अग्नि पुराण — पृष्ठ 321–330
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 321–330
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चतुरशीतितमोऽध्यायः विसृजेद्गणमग्निं ' च रक्षितं यदि बाह्यतः । बाह्यतो ३१७ भस्मना शुद्धतोयैर्वा स्नात्वा यागालयं लोकपालानां दत्त्वा संक्षेपतो बलिम् ॥ ५६ ॥
हृदा सद्भस्मशय्यायां पञ्चगव्यं चरुं प्राश्य विशेत् । गृहस्थान्दर्भशय्यायां पूर्वशीर्षान्सुरक्षितान् यतीन्दक्षिणमस्तकान् ॥ ५७ ॥
। शिखाबद्धशिखानस्त्रसप्तमाणवकान्वितान् विज्ञाय स्नापयेच्छिष्यांस्ततो ॥५८ ॥
यायात्पुनर्बहिः ॐ हिलि हिलि शूलपाणये ॥५९ ॥
स्वाहा ॥६० ॥
गृहीत्वा दन्तधावनम् । समाचम्य शिवं ध्यात्वा शय्यामास्थाय ' पावनीम् ॥६१ ॥
दीक्षागतं " क्रियाकाण्डं संस्मरन्संविशेद्गुरुः । इति संक्षेपतः प्रोक्तो विधिर्दीक्षाधिवासने इत्यादिमहापुराण आग्नेय निर्वाणदीक्षायामधिवासनविधिकथनं ॥६२ ॥
नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥८३ ॥
अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः निर्वाणदीक्षायां निवृत्तिकलाशोधनम् ईश्वर उवाच अथ प्रातः समुत्थाय कृतस्नानादिको गुरुः । दध्यार्द्रमांसमद्यादेः प्रशस्ताऽभ्यवहारिता ॥१ ॥
गजाश्वारोहणं स्वप्ने शुभं शुक्लांशुकादिकम् । तैलाभ्यङ्गादिकं हीनं होमोऽघोरेण शान्तये ॥२ ॥
करे । यदि बाहर से अन्य देवों द्वारा रक्षित हों तो बाहर से लोकपालों को संक्षेप में बलि दे ॥५६ ॥ भस्म से या शुद्ध
जल से स्नानकर यज्ञ - मण्डप में प्रवेश करे । कुश के आसन पर गृहस्थों को पूर्वाभिमुख बैठाकर हृद् मन्त्र का उच्चारण करते हुए भस्म के उत्तम आसन पर संन्यासियों को दक्षिणाभिमुख बैठावे ॥५७-५७३ ॥ शिखा मन्त्र से शिखा बाँधे हुए सात बटुओं को भी वहाँ बैठाये, पुनः अस्त्र - मन्त्र से उन शिष्यों को नहलाये, तत्पश्चात् यज्ञमन्दिर से बाहर जाय और ‘ ॐ हिलि हिलि शूलपाणये स्वाहा ' - मन्त्र का उच्चारण करे ॥५८-६० ॥ पञ्चगव्य और चरु का स्वयं भक्षण करके दातून ले ले । आचमन करके शिव का ध्यान करके पवित्र शय्या पर सोने के लिए जाय । गुरु दीक्षा सम्बन्धी क्रिया - कलापों का स्मरण करता हुआ सो जाय । इस प्रकार यहाँ संक्षेप रूप में दीक्षाधिवासन की विधि बतायी गयी है ॥६१-६२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में निर्वाणदीक्षा - विधि कथन नामक तिरासीवाँ अध्याय समाप्त ॥८३ ॥
अध्याय ८४ निर्वाणदीक्षा में निवृत्ति कला - शोधन महादेव बोले- गुरु को प्रातः काल उठकर स्नान इत्यादि करना चाहिए । उसकी पूर्व की रात्रि में गुरु के द्वारा स्वप्न में दही, अदरक, कच्चा मांस और मद्यादि का भोजन देखना शुभ होता है । स्वप्न में हाथी अथवा घोड़े पर चढ़ना और शुक्ल वस्त्रादि का देखना भी शुभ माना गया है किन्तु शरीर के ऊपर तैलादि की मालिश करना अनिष्टकर होता है जिसकी शान्ति अघोर मन्त्र से यज्ञ करने से हो सकती है ॥१-२ ॥ गुरु को दोनों नित्य कर्म ( सन्ध्या ) करके यज्ञ - मण्डप १ क. ङ. च. ' जेत्क्षण ' । ख. ' जेद्गण ' । २ क. ङ. च. ' य श्रावये । ख ' य स्थाप्य । ३ घ. ' लि त्रिशू । ४ ख. ' मादाय । ५ घ. गतक्रि ' ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ३१८ नित्यकर्मद्वयं कृत्वा प्रविश्य मखमण्डपम् । ततः संशोध्य चाऽऽत्मानं शिवहस्तं तथाऽऽत्मनि ।
मण्डले स्थण्डिले वाऽपि प्रकुर्वीत शिवार्चनम् ।
दुःस्वप्नदोषमोषाय शस्त्रेणाष्टाधिकं शतम् ॥
अन्तर्बलिविधानं च मध्ये स्थण्डिलकुम्भयोः । कुर्यात्समयवत्तत्र * मण्डलारोपणादिकम् । तत्संनिधानाय तिस्रो हुत्वा मूलाणुनाऽऽहुतीः । स्वदक्षिणोर्ध्वकायस्य शिष्यस्याभ्यर्चितस्य च । तं निवेश्य निवृत्तेस्तु व्याप्तिमालोक्य चेतसा कपालोऽजश्च बुद्धश्च वज्रदेहः प्रमर्दनः अग्नी ' रुद्रो हुताशी च पिङ्गलः खादको हरः याम्यमृत्युहरो धाता विधाता कार्यरञ्जकः " नैर्ऋतो मारणो हन्ता क्रूरदृष्टिर्भयानकः बलश्चातिबलश्चैव पाशहस्ती १२ महाबलः में प्रवेश करना चाहिए । अच्छी तरह आचमन करके स्वाचान्तो ' नित्यवत्कर्म कुर्यान्नैमित्तिके विधौ ॥३ ॥
विन्यस्य कुम्भगं इन्द्रादीनामनुक्रमात् ॥४ ॥
तर्पणं पूजनं वह्नेः पूर्णान्तं मन्त्रतर्पणम् ॥५ ॥
हुत्वा हूंसंपुटेनैव विदध्यान्मन्त्रदीपनम् ॥६ ॥
कृत्वा शिष्यप्रवेशाय लब्धानुज्ञो बहिर्व्रजेत् ॥ ७ ॥
संपातहोमं तन्नाडीरूपदर्भकरानुगम् ॥८ ॥
कुम्भस्थं शिवमभ्यर्च्य पाशसूत्रमपाहरेत् ॥९ ॥
तच्छिखायां निबध्नीयात्पादाङ्गुष्ठावलम्बितम् ॥१० ॥
। ज्ञेयानि भुवनान्यस्यां शतमष्टाधिकं ततः ॥ ११ ॥
। विभूतिरव्ययः शास्ता पिनाकी त्रिदशाधिपः ॥ १२ ॥
। ज्वलनो दहनो ' बभ्रुर्भस्मान्तक क्षपान्तकौ ॥१३ ॥
। कालो धर्मोऽप्यधर्मश्च संयोक्ता " च वियोजकः ॥१४ ॥
। ऊर्ध्वाशको विरूपाक्षो धूम्रलोहितदंष्ट्रवान् ॥ १५ ॥
। श्वेतश्च जयभद्रश्च दीर्घबाहुर्जलान्तकः ॥ १६ ॥
नैमित्तिक कार्य नित्य - कर्म के समान करना चाहिए ॥३ ॥ अपनी
आत्मा तथा शिवहस्त नामक हाथ के अङ्ग को पवित्र करके अपने अन्दर इन्द्र आदि दिक्पालों का न्यास करना चाहिए । शिव का अर्चन किसी मण्डल अथवा स्थण्डिल पर करना चाहिए और अग्नि का पूजन तथा मन्त्रों से तर्पण भी करना चाहिए ॥४-५ ॥ उपर्युक्त दुःस्वप्नों से उत्पन्न दोषों से मुक्ति पाने के लिए ' हूं ' सम्पुटपूर्वक शस्त्र - मन्त्र से एक सौ आठ बार हवन करके मन्त्र को दीप्त करना चाहिए ॥६ ॥ स्थण्डिल और कुम्भ के बीच में अन्तर्बलि का विधान करके देवता
से शिष्य के प्रवेश की आज्ञा प्राप्त करके बाहर चला जाना चाहिए ॥७ ॥ वहाँ समय - दीक्षा के समय मण्डल आरोपण
इत्यादि क्रियाएँ करनी चाहिए । वहाँ पर पवित्र कुशों के द्वारा सम्पात होम करना चाहिए । उनके सन्निधान के लिए मूल-मन्त्र से तीन आहुतियाँ देनी चाहिए और कुम्भस्थ शिव की अर्चना करके पाश - सूत्र को हाथ में उठा लेना चाहिए ॥८-९ ॥ तदनन्तर पूजित शिष्य के ऊपरी शरीर के दक्षिणी भाग में - उसकी शिखा में उस सूत्र को बाँधे और उसे पैर के अँगूठे तक लम्बा रखे ॥१० ॥ इस प्रकार उस पाश का निवेश करके उसमें मन - ही - मन निवृत्ति कला की व्याप्ति का दर्शन
करे । उसमें एक सौ आठ भुवन जानने योग्य हैं || ११ || उनके नाम हैं - कपाल, अज, बुद्ध, वज्रदेह, प्रमर्दन, विभूति, अव्यय, शास्ता, पिनाकी, इन्द्र, अग्नि, रुद्र, हुताशी, पिङ्गल, खादक, हर, ज्वलन, दहन, बभ्रु, भस्मान्तक, क्षपान्तक, याम्य, मृत्युहर, धाता, विधाता, कार्यरञ्जक, काल, धर्म, अधर्म, संयोक्ता, वियोजक, नैर्ऋत, मारण, हन्ता, क्रूरदृष्टि, भयानक, ऊर्ध्वाशक, विरूपाक्ष, धूम्र, लोहित, दंष्ट्री, बल, अतिबल, पाशहस्त, महाबल, श्वेत, जयभद्र, दीर्घबाहु, १ क. ङ. च. स्वधान्तं । २ ख. शिवं हंसं त ' । ३ क. ङ. च. ' त्वा हं सं । ख. ' त्वा ह रूं सं । ४ क. ङ. च. यकं याम्यो तत्र । ५ ख. ' होमवन्ना ' । ६ घ. ' त्रमुपा । ७ क. ख. ङ. च. अग्निरुद्रोह । ८ ख. ' नो वाऽपि भस्मा ' । ९ क. ख. ङ. च. मृ ' । १० क. च. ' र्यवञ्चकः । ११ क. ङ. च. ' क्ताविधिपोषकः । १२ क. ङ. च. ' हस्तो म ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुरशीतितमोऽध्यायः वडवास्यश्च ' भीमश्च दशैते वारुणाः स्मृताः पञ्चान्तकः पञ्चशिखः कपर्दी मेघवाहनः निधीशो रूपवान्धन्यः " सौम्यदेहः प्रसादकृत् विद्याधरो ज्ञानधरः सर्वज्ञो वेदपारगः सर्वविद्याविधाता च सुखदुःखहरो दश वृषो वृषधरो वीर्यो ग्रसनः सर्वतोमुखः शंभुविभुर्गणाध्यक्षस्त्र्यक्षस्त्रिदशवन्दितः अत्ता कुहककालाग्निरुद्रो हाटक एव च । रुद्रश्चाष्टाविमे रुद्राः कटाहाभ्यन्तरे स्थिताः । भवोद्भवः सर्वभूतः सर्वभूतसुखप्रदः । संस्तुतपूर्वस्थित, ॐ साक्षिन् " ॐ शब्द, ॐ सूक्ष्म, ॐ शिव ३१ ९ । दीर्घो लघुवायुवेगः सूक्ष्मस्तीक्ष्णः क्षमान्तकः ॥१७ ॥
। जटामुकुटधारी च नानारत्नधरस्तथा ॥१८ ॥
। प्रकाशोऽप्यथ लक्ष्मीवान्कामरूपो दशोत्तरे ॥१९ ॥
। मातृवृत्तश्च पिङ्गाक्षो भूतपालो बलिप्रियः ॥२० ॥
। अनन्तः पालको धीरः पातालाधिपतिस्तथा ॥ २१ ॥
। लोहितश्चैव विज्ञेया दशरुद्राः फणिस्थिताः ॥ २२ ॥
। संवाहश्च ' विवाहश्च ' लाभो लिप्सुर्विचक्षणः ॥२३ ॥
कुष्माण्डश्चैव सत्यश्च ब्रह्मा विष्णुश्च सप्तमः ॥२४ ॥
एतेषामेव नामानि भुवनानामपि स्मरेत् ॥ २५ ॥
सर्वसांनिध्यकृद्ब्रह्मविष्णुरुद्रशरार्चितः " ॥२६ ॥
, ॐ रुद्रान्तक, ॐ पतंग, सर्वसर्वद सर्वसांनिध्यकर ब्रह्मविष्णुरुद्रकर', ॐ नमः शिवाय, ॐ नमो नमः १३ ॥२७ ॥
अष्टाविंशतिपादानि ४ व्योमव्यापिमनोगुह । सद्योहृदस्त्रनेत्राणि १५ मन्त्रवर्णाष्टको मतः ॥२८ ॥
बीजकारो मकारश्च नाड्याविडापिङ्गलाह्वये । प्राणापानावुभौ वायू घ्राणोपस्थौ तथेन्द्रिये ॥२९ ॥
जलान्तक, वडवास्य, भीम ( इनमें से अंतिम दस वरुण दिशा में स्थिर रहते हैं ), दीर्घ, लघु, वायुवेग, सूक्ष्म, तीक्ष्ण, क्षमान्तक, पञ्चान्तक, पञ्चशिख, कपर्दी, मेघवाहन, जटामुकुटधारी, नानारत्नधर, निधीश, रूपवान्, धन्य, सौम्यदेह, प्रसादकृत्, प्रकाश, लक्ष्मीवान्, कामरूप ( ये रुद्र उत्तर दिशा में अवस्थित हैं ), विद्याधर, ज्ञानधर, सर्वज्ञ, वेदपारग, मातृवृत्त, पिङ्गाक्ष, भूतपाल, बलिप्रिय, सर्वविद्याविधाता, सुखदुःखहर, अनन्त, पालक, धीर, पातालाधिपति, वृष, वृषधर, वीर्य, ग्रसन, सर्वतोमुख, लोहित ( इनमें से अन्तिम दस शेषनाग की फण अर्थात् पाताललोक में अवस्थित हैं ), शम्भु, विभु, गणाध्यक्ष, त्रैक्ष, त्रिदशवन्दित, संवाह, विवाह, लाभ, लिप्सु, विचक्षण, अत्ता, कुहक, कालाग्निरुद्र, हाटक, कूष्माण्ड, सत्य, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र ( इनमें से आठ कटाह स्थित रुद्र के प्रतिरूप हैं ) । ये नाम एक सौ आठ भुवनों के भी हैं । भवोद्भव, सर्वभूतसुखप्रद, सर्वसान्निध्यकर, ब्रह्मविष्णुरुद्रकर, अनर्चितानर्चित, असंस्तुतासंस्तुत, पूर्वस्थित साक्षिन्, पतंग, शब्द, सूक्ष्म, शिव, सर्व, सर्वद, ॐ नमो नमः, ॐ नमः शिवाय, नमो नमः, ये अट्ठाईस पाद हैं । हे स्कन्द! उपर्युक्त पाशसूत्र में निवृत्तिकला को अट्ठाईस पादों से युक्त समझना चाहिए । उनमें सद्यो, हृदय तथा नेत्र ये तीन मन्त्र हैं । उसमें अकार और लकार बीजमन्त्र, इड़ा और पिङ्गला नामक नाड़ियाँ, प्राण और अपान वायु, घ्राण तथा १ च. ' श्च भौम ' । २ घ. शीघ्रो । ३ क. ङ. च. क्षपान्तकः । घ. क्षयान्तकः । ४ ख. ' वान्वद्यः सौ ' । ५ घ. न्धन्योऽसौ । ६ क. ङ. च. वीरः । ७ क. च. ' रो धार्यो ग्रथनः । ८ घ. संधारश्च विहारश्च । ९ ख. ' श्चनभोलि ' । १० क. ङ. ' तः । अनर्चित, अ सं । ११ क. ख. ङ. च. ' न्, ' तुङ्ग ', पतङ्ग ', ज्ञान, शब्द, सूक्ष्म ', ' शिव ', सर्वदण्ड ', सर्वसां । १२ क. ङ. च. ' द्र पर । १३ क. ङ. च. ' मः, ॐ शिवाय, ॐ नमो नमः । अ । १४ क. ख. ङ. च. ' तिपदा ' । १५ क. ङ. च. ' दन्ते ने ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३२० अग्निपुराणम् गन्धस्तु विषयः प्रोक्तो गन्धादिगुणपञ्चके । पार्थिवं मण्डलं पीतं वज्राङ्कं चतुरस्त्रकम् ॥ ३० ॥
विस्तारो योजनानां तु कोटिरस्य शताहता । अत्रैवान्तर्गता ज्ञेया योनयोऽयि चतुर्दश ॥ ३१ ॥
प्रथमा ' सोमदेवानामश्वाद्या ' देवयोनयः । मृगः पक्षी च पशवश्चतुर्धा तु सरीसृपाः ॥ ३२ ॥
स्थावरं पञ्चमं सर्वं योनिः षष्ठी अमानुषी । पैशाचं राक्षसं याक्षं गान्धर्वं चैन्द्रमेव च ॥ ३३ ॥
सौम्यं प्राजेश्वरं ब्राह्ममष्टमं परिकीर्तितम् । अष्टानां पार्थिवं तत्त्वमधिकारास्पदं मतम् ॥३४ ॥
लयस्तु प्रकृतौ बुद्धौ भोगो ब्रह्मा च कारणम् । ततो जाग्रदवस्थानैः समस्तैर्भुवनादिभिः ॥३५ ॥
निवृत्तिं गर्भितां ध्यात्वा स्वमन्त्रेण नियोज्य च ॥३६ ॥
ॐ हां हूं ' हां निवृत्तिकलापाशाय हूं फट् तत ॐ हां हां निवृत्तिकलापाशाय स्वाहेत्यनेनाङ्कुशमुद्रया पूरकेणाऽऽकृष्य, ॐ हूं ह्रां हूं निवृत्तिकलापाशाय हूं फडित्यनेन संहारमुद्रया " कुम्भकेनाधः स्थानादादाय, ॐ ॐ हं हां निवृत्तिकलापाशाय नम इत्यनेनोद्भवमुद्रया रेचकेन कुम्भेर संस्थाप्य, ॐ हां निवृत्तिकलापाशाय नम इत्यनेनार्घ्यं दत्वा संपूज्य विमुखेनैव स्वाहान्तेनैव संनिधानायाऽऽहुतित्रयं संतर्पणाहुतित्रयं च दत्त्वा, ॐ हां ब्रह्मणे नम इति ब्रह्माणमावाह्य संपूज्य च स्वाहान्ते संतर्प्य ॥३७ ॥
ब्रह्मं स्तवाधिकारेऽस्मिन्मुमुक्षं दीक्षयाम्यहं । भाव्यं त्वयाऽनुकूलेन विधिं विज्ञापयेदिति ॥ ३८ ॥
उपस्थ इन्द्रियाँ और गन्धादि गुण पञ्चकों में गन्ध विषय भी रहा करता है । पार्थिव मण्डल पीतवर्ण, चतुष्कोण और वज्राङ्कित होता है ॥१२-३० ॥ उसका विस्तार सौ करोड़ योजन होता है । इसी के अन्तर्गत चौदह योनियाँ भी होती हैं ॥३१ ॥ प्रथम योनियाँ सोमदेवों की हैं अन्य अश्व आदि देवयोनियाँ हैं । उनका विवरण इस प्रकार है - मृग, पक्षी,
पशु और सरीसृप, पाँचवीं स्थावर तथा छठीं अमानुषी योनि, पैशाची, राक्षसी, याक्षी, गान्धर्वी, ऐन्द्री, सौमी, प्राजापत्या और ब्राह्मी ये आठ देवयोनियाँ हैं । इन आठों योनियों में पार्थिव तत्त्व का अधिकार रहता है ॥३२-३४ ॥ इनका लय प्रकृति में, भोगबुद्धि में होता है और ब्रह्मा कारण है । उसी की जाग्रत अवस्थाओं के कारण इन भुवनादिकों की स्थिति रहा करती है । सर्वप्रथम इन सबसे गर्भिता निवृत्ति का ध्यान करके अपने मन्त्र से उनका विनियोग करना चाहिए ॥३५-३६ ॥ ‘ ॐ हां हूं हां निवृत्तिकलापाशाय हूं फट् स्वाहा ' । तदनन्तर ' ॐ हां हूं हां निवृत्तिकलापाशाय स्वाहा ' - इस मन्त्र से अङ्कुशमुद्रा के द्वारा पूरक से आकृष्ट करना चाहिए । ' ॐ ह्रूं ह्रां ह्रूं निवृत्तिकलापाशाय ह्रूं फट् ’ - इस मन्त्र से संहार मुद्रा एवं कुम्भक द्वारा, नाभि के नीचे से ग्रहण करना चाहिए; ' ॐ ॐ हूं हां निवृत्तिकलापाशाय नमः - इस मन्त्र से उद्भव मुद्रा के द्वारा रेचक प्राणायाम से कुम्भ में स्थापित करना चाहिए । ॐ हां निवृत्तिकलापाशाय नमः ' - इस मन्त्र से अर्घ्य देकर पूजन करके और स्वाहा से अन्त करके इसी मन्त्र के द्वारा तीन संनिधानाहुति और संतर्पणाहुतियाँ देनी चाहिए, ‘ ॐ हां ब्रह्मणे नम: ' इस मन्त्र से ब्रह्म का आवाहन करके ब्रह्मा का पूजन और तर्पण करना चाहिए ॥३७ ॥ हे ब्रह्मन्! तुम्हारे
इस अधिकार में मैं मुमुक्षु को दीक्षित कर रहा हूँ इसलिए यह विधि आपके अनुकूल होनी चाहिए, ऐसा निवेदन करना १ घ. " मा सर्वदे ' । २ घ. ' वानां मन्वाद्या । ३ ख. घ. मृगप ' । ४ घ. प्राणेश्व ' । ५ ख. रूं । ६ ख. हरूं । चहुं । ७ ख. हां नि । च. हां हूं हां । ८ च. हूं हूं हूं नि । ९ ख. हुं । १० च. कुम्भेन नाम्यवस्था । ११ ख. ॐ हूं हां नि । च. ॐ ह्रां हूं नि ' । १२ च. कुम्भ संप्राप्य, ॐ हूं नि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुरशीतितमोऽध्यायः ३२१ आवाहयेत्ततो देवीं रक्षां वागीश्वरीं हृदा । पूजयेत्तयेद्देव प्रकारेणामुनः ततः । हृत्संपुटार्थबीजादिहूंफडन्तशराणुना । ततः शिष्यस्य चैतन्यं हृदि वह्निकणोपमम् । ॐ ह्रां हूं ' ॐ हां स्वाहेत्यनेनाथ पूरकेणाङ्कुशमुद्रया । ॐ हां ° हूं पित्रोर्विभाव्य संयोगं चैतन्यं रेचकेन तत् । गर्भाधानार्थमादाय युगपत्सर्वयोनिषु । ॐ हां हां पूजयेदप्यनेनैव तर्पयेदपि पञ्चधा । नात्र पुंसवनं स्त्र्यादिशरीरस्यापि संभवात् ।
शिरसा जन्म कुर्वीत युगपत्सर्वदेहिनाम् ।
इच्छाज्ञानक्रियारूपां षड्विधां ह्येककारणम् ॥ ३ ९ ॥
वागीश्वरीं विनिःशेषयोनिविक्षोभकारणम् ॥४० ॥
ताडयेद्धृदये तस्य प्रविशेत्स विधानवित् ॥४१ ॥
निवृत्तिस्थं युतं पाशैर्ज्येष्ठया विभजेद्यथा ॥४२ ॥
हः, हूं फट् ॥४३ ॥
तदाकृष्य ' स्वमन्त्रेण गृहीत्वाऽऽत्मनि योजयेत् ॥४४ ॥
हामात्मने नमः ॥४५ ॥
ब्रह्मादिकारणत्यागक्रमान्नीत्वा शिवास्पदम् ॥४६ ॥
क्षिपेद्वागीश्वरीयोनौ वामयोद्भवमुद्रया ॥४७ ॥
हामात्मने नमः ॥४८ ॥
अन्ययोनिषु सर्वासु देहशुद्धि हृदाऽऽचरेत् ॥ ४ ९ ॥
सीमन्तोन्नयनं वाऽपि दैवान्यङ्गानि देहवत् ॥५० ॥
तथैव भावयेदेषामधिकारं शिवाणुना ॥५१ ॥
चाहिए ॥ ३८ ॥ इसके बाद हृद् - मन्त्र से वागीश्वरी रक्षा देवी का आवाहन करना चाहिए । यह इच्छा, ज्ञान और क्रियारूप
है । छह प्रकार की यह एकमात्र कारण होती है ॥ ३ ९ ॥ इसके बाद इस प्रकार से देवी का पूजन तथा तर्पण करना चाहिए । मुख्य मन्त्रों के आदि में हृद्मन्त्र तथा अन्त में हुं फट् शब्दों का सम्पुट करना चाहिए और जिससे पहले वागीश्वरी के गर्भ को विक्षुब्ध किया गया उससे शिष्य के हृदय को भी प्रभावित करना चाहिए । इन विधियों में पारङ्गत गुरु को शिष्य के हृदय में प्रवेश करके वह्निकण के समान उसके निवृत्तिस्थ चैतन्य को ' ॐ हां हूं ह:, हूं फट् ' मन्त्र से विभक्त करना चाहिए ॥४०-४३ ॥ ‘ ॐ हां स्वाहा ' इस मन्त्र से पूरक प्राणायाम और अंकुश - मुद्रा के द्वारा उस जीव चैतन्य को हृदय में आकृष्ट करके, आत्ममन्त्र से पकड़कर, उसे अपनी आत्मा में योजित करे । वह मन्त्र इस प्रकार है - ' ॐ हां हूं हामात्मने नमः ' ॥४४-४५ ॥ माता - पिता के सयोग की कल्पना करके रेचक से चैतन्य को ब्रह्मादि कारणों के त्याग से शिव के स्थान पर युक्त करना चाहिए । गर्भाधान के लिए उद्भव - मुद्रा से वागीश्वरी योनि में उसका प्रक्षेप कर देना चाहिए ॥४६-४७ ॥ ‘ ॐ हां हां हामात्मने नमः ' - इस मन्त्र से पूजन और पाँच प्रकार का तर्पण भी करना चाहिए । अन्य सभी योनियों में हृद्मन्त्र से देहशुद्धि का आचरण करना चाहिए ॥४८-४९ ॥ यहाँ पर पुंसवन संस्कार नहीं करना चाहिए, क्योंकि स्त्री आदि शरीर की सम्भावना हो सकती है । न तो सीमन्तोन्नयन करना चाहिए । शिरस् मन्त्र के द्वारा जन्म कराना चाहिए और शिव -मन्त्र - I से उसके अधिकार की भावना करनी चाहिए ॥५०-५१ ॥ कवच - मन्त्र से भोग और अस्त्र - मन्त्र से १ क. ङ. च. ‘ विधायैककारणात् । पू ० । २ क. ङ. च. ' श्वर च. निः । ३ क. ङ. च. ' शेच्च वि ' । ४ ख. हां हूं हां हः, हूं फ ।.५ क. ङ. च. हूं हां हः । ६ क. ङ. च. ' कृष्याऽऽत्मम । ७ क. ङ. च. हं । ८ क. ङ. च. हं । ९. क. ङ. च. शिखण्डिना । २१ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३२२ अग्निपुराणम्
भोगं कवचमन्त्रेण शस्त्रेण विषयात्मना । मोहरूपमभेद्यं च लयसंज्ञं विभावयेत् ॥५२ ॥
शिवेन स्त्रोतसां शुद्धिं हृदा तत्त्वविशोधनम् । पञ्च पञ्चाऽऽहुतीर्दद्याद्गर्भाधानादिषु क्रमात् ॥५३ ॥
मायया मलकर्मादिपाशबन्धनिवृत्तये ॥ निष्कृत्यैव हृदा पश्चाद्यजेत शतमाहुतीः ॥ ५४ ॥
मलशक्तिनिरोधेन ' पाशानां च वियोजनम् । स्वाहान्तायुधमन्त्रेण पञ्च पञ्चाहुतीर्यजेत् ॥ ५५ ॥
मायाद्यन्तस्यरे पाशस्य सप्तवारास्त्रजप्तया 1 । कर्तर्या छेदनं कुर्यात्कल्पशस्त्रेण तद्यथा ॥ ५६ ॥
ॐ हूं निवृत्तिकलापाशाय हूं फट् ॥५७ बन्धकत्वं च निर्वर्त्य हस्ताभ्यां च शराणुना । विसृज्य वर्तुलीकृत्य घृतपूर्णे स्रुवे धरेत् ॥ ५८ ॥ ॥
दहेदनुकलास्त्रेण केवलास्त्रेण भस्मसात् । कुर्यात्पञ्चाऽऽहुतीर्दत्त्वा पाशाङ्कुशनिवृत्तये ॥ ५ ९ ॥ ॐ:, हं ६ अस्त्राय हूं ' फट् ॥६० ॥
प्रायश्चित्तं ततः कुर्यादस्त्राहुतिभिरष्टभिः । अथाऽऽवाह्य विधातारं पूजयेत्तर्पयेत्तथा ॥६१ ॥
ततः - ॐ हां हां शब्दस्पर्शशुद्धब्रह्मन्गृहाण । स्वाहेत्याहुतित्रयेणाधिकारमस्य समर्पयेत् ॥६२ ॥
दग्धनिःशेषपापस्य ब्रह्मन्नस्य पशोस्त्वया । बन्धाय न पुनः स्थेयं शिवाज्ञां श्रावयेदिति ॥६३ || ततो विसृज्य धातारं नाड्या दक्षिणया शनैः । संहारमुद्रयाऽऽत्मानं कुम्भकेन निजाणुना ॥ ६४ || विषयों की शुद्धि करनी चाहिए तथा आत्म - मन्त्रों से मोह, रूप, अभेद्य और लय की भी भावना करनी चाहिए ॥५२ ॥
शिव - मन्त्र से कानों की शुद्धि करनी चाहिए और हृद्मन्त्र से तत्त्वों का विशोधन । गर्भाधान इत्यादि में पाँच बार आहुतियाँ देनी चाहिए तथा माया मन्त्र से शिष्य के पापों का शमन करना चाहिए । इसी प्रकार कर्मादि के पाशों से मुक्त करने के लिए भी माया मन्त्रों का पाठ करना चाहिए । हृद्मन्त्र से सौ आहुतियाँ देकर आहुति देने से सभी बन्धनों से शिष्य का निस्तार हो जाता है ॥५३-५४ ॥ मल - शक्ति के निरोध से ही पाशों की विमुक्ति होती है । स्वाहा से अन्त करके आयुधमन्त्र के द्वारा पाँच - पाँच आहुतियाँ पाँच बार देनी चाहिए ॥५५ ॥ अस्त्र - मन्त्रों से सात बार पाठ करके मायादि पाश का छेदन
करना चाहिए । उसके लिए कल्पशस्त्र से तथा कर्तरी से उसका छेदन भी करना चाहिए ॥५६ ॥ ॐ हूं निवृत्तिकलापाशाय
हूं फट् ’ - इस मन्त्र से हाथों से बन्धन को हटाकर उसको वर्तुलाकार करके घृतपूर्ण स्रुव में रखना चाहिए तथा अनुकलास्त्र मन्त्र से उसे जलाकर केवलास्त्र मन्त्र से उसे भस्मसात् कर देना चाहिए । पाशाङ्कुश निवृत्ति के लिए इसी मन्त्र से पाँच आहुतियाँ देनी चाहिए ॥५७-५९ ॥ ' ॐ हः अस्त्राय हूं फट् ' - इस मन्त्र से आठ अस्त्राहुतियाँ देकर प्रायश्चित्त करना चाहिए । तदनन्तर ब्रह्मा का आवाहन करके उसका पूजन तथा तर्पण करना चाहिए और ' ॐ हां शब्दस्पर्शशुद्धब्रह्मन् गृहाण स्वाहा ’ - इस मन्त्र से तीन आहुतियाँ देकर उसके अधिकार को समर्पित करना चाहिए ॥६०-६२ ॥ उस समय आज्ञा को भी सुनाना चाहिए कि हे ब्रह्मन्! इस पशु के पाप दग्ध हो चुके हैं, अतः उसे पुनः बन्धन में मत इस शिव इसके बाद विधाता को विदा करके कुम्भक के द्वारा संहारमुद्रा से दक्षिण नाड़ी को पूरित करना डालना । चाहिए और अपने-१ क. ङ. च. मनः श ' । २ क. ङ. च. नियोजनम् । ३ क. ङ. च. ' न्तस्थपा ' । ४ क. ङ. च. चरेत् । ५ क. ङ. च. पाशशङ्कुनि । ६ क. ङ. च. हूं । ७ क. ङ. च. हुं । ८ घ. ' जात्मना । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ३२३ राहुयुक्तैकदेशेन चन्द्रबिम्बेन संनिभम् । आदाय योजयेत्सूत्रे रेचकेनोद्भवाख्यया ॥६५ ॥
पूजयित्वाऽर्घ्यपात्रस्थतोयविन्दुसुधोपमम् । आप्यायनाय शिष्यस्य गुरुः शिरसि विन्यसेत् ॥ ६६ ॥
विसृज्य पितरौ दद्याद्वौषडन्तशिवाणुना ' । पूरणाय विधिः पूर्णा निवृत्तिरिति शोधिता ॥६७ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये निर्वाणदीक्षायां निवृत्तिकलाशोधनं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥८४ ॥
अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः प्रतिष्ठाकलासंशोधनविधिः ईश्वर उवाच तत्त्वयोरथसंधानं कुर्याच्छुद्धविशुद्धयोः । ह्रस्वदीर्घप्रयोगेण नादनादान्तसङ्गिना ॥१ ॥
ॐ हां ह्रूं हाम् ॥२ ॥
अप्तेजो वायुराकाशं तन्मात्रेन्द्रियबुद्धयः । गुणत्रयमहंकारश्चतुर्विंशः पुमानिति ॥३ ॥
प्रतिष्ठायां निविष्टानि तत्त्वान्येतानि भावयेत् । पञ्चविंशतिसंख्यानि खादियान्ताक्षराणि च ॥४ ॥
पञ्चाशदधिका षष्टिर्भुवनैस्तुल्यसंज्ञिता: ' । तावन्त एव रूपाश्च विज्ञेयास्तत्र तद्यथा ॥५ ॥
आपको उस परमात्मा के साथ एकाकार करना चाहिए जो राहुग्रस्त चन्द्र - बिम्ब के समान प्रतीत होता है । उद्भव नामक मुद्रा से रेचक द्वारा उसे सूत्र से युक्त करना चाहिए ॥ ६३-६५ ॥ तदनन्तर अर्घ्यपात्र में रहनेवाले अमृतोपम जल-विन्दु की अर्चना करके गुरु को उसे शिष्य के आप्यायन के लिए सिर पर रख देना चाहिए ॥६६ ॥ तदनन्तर देवता
और देवी को विदा करके वौषट् से अन्त होनेवाले शिव - मन्त्र का पाठ करना चाहिए । इस प्रकार से निवृत्ति - विधि की शुद्धि और पूर्ति की जाती है ॥६७ ॥
श्री अग्निमहापुराण में निर्वाणदीक्षा में निवृत्तिकला - शोधन नामक चौरासीवाँ अध्याय समाप्त ॥८४ ॥
अध्याय ८५ प्रतिष्ठा - कला - शोधन - विधि भगवान् शिव बोले - ह्रस्व और दीर्घ मात्रावाले और नाद तथा घोष प्रयत्नवाले ‘ ॐ हां हूं हाम् ' इस मन्त्र का उच्चारण करके शुद्ध और अविशुद्ध निवृत्ति और प्रतिष्ठा कला को जोड़ देना चाहिए ॥१-२ ॥ तदनन्तर जल, तेज, वायु, आकाश, तन्मात्रा, इन्द्रियाँ, बुद्धि, सत्त्व, रज, तम, अहङ्कार, चौबीसवाँ पुरुष - इन पचीस तत्त्वों का ध्यान करना चाहिए, जो प्रतिष्ठा - कला में निविष्ट हैं । तत्पश्चात् ' ख ' से लेकर ' य ' तक अक्षरों, छप्पन - भुवनों १ ख. “ न्तशराणु ' । २ क. ङ. च. श्रावणाय । ३ क. ङ. च. तत्तयो ' । ४ ख. ग. ' न्तसंज्ञिना । ५ क. ख. ग. ङ च. वनास्तुल्य ' ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३२४ अग्निपुराणम् अमरेशः प्रभावश्च नैमिषः पुष्करोऽपि च । तथा ' पादिश्च दण्डिश्च भावभूतिरथाष्टमः ॥६ ॥
नकुलीशो हरिश्चन्द्रः केदारो भैरवश्चैव विमलश्चाटुहासश्च गोकर्णो भद्रकर्णाश्च सुबाहुर्मन्त्ररूपी ० च विदुरश्चैव " घोरश्च मतङ्गः पिङ्गलश्चैव श्रीशैलो दशमः स्मृतः । द्वितीयाष्टकमीरितम् । माहेन्द्रो भीम एव च । स्वर्णाक्षः स्थाणुरेव च ' । विशालो जटिलस्तथा । प्राजापत्यो हुताशनः ।
हरो वैधातृसंज्ञकः ।
अन्वीशोऽभ्रातिकेशश्च महाकालोऽथ मध्यमः ॥७ ॥
ततो गयाकुरुक्षेत्रखलानादिकनादिके ' ॥८ ॥
वस्वापदं रुद्रकोटिरवियुक्तो महाबलः ॥९ ॥
अजेशश्चैव सर्वज्ञो भास्वर: सूदनान्तरः ' ॥१० ॥
रौद्रोऽथ पिङ्गलाक्षश्च कालदंष्ट्री भवेत्ततः ॥ ११ ॥
कामरूपी तथा कालः कर्णोऽप्यथ भयानकः १ ९ ॥१२ ॥
शङ्कुकर्णो विधानश्च श्रीकण्ठश्चन्द्रशूलिना ३ सहैतेन च पर्यन्ताः कथ्यन्तेऽथ पदान्यपि ॥१३ ॥
व्यापिन् ४, ओम्रूप, ॐ प्रमथ, ॐ तेजः, ॐ ज्योतिः, ॐ पुरुष, ओमग्ने, ॐ धूम, ओमभस्म ( न् ), ॐ अनादि, ॐ नाना, ॐ धू धू, ॐ भूः, ॐ भुवः, ॐ स्वः, अनिधन विधनोद्भव शिव शर्व परमात्मन् महेश्वर महादेव सद्भावेश्वर महातेजः, भोगाधिपते " मुञ्च प्रथम सर्वसर्वेति द्वात्रिंशत्पदानि ॥१४ ॥
वी ( बी ) जभावे त्रयोमन्त्रा वामदेवः शिवः शिखा " ।
गान्धारी च सुषुम्ना च नाड्यौ द्वौ मारुतौ तथा ॥१५ ॥
समानोदाननामानौ रसना पायुरिन्द्रिये । रसस्तु विषयो रूपशब्दस्पर्शरसा गुणाः ॥ १६ ॥
का और इतनी ही संख्या में रुद्रों का ध्यान करना चाहिए ॥३-५ ॥ अमरेश, प्रभाव, नैमिष, पुष्कर, पादि, दण्डि, भावभूति, नकुलीश, हरिश्चन्द्र, श्रीशैल, अन्वीश, अभ्रातिकेश, महाकाल, मध्यम, केदार, भैरव, गया, कुरुक्षेत्र, खल, अनादिक, नादिक, विमल, अट्टहास, महेन्द्र, भीम, वस्वापद, रुद्रकोटि, अवियुक्त, महाबल, गोकर्ण, भद्रकर्ण, स्वर्णाक्ष, स्थाणु, अजेश, सर्वज्ञ, भास्वर, सूदनान्तर, सुबाहु, मन्त्ररूपी, विशाल, जटिल, रौद्र, पिङ्गलाक्ष, कालदंष्ट्री, विदुर, घोर, प्राजापत्य, हुताशन, कामरूपी, काल, कर्ण, भयानक, मतङ्ग, पिङ्गल, हर, धातृसंज्ञक, शङ्कुकर्ण, विधान, श्रीकण्ठ और चन्द्रशूली – यह रुद्रों की नामावली है । इसके पश्चात् पदों को बतलाया जा रहा है ॥६-१३ ॥ व्यापिन्, अरूपिन्, प्रमथ, तेजस्, ज्योतिः, अरूप, पुरुष, अनग्ने, अधूम, अभस्मन्, अनादे, नाना नाना, धूधू धूधू, ॐ भूः, ॐ भुवः, ॐ स्वः, अनिधन, निधन, निधनोद्भव, शिव, शर्व, परमात्मन्, महेश्वर, महादेव, सद्भाव, ईश्वर, महातेजा, योगाधिपते, मुञ्च, प्रथम, सर्व, सर्वसर्व - ये बत्तीस पद हैं ॥१४ ॥ प्रतिष्ठा कला में दो बीज और वामदेव शिव तथा
शिखा के तीन मन्त्र हैं । गान्धारी तथा सुषुम्ना नामक नाड़ियों का, समान तथा उदान नामक वायु का, जिह्वा और १ क. ङ. च. “ षः प्लक्षवोऽपि । २ क. ङ. च. तथाऽऽषाढिश्च । ३ क. ङ. च. ' तः । जलान्सौम्याति " । ४ घ. " शोऽस्त्राति " । ५ ८ ख ख.. च ग. । गयां ओजे कुरुक्षेत्रं खलोना ' । ६ क. ङ. च. ' श्चाथ होमश्च मा ' । घ. ' चाट्टहा ' । ७ क. ख. ग. ङ. च. वस्त्राप " । बहवः श्री ' । १३ घ ।. ९ चन्द्रशेखरः क. ङ. च. ' रः । स्वराहुर्मत्तरू । १० घ. ' हुर्मत्तरूं । ११ ख. विदूर । १२ क. ङ. च. “ कः । पतङ्गश्चैव २ अधूम, २ अभस्म २ । स ' । १४ क. ङ. च. ' नू, अरूप, २ प्रथम तेज ( जो ) ज्योतिः २ पुरुषः ( ष ) (? ) २ अनश्व अनादि २ नाना २ वृत्त २ ॐ भूः । १५ ख. ग. घ. योगाधिपतये । १६ ख. ' ञ्च ॐ प्र । १७ ख. ' थम, ॐ स । १८ ख. सखा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ३२५ मण्डलं वर्तुलं तच्च पुण्डरीकाङ्कितं सितम् ' । स्वप्नावस्था प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठान्तर्गतं सर्वं संचिन्त्य भुवनादिकम् कारणं गरुडध्वजम् ॥१७ ॥
ॐ । सूत्रं देहेऽथ मन्त्रेण प्रविश्यैनां वियोजयेत् ॥ १८ ॥
हां खीं प्रतिष्ठाकलापाशाय, ॐ फट् । स्वाहान्तेनानेनैव पूरकेणाङ्कुशमुद्रया ततः ॐ ह्रां ह्रूं ह्रां ह्रूं प्रतिष्ठाकलापाशाय हूं ' फडित्यनेन समाकर्षेत् । संहारमुद्रया कुम्भकेन हृदयादधो नाभिसूत्रादादाय, ॐ ह्रां हूं हां हां प्रतिष्ठाकलापाशाय नम इत्यनेनोद्भवमुद्रया रेचकेन कुम्भे समारोपयेत् । ॐ ह्रां ह्रीं प्रतिष्ठाकलापाशाय नम इत्यनेनार्चयित्वा स्वाहान्तेनाऽऽहुतीनां त्रयेण संनिधाय ततः - ॐ संतर्प्य विष्णो तवाधिकारेऽस्मिन्मुमुक्षं दीक्षयाम्यहं । ततो वागीश्वरीं देवीं वागीशमपि पूर्ववत् । ॐ हां १२ हां हं फट् प्रविशेदप्यनेनैव चैतन्यं विभजेत्ततः । ॐ ह्रां हं हों " हूं फट् " संपूज्य हां विष्णवे नम इति विष्णुमावाह्य संपूज्य ॥१९ ॥
भाव्यं त्वयाऽनुकूलेन विष्णुं विज्ञापयेदिति ॥ २० ॥
आवाह्याभ्यर्च्य संतर्प्य शिष्यं वक्षसि ताडयेत् ॥२१ ॥
॥२२ ॥
शस्त्रेण पाशसंयुक्तं ज्येष्ठयाऽङ्कुशमुद्रया ॥२३ ॥
॥२४ ॥
पायु नामक इन्द्रियों का, रस, विषय तथा रूप, शब्द, स्पर्श और रस नामक गुणों का, कमल से अंकित, स्वच्छ और वर्तुलाकार मण्डल का, स्वप्नावस्था का तथा कारणभूत गरुड़ध्वज भगवान् का ध्यान करना चाहिए ॥१५-१७ ॥ तदनन्तर शिष्यदेह में सूत्र संयोजन कर प्रतिष्ठा कला के अन्तर्गत समस्त भुवन आदि का वियोजन ' ॐ हां खीं हां प्रतिष्ठाकलापाशाय ॐ फट् स्वाहा ' इस मन्त्र से शरीर पर उसे धारण करना चाहिए । पुनः इसी मन्त्र को पढ़कर पूरक प्राणायाम तथा अंकुश मुद्रा करके वायु को ऊपर खींचना चाहिए । तत्पश्चात् ' ॐ हां हूं ह्रां हूं प्रतिष्ठाकलापाशाय हूं फट् मन्त्र को पढ़कर कुम्भक प्राणायाम तथा संहार मुद्रा करके सूत्र को हृदय से नीचे नाभि तक ले जाकर डाल लेना चाहिए और ' ॐ हां हूं हां हां प्रतिष्ठाकलापाशाय नमः ' मन्त्र को पढ़कर रेचक- -प्राणायाम तथा उद्भव - मुद्रा के द्वारा सूत्र को घट के ऊपर स्थापित कर दे । तत्पश्चात् ' ॐ हां ह्रीं प्रतिष्ठाकलापाशाय नमः ' मन्त्र से कलश की पूजा करके इसी मन्त्र में ' स्वाहा ' शब्द जोड़कर तीन बार आहुतियाँ डाले । अनन्तर ‘ ॐ हां विष्णवे नम: ' इस मन्त्र से विष्णु का आवाहन, पूजन तथा तर्पण करके यह प्रार्थना करे ॥१८-१९ ॥ हे विष्णो! आपके इस अधिकार में मैं मोक्षाभिलाषी जन को दीक्षा देता हूँ । आप इसमें अनुकूलता प्रदान करें ॥२० ॥ तदनन्तर वागीश्वरी
देवी तथा वागीश का भी पूर्ववत् आवाहन, पूजन, तर्पण करके ' ॐ हां हां हं फट् ' मन्त्र से शिष्य के हृदय पर ताड़न करे और इसी मन्त्र से प्रवेश भी करे ( अर्थात् इस मन्त्र को पढ़ते हुए भावना भी करे कि मैं शिष्य के अन्तःकरण में प्रविष्ट हूँ ) ॥२१-२२३ ॥ इसके बाद उस सूत्र में शस्त्र - मन्त्र से पाश - युक्त चैतन्य का विभाग कर ज्येष्ठा अंकुशमुद्रा १ क. ख. ग. ङ. च. शितम् । २ घ. देहे स्वम ' । ३ क. ङ. च. खां । ४ क. ङ. च. हुं । ५ क. ङ. च. हां हूं क्लीं हां हूं प्र ' । ख. हां हुं हूं प्र ' । ६ क. ङ. च. हुं । ७ घ. नाडीसू । ८ क. ङ. च. हूं । ९ क. ख. ग. घ. ङ. च. हां प्र । १० क. ख. ग. ङ. च. हरां । ११ के. ख. ग. ङ. च. ' नार्धयि । १२ क. ङ. च. हां हं हां हः फ । १३ क. ङ. च. हं हां हूं फ । १४ ख. हां । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३२६ अग्निपुराणम् स्वाहान्तेन हृदाऽऽकृष्य तेनैव पुटितात्मना । ॐ हां ही होमात्मने नमः पूर्ववत्पितृसंयोगं भावयित्वोद्भवाख्यया । ॐ हां हं हामात्मने नमः देहोत्पत्तौ हृदा ह्येवं शिरसा जन्मना तथा । तत्त्वशुद्ध हृदा ह्येवं गर्भाधानाय पूर्ववत् । एवं पाशवियोगेऽपि ततः शस्त्रात्मजप्तया । ॐ ह्रीँ ' प्रतिष्ठाकलापाशाय ह: ' फट् विसृज्य वर्तुलीकृत्य पाशमस्त्रेण पूर्ववत् । अस्त्रेण जुहुत्यात्पञ्च पाशाङ्कुशनिवृत्तये । ॐ हः, अस्त्राय १२ हूं १३ फट् हृदाऽऽवाह्य हृषीकेशं कृत्वा पूजनतर्पणे ॐ हां रसशुल्कं गृहाण स्वाहा गृहीत्वा तं नमोन्तेन निजात्मनि नियोजयेत् ॥ २५ ॥
॥२६ ॥
वामया तदनेनैव देवीगर्भे विनिक्षिपेत् ॥ २७ ॥
॥२८ ॥
शिखया वाऽधिकाराय भोगाय कवचाणुना ॥ २ ९ ॥ शिरसा पाशशैथिल्ये छिन्द्यादस्त्रेण कर्तर्या घृतपूर्णे स्रुवे दत्त्वा प्रायश्चित्तनिषेधार्थं ॥ पूर्वोक्तविधिना निष्कृत्यैवं शतं जपेत् ॥ ३० ॥
कला बीजवता यथा ॥ ३१ ॥
॥३२ ॥
कलास्त्रेणैव होमयेत् ॥ ३३ ॥
दद्यादष्टाऽऽहुतिस्ततः ११ ॥ ३४ ॥
॥३५ ॥
कुर्यादधिकारसमर्पणम् ॥ ३६ ॥
॥३७ ॥
के द्वारा ‘ ॐ हां हं हों हूं फट् स्वाहा ' मन्त्र से सूत्र को हृदय से खींचकर ' ॐ हां हं होमात्मने नमः ' मन्त्र से अपनी आत्मा में उसका नियोग करे ॥२३-२५ ॥ तत्पश्चात् पहले की भाँति उद्भव - मुद्रा से उसका पितृसंयोग करके ‘ ॐ हां हं होमात्मने नमः ' मन्त्र को पढ़कर वामा मुद्रा से देवी ( वागीश्वरी ) के गर्भ में उसका प्रक्षेप करे ॥२६-२७ ॥ साथ ही ‘ ॐ हां हं हामात्मने नम: ' इस मन्त्र का उच्चारण करे । देह की उत्पत्ति को जाने पर उसके अधिकार तथा भोग की रक्षा के लिए हृदय, शिर, जन्म, शिखा तथा कवच के मन्त्र से उसका संस्कार करना चाहिए ॥ २८-२ ९ ॥ तदनन्तर उसके अङ्गभूत तत्त्व की शुद्धि हृदय - मन्त्र से सम्पन्न करके पहले की भाँति गर्भाधान करना चाहिए । फिर सांसारिक बन्धनों को शिथिल करने के लिए सौ बार शिरोमन्त्र का जप करके पाश - वियोग होने पर शस्त्र मन्त्र का जप करे । तत्पश्चात् ‘ ॐ ह्रीं प्रतिष्ठाकलापाशाय हः फट् कला - मन्त्र से सूत्र को चाकू से काट दे । उस कठे हुए सूत्र का पाशमन्त्र से गुट्ठल बनाकर घृतपूर्ण स्रुव के ऊपर रखकर कलामन्त्र से हवन करे ॥३०-३३ ॥ पाश तथा अंकुश की निवृत्ति के लिए ‘ ॐ हं अस्त्राय हूं फट् ' इस अस्त्र - मन्त्र से पाँच आहुतियाँ डालकर प्रायश्चित्त का निवारण करने के लिए इसी मन्त्र से आहुतियाँ डाले ।३४ ॥ ' ॐ हः, अस्त्राय हुं फट् ' इस अस्त्र - मन्त्र से आहुति डाले । तदनन्तर हृदय - मन्त्र से हृषीकेश का आवाहन करके पूजन, तर्पण करे और ' ॐ हां रसशुल्कं गृहाण - स्वाहा ' इस मन्त्र को पढ़कर पूर्वोक्त विधि से अधिकार समर्पण करे ॥३५-३७ ॥ पश्चात् - ' हे हरे! इस पशु का पाश निःशेष १. ख. ' हीत्वाऽन्तर्नमो । २ क. ङ. च. हं हामा ' । ३ क. ङ. ' मपादतलेनै । ४ ख. देवो ' ग । ५ क. ख. ग. ङ. च ०. । जन्मने । ६ क. ङ. च. ' ना । नवशु । ख. ग. ना । बलशु । ७ क. ङ. च. यजेत् । ८ क. ङ. च. क्लीं । ९ ङ. च. हः । वि १० ख. ग. घ. ' कुरनि । Sankra & Sanghiya च. igitize Sanlon क फ । १३ ख. हुं ।