैः पुर । ५ क. ङ. च. " न्तामुख ' । ६ ख. ग. घ. ' कुचप । ७ क. ङ. च. ' ब्रह्मावसानका ' । ख. ग. ' ब्रह्मेश्वरादि । ८ क. ख. ग. ङ. च. ' य मूढं दृष्ट्वाऽनुखत्रालय mmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अष्टसप्ततितमोऽध्यायः भगलिङ्गसमायोगं विदध्याल्लिङ्गमुद्रया ' तद्दशांशेन वर्धन्यां रक्षां विज्ञापयेदपि स्नापयेत्पूर्ववत्प्रार्च्य कुण्डे च शिवपावकम् । देवाग्न्यात्मविभेदेन दर्व्या तं विभजेत्त्रिधा । नरेण वर्मणार देयं पूर्वतो दन्तधावनम् ' । सद्योजातेन च हृदा चोत्तरे वाऽऽमलीफलम् । पञ्चगव्यं पलाशादिपुटकं वै समन्ततः । अगुरुं निर्ऋताशायां बायव्यां च चतुःसमम् । दण्डाक्षसूत्रकौपीनभिक्षापात्राणि रूपिणे । ताम्बूलं दर्पणं दद्यादुत्तरे रोचनामपि ।
ऐशान्यामीशमन्त्रेण दद्यादीशानतुष्टये ।
पवित्राणि समादाय प्रोक्षितान्यर्घ्यवारिणा ॥
कृष्णाजिनादिनाऽऽच्छाद्य स्मरन्संवत्सरात्मकम् । २ ९ ३ । कुम्भे निवेद्य बोधांसि मूलमन्त्रजपं तथा ॥ ३५ ॥
। गणेशं वायवेऽभ्यर्च्य हरं पञ्चामृतादिभिः ॥३६ ॥
विधिवच्चरुकं कृत्वा संपाताहुतिशोधितम् ॥३७ ॥
दत्त्वा भागौ शिवाग्निभ्यां संरक्षेद्धागमात्मनि ॥ ३८ ॥
' भस्मघोरशिखाभ्यां वा दक्षिणे पश्चिमे मृदम् ॥ ३ ९ ॥ जलं वामेन शिरसा ईशे गन्धान्वितं जलम् ॥ ४० ॥
ऐशान्यां कुसुमं दद्यादाग्नेय्यां दिशि रोचनाम् ॥४१ ॥
होमद्रव्याणि सर्वाणि सद्योजातैः कुशैः सह ॥४२ ॥
कज्जलं कुंकुमं तैलं शलाकां केशशोधिनीम् ॥४३ ॥
आसनं पादुके ' पात्रं योगपट्टातपत्रकम् ॥४४ ॥
पूर्वस्यां चरुकं साज्यं दद्याद्गन्धादिकं नरे " ॥ ४५ ॥
संहितामन्त्रपूतानि नीत्वा पावकसंनिधिम् ॥४६ ॥
साक्षिणं सर्वकृत्यानां गोप्तारं शिवमव्ययम् ॥४७ ॥
लिङ्ग का संयोग करे और ज्ञान खड्ग को निवेदित कर मूल मन्त्र का जप करे ॥ ३४-३५ ॥ मन्त्र जप की संख्या के दशांश से वर्धनी पर रक्षा का विज्ञापन करे, गणेश, वायु और शिव को पञ्चामृत आदि से नहलाकर पूजन करे और पूर्व की ही भाँति कुण्ड के मध्य में शिव और अग्नि की पूजा करे । विधिपूर्वक चरु बनाकर उसको सम्पात आहुति से शुद्ध करे ॥ ३६-३७ ॥ उस चरु को करछुली से देव, अग्नि और आत्मा के भेद से तीन भागों में विभक्त करे । शिव और अग्नि को उनका भाग प्रदान कर शेष भाग को अपने लिये सुरक्षित रखे || ३८ || पहले वर्म मन्त्र से दन्तधावन, घोर शिखा से भस्म, दक्षिण और पश्चिम में ' सद्योजात ' मन्त्र से मिट्टी, हृद् मन्त्र से उत्तर में आँवले का फल, वाम भाग की ओर जल, ईशानकोण में सुगन्धित जल, पञ्चगव्य और चारों ओर पलाश के बने दोने को रखे ॥३९ -४०३ ॥ ईशानकोण में फूल, अग्निकोण में गोरोचन, नैर्ऋत में अगुरु, वायव्यकोण में चतुःसम ( कस्तूरी, लवङ्ग, कर्पूर, कुङ्कुम ) और उत्तर दिशा में नवीन कुशों के सहित सकल हवन सामग्री, दण्ड, रुद्राक्ष, सूत्र, कौपीन, भिक्षापात्र, कज्जल, कुङ्कुम, तेल, शलाका, कंघी, ताम्बूल, दर्पण और गोरोचना रखे ॥४१-४३ ई ॥ आसन, खड़ाऊँ, पात्र, योगपट्ट तथा छाते को ईश मन्त्र से ईशान आदि चारों कोणों में रखे । पूर्व दिशा में घी सहित चरु और गन्ध आदि दे । हाथ में पवित्रक लेकर उसके ऊपर अर्घ्य- -जल छिड़ककर संहितामन्त्रों से उनको पवित्र करके उसको अग्नि के समीप ले जाय ॥४४-४६ ॥ कृष्ण मृग - चर्म से ढककर संवत्सरात्मक, सब कर्मों के १ क. ङ. च. ' ध्यादङ्गमु ' । २ घ. शरेण । ३ ख. धर्मणा । ४ ख. ग. घ. ' म् । तस्माद्योर । ५ क. ङ. च. भस्माङ्गार " । ६ ख. ग. ' शिवाभ्यां । ७ ख. ग. रे बामलीकृतम् । थ रे बामनीकृतम् । ८ क. ख. ग. ङ. च. ईशग । ९ ख. ' दुकापा ' । १० ख. द्वादिपात्रं । ११ घ. नवे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२ ९ ४ अग्निपुराणम् स्वेति हेति प्रयोगेण मन्त्रसंहितया पुनः गृहादि वेष्टयेत्सूत्रैर्गन्धाद्यं रवये ददेत् नन्दादिभ्योऽथ गन्धाख्यं वास्तोश्चाथ प्रविश्य च वर्धन्यै विघ्नराजाय गुरवे ह्यात्मने यजेत् आमन्त्र्य च पवित्रं तद्धिधायाञ्जलिमध्यगम् प्रभवान्मन्त्रयामि त्वां त्वदिच्छावावप्तिकारिकाम् सर्वथा सर्वदा शंभो नमस्तेऽस्तु प्रसीद मे मन्त्रेशैर्लोकपालैश्च सहितः परिचारकैः नियमं च करिष्यामि परमेश तवाज्ञया शिवान्तं मूलमुच्चार्य तच्छिवाय निवेदयेत् हुत्वा चरोस्तृतीयांशं तद्द ' ( तं द ) दीत शिवाग्नये । शोधयेच्च पवित्राणि वाराणामेकविंशतिम् ॥४८ ॥
। पूजिताय समाचम्य कृतन्यासः कृतार्घ्यकः ॥४९ ॥
। शस्त्रेभ्यो लोकपालेभ्यः स्वनाम्ना शिवकुम्भके ॥ ५० ॥
। अथ सर्वौषधीलिप्तं धूपितं पुष्पदूर्वया ॥ ५१ ॥
। ॐ समस्तविधिच्छिद्रपूरणे च विधिं प्रति ॥५२ ॥
। तत्सिद्धिमनुजानीहि यजतश्चिदचित्पते ॥ ५३ ॥
। आमन्त्रितोऽसि देवेश सह देव्या गणेश्वरैः ॥ ५४ ॥
। निमन्त्रयाम्यहं तुभ्यं प्रभाते तु पवित्रकम् ॥५५ ॥
। इत्येवं देवमामन्त्र्य रेचकेनामृतीकृतम् ॥५६ ॥
। जपं स्तोत्रं प्रणामं च कृत्वा शम्भुं क्षमापयेत् ॥५७ ॥
। दिग्वासिभ्यो दिगीशेभ्यो भूतमात्रगणैः सह ॥ ५८ ॥
रुद्रेभ्यः क्षेत्रपादिभ्यो नमः स्वाहा बलिस्त्वयम् । दिग्गजाद्यैश्च ' पूर्वादौ क्षेत्राय चाग्नये बलिः ॥ ५ ९ ॥ समाचम्य विधिच्छिद्रपूरकं होममाचरेत् । पूर्णां व्याहृतिहोमं च कृत्वा रुन्धीत पावकम् || ६० ॥ साक्षी, रक्षक और अव्यय शिव का स्मरण करते हुए स्वाहा के द्वारा तथा पुनः मन्त्र - संहिता से पवित्रक को इक्कीस बार शोधन करे ॥४७-४८ ॥ घर आदि सूत्र से वेष्टित करके सूर्य को गन्ध आदि अर्पित करे । फिर पूजित सूर्य को आचमनपूर्वक अर्घ्य दे । न्यास करके नन्दी आदि द्वारपालों को और वास्तु देवता को भी गन्धादि समर्पित करे । तदनन्तर यज्ञ - मण्डप के भीतर प्रवेश करके शिव - कलश पर उसके चारों ओर इन्द्रादि लोकपालों और उनके अस्त्रों की अपने-अपने नाम - मन्त्रों से पूजा करे । इसके बाद वर्धनी में विघ्नराज, गुरु और आत्मा का पूजन करे ॥ ४ ९ -५०३ ॥ सब ओषधियों से लिप्त, धूप से सुवासित पवित्रक को पुष्प तथा दूर्वा से आमन्त्रित कर अपनी अञ्जलि में रखे । ‘ ॐ समस्त विधियों के दोष को दूर करनेवाली, सब कर्मों के सिद्धि के आदि कारण तुमको आमन्त्रित कर रहा हूँ, तुम अपनी इच्छाओं को अनुकूल बनानेवाली कार्यसिद्धि को मेरे यज्ञ की सिद्धि के लिए प्रेरित कर भेजो ' – इस मन्त्र से वर्धनी की पूजा करे । चित्पते! शम्भो! आपको सर्वदा नमस्कार है, आप मुझ पर प्रसन्न होइये ॥५१-५३ ॥ देवेश! मैं पार्वती, गणेश्वर, मन्त्रेश, लोकपाल और परिचारक वृन्दों के सहित आपको निमन्त्रित कर रहा हूँ । देव! परमेश्वर! मैं आपकी आज्ञा से कल प्रात: काल पवित्राधिवासन और नियमव्रत करूँगा ॥५४-५५३ ॥ इस प्रकार शिव को आमन्त्रित करके रेचक प्राणायाम से अमृतीकरण कर मूलमन्त्र में शिव शब्द जोड़कर उस मन्त्र से प्रार्थना करे । जप, स्तोत्र और प्रणाम करने के अनन्तर क्षमापन करे ॥५६-५७ ॥ चरु के तीसरे भाग का हवन कर उसको शिवाग्नि को अर्पित कर दे । फिर “ दिग्वासिभ्यो दिगीशेभ्यो भूतमात्रगणैः सह रुद्रेभ्यः क्षेत्रपादिभ्यो नमः स्वाहा ” इस मन्त्र से बलि प्रदान करे । पूर्वादि दिशाओं में दिग्गजों, क्षेत्रपतियों और अग्नि को भी बलि दे ॥५८-५९ ॥ आचमन करके विधिच्छिद्रपूरक हवन १ ख. ग. जप्त्वा । २ क. च. तदधीत शिवालये । ३ ख. ग. घ. ' गणेभ्य उ । रु ।४ दिग्गजाद्यैश्च " बलिः क. ङ. च पुस्तकेषु नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अष्टसप्ततितमोऽध्यायः २ ९ ५ तत ओमग्नये स्वाहा स्वाहा सोमाय चैव हि । ओमग्नीषोमाभ्यां स्वाहाऽग्नये स्विष्टकृते तथा ॥ ६१ ॥
इत्याहुतिचतुष्कं तु नत्त्वा कुर्यात्तु योजनाम् । वह्निकुण्डार्चितं देवं मण्डलाभ्यर्चिते शिवे ॥६२ ॥
नाडीसंधानरूपेण ' विधिना योजयेत्ततः । वंशादिपात्रे ' विन्यस्य अस्त्रं च हृदयं ततः ॥ ६३ ॥
अधिरोप्य पवित्राणि कलाभिर्वाऽथ मन्त्रयेत् । षडङ्गं ब्रह्ममूलैर्वा हृद्वर्मास्त्रं च योजयेत् ॥६४ ॥
विधाय सूत्रैः संवेष्ट्य पूजयित्वाऽङ्गसंभवैः । रक्षार्थं जगदीशाय भक्तिनम्रः समर्पयेत् ॥ ६५ ॥
पूजिते पुष्पधूपाद्यैर्दत्त्वा सिद्धान्तपुस्तके । गुरोः पादान्तिकं गत्वा भक्त्या दद्यात्पवित्रकम् ॥६६ ॥
निर्गत्य बहिराचम्य गोमये मण्डलत्रये । पञ्चगव्यं चरुं दन्तधावनं च क्रमाद्यजेत् ॥६७ ॥
स्वाचान्तो मन्त्रसंनद्धः ' कृतसंगीतजागरः । स्वपेदन्तः स्मरन्नीशं बुभुक्षुर्दर्भसंस्तरे ॥६८ ॥
अनेनैव प्रकारेण मुमुक्षुरपि संविशेत् । केवलं भस्मशय्यायां सोपवासः समाहितः ॥ ६ ९ ॥ इत्यादिमहापुराण आग्नेये पवित्राधिवासनविधिकथनं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥७८ ॥
करे । पूर्णाहुति तथा व्याहृति होम से अग्नि को अवरुद्ध कर दे । इतनी क्रिया के पश्चात् ' ॐ अग्नये स्वाहा ', ' सोमाय स्वाहा ', ‘ ओमग्नीषोमाभ्याम् ', ' अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ' - इन मन्त्रों से चार आहुतियों को देकर योजना करे ॥६०-६१३ ॥ मण्डप में पूजित शिव में और अग्निकुण्ड में अर्चित शिव को नाड़ी संधान रूप से विधिपूर्वक संयुक्त करे । वंश आदि पात्र में अस्त्र और हृदय का न्यास करके पवित्रक को रखकर कलाओं के द्वारा उसे अभिमन्त्रित करे ॥६२-६३३ ॥ ब्रह्ममूल से षडङ्ग से हृद् और वर्मास्त्र की योजना करे । इस प्रकार योजना करके उसको सूत्र से घेरकर रक्षा के लिए अङ्ग - सम्बन्धी मन्त्रों से पूजन करके जगदीश के सम्मुख भक्ति से विनम्र होकर आत्मार्पण करे ॥६४-६५ ॥ पुष्प, धूप, दीप आदि से पूजन करने के पश्चात् सिद्धान्त पुस्तक दानकर गुरुचरणों के समीप जाकर भक्तिपूर्वक पवित्रक का दान करना चाहिए ॥६६ ॥ वहाँ से बाहर आकर आचमन करके गोबर के बने तीन मण्डलों में पञ्चगव्य,
चरु और दन्तधावन रखकर क्रमशः उनकी पूजा करे ॥६७ ॥ आचमन के अनन्तर मन्त्र - जप में तल्लीन हो गान आदि
के द्वारा जागरण करे । अन्त में बिना कुछ खाये, हृदय में शिव का स्मरण करते हुए कुशासन पर सोये ॥६८ ॥ इसी
प्रकार से मुमुक्षु - जन को भी सोना चाहिए । उसे केवल भस्म की शय्या पर एकाग्र होकर सोना और निराहार रहना चाहिए ॥ ६ ९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में पवित्राधिवासन विधि - वर्णन नामक अठहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥७८ ॥
१ क. ङ. च. नाभिसं ' । २ ख. पात्रं वि ' । ३ ख. पूजिते । ४ ख. ग. ङ. च. हृद्वर्मा ' । ५ क. ङ. च. ङ्गसस्वनैः । ख. ग. ' ङ्गशंबरैः । र ' । ६ क. ङ. च. ' ण्डपत्र ' । ७ घ. आचान्तो । ८ घ. ' सघद्धः । ९ क. ङ. च. ' परागः स ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२ ९ ६ अग्निपुराणम् अथैकोनाशीतितमोऽध्यायः पवित्रारोहणविधिः ईश्वर उवाच अथ प्रातः समुत्थाय कृतस्नानः समाहितः ।
समादाय पवित्राणि अविसर्जितदेवतः ।
ततो विसर्ज्य देवेशं निर्माल्यमपनीय च ॥
आदित्यद्वारदिक्पालकुम्भेशानौ शिवेऽनले । मन्त्राणां तर्पणं प्रायश्चित्तहोमं शराणुना । पवित्रं भानवे दत्त्वा समाचम्य ददीत च । संनिधाने ततः शम्भोरुपविश्य निजासने । ॐ कालात्मना ' त्वया देव यद्दिष्टं ' मामके विधौ । तदस्तु क्लिष्टमक्लिष्टं कृतं क्लिष्टमसंस्कृतम् । II पूरय मखव्रतं नियमेश्वराय स्वाहा कृतसंध्यार्चनो मन्त्री प्रविश्य मखमण्डलम् ॥१ ॥
ऐशान्यां भाजने शुद्धे स्थापयेत्कृतमण्डले ॥२ ॥
पूर्ववदभूतले शुद्धे कृत्वाऽऽह्निकमथद्वयम् ॥३ ॥
नैमित्तिकीं सविस्तारां कुर्यात्पूजां विशेषतः ॥ ४ ॥
अष्टोत्तरशतं कृत्वा दद्यात्पूर्णाहुतिं शनैः ॥ ५ ॥
द्वारपालादिदिक्पालकुम्भवर्धनिकादिषु ॥६ ॥
पवित्रमात्मने दद्याद्गणाय गुरुवह्नये ॥७ ॥
कृतं क्लिष्टं समुत्सृष्टं कृतं गुप्तं च यत्कृतम् ॥८ ॥।
सर्वात्मनाऽमुना शंभो पवित्रेण त्वदिच्छया ॥९ ॥
॥१० ॥
अध्याय ७ ९ पवित्रारोहण - विधि महेश्वर बोले- इसके बाद प्रात: काल उठकर स्नान करे और एकाग्र होकर सन्ध्या - पूजा आदि करके यज्ञ - मण्डप में प्रवेश करे ॥१ ॥ पवित्रक को हाथ में लेकर देवताओं को बिना विसर्जित किये ही ईशानकोण में शुद्ध पात्र में मण्डल
बनाकर उसमें पवित्रक को स्थापित करे ॥२ ॥ तदनन्तर देवेश शिव को विसर्जित करके निर्माल्य को पृथक् कर दे ।
पूर्व की भाँति शुद्ध भूमि पर दो बार आह्निक कर्म करके आदित्य, द्वारपाल, दिक्पाल, कुम्भ, ईशान, शिव और अग्नि की विस्तारपूर्वक विशेषरूप से नैमित्तिकी पूजा करे ॥३-४ ॥ मन्त्रों का तर्पण और एक सौ आठ बार शर - मन्त्र से प्रायश्चित्त होम करके पूर्णाहुति प्रदान करे । सूर्य को पवित्रक प्रदान करके स्वयं आचमन करे और द्वारपाल तथा दिक्पाल के लिए कुम्भ और वर्धनिकादि पर भी पवित्रक समर्पित कर दे ॥५-६ ॥ तदनन्तर शिव के समीप अपने आसन पर बैठकर आत्मा, गुरु, गण और अग्नि को पवित्रक दे । ॐ देव! कालात्मन्! तुम्हारी प्रेरणा से मेरी यज्ञविधि में जो कुछ कठिनाई के कारण छूट गये हैं, वे सब - कुछ तुम्हारी कृपा से भली - भाँति इस पवित्रक प्रदान से सरल हो जायँ और कठिनाइयाँ दूर हो जायँ । ॐ नियमेश्वर को स्वाहा, मेरे यज्ञ - व्रत को पूर्ण कीजिये ॥७-१० ॥ ब्रह्मा से पालित प्रकृतिपर्यन्त १ क. च. मण्डमण्डपे । त ' । २ ख. ग. ' मखद् ' । ३ क. ङ. च. ' र्पणे होमं प्रायश्चित्तं श ' । ४ घ. ' रात्मना । ५ क. ख. ग. ङ. च. हुत्त्वा । ६ ग. सुखासने । ७ ङ. च. " कारार्थ त्व ' । ८ ङ. च. यद्दृष्टं । ९ क. ङ. च - तं क्षिप्तम ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA