अग्नि पुराण — पृष्ठ 341–350
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 341–350
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एकोननवतितमोऽध्यायः ३३७ इति विज्ञाप्य देवेशं प्रणम्य च गुरुः स्वयम् । श्रेयस्तवास्त्विति ततः परमया भक्त्या दत्त्वा देवेऽष्टपुष्पिकाम् ब्रूयादाशिषं शिष्यमादरात् ॥६० ॥
। पुत्रकं शिवकुम्भेन संस्नाप्य विसृजेन्मखम् ॥६१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये निर्वाणदीक्षाकथनं नामाष्टाशीतिमोऽध्यायः अथैकतात्त्विकी दीक्षा कालाग्न्यादिशिवान्तानि आवाह्य शिवतत्त्वादि प्रददीत ततः पूर्णां योजनायै शिवे चान्यां ॥८८ ॥
अथैकोननवतितमोऽध्यायः एकतत्त्वदीक्षाविधिः ईश्वर उवाच लघुत्वादुपदिश्यते । सूत्रबन्धादि कुर्वीत यथायोगं निजाणुना ॥१ ॥
तत्त्वानि परिभावयेत् । समतत्त्वे समग्राणि सूत्रे मणिगणानिव ॥२ ॥
गर्भाधानादि पूर्ववत् । मूलेन किं तु कुर्वीत सर्वशुल्क समर्पणम् ॥३ ॥
तत्त्वव्रातोपगर्भिताम् । एकयैव यया शिष्यो निर्वाणमधिगच्छति ॥४ ॥
स्थिरत्वापादनाय च । दत्त्वा पूर्णां प्रकुर्वीत शिवकुम्भाभिषेचनम् ॥५ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये एकतत्त्वदीक्षाविधिकथनं नामैकोननवतितमोऽध्यायः ॥८९ ॥
को आदरपूर्वक आशीर्वाद दे कि -'तुम्हारा कल्याण हो । ' तदनन्तर देवता को परम भक्तिपूर्वक आठ पुष्पों का गुच्छा समर्पित करके शिष्य को शिव - कुम्भ के जल से नहलाकर यज्ञ का विसर्जन कर देना चाहिए ॥६०-६१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में निर्वाणदीक्षा - कथन नामक अट्ठासीवाँ अध्याय समाप्त ॥८८ ॥
अध्याय ८ ९ एकतत्त्वदीक्षा - विधि महेश्वर बोले - अब एक तत्त्व की दीक्षा लघु होने के कारण पहले मैं उसे ही बता रहा हूँ । यथावसर यथोचित विधि से स्वकीय मन्त्र से सूत्र - बन्धन आदि करके कालाग्नि से लेकर शिव पर्यन्त तत्त्वों का इस प्रकार चिन्तन करे कि ' यथा सूत्र में मणियाँ गूँथी रहती हैं, वैसे ही शिव तत्त्व में अन्य समस्त तत्त्व ओत - प्रोत हैं । ' तदनन्तर शिव तत्त्व आदि का आवाहन करके पूर्व की भाँति गर्भाधान आदि संस्कार करके मूल मन्त्र से सब शुल्कों का समर्पण करे । फिर तत्त्व समूह से उपगर्भित पूर्णाहुति प्रदान करे, जिससे शिष्य को निर्वाण की प्राप्ति हो जाय । शिवभक्ति में नियोजन और स्थिरता की प्राप्ति के लिए दूसरी बार पूर्णाहुति देकर शिव - कुम्भ के जल से उसका अभिषेक करना चाहिए ॥१-५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में एकतत्त्वदीक्षा विधि - कथन नामक नवासीवाँ अध्याय समाप्त ॥८९ ॥
१ घ. ' जात्मना । २ ख. ' त्त्वानि ग ° । २२ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३३८ अग्निपुराणम् अथ नवतितमोऽध्यायः अभिषेकादिविधिकथनम् ईश्वर उवाच शिवमभ्यर्चाभिषेकं कुर्याच्छिष्यादिके श्रिये । कुम्भानीशादिकाष्ठासु क्रमशो नव विन्यसेत् ॥१ ॥
तेषु क्षारोदं क्षीरोदं दध्युदं घृतसागरम् । इक्षुकादम्बरीस्वादुमस्तूदानष्ट सागरान् ॥२ ॥
निवेशयेद्यथासंख्यमष्टौ विद्येश्वरानथ ' । एकं शिखण्डिनं रुद्रं श्रीकण्ठं तु द्वितीयकम् || ३ || त्रिमूर्तिमेकरुद्राक्षमेकनेत्रं ' शिवोत्तमम् । सप्तमं सूक्ष्मनामानमनन्तं रुद्रमष्टमम् ॥४ ॥
मध्ये शिवं समुद्रं च शिवमन्त्रं च विन्यसेत् । यागालयान्दिगीशस्य रचिते स्नानमण्डपे ॥५ ॥
कुर्यात्करद्वयायामां वेदीमष्टाङ्गुलोच्छ्रिताम् । श्रीपर्णाद्यासने तत्र विन्यस्यानन्तमासनम् ' ॥६ ॥
शिष्यं निवेश्य पूर्वास्यं सकलीकृत्य पूजयेत् । काञ्जिकौदनमृद्भस्मदूर्वागोमयगोलकैः 11911 सिद्धार्थदधितोयैश्च कुर्यान्निर्मन्थनं ततः । क्षारोदानुक्रमेणाथ हृदा विद्येशशम्बरैः ' ॥८ ॥
कलशैः स्नपयेच्छिष्यं सुधाधारणयाऽन्वितम् । परिधाप्य सिते वस्त्रे निवेश्य शिवदक्षिणे ॥९ ॥
अध्याय ९ ० अभिषेकादि विधि का वर्णन महेश्वर बोले - शिव का पूजन करके शिष्य आदि के कल्याण के लिए अभिषेक करे । उत्तर- -पूर्व आदि दिशा-विदिशाओं में क्रमशः नौ घटों की स्थापना करे । उन घटों में लवण - समुद्र, क्षीर - समुद्र, दधि - समुद्र, घृत - समुद्र, इक्षु - समुद्र, मद्य - समुद्र, मधु - समुद्र और तक्र - समुद्र- इन आठ समुद्रों का ( भावात्मक ) निवेश करके क्रमश: आठ विद्येश्वरों को भी उनमें सन्निविष्ट कर दे । पहला विद्येश्वर ( रुद्र ) शिखण्डी है, दूसरा श्रीकण्ठ, तीसरा त्रिमूर्ति, चौथा एक रुद्राक्ष, पाँचवाँ एक नेत्र, छठा शिवोत्तम, सातवाँ सूक्ष्म, आठवाँ अनन्त है । मध्य में शिव, समुद्र तथा शिवमन्त्र का न्यास करना चाहिए तथा यज्ञमन्दिर एवं दिक्पालों के स्नान - मण्डप का निर्माण करना चाहिए ॥१-५ ॥ तदनन्तर दो हाथ लम्बी - चौड़ी और आठ अङ्गुल ऊँची वेदी का निर्माण करे । बिल्वपत्र आदि के बने आसन पर अनन्त ( भगवान् ) के आसन की रचना करके शिष्य को पूर्वाभिमुख बैठाकर सकलीकरणपूर्वक पूजन करे । पश्चात् कांजी, भात,, मिट्टी, भस्म, दूब, गोबर, सरसों और तक्र से क्रमशः शिष्य के देह को मलकर लवण - समुद्र आदि के क्रम से मन्त्रोच्चारणपूर्वक विद्येश्वरों के मन्त्रों का उच्चारण करते हुए कलशों के जल से उस शिष्य को स्नान कराये, जो उस जलधारा को १ क. ख. ग. ङ. च. विश्वेश्व ' । २ ख. ग. घ. " मूर्तये ' । ३ ख. ग. ' मं शूकना ' । ४ ख. ग. ' याद्गिरीश ' । ५ घ. उ ' मानसम् । ६ ख. ग. ' र्मथनं । ७ क. ङ. च. ' तः । क्षीरो ' । ८ च. ' शसंचरैः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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नवतितमोऽ ऽध्यायः पूर्वोदितासने शिष्यं पुनः पूर्ववदर्चयेत् । अक्षमालां पुस्तकादि शिविकाद्यधिकारकम् । सुपरीक्ष्य विधातव्यमाज्ञां संश्रावयेदिति । विघ्नज्वालापनोदार्थं कुर्याद्विज्ञापनां यथा । संहितापारगः सोऽयमभिषिक्तो मया शिव । दद्यात्पूर्णा ततः शिष्यं स्थापयेन्निजदक्षिणे । लाञ्छयेदुपबद्धाय " दग्धदर्भाग्रशम्बरैः । कुम्भेऽनले शिवे स्वस्मिंस्ततस्तत्कृत्यमाविशेत् । भूपवन्मानवादीनामभिषेकादभीप्सितम् ३३ ९ उष्णीषं योगपट्टं च ' मुकुटं कर्तरीं घटीम् ॥१० ॥
दीक्षाव्याख्याप्रतिष्ठाद्यं ज्ञात्वाऽद्यप्रभृति त्वया ॥ ११ ॥
अभिवाद्य ततः शिष्यं प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥१२ ॥
अभिषेकार्थमादिष्टस्त्वयाऽहं गुरुमूर्तिना ॥१३ ॥
तृप्तये मन्त्रचक्रस्य पञ्चपञ्चाऽऽहुतीर्यजेत् ॥१४ ॥
शिष्यदक्षिणपाणिस्था अङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीः क्रमात् ॥१५ ॥
कुसुमानि करे दत्त्वा प्रणामं कारयेदमुम् ॥ १६ ॥
अनुग्राह्यास्त्वया शिष्याः शास्त्रेण सुपरीक्षिताः ॥१७ ॥
६ ॐ ७ श्रां श्रौं पशुं हूं फडित्यस्त्रराजाभिषेकतः ॥१८ ॥
इत्याग्नेये महापुराणेऽभिषेकादिविधिकथनं नाम नवतितमोऽध्यायः ॥९ ० ॥ अमृत के समान समझता हो । स्नानोत्तर शुक्ल वस्त्र पहनाकर शिव से दाहिनी ओर पूर्वोक्त आसन पर बैठाकर पुनः पहले की भाँति पूजन करे । तदनन्तर शिष्य से कहे कि “ आज से तुम दीक्षा की व्याख्या, प्रतिष्ठा आदि जानकर उष्णीष, योगपट्ट, मुकुट, कर्तरी ( कैंची ), घटी, रुद्राक्षमाला, पुस्तक, शिविका आदि वस्तुओं की भलीभाँति परीक्षा करके उसका व्यवहार करो । " इसके बाद शिष्य और महादेव का अभिवादन करके विघ्नज्वाला की शान्ति के लिए ( शिव से ) निवेदन करे कि " हे शिव! गुरुमूर्तिरूप अपने अभिषेक के लिए मुझे आदेश दिया है, इसलिए मैंने संहिता भाग का पूर्ण अध्ययन किये हुए, इस शिष्य को अभिषिक्त किया है । " तदनन्तर मन्त्र - चक्र की तृप्ति के लिए पाँच - पाँच आहुतियाँ डालकर पूर्णाहुति प्रदान करे ॥६-१४ ॥ फिर शिष्य को अपने दाहिने भाग में बैठाकर उसके दाहिने हाथ के अँगूठे और अँगुलियों को क्रमशः जले हुए कुशों के अग्रभाग से पोंछकर उसके हाथ में फूल देकर उसे घट, अग्नि, शिव तथा अपने को प्रणाम कराये । तत्पश्चात् देवता से यह प्रार्थना करे कि “ शास्त्र द्वारा परीक्षा किये हुए शिष्यों के ऊपर आप अनुग्रह किया करें । " जैसे राज्याभिषेक के बाद राजा प्रजा की अभिलाषाएँ पूरी करता है उसी भाँति ' ॐ श्रां श्रौं पशुं हूं फट्- ' इस मन्त्रराज के द्वारा अभिषिक्त होने पर शिष्य की सभी अभिलाषाएँ पूरी होती हैं ॥ १५-१८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अभिषेकादि विधि - वर्णन नामक नब्बेवाँ अध्याय समाप्त ॥१० ॥
१ ख. मुकुरं । २ ख. पटीम् । ३ ख. ङ. पुष्पका ' । ४ ख. ' पनं तथा । ५ ग. ङ. च. ' येदूषरत्वायदग्रगर्भाङ्गसंचरैः । ६ ॐ श्रांराजाभिषेकतः क. ङ. घ. पुस्तकेषु नास्ति । ७ ख. ॐ श्रां पशुन्हुं फ ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३४० अग्निपुराणम् अथैकनवतितमोऽध्यायः अभिषिक्तेन कर्त्तव्यस्य तत्तद्देवतापूजनस्य विधिः ईश्वर उवाच अभिषिक्तः शिवं विष्णुं पूजयेद्भास्करादिकान् । ' यो देवान्देवलोकं स याति स्वं कुलमुद्धरन् ।
घृताभ्यङ्गेन देवानां भस्मीभवति पावके ।
चन्दनेनानुलिप्याथ गन्धाद्यैः पूजयेत्तथा ॥
अतीतानागतज्ञानमन्त्रधीभुक्तिमुक्तिदाः । त्रिभिर्जीवो ' मूलधातुश्चतुर्भिर्ब्राह्मणादिधीः । एकत्रिकातित्रिकान्ते पदें द्विपमकान्तके संख्यावृन्दे ' जीविताब्दं " यमोऽब्ददशहा ध्रुवम्
कठिन्या जप्तया स्पृष्टे " गोमूत्राकृतिरेखया ।
शङ्खभेर्यादिनिर्घोषैः स्नापयेत्पञ्चगव्यकैः ॥१ ॥
वर्षकोटिसहस्त्रैस्तु यत्पापं समुपार्जितम् ॥२ ॥
आढकेन घृताद्यैश्च देवान्स्नाप्य सुरो भवेत् ॥ ३ ॥
अल्पायासेन स्तुतिभिः स्तुता देवास्तु सर्वदा ॥ ४ ॥
गृहीत्वा प्रश्नसूक्ष्मार्णे हृते द्वाभ्यां शुभाशुभम् ॥ ५ ॥
पञ्चादौ भूततत्त्वादि शेषे चैवं जयादिकम् ॥ ६ ॥
। अशुभं मध्यमं मध्येष्विन्द्रस्त्रिषु नृपः शुभः ॥ ७ ॥
। सूर्येभास्येशदुर्गाश्रीविष्णुमन्त्रैर्लिखेत्कजे ॥८ ॥
आरभ्यैकं त्रिकं यावत्रिचतुष्कावसानकम् ॥९ ॥
अध्याय ९९ अभिषिक्त द्वारा देवताओं के पूजन की विधि महादेव बोले - अभिषिक्त शिष्य को शङ्ख और भेरी आदि निर्घोष से शिव, विष्णु और भास्करादि का पूजन करना चाहिए । पहले उनको पञ्चगव्य से स्नान कराना चाहिए । ऐसा करनेवाला शिष्य अपने कुल का उद्धार करके देवलोक को जाता है । घृत से देवताओं का अभ्यञ्जन करनेवाले शिष्य के हजारों करोड़ वर्षों में समुपार्जित पापों का नाश हो जाता है । एक आढक परिमाण घृत इत्यादि से देवताओं को स्नान करानेवाला व्यक्ति स्वयं देवता हो जाता है ॥१-३ ॥ चन्दन से लेपादि करने के बाद गन्ध आदि से देवार्चन करना चाहिए । थोड़े से परिश्रम से स्तुतियों द्वारा देवताओं की सर्वदा स्तुति करनी चाहिए । इसमें भूत, भविष्य का ज्ञान, फल, मन्त्र, बुद्धि, योग और मोक्ष की प्राप्ति होती है । प्रश्नकर्त्ता के संक्षिप्त प्रश्न वाक्य के अक्षरों को गिनकर उसमें दो से भाग दे । एक और दो बचने पर क्रमशः शुभाशुभ की प्राप्ति होती है, तीन से व्यक्ति की मूल धातु मालूम होती है, चार मन्त्रों से ब्राह्मणों की बुद्धि, पाँच मन्त्रों से भूततत्त्वादि ज्ञान की प्राप्ति होती है और शेष से जय इत्यादि अधिक बीजाक्षर हों अथवा दो ' प, म एवं क हो तो इनमें से प्रथम वर्ण अशुभ, बीचवाला मध्यम तथा अन्तिम वर्ण शुभ है । यदि अन्त में संख्या समूह हो तो वह जीवनकाय के दस वर्ष का सूचक है । यदि दस की संख्या हो तो दस वर्ष बाद साधक पर यमराज १ यो देवान् कुलमुद्धरन् क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । २ ख. ' मुपस्थित । ३ क. ख. ग. ङ. च. ' जयंस्तथा । ४ क ङ. च. ' तुर्बदूक्तेन । ५ ख. ' कात्रित्रि । ६ क. ङ. च. ' द्वेद्वयम । ७ पदका । ८ क. ङ. च. ध्ये स्वकेन्द्रस्त्रित ख. " ध्ये स्वे केन्द्रस्त्रिन् । ९ ख. ' वृत्ते जी । १० ख. ' ब्दं मयोऽब्द ' । ११ क. ङ. स्पृष्टो गो । १२ क. ख. ग. ङ. च. ' मूत्र्याकृ ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकनवतितमोऽध्यायः मरुद्व्योममरुद्बीजैश्चतुःषष्टिपदे ' तथा एकत्रिकादिमारभ्य अन्ते चाष्टत्रिकं तथा आईपल्लवितैः ' काद्यैः षोडशस्वरपूर्वगैः । ह्रीं बीजाः प्रणवाद्याः स्युर्नमोन्ता यत्र पूजने । आ ॰ ह्रींमन्त्राः सरस्वत्याश्चण्डिकायास्तथैव च । तथा ” क्षौमन्त्राः सूर्यस्य ४ आंहौंमन्त्राः शिवस्य च । शतार्थैकाधिकैः काद्यैस्तथा " षोडशभिः स्वरैः । रवीशदेवीविष्णूनां खाब्धिदेवेन्द्रवर्तनात् । अभिषिक्तो जपेद्ध्यायेच्छिष्यादीन्दीक्षयेद्गुरुः ३४१ । अक्षाणां पातनात्स्पर्शाद्विषमादौ शुभादिकम् ॥१० ॥
। ध्वजाद्यायाः समा हीना विषमाः शोभनादिदाः ॥११ ॥
आद्यैस्तैः सस्वरैः काद्यैस्त्रिपुरानाम ' मन्त्रकाः ॥१२ ॥
मन्त्रा विंशतिसाहस्राः शतं षष्ठ्यधिकं ततः ॥१३ ॥
तथा गौर्याश्च दुर्गाया आं " श्रीमंत्राः श्रियस्तथा ॥१४ ॥
आंगंमन्त्रा " गणेशस्य " आंमंत्राश्च तथा हरेः ॥१५ ॥
काद्यैस्तैः सस्वरैराद्यैः कान्तैर्मन्त्रास्तथाऽखिलाः ॥१६ ॥
शतत्रयं " षष्ठ्यधिकं प्रत्येकं मण्डलं क्रमात् ॥१७ ॥
॥१८ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽभिषिक्तेन कर्त्तव्यस्य तत्तद्देवतापूजनस्य विधिकथनं नामैकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ १ ॥ का आक्रमण होगा । भविष्य को जानने के लिए पद्माकर चित्र में गुरु को सूर्य, गणेश, दुर्गा और लक्ष्मी के लिए पवित्र मन्त्रों का उल्लेख करना चाहिए । मन्त्र को कनिष्ठिका अँगुली पर गोमूत्रिका चित्र की भाँति जपना चाहिए, जिसकी प्रत्येक रेखा तीन भागों में विभक्त हो और इन तीन भागों को बाद में चौंसठ भागों में विभक्त किया गया हो । यक्ष को इन वर्गों में डालकर प्रश्न का उत्तर पूछना चाहिए । यदि यक्ष युग्म संख्या का स्पर्श कर ले तो प्रश्न का उत्तर शुभ समझना चाहिए । ' यं वं हं ' इन तीन वर्णों के आठ मिथ हैं । वे ध्वज आदि आठ आयों के प्रतीक हैं । इन आयों में जो सम हैं, वे अशुभ हैं । विषम आय शुभप्रद कहे गये हैं । त्रिपुर मन्त्र ' क ' अक्षर से युक्त होता है जिसके पूर्व सोलह स्वर होते हैं । इन मन्त्रों के बीज प्राप्त होते हैं । यदि मन्त्रपद के अन्त में एक मिथ ( तीन बीजाक्षर ) हों, ह्रीं होता है और इनका प्रारम्भ ' ॐ ' तथा अन्त ' नमः ' से किया जाता है । इनकी संख्या बीस हजार एक सौ साठ होती है ॥४-१३ ॥ ' आं ह्रीं ' मन्त्र सरस्वती और चण्डिका के कहे गये हैं तथा गौरी, दुर्गा और श्री के मन्त्र ' आं श्री ' माने गये हैं । इसी प्रकार ' आं क्षौं ' मन्त्र सूर्य के, ' आं हौं ' मन्त्र शिव के, ' आं गं ' मन्त्र गणेश के और ' आं ' मन्त्र विष्णु के माने गये हैं । शिष्य को अभिषिक्त करने के बाद गुरु को उपर्युक्त मन्त्रों को तीन सौ छह बार पढ़ना चाहिए । ये मन्त्र क्रमशः सूर्य, चन्द्रमा, देवी और विष्णु से सम्बन्धित हैं और इनकी रचना सोलह - स्वरों के साथ ' क ' आदि इक्यावन अक्षरों को मिलाकर की जाती है और इन मन्त्रों का अन्त भी ' क ' अक्षर से होता है । अभिषिक्त गुरु इन सब मन्त्रों तथा देवताओं का जप - ध्यान करे तथा शिष्य आदि को भी दीक्षा दे ॥१४-१८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अभिषिक्त देवताओं का विधि - वर्णन नामक इक्यानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥९ १ ॥। १ क. ङ. न्न. ' रुत्वोराम रुद्वे गैश्च । २ घ. ' णां पत । ३ ख. त्रिधा । ४ क. ङ. च. ' दिकाः । आ । ५ क. आए प । ख. आहाप ' । ६ क. ङ. च. संवरैः । ख. सुस्वरैः । ७ क. ङ. च. ' मन्त्रिकाः । ८ क. ङ. च. ' काः । क्लीं बी । ९ ख. षष्ठ्याऽधि । १० क. च. अश्रीमन्ताः । ११ क. ख. ग. ङ. च. अश्रीमंत्राः । १२ क. ङ. च. ' था । क्षौ । १३ ख. घ. ' था क्रौम ' । घ. था क्रौं । १४ क. च. ' स्य आम्रौम ' । १५ क. च. आगमन्ता । १६ क. ख. ग. ङ. च. ' स्य आयान्ताश्च । १७ क. ख. ग. ङ. च. ' द्यैराद्यैः षो । १८ ख. शतद्वयं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३४२ अग्निपुराणम् अथ द्विनवतितमोऽध्यायः संक्षेपेण प्रतिष्ठाविधिः ईश्वर उवाच प्रतिष्ठां संप्रवक्ष्यामि क्रमात्संक्षेपतो गुह । प्रतिष्ठायाः पञ्चभेदास्तेषां रूपं वदामि ते । स्थापनं तु यथायोगं पीठ एव निवेशनम् । उत्थापनं च सा प्रोक्ता लिङ्गोद्धारपुरःसरा ।
आस्थापनं तदुद्दिष्टं द्विधा विष्ण्वादिकस्य च ।
यदाधारादिभेदेन प्रासादेष्वपि पञ्चथा ॥
` शुक्लाऽऽज्यगन्धा ' रक्ता च रक्तगन्धा सुगन्धिनी ।
पूर्वेशोत्तरसर्वत्र पूर्वा चैषां विशिष्यते ।
पीठं शक्तिं शिवो लिङ्गं तद्योगः सा शिवाणुभिः ॥ १ ॥
यत्र ब्रह्मशिलायोगः सा प्रतिष्ठा विशेषतः ॥२ ॥
प्रतिष्ठा भिन्नपीठस्य स्थितस्थापनमुच्यते ॥ ३ ॥
यस्यां तु ' लिङ्गमारोप्य संस्कारः क्रियते बुधैः ॥ ४ ॥
आसु सर्वासु चैतन्यं नियुञ्जीत परं शिवम् ॥ ५ ॥
परीक्षामथ मेदिन्याः कुर्यात्प्रासादकाम्यया ॥६ ॥
पीता कृष्णा सुरागन्धा विप्रादीनां मही क्रमात् ॥७ ॥
आखाते ' हास्तिके यस्याः पूर्णे: ६ ' मृदधिका भवेत् ॥८ ॥
अध्याय ९ २ संक्षिप्त प्रतिष्ठाविधि महादेव बोले - अये कार्तिकेय! मैं क्रमशः संक्षेप में प्रतिष्ठा का वर्णन करता हूँ । प्रतिष्ठा के पाँच भेद होते हैं-पीठ, शक्ति, शिव, लिङ्ग तथा इनका सम्बन्ध । प्रतिष्ठा शिव मन्त्रों से करनी चाहिए । मैं तुम्हें उनके भेदों का स्वरूप बता रहा हूँ । जिस प्रतिष्ठा का ब्रह्मशिला योग होता है, वह विशेष कहलाती है । योग के अनुसार पीठ पर निवेश करने को ही स्थापना कहते हैं । भिन्न पीठ की प्रतिष्ठा स्थित स्थापना कहलाती है ॥१-३ ॥ जिस प्रतिष्ठा में लिङ्गोद्धार किया जाता है, उसे उत्थापना कहते हैं । जिसमें लिङ्ग को आरोपित कर विद्वान् लोग संस्कार करते हैं, उसे आस्थापना कहते हैं । विष्णु आदि देवताओं की आस्थापना दो प्रकार की मानी गयी है । उन सब प्रकार की प्रतिष्ठाओं में चैतन्य रूप शिव को नियुक्त करना चाहिए । उनके आधार आदि भेद से प्रासादों में भी पाँच प्रकार की प्रतिष्ठा मानी गयी है । जहाँ प्रासाद बनाना हो, पहले वहाँ की भूमि परीक्षित कर लेनी चाहिए ॥४-६ ॥ ब्राह्मण आदि वर्णों के लिए क्रमशः शुक्ल, रक्त, पीत और कृष्ण वर्ण की भूमि होनी चाहिए, जिनमें शुक्ल भूमि की गन्ध घी के समान, पीत भूमि की गन्ध सुगन्धित द्रव्य के समान और कृष्ण भूमि की गन्ध मद्य के समान होनी चाहिए । यद्यपि पूर्व, उत्तर और पूर्वोत्तर - ये तीनों दिशाएँ भवन - निर्माण के लिए शुभ हैं, तथापि इनमें पूर्व दिशा सबसे उत्तम है । एक हाथी के बराबर की खाईं खोदने पर यदि खाईं के भीतर १ क. ङ. च. तु पीठमा । २ क. घ. ङ. च. शुल्काऽऽज्य । ३ ख. ग. ' क्लाऽऽद्यग ' । ४ ख. ग. परा । ५ क. ङ. च. आख्याते । ६ ख. पूर्वे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्विनवतितमोऽध्यायः उत्तमां तां महीं विद्यात्तोयाद्यैर्वा समुक्षिताम् नगरग्रामदुर्गार्थं गृहप्रासादकारणम् मण्डपे द्वारपूजादिमन्त्रतृप्त्यवसानकम् समीकृत्योपलिप्तायां भूमौ संशोधयेद्दिशः मध्यादीशानकोष्ठस्थे पूर्णकुम्भे शिवं यजेत् बाह्ये रक्षोगणानिष्ट्वा विधिना दिग्बलिं क्षिपेत् अन्यं वस्त्रयुगच्छन्नं कुम्भं स्कन्धे द्विजन्मनः पूजां कुम्भे समाहृत्य प्राप्ते लग्नेऽग्निकोष्ठके नैर्ऋत्यां क्षेपयेन्मृत्स्नां खाते कुम्भजलं क्षिपेत् अथ तद्रक्षणं स्थित्वा भ्रामयेत्परितः ' पुरम् अर्घ्यदानमिदं प्रोक्तं तत्र कुम्भपरिभ्रमात् । कर्करान्तं जलान्तं वा शल्यदोषजिघांसया " । ३४३ । अस्थ्यङ्गारादिभिर्दृष्टामत्यन्तं ' शोधयेद्गुरुः ॥९ ॥
। खननैर्गोकुलावासैः कषणैर्वा मुहुर्मुहुः ॥१० ॥
। कर्म निर्वर्त्याघोरास्त्रं सहस्त्रं विधिना यजेत् ॥ ११ ॥
1 । स्वर्णदध्यक्षतै रेखाः प्रकुर्वीत प्रदक्षिणम् ॥१२ ॥
। वास्तुमभ्यर्च्य तत्तोयैः सिञ्चेत्कुद्दालकादिकम् ॥१३ ॥
। भूमिं संसि संस्नाप्य कुद्दालाद्यं प्रपूजयेत् ॥१४ ॥
। निधाय गीतवाद्यादिब्रह्यघोषसमाकुलम् ॥१५ ॥
। कुद्दालेनाभिषिक्तेन मध्वक्तेन तु खानयेत् ॥ १६ ॥
। पुरस्य पूर्वसीमान्तं नयेद्यावदभीप्सितम् ॥१७ ॥
। सिञ्चन्सीमान्तचिह्नानि यावदीशानगोचरम् ॥ १८ ॥
इत्थं परिग्रहं भूमेः कुर्वीत तदनन्तरम् ॥१९ ॥
खादयेद्भूकुमारीं चेद्विधिना शल्यमुद्धरेत् ॥२० ॥
मिट्टी -ही - मिट्टी मिले या जल आदि ( पवित्र चीजें ) मिले तो वहाँ की भूमि उत्तम समझनी चाहिए । यदि हड्डी, कोयला आदि चीजों से अत्यन्त दूषित भूमि मिले तो गुरु को उस भूमि का शोधन करना चाहिए ॥७ - ९ ॥ नगर, ग्राम,, दुर्ग, गृह और प्रासाद के लिए निर्धारित भूमि का संशोधन भूमि को खोदकर, वहाँ पर गोष्ठ बनाकर तथा बार - बार उसे जोतकर कर लेना चाहिए । मण्डप में द्वार - पूजा, हवन आदि कर्म करके एक हजार बार अघोरास्त्र - मन्त्र का जप करना चाहिए ॥१०-११ ॥ भूमि को समतल करके उसे लीप - पोतकर दिशा की शुद्धि करे । सोना, दही तथा अक्षत से रेखा खींचकर मध्य में ईशानकोण में स्थित पूर्ण कुम्भ के ऊपर शिव का पूजन करे । डीह की अर्चना करके कलश के पानी को कुदाल आदि पर छिड़क दे । बाहर रक्षोगण की पूजा करके विधिपूर्वक दिशाओं को बलि चढ़ावे । भूमि पर जल छिड़ककर, कुदाल आदि को धोकर उनकी पूजा करे ॥ १२-१४ ॥ किसी ब्राह्मण के कन्धे पर एक जोड़े वस्त्र से आच्छादित एक दूसरे घड़े को रखकर गाना, बजाना, वेदध्वनि आदि के साथ घट की पूजा करके अग्निकोण में ठीक लग्न के समय अभिषिक्त तथा मधुलिप्त कुदाल से खोदना प्रारम्भ करे । खोदी हुई मिट्टी को नैर्ऋत्यकोण में फेंककर गड्ढे में घड़े का जल छिड़के । उस घड़े को नगर की सीमा तक ले जाकर सुरक्षापूर्वक नगर की परिक्रमा करके ईशानकोण तक सीमान्त के चिह्नों में जल छिड़क देना चाहिए ॥१५-१८ ॥ वहाँ घड़े को घुमाने से अर्घ्यदान हो जाता है । इस प्रकार भूमि का परिग्रह करके शल्य - दोष को दूर करने के लिए भूमि तब तक खोदे, जब तक कंकड़ या जल न दिखायी पड़ जाय । यदि वहाँ ( वास्तुभूमि के अन्दर ) शल्य ( हड्डी आदि ) मिलने की आशंका हो तो उसका विधिपूर्वक उद्धार करना चाहिए ॥१९ -२० ॥ इस जगह १ क. च. अस्त्रागारा ' । २ ख. ' येत्पुरा । न ' । ३ च. ' त्रदृष्ट्यव ' ४ क. ख. ग. ङ. च. ' र्बत्य घोरास्त्रस ' । ख. ग. ° र्वर्त्य घो ' । ५ ख. ग. ' ग्बलीन्क्षिपे ' । ६ क. ख. ग. ङ. च. संस्थाप्य । ७ क. ङ. च. सरक्तेन । ८ ख. ग. मयन्परि । ९ क. ख. ग. ङ. च. अर्घदा । १० क. ङ. च. ' क्तं भद्रकु । ११ क. ङ. च. जिहास ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३४४ अग्निपुराणम् ( ' अकचटतपयशहान्मानवश्चेत्प्रश्नाक्षराणि तु । कर्तुश्चाविकारेण जानीयात्तत्प्रमाणतः मातृकामष्टवर्गाढ्यां फलके भुवि वा लिखेत् । अवर्गे चैव लोहं तु कवर्गेऽङ्गारमग्नितः तवर्गे चेष्टका चाऽऽप्ये कपालं च पवर्गके हवर्गे रजतं तद्वदवर्गाच्चानर्थकरानपि पादोनं खातमापूर्य सजलैर्मुद्गराहतैः सामान्यार्घ्यकरो ' यायान्मण्डपं वक्ष्यमाणकम् कुर्यात्तत्राऽऽत्मशुद्ध्यादिकुण्डमण्डपसंस्कृतिम् अग्नेर्ज्वलनपूजादि ' सर्वं पूर्ववदाचरेत् शल्य है या नहीं - इस प्रकार के प्रश्न करनेवाले के अग्नेर्ध्वजादिपतिताः ' स्वस्थाने शल्यमाख्यान्ति ॥२१ ॥
। पश्वादीनां प्रवेशेन कीर्तनैर्विरुतैर्दिशः ॥ २२ ॥
शल्यज्ञानं वर्गवशात्पूर्वादीशान्ततः क्रमात् ॥२३ ॥
। चवर्गे भस्म दक्षे स्वादृवर्गेऽस्थि ' च नैर्ऋते ॥ २४ ॥
। यवर्गे शवकीटादि शवर्गे लोहमादिशेत् ॥ २५ ॥
। प्रोक्ष्याश्मभिः ' करापूरैरष्टाङ्गुलमृदन्तरैः ॥२६ ॥
॥ लिप्तां समप्लवां तत्र कारयित्वा भुवं गुरुः ॥ २७ ॥
। तोरणद्वा: पतीनिष्ट्वा प्रत्यग्द्वारेण संविशेत् ॥ २८ ॥
। कलशं वर्धनीशक्तं लोकपालशिवार्चनम् ॥२९ ॥
। यजमानान्वितो यायाच्छिलानां स्नानमण्डपम् ॥३० ॥
मुख से अ क च ट त प य श ह - ये अक्षर निकलें तो वे ही पूर्व से लेकर मध्य पर्यन्त शल्यकारण होते हैं ( जैसे - ' अ ' ' कहने से पूर्व दिशा में और ' क ' कहने से अग्निकोण में शल्य को बतलाना चाहिए इत्यादि । ) प्रश्नकर्त्ता के अङ्गविकार से भी शल्याशल्य का विचार किया जा सकता है । अर्थात् प्रश्नकाल में प्रश्नकर्त्ता किस अङ्ग के बल बैठा है, किस अङ्ग का स्पर्श कर रहा है- इन सब बातों के ऊपर ध्यान देना आवश्यक है । ( जिस स्थान में उस समय ) पशु - पक्षियों के प्रवेश करने तथा शब्द करने से भी शब्द का ज्ञान होता है । ( शल्यज्ञान करने के उपर्युक्त प्रकारों का स्पष्टीकरण यह है कि ) किसी तख्ते के ऊपर या भूमि पर ( अवर्ग आदि ) आठ वर्गों के मातृकाक्षरों को लिखकर पूर्व से ईशानकोण की दिशा तक क्रमशः वर्ग द्वारा शल्यज्ञान कराना चाहिए । अवर्ग के पड़ने से अग्निकोण में कोयला समझना चाहिए । चवर्ग के पड़ने से दक्षिण दिशा में भस्म, टवर्ग के पड़ने से नैर्ऋतकोण में हड्डी और तवर्ग के पड़ने से पश्चिम दिशा में ईंट समझना चाहिए । पवर्ग के पड़ने से शव और कीड़े - मकोड़े आदि तथा शवर्ग के पड़ने से ( अवशिष्ट दिशाओं में ) लोहा समझना चाहिए । इसी भाँति हवर्ग में चाँदी और अवर्ग में अनर्थकारी पदार्थ का ज्ञान होना चाहिए । गुरु को मुग्दर से मिट्टी के बड़े - बड़े टुकड़ों को तुड़वाकर भूमि को समतल और चिकनी करवा लेनी चाहिए ॥२१-२७ ॥ उसके बाद भूमि को आठ अङ्गुल ऊँची मिट्टी से लिपवाकर उसे जल से भलीभाँति स्वच्छ करवा लेना चाहिए । इस प्रकार भूमि को समतल बनवाकर और लिपवाकर सामान्य अर्घ्यजल को लेकर गुरु को आगे कहे जानेवाले मण्डप के लिए प्रस्थान करना चाहिए । मण्डप के मुख्य द्वार पर द्वारपतियों की पूजा करके उसमें पश्चिम द्वार से प्रवेश करे । वहाँ आत्म - शुद्धि करके कुण्ड तथा मण्डप का संस्कार करे । फिर टोंटीवाले कलश की स्थापना करके, लोकपाल और शिव की अर्चना करके, अग्नि - प्रज्वलन तथा पूजन आदि सब कार्य पहले ही की भाँति कर लेना चाहिए । ( अब शिलान्यास की विधि बतायी जा रही है ) गुरु यजमान को साथ लेकर १ अकचटत " तत्प्रमाणतः नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । २ ख. ग. ' दिपाति । ३ क. ङ. च. ' वर्गे स्थिरनै ' । ख. ग. “ वर्गे चरनै " । ४ क. ङ. च. ' त् । कवर्गे रजतं तद्वद्रक्षास्ताच्च करान ' । ख. ग. ' त् । कवर्गे रजतं तद्वदवर्गानर्थचारपि । ५ घ. प्रोक्ष्याऽऽत्मभिः । ६ क. ख. ग. ङ. च. ' न्यार्घक ' । ७ घ. ' ग्नेर्जनन ' । ८ ख. ग. नां स्थान । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्विनवतितमोऽध्यायः शिलाः प्रासादलिङ्गस्य पादा ' धर्मादिसंज्ञकाः पाषाणानां शिलाः कार्या इष्टकानां तदर्धतः अङ्किता नववक्त्राद्यैः पङ्कजाः पङ्कजान्विताः आसां पद्मो महापद्मः शङ्खोऽथ मकरस्तथा नन्दा भद्रा जया पूर्णा अजिता चापराजिता सुभद्रश्च विभद्रश्च सुनन्दः पुष्पनन्दकः नवानां तु यथासंख्यं निधिकुम्भा अमी नव सर्वासामविशेषेण तनुत्रेणावगुण्ठनम् अस्त्रेण हुंफडन्तेन मलस्नानं समाचरेत् गन्धतोयान्तरं कुर्यान्निजनामाङ्किताणुना चन्दनेन समालभ्य ' वस्त्रैराच्छादयेच्छिलाम् " शय्यायां कुशतल्पे वा हृदयेन निवेशयेत् त्रिखण्डव्यापकं तत्त्वत्रयं चानुक्रमान्न्यसेत् तन्मात्रादौ धरान्ते १३ च शिवविद्यात्मनां स्थितिः ३४५ । अष्टाङ्गुलोच्छ्रिताः शस्ताश्चतुरस्राः करायताः ॥३१ ॥
। प्रासादेऽश्मशिलाः शैल इष्टका इष्टकामये ॥३२ ॥
। नन्दा भद्रा जया रिक्ता पूर्णाख्या पञ्चमी मता ॥३३ ॥
। समुद्रश्चेति पञ्चामी निधिकुम्भाः क्रमादधः ॥३४ ॥
1 । विजया मङ्गलाख्या ' च धरणी नवमी शिला ॥ ३५ ॥
। जयोऽथ विजयश्चैव कुम्भः पूर्णस्तथोत्तरः ' ॥ ३६ ॥
। आसनं प्रथमं दत्त्वाऽऽताड्योल्लिख्य शराणुना ॥ ३७ ॥
। मृद्भिर्गोमयगोमूत्रकषायैर्गन्धवारिणा ॥३८ ॥
। विधिना पञ्चगव्येन स्नानं पञ्चामृतेन च ॥ ३ ९ ॥ । फलरत्नसुवर्णानां गोशृङ्गसलिलैस्ततः ॥ ४० ॥
। स्वर्णोत्थमासनं दत्वा नीत्वा योगं " प्रदक्षिणम् ॥४१ ॥
। संपूज्य न्यस्य बुद्ध्यादिधरान्तं तत्त्वसंचयम् ॥४२ ॥
। बुद्ध्यादौ चित्तपर्यन्ते चिन्तातन्मात्रकावधौ ॥४३ ॥
। तत्त्वानि निजमन्त्रेण तत्त्वेशांश्च हृदार्चयेत् ॥४४ ॥
उस स्थान में जाय जहाँ शिलाएँ रखी हुई हों । महल बनाने की शिला पाद और धर्म आदि के नाम से पुकारी जाती है । पत्थर की शिला आठ अङ्गुल ऊँची, सुन्दर, चौकोर तथा हाथ भर लम्बी होनी चाहिए और ईंट की शिला आकार में उसकी आधी होनी चाहिए । पत्थर का महल बनवाना हो तो पत्थर की शिला का न्यास करे और ईंट का बनवाना हो तो ईंट का शिलान्यास करे ॥२८-३२ ॥ शिला के ऊपर नौ मुखों तथा कमलों का चिह्न अङ्कित करना चाहिए । नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता तथा पूर्णा- ये पाँच निधियाँ और इनके पद्म, महापद्म, शङ्ख, मकर और समुद्र - ये पाँच कुम्भ क्रमशः नीचे की ओर अङ्कित रहने चाहिए । नन्दा, भद्रा, जया, पूर्णा, अजिता, अपराजिता, विजया, मंगला और धरणी - ये नौ निधियाँ तथा इनके सुभद्र, विभद्र, सुनन्द, पुष्पनन्दक, जय, विजय, कुम्भ, पूर्ण और उत्तर - ये नौ कुम्भ भी अङ्कित होने चाहिए ॥३३-३६३ ॥ तदनन्तर शिला को आसन पर रखकर शस्त्र - मन्त्र से ताड़न करके उस पर मन्त्र लिख दे । फिर कवच से लपेटकर ‘ हुं फट् ' शब्द से अन्त होनेवाले अस्त्र - मन्त्र को पढ़कर मिट्टी, गोबर, गोमूत्र, कषाय और गन्ध-जल से मलस्नान कराये । तत्पश्चात् पञ्चगव्य और पञ्चामृत से स्नान कराकर अपना नाम जुड़े हुए मन्त्र द्वारा गन्ध, फल, रत्न, सुवर्ण तथा गोशृङ्ग के जल से स्नान कराये ॥३७-४० ॥ तदनन्तर चन्दन का लेपकर वस्त्रों से शिला को आच्छादित कर दे, फिर उसे सोने का आसन देकर सामान्य शय्या या कुश की बनी हुई शय्या पर उसे हृदय - मन्त्र से स्थापित करे । तदनन्तर उसका पूजन करके बुद्धि से धरा तक तत्त्व का सञ्चय करते हुए त्रिखण्ड में व्याप्त तीन तत्त्वों का क्रमशः न्यास करे । उस समय यह भावना करे कि बुद्धि से चित्त तक, चित्त से तन्मात्रा तक और तन्मात्रा से घरा तक शिव, विद्या और आत्मतत्त्वों की स्थिति है । तत्पश्चात् अपने मन्त्र से तत्त्वों का और हृद्मन्त्र से तत्त्वेशों का पूजन करे ॥४१-४४ ॥ १ घ. पादध । २ क. च. मण्डलाक्षा । ३ क. ङ. च. ' ष्पदन्तकः । ४ क. ङ. च. पूर्वस्त ' । ५ क. ख. ग. ङ. च. प्रणवं । ६ घ. ' ण हूं फ ° । ७ क. ङ. च. कुम्भानां । ८ क. ङ. च. ' लवत्सुसु ' । ९ क. ङ. च. ' च्छिलाः । तद्वर्णनाश । १० ख. ग. म् । यदुत्थ ' । ११ घ. यागं । १२ ङ. च. चित्तं तैर्मातृका । १३ क. ङ. वरान्ते । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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३४६ अग्निपुराणम् स्थानेषु पुष्पमालादिचिह्नितेषु यथाक्रमम् ॥।४५ ॥ ॐ हूं शिवतत्त्वाय नमः । ॐ हूं शिवतत्त्वाधिपतये रुद्राय नमः । ॐ हां विद्यातत्त्वाय नमः ।
ॐ ह्रां विद्यातत्त्वाधिपाय विष्णवे नमः । ॐ हामात्मतत्त्वाय नमः ॥४६ ॥
ॐ हामात्मतत्त्वाधिपतये ब्रह्मणे नमः क्षमाग्नियजमानार्काञ्जलवातेन्दुखानि च । प्रतितत्त्वं न्यसेदष्टौ मूर्ती: प्रतिशिलां शिलाम् ॥४७ ॥
स ( श ) र्वं पशुपतिं चोग्रं रुद्रं भवमथेश्वरम् । महादेवं च भीमं च मूर्तीशांश्च यथाक्रमात् ॥४८ ॥
ॐ धरामूर्तये नमः । ॐ ५ धराधिपतये नमः इत्यादिमन्त्राँल्लोकपालान्यथासंख्यं निजाणुभिः । विन्यस्य इन्द्रादीनां तु बीजानि वक्ष्यमाणक्रमेण तु लूं तं शुं पूं वूं यूं मूं हूं क्षूमिति उक्तो नवशिलापक्षः शिला पञ्चपदा तथा । प्रतितत्त्वं ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रः ईश्वरश्च सदाशिवः । एते च ॐ पृथ्वीमूर्तये नमः । ॐ पृथ्वीमूर्त्यधिपतये ब्रह्मणे संपूज्य कलशान्पञ्च क्रमेण निजनामभिः 1 । निरुन्धीत ॥४९ ॥
पूजयेत्कुम्भांस्तन्मन्त्रैर्वा निजाणुभिः ॥।५० ॥ ॥५१ ॥
न्यसेन्मूर्तीः सृष्ट्या पञ्च धरादिकाः ॥ ५२ ॥
पञ्चमूर्तीशा यष्टव्यास्तासु पूर्ववत् ॥ ५३ ॥
नमः । इत्यादि मन्त्राः ॥५४ ॥
विधानेन न्यासो मध्यशिलाक्रमात् ॥५५ ॥
पुष्प, माला अदि से चिह्नित स्थानों पर क्रमशः ' ॐ हूं शिवतत्त्वाय नमः ', ' ॐ हूं शिवतत्त्वाधिपतये रुद्राय नमः ', ' ॐ हां विद्यातत्त्वाय नमः ', ' ॐ हां विद्यातत्त्वाधिपाय विष्णवे नमः ', ' ॐ हामात्मतत्त्वाय नमः ', ‘ ॐ हामात्मतत्त्वाधिपतये ब्रह्मणे नमः ' - इन मन्त्रों को पढ़ते हुए पूजन करना चाहिए ॥४५-४६ ॥ तदनन्तर प्रत्येक तत्त्व में पृथ्वी, अग्नि, यजमान, सूर्य, जल, वायु, चन्द्रमा और आकाश - इन आठ मूर्तियों का न्यास करके प्रत्येक शिला में शर्व, पशुपति, उग्र, रुद्र, भव, महेश्वर, महादेव और भीम - इन आठ मूर्ति स्वामियों का भी क्रमशः न्यास करे । उसके बाद ' ॐ धरामूर्तये नमः ', ' ॐ धराधिपतये नमः ' - इत्यादि मन्त्रों से तथा लोकपालों का अपने मन्त्र से संख्यानुसार न्यास करके कुम्भों का उनके मन्त्र से अथवा अपने मन्त्र से न्यास करना चाहिए । इन्द्र आदि के बीज मन्त्र ये हैं - ' लूं रूं शुं पूं वूं यूं मूं हूं क्षूम् । ' इस प्रकार नवशिला पक्ष की विधि का वर्णन हुआ । अब पञ्चशिला पक्ष का वर्णन किया जाता है - प्रत्येक तत्त्व में सृष्टि - प्रक्रिया से पृथ्वी आदि पाँच मूर्तियों को शिलाओं के ऊपर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव - इन मूर्तियों की पूजा करनी चाहिए । उनके ‘ ॐ पृथ्वीमूर्तये नमः ’, ‘ ॐ पृथ्वीमूर्त्यधिपतये ब्रह्मणे नमः ' इत्यादि मन्त्र हैं ॥४७-५४ ॥ तदनन्तर अपने नामों से पाँच कलशों का क्रमपूर्वक पूजन करके मध्यशिला से लेकर विधिपूर्वक न्यास करे । फिर कुश - तिल लेकर प्राकार मन्त्र से कुण्डों में धारिका - शक्ति का न्यास करके, पूजन करके, घी आदि से तत्त्वों, तत्त्वाधिपों और मूर्तियों - मूर्तीशों का तर्पण करना चाहिए ॥५५-५६३ ॥ १. ख. ग. हूं । २ ख. ग. हूं । ३ क. ङ. च. ह्रीं । ख. हीं । ४ क. ङ. च. ॐ वरा । ५ क. ङ. च. ॐ वरा । ६ क. ङ. च. “ मः । लोकपालानन्तान्तान्य । ७ क. ङ. च. तु । ॐ सूं रुं यूं शूं हूं कुमि । ८ क. ख. ग. ङ. च. तदा । ९ क. ङ. च. कुम्भेषु । ख. कुशेषु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA