अग्नि पुराण — पृष्ठ 401–410

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

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षडधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मणा यतयः सिद्धाः पुण्यवन्तश्च ' चोत्तरे पूर्वतश्च बलाध्यक्षा आग्नेये विविधं बलम् पश्चिमे च महामात्यान्कोषपालांश्च ' कारुकान् ' पूर्वतः क्षत्रियान्दक्षे वैश्याञ्शूद्रांश्च पश्चिमे पूर्वेण चरलिङ्ग्यादी श्मशानादीनि ' दक्षिणे न्यसेन्मूलेच्छांश्च कोणेषु ग्रामादिषु तथा स्थितिम् देवादीनां पश्चिमतः ( ‘ पूर्वास्यानि गृहाणि हि नाकेशविष्ण्वादिधामानि रक्षार्थं नगरस्य च ) भुज्यते तत्पिशाचाद्यै रोगाद्यैः परिभूयते पूर्वायां ( र्वस्यां ) श्रीगृहं प्रोक्तमाग्नेय्यां वै महानसम् भोजनं पश्चिमायां तु वायव्यां धान्यसंग्रहः चतुःशालं त्रिशालं वा द्विशालं चैकशालकम् ३ ९ ७ । फलाद्यादिविक्रयिण ईशाने च वणिग्जनाः ॥ ९ ॥

। स्त्रीणामादेशिनो दक्षे काण्डारान्नैर्ऋते न्यसेत् ॥१० ॥

। उत्तरे दण्डनाथांश्च नायकद्विजसंकुलान् ॥११ ॥

। दिक्षु वैद्यान्वाजिनश्च बलानि च चतुर्दिशम् ॥१२ ॥

। ' पश्चिमे गोधनाद्यं च कृषिकर्तृस्तथोत्तरे ॥ १३ ॥

1 । श्रियं वैश्रवणं द्वारि पूर्वे तौ पश्यतां श्रियम् ॥१४ ॥

। पूर्वतः पश्चिमास्यानि दक्षिणे चोत्तराननाम् (? ) ॥१५ ॥

। निर्दैवतं तु नगरग्रामदुर्गगृहादिकम् ॥१६ ॥

। नगरादि सदैवं हि जयदं भुक्तिमुक्तिदम् ॥१७ ॥

। शयनं दक्षिणस्यां तु नैर्ऋत्यामायुधाश्रयम् ॥१८ ॥

। उत्तरे द्रव्यसंस्थानमैशान्यां देवतागृहम् ॥१९ ॥

। चतुःशालगृहाणां तु शालालिन्दकभेदतः ॥२० ॥

( नगर के ) उत्तर की ओर बसाना चाहिए । फल तथा अन्य खाद्य - पदार्थ बेचनेवालों को ( नगर के ) पूर्वोत्तर में, सेनापतियों को पूर्व दिशा में तथा विविध प्रकार की सेना को दक्षिण - पूर्व की ओर बसाना चाहिए । अन्तःपुर के अध्यक्षों को दक्षिण दिशा में और काण्डार नामक ( राजकीय कैम्प लगानेवाली ) जाति को दक्षिण - पश्चिम की ओर बसाना चाहिए ॥६-१० ॥ प्रधान सचिवों, कोश - रक्षकों तथा शिल्पियों को पश्चिम दिशा में, दण्डाध्यक्षों, सरदारों तथा ब्राह्मणों को उत्तर दिशा में, क्षत्रियों को पूर्व दिशा में, वैश्यों को दक्षिण दिशा में और शूद्रों को पश्चिम दिशा में बसाना चाहिए । वैद्यों, घुड़सवारों तथा ( अन्य ) सिपाहियों को ( नगर के ) चारों तरफ बसाना चाहिए । गुप्तचरों को पूर्व दिशा में तथा श्मशान और गोशाला का निर्माण क्रमशः दक्षिण और पश्चिम दिशाओं में करना चाहिए । किसानों को उत्तर दिशा में और म्लेच्छों को ( चारों ) कोने में बसाना चाहिए । यही स्थिति गाँवों के निर्माण में भी रहती है । नगर के पूर्वी फाटक के दोनों ओर लक्ष्मी तथा कुबेर की मूर्तियों को आमने - सामने स्थापित करना चाहिए । नगर की रक्षा के लिए ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश की मूर्तियों की ( भी ) स्थापना करनी चाहिए, क्योंकि जिस नगर या गाँव या किले या घर में देवताओं की मूर्तियाँ नहीं रहती हैं वहाँ पिशाच आदि निवास करने लगते हैं और वहाँ पर रोग आदि का आक्रमण होता रहता है । इसके विपरीत जो नगर आदि देवताओं की ( प्रतिमाओं ) से युक्त होते हैं, वे विजय, भोगविलास और मोक्षदायक हुआ करते हैं ॥११-१७ ॥ राजमहल में पूर्व की ओर कोशागार, दक्षिण - पूर्व की ओर पाकशाला, दक्षिण की ओर शयनकक्ष, दक्षिण - पश्चिम की ओर अस्त्रागार, पश्चिम की ओर भोजनालय, पश्चिमोत्तर की ओर धान्यागार, उत्तर की ओर द्रव्यागार तथा पूर्वोत्तर की ओर देवालय का निर्माण करना चाहिए । राजमहल को चतुःशाल, ( एक-दूसरे के सामने स्थित चार घरोंवाला महल ) त्रिशाल, द्विशाल या एकशाल बनाना चाहिए । शाला तथा अलिन्दक १ क. ङ. च. ‘ वणस्तिथोत्त ' । २ क. ङ. च. ' हाभागान्को । ३ क. ङ. च. कारका । ४ क. ङ. च. ' जसङ्गणान् । ५ क. ङ. च. ' लिङ्गादी ' । ६ पश्चिमे तथोत्तरे नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । ७ क. ङ च. स्थितम् । ८ पूर्वास्यानि नगरस्य च क. ङ. च. पुस्तकेषु त्रुटितम् । ९ ग. ' त्तरेण वा । ना । १० क. ङ. च. ' लानिनवभे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 402

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३ ९ ८ अग्निपुराणम् शतद्वयं तु जायन्ते पञ्चाशत्पञ्च तेष्वपि । त्रिशालानि तु चत्वारि द्विशालानि तु पञ्चधा ॥ २१ ॥

एकशालानि चत्वारि एकालिन्दानि वच्मि च । अष्टाविंशदलिन्दानि गृहाणि नगराणि च ॥ २२ ॥

चतुर्भिः सप्तभिश्चैव पञ्चपञ्चाशदेव तु । षडलिन्दानि विंशैव अष्टाभिर्विंश (? ) एव हि ॥ २३ ॥

अष्टालिन्दं भवेदेवं नगरादौ गृहाणि हि ॥२४ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये नगरादि वास्तुकथनं नाम षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥

अथ सप्ताधिकशततमोऽध्यायः स्वायंभुवसर्गकथनम् अग्निरुवाच वक्ष्ये भुवनकोषं च पृथ्वीद्वीपादिलक्षणम् । अग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च वपुष्मान्द्युतिमांस्तथा ॥१ ॥

मेधा मेधातिथिर्भव्यः सवनः पुत्र एव च । ज्योतिष्मान्दशमस्तेषां सत्यनामा सुतोऽभवत् ॥२ ॥

प्रियव्रतसुताः ख्याताः सप्तद्वीपान्ददौ पिता । जम्बूद्वीपमथाग्नीधे प्लक्षं मेधातिथेर्ददौ || ३ || वपुष्मते शाल्मलं च ज्योतिष्मते कुशाह्वयम् । क्रौञ्चद्वीपं द्युतिमते शाकं भव्याय दत्तवान् ॥४ ॥

पुष्करं सवनायादादग्नीध्रौऽदात्सुते ' शतम् । जम्बूद्वीपं पिता लक्षं नाभेर्दत्तं हिमाह्वयम् || ५ || हेमकूटं किंपुरुषे ( बरामदा ) आदि के भेद बतलाये गये हैं । त्रिशाल अलिन्दों ( बरामदा ) की श्री अग्निमहापुराण में हरिवर्षाय नैषधम् ॥ इलावृते मेरुमध्यं रम्ये नीलाचलाश्रितम् ॥ ६ ॥

से चतुःशाल भवन दो सौ प्रकार के हो जाते हैं और उनमें से प्रत्येक के पचपन - पचपन भेद भवन के चार भेद, द्विशाल के पाँच भेद और एकशाल के चार भेद होते हैं । गृह तथा नगर में संख्या अट्ठाईस, चार, सात, पचपन, छह, बीस या आठ हो सकती है ॥ १८-२४ ॥ नगर आदि वास्तुप्रतिष्ठा - विधि - वर्णन नामक एक सौ छठवाँ अध्याय समाप्त ॥१०६ ॥

अध्याय १०७ स्वायम्भुव - सर्ग - वर्णन अग्निदेव बोले - अब मैं भुवनकोश तथा पृथ्वी के द्वीप आदि का लक्षण बतलाऊँगा । महाराज प्रियव्रत के दस पुत्र थे- अग्नीघ्र, अग्निबाहु, वपुष्मान्, द्युतिमान्, मेधा, मेधातिथि, भव्य, सवन, ज्योतिष्मान् और सत्य । इनमें से पिता ने सात को सात द्वीप दे दिया । अग्नीध्र को जम्बूद्वीप और मेधातिथि को प्लक्षद्वीप दिया गया ॥१-३ ॥ वपुष्मान् को शाल्मल, ज्योतिष्मान् को कुशाह्वय, द्युतिमान् को क्रौञ्च, भव्य को शाक और सवन को पुष्कर द्वीप दिये गये । तत्पश्चात् अग्नीघ्र ने अपने पुत्रों में द्वीपों का विभाजन इस प्रकार किया । पिता ने लक्ष नामक पुत्र को जम्बूद्वीप, नाभि को हिमाह्वय, किंपुरुष को हेमकूट, हरिवर्ष को नैषध, इलावृत को मेरुमध्य, रम्य को नीलाचल, हिरण्वान् को श्वेतवर्ष, कुरु को १ घ. ' ग्नीध्रेऽदा ' । २ क. ङ. च. नाभिदत्तं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 403

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सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ' हिरण्वते श्वेतवर्षं कुरूंस्तु कुरवे ददौ मेरोः प्रियव्रतः पुत्रानभिषिच्य ययौ वनम् यानि किं पुरुषाद्यानि ह्यष्ट वर्षाणि सत्तम जरामृत्युभयं नास्ति धर्माधर्मौ युगादिकम् ऋषभो मेरुदेव्यां च ऋषभाद्भरतोऽभवत् । भरताद्भारतं वर्षं भरतात्सुमतिस्त्वभूत् । स योगी " योगप्रस्थाने ' वक्ष्ये तच्चरितं पुनः । परमेष्ठी ततस्तस्मात्प्रतीहारस्तदन्वयः । उद्गीतोऽथ च प्रस्तारो विभुः प्रस्तारतः सुतः ) । ' नरो गयस्य तनयस्तत्पुत्रोऽभूद्विराट् ततः । महान्तस्तत्सुतश्चाभून्मनस्यस्तस्य ' चाऽऽत्मजः । ३ ९९ । भद्राश्वाय च भद्राश्वं केतुमालाय पश्चिमम् ॥७ ॥

। शालग्रामे तपस्तप्त्वा ययौ विष्ण्वालयं नृपः ॥८ ॥

। तेषां स्वाभाविकी सिद्धिः सुखप्राया ह्ययत्नतः ॥९ ॥

। नाधमं मध्यमं तुल्या हिमाद्देशात्त नाभितः ॥ १० ॥

ऋषभो दत्तश्रीः पुत्रे शालग्रामे हरिं गतः ॥११ ॥

भरतो दत्तलक्ष्मीकः शालग्रामे हरिं गतः ॥ १२ ॥

सुमतेस्तेजसस्तस्मादिन्द्रद्युम्नो व्यजायत ॥१३ ॥

( ' प्रतीहारात्प्रतीहर्ता प्रतिहर्त्तुर्भुवस्ततः ॥१४ ॥

पृथुश्चैव ततो नक्तो नक्तस्यापि गयः सुतः ॥ १५ ॥

तस्य पुत्रो महावीर्यो धीमांस्तस्मादजायत ॥१६ ॥

त्वष्टा त्वष्टुश्च विरजा रज ( जा ) स्तस्याप्यभूत्सुतः ॥१७ ॥

कुरुदेश, भद्राश्व को भद्राश्व और केतुमाल को मेरु का पश्चिम प्रदेश दे दिया । महाराज प्रियव्रत पुत्रों का राज्याभिषेक करके वन को चले गये । महाराज प्रियव्रत शालग्राम ( नामक वन ) में तपस्या करके स्वर्गलोक को चले गये ॥४-८ ॥ अये पुरुषश्रेष्ठ! किंपुरुष आदि जो आठ वर्ष ( देश ) बताये गये हैं, उनमें यह स्वाभाविक सिद्धि है कि वहाँ बिना प्रयत्न के ही सुख प्राप्त हो जाता है । वहाँ न तो वृद्धावस्था का भय है न मृत्यु का भय है, और वहाँ न तो धर्म - अधर्म है और न युग इत्यादि ही । वहाँ न तो कोई अधम कोटि का है और न कोई मध्यम कोटि का है, अपितु सभी तुल्य हैं । महाराज नाभि ने मेरुदेवी से ऋषभ नामक पुत्र प्राप्त किया । ऋषभ से भरत की उत्पत्ति हुई । ( राज्य का ) ऐश्वर्य अपने पुत्र ( भरत ) को सौंपकर ऋषभ ने शालग्राम वन में तपस्या करके विष्णुलोक को प्राप्त कर लिया । भरत के नाम पर ( इस देश का नाम ) भारतवर्ष प्रचलित हुआ है । ( कालान्तर ) में भरत से सुमति नामक पुत्र का जन्म हुआ । भरत ने ( भी ) पुत्र को राज्यलक्ष्मी देकर शालग्राम वन में तपस्या करके भगवान् विष्णु को प्राप्त कर लिया ॥९ -१२ ॥ सुमति योगी था । उसके चरित्र का वर्णन मैं योग - प्रस्थान के प्रसंग में पुनः करूँगा । सुमति से तेजस् और तेजस् से इन्द्रद्युम्न की उत्पत्ति हुई । इन्द्रद्युम्न से परमेष्ठी और परमेष्ठी से प्रतीहार का जन्म हुआ, जिससे वंश-परम्परा चल पड़ी । प्रतीहार से प्रतीहर्ता, प्रतीहर्ता से भुव, भुव से उद्गीथ, उद्गीथ से प्रस्तार और प्रस्तार से विभु का जन्म हुआ । विभु से पृथु, पृथु से नक्त और नक्त से गय नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई । गय का पुत्र हुआ नर और नर का पुत्र विराट् हुआ । विराट् का पुत्र महावीर्य और उसका पुत्र धीमान् हुआ ॥१३-१६ ॥ धीमान् का पुत्र महान्त और महान्त से मनस्य नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई । मनस्य से त्वष्टा, त्वष्टा से विरजस्, विरजस् से रजस् और उससे १ हिरण्वते ददौ नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । २ क. ङ. च. शालाग्रामे । ३ ख. ग. घ. विष्णोर्लयं । ४ क. ङ. च. ' ग विस्तारे व । ५ घ. ' प्रस्तावे व ' । ६ प्रतीहारात् " सुतः नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । ७ ङ. यशः । च. शयः । ८ ङ. नगो । च. नवो । ९ क. ङ. च. न्मनः प्राप्तस्य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 404

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४०० अग्निपुराणम् सत्यजिद्रजसस्तस्य जज्ञे पुत्रशतं मुने ॥ विश्वज्योतिः प्रधानास्ते भारतं तैर्विवर्धितम् ॥१८ ॥

कृतत्रेतादिसर्गेण सर्गः स्वायम्भुवः स्मृतः ॥१९ ॥

इत्यादि महापुराण आग्नेये स्वायम्भुवसर्गकथनं नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥

अथाष्टाधिकशततमोऽध्यायः भुवनकोशकथनम् अग्निरुवाच जम्बूप्लक्षाह्वयौ द्वीप शाल्मलिश्चापरो महान् । कुशः क्रौञ्चस्तथा शाकः पुष्करश्चेति सप्तमः ॥ १ ॥

एते द्वीपाः समुद्रैस्तु सप्त सप्तभिरावृताः । लवणेक्षुसुरासर्पिर्दधिदुग्धजलैः समम् ॥२ ॥

जम्बूद्वीपो द्वीपमध्ये तन्मध्ये मेरुरुच्छ्रितः । चतुरशीतिसाहस्त्रो भूयिष्ठः षोडशाद्रिराट् || ३ || द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तारात्षोडशाधः सहस्त्रवान् । भूयस्तस्यास्य शैलोऽसौ कर्णिकाकारसंस्थितः ॥४ ॥

हिमवान्हेमकूटश्च निषधश्चास्य दक्षिणे । नीलः श्वेतश्च शृङ्गी च उत्तरे वर्षपर्वताः ॥५ ॥

लक्षप्रमाणौ द्वौ मध्ये दशहीनास्तथाऽपरे । सहस्रद्वितयोच्छ्रास्तावद्विस्तारिणश्च ते ॥६ ॥

सत्यजित् की उत्पत्ति हुई । अये मुनिराज! सत्यजित् के सौ पुत्र थे जिनमें ज्येष्ठ पुत्र था विश्वज्योति । इन्हीं सब भाइयों से सतयुग, त्रेता आदि युगों में भारतवर्ष की वृद्धि होती रही । उनकी इस सृष्टि को ही स्वायम्भुव सृष्टि कहते हैं ॥१७-१९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में स्वायम्भुवसर्ग - वर्णन नामक एक सौ सातवाँ अध्याय समाप्त ॥१०७ ॥

अध्याय १०८ भुवनकोश - वर्णन अग्निदेव बोले - जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च, शाक तथा पुष्कर - ये सातों महाद्वीप सात समुद्रों से घिरे हुए हैं । ये सातों सागर – लवण, ईख, मद्य, घी, दही, दूध और जल के सागर हैं । जम्बूद्वीप इन सब द्वीपों के बीच में पड़ता है । उसके मध्य में चौरासी हजार योजन ऊँचा सुमेरु पर्वत है जो सोलह पर्वतों का राजा है । उसका शिखर बत्तीस हजार योजन चौड़ा है और उसकी नींव एक हजार योजन गहराई में है । वह पर्वत कर्णिका के आकार में स्थित है । उसके दक्षिण की ओर हिमवान्, हेमकूट तथा निषध पर्वत स्थित हैं और उत्तर की ओर नील, श्वेत तथा श्रृंगी पर्वत हैं । इन पर्वतों को वर्षपर्वत कहते हैं । उनमें दो पर्वत बीच में एक - एक लाख योजन लम्बे हैं और अन्य पर्वत उनसे दस - दस हजार योजन कम हैं । उनकी ऊँचाई दो हजार योजन है और चौड़ाई भी उतनी ही है ॥१-६ ॥ अये ब्राह्मण! वर्षों में पहला भारतवर्ष है, दूसरा किंपुरुष और तीसरा हरिवर्ष । इसी तरह अन्य वर्षों को भी समझना CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 405

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अष्टाधिकशततमोऽध्यायः भारतं प्रथमं वर्षं ततः किं पुरुषं स्मृतम् ( रम्यकं चोत्तरे वर्षं तथैवान्यद्धिरण्मयम् नवसाहस्रमेकैकमेतेषां मुनिसत्तम मेरोश्चतुर्दिशं तत्र नवसाहस्रविस्तृतम् विष्कम्भार रचिता मेरोर्योजनायुतविस्तृताः विपुलः पश्चिमे पार्श्वे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्मृतः एकादशशतायामाः पादपाः गिरिकेतवः जम्बूनदी रसेनास्यास्त्विदं जाम्बूनदं परम् वनं चैत्ररथं पूर्वे दक्षिणे गन्धमादनः अरुणोदं महाभद्रं शीतोदं मानसं तथा दक्षिणेऽद्रेस्त्रिकूटाद्याः ' शिखिवास - ' मुखा ' जले चतुर्दश सहस्राणि योजनानां च दिक्षु च विष्णुपादात्प्लावयित्वा चन्द्रं स्वर्गात्पतत्यपि ४०१ । हरिवर्ष ' तथैवान्यन्मेरोर्दक्षिणतो द्विज ॥७ ॥

। उत्तराः कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा ॥८ ॥

। इलावृतं च तन्मध्ये सौवर्णो मेरुरुच्छ्रितः ॥९ ॥

। इलावृतं महाभाग चत्वारश्चात्र पर्वताः ॥१० ॥

। पूर्वेण मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः ॥११ ॥

। कदम्बस्तेषु जम्बूश्च पिप्पलो वट एव च ॥१२ ॥

। जम्बूद्वीपेति संज्ञास्यात् फलं जम्ब्वा गजोपमम् ॥१३ ॥

। भद्राश्वः ' पूर्वतो मेरोः केतुमालस्तु पश्चिमे ॥१४ ॥

। वैभ्राजं पश्चिमे सौम्ये नन्दनं च सरांस्यथ ॥ १५ ॥

। सिताम्भश्चक्रमुञ्जाद्याः पूर्वतः केशराचलाः ॥१६ ॥

। शङ्खकूटादयः सौम्ये मेरौ च ब्रह्मणः पुरी ॥१७ ॥

। इन्द्रादिलोकपालानां समन्ताद्ब्रह्मणः पुरः ॥१८ ॥

। पूर्वेण शीता भद्राश्वाच्छैलाद्गताऽर्णवम् ” ॥१९ ॥

चाहिए । ये वर्ष मेरु पर्वत से दक्षिण की ओर रम्यक, हिरण्य तथा उत्तर कुरुवर्ष स्थित हैं । अये मुनिश्रेष्ठ! इनमें प्रत्येक का प्रमाण ( माप ) नौ - नौ हजार योजन है । इलावृत वर्ष सबके बीच में है जो अत्यन्त ऊँचे स्वर्ण निर्मित मेरु पर्वत के चारों ओर नौ हजार योजन में फैला हुआ है । अये महात्मन्! वहाँ दस - दस हजार योजन में फैले हुए चार पर्वत हैं जो मेरु पर्वत की अर्गला के रूप में फैले हुए हैं ॥७-१०३ ॥ सुमेरु पर्वत के पूर्व की ओर मन्दराचल, दक्षिण की ओर गन्धमादन, पश्चिम की ओर विपुल और उत्तर की ओर सुपार्श्व पर्वत विद्यमान हैं । उन पर्वतों के ऊपर कदम्ब, जामुन, पीपल तथा वट के वृक्ष ग्यारह ग्यारह सौ योजन लम्बे होने के कारण ( सुमेरु ) पर्वत की पताका से प्रतीत होते रहते हैं । उसी जामुन के वृक्ष से ही इस द्वीप का नाम जम्बूद्वीप पड़ गया है । उस जामुन का फल हाथी के बराबर होता है । उस ( फल ) के रस से निकलकर बहनेवाली नदी जम्बू नदी कहलाती है और जम्बू नदी से उत्पन्न होने के कारण ही इसे ( सोने को ) जम्बूनद कहा जाता है । मेरु से पूर्व की ओर भद्राश्व और पश्चिम की ओर केतुमाल नामक पर्वत हैं ॥११-१४ ॥ मेरु के पूर्व में चैत्ररथ, दक्षिण में गन्धमादन, पश्चिम में वैभ्राज और उत्तर में नन्दन वन है । वहाँ पर बहुत से सरोवर भी हैं, जिनके नाम हैं- अरुणोद, महाभद्र, शीतोद, मानस और सिताम्भ । मेरु पर्वत के पूर्व की ओर चक्र और मुञ्ज आदि केशराचल, दक्षिण की ओर त्रिकूट आदि, पश्चिम की ओर शिखिवास आदि और उत्तर की ओर शंखकूट आदि पर्वत विद्यमान हैं । मेरु के ऊपर की नगरी तथा उसके चारों ओर इन्द्रादि लोकपालों का निवास है, जो सभी दिशाओं में चौदह हजार योजन में फैले हुए हैं । ( आकाशगङ्गा की चौथी धारा ) विष्णु के चरण से निकली है । वह स्वर्ग से गिरकर चन्द्रलोक को जलप्लावित करती हुई मेरु के पूर्व भद्राश्व नामक पर्वत १ क. ङ. च. ‘ मनः प्राप्तस्य । २ रम्यकं पर्वतावुभौ नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । ३ ख. ग. पुस्तकयोरिदमर्धमत्र नास्ति किं चोत्तरश्लोक पूर्वार्धोत्तरं विद्यते । ४ सुपार्श्वरिति पाठान्तरम् । ५ घ. द्रं संशितीदं समानसम् । शिता । ६ ख. शिशिराचलाः । ७ क. ङ. च. शिशिवा ' । ८ ग. बासुमु । ९ ग. ' खानले । १० घ. तन्त्यपि । ११ ग. ' द्राश्वं शैला । २६ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 406

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४०२ अग्निपुराणम् तथैवालकनन्दाऽपि दक्षिणेनैव भारतम् । अब्धिं च चक्षुः सौम्याऽब्धिं भद्रोत्तरकुरूनपि । तयोर्मध्यगतो मेरुः कर्णिकाकारसंस्थितः पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः । तौ दक्षिणोत्तरायामावानीलनिषधायतौ । अशीतियोजनायामावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ मेरोः पश्चिमदिग्भागे यथा पूर्वे तथा स्थितौ पूर्वपश्चायतावेतावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ४ केशरादिषु ' याः श्रेण्यस्तासु सन्ति पुराणि हि भौमानां स्वर्गधर्माणां न पापास्तत्र यान्ति च भारते कूर्मरूपी च मत्स्यरूपः कुरुष्वपि ( ' किं पुरुषाद्यष्टसु क्षुद्धीतिशोकादिकं न च

से दूसरे पर्वत पर होती हुई सागर में गिर जाती है ।

प्रयाति सागरं कृत्वा सप्तभेदाऽथ पश्चिमम् ॥२० ॥

आनीलनिषधा यामौ माल्यवद्गन्धमादनौ ॥ २१ ॥

। भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा ॥२२ ॥

जठरो देवकूटश्च मर्यादापर्वतावुभौ ॥२३ ॥

। गन्धमादनकैलासौ पूर्वच्चाऽऽयतावुभौ ॥२४ ॥

। निषधः पारियात्रश्च मर्यादापर्वतावुभौ ॥ २५ ॥

। त्रिशृङ्गो रुधिरश्चैव उत्तरौ वर्षपर्वतौ ॥ २६ ॥

। जाठराद्याश्च मर्यादाशैलामेरोश्चतुर्दिशम् ॥ २७ ॥

। लक्ष्मीविष्ण्वाग्निसूर्यादिदेवानां मुनिसत्तम ॥ २८ ॥

। भद्राश्वेऽस्ति हयग्रीवो वराहः केतुमालके ॥ २ ९ ॥

। विश्वरूपेण सर्वत्र पूज्यते भगवान्हरिः ॥ ३० ॥

। चतुर्विंशति साहस्रं प्रजा जीवन्त्यनामयाः ) ॥ ३१ ॥

उसी तरह अलकनन्दा भी मेरु के दक्षिण से भारत में आकर और सात धाराओं में विभक्त होकर समुद्र में मिल जाती है । पश्चिम में वह अब्धि, चक्षुष्, सौम्याब्धि, भद्र, उत्तरकुरु, आनील तथा निषध देशों से होकर जाती है । माल्यवान् तथा गन्धमादन पर्वत क्रमशः आनील तथा निषध देश के बराबर फैले हुए हैं ॥१५-२१ । उन दोनों के बीच में मेरु पर्वत कर्णिका के ही समान खड़ा हुआ है । मेरु रूपी कर्णिका से युक्त यह लोक ही पद्म है । इसके पत्र हैं - भारत, केतुमाल, भद्राश्व तथा उत्तर कुरुदेश । मर्यादापर्वतों के बाहर तक उसकी सीमा है । मर्यादापर्वत दो हैं - जठर तथा देवकूट । ये दोनों पर्वत दक्षिण से उत्तर की ओर आनील तथा निषध देशों को पार कर गये हैं । गन्धमादन तथा कैलास पर्वत का विस्तार भी इन्हीं के बराबर है । एक समुद्र दूसरे समुद्र तक फैले हुए निषध तथा पारियात्र नामक दो पर्वत अस्सी योजन तक फैले हुए हैं । मेरु के पश्चिम से पूर्व तक त्रिशृङ्ग और रुधिर नामक दो पर्वत खड़े हुए हैं ॥२२-२६ ॥ उनके उत्तर की ओर दो वर्षपर्वत ( और ) हैं, जो पूर्वीय और पश्चिमीय सागरों के बीच फैले हुए हैं । मेरु पर्वत के चारों ओर जाठर आदि मर्यादापर्वत फैले हुए हैं । अये मुनिश्रेष्ठ! केशर आदि पर्वतों के शिखरों पर लक्ष्मी, विष्णु, अग्नि तथा सूर्य आदि देवता निवास करते हैं । पृथ्वी पर स्वर्ग के धर्म का आचरण करनेवाले निवासियों में जो पाप कर्म करनेवाले हैं, वह यहाँ प्रवेश नहीं कर सकते हैं । भगवान् हरि की पूजा हयग्रीव के रूप में होती है । केतुमाल देश में वराह रूप में, भारत देश में कूर्म रूप में, कुरु देश में मत्स्य रूप में तथा अन्य सब देशों में विष्णु की अर्चना विश्वरूप में की जाती है । किन्नर आदि आठ देशों में भूख, भय तथा शोक आदि ( का अनुभव ) नहीं हुआ करता है । वहाँ चौबीस हजार प्रजाएँ आरोग्यपूर्ण जीवन बिता रही हैं । वहाँ कृतयुग आदि के रूप में युगों की कल्पना नहीं हुआ करती है । वहाँ जल, भूमि से ही १ ग. “ र्वपश्चाय ' । २ ख. ग. “ रिभद्रश्च । ३ त्रिशृङ्गो वर्षपर्वतौ नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । ४ ग. च. " तौ । जठ " । ५ घ. ' षु या द्रोण्य ' । ६ क. घ. ङ. मुद्गधर्माणां । ७ ख. ग. ' रिः । भूष कि पुरुषाद्य सु क्षु । ८ किं पुरुषा " जीवन्त्यनामयाः नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । ९ ख. ग. दीशो ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 407

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नवाधिकशततमोऽध्यायः ४०३ कृतादिकल्पना नास्ति भौमान्यम्भांसि नाम्बुदाः । सर्वेष्वेतेषु वर्षेषु सप्त सप्त कुलाचलाः नद्यश्च शतशस्तेभ्यस्तीर्थभूताः प्रजज्ञिरे । भारते यानि तीर्थानि तानि तीर्थानि वच्मि ते ॥३३ ॥३२ ॥ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये भुवनकोशकथनं नाम अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥

अथ नवाधिकशततमोऽध्यायः तीर्थमाहात्म्यम् ' अग्निरुवाच माहात्म्यं सर्वतीर्थानां वक्ष्ये यद्भुक्तिमुक्तिदम् । यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम् ॥१ ॥

विद्यातपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते । प्रतिग्रहादुपावृत्तो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ॥२ ॥

निष्पापस्तीर्थयात्री तु सर्वयज्ञफलं लभेत् । अनुपोष्य त्रिरात्राणि तीर्थान्यभिगम्य च ॥३ ॥

अदत्त्वा काञ्चनं गाश्च दरिद्रो नाम जायते 1 । तीर्थाभिगमने तत्स्याद्यद्यज्ञेनाऽऽप्यते फलम् ॥४ ॥

पुष्करं परमं तीर्थं सांनिध्यं हि त्रिसंध्यकम् । दशकोटिसहस्राणि तीर्थानां विप्र पुष्करे ॥५ ॥

ब्रह्मा सह सुरैरास्ते मुनयः सर्वमिच्छवः । देवाः प्राप्ताः सिद्धिमत्र स्नाताः पितृसुरार्चकाः ॥६ ॥

उत्पन्न हो जाता है, ( केवल ) मेघ ही जल प्रदान करनेवाले नहीं हैं । उपर्युक्त वर्षों में ( महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र नाम के ) सात - सात कुलपर्वत हैं । उनसे सैकड़ों नदियाँ निकली हैं जो ( पवित्रता के कारण ) तीर्थों के समान हैं । अब मैं तुमसे उन तीर्थों का वर्णन करूँगा जो भारतवर्ष में ( विद्यमान ) हैं ॥२७-३३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में भुवनकोश - वर्णन नामक एक सौ आठवाँ अध्याय समाप्त ॥१०८ ॥

अध्याय १० ९ तीर्थ - माहात्म्य अग्निदेव बोले- ( अब ) मैं सभी तीर्थों के उस माहात्म्य को बतलाऊँगा जो ( इस लोक में ) भोग और ( परलोक ) में मोक्ष प्रदान करनेवाला है । तीर्थों का फल उसी को प्राप्त होता है जिसके हाथ, पाँव तथा मन ( आदि इन्द्रियाँ ) सुसंयत हैं और जो विद्वान्, तपस्वी और कीर्तिमान् है । वह तीर्थयात्री सभी यज्ञों के फल को प्राप्त कर लेता है, जो दान आदि नहीं लेता है और स्वल्पाहारी, जितेन्द्रिय तथा निष्पाप हुआ करता है । जिसने कभी तीन रात उपवास नहीं किया, तीर्थयात्रा नहीं की तथा सुवर्ण और गायों का दान नहीं किया वह निश्चय ही ( दूसरे जन्म में ) दरिद्र होता है । ( यही नहीं ) तीर्थयात्रा से वही फल प्राप्त होता है, जो साधारणतया यज्ञों से प्राप्त होता है ॥१-४ ॥ अये ब्राह्मण देव! पुष्कर तीर्थ सर्वोत्कृष्ट तीर्थ है । ( कम - से - कम तीन संध्याओं तक उसका सान्निध्य प्राप्त करना चाहिए; क्योंकि पुष्कर तीर्थ में दस करोड़ सहस्र तीर्थ रहा करते हैं । वहाँ सभी देवताओं के साथ ब्रह्मा तो रहते ही हैं, सभी प्रकार की इच्छा करनेवाले मुनिजन भी वहाँ निवास करते हैं । पुष्कर तीर्थ में स्नान करके पितरों और देवताओं की पूजा करनेवाले १ नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 408

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४०४ अग्निपुराणम् अश्वमेधफलं प्राप्य ब्रह्मलोकं प्रयान्ति ते । पुष्करे दुष्करं गन्तुं पुष्करे दुष्करं तपः तत्र वासाज्जपाच्छ्राद्धात्कुलानां शतमुद्धरेत् । कण्वाश्रमं कोटितीर्थं नर्मदा चार्बुदं परम् सरस्वत्यब्धिसङ्गश्च सागरं तीर्थमुत्तमम् भूमितीर्थं ब्रह्मतुङ्गं तीर्थं पञ्चनदं परम् तीर्थं विनाशनं पुण्यं नागोद्भेदमघार्दनम् कुरुक्षेत्रे गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् तत्र विष्ण्वादयो देवास्तत्र वासाद्धरिं व्रजेत् पांशवोऽपि कुरुक्षेत्रे नयन्ति परमां गतिम् तीर्थं कनखलं पुण्यं भद्रकर्णहृदं तथा भृगुतुङ्गं च कुब्जाभ्रं गङ्गोदभेदमघान्तकम् कपालमोचनं तीर्थं तीर्थराजं प्रयागकम् कार्तिक्यामन्नदानाच्च निर्मलो ब्रह्मलोकभाक् ॥७ ॥

। दुष्करं पुष्करे दानं वस्तुं चैव सुदुष्करम् ॥८ ॥

जम्बूमार्गं च तत्रैव तीर्थं तण्डुलिकाश्रमम् ॥९ ॥

। तीर्थं चर्मण्वती सिन्धुः सोमनाथः प्रभासकम् ॥१० ॥

। पिण्डारकं द्वारका च गोमती सर्वसिद्धिदा ॥ ११ ॥

। भीमतीर्थं गिरीन्द्रश्च देविका पापनाशिनी ॥ १२ ॥

। तीर्थं कुमारकोटिश्च सर्वदानीरितानि च ॥ १३ ॥

। य एवं सततं ब्रूयात्सोऽमलः प्राप्नुयाद्दिवम् ॥ १४ ॥

। सरस्वत्यां संनिहित्यां स्नानकृद्ब्रह्मलोकभाक् ॥१५ ॥

। धर्मतीर्थं सुवर्णाख्यं गङ्गाद्वारमनुत्तमम् ॥१६ ॥

। गङ्गासरस्वतीसङ्गं ब्रह्मावर्तमघार्दनम् ॥ १७ ॥

। वाराणसी वरं तीर्थमविमुक्तमनुत्तमम् ॥१८ ॥

। गोमतीगङ्गयोः सङ्गं गङ्गा सर्वत्र नाकदा ॥ १ ९ ॥ देवताओं ने सिद्धि प्राप्त की थी । इसमें स्नान करनेवाले ( प्राणी ) अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करके ब्रह्मलोक पहुँच जाते हैं । वहाँ कार्तिक के महीने में अन्नदान करनेवाला व्यक्ति भी पवित्र होकर ब्रह्मलोक का अधिकारी हो जाता है । पुष्कर की यात्रा तो कठिन है ही, वहाँ तपस्या करना, दान देना तथा निवास करना और भी कठिन है ॥५-८ ॥ वहाँ पर निवास करने से, जप करने से और श्राद्ध करने से सौ कुलों का उद्धार हो जाता है । वहीं जम्बूमार्ग नामक तीर्थ है । वहाँ ये तीर्थ भी हैं - तण्डुलिकाश्रम, कण्वाश्रम, कोटितीर्थ, नर्मदातीर्थ, श्रेष्ठ अर्बुद तीर्थ, चर्मण्वती, सिन्धु, सोमनाथ, प्रभास, सरस्वती और समुद्र का संगम, सागर तीर्थ, पिण्डारक, द्वारका, सकलसिद्धिदायिनी गोमती, भूमितीर्थ, ब्रह्मतुङ्ग तीर्थ, श्रेष्ठ पञ्जनद तीर्थ, भीमतीर्थ, गिरीन्द्र, पापनाशिनी देविका, पवित्र विनाशन तीर्थ,, पापों का नाश करनेवाला नागोद्भेद तीर्थ और कुमारकोटि । ये सभी तीर्थ ( उत्तर फलों का ) दान करनेवाले हैं ॥ ९ -१३ ॥ जो निरन्तर यह कहता रहता है कि ' मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा ', ' मैं कुरुक्षेत्र में निवास करूँगा ' - वह पवित्र होकर स्वर्ग चला जाता है । कुरुक्षेत्र में विष्णु आदि देवता रहते हैं अत: वहाँ निवास करनेवाला विष्णु के पास पहुँच जाता है । जो मनुष्य सरस्वती तीर्थ में जाकर स्नान करता है, वह ब्रह्मलोक का भागी होता है । कुरुक्षेत्र के धूलिकण भी मनुष्य को सद्गति प्राप्त करा दिया करते हैं । इसी तरह धर्मतीर्थ, सुवर्णतीर्थ, परमोत्तम गङ्गाद्वार ( हरिद्वार ), कनखलतीर्थ, पवित्र भद्रकर्ण सरोवर, गङ्गा - सरस्वती का सङ्गम, ब्रह्मावर्त, अघार्दन, भृगुतुङ्ग, कुब्जाभ्र, गङ्गोद्भेद, अघान्तक, वाराणसी - सर्वश्रेष्ठ अविमुक्त तीर्थ, कपालमोचन तीर्थ, तीर्थराज प्रयाग, गोमती - गङ्गा का सङ्गम तथा गङ्गा सर्वत्र स्वर्ग प्रदान करनेवाली हैं ॥१४-१९ ॥ पवित्र राजगृह तीर्थ, पापनाशक १ ख. ग. र्थं मण्डलि । २ ख. ग. कण्ठाश्रमं । घ. कर्णाश्रमं । ३ ख. ग. कृमितीर्थं । ४ घ. ' रीन्द्र च दे । ५ ग. विनाश ' । ६ ग ' क्षेत्रे ग ° । ७ CC ख - 0.. JK ग. Sanskrit त्रे ते यान्ति Academy ।, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 409

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दशाधिकशततमोऽध्यायः ४०५ तीर्थं राजगृहं पुण्यं शालग्राममघान्तकम् । वटेशं वामनं तीर्थं कालिकासङ्गमुत्तमम् ॥२० ॥

लौहित्यं करतोयाख्यं शोणं चाथर्षभं परम् । श्रीपर्वतं कोल्लगिरिः सह्याद्रिर्मलयो गिरिः ॥ २१ ॥

गोदावारी तुङ्गभद्रा कावेरी वरदा नदी । तापी पयोष्णी रेवा च दण्डकारण्यमुत्तमम् ॥२२ ॥

कालंजरं मुञ्जवटं तीर्थं सूर्पारकं परम् । मन्दाकिनी चित्रकूटं शृङ्गवेरपुरं परम् ॥२३ ॥

अवन्ती परमं तीर्थमयोध्या पापनाशिनी । नैमिषं परमं तीर्थं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥२४ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये तीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १० ९ ॥ अथ दशाधिकशततमोऽध्यायः गङ्गामाहात्म्यम् अग्निरुवाच गङ्गामाहात्म्यमाख्यास्ये सेव्या सा भुक्तिमुक्तिदा । येषां मध्ये याति गङ्गा ते देशाः पावना वराः ॥१ ॥

गतिर्गङ्गा तु भूतानां गतिमन्वेषतां सदा । गङ्गा तारयते चोभौ वंशौ नित्यं हि सेविता ॥ २ ॥

चान्द्रायणसहस्राच्च गङ्गाम्भः पानमुत्तमम् । गङ्गा मासं तु संसेव्य सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥३ ॥

सकलाघहरी देवी स्वर्गलोकप्रदायिनी । यावदस्थि च गङ्गायां तावत्स्वर्गे स तिष्ठति ॥४ ॥

शालग्राम तीर्थ, वटेश तीर्थ, वामन तीर्थ, उत्तम कालिका संग तीर्थ, लौहित्य तीर्थ, करतोया, शोण, उत्कृष्ट ऋषभ तीर्थ, श्रीपर्वत, कोल्लगिरि, सह्यपर्वत, मलयगिरि, गोदावरी, तुङ्गभद्रा, कावेरी, वरदा नदी, तापी, पयोष्णी, रेवा, उत्कृष्ट दण्डकारण्य, कालञ्जर, मुञ्जवट तीर्थ, श्रेष्ठ सूर्पारक तीर्थ, मन्दाकिनी, चित्रकूट, शृंगवेरपुर, अवन्तिकानगरी, पापनाशिनी अयोध्या और नैमिषारण्य - से सभी तीर्थ ( इस लोक में ) भोग और ( परलोक में ) मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं ॥ २०-२४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में तीर्थमाहात्म्य - वर्णन नामक एक सौ नौवाँ अध्याय समाप्त ॥१०९ ॥

अध्याय ११० गङ्गा - माहात्म्य अग्निदेव ने कहा - अब मैं गङ्गा - माहात्म्य का वर्णन करूँगा । भोग और मोक्ष को देनेवाली गङ्गा जी ( सदैव ) सेवनीय हैं । जिन - जिन देशों से होकर गङ्गा जी बहती हैं, वे देश पवित्र और श्रेष्ठ हैं । ( सद् ) गति चाहनेवाले प्राणियों को गङ्गा जी सद्गति प्रदान किया करती हैं । नित्य सेवन करने से गङ्गा जी दोनों कुलों ( मातृकुल तथा पितृकुल ) को तार देती हैं । गङ्गाजल पीना सहस्रों चान्द्रायण व्रतों से उत्तम है । एक मास तक गङ्गा जी की सेवा करने से सम्पूर्ण यज्ञों का फल प्राप्त हो जाता है । वह देवी ( गङ्गा ) समस्त पापों का नाश करनेवाली तथा स्वर्गलोक को देनेवाली है ॥ जब तक मनुष्य की अस्थि ( मात्र ) गङ्गा में रहती है, तब तक वह स्वर्ग में निवास करता रहता है । अन्धे आदि १ ख. तीर्थ रा । २ घ. कोल्वगिरि । ३ क. ङ. च. ' रिः सिंहाद्रि । ४. क. ङ. च. ' तिर्गतिमतां । ५ क. ङ. च. पावयते । ६ क. ङ. च. ' र्वज्ञस्य फ ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 410

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४०६ अग्निपुराणम् अन्धादयस्तु तां सेव्य देवैर्गच्छन्ति तुल्यताम् । गङ्गातीर्थंसमुद्भूतमृद्धारी सोऽघहाऽर्कवत् ॥५ ॥

दर्शनात्स्पर्शनात्पानात्तथा गङ्गेतिकीर्तनात् । पुनाति पुण्यपुरुषाञ्शतशोऽथ सहस्रशः ॥६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये गङ्गामाहात्म्यवर्णनं नाम दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥

अथैकादशाधिकशततमोऽध्यायः प्रयाग माहात्म्यम् अग्निरुवाच वक्ष्ये प्रयागमाहात्म्यं भुक्तिमुक्तिप्रदं परम् । प्रयागे ब्रह्मविष्ण्वाद्या देवा मुनिवराः स्थिताः || १ || सरितः सागराः सिद्धा गन्धर्वाप्सरसस्तथा । तत्र त्रीण्यग्निकुण्डानि तेषां मध्ये तु जाह्नवी || २ || वेगेन समतिक्रान्ता सर्वतीर्थपुरस्कृता । तपनस्य सुता तत्र त्रिषु लोकेषु विश्रुताः || ३ || गङ्गायमुनयोर्मध्यं पृथिव्या जघनं स्मृतम् । प्रयागं जघनस्यान्तरुपस्थमृषयो विदुः ॥४ ॥

प्रयागं सप्रतिष्ठानं कम्बलाश्वतरावुभौ । तीर्थं भोगवती चैव वेदी प्रोक्ता प्रजापतेः ॥ ५ ॥

( विकलाङ्ग ) भी गङ्गा का सेवन करने से देवताओं की समता प्राप्त कर लेते हैं । जो व्यक्ति गङ्गातीर्थ से मिट्टी खोदकर ले जाता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और वह सूर्य के समान ( तेजस्वी ) हो जाता है । गङ्गा के दर्शन, स्पर्श, पान तथा नाम के संकीर्त्तन से मनुष्य सैकड़ों - हजारों पूर्वजों को पवित्र कर देता है ॥१-६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में गङ्गामाहात्म्य - वर्णन नामक एक सौ दसवाँ अध्याय समाप्त ॥११० ॥

अध्याय १११ प्रयाग - माहात्म्य अग्निदेव बोले- ( अब ) मैं उस प्रयागराज का माहात्म्य बतलाऊँगा जो भोग और मोक्ष दोनों को प्रदान करनेवाला है । ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता तथा श्रेष्ठ मुनिजन प्रयाग में ही निवास करते हैं । वहाँ ( सभी ) नदियाँ, समुद्र, सिद्ध, गन्धर्व, अप्सराएँ तथा तीन अग्निकुण्ड हैं, जिनके बीच में जह्रुकन्या ( गङ्गा जी ) बहती रहती है । वे अत्यन्त वेगवती हैं तथा सभी तीर्थों के आगे रहनेवाली हैं । वहाँ तीनों लोकों में प्रसिद्ध सूर्यपुत्री यमुना भी हैं । गङ्गा और यमुना का मध्य भाग पृथ्वी देवी की जङ्घा है तथा इन दोनों नदियों के बीच में स्थित प्रयाग योनि है - ऐसा ऋषियों ने माना है । प्रयाग के साथ ( मिला हुआ ) है प्रतिष्ठानपुर ( आधुनिक झूसी ) । प्रयाग में कम्बल तथा अश्वतर नामक दो तीर्थ और हैं । वहाँ भोगवती नामक तीर्थ है, जो ब्रह्मा की वेदी कहलाता है ॥१-५ ॥ प्रयाग में १ क. ङ. च. ' र्मध्ये पृ ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA