अग्नि पुराण — पृष्ठ 331–340

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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षडशीतितमोऽध्यायः ३२७ निःशेषदग्धपाशस्य पशोरस्य हरे त्वया । न स्थेयं बन्धकत्वेन शिवाज्ञां ततो विसृज्य गोविन्दं विद्यात्मानं श्रावयेदिति ॥ ३८ ॥

नियोज्य ' च । राहुमुक्तार्धदृश्येन चन्द्रबिम्बेन संनिभम् ॥३९ ॥

संहारमुद्रा स्वस्थं विधायोद्भवमुद्रया । सूत्रे संयोज्य विन्यस्य तोयविन्दुं यथा पुरा

विसृज्य पितरौ वह्नेः पूजितौ कुसुमादिभिः । दद्यात्पूर्णां ॥ ४० ॥

विधानेन प्रतिष्ठाऽपि विशोधिता ॥४१ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये निर्वाणदीक्षायां प्रतिष्ठाकलासंशोधनविधिकथनं नाम पञ्चाशीतितमोध्यायः ॥ ८५ ॥

अथ षडशीतितमोऽध्यायः विद्यासंशोधनविधिः ईश्वर उवाच संधानमथ विद्यायाः प्राचीनकलया सह । कुर्वीत पूर्ववत्कृत्वा तत्त्वं वर्णय तद्यथा ॥१ ॥

ॐ ४ हों क्षीमिति संधानम् ' ॥२ ॥

रागश्च शुद्धविद्या च नियतिः कलया सह । कालो माया तथाऽविद्या तत्त्वानामिति सप्तकम् ॥३ ॥

होकर जल गया है । अतः आप इसको बन्धन में नहीं डालेंगे ' - यह शिव की आज्ञा सुनकर गोविन्द का विसर्जन करे और संहार मुद्रा से आत्मा का इस प्रकार नियोग करे कि मानो राहु से छोड़ा हुआ आधा दिखायी देनेवाला चन्द्रविन्दु हो ॥३८-३९ ॥ फिर उद्भव - मुद्रा से जलविन्दु की तरह आत्मा को सूत्र के साथ संयुक्त करके पुष्पादि से पूजित वागीश्वरी देवी और वागीश्वर देवता का विसर्जन करे । अन्त में विधिपूर्वक पूर्णाहुति प्रदान करे । इस प्रकार प्रतिष्ठा-कला का भी शोधन सम्पन्न होता है ॥४०-४१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में निर्वाण दीक्षा में प्रतिष्ठा - कला संशोधन - विधि वर्णन नामक पचासीवाँ अध्याय समाप्त ॥ ८५ ॥

अध्याय ८६ विद्यासंशोधनविधि महेश्वर बोले - ‘ ॐ हों क्षीम् ' इस मन्त्र से प्रतिष्ठा - कला के साथ विद्या - कला का संधान पहले की ही भाँति करना चाहिए । अब मैं विद्या - कला के तत्त्व, वर्ण आदि बतला रहा हूँ । राग, शुद्धविद्या, नियति, कला, काल, माया तथा अविद्या - ये सात तत्त्व हैं । विद्या के छह वर्ण हैं- र, ल, व, श, ष, स । इसके प्रणव आदि पदों की संख्या इक्कीस १ ख. ग. घ. च । बाहु ' । २ ख. ग. ' यविद्धं य ' । ३ क. ङ. च. तद्वद्वर्णोदितं यथा । ४ क. च. ॐ हां क्लीं हूं हां संधाने । रोग ° । ङ. ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रां संधाने । रोग ' । ५ ख. ग. ' म् । योग । ६ क. ख. ङ. च. ‘ गश्चाशु ” । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 332

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३२८ अग्निपुराणम् रलवाः शषसा वर्णाः षड्विद्यायां प्रकीर्तिताः । पदानि प्रणवादीनि एकविंशतिसंख्यया ॥४ || ४ || ॥ ॐ नमः शिवाय सर्वप्रभवे ' शिवायेशानमूर्धाय तत्पुरुषवक्त्रायाघोरहृदयाय वामदेवगुह्याय सद्योजातमूर्तय ॐ नमो नमो गुह्यातिगुह्याय गोप्त्रेऽनिधनाय सर्वाधिपाय ' ज्योतीरूपाय परमेश्वराय भावेन, ॐ व्योम

ॐ रुद्राणां भुवनानां च स्वरूपमथ कथ्यते ।

वज्रदेहः प्रभुता क्रमविक्रमसुप्रभाः ॥

शिवश्च सशिवो बभ्रुरक्षयः शंभुरेव च । मनोन्मनो महावीर्यश्चित्राङ्गस्तदनन्तरम् । मन्त्रौ ' घोरामरौ बीजे नाड्यौ द्वे तत्र ते यथा । विषयो रूपमेवैकमिन्द्रिये पादचक्षुषी । अवस्थाऽत्र सुषुप्तिश्च रुद्रो देवस्तु कारणम् । ताडनं छेदनं तत्र प्रवेशं चापि योजनम् । आत्मन्यारोप्य संगृह्य कलां कुण्डे निवेशयेत् । कुर्वीत देहसंपत्तिं जन्माधिकारमेव च । निःशेषमलकर्मादिपाशबन्धनिवृत्तये । 11411 प्रथमो वामदेवः स्यात्ततः सर्वभवोद्भवः ॥६ ॥

वटुः प्रशान्तनामा च परमाक्षरसंज्ञकः ॥७ ॥

अदृष्टरूपनामानौ तथाऽन्यो रूपवर्धनः ॥ ८ ॥

कल्याण इति विज्ञेयाः पञ्चविंशतिसंख्यया ॥ ९ ॥

पूर्वा च हस्तिजिह्वा च व्याननागौ प्रभञ्जनौ ॥१० ॥

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च त्रय एते गुणाः स्मृताः ॥११ ॥

विद्यामध्यगतं सर्वं भावयेद्भुवनादिकम् ॥१२ ॥

आकृष्य ग्रहणं कुर्याद्विद्यया ' हृत्प्रदेशतः ॥ १३ ॥

वामया योजयेद्योनौ गृहीत्वा द्वादशान्ततः ॥१४ ॥

भोगं लयं तथा स्त्रोतः शुद्धिस्तत्त्वविशोधनम् ॥१५ ॥

निष्कृत्यैव विधानेन यजेत शतमाहुतीः ॥१६ ॥

है, जो ये हैं - ॐ नमः शिवाय, सर्वप्रभवे, शिवाय, ईशानमूर्ध्वे, तत्पुरुषवक्त्राय, अघोरहृदयाय, वामदेवगुह्याय, सद्योजातमूर्तये, ॐ नमः नमः गुह्यातिगुह्याय, गोप्त्रे, अनिधनाय, सर्वभोगाधिकृताय, सर्वयोगाधिपाय, ज्योतिरूपाय, परमेश्वराय, अचेतन - अचेतन, व्योमन् - व्योमन् ॥१-५ ॥ अब रुद्रों का तथा भुवनों का स्वरूप वर्णन करता हूँ । उनका प्रथम नाम है - वामदेव । उसके बाद सर्वभवोद्भव, वज्रदेह, प्रभु, धाता, क्रम, विक्रम, सुप्रभ, वटु, प्रशान्त, परमाक्षर, शिव, सशिव ( कल्याणयुक्त ), बभ्रु, अक्षय, शम्भु, अदृष्टरूप, अदृष्टनाम, रूपवर्धन, मनोन्मन, महावीर्य, चित्राङ्ग तथा कल्याण - ये पचीस नाम हैं ॥ ६ - ९ ॥ बीज मन्त्र दो हैं - घोर और अमर बीज, दो नाड़ियाँ हैं - पूर्वा और हस्तजिह्वा वायु दो हैं - व्यान और प्रभंजन । विषय एक ही है । रूप, इन्द्रियाँ दो हैं - चरण और नेत्र । गुण तीन हैं - शब्द, स्पर्श और रूप ॥१०-११ ॥ इसकी अवस्था है सुषुप्ति और कारण हैं रुद्र - देवता । ( गुरु को ) विद्या के मध्य में भुवन आदि सकल पदार्थों का चिन्तन करना चाहिए ॥१२ ॥ फिर वहाँ ताड़न, छेदन, प्रवेश तथा योजन करके विद्या के द्वारा ( शिष्य

के ) हृदय - प्रदेश से खींचकर ग्रहण करना चाहिए ॥१३ ॥ तत्पश्चात् कला को आत्मा में आरोपित तथा गृहीत करके

कुण्ड में प्रविष्ट कर दे । तदनन्तर द्वादशान्त से लेकर वामा मुद्रा से योनि में नियुक्त करे ।१४ ॥ तत्पश्चात् पाश-बन्धन से छुटकारा पाने के लिए देहसम्पत्ति, जन्माधिकार, भोग, लय, स्रोतः - शुद्धि, तत्त्वविशोधन और मलनिराकरण आदि कार्य करे । इस प्रकार निस्तार के लिए विधिपूर्वक सौ आहुतियाँ डालकर अस्त्र - मन्त्र से पाठ की शिथिलता, १ घ. ' वे हं शि । २ क. ङ. च. सर्वविद्याधि ' । ३ क. ङ. च. ' रायाचिन्तनाय । रुद्राय भु । ४ ख. ' मपि क । ५ क. ङ. च. । ' प्रजाः । व ' । ६ ख. ग. घ. ङ. च. मन्त्रौ । ७ ख. ग. तथा । ८ क ङ. च ' द्विक्षेपाद्धृत्प्रवेश ” ॥ ९ क. ङ. च. कलाकु ' । ख. ग. कल्पकु ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 333

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सप्ताशीतितमोऽध्यायः अस्त्रेण पाशशैथिल्यं मलशक्तितिरोहितम् । छेदनं मर्दनं तेषां दाहं तदक्षराभावं प्रायश्चित्तमथोदितम् । रुद्राण्यावाहनं पूजा ॐ ह्रीं रूपगन्धौ शुल्कं रुद्र गृहाण स्वाहा संश्राव्य शाम्भवीमाज्ञां रुद्रं विसृज्य कारणम् । विधायाऽऽत्मनि चैतन्यं विन्दुं शिरसि विन्यस्य विसृजेत्पितरौ ततः । दद्यात्पूर्णां विधानेन ३२ ९ वर्तुलीकरणं तथा ॥ १७ ॥

रूपगन्धसमर्पणम् ॥१८ ॥

॥१९ ॥

पाशसूत्रे निवेशयेत् ॥२० ॥

समस्तविधिपूरणीम् ॥२१ ॥

पूर्वोक्तविधिना कार्यं विद्यायां ताडनादिकम् । स्वबीजं तु विशेष: ' स्यादिति विद्या विशोधिता ॥२२ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये निर्वाणदीक्षायां विद्याशोधनं नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥८६ ॥

अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः शान्तिशोधनम् ईश्वर उवाच संदध्यादधुना विद्यां शान्त्या सार्धं यथाविधि । शान्तौ तन्तुद्वयं लीनं भावेश्वरसदाशिवौ ॥१ ॥

हकारश्च क्षकारश्च द्वौ वर्णौ परिकीर्तितौ । रुद्राः समाननामानो भुवनैः सह तद्यथा ॥२ ॥

मलशक्ति का तिरोधान, छेदन, मर्दन, वर्तुलीकरण, दाह, अक्षराभाव तथा प्रायश्चित्त करे ॥१५-१७३ ॥ तदनन्तर रुद्राणी का आवाहन करके ‘ ॐ ह्रीं रूपगन्धौ शुल्कं रुद्र गृहाण स्वाहा ' इस मन्त्र से रूप, गन्ध आदि वस्तु समर्पित करे । फिर शिव की आज्ञा सुनाकर कारणरूप रुद्र का विसर्जन करे । तत्पश्चात् आत्मा में चेतनता का ध्यान करके पाश-सूत्र में उसे आरोपित करे ॥१८-२० ॥ सिर पर विन्दु का न्यास करके वागीश्वरी और वागीश्वर का विसर्जन करे । तदनन्तर विधानपूर्वक सकल विधियों को पूर्ण करनेवाली पूर्णा दक्षिणा देनी चाहिए || २१ || फिर पूर्वोक्त विधि से विद्या में ताड़न आदि करना चाहिए । पूर्वोक्त विधि से इसमें इतनी विशेषता यह है कि यहाँ पर अपने ( विद्या ) बीज

मन्त्र का उपयोग करना चाहिए । इस प्रकार विद्या - कला की शुद्धि की जाती है ॥२२ ॥

श्री अग्निमहापुराण में निर्वाणदीक्षा - विद्या - संशोधन नामक छियासीवाँ अध्याय समाप्त ॥८६ ॥

अध्याय ८७ शान्ति - शोधन महेश्वर बोले -- अब शान्ति - कला के साथ विधिपूर्वक विद्या - कला का सन्निधान करना चाहिए । शान्ति में ईश्वर और सदाशिव - ये दो तत्त्व विद्यमान रहते हैं ॥१ ॥ इसमें हकार और क्षकार वर्ण तथा समान नामवाले रुद्र और भुवन

ये हैं - प्रभव, समय, क्षुद्र, विमल, शिव, धन, निरञ्जन, अङ्गार, सुशिरस्, दीप्त, कारण, त्रिदशेश्वर, कालसूक्ष्म और १ घ. ' रोहिताम् । २ क. ङ. च. ' दङ्गनाभा ' । ३ क. ङ. च. हां । ४ क. ख. ग. ङ. च. विशेषं । ५ क. ङ. च. तत्त्वत्रयं नीलं भा । ६ ख. ग. नीलं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 334

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३३० अग्निपुराणम् प्रभवः समयः क्षुद्रो विमलः शिव इत्यपि त्रिदशेश्वरनामा च त्रिदशः कालसंज्ञकः व्योमव्यापिने व्योमव्याप्यरूपाय सर्वव्यापिने योगपीठसंस्थिताय नित्ययोगिने ध्यानाहारायेति पुरुषः कवचोमन्त्रो बीजे विन्दूपकारकौ इन्द्रिये त्वक्करावस्याः स्पर्शस्तु विषयो मतः तुर्यावस्थितिशान्तिस्थं ' संभाव्य भुवनादिकम् आकृष्य ग्रहणं कुर्याच्छान्तेर्वदनसूत्रतः ईश तवाधिकारेऽस्मिन्मुमुक्षं दीक्षयाम्यहम् आवाहनादिकं पित्रोः शिष्यस्य ताडनादिकम् पूर्ववत्पितृसंयोगं भावयित्वोद्भवाख्यया देहोत्पत्तौ हृदा पञ्च शिरसा जन्महेतवे लयाय शस्त्रमन्त्रेण स्त्रोतः शुद्धौ शिवेन च । घनौ ' निरञ्जनाकारौ श्वशुरौ दीप्तकारणौ ॥३ ॥

। सूक्ष्माम्बुजेश्वरश्चेति रुद्राः शान्तौ प्रतिष्ठिताः ॥४ ॥

शिवायानन्ता ' यानाथायानाश्रिताय ध्रुवाय शाश्वताय द्वादशपदानि 11411 । अलम्बुषायसानाड्यौ वायूकृकरकूर्मकौ ॥६ ॥

। गुणौ स्पर्शनिनादौ द्वावेकः कारणमीश्वरः ॥७ ॥

। विदध्यात्ताडनं भेदं प्रवेशं च वियोजनम् ॥ ८ ॥

। आत्मन्यारोप्य संगृह्य ' कलां कुण्डे निवेशयेत् ॥९ ॥

। भाव्यं त्वयाऽनुकूलेन कुर्याद्विज्ञापनामिति ॥ ॥१० १० ॥ ॥ । विधायाऽऽदाय चैतन्यं विधिनाऽऽत्मनि योजयेत् ॥ ११ ॥

। हृत्संपुटात्मबीजेन देवीगर्भे नियोजयेत् ॥१२ ॥

। शिखया " वाऽधिकाराय भोगाय कवचाणुना ॥१३ ॥

। तत्त्वशुद्धौ हृदा ह्येवं गर्भाधानादि पूर्ववत् ॥ १४ ॥

अम्बुजेश्वर । शान्ति - कला में निम्न बारह पद विद्यमान हैं- व्योमव्याप्यरूपाय, सर्वव्यापिने, शिवाय, अन्ताय, अनाथाय, अनाश्रिताय, ध्रुवाय, शाश्वताय, योगपीठसंस्थिताय, नित्ययोगिने तथा ध्यानाहाराय । पुरुष और कवच में दो बीज मन्त्र हैं - विन्दु और पकार वर्ण हैं ॥२-५३ ॥ इसकी अलम्बुषा और अयसा नाड़ियाँ, कृकर और कूर्मक नामक वायु हैं । दो इन्द्रियाँ मानी गयी हैं - त्वचा और हाथ, जिनका विषय स्पर्श माना गया है । स्पर्श और निनाद नामक दो गुण हैं । इसका कारण ईश्वर है और तुर्यावस्था शान्ति - कला की अवस्था है । इस प्रकार शान्ति - कला में विद्यमान भुवनादि का ताड़न, भेद, प्रवेश और वियोजन करना चाहिए ॥६-८ ॥ गुरु को शान्ति में प्रवेश करके वदन सूत्र से आत्मा को खींचकर अपने-आप में आरोप और संग्रह करके कला को कुण्ड में निवेशित करना चाहिए । उस समय उसे इस प्रकार निवेदन करना चाहिए - ‘ हे ईश! आपके अधिकार में मैं इस मुमुक्षु को दीक्षित कर रहा हूँ । ' आपको इसके अनुकूल होना चाहिए ॥९-१० ॥ उसे माता और पिता ( रूपी देवी और देवता ) का आवाहन करके, शिष्य का ताड़नादि करके विधिपूर्वक चैतन्य को ग्रहण करके उसे अपने - आप में विनियुक्त करना चाहिए ॥११ ॥ पूर्ववत् उद्भव नाम्नी मुद्रा से पितृसंयोग की कल्पना

करके हृत् सम्पुट मन्त्र युक्त आत्मबीज से देवी के गर्भ में नियोजित करना चाहिए ॥१२ ॥ शरीर की उत्पत्ति में हृद्-मन्त्र और जन्म के लिए पाँच बार शिरस् - मन्त्र, अधिकार के लिए शिखा - मन्त्र और भोग के लिए कवच - मन्त्र हुआ

करता है ॥१३ ॥ लय के लिए शस्त्र मन्त्र और स्रोतः शुद्धि शिव मन्त्र से की जाती है । तत्त्व - शुद्धि हृद्मन्त्र से होती

है और गर्भाधानादि पूर्ववत् किये जाते हैं || १४ || कवच - मन्त्र से पाश को शिथिल करके सौ आहुतियाँ देनी चाहिए १ ख. ग. घनौ । २ क. ङ. च. ' ताः । व्या ' । ३ क. ' वायानाथा ' । ङ. ' वायानाश्रि ' । च. वाय स्वनाथा ' । ४ क. ङ. च. क्रूराय । ५ घ. कवचौ । ६ क. ङ. च. ' णौ चात्र नि ' । ७ ख. ग. शान्त्यर्थे सं ० । ८ ङ. च. नियोजयेत् । ९ क. ङ. च. संपूज्य । १० क. ङ. च. ईशे । ११ क. ङ. च. ' या चाधि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 335

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सप्ताशीतितमोऽध्यायः वर्मणा पाशशैथिल्यं निष्कृत्यैवं शतं यजेत् एवं पाशवियोगेऽपि ततः सप्तास्त्रजप्तया ॐ ह्रौं शान्तिकलापाशाय हः ३ हूं फट् विसृज्य वर्तुलीकृत्य पाशमस्त्रेण पूर्ववत् अस्त्रेण जुहुयात्पञ्च पाशाङ्कुशनिवृत्तये ॐ हः, अस्त्राय ' हूं फट् हृदेश्वरं समावाह्य कृत्वा पूजनतर्पणे । ॐ हामीश्वर बुद्ध्यहंकारौ शुल्कं गृहाण स्वाहा निःशेषदग्धपाशस्य पशोरस्येश्वर त्वया ॥ मलशक्तितिरोधाने । छिन्द्यादस्त्रेण कर्तर्या । घृतपूर्णे स्स्रुवे दत्त्वा । प्रायश्चित्तनिषेधाय विदधीत विधानेन न स्थेयं बन्धकत्वेन ३३१ शस्त्रेणाऽऽहुतिपञ्चकम् ॥ १५ ॥

पाशान्बीजवता यथा ॥ १६ ॥

॥१७ ॥

कलास्त्रेणैव होमयेत् ॥१८ ॥

दद्यादष्टाऽऽहुतीरथ ॥१९ ॥

॥२० ॥

तस्मै शुल्कसमर्पणम् ॥ २१ ॥

॥२२ ॥

शिवाज्ञां श्रावयेदिति ॥२३ ॥

विसृजेदीश्वरं देवं रौद्रात्मानं नियोजयेत् । ईशश्चन्द्रमिवाऽऽत्मानं विधिनाऽऽत्मनि योजयेत् || २४ || संयोजयेदेनं शुद्धयोद्भवमुद्रया ॥ दद्यान्मूलेन शिष्यस्य शिरस्यमृतविन्दुकम् ' ॥२५ ॥

विसृज्य पितरौ वह्नेः पूजितौ कुसुमादिभिः । दद्यात्पूर्णां विधानज्ञो निःशेषविधिपूरणीम् ॥ २६ ॥

अस्यामपि विधातव्यं पूर्ववत्ताडनादिकम् । स्वबीजं तु विशेषः स्याच्छुद्धिः शान्तेरपीडिता ॥ २७ ॥

इत्याग्नेये महापुराणे निर्वाणदीक्षायां शान्तिशोधनं नाम सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥८७ ॥

और मल - शक्ति को दूर करने के लिए शस्त्र - मन्त्र से पाँच आहुतियाँ देनी चाहिए ॥ १५ ॥ इसी प्रकार पाश के विमोचन

में सात बार अस्त्र - मन्त्र का जप करना चाहिए और बीज युक्त अस्त्र - मन्त्र से पाशों का छेदन करना चाहिए ।१६ ॥ उस समय ‘ ॐ हौं शान्तिकलापाशाय हः, हूं फट् ' इस मन्त्र का पाठ करना चाहिए ॥ १७ ॥ पूर्ववत् अस्त्र - मन्त्र से पाश को

वर्तुलाकार करके उसे छुड़ाकर घृतपूर्ण स्रुव को लेकर अस्त्र - मन्त्र से होम करना चाहिए ।१८ ॥ पाशाङ्कुश की निवृत्ति के लिए अस्त्र - मन्त्र से पाँच आहुतियाँ डालनी चाहिए और प्रायश्चित्त का निषेध करने के लिए आठ आहुतियाँ देनी चाहिए । उस समय ‘ ॐ हः अस्त्राय हूं फट् ' यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ॥१९ -२० ॥ हृदेश्वर का आवाहन करके तथा उसका पूजन, तर्पण करके विधानपूर्वक दक्षिणा देनी चाहिए ॥ २१ ॥ उस समय ' ॐ हामीश्वर बुद्ध्यहंकारौ शुल्कं गृहाण स्वाहा ' यह मन्त्र

पढ़ना चाहिए ॥२२ ॥ उस समय इस शिवाज्ञा को सुनना चाहिए- “ ईश्वर! जिसके समस्त पाश दग्ध हो गये हैं, उसे इस

पशु के बन्धन के रूप में तुम्हें नहीं रहना चाहिए || २३ || तदनन्तर इन देवता को विदा करके रुद्र का विनियोग करना चाहिए और अपने - आप में ईश और चन्द्रमा की तरह योग कराना चाहिए ॥२४ ॥ तदनन्तर शुद्ध उद्भव मुद्रा से इसे सूत्र से संयुक्त

करके मूल मन्त्र से शिष्य के मस्तक पर अमृतविन्दु डालना चाहिए ॥ २५ ॥ पुष्पादि से पूजित माता - पिता रूप दोनों देवताओं

को विदा करके विधान को जाननेवाले गुरु को विशेष विधि की पूर्ति के लिए पूर्णाहुति देनी चाहिए ॥२६ ॥ इसमें भी पूर्ववत्

ताड़न इत्यादि का विधान करना चाहिए । यहाँ पर भी पूर्वोक्त विधि से इतनी ही विशेषता आती है कि यहाँ विधि में शान्ति कला के बीज का विनियोग किया जाय । इस प्रकार शान्तिकला की शुद्धि पूरी होती है ॥२७ ॥

श्री अग्निमहापुराण में निर्वाण - दीक्षा - शान्ति - शोधन वर्णन नामक सत्तासीवाँ अध्याय समाप्त ॥८७ ॥

१ घ. जपेत् । २ क. ङ. च. हूं । ३ क. ङ. च. हाः । ४ ख. ' मन्त्रेण । ५ ख. हूं । ६ क. ङ. च. ' तपिण्डक ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 336

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३३२ अग्निपुराणम् अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः निर्वाणदीक्षाशेषविधिः ईश्वर उवाच संधानं शान्त्यतीतायाः शान्त्या सार्धं विशुद्धया । कुर्वीत पूर्ववत्तत्र तत्त्ववर्णादि तद्यथा ॥ | १ || ॐ ह्रीं क्षौं हौं हामिति संधानानि ॥२ ॥

उभौ शक्तिशिवौ तत्त्वे भुवनाष्टकसिद्धिकम् । दीपकं रोचिकं चैव मोचकं चोर्ध्वगामि च || ३ || व्योमरूपमनाथं च स्यादनाश्रितमष्टकम् । ॐ कारपदमीशाने मन्त्रो वर्णाश्च षोडश || ४ || अकरादिविसर्गान्ता बीजेन देहकारकौ ॥ कुहूश्च शङ्खिनी नाड्यौ देवदत्तधनंजय ॥ ५ ॥

मारुतौ ” स्पर्शनं श्रोत्रमिन्द्रिये विषयो नभः । शब्दो गुणोऽस्यावस्था तु तुर्यातीता तु पञ्चमी ॥ ६ ॥

हेतुः सदाशिवो देव इति तत्त्वादिसंचयम् । संचिन्त्य शान्त्यतीताख्यं विदध्यात्ताडनादिकम् ॥७ ॥

कलापाशं समाताड्य फडन्तेन विभिद्य च । प्रविश्यान्तर्नमोन्तेन फडन्तेन ' वियोजयेत् ॥८ ॥

अध्याय ८८ निर्वाणदीक्षाविधि महेश्वर बोले - विशुद्ध शान्ति के साथ शान्त्यतीत कला को जोड़ते हुए पहले की विधि का अनुसरण करे । शान्त्यतीत कला में तत्त्व, वर्ण आदि बताये जाते हैं । शान्ति कला को मिलाने का मन्त्र यह है- ' ॐ ह्रीं क्षौं हौं हाम् ' इसमें शक्ति और शिव - ये दो तत्त्व हैं । दीपक, रोचिक, मोचक, ऊर्ध्वगामि, व्योमरूप, अनाथ, अनाश्रित और ॐकार पद - ये आठ सिद्धि के भुवन हैं और ईशान मन्त्र है । अकार से लेकर विसर्गपर्यन्त सोलह वर्ण हैं ॥ १-४ ॥ अकार से लेकर विसर्गपर्यन्त सोलह अक्षर हैं, नाद और हकार बीज हैं । कुहू और शङ्खिनी नामक दो नाड़ियाँ हैं । देवदत्त और धनञ्जय नामक दो वायु हैं ॥५ ॥ त्वचा और श्रोत्र दो इन्द्रियाँ हैं, शब्द विषय है, गुण भी वही है और अवस्था

पाँचवीं तुरीयातीता है । सदाशिव देव ही एकमात्र हेतु है । इस तत्त्वादि संचय की शान्त्यतीत कला में स्थिति है, ऐसा चिन्तन कर ताड़न आदि कर्म करे ॥६-७ ॥ कलापाश के ताड़न करने के बाद अन्त में ' फट् ' से अन्त होनेवाले मन्त्र से उसे काट दे । पश्चात् ' नमः ' जुड़े हुए मन्त्र से भीतर प्रवेश करके ' फट् ' से अन्त होनेवाले मन्त्र से उसे वियुक्त कर दे ॥८ ॥ शिखा और हृद् - मन्त्र से सम्पुटित और अन्त में स्वाहा शब्द से युक्त शान्ति मन्त्र पढ़कर अङ्कुश मुद्रा

१ क. च. ‘ वर्णोदितं य ' । २ क. ङ. च. हां । ख. ह्रीं । ३ क. ङ. च. ' कमिश्रितम् । ४ क. च. रौचकं । ५ क. ङ. च, ज्ञानं म ' । ६ क. ख. ङ. च. नाथौ । ७ मारुतौ पञ्चमी नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । ८ क. ङ. च. ' तायां वि । ९ क. ङ. च. न ' नियो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 337

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अष्टाशीतितमोऽध्यायः शिखाहृत्संपुटीभूतं स्वाहान्तं सृणिमुद्रया कुम्भकेन समादाय रेचकेनोद्भवाख्यया अस्याः पूजादिकं सर्वं निवृत्तेरिव साधयेत् सदाऽऽख्यातेऽधिकारेऽस्मिन्मुमुक्षं दीक्षयाम्यहम् पित्रोरावाहनं ३३३ । पूरकेण समाकृष्य पाशं मस्तकसूत्रतः ॥९ ॥

। हृत्संपुटनमोन्तेन वह्निं कुण्डे निवेशयेत् ॥१० ॥

। सदाशिवं समावाह्य पूजयित्वा प्रतर्प्य च ॥ ११ ॥

। भाव्यं त्वयाऽनुकूलेन भवत्या विज्ञापयेदिति ॥१२ ॥

पूजां कृत्वा तर्पणसंनिधी 1 । हृत्सम्पुटात्मबीजेन शिष्यं वक्षसि ॐ ५ हां हूं हां फट् प्रविश्य चाप्यनेनैव चैतन्यं विभजेत्ततः ॐ हां हः, हूं फट् स्वाहान्तेन तदाकृष्य तेनैव पुटितात्मना । ॐ हां हं ' हीमात्मने नमः पूर्ववत्पितृसंयोगं भावयित्वोद्भवाख्यया । गर्भाधानादिकं सर्वं पूर्वोक्तविधिनाऽऽचरेत् । मलशक्तितिरोधाने पाशानां च वियोजने । पाशानायुधमन्त्रेण सप्तवाराभिजप्तया ॥ शस्त्रेण पाशसंयुक्तं गृहीत्वा तं नमोन्तेन

ताडयेत् । १३ ॥

॥१४ ॥

ज्येष्ठयाऽङ्कुशमुद्रया ॥१५ ॥

॥१६ ॥

निजात्मनि नियोजयेत् ॥१७ ॥

॥१८ ॥

वामया तदनेनैव देव्या गर्भे नियोजयेत् ॥१९ ॥

मूलेन पाशशैथिल्ये निष्कृत्यैव शतं जपेत् ॥२० ॥

पञ्च पञ्चाऽऽहुतीर्दद्यादायुधेन यथा पुरा ॥ २१ ॥

छिन्द्यास्त्रेण कर्तर्या कलाबीजयुजा यथा ॥ २२ ॥

बनाकर पूरक प्राणायाम कर लेने के पश्चात् पाश को मस्तक सूत्र से खींच ले । फिर कुम्भक प्राणायाम करने के बाद उसे हाथ में लेकर रेचक प्राणायाम तथा उद्भव मुद्रा करके ' हृद् ' शब्द से सम्पुटित और अन्त में ' नमः ' शब्द से युक्त मन्त्र पढ़कर अग्नि को कुण्ड में स्थापित करे ॥९ -१० ॥ शान्त्यतीत कला की भी पूजा आदि निवृत्ति कला की ही तरह करनी चाहिए । सदाशिव का आवाहन, पूजन तथा तर्पण करके उससे भक्तिपूर्वक निवेदन करे कि - ' इस नित्य प्रसिद्ध अधिकार में मैं मुमुक्षु को दीक्षित कर रहा हूँ । इसलिए आप अनुकूल रहें ।११-१२ ॥ तदनन्तर माता-पिता का आवाहन और पूजन तथा तर्पण करके ' हृद् ' शब्द से सम्पुटित बीज - मन्त्र के द्वारा शिष्य के वक्षःस्थल पर ताड़न करे ॥१३ ॥ इसका बीज - मन्त्र यह है - ' ॐ हां हूं हां फट् ' इसी मन्त्र से प्रवेश भी करना चाहिए । तदनन्तर

' ॐ हां हः, हूं फट् ' मन्त्र पढ़कर ज्येष्ठा नामक अङ्कुश मुद्रा बनाकर शस्त्र से पाशसंयुक्त चैतन्य को विभक्त करे । फिर अन्त में ' स्वाहा ' शब्द जोड़कर इसी मन्त्र से पाश को खींचकर ' ॐ हां हं हीमात्मने नमः ' मन्त्र से उसे आत्मा में नियोजित करे ॥१४-१८ ॥ पहले की भाँति उद्भव - मुद्रा से पितृसंयोग उत्पन्न करके, उपर्युक्त मन्त्र से देवी के गर्भ में नियोग करे || १ ९ || गर्भाधान आदि समस्त कार्य पूर्वोक्त विधि से सम्पन्न करना चाहिए । मूल मन्त्र से पाश को शिथिल कर निष्कृति के लिए सौ बार मन्त्र का जप करना चाहिए || २० || मल - शक्ति को तिरोहित करने में तथा पाशों को वियुक्त करने में पूर्व की भाँति आयुध - मन्त्र से पाँच - पाँच आहुतियाँ डाले ॥२१ ॥ आयुध मन्त्र से सात

बार अभिमन्त्रित की हुई छुरी से ' ॐ हां शान्त्यतीतकलापाशाय हः, हूं फट् ' यह कलाबीज मन्त्र पढ़ते हुए पाशों को १ क. ङ. च. प्राणमुद्रया । ख. ग. शूलमुद्रया । २ क. ङ. च. ' केनान्तराख्य ' । ३ ख. ग. ' पुटं न ' । ४ क. ख. ग. ङ. च. वह्निकु ' । ५ ख. ॐ ह्रां ह्रूं ह्रां फ ' । ६ घ. हं । ७ क. ङ. च. हां हूं । ८ ख. ग. हूं । ९ क. ङ. च. हं हामा । १० क. ङ. च. ' धिमाच ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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३३४ विसृज्य वर्तुलीकृत्य अस्त्रेण जुहुयात्पञ्च सदाशिवं हृदाऽऽवाह्य अग्निपुराणम् ॐ ह्रां शान्त्यतीतकलापाशाय हः, हूं फट् ॥२३ ॥

पाशानस्त्रेण पूर्ववत् । घृतपूर्णे स्स्रुवे दत्त्वा कलास्त्रेणैव होमयेत् ॥ २४ ॥

पाशाङ्कुशनिवृत्तये । प्रायश्चित्तनिषेधार्थं दद्यादष्टाऽऽहुतीस्ततः ॥२५ ॥

कृत्वा पूजनतर्पणे ॥ पूर्वोक्तविधिना कुर्यादधिकारसमर्पणम् ॥२६ ॥

ॐ हां सदाशिव मनोविन्दुं शुल्कं गृहाण स्वाहा ॥२७ ॥

निःशेषदग्धपाशस्य मूलेन जुहुयात्पूर्णां संहारमुद्रया रौद्र्या दद्यादाप्यायनायास्य खेदितौ शिष्यदीक्षायै शिखामन्त्रितकर्तर्या पशोरस्य सदाशिव विसृजेत्तु सदाशिवम् संयोज्य गुरुरात्मनि मस्तकेऽर्घ्याम्बुविन्दुकम् यन्मया पितरौ युवाम् बोधशक्तिस्वरूपिणीम् ॐ क्लीं शिखायै । बन्धाय न त्वया स्थेयं शिवाज्ञां श्रावयेदिति ॥ २८ ॥

॥ ततो विशुद्धमात्मानं शरच्चन्द्रमिवोदितम् ॥२९ ॥

। कुर्वीत शिष्यदेहस्थमुद्धृत्योद्भवमुद्रया ॥ ३० ॥

। क्षमयित्वा महाभक्त्या पितरौ विसृजेत्तथा ॥ ३१ ॥

। कारुण्यान्मोक्ष ( च ) यित्वा तद्वृज त्वं स्थानमात्मनः ॥३२ ॥

। शिखां छिन्द्याच्छिवास्त्रेण शिष्यस्य चतुरङ्गुलाम् ॥३३ ॥

हूं फट्, ओमस्त्राय हूं ' फट् ॥३४ ॥

स्स्रुचि तां घृतपूर्णायां गोविङ्गोलकमध्यगाम् ' । संविधायास्त्रमन्त्रेण " हूंफडन्तेन होमयेत् ॥३५ ॥

ॐ हौं हः, ११ अस्त्राय हूं फट् ॥३६ ॥

काट दे । पुनः पहले की भाँति विसर्जन कर पाशों की गुठली बनाकर अस्त्र मन्त्र से घृतपूर्ण स्रुव पर रखकर कलास्त्र मन्त्र से हवन करे । पाश तथा अङ्कुश का दोष दूर करने के लिए अस्त्र मन्त्र से पाँच आहुतियाँ दे और प्रायश्चित्त के निषेध के लिए आठ आहुतियाँ दे ॥२२-२५ ॥ तदनन्तर हृद् - मन्त्र से सदाशिव का आवाहन, पूजन और तर्पण करके ‘ ॐ हां सदाशिव मनोविन्दुं शुल्कं गृहाण स्वाहा ' मन्त्र से पहले की भाँति अधिकार समर्पण करे और शिव की यह आज्ञा सुनाये - ' हे सदाशिव! जिसका पाश भली - भाँति जल गया है, ऐसे पशु को तुम बन्धन में मत डालो ' ॥२६-२८ ॥ इसके बाद मूल मन्त्र से हवन करके सदाशिव का विसर्जन करे । तत्पश्चात् गुरु शरद् ऋतु के चन्द्रमा के समान विशुद्ध मन को रुद्र देवतावाली संहारमुद्रा से आत्मा में संयुक्त करके उद्भव - मुद्रा से उसे शिष्य की देह में स्थापित करे ॥। २ ९ -३० ॥ तदनन्तर वृद्धि के लिए शिष्य के मस्तक पर अर्घ्य - जल का विन्दु छिड़ककर अत्यन्त भक्ति से क्षमाप्रार्थनापूर्वक माता - पिता का विसर्जन करते हुए यह कहे कि- “ शिष्य की दीक्षा के लिए जो मैंने आप दोनों को कष्ट दिया है, उसे कृपया क्षमा करके अपने स्थान को जाइये ” ॥३१-३२ ॥ तत्पश्चात् ' ॐ क्लीं शिखायै हूं फट् ओमस्त्राय हूं फट् इस शिवास्त्र - मन्त्र को पढ़कर शिखा - मन्त्र से अभिमन्त्रित की हुई छुरी से चार अँगुलियों की बोधशक्तिरूप शिखा को काट डाले ॥३३-३४ ॥ उस कटी हुई शिखा को गोबर के गोलों के बीच में रखकर घृतपूर्ण स्रुव के ऊपर रखकर ' ॐ हौं हः, अस्त्राय हूं फट् ’ - इस अस्त्र - मन्त्र से हवन करे ॥३५-३६ ॥ इसके बाद खुक् तथा स्रुव को धोकर, १ क. ङ. च. हूं । ख. हरू । २ क. च. ' व नमो वि । ३ क. ङ. च. त्मवान् । कु । ४ ख. ग. स्तके हाम्बु । ५ क. ख. ग, ङ. च. " ङगुलम् । ६ क. ङ. च. हूं । ख. ग. हूं । ७ ख. ग. हूं । ८ ख. ग. हूं । ९ ख. ग. ' विन्दोऽल ' । १० ख. ' ण रूफ ' । ११ क. ङ. च. हं । १२ ख. ' य फ ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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अष्टाशीतितमोऽध्यायः प्रक्षाल्य स्रुक्नुवौ शिष्यं संस्नाप्याऽऽचम्य च स्वयम् वियोज्याऽऽकृष्य संपूज्य ' पूर्ववद्द्द्वादशांशतः पूरितं स्रुवमाज्येन विहिताधोमुखस्रुचा प्रसारितशिरोग्रीवो नादोच्चारानुसारतः कुम्भमण्डलवह्निभ्यः शिष्यादपि निजात्मनः संचिन्त्य ' विन्दुवद्ध्यात्वा क्रमशः सप्तधा यथा । हृदयादिक्रमोच्चारविसृष्टं " मन्त्रसंज्ञकम् ” । सप्त कारणत्यागात्प्रशान्तविस्वरं ३ लयः । प्राणस्य निखिलस्यापि शक्तिप्रमेयवर्जितम् । तदेतद्योजनस्थानं १७ विस्वरं तत्त्वसंज्ञकम् । शनैरुदीरयन्मूलं कृत्वा शिष्यात्मनो " लयम् । ३३५ । योजनिकास्थमात्मानं शस्त्रमन्त्रेण ताडयेत् ॥ ३७ ॥

। आत्मीयहृदयाम्भोजकर्णिकायां निवेशयेत् ॥३८ ॥

। नित्योक्तविधिनाऽऽदाय शङ्खसंनिभमुद्रया ॥ ३ ९ ॥ । समदृष्टि: ५ स्थिरश्चान्तः परभावसमन्वितः ॥४० ॥

। गृहीत्वा ' षड्विधाध्वानं श्रु ( स्रु ) गग्रे प्राणनाडिकम् ° ॥४१ ॥

प्रथमं प्राणसंयोगस्वरूपमपरं ततः ॥४२ ॥

सुषुम्नानुगतं नादस्वरूपं‍ तु तृतीयकम् ॥४३ ॥

शक्तिनादोर्ध्वसंचारस्तच्छक्ति विस्वरं ४ मतम् ॥४४ ॥

तत्कालविस्वरं ५ षष्ठं शक्त्यतीतं " च सप्तकम् ॥४५ ॥

पूरकं कुम्भकं कृत्वा व्यादाय वदनं मनाक् ॥ ४६ ॥

हकारे तडिदाका षडध्वप्राणरूपिणि ॥४७ ॥

शिष्य को नहलाकर स्वयं आचमन करके अस्त्र - मन्त्र से योजनिका स्थित आत्मा का ताड़न करे || ३७ || फिर पहले की भाँति वियोग, आकर्षण तथा पूजन करके द्वादशान्त से लेकर अपने हृदय - कमल की कर्णिका पर उसे स्थान दे ॥ ३८ ॥ स्रुव को घी से भरकर अधोमुख स्रुक् से स्पर्श कराकर, शङ्खमुद्रा बनाकर, पूर्वोक्त विधि से ही उसका

ग्रहण करे ॥ ३ ९ ॥ उस समय नाद के उच्चारण के अनुसार, सिर और ग्रीवा को सीधा रखे । दृष्टि समान और स्थिर होनी चाहिए । हृदय में आकृष्ट भाव रखना चाहिए । तदनन्तर यह चिन्तन करे कि ' कुम्भमण्डल की अग्नियों से, शिष्य > से तथा अपनी आत्मा से लेकर षड्विध अध्वा तक स्रुवा के अग्रभाग पर प्राणनाड़ी में स्थित हैं ॥४०-४१ ॥ इस प्रकार चिन्तन कर फिर विन्दु की तरह क्रमशः सात विषुओं का ध्यान करे । जैसे, पहले प्राण संयोगस्वरूप का, दूसरे हृदयादि क्रम से उच्चारण करके परित्यक्त मन्त्रसंज्ञकस्वरूप का, तीसरे सुषुम्ना का अनुगमन करनेवाले नादस्वरूप का, चौथे सातवें में कारण के त्याग से प्रशान्त विषुवस्वरूप का, पाँचवें शक्तिनाद के ऊपर संचरण करने की शक्तिरूप विषुव का, छठे निखिल प्राणों की अभेद शक्ति से वर्जित काल विषुव स्वरूप का और सातवें अतीतशक्तिस्वरूप तत्त्व विषुव का ध्यान करे ॥४२-४५ ॥ इसी को योजन स्थान कहते हैं । इसके बाद पूरक तथा कुम्भक प्राणायाम करके थोड़ा - सा मुख खोलकर धीरे - धीरे मूलमन्त्र का उच्चारण करते हुए बिजली - जैसी आकृतिवाले तथा षडध्व के प्राणरूप हकार में शिष्य की आत्मा का लय करे ॥४६-४७ ॥ नाभि के ऊपर एक बालिश्त तक व्याप्त करके, १ क. ङ. च. ' जनीकाक्षमा । २ क. ङ. च. संगृह्य । ३ क. ङ. च. ' तं श्रुव ' । ४ क. घ. ङ. च. ' खश्रुचा । ५ ख. ग. घ. ' दृष्टिशिवश्चा ' । ६ क. ङ. च. ' त्वा स द्विधाऽऽत्मानं युगाग्रे । ७ क. ङ. च. ' डिगम् । ८ क. ङ. च. न्त्य विश्रवं ध्यात्वा । ९ ख. ङ. च. “ योगं स्व ’ । १० क. ङ. च. त्ररूपक ' । ११ ' मन्त्रसंज्ञकम् ' इत्यस्याग्रे ' पूरकं कुम्भकं कृत्वा व्यादाय वदनं मनाक् ' इत्यर्धमधिकं घ. पुस्तके । १२ ख. नादं स्व ' । १३ क. ख. ग. ङ. च. विषुवं ल । १४ क. ख. ग. ङ. च. विषुवं । १५ क. ख. ग. ङ. च । ' विषुवं ष ' । १६ क. ङ. च. ' तं तु संयुतम् । १७ घ. ' जनास्था । १८ क. ख. ग. ङ. च. विषुवं । १ ९ क. ख. ग. ङ. च. ' त्मना ल ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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३३६ अग्निपुराणम् उकारं परतो नाभेर्वितस्तिं व्याप्य संस्थितम् । ॐ ' कारवाचकं ' विष्णोस्ततोऽष्टाङ्गलकण्टकम् । तद्बल्ललाटमध्यस्थं विन्दुमीश्वरवाचकम् । शक्तिं च ब्रह्मरन्ध्रस्थां त्यजन्नित्यमनुक्रमात् । द्वादशान्ते परे तत्त्वे परमानन्दलक्षणे । विलीय मानसे तस्मिशिष्यात्मानं विभावयेत् । योजनिकास्थिरत्वाय ' वौषडन्तशिवाणुना । ॐ हामात्मने सर्वज्ञो भव स्वाहा । ॐ हामात्मने ततः परमकारस्तु हृदयाच्चतुरङ्गलम् ॥४८ ॥

चतुरङ्गुलतालस्थं मकारं रुद्रवाचकम् ॥४९ ॥

नादं सदाशिवं देवं ब्रह्मरन्ध्रावसानकम् ॥५० ॥

दिव्यं पिपीलिकास्पर्शं तस्मिन्नेवानुभूय च ॥ ५१ ॥

भावशून्ये मनोऽतीते शिवे नित्यगुणोदये ॥ ५२ ॥

विमुञ्चन्सर्पिषो धारां ज्वालान्तेऽपि परे शिवे ॥ ५३ ॥

दत्त्वा पूर्णां विधानेन गुणापादनमाचरेत् ॥ ५४ ॥

परितृप्तो भव स्वाहा । ॐ हमात्मनेऽनादिबोधो भव स्वाहा । ॐ हौमात्मने स्वतन्त्रो भव स्वाहा । ॐ हौमात्मन् अलुप्तशक्तिर्भव स्वाहा । ॐ हः, आत्मनेऽनन्तशक्तिर्भव स्वाहा ॥५५ ॥

इत्थं षड्गुणमात्मानं गृहीत्वा परमाक्षरात् । विधिना भावनोपेतः शिष्यदेहे नियोजयेत् || ५६ ॥ तीव्राणुशक्तिसंपातजनितश्रमशान्तये | शिष्यमूर्धनि विन्यस्येद् अर्ध्यादमृतविन्दुकम् ॥५७ ॥

। सौम्यवक्त्रं व्यवस्थाप्य शिष्यं दक्षिणमात्मनः ॥५८ ॥

प्रणमय्येशकुम्भादीञ्शिवाद्दक्षिणमण्डले त्वयैवानुगृहीतोऽयं मूर्तिमास्थाय मामकीम् । देवे वह्नौ गुरौ तस्माद्भक्तिं चाप्यस्य वर्धय ॥५९ ॥

स्थिर उकार को हृदय से चार अङ्गुल ऊपर तक व्याप्त करके स्थिर आकार को, कण्ठ से आठ अङ्गुल ऊपर तक व्याप्त करके स्थिर विष्णुवाचक ॐकार को, तालु से चार अङ्गुल ऊपर तक व्याप्त करके स्थिर रुद्रवाचक मकार को, ललाट के मध्य में स्थित ईश्वरवाचक विन्दु को, ब्रह्मरन्ध्र के अन्त में स्थित नादरूप सदाशिव देव को और ब्रह्मरन्ध्र में स्थित शक्ति को अनुक्रम से छोड़ते हुए उसी ब्रह्मरन्ध्र में दिव्य पिपीलिका स्पर्श का अनुभव करे || ४८-५१ ॥ पश्चात् ऐसी भावना करे कि परमानन्द लक्षणवाले द्वादशानन मन से परे, भावशून्य, नित्यगुणों के उदय से सम्पन्न और परम तत्त्वस्वरूप शिव में शिष्य की आत्मा विलीन हो गयी है ॥५२-५२३ ॥ इसके बाद ' ॐ हामात्मने सर्वज्ञो भव स्वाहा ', ' ॐ हामात्मने परितृप्तो भव स्वाहा ’, ‘ ॐ हृमात्मनेऽनादिबोधो भव स्वाहा ', ' ॐ हौमात्मने स्वतन्त्रो भव स्वाहा ', ' ॐ हौमात्मन्स्वाहा ', ' ॐ हः, आत्मनेऽनन्तशक्तिर्भव स्वाहा । ' इन मन्त्रों से प्रज्वलित अग्नि में परमशिव के उद्देश्य से घी की धारा छोड़कर योजनिका की स्थिरता के लिए अन्त में ' वौषट् ' शब्द से युक्त शिवमन्त्र से विधिपूर्वक पूर्ण दक्षिणा का दान करे ॥५३-५५ ॥ इस प्रकार भावनायुक्त होकर परमाक्षर षड्गुणसम्पन्न आत्मा का ग्रहण करके उसे शिष्य की देह में नियुक्त करे ॥५६ ॥

तदनन्तर तीव्र अणुशक्ति के संपात से उत्पन्न श्रम की शान्ति के लिए शिष्य के मस्तक पर अर्घ्य से अमृत - विन्दु को छिड़क दे और शिवकुम्भ आदि ( पात्रों ) को प्रणाम करके शिव से दक्षिण ओर के मण्डल में प्रसन्न मुखवाले शिष्य को अपनी दाहिनी ओर बैठाकर देवेश से यह निवेदन करे कि- “ मेरी मूर्ति को धारणकर आपने ही इसे अनुगृहीत किया है । इसलिए देवता, अग्नि तथा गुरु में इसकी भक्ति को बढ़ाते रहिये " ॥५७-५९ ॥ यह कहकर स्वयं गुरु देवेश को प्रणामकर शिष्य १ ख. घ. कारं वा । २ ख. ' चको वि ' । ३ घ. ' कण्ठक । ४ ख. ग. घ. ' नसे त ' । ५ क. ङ. च. ' जनीयास्थि ' । ६ । ख. ' हा । ओ मा । ७ क. ङ. शिवदे । ८ क. ङ. च. ' न्यस्य दद्यादमृ । ९ ख. ग. ' दर्घाद ' । १० क. ङ. च. ' क्तिनायास्य CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA