अग्नि पुराण — पृष्ठ 411–420

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 411–420

पृष्ठ 411

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एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ४०७ तत्र वेदाश्च यज्ञाश्च मूर्तिमन्तः प्रयागके ' । मृत्तिकालम्भनाद्वाऽपि सर्वपापैः प्रमुच्यते । न वेदवचनाद्विप्र न लोकवचनादपि दशतीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस्तथाऽपराः । वासुकेर्भोगवत्यत्र ' हंसप्रपतनं परम् प्रयागे माघमासे तु एवमाहुर्मनीषिणः । गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसङ्गमे । वटमूले सङ्गमादौ मृतो विष्णुपुरीं व्रजेत् ।

कोटितीर्थं चाश्वमेधं गङ्गायमुनमुत्तमम् ।

स्तवनादस्य तीर्थस्य मामसंकीर्तनादपि ॥६ ॥

प्रयागे सङ्गमे दानं श्राद्धं जप्यादि चाक्षयम् ॥७ ॥

। मतिरुत्क्रमणीयान्ते प्रयागे मरणं प्रति ॥८ ॥

तेषां सांनिध्यमत्रैव प्रयागं परमं ततः ॥ ९ ॥

। गवां कोटिप्रदानाद्यत्त्र्यहं स्नानस्य तत्फलम् ॥१० ॥

सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्नानेषु दुर्लभा ॥११ ॥

अत्र दानाद्दिवं यान्ति राजेन्द्रो जायतेऽत्र च ॥१२ ॥

उर्वशीपुलिनं रम्यं तीर्थं सन्ध्यावटस्तथा ॥१३ ॥

मानसं रजसा हीनं तीर्थं वासरकं ' परम् ॥१४ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये प्रयागमाहात्म्यवर्णनं नामैकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥

( सभी ) वेद तथा यज्ञ मूर्तिमान् होकर रहते हैं । प्रयाग की स्तुति करने से, उसका नाम संकीर्त्तन करने से तथा वहाँ की मिट्टी लेने मात्र से ही ( प्राणी ) सभी पापों से मुक्त हो जाता है । प्रयाग में सङ्गम पर किये हुए दान, श्राद्ध तथा जप आदि का अक्षय फल मिलता है । अये ब्राह्मणराज! प्रयाग में मरने का विचार न तो वेद वचनों से ही छोड़ा जा सकता है और न लोकवचनों से ही । केवल दस हजार ही क्या, साठ करोड़ तीर्थों का सान्निध्य ( भी ) प्रयागराज को प्राप्त है । इसलिए प्रयाग तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ है । यहाँ नागराज वासुकि का भोगवती तीर्थ तथा हंसप्रपतन तीर्थ भी है । इनमें तीन दिन स्नान करने का उतना ही फल होता है जितना कि करोड़ों गायों का दान करने से होता है ॥ ६-१० ॥ विद्वानों का मत तो यह है कि माघ मास में प्रयाग में स्नान करने से भी यही फल प्राप्त होता है । गङ्गा सब स्थानों पर सुलभ हैं, किन्तु तीन स्थानों की गङ्गा जी दुर्लभ हैं । वे स्थान हैं - गङ्गाद्वार ( हरिद्वार ), प्रयाग तथा गङ्गासागर - सङ्गम । यहाँ पर दान करने से मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करता है तथा ( दूसरे जन्म में ) राजाधिराज होता है । प्रयाग स्थित वटवृक्ष के नीचे तथा सङ्गम आदि स्थानों में मृत्यु होने से विष्णुधाम की प्राप्ति होती है । प्रयाग में जो अन्य तीर्थ हैं उनके नाम हैं- उर्वशीपुलिन, सन्ध्यावट, कोटितीर्थ, अश्वमेध, गङ्गायमुन, निर्मल मानसतीर्थ और श्रेष्ठ वासरक तीर्थ ॥११-१४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में प्रयागमाहात्म्य - वर्णन नामक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१११ ॥

१ क. ङ. च. ' के । श्रवणाद ' । २ क. ङ. च. श्राद्धवर्ज्यादि । ३ क. ङ. ' के भोग । ४ क. ङ. च. वानर ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 412

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४०८ अग्निपुराणम् अथ द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः वाराणसीमाहात्म्यम् अग्निरुवाच वाराणसी परं तीर्थं गौर्यै प्राह महेश्वरः । भुक्तिमुक्तिप्रदं पुण्यं वसतां गृणतां हरिम् ॥ १ ॥

रुद्र उवाच गौरि क्षेत्रं ' न मुक्तं वै अविमुक्तं ततः स्मृतम् । जप्तं तप्तं हुतं दत्तमविमुक्ते किलाक्षयम् ॥२ ॥

अश्मना चरणौ हत्वा ' वसेत्काशीं नहि त्यजेत् । हरिश्चन्द्रं परं गुह्यं गुह्यमाम्रातकेश्वरम् ॥३ ॥

जप्येश्वरं परं गुह्यं गुह्यं श्रीपर्वतं तथा । महालयं परं गुह्यं भूमिचण्डेश्वरं तथा ॥ ४ ॥

केदारं परमं गुह्यमष्टौ सन्त्यविमुक्तके । गुह्यानां परमं परमं गुह्यमविमुक्तं परं मम ॥५ ॥

द्वियोजनं तु पूर्वं स्याद्योजनार्थं तदन्यथा । वरणा च नदी नासी मध्ये वाराणसी तयोः ॥ ६ ॥

अत्र स्नानं जपो होमो मरणं देवपूजनम् । श्राद्धं दानं निवासश्च यद्यत्स्याद्भुक्तिमुक्तिदम् ॥७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये वाराणसीमाहात्म्यकथनं नाम द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११२ ॥

अध्याय ११२ वाराणसी - माहात्म्य अग्निदेव बोले- शिव ने पार्वती जी को बतलाया कि वाराणसी तीर्थ श्रेष्ठ तीर्थ है । जो लोग वहाँ पर निवास करते हुए विष्णु नाम का संकीर्त्तन करते हैं उनके लिए यह श्रेष्ठ तीर्थ भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला हुआ करता है ॥१ ॥

रुद्र ने कहा - अयि गौरि! वाराणसी क्षेत्र अविमुक्त कहलाता है क्योंकि मैं उसे कभी छोड़ता नहीं हूँ । अविमुक्त क्षेत्र में किये हुए हवन, जप, तप तथा दान का फल अक्षय हुआ करता है । ( वाराणसी के घाटों की सीढ़ियों से ) ' पैरों को तोड़कर भी काशी को छोड़ नहीं देना चाहिए ( अपितु वहीं पर निवास करते रहना चाहिए ) काशी में हरिश्चन्द्र, आम्रातकेश्वर, जप्येश्वर, श्रीपर्वत, महालय, भूमि, चण्डेश्वर और केदार - ये आठों तीर्थ अत्यन्त गुह्य ( गोपनीय ) तीर्थ हैं परन्तु मेरा अविमुक्त क्षेत्र तो सबसे अधिक गुप्त है । यह क्षेत्र पूर्व की ओर ( पश्चिम ) दिशा में आधे योजन तक फैला हुआ है । वरणा और नासी ( असी ) होने के कारण इस नगरी को वाराणसी कहते हैं । यहाँ स्नान, जप, होम, मरण, आदि जो - जो किया जायगा, वह सब भोग और मोक्ष को प्रदान करनेवाला ही श्री अग्निमहापुराण में वाराणसीमाहात्म्य - वर्णन नामक एक सौ बारहवाँ १ क. च क्षेत्रेण मुरौं । २ क. ग. हुत्वा । ३ क. ख. ग. ङ. च. ' सी तयोर्मध्ये स्याद्भुक्तिमुक्तिदः । इ ° । दो योजन तक और उसके विपरीत नामक दो नदियों के बीच में बसी देवपूजन, श्राद्ध, दान और निवास होगा ॥२-७ ॥ अध्याय समाप्त ॥ ११२ ॥

वाराणसी । अ ° । ४ क. ङ. च. यज्ञः CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 413

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त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ४० ९ अथ त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः नर्मदामाहात्म्यम् अग्निरुवाच नर्मदादिकमाहाम्यं वक्ष्येऽहं नर्मदां पराम् । सद्यः पुनाति गाङ्गेयं विस्तराद्योजनशतं योजनद्वयमायतम् । षष्टिस्तीर्थसहस्त्राणि पर्वतस्य समन्तात्तु तिष्ठन्त्यमरकण्टके 1 । कावेरीसङ्गमं पुण्यं गौरी श्रीरूपिणी तेपे तपस्तामब्रवीद्धरिः । अवाप्स्यसि त्वमध्यात्म समन्ताद्योजनशतं महापुण्यं भविष्यति । अत्र दानं ततो जप्यं दर्शनाद्वारि नार्मदम् ॥१ ॥

षष्टिकोट्यस्तथाऽपराः ॥२ ॥

श्रीपर्वतमतः शृणु ॥३ ॥

नाम्ना श्रीपर्वतस्तव ॥४ ॥

श्राद्धं सर्वमथाक्षयम् ।५ ॥ मरणं शिवलोकाय सर्वदं तीर्थमुत्तमम् । हरोऽत्र क्रीडते देव्या हिरण्यकशिपुस्तथा ॥६ ॥

तपस्तप्त्वा बली चाभून्मुनयः सिद्धिमाप्नुवन् ॥७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये नर्मदामाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११३ ॥

अध्याय ११३ नर्मदा - माहात्म्य अग्निदेव बोले- अब मैं नर्मदा नदी का माहात्म्य बतलाऊँगा । नर्मदा अत्यन्त उत्कृष्ट नदी है । गंगाजल ( स्पर्श से ) ही सद्यः पवित्र कर देता है, किन्तु नर्मदा का जल तो दर्शनमात्र से ( ही ) पवित्र कर दिया करता है । नर्मदा तटवर्ती पर्वत के चारों ओर दो भागों में विभक्त साठ करोड़ साठ हजार तीर्थ हैं । ये सौ योजनों में फैले हुए तथा दो योजन चौड़े हैं । अमरकण्टक में नर्मदा तथा कावेरी का पवित्र सङ्गम होता है । इसके बाद श्रीपर्वत के सम्बन्ध में सुनो । ( एक बार ) पार्वती लक्ष्मी का रूप धारण करके वहाँ तपस्या कर रही थीं । उस समय भगवान् विष्णु ने उनसे कहा था - ' ( यहाँ तपस्या करने से ) तुम्हें अध्यात्म ज्ञान प्राप्त हो सकेगा और यह पर्वत तुम्हारे ही नाम पर श्रीपर्वत कहलायेगा । इसके चारों ओर सौ योजन तक फैला हुआ स्थान महान् पुण्य देनेवाला होगा । यहाँ पर दान, तप तथा श्राद्ध आदि जो कुछ भी किया जायगा, उसका फल अक्षय होगा ॥१-५ ॥ यहाँ पर होनेवाली मृत्यु शिवलोक को देनेवाली होगी । यह तीर्थ परम पवित्र तथा सब-कुछ देनेवाला होगा । यहाँ गौरी के साथ भगवान् शंकर क्रीड़ा किया करते हैं । यहीं तपस्या करके हिरण्यकशिपु बलवान् हो गया था और ( यहीं तपस्या करके ) मुनियों ने सिद्धि प्राप्त कर ली थी ॥६-७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नर्मदामाहात्म्य - वर्णन नामक एक सौ तेरहवाँ अध्याय समाप्त ॥११३ ॥

१ क. ङ. च. द्धरः । अ । २ क. ङ. च. राज्ञा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 414

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अग्निपुराणम् ४१० अथ चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः गयामाहात्म्यम् अग्निरुवाच गयामाहात्म्यमाख्यास्ये गया तीर्थोत्तमोत्तमम् ।

उक्तः क्षीराब्धिगो विष्णुः पालयास्मान्गयासुरात् ।

दैत्योऽब्रवीत्पवित्रोऽहं भवेयं सर्वतीर्थतः ॥

गताः शून्या मही स्वर्गे देवा ब्रह्मादयः सुराः । दैत्यस्य दर्शनादेव ब्रह्माणं चाब्रवीद्धरिः तच्छ्रुत्वा ससुरो ब्रह्मा गयासुरमथाब्रवीत् । गयासुरस्तथेत्युक्त्वाऽपतत्तस्य शिरस्यथ पुनर्ब्रह्माऽब्रवीद्विष्णुं " पूर्णाकालेऽसुरोऽचलत् ' धारयस्व ' सुराः सर्वे ॰ तस्यामुपरि सन्तु ते गयासुरस्तपस्तेपे तत्तपस्तापिभिः ' सुरैः ॥१ ॥

तथेत्युक्त्वा हरिर्दैत्यं वरं ब्रूहीति चाब्रवीत् ॥ २ ॥

तथेत्युक्त्वा गतो विष्णुर्दैत्यं दृष्ट्वा नरा हरिम् ॥३ ॥

गता ऊचुर्हरिं देव शून्या भूस्त्रिदिवं हरे ॥ ४ ॥

। यागार्थं दैत्यदेहं त्वं प्रार्थय त्रिदशैः सह । ५ ॥ अतिथिः प्रार्थयामि त्वां तेहं यागाय पावनम् ॥६ ॥

। यागं चकार चलिते देहे पूर्णाहुतिं विभुः ॥७ ॥

। विष्णुधर्ममथाऽऽहूय प्राह देवमयीं शिलाम् ॥८ ॥

। गदाधारो मदीयाऽथ मूर्तिः स्थास्यति ' साऽमरैः ॥९ ॥

अध्याय ११४ गया - माहात्म्य अग्निदेव बोले - अब मैं गया का माहाम्त्य बतलाऊँगा । गया में गय नामक राक्षस तप किया करता था । उसके तप से व्यथित होकर देवता क्षीरसागर में शयन करनेवाले भगवान् विष्णु के पास जाकर प्रार्थना करने लगे । ( अये भगवन् ) हम लोगों को गयासुर से बचाइये । भगवान् विष्णु ने कहा- ' ऐसा ही होगा । ' तदनन्तर उन्होंने जाकर दैत्य से कहा- ' मुझसे वर माँग लो । ' दैत्य ने कहा- मैं समस्त तीर्थों के जल से पवित्र हो जाऊँ ( यही वर दीजिये ) । विष्णु ने कहा - ' ऐसा ही होगा ' और यह कहकर वह चले गये । तदनन्तर दैत्य को देखकर ( उसके डर के कारण ) सभी मनुष्य भगवान् विष्णु की शरण में गये । इससे पृथ्वी खाली हो गयी । ब्रह्मा आदि देवता स्वर्ग में विष्णु के समीप जाकर कहने लगे - ‘ अये भगवन् विष्णु! उस दैत्य के दर्शनमात्र से पृथ्वी और स्वर्ग शून्य हो गये हैं । ' यह सुनकर विष्णु ने ब्रह्मा से कहा — ' तुम देवताओं के साथ जाकर यज्ञ के लिए उसके शरीर की याचना करो ' ॥१-५ ॥ यह सुनकर ब्रह्मा ने देवताओं के साथ जाकर गयासुर के निकट पहुँचकर कहा - ' मैं अतिथि होकर तुमसे एक प्रार्थना करता हूँ कि यज्ञ के लिए तुम अपना पवित्र शरीर दे दो । ' गयासुर ने कहा- -'ऐसा ही होगा ' और इतना कहकर वह गिर पड़ा । उसके सिर के ऊपर ब्रह्मा ने यज्ञ किया किन्तु पूर्णाहुति के समय उसका शरीर चञ्चल हो गया । ( यह देखकर ) ब्रह्मा ने पुनः विष्णु से कहा - ‘ उसका शरीर तो पूर्णाहुति के पहले ही चल पड़ा । ' तदनन्तर विष्णु ने धर्मराज को बुलाकर कहा - ' तुम यहाँ देवमयी शिला को पकड़ लो जिसके ऊपर सभी देवता लोग खड़े होंगे और देवताओं के साथ मेरी गदाधर मूर्ति भी रहेगी ' ॥६ – ९ ॥ १ क. ङ. च. ' पितैः सु ' । २ घ. नवा । ३ क. ङ. च. पुनः । ४ घ. देवाः । ५ क. घ. ङ. च. देहि । ६ क. ङ. च. भुवि । ७ पूर्णका ' । ८ ग. ‘ रोज्ज्वल ’ । ९ घ. धारयध्वं । १० घ. ' र्वेयस्या ' । ११ क. च. ' ति संवरैः । ग. ति सा सुरैः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 415

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चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ४११ धर्मः शिलां देवमयीं तच्छ्रुत्वाऽधारयत्पराम् मरीचिर्ब्रह्मणः पुत्रस्तामुवाह तपोन्विताम् कुशपुष्पाद्यरण्याच्च आनीयातिश्रमान्वितः विश्रान्तस्य मुनेः पादौ तथेत्युक्त्वा प्रियाऽकरोत् धर्मव्रताऽचिन्तयच्च किं ब्रह्माणं समर्चये विचिन्त्य पूजयामास ब्रह्माणं चार्हणादिभिः शिला भविष्यसि क्रोधाद्धर्मव्रताऽब्रवीच्च तम् अदोषाऽहं यतस्त्वं हि शापं प्राप्स्यसि शंकरात् तपश्चचार वर्षाणां सहस्राण्ययुतानि च धर्मव्रताऽब्रवीद्देवाञ्शापं निर्वर्तयन्तु मे । या धर्माद् धर्मवत्यायां च जाता धर्मव्रता सुता ॥१० ॥

। यथा हरिः श्रिया रेमे गौर्यां शम्भुस्तथा तया ॥११ ॥

। भुक्त्वा धर्मव्रता प्राह पादसंवाहनं कुरु ॥१२ ॥

। एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा मुनौ सुप्ते ' समागतः ॥१३ ॥

। पादसंवाहनं कुर्वे ब्रह्मा पूज्यो गुरोर्गुरुः ॥१४ ॥

। मरीचिस्तामपश्यन्स ' शशापोक्तिव्यतिक्रमात् ॥१५ ॥

। पादाभ्यङ्गं परित्यज्य त्वद्गुरुः पूजितो मया ॥१६ ॥

। धर्मंव्रता पृथक्शापं धारयित्वाऽग्निमध्यगात् ॥१७ ॥

। ततो विष्ण्वादयो देवा वरं ब्रूहीति चाब्रुवन् ॥ ॥१८ ॥

देवा ऊचुः दत्तो मरीचिना शापो भविष्यति न चान्यथा । शिला पवित्रा देवा‌ङ्घ्रिलक्षिता त्वं भविष्यसि ॥ १ ९ ॥ देवव्रता देवशिला सर्वदेवादिरूपिणी । सर्वदेवमयी पुण्या निश्चला ( नैश्चल्या ) यासुरस्यहि ॥२० ॥

यह सुनकर धर्मराज ने उस देवमयी शिला को उठा लिया । वही शिला धर्म और धर्मवती से धर्मव्रता कन्या के रूप में उत्पन्न हुई । ब्रह्मा के एक पुत्र थे मरीचि । उन्होंने इस तपस्विनी कन्या से विवाह कर लिया । जैसे भगवान् विष्णु लक्ष्मी के साथ और भगवान् शंकर पार्वती के साथ रमण करते हैं, उसी प्रकार मरीचि उस ( धर्मव्रता ) के साथ रमण करते रहे । ( एक दिन ) वन से कुश, पुष्प आदि लाने के कारण अत्यन्त थके हुए मरीचि ने भोजन करके धर्मव्रता से कहा - ‘ अयि! मेरे पैर दबा दो । ' पत्नी ( धर्मव्रता ) ' अच्छा ' कहकर थके हुए मुनि के पैर दबाने लगी । इसी बीच मुनि के सो जाने पर ब्रह्मा वहाँ आ पहुँचे । धर्मव्रता सोचने लगी- ' क्या मैं ब्रह्मा का आतिथ्य करूँ या पति के पैरों को ही दबाती रहूँ? ब्रह्मा तो मेरे ( गुरु ) पति के भी गुरु और पूज्य हैं ' ऐसा सोचकर वह अर्घ्य आदि से ब्रह्मा की पूजा करने में लग गयी । इधर मरीचि ने उसे न देखकर आज्ञोल्लंघन के अपराध से उसे शाप दे दिया कि ' तू पत्थर हो जा । ' इस पर धर्मव्रता ने क्रोध में आकर मुनि से कहा- “ मैंने तुम्हारे पैरों की मालिश करना छोड़कर उनकी पूजा की है जो आपके भी पूज्य हैं । इसलिए मैं निर्दोष हूँ । ( मुझे शाप देने के कारण ) तुम्हें भी शंकर का शाप मिलेगा ' ॥१०-१६ ॥ तदनन्तर धर्मव्रता ने शाप को अङ्गीकार करके अग्नि के बीच में बैठकर दस हजार वर्षों तक तपस्या की । ( यह देखकर ) विष्णु आदि देवताओं ने उससे वर माँगने को कहा । धर्मव्रता ने देवताओं से प्रार्थना की कि ' मेरा शाप शान्त हो जाय ' ॥१७-१८ ॥ देवताओं ने कहा - मरीचि का दिया हुआ शाप व्यर्थ नहीं हो सकता है, इसलिए तुम देवताओं के चरणों से चिह्नित एक पवित्र शिला बन जाओगी । वह देवशिला समस्त देवताओं की आदिरूप, सर्वदेवमयी, पुण्यदायिनी तथा गयासुर को निश्चल रखनेवाली होगी ॥ १ ९ -२० ॥ १ ख. ग. घ. प्ते तथाऽऽग । २ घ. ' श्यत्स सशा । ३ क. ङ. च. ' र्वतीर्थम ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 416

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अग्निपुराणम् ४१२ देवव्रतोवाच यदि तुष्टाःस्थ मे सर्वे मयि तिष्ठन्तु सर्वदा । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्राद्या गौरी लक्ष्मीमुखाः सुराः ॥२१ ॥

अग्निरुवाच देवव्रतावचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा दिनं गताः । सा धर्मेणासुरस्यास्य धृता देवमयी शिला ॥ २२ ॥

सशिलश्चलितो दैत्यः स्थिता रुद्रादयस्ततः । सदेवश्चलितो दैत्यस्ततो देवैः प्रसादितः ॥ २३ ॥

क्षीराब्धिगो हरिः प्रादात्स्वमूर्तिं श्रीगदाधरम् । ` गच्छन्तु भोः स्वयं यास्ये मूर्त्या वै देवगम्यया ॥२४ ॥

स्थितो गदाधरो देवो व्यक्ताव्यक्तोभयात्मकः । निश्चला ( नैश्चल्या ) र्थं स्वयं देवः स्थित आदिगदाधरः ॥ २५ ॥

गदो नामासुरो रौद्रः स हतो विष्णुना पुरा । तदस्थिनिर्मिता चाऽऽद्या गदा या विश्वकर्मणा ॥ २६ ॥

आद्यया गदया हेतिप्रमुखा राक्षसा हताः । गदाधरेण देवेन तस्मादादि गदाधरः ॥२७ ॥

देवमय्यां शिलायां च स्थिते चाऽऽदिगदाधरे । गयासुरे निश्चलेऽथ ब्रह्मा पूर्णाहुतिं ददौ ॥ २८ ॥

गयासुरोऽब्रवीद्देवान्किमर्थं वञ्चितो ह्यहम् । विष्णोर्वचनमात्रेण किं न स्यां निश्चलो ह्ययम् ॥ २ ९ ॥ आक्रान्तो यद्यहं देवा दातुमर्हत मे वरम् ॥३० ॥

देवव्रता ने कहा - यदि आप लोग मुझसे सन्तुष्ट हैं तो ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, गौरी तथा लक्ष्मी आदि देवगण सदा मेरे ऊपर निवास करते रहें ॥ २१ ॥

अग्निदेव बोले - देवव्रता की बात सुनकर देवता लोग ' ऐसा ही हो ' कहकर स्वर्ग को लौट गये । धर्मराज ने उसी देवमयी शिला को असुर को रोकने के लिए उठाया था । जब वह दैत्य शिला सहित चलने लगा तब रुद्र आदि देवता उस पर चढ़ गये; किन्तु जब देवताओं को लेकर भी वह दैत्य चलता ही रहा तब देवताओं ने क्षीरसागर में रहनेवाले भगवान् विष्णु की आराधना की । भगवान् विष्णु ने ( देवताओं को ) अपनी गदाधर मूर्ति प्रदान की और कहा - ‘ आप लोग जाइये ' इस देवगम्या मूर्ति के साथ मैं स्वयं चला आऊँगा । तभी से भगवान् आदि गदाधर व्यक्त और अव्यक्त दोनों रूपों में उस असुर को स्थिर करने के लिए उसके ऊपर बैठे हुए हैं ॥ २२-२५ ॥ प्राचीनकाल में गद नाम का एक भयंकर असुर था । उसे भगवान् विष्णु ने मार डाला था । विश्वकर्मा ने उसकी हड्डियों से पहले पहल जिस गदा का निर्माण किया उससे गदाधर देव ( भगवान् विष्णु ) ने हेति आदि राक्षसों का वध किया था । इसलिए वे ( भगवान् विष्णु ) आदि गदाधर कहलाते हैं । इधर, जब देवमयी शिला के ऊपर आदि गदाधर ( भगवान् विष्णु ) बैठ गये और जब गयासुर अचल हो गया तब ब्रह्मा ने पूर्णाहुति दी । गयासुर ने देवताओं से - ‘ आप लोगों ने मेरे साथ छल क्यों किया? क्या मैं विष्णु के कह देने भर से ही निश्चल नहीं हो सकता था? अये पूछा देवताओ! आप लोगों ने मेरे ऊपर आक्रमण किया है, इसलिए आप मुझे वरदान दीजिये ॥ २६-३० ॥ १ गच्छन्तु " गम्यया नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । २ घ. दैत्यः । ३ क. ङ. च. ' दङ्गान्निर्मि ' । ४ घ. ' ण विधिवत्तस्मा ’ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 417

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चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ४१३ देवा ऊचुः तीर्थस्य करणे यत्त्वमस्माभिर्निश्चलीकृतः । विष्णोः शम्भोर्ब्रह्मणश्च क्षेत्रं तव भविष्यति ॥ ३१ ॥

प्रसिद्धं सर्वतीर्थेभ्यः पित्रादेर्ब्रह्मलोकदम् । इत्युक्त्वा ते स्थिताः देवा देव्यस्तीर्थादयः स्थिताः ॥३२ ॥

यागं कृत्वा ददौ ब्रह्मा ऋत्विग्भ्यो दक्षिणास्तदा । पञ्चक्रोशं गयाक्षेत्रं पञ्चाशत्पञ्च चार्पये ( चाऽऽर्पय ) त् ॥३३ ॥

ग्रामान्स्वर्णगिरीन्कृत्वा नदीर्दुग्धमधुश्रवाः कामधेनुं कल्पतरुं स्वर्णरूप्यगृहाणि च । धर्मयागे प्रलोभस्तु प्रतिगृह्य धनादिकम् । विद्या विवर्जिता यूयं तृष्णायुक्ता भविष्यथ ब्रह्माणं ब्राह्मणाश्चोचुर्नष्टं शापेन चाखिलम् तीर्थोपजीविका यूयं सचन्द्रार्कं भविष्यथ । हव्यकव्यैर्धनैः श्राद्धैस्तेषां कुलशतं व्रजेत् ' गयोऽपि चाकरोद्यागं वह्वन्नं बहुदक्षिणम् ॥ सरोवराणि दध्याज्यैर्बहूनन्नादिपर्वतान् ॥ ३४ ॥

न याचयन्तु विप्रेन्द्रा अल्पानुक्त्वा ददौ प्रभुः ॥३५ ॥

स्थिता यदा गयायां ते शप्तास्ते ब्रह्मणा तदा ॥ ३६ ॥

। दुग्धादिवर्जिता नद्यः शैलाः पाषाणरूपिणः ॥ ३७ ॥

। जीवनाय प्रसादं नः कुरु विप्रांश्च सोऽब्रवीत् ॥३८ ॥

ते युष्मान्पूजयिष्यन्ति गयायामागता नराः ॥ ३ ९ ॥ । नरकात्स्वर्गलोकाय स्वर्गलोकात्परां गतिम् ॥४० ॥

गयापुरी तेन नाम्ना पाण्डवा ईजिरे हरिम् ॥४१ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये गयामाहात्म्यवर्णनं नाम चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥

देवतागण बोले - ' हम लोगों ने तीर्थ निर्माण करने के लिए ही तुम्हें स्थिर कर दिया है । अत: तुम्हारा शरीर विष्णु, शिव और ब्रह्मा का क्षेत्र होगा । वह क्षेत्र समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ तथा पितरों को ब्रह्मलोक तक पहुँचानेवाला होगा । ' इतना कहकर सभी देव, देवियाँ तथा तीर्थ वहीं बैठ गये । तदनन्तर ब्रह्मा ने यज्ञानुष्ठान करके ऋत्विजों को दक्षिणा दी । जिसमें पाँच कोस गया क्षेत्र, पचपन गाँव, सोने के पहाड़, दूध तथा मधु को प्रवाहित करनेवाली नदियाँ, दही और घी के सरोवर, प्रचुर अन्न आदि के पर्वत, कामधेनु, कल्पवृक्ष, सोना और चाँदी तथा घर थे । तदनन्तर उन्होंने ब्राह्मणों को सम्बोधित करके कहा - ' अये ब्राह्मणो! इसके बाद कहीं अन्यत्र याचना मत करना ॥३१-३५ ॥ ( एक बार ) लोभवश जब वे ही ब्राह्मण ( अन्यत्र ) धर्मयाग में दान लेकर गया में पहुँचे तब ब्रह्मा ने उन्हें शाप दे दिया कि ' तुम लोग विद्याविहीन और तृष्णा से युक्त रहोगे । यह नदियाँ दुग्ध आदि से शून्य हो जायँगी और पर्वत पत्थर होकर रह जायँगे ' ॥ ३६-३७ ॥ ( ब्रह्मा का शाप सुनकर ) ब्राह्मणों ने ब्रह्मा से कहा - ' आपके शाप से हमारा सर्वस्व नष्ट हो गया है । अब जीविका के लिए हमारे ऊपर कृपा कीजिये । ' ब्रह्मा ने ब्राह्मणों से कहा - ' जब तक सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे तब तक तुम लोगों की जीविका तीर्थों से ही चलेगी । गया में आये हुए मनुष्य तुम्हारा पूजन करेंगे और यहाँ हव्य ( देवताओं के निमित्त अन्न ), कव्य ( पितरों के निमित्त अन्न ) तथा धन आदि से श्राद्ध करने से उन यजमानों के सौ कुल नरक से स्वर्ग चले जायँगे और यदि स्वर्ग में होंगे तो परम गति को प्राप्त कर लेंगे । गय ने भी बहुत - सा अन्न तथा बहुत - सी दक्षिणा से युक्त यज्ञ किया । उस ( गय ) के नाम पर ही यह नगरी गया के नाम से प्रसिद्ध हो गयी है । यहीं पर पाण्डवों ने भगवान् विष्णु की आराधना की थी ॥ ३८-४१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में गया - माहात्म्य - वर्णन नामक एक सौ चौदहवाँ अध्याय समाप्त ॥११४ ॥

१ क. ङ. च. महत् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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४१४ अग्निपुराणम् अथ पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः गयायाञाविधिः अग्निरुवाच उद्यतश्चेद्गयां यातुं ' श्राद्धं कृत्वा विधानतः । कृत्वा प्रतिदिनं गच्छेत्संयतश्चाप्रतिग्रही । स्वर्गारोहणसोपानं पितॄणां तु पदे पदे । किं कुरुक्षेत्रवासेन यदा पुत्रो गयां व्रजेत् । पद्भ्यामपि जलं स्पृष्ट्वा अस्मभ्यं किंन दास्यति । वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा । गयां यास्यति यः पुत्रः स नस्त्राता भविष्यति । न कालादि गयातीर्थे दद्यात्पिण्डांश्च नित्यशः अष्टकासु च वृद्धौ च गयायां मृतवासरे विधाय कार्पटीवेशं ( षं ) ग्रामस्यापि प्रदक्षिणम् ॥१ ॥

गृहाच्चलितमात्रस्य गयाया गमनं प्रति ॥२ ॥

ब्रह्मज्ञाने किं कार्यं गोगृहे मरणेन किम् ॥ ३ ॥

गयां प्राप्तं सुतं दृष्ट्वा पितॄणामुत्सवो भवेत् ॥४ ॥

ब्रह्मज्ञानं गया श्राद्धं गोगृहे मरणं तथा ॥५ ॥

काङ्क्षन्ति पितरः पुत्रं नरकाद्भयभीरवः ॥ ६ ॥

मुण्डनं चोपवासश्च सर्वतीर्थेष्वयं विधिः ॥७ ॥

। पक्षत्रयनिवासी च पुनात्यासप्तमं कुलम् ॥८ ॥

। अत्र मातुः पृथक् श्राद्धमन्यत्र पतिना सह ॥ ९ ॥

अध्याय ११५ गया- यात्रा - विधि अग्निदेव बोले - गया - यात्रा के लिए उद्यत व्यक्ति को विधिपूर्वक श्राद्ध करके काषाय वस्त्र धारण करना चाहिए । फिर उसे गाँव की प्रदक्षिणा करके प्रत्येक दिन चलते रहना चाहिए, और इस बीच उसे कहीं दान नहीं लेना चाहिए । उसे संयम से रहना चाहिए । जिस समय से मनुष्य गया - यात्रा के लिए घर से निकल पड़ता है तब से उसके एक - एक पद पर पितरों को स्वर्गारोहण का सोपान प्राप्त होता रहता है । जिसका पुत्र गया - यात्रा कर ले उसके लिए ब्रह्मज्ञान की आवश्यकता ही क्या? उसे गौ के घर में भी मरने से क्या लाभ? अथवा कुरुक्षेत्र में निवास करने से ही क्या प्रयोजन? ( क्योंकि वह व्यक्ति तो पुत्र की गया - यात्रा से ही मुक्त हो जाता है । ) इसीलिए पुत्र की गया - यात्रा को देखकर पितृगण उल्लास मनाने लगते हैं ॥१-४ ॥ ( वे सोचने लगते हैं ) ' क्या यह अपने पैरों से भी छूकर हमें जल नहीं देगा? ' मोक्ष चार प्रकार से होता है-ब्रह्मज्ञान से, गयाश्राद्ध से, गौ के घर में मरण से तथा कुरुक्षेत्र में निवास करने से । नरक के भय से भयभीत होने के कारण पितृगण पुत्र की कामना करते हैं । वे सोचते हैं कि ( नरक से ) हमारी रक्षा वही पुत्र कर सकेगा जो गया - यात्रा करेगा । सभी तीर्थों में ( जाकर वहाँ ) मुण्डन तथा उपवास करने का नियम है, किन्तु गया तीर्थ के लिए काल ( विशेष ) आदि का कोई नियम नहीं है । वहाँ तो नित्य पिण्डदान करना चाहिए । वहाँ पर तीन पक्ष तक निवास करनेवाला अपने सात कुलों को पवित्र कर देता है । पिता आदि नौ देवतावाले तथा बारह देवतावाले अष्टकाश्राद्ध ( सप्तमी आदि तीन दिनों में किया जानेवाला श्राद्ध ), नान्दी श्राद्ध ( पुत्र आदि के शुभ संस्कार के दिन किया जानेवाला श्राद्ध ), गया श्राद्ध और मृत्यु दिवसीय श्राद्ध में माता का श्राद्ध उसके पति ( अर्थात् अपने पिता ) से पृथक् करना चाहिए । अन्यत्र पति के साथ ही श्राद्ध कर लेना चाहिए ॥५ - ९ ॥ १ क. ङ. च. गन्तु । २ क. ङ. च. " त् । पुत्रे मयि ज । ३ क. ङ. च. अन्वाष्टकासु वृ ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ४१५ पित्रादिनवदैवत्यं तथा द्वादशदैवतम् । उत्तरे मानसे पुण्य आयुरारोग्यवृद्धये । सन्तर्प्य देवत्रादीश्राद्धकृत्पिण्डदो भवेत् । दिव्यान्तरिक्षभौमादि पितृमात्रादि तर्पयेत् । माता पितामही चैव तथैव प्रपितामही । तेभ्योऽन्येभ्य इमान्पिण्डानुद्धाराय ददाम्यहम् । जीवशुक्रशनैश्चारि राहुकेतुस्वरूपिणे । सूर्यं नत्वा ब्रजेन्मौनी नरो दक्षिणमानसम् । गयायामागतः स्वर्गं यान्तु मे पितरोऽखिलाः । ॐ नमो भानवे भर्त्रे भवाय भव मे विभो । ' कव्यवाहोऽनलः सोमो यमश्चैवार्यमा तथा । आगच्छन्तु महाभागा युष्माभी रक्षितास्त्विह ।

तेषां " पिण्डप्रदाताऽहमागतोऽस्मि गयामिमाम् ।

प्रथमे दिवसे स्नायात्तीर्थे ह्युत्तरमानसे ॥१० ॥

सर्वाघौघविघाताय स्नानं कुर्याद्विमुक्तये ॥११ ॥

दिव्यान्तरिक्षभौमस्था ( भूमिष्ठा ) न्देवान्संतर्पयाम्यहम् ॥१२ ॥

पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः ॥ १३ ॥

मातामहः प्रमातामहो वृद्धप्रमातामहः ॥१४ ॥

ॐ नमः सूर्यदेवाय सोम भौमज्ञरूपिणे ॥१५ ॥

उत्तरे मानसे स्नात उद्धरेत्सकलं कुलम् ॥१६ ॥

दक्षिणे मानसे स्नानं करोमि “ पितृतृप्तये ॥१७ ॥

श्राद्धं पिण्डं ततः कृत्वा सूर्यं नत्वा वदेदिदम् ॥१८ ॥

भुक्तिमुक्तिप्रदः सर्वपितॄणां भव भावितः ॥ १ ९ ॥

अग्निष्वात्ता बर्हिषद आज्यपाः पितृदेवताः ॥ २० ॥

मदीयाः पितरो ये च मातृमातामहादयः ॥ २१ ॥

उदीच्यां मुण्डपृष्ठस्य देवर्षिगणपूजितम् ॥२२ ॥

गया में पिता आदि के क्रम ' नवदेवताक ' अथवा ' द्वादशदेवताक ' श्राद्ध करना आवश्यक है । गयायात्री को पहले दिन वहाँ के उत्तर मानस तीर्थ में स्नान करना चाहिए । पवित्र उत्तर मानस तीर्थ में स्नान इसलिए करना चाहिए जिससे आयु तथा आरोग्य की वृद्धि हो, सम्पूर्ण पापों का विनाश हो, और मोक्ष की प्राप्ति हो ॥१०-११ ॥ ( स्नानान्तर ) देवताओं और पितरों को तर्पण करके ही श्राद्ध और पिण्डदान का अधिकार प्राप्त होता है । तर्पण करते समय यह कहना चाहिए कि ' मैं स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूमि पर स्थित देवों के लिए तर्पण कर चुकने के बाद पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह और वृद्धप्रमातामह तथा अन्य सम्बन्धियों के लिए तर्पण कर रहा हूँ । तदनन्तर मैं ( अपने पितरों का ) उद्धार करने के लिए पिण्डदान कर रहा हूँ ऐसा कहकर उन सबको पिण्डदान देना चाहिए । तदनन्तर ' चन्द्र, मङ्गल, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, बुध, राहु और केतु रूपी सूर्य को नमस्कार है । ' ऐसा कहना चाहिए । उत्तर मानस में स्नान करनेवाला अपने सम्पूर्ण कुल का उद्धार कर देता है ॥१२-१६ ॥ सूर्य नमस्कार कर लेने के बाद मौन धारण करके दक्षिण मानस की ओर जाना चाहिए । ( इस समय उसे यह सोचना चाहिए कि ) मैं पितरों की तृप्ति के लिए ही दक्षिण मानस में स्नान करता हूँ । ' उसे यह भी सोचते रहना चाहिए कि ' मैं गया में आया हूँ, इसलिए मेरे सभी पितृगण स्वर्ग में पहुँच जायँ । ' तदनन्तर श्राद्ध, पिण्डदान और सूर्य नमस्कार करके यह कहना चाहिए - ' भरण - पोषण करनेवाले भगवान् सूर्य को नमस्कार है । अये विभो! मेरी रक्षा कीजिये और मेरे पितरों के ऊपर कृपा करके उन्हें भुक्ति - मुक्ति प्रदान कीजिये । कव्यवाह, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्ता, बर्हिषद तथा ( अन्य ) आज्य भक्षण करनेवाले पितृदेवताओ! अये महाभाग! आप लोग आइये । आप लोगों ने मेरे जिन माता, मातामह आदि पितरों की रक्षा ( अभी तक ) की है, मैं उन्हीं को पिण्डदान देने के लिए गया में आया हूँ ' ॥१७- २१३ ॥ गया में मुण्डपृष्ठ से उत्तर की ओर कनखल नामक एक तीर्थ है । देवता १ क. ङ. च. ' दिमेकर्द ' । २ दिव्यान्तरिक्षमभौमस्था सन्तर्पयाम्यहम् नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । ३ क. ङ. च. तेभ्यस्तेभ्य । ४ क. ङ. च. ततो । ५ क. ङ. च. तृदैवते । ग ° । ६ घ. ' वाहान ' । ७ क. ङ. च. ' ण्डयुतानां च आग ' । ८ क. ङ. च. ' वतागणसेवित । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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अग्निपुराणम् ४१६ नाम्ना कनखलं तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । लेलिहानैर्महानागै रक्ष्यते चैव नित्यशः । फल्गुतीर्थं ततो गच्छेन्महानद्यां स्थितं परम् । एतद्गयाशिरः प्रोक्तं फल्गुतीर्थं तदुच्यते । यस्मिन्फलति श्रीगौर्वा कामधेनुर्जलं मही । फल्गुतीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवं गदाधरम् । पृथिव्यां यानि तीर्थानि आसमुद्रात्सरांसि च । फल्गुतीर्थे तीर्थराजे करोति स्नानमादृतः । स्नात्वा श्राद्धी पिण्डदोऽथ नमेद्देवं पितामहम् पितामहो लिङ्गरूपी तं नमामि महेश्वरम् ब्रह्मविष्णुनृसिंहाख्यं वराहादीन्नमाम्यहम् धर्मारण्यं द्वितीयेऽह्नि मतङ्गस्याऽऽश्रमे वरे सिद्धानां प्रीतिजननैः पापानां च भयङ्करैः ॥२३ ॥

तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति क्रीडन्ते ( न्ति ) भुवि मानवाः ॥२४ ॥

नागाज्जनार्दनात्कूपादूराच्चोत्तरमानसात् ॥२५ ॥

मुण्डपृष्ठं ' नगा द्यौश्च सारात्सारमथान्तरम् ॥२६ ॥

दृष्टिरम्यादिकं यस्मात्फल्गुतीर्थं न फल्गुवत् ॥ २७ ॥

एतेन किं न पर्याप्तं नृणां सुकृतकारिणाम् ॥२८ ॥

फल्गुतीर्थं गमिष्यन्ति वारमेकं दिनेदिने ॥ २ ९ ॥ पितॄणां ब्रह्मलोकाप्त्या आत्मनो भुक्तिमुक्तये ॥ ३० ॥

। कलौ माहेश्वरा लोका अत्र देवो गदाधरः ॥ ३१ ॥

। गदाधरं बलं काममनिरुद्धं नरायणम् ॥३२ ॥

। ततो गदाधरं दृष्ट्वा कुलानां शतमुद्धरेत् ॥ ३३ ॥

। मतङ्गवाप्यां संस्नाप्य श्राद्धकृत्पिण्डदो भवेत् ॥३४ ॥

और ऋषि लोग उसकी पूजा किया करते हैं । वह तीनों लोकों में प्रसिद्ध है । उसकी रक्षा प्रतिदिन जिह्वा को लपलपाते हुए वे सर्प करते हैं जो सिद्ध जनों के लिए आनन्द प्रदान करनेवाले किन्तु पापियों के लिए भयङ्कर हैं । उसमें स्नान करनेवाले मनुष्य स्वर्ग को चले जाते हैं और ( इस लोक में आने पर ) पृथ्वी पर आनन्द से क्रीड़ा किया करते हैं ॥ २२-२४ ॥ कनखल तीर्थ के बाद तीर्थयात्री को नागजनार्दन कूप, वट, उत्तरमानस सभी तीर्थों में होते हुए फल्गुतीर्थ में जाना चाहिए- जो महानदी में स्थित है । यह जो फल्गुतीर्थ है, वह गयासुर का सिर कहा गया है । इसी प्रकार मुण्डपृष्ठ, नग और द्यौ - एक से बढ़कर एक उत्तम तीर्थ हैं । फल्गुतीर्थ जल और उसकी भूमि लक्ष्मी और कामधेनु का फल देनेवाली है । यह देखने में भी रमणीय है अतः फल्गुतीर्थ का फल किसी प्रकार भी फल्गु ( तुच्छ ) नहीं है । फल्गुतीर्थ में स्नान करके भगवान् गदाधर ( विष्णु ) देव का दर्शन कर लेनेवाले पुण्यात्मा मनुष्यों के लिए करना ही क्या रह जाता है? समुद्र से लेकर सरोवर तक इस पृथ्वी पर जितने तीर्थ हैं वे प्रतिदिन एक बार फल्गुतीर्थ अवश्य जाते हैं । तीर्थराज फल्गुतीर्थ में श्रद्धापूर्वक स्नान करनेवाला व्यक्ति पितरों को ब्रह्मलोक में पहुँचाकर स्वयं भोग और मोक्ष को प्राप्त कर लेता है । गया - यात्री को उसमें स्नान करके, पितरों के लिए श्राद्ध और पिण्डदान करते हुए यह कहते हुए भगवान् ब्रह्मा को नमस्कार करना चाहिए - ' कलियुग में लोग महेश्वर के भक्त हुआ करते हैं किन्तु यहाँ तो केवल गदाधर ( भगवान् विष्णु ही एकमात्र ) देवता हैं और पितामह लिङ्गरूपी हैं । इसलिए महेश्वर को नमस्कार करता हूँ । मैं गदाधर ( भगवान् विष्णु ), बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नृसिंह तथा वराह आदि को ( भी ) नमस्कार करता हूँ । तदनन्तर गया - यात्री को गदाधर ( भगवान् विष्णु ) का दर्शन करके अपने सौ कुलों का उद्धार करना चाहिए ॥२५-३३ ॥ दूसरे दिन गया - यात्री मतङ्ग के श्रेष्ठ आश्रम में स्थित धर्मारण्य तीर्थ में जाय । वहाँ मतङ्ग-१ ख. ग. घ. ‘ “ पृष्ठनगाद्याश्च । २ दृष्टिरम्यादिकं फल्गुवत् नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA