अग्नि पुराण — पृष्ठ 431–440

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः उद्धृत्योच्छिष्ट पार्श्वे तु कृत्वा चैवावनेजनम् आचान्तेषूदकं पुष्पाण्यक्षतानि प्रदापयेत् अघोराः पितरः सन्तु गोत्रं नो वर्धतां सदा श्रद्धा च नो मा व्यगमद्बहुदेयं च नोऽस्त्विति याचितारश्च नः सन्तु मा च याचिष्म कंचन स्वधां वाचयिष्ये पृच्छेदनुज्ञातश्च वाच्यताम् स्वधोच्यतामस्तु स्वधा ' उच्यमानस्तथैव च यथाशक्ति प्रदद्याच्च दैवे पित्रेऽ ( त्र्येऽ ) थ वाचयेत् आ मा वाजस्येत्यनुव्रज्य कृत्वा विप्रान्प्रदक्षिणम् एकोद्दिष्टं प्रवक्ष्यामि श्राद्धं पूर्ववदाचरेत् नावाहनाग्नौकरणं विश्वेदेवा न चात्र हि उपतिष्ठतामित्यक्षय्ये विसर्गे चाभिरम्यताम् ४२७ । दद्यात्कुशेषु त्रीन्पिण्डानाचान्तेषु परे जगुः ॥ २५ ॥

। अक्षय्योदकमेवाथ आशिषः प्रार्थयेन्नरः ' ॥ २६ ॥

। दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः सन्ततिरेव च ॥ २७ ॥

। अन्नं च नो बहुभवेदतिथींश्च लभेमहि ॥ २८ ॥

। स्वधावाचनीयान्कुशानास्तीर्य सपवित्रकान् ॥२९ ॥

। पितृभ्यः पितामहेभ्यः प्रपितामहमुख्यके ॥३० ॥

। अपो निषिञ्चेदुत्तानं पात्रं कृत्वाऽथ दक्षिणाम् ॥३१ ॥

। विश्वेदेवाः प्रीयन्तां च वाजे वाजे विसर्जयेत् ॥ ३२ ॥

। गृहे * विशेदमावास्यां मासि मासि चरेत्तथा ॥३३ ॥

। एकं पवित्रमेकार्घमेकं पिण्डं प्रदापयेत् ॥३४ ॥

। तृप्तिप्रश्ने स्वदितमिति वदेत्सुस्वदितं द्विजः ॥ ३५ ॥

। अभिरताः स्म इत्यपरे शेषं पूर्ववदाचरेत् ॥ ३६ ॥

भी दे करके सब अन्न को एक जगह उठाकर रख देना चाहिए और उस स्थान में अवनेजन ( पहले से पिण्डिका के समीप एक पात्र में रखा हुआ सुरक्षित जल छिड़क देना चाहिए । दूसरे आचार्यों का मत है कि पहले कुशों के ऊपर तीन पिण्डों को रखकर तब आचमन करना चाहिए ॥। २२-२५ ॥ आचमन के बाद जल, पुष्प, अक्षत तथा अक्षय्य उदक प्रदान करके पितरों से आशीर्वाद के लिए इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए- ' हमारे पितर सौम्य हों, हमारा गोत्र सदा बढ़ता रहे, हमारे वंश में दानियों, वेदों तथा सन्तान की ( सदैव ) वृद्धि होती रहे । हमारी श्रद्धा कभी नष्ट न हो, हमारे पास प्रचुर मात्रा में देय वस्तुएँ हों, हमारे पास धन भी बहुत हो जिससे हम अतिथियों को प्राप्त करते रहें । हमसे याचना करनेवाले बहुत हों, किन्तु हम किसी से कुछ भी याचना न करें ॥ २६-२८३ ॥ तदनन्तर जिनके ऊपर ' स्वधा ' पाठ किया जायगा, ऐसे कुशों को पवित्री के साथ बिछाकर यह कहना चाहिए कि ' मैं स्वधा का पाठ करूँगा । ' ' पाठ करो ' - इस प्रकार अनुज्ञा प्राप्त करके ' पितृभ्यः स्वाहा, पितामहेभ्यः स्वाहा, प्रपितामहेभ्यः स्वाहा ' इस प्रकार पाठ करना चाहिए । तदनन्तर जल छिड़ककर पात्र को उलटा करके यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिए । देवकर्म और पितृकर्म में प्रत्येक श्राद्ध में ' विश्वेदेव प्रसन्न हों ' यह कहकर उनका विसर्जन करना चाहिए । तदनन्तर ' आ मा वाजस्य ० ' इस मन्त्र से ब्राह्मणों के पीछे - पीछे चलकर उनकी परिक्रमा करके घर में प्रवेश करना चाहिए । इसी प्रकार प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि में श्राद्ध करना चाहिए ॥२९ -३३ ॥ अब मैं ( मृत प्राणि - विशेष के लिए अनुष्ठित ) एकोद्दिष्ट नामक श्राद्ध की विधि बतलाऊँगा । यह श्राद्ध पहले ही की तरह करना चाहिए । इसमें एक पवित्री, एक अर्घ तथा एक ही पिण्ड दिलाना चाहिए । किन्तु इसमें आवाहन, अग्न्याहुति तथा विश्वेदेव का पूजन नहीं करना चाहिए और तृप्ति के प्रश्न में ब्राह्मण को ' स्वदितम् ' तथा ' सुस्वदितम् ' कहना चाहिए । अक्षय्य जल आदि प्रदान करते समय ' उपतिष्ठताम् ' और विसर्जन के समय ' अभिरम्यताम् ' कहना चाहिए । अन्य आचार्यों के अनुसार इसमें ' अभिरताः स्म ' कहना चाहिए । शेष कर्म पहले के समान ही करना चाहिए ॥३४-३६ ॥ १ क. ङ. च. येत्ततः । अ ' । २ ख. ग. ' धा तस्य चानन्तरेषु च । अ ' । च ' धा स्तव्यमा । ३ क. ख. ' वे विप्रेऽथ । च. ' वे पित्रे तथाऽर्चये । ४ क. ङ. च. गृहं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 432

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४२८ अग्निपुराणम् सपिण्डीकरणं वक्ष्ये अब्दान्ते मध्यतोऽपि वा । सपवित्राणि चत्वारि तिलपुष्पयुतानि च । प्रेतपात्रं पितृपात्रे ये सम ( मा ) ना इतिद्वयात् । अथाऽऽभ्युदयिकं श्राद्धं वक्ष्ये सर्व तु पूर्ववत् । उपचारा ऋजुकुशास्तिलार्थैश्च यवैरिह । दध्यक्षतवदराद्याः पिण्डा नान्दिमुखान्पितॄन् । नान्दीमुखाश्च पितरो वाचयिष्येऽथ पृच्छति । नान्दीमुखाश्च पितरस्तत्पिता प्रपितामहः । स्वधाकारान्न ' युञ्जीत युग्मान्विप्रांश्च भोजयेत् मासं तृप्तिस्तथाऽऽरण्यैः कन्दमूलफलादिभिः चतुरो रौरवेणाथ पञ्च षट्छागलेन तु मेषमांसेन दश च माहिषैः ' पार्षतैः शिवैः पितॄणां त्रीणि पात्राणि एकं प्रेतस्य पात्रकम् ॥३७ ॥

गन्धोदकेन युक्तानि पूरयित्वाऽभिषिञ्चति ॥३८ ॥

पूर्ववत् पिण्डदानादि प्रेतानां पितृता भवेत् ॥ ३ ९ ॥ जपेत्पितृमन्त्रवर्जं पूर्वाह्ने तत्प्रदक्षिणम् ॥ ॥४० ४० ॥ ॥ तृप्तिप्रश्नस्तु सम्पन्नं सुसम्पन्नं वदेद्विजः ॥४१ ॥

आवाहयिष्ये पृच्छेच्च प्रीयतामिति चाक्षये ॥ ४२ ॥

नान्दीमुखान्पितृगणान्प्रीयन्तामित्यथो वदेत् ॥ ४३ ॥

मातामहः प्रमातामहो वृद्धप्रमातृकामहः ॥४४ ॥

। तृप्तिं वक्ष्ये पितॄणां च ग्राम्यैरोषधिभिस्तथा ॥४५ ॥

। मत्स्यैर्मासद्वयं ' मार्गैस्त्रयं वै शाकुनेन च ॥ ४६ ॥

। कूर्मेण सप्त चाष्टौ च वाराहेण नवैव तु ॥ ४७ ॥

। संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन वा ॥ ४८ ॥

अब मैं सपिण्डीकरण श्राद्ध बतलाऊँगा । यह श्राद्ध वर्ष के अन्त में या वर्ष के बीच में ही करना चाहिए । इसमें तीन पात्र पितरों के लिए और एक छोटा - सा पात्र प्रेत के लिए हुआ करता है । तिल, पुष्प और पवित्री से युक्त चारों पात्रों को गन्ध तथा जल से भरकर ' ये समाना ० ' इत्यादि मन्त्र से प्रेतपात्र तथा पितृपात्र का अभिषेक करके पहले की तरह पिण्डदान आदि करना चाहिए । इससे प्रेत पितृवत् हो जाते हैं ॥ ३७-३९ ॥ अब मैं आभ्युदयिक श्राद्ध की विधि बतलाऊँगा । इसमें सब - कुछ पहले की तरह ही होता है । किन्तु ( इसमें ) पितृमन्त्र को छोड़कर ( अन्य ) मन्त्रों का जप करना चाहिए । पूर्वाह्ण में पितरों की प्रदक्षिणा करनी चाहिए । अन्य क्रियाओं को सीधे कुशों, तिल तथा यव से करना चाहिए और तृप्तिप्रश्न के लिए ब्राह्मण को ‘ सम्पन्न ' तथा ' सुसम्पन्न ' शब्दों का व्यवहार करना चाहिए । नान्दीमुख पितरों को दही, अक्षत तथा बेर आदि के पिण्ड देने चाहिए । ' मैं आवाहन करूँगा ' - ऐसे प्रश्न पूछना चाहिए तथा अक्षय वस्तु समर्पण करते समय ' तृप्त होइये ' – ऐसा कहना चाहिए । फिर ' नान्दीमुख पितरों से निवेदन करूँगा ' - यह पूछना चाहिए और ' नान्दीमुख पितर, उनके पिता, प्रपितामह, मातामह, प्रमातामह तथा वृद्धप्रमातामह तृप्त हों ' यह कहना चाहिए । इस श्राद्ध में ' स्वधा ' शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा युग्म ( जैसे दो - चार आदि ) ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए ॥४०-४४३ ॥ अब मैं पितरों को तृप्ति देनेवाली ग्राम्य वस्तुओं तथा ओषधियों का वर्णन करूँगा । जंगली कन्द, मूल तथा फल आदि प्रदान करने से पितरों की तृप्ति एक मास तक होती है । मछली से दो मास, हरिण के मांस से तीन मास, पक्षियों के मांस से चार मास, रुरु ( मृग ) के मांस से पाँच मास, बकरे के मांस से छह मास, कछुए के मांस से सात मास, सुअर के मांस से नौ मास और भैंसे, भेंड़े तथा सियार के मांस से श्राद्ध करने से दस मास तक के लिए तृप्ति हो जाती है । गाय के दूध या खीर से श्राद्ध करने पर एक वर्ष तक तृप्ति होती है ॥४५-४८ ॥ १ च. ' र्जं कृतद ' । २ च ' कारं नियु । ३ क. ङ. च. मासत्रयं । ४ च. पार्वतैः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 433

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सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ४२ ९ ' वाध्रीनसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादश वार्षिकी महाशल्काश्च वर्षासु मघाश्राद्धमथाक्षयम् तृणाचिकेतस्त्रिमधुर्धर्मद्रोणस्य ' पाठकः काम्यानां कल्पमाख्यास्ये प्रतिपत्सु धनं बहु पञ्चम्यां पुत्रकामस्तु षष्ठ्यां च श्रयैष्ठ्यभागपि नवम्यां च एकसफा दशम्यां गोगणो भवेत् ज्ञातिश्रेष्ठ्यं त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां च शस्त्रतः सप्तव्याधा ' दशारण्ये मृगाः कालञ्जरे गिरौ तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः श्राद्धादौ पठिते श्राद्धं पूर्णं स्याद्ब्रह्मलोकदम् तत्पितुस्तत्पितुः कुर्याज्जीवति प्रपितामहे । खड्गमांसं कालशाकं लोहितच्छागलो मधु ॥ ४ ९ ॥ । मन्त्राध्याय्यग्निहोत्री च शाखाध्यायी षडङ्गवित् ॥५० ॥

। त्रिषु ( सु ) पर्णज्येष्ठ सामज्ञानी स्युः पङ्क्तिपावनाः ॥५१ ॥

। स्त्रियः परा द्वितीयायां चतुर्थ्यां धर्मकामदः ॥५२ ॥

। कृषिभागी च सप्तम्यामष्टभ्यामर्थलाभकः ॥५३ ॥

। एकादश्यां परीवारो द्वादश्यां धनधान्यकम् ॥५४ ॥

। मृतानां श्राद्धं सर्वाप्तममावस्यां समीरितम् ॥५५ ॥

। चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे ॥ ५६ ॥

। प्रस्थिता दूरमध्वानं यूयं तेभ्योऽवसीदत ॥५७ ॥

। श्राद्धं कुर्याच्च पुत्रादिः पितुर्जीवति तत्पितुः ॥ ५८ ॥

। पितुः पितामहस्याथ परस्य प्रपितामहात् ॥ ५ ९ ॥ वाध्रीनस ( परिपक्व बकरे ) के मांस से बारह वर्षों तक तृप्ति होती है । वर्षा ऋतु और मघा नक्षत्र में गैंडे के मांस, कालशाक ( श्राद्ध के लिए प्रसिद्ध एक साग ) लाल रंग के बकरे, मधु और महाशल्क ( बड़ी मछली - बोआर, रोहू आदि ) से किया जानेवाला श्राद्ध अक्षय फल प्रदान करनेवाला हुआ करता है । मन्त्रों का अध्ययन करनेवाला अग्निहोत्री, वेद की शाखाओं का अध्ययन करनेवाला, ऋग्वेद की ' मधुवाता ० ' आदि तीन ऋचाओं का ज्ञाता, धर्मद्रोण का पाठक, त्रिसुपर्ण और ज्येष्ठ मास का ज्ञाता ये ब्राह्मण पंक्तिपावन ब्राह्मण कहे जाते हैं ॥ ४ ९ -५१ ॥ अब मैं काम्यकल्प का ( अर्थात् जिस - जिस दिन श्राद्ध करने से जो - जो कामनाएँ पूरी होती हैं उनका ) वर्णन करूँगा । प्रतिपदा को श्राद्ध करने से बहुत धन मिलता है । द्वितीया को श्राद्ध करने से सुन्दर स्त्रियाँ मिलती हैं । चतुर्थी तिथि के दिन श्राद्ध करने से धर्म और काम की प्राप्ति होती है । पुत्र की कामना करनेवाला पंचमी को, श्रेष्ठता चाहनेवाला षष्ठी को, खेती में उन्नति चाहनेवाला सप्तमी को और अर्थ चाहनेवाले व्यक्ति को अष्टमी के दिन श्राद्ध करना चाहिए । नवमी को श्राद्ध करने से एक खुरवाले ( घोड़े आदि ) पशुओं की प्राप्ति होती है तथा दशमी को श्राद्ध करने से गायों की वृद्धि होती है । एकादशी को श्राद्ध करने से परिवार की वृद्धि होती है और द्वादशी को श्राद्ध करने से धनधान्य की वृद्धि होती है । त्रयोदशी को श्राद्ध करने से बन्धुओं में श्रेष्ठता आती है और चतुर्दशी को श्राद्ध करने से शस्त्रों से रक्षा होती है । अमावस्या का श्राद्ध मृतकों को सब - कुछ दिलानेवाला कहा गया है ॥५२-५५ ॥ ' दशारण्य के रहनेवाले सात व्याध, कालंजर पर्वत के रहनेवाले मृग, शरद्वीप के रहनेवाले हंसों ने कुरुक्षेत्र में वेदों में पारङ्गत ब्राह्मणों के रूप में जन्म प्राप्त किया । वे बहुत लम्बे मार्ग पर चलते रहे । आप लोग भी उनके साथ चलते रहे ' - श्राद्ध के प्रारम्भ में इन वाक्यों का पाठ करने से श्राद्ध पूर्ण तथा ब्रह्मलोक को प्रदान करनेवाला होता है । पिता के जीवन - काल में पुत्र को अपने पितामह का श्राद्ध करना चाहिए । पितामह के जीवित रहते हुए प्रपितामह का श्राद्ध करना चाहिए, प्रपितामह के जीवनकाल में उसके पिता का श्राद्ध करना चाहिए । १ घ. छ. वार्धीनसस्य । २ क. च. ' धुर्वलद्रो ' । ३ क. कर्मकादयः । ४. घ. छ. दशार्णेषु । ५ घ. छ. तेऽभिजा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 434

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अग्निपुराणम् ४३० एवं मात्रादिकस्यापि तथा मातामहादिके । श्राद्धकल्पं पठेद्यस्तु स लभेच्छ्राद्धकृत्फलम् ॥ ६० ॥

तीर्थे युगादौ मन्वादौ श्राद्धं दत्तमथाक्षयम् । अश्वयुक्शुक्लनवमी द्वादशी कार्तिके तथा ॥ ६१ ॥

तृतीया चैव माघस्य तथा भाद्रपदस्य च । फाल्गुनस्याप्यमावास्या पौषस्यैकादशी तथा ॥ ६२ ॥

आषाढस्यांपि दशमी माघमासस्य सप्तमी । श्रावणे चाष्टमी कृष्णा तवाऽऽषाढे च पूर्णिमा ॥६३ ॥

कार्तिकी फाल्गुनी तद्वज्ज्येष्ठे पञ्चदशी ' सिता । स्वायंभुवाद्या मनवस्तेषामाद्याः किलाक्षयः ॥ ६४ ॥

गया प्रयागो गङ्गा च कुरुक्षेत्रं च नर्मदा । श्रीपर्वत: प्रभासश्च शालग्रामो वाराणसी ॥ ६५ ॥

गोदावरी तेषु श्राद्धं श्रीपुरुषोत्तमादिषु ॥६६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये श्राद्धकल्पवर्णनं नाम सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११७ ॥

अथाष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः भारतवर्षवर्णनम् अग्निरुवाच उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । वर्षं तद्भारतं नाम नवसाहस्रविस्तृतम् ॥१ ॥

इसी प्रकार मातामह आदि का श्राद्ध करना चाहिए । श्राद्ध - कल्प का पाठ करनेवाले को भी श्राद्ध करने का ( ही ) फल प्राप्त होगा ॥५६-६० ॥ तीर्थ स्थान में, युगादि और मन्वादि में किया हुआ श्राद्ध अक्षय फल देनेवाला हुआ करता है । आश्विन शुक्ल की नवमी, कार्तिक की द्वादशी, माघ तथा भाद्रपद की तृतीया, फाल्गुन की अमावस्या, पौष की एकादशी, आषाढ़ की दशमी, माघ की सप्तमी, श्रावण मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी, आषाढ़, कार्तिक तथा फाल्गुन की पूर्णिमा, ज्येष्ठ की पञ्चदशी और स्वायम्भुव आदि मनु अक्षय फल को प्रदान करनेवाले श्राद्ध के लिए उपयुक्त माने गये हैं । गया, गङ्गा, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, नर्मदा, श्रीपर्वत, प्रभास, शालग्राम, काशी, गोदावरी और पुरी आदि स्थानों में श्राद्ध करने का बड़ा महत्त्व माना गया है ॥६१-६६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में श्राद्ध - कल्प वर्णन नामक एक सौ सतरहवाँ अध्याय समाप्त ॥११७ ॥

अध्याय ११८ भारतवर्ष - वर्णन अग्निदेव बोले- समुद्र से उत्तर तथा हिमालय से दक्षिण की ओर जो वर्ष है, उसी का नाम भारत है । वह नौ सहस्र योजन में फैला हुआ है । स्वर्ग तथा मोक्ष पानेवालों के लिए यह भारतवर्ष ( कर्मभूमि ) है । यहाँ सात कुल-१ च. तथा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 435

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एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ४३१ कर्मभूमिरियं स्वर्गमपवर्गं च गच्छताम् । महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमान्हे ( न्हि? ) मपर्वतः ॥२ ॥

विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः । इन्द्रद्वीपः कसेरुश्च ताम्रवर्णो गभस्तिमान् ॥३ ॥

नागद्वीपस्तथा सौम्यो गान्धर्वस्त्वथ वारुणः । अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः ॥४ ॥

योजनानां सहस्त्राणि द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरात् । नव भेदा भारतस्य मध्यभेदेऽथ पूर्वतः ॥ ५ ॥

किराता यवनाश्चापि ब्राह्मणाद्याश्च मध्यतः । वेदस्मृतिमुखा नद्यः पारियात्रोद्भवास्तथा ॥६ ॥

विन्ध्याच्च नर्मदाद्याः स्युः सह्यात्तापी पयोष्णिका । गोदावरी भीमरथी कृष्णवेणादिकास्तथा ॥७ ॥

मलयात्कृतमालाद्यास्त्रिसामाद्या महेन्द्रजाः । कुमाराद्याः शुक्तिमत्तो हिमाद्रेश्चन्द्रभागका ॥ पश्चिमे कुरुपाञ्चालमध्यदेशादयः स्थिताः ॥८ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये भारतवर्षवर्णनं नामाष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११८ ॥

अथैकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः महाद्वीपादिवर्णनम् अग्निरुवाच

लक्षयोजनविस्तारं जम्बूद्वीपं समावृतम् । लक्षयोजनमानेन क्षारोदेन समन्ततः ॥१ ॥

संवेष्ट्य क्षारमुदधिं प्लक्षद्वीपस्तथा स्थितः । सप्तमेधातिथेः पुत्राः प्लक्षद्वीपेश्वरास्तथा ॥२ ॥

पर्वत हैं; जिनके नाम हैं - महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, हिमालय, विन्ध्य और पारियात्र । इन्द्र, कसेरु, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नाग, सौम्य, गान्धर्व और वारुण द्वीपों में ही नवम द्वीप भारत है, जो समुद्रों से घिरा हुआ है । दक्षिण से उत्तर तक यह द्वीप हजारों योजन फैला हुआ है । भारत के नौ विभाग हैं || १-५ ॥ मध्य विभाग में पूर्व की ओर किरात, यवन तथा श्रौत और स्मार्त ब्राह्मण निवास करते हैं । यहाँ पारियात्र पर्वत से निकलनेवाली कई नदियाँ हैं । विन्ध्याचल से नर्मदा आदि, सह्यपर्वत से तापी पयोष्णिका, गोदावरी, भीमरथी, कृष्णा और वेणी, मलय पर्वत से कृतमाला आदि, महेन्द्र पर्वत से त्रिसामा आदि, शुक्तिमान् से कुमारा आदि और हिमालय से चन्द्रभागा आदि नदियाँ निकली हुई हैं । पश्चिम में कुरु, पाञ्चाल तथा मध्यदेश आदि स्थित हैं ॥६-८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में भारतवर्ष - वर्णन नामक एक सौ अठारहवाँ अध्याय समाप्त ॥११८ ॥

अध्याय ११ ९ महाद्वीप आदि का वर्णन अग्निदेव बोले - जम्बू द्वीप एक लाख योजन विस्तृत है । वह चारों ओर से उतने ही योजन लम्बे खारे सागर से घिरा हुआ है । ( उसी तरह ) क्षार समुद्र को घेरकर प्लक्ष द्वीप स्थित है । मेधातिथि के सात पुत्र थे - शान्तभय, शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेम तथा ध्रुव । यही प्लक्ष द्वीप के स्वामी हैं । उन्हीं के नाम पर वर्षों के नाम हैं । गोमेध, १ घ. छ. क्षीरोदेन । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 436

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अग्निपुराणम् ४३२ स्याच्छान्तभयः शिशिरः सुखोदय इतः परः । मर्यादाशैलो गोमेधश्चन्द्रो ' नारददुन्दुभी । नद्यः प्रधानाः सप्तात्र प्लक्षाकान्तिकेषु च । आर्यकाः कुरवश्चैव विविंशा भाविनश्च ' ते । मानेनेक्षुरसोदेन वृतो द्विगुणशाल्मलः । श्वेतोऽथ हरितश्चैव जीमूतो लोहितः क्रमात् । द्विगुणो द्विगुणेनैव सुरोदेन समावृतः । द्रोणः कङ्कोऽथ महिषः ककुद्मान्सप्तनिम्नगाः । वायुरूपं यजन्तिस्म ' सुरोदेनायमावृतः । ' द्वैरथी लम्बनी धैर्यः कपिलश्च प्रभाकरः । विद्रुमो हेमशैलश्च द्युतिमान्पुष्पवांस्तथा वेष्टितोऽयं घृतोदेन क्रौञ्चद्वीपेन सोऽप्यथ ( कुशलो " मनोनुगश्चोष्णः १२ प्रधानोऽथान्धकारकः आनन्दश्च शिवः क्षेमो ध्रुवस्तन्नाम वर्षकम् ॥३ ॥

सोमकः सुमनाः शैलो वैभ्राजास्तर्जनाः शुभाः ॥४ ॥

जीवनं पञ्चसाहस्रं धर्मो वर्णाश्रमात्मकः ॥५ ॥

विप्राद्यास्तैश्च सोमोऽर्थ्यो द्विलक्षश्चैव ' प्लक्षकः ॥६ ॥

वपुष्मतः सप्तपुत्राः शाल्मलेशास्तथाऽभवन् ॥७ ॥

वैद्युतो मानसश्चैव सुप्रभो नाम वर्षकः ॥ ८ ॥

कुमुदश्चानलश्चैव तृतीयस्तु बलाहकः ॥। ९ ॥ कपिलाश्चारुणाः पीताः कृष्णाः स्युर्ब्राह्मणादयः ॥१० ॥

ज्योतिष्मतः कुशेशाः स्युरुद्भिदो वेणुमान्सुतः ॥११ ॥

विप्राद्या दमिमुख्यास्तु ब्रह्मरूपं यजन्ति ते ॥१२ ॥

। कुशेशयो हरिः शैलो वर्षार्थं मन्दराचलः ॥ १३ ॥

॥ क्रौञ्चेश्वरा द्युतिमतः पुत्रास्तन्नामवर्षकाः ॥।१४ । १४ ॥ ॥ । मुनिश्च दुन्दुभिः सप्त सप्त शैलाश्च निम्नगाः ) ॥ १५ ॥

चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमनस, वैभ्राज, तर्जन - ये प्लक्षद्वीप के सीमा पर्वत हैं । प्लक्षद्वीप में सात प्रधान नदियाँ हैं । वहाँ जीवनकाल पाँच हजार वर्षों का होता है और वर्णाश्रम धर्म का पालन किया जाता है । वहाँ की आर्यक, कुरु, विविंश तथा भाविन् नामक ब्राह्मण इत्यादि जातियाँ चन्द्रमा की उपासना करती हैं । प्लक्षद्वीप का क्षेत्रफल दो लाख योजन है । वह उतने ही विस्तारवाले गन्ने के रस के समुद्र से घिरा हुआ है । प्लक्षद्वीप से दुगुना बड़ा शाल्मल द्वीप है ॥१-६३ ॥ वपुष्मान् के सात पुत्र थे - श्वेत, हरित, जीमूत, लोहित, वैद्युत, मानस और सुप्रभ । यही शाल्मल द्वीप के स्वामी हैं । वहाँ के वर्षों के नाम इन्हीं के नामों पर पड़े हैं । वह द्वीप अपने से दुगुने विस्तारवाले सुरा के समुद्र से घिरा हुआ है । वहाँ पर सात पर्वत हैं - कुमुद, अनल, बलाहक, द्रोण, कङ्क, महिष और ककुद्मान् । वहाँ पर कपिला, अरुणा, पीता और कृष्णा आदि सात नदियाँ हैं । वहाँ ब्राह्मण आदि जातियाँ वायु - देवता की उपासना करती हैं । ( जैसे कि पहले कहा जा चुका है ) यह चारों ओर से सुरासागर से घिरा हुआ है ॥७-१०३ ॥ ज्योतिष्मान् के सात पुत्र हैं - उद्भिद, वेणुमान्, द्वैरथी, लम्बनी, धैर्य, कपिल और प्रभाकर । ये सभी कुशद्वीप के स्वामी हैं । वहाँ धर्म आदि ब्राह्मण जातियाँ ब्रह्मा की उपासक हैं । कुशद्वीप में विद्रुम, हेमशैल, द्युतिमान्, पुष्पवत्, कुशेशय, हरिशैल और मन्दराचल - ये सात पर्वत हैं । वह द्वीप घी के समुद्र से घिरा हुआ है और उस समुद्र को घेरे हुए है क्रौञ्चद्वीप । क्रौञ्चद्वीप के स्वामी द्युतिमान् के पुत्र हैं । उन्हीं के नामों से वहाँ के वर्ष प्रसिद्ध हैं, जिनके नाम हैं - कुशल, मनोनुग, उष्ण, प्रधान, अन्धकारक, देवावृत्, पुण्डरीक, दुन्दुभि और द्विगुण नामक सात पर्वत और सात नदियाँ हैं । इनके अतिरिक्त १ क. ग. " मेरुश्च । २ क. निविंशा । च. विदिशो । ३ च. भापिनिश्चिते । ४ घ. छ. क्षश्चाब्धिलक्ष ' । ५ च. भजन्ति । ६ च. “ देन समा ” । ७ घ. छ. ‘ रुद्गिजो धेनुमा ' । ८ क. द्वैरथो । ९ घ. छ. दधिमु ' । १० कुशलो निम्नगाः क. ङ पुस्तकयोर्नास्ति । ११ ख. ग. लो मुन्नटश्चो ' । च. ' लोमानु ' । १२ ख. ग. च. ' ष्णः पीवरोऽप्यन्ध ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 437

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एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ४३३ क्रौञ्चश्च वामनश्चैव तृतीयश्चान्धकारकः द्वीपा द्वीपेषु ये शैला यथा द्वीपानि ते तथा यजन्ति क्रौञ्चद्वीपस्तु दधिमण्डोदकावृतः जलदश्च ' कुमारश्च सुकुमारो ' मणीचकः उदयाख्यो जलधरो रैवतः ' श्यामकोद्रकौ " मगा मगधमानस्यामन्दगाश्च द्विजातयः पुष्करेणाऽऽवृतः सोऽपि द्वौ पुत्रौ सवनस्य च एकोऽद्रिर्मानसाख्योऽत्र मध्यतो बलयाकृतिः जीवनं दशसाहस्त्रं सुरैर्ब्रह्माऽत्र पूज्यते ऊनातिरिक्तता चापां समुद्रेषु न जायते दशोत्तराणि पञ्चैव अङ्गुलानां शतानि वै स्वादूदकात्तु ११ द्विगुणा‍ भूर्हेमी जन्तुवर्जिता ॥ देवावृत्पुण्डरीकश्च दुन्दुभिर्द्विगुणो ' मिथः ॥ १६ ॥

। पुष्कराः पुष्कलः'धन्याः ' तिथ्यां ' विप्रादयो हरिम् ॥१७ ॥

। संवृतः शाकद्वीपेन ' भव्याच्छाकेश्वराः सुता ॥१८ ॥

। कुशोत्तरथो ' ( रोऽथ ) मोदाकी द्रुमस्तन्नामवर्षकाः ॥१९ ॥

। आम्बिकेयस्तथा रम्यः केशरी सप्तनिम्नगाः ॥२० ॥

। यजन्ति सूर्यरूपं तु शाकः क्षीराब्धिनाऽऽवृतः ॥२१ ॥

। महावीतो धातकिश्च वर्षे द्वे नामचिह्निते ॥ २२ ॥

। योजनानां सहस्राणि विस्तारोच्छ्रायतः समः ॥२३ ॥

। स्वादूदकेनोदधिना वेष्टितो द्वीपमानतः ॥ २४ ॥

। उदयास्तमनेष्विन्दोः पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः ॥ २५ ॥

। अपां वृद्धिक्षयौ दृष्टौ सामुद्रीणां महामुने ॥ २६ ॥

लोकालोकस्ततः शैलो योजनायुतविस्तृतः ॥ २७ ॥

और भी द्वीप हैं, जिनमें द्वीपों के अनुसार पर्वत भी हैं । इन द्वीपों में बहुत से श्रेष्ठ तालाब भी हैं । वहाँ ब्राह्मण आदि जातियाँ भगवान् विष्णु की उपासना किया करती हैं ॥११-१७ ॥ क्रौञ्चद्वीप तक के समुद्र से घिरा हुआ है और वह समुद्र भी शाकद्वीप से आवेष्टित है । भव्य के पुत्र थे- जलद, कुमार, सुकुमार, मणीचक, कुशोत्तर, मोदाकी और द्रुम । यही इस शाकद्वीप के स्वामी हैं । उन्हीं के नामों पर वहाँ के वर्षों के नाम पड़े हैं । उस द्वीप में उदय, जलधर, रैवत, श्याम, कोद्रक, आम्बिकेय तथा केशरी नामक सात पर्वत हैं और मगा, मगधमानस्या तथा मन्दगा आदि नामोंवाली सात नदियाँ हैं । वहाँ की द्विजातियाँ सूर्य की उपासना करती हैं । शाकद्वीप दूध के समुद्र से घिरा हुआ है ॥१८-२१ ॥ वह समुद्र पुष्करद्वीप से आवेष्टित है । पुष्कर द्वीप के स्वामी सवन के दो पुत्र हैं-महावीत और धातकि । उनके नामों से चिह्नित दो वर्ष हैं । वहाँ मानस नामक एक पर्वत भी है, जिसका मध्यभाग वलय ( कड़ा ) के समान है । वह हजारों योजन लम्बा और उतना ही ऊँचा है । वहाँ के निवासियों की आयु दस हजार वर्षों की होती है । वहाँ पर देवता लोग ब्रह्मा की पूजा किया करते हैं । वह द्वीप स्वादिष्ट जल के समुद्र से घिरा हुआ है । उस समुद्र का जल घटता - बढ़ता नहीं है । अये मुनिराज! जिस प्रकार शुक्लपक्ष तथा कृष्णपक्ष में चन्द्रमा के उदय और अस्त होने पर दूसरे समुद्रों का जल पचास अँगुलियों के बराबर बढ़ता - घटता रहता है, उसी प्रकार इस समुद्र का जल बढ़ता - घटता नहीं है । उस समुद्र के बाद उससे दुगुनी सोने की भूमि १ क. ङ. ' गुणामि ' । २ क. ङ. ष्करावश्यां तिथ्यां । च. ' ष्करावत्यां तिथ्यां । ३ घ. छ. ' न्यास्तीर्था वि ' । ४ ख. ग. " स्तिथ्या वि ° । ५ घ. छ. “ न हव्या ं । ६ च. ' लजश्च । ७ घ. छ. ' णीवकः । ८ क. ङ. कुसुमोत्तरः ससोदाकिर्द्रुम । ख. ग. कुसुमोत्तरः समोदाकिर्द्रुम ' । ९ क. ‘ मकेदकौ । १० ख. ग. ' कोद्दकौ । ११ घ. छ. ' दका बहुगु ' । १२ ख. ग. त्रिगुणा । २८ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 438

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अग्निपुराणम् ४३४ । भूमिः साऽण्डकटाहेन पञ्चाशत्कोटिविस्तरा ॥ २८ ॥

लोकालोकस्तु तमसाऽऽवृतोऽथाण्डकटाहतः ॥११९ ॥

इत्याग्नेये महापुराणे महाद्वीपादिवर्णनं नामैकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः अथ विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः भुवनकोशवर्णनम् अग्निरुवाच विस्तारस्तु स्मृतो ' भूमेः सहस्राणि च सप्ततिः । उच्छ्रायो दशसाहस्त्रं पातालं चैकमेककम् ॥१ ॥

अतलं वितलं चैव नितलं च गभस्तिमत् । महाग्र्यं सुतलं चाग्र्यं पातालं चापि सप्तमम् ॥२ ॥

कृष्णपीतारुणाः शुक्लशर्कराः शैलकाञ्चनाः । भूमयस्तेषु रम्येषु सन्ति दैत्यादयः सुखम् ॥३ ॥

पातालानामधश्चाऽऽस्ते शेषो विष्णुश्च तामसः । गुणानन्त्यात्स चानन्तः शिरसा धारयन्महीम् ॥४ ॥

भुवोऽधो ' नरका नैके न पतेत्तत्र वैष्णवः । रविणा भासिता पृथ्वी यावत्तावन्नभो मतम् ॥५ ॥

भूमेर्योजनलक्षं तु वशिष्ठरविमण्डलम् । रवेर्लक्षेण चन्द्रश्च लक्षान्नाक्षत्रमिन्दुतः ॥६ ॥

है, जिस पर कोई जन्तु नहीं रहता है । उसके बाद दस हजार योजन विस्तृत लोकालोक पर्वत है जो ब्रह्माण्ड तक अन्धकार से आच्छन्न है । वहाँ की पचास करोड़ योजन में विस्तृत भूमि ब्रह्माण्ड से घिरी हुई है || २२-२८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में महाद्वीप आदि का वर्णन नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त ॥११९ ॥

अध्याय १२० भुवनकोश - वर्णन अग्निदेव बोले - भूमि का विस्तार सत्तर हजार योजन और उसकी ऊँचाई दस हजार योजन मानी जाती है । उसके नीचे एक के बाद एक करके सात पाताल हैं, जिनके नाम अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान्, महाग्र्य, सुतल और अग्र्य हैं । उन पातालों की भूमि काली, पीली तथा लाल है । वहाँ के कङ्कण शुभ्र और पर्वत सुवर्णमय होते हैं । उन रमणीय भूमियों पर दैत्य लोग सुखपूर्वक निवास करते हैं । समस्त पातालों के नीचे शेषनाग के रूप में तमोगुण से युक्त भगवान् विष्णु निवास करते हैं ॥१-३३ ॥ उनमें अनन्त गुण होने के कारण ही वे अनन्त कहलाते हैं । वह अपने सिर पर पृथ्वी को धारण किये हुए हैं । पृथ्वी के नीचे अनेक नरक हैं जिनमें भगवान् विष्णु के भक्तों को गिरना नहीं पड़ता है । हे वशिष्ठ! आकाश को नभ इसलिए कहते हैं, क्योंकि वह सूर्य की किरणों से भासमान् रहा करता है । सूर्य का मण्डल पृथ्वी से एक लाख योजन की दूरी पर स्थित है । सूर्य से एक लाख योजन की दूरी पर चन्द्रमा और चन्द्रमा से भी एक लाख योजन की दूरी पर नक्षत्र - मण्डल है ॥४-६ ॥ नक्षत्र से दो लाख योजन की दूरी पर शुक्र, शुक्र से दो लाख योजन की १ क. ङ. च. श्रुतो । २ अस्य श्लोकस्यार्धभागं नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः द्विलक्षाद्भादबुधश्चाऽऽस्ते बुधाच्छुक्रो द्विलक्षतः । गुरोर्द्विलक्षतः सौरिर्लक्षात्सप्तर्षयः शनेः । ध्रुवात्कोट्या महर्लोको यत्र ते कल्पवासिनः । जनात्तपश्चाष्टकोट्या वैराजा यत्र देवताः । अपुनर्द्वारका यत्र ब्रह्मलोको हि स स्मृतः । स्वर्गलोको ध्रुवान्तस्तु नियतानि चतुर्दश । वारिवह्न्यनिलाकाशैस्ततो भूतादिना बहिः । दशोत्तराणि शेषाणि एकैकस्मान्महामुने । अनन्तस्य न तस्यान्तः संख्यानं नापि विद्यते । असंख्यातानि चाण्डानि तत्र जातानि चेदृशाम् । प्रधाने च स्थितो व्यापी ' चेतनात्माऽऽत्मवेदनः । विष्णुशक्त्या महाप्राज्ञ वृतौ संश्रयधर्मिणौ । क्षोभकारणभूतश्च सर्गकाले महामुने । ४३५ द्विलक्षेण कुजः शुक्राद्भौमाद्विलक्षतो गुरुः ॥७ ॥

लक्षाद्ध्रुवो ह्यषिभ्यस्तु त्रैलोक्य ' चोच्छ्रयेण च ॥८ ॥

जनो द्विकोटितस्तस्माद्यत्राऽऽसन्सनकादयः ॥९ ॥

षण्णवत्या तु कोटीनां तपसः सत्यलोककः ॥१० ॥

पादगम्यस्तु भूर्लोको भुवः सूर्यान्तरः स्मृतः ॥११ ॥

एतदण्डकटाहेन वृतो ब्रह्माण्डविस्तरः ॥१२ ॥

वृतं दशगुणैरण्डं भूतादिर्महता तथा ॥१३ ॥

महान्तं च समावृत्य प्रधानं समवस्थितम् ॥१४ ॥

हेतुभूतमशेषस्य प्रकृतिः सा परा मुने ॥१५ ॥

दारुण्यग्निर्यथा तैलं तिले तद्वत्पुमानिति ॥१६ ॥

प्रधानं च पुमांश्चैव सर्वभूतात्मभूतया ॥१७ ॥

तयोः सैव पृथग्भावे कारणं संश्रयस्य च ॥१८ ॥

यथा शैत्यं जले वातो बिभर्ति कणिकागतम् ॥१९ ॥

दूरी पर मंगल, मंगल से दो लाख योजन की दूरी पर बृहस्पति, बृहस्पति से दो लाख योजन की दूरी पर शनि की स्थिति है । शनि से एक लाख योजन की दूरी पर सप्तर्षि और सप्तर्षि से एक लाख योजन की दूरी पर ध्रुव अवस्थित है, जो ऊँचाई में त्रैलोक्य का स्थान ग्रहण करता है । ध्रुव से एक करोड़ योजन की दूरी पर महर्लोक स्थित है, जहाँ एक कल्प तक निवास करनेवाले प्राणी रहते हैं । महर्लोक से दो करोड़ योजन की दूरी पर जनलोक की स्थिति है, जिसमें सनक आदि निवास करते हैं । जनलोक से आठ करोड़ योजन की दूरी पर तपोलोक स्थित है, जिसमें वैराज नामक देवता निवास करते हैं । तपोलोक से छियानबे करोड़ योजन की दूरी पर सत्यलोक है ॥ ७-१० ॥ ब्रह्मलोक उसे कहते हैं, जहाँ पर लोगों की मृत्यु ही नहीं होती है । भूर्लोक एक पादगम्य है अर्थात् उसका परिमाण सम्पूर्ण सूर्यमण्डल का चतुर्थांश है । भुवर्लोक सूर्यमण्डल के अन्दर ही स्थित है । स्वर्गलोक ध्रुव की सीमा तक फैला हुआ है और उसका परिमाण एक लाख चालीस हजार योजन है । इस प्रकार ब्रह्माण्ड से सम्पूर्ण जगत् घिरा हुआ है । वह ब्रह्माण्ड अपने से दसगुने महाभूतों - जल, अग्नि, वायु और आकाश से घिरा हुआ है । अये मुनिराज! वे महाभूत, जो क्रमशः एक - दूसरे से दसगुने बड़े हैं, परस्पर एक-दूसरे से घिरे हुए हैं । अन्तिम महाभूत ( आकाश ) महत् ( तत्त्व ) से घिरा हुआ है और महत् को घेरकर प्रधान ( प्रकृति ) अवस्थित है ॥११-१४ ॥ हे मुनिराज! उस अनन्त ( आकाश ) का न अन्त है और न उसकी संख्या ही की जा सकती है । वह सबका हेतु ( कारण ) है और उसे परा प्रकृति कहते हैं । यह असंख्य ब्रह्माण्ड उसी से उत्पन्न होते रहते हैं । जैसे लकड़ी में आग और तिल में तेल व्याप्त रहता है वैसे ही प्रकृति में ( चेतनात्मा ) पुरुष व्याप्त रहता है । अये महाबुद्धिमान्! सकलभूतों के आत्मरूप विष्णु शक्ति के द्वारा आश्रम धर्मवाले प्रधान और पुरुष से आवृत हैं अर्थात् उन दोनों की एकता विष्णुशक्ति से स्थापित है । उन दोनों के मिलने तथा पृथक् होने में भी वही शक्ति कारण है । महामुने! सृष्टिकाल में ( सत्त्वादि गुणों में ) क्षोभ उत्पन्न होने का कारण भी वही शक्ति है जैसे जल - विन्दु की शीतलता को वायु १ घ. छ. “ लोक्याच्चोच्छ्र । २ च. अयुतानि । ३ क. ङ. च. ' न नैव वि । ४ क. ङ. च. ' दृशाः । दा ' । ५ ' पी तन्नामाक सुप्रवे । ६ ख. ग. नान्नाऽऽत्म ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 440

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अग्निपुराणम् ४३६ जगच्छक्तिस्तथा विष्णोः प्रधानप्रतिपादिकाम् ' । स च विष्णुः स्वयं ब्रह्म ' यतः सर्वमिदं जगत् । ईशादण्डस्तथैवास्य द्विगुणो मुनिसत्तम । योजनानां तु तस्याक्षस्तत्र चक्रं प्रतिष्ठितम् । संवत्सरमयं कृत्स्नं कालचक्रं प्रतिष्ठितम् । पञ्चान्यानि तु सार्धानि स्यन्दनस्य महामते । ह्रस्वोऽक्षस्तद्युगार्धं च धुवाधारं रथस्य वै । उदयास्तमनं ज्ञेयं दर्शनादर्शनं रवेः । स्वयमायाति तावत्तु भूमेराभूतसंप्लवम् । एतद्विष्णुपदं दिव्यं तृतीयं व्योम्नि भास्वरम् । ततो गङ्गा प्रभवति स्मरणात्पापनाशिनी । स्थितः पुच्छे ध्रुवस्तत्र भ्रमन्भ्रामयति ग्रहान् गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः ) विष्णुशक्तिं समासाद्य देवाद्याः सम्भवन्ति हि ॥२० ॥

योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव ॥ २१ ॥

सार्धकोटिस्तथा सप्त नियुतान्यधिकानि वै ॥ ॥२२ २२ ॥ ॥ त्रिनाभिमतिपञ्चारं ( १ ) षण्नोमि द्वयायनात्मकम् ॥२३ ॥

चत्वारिंशत्सहस्त्राणि द्वितीयाक्षो विवस्वतः ॥ २४ ॥

अक्षप्रमाणमुभयोः प्रमाणं तद्युगार्धयोः ॥२५ ॥

हयाश्च सप्तच्छन्दांसि गायत्र्यादीनि सुव्रत ॥ २६ ॥

यावन्मात्रप्रदेशे तु वशिष्ठावस्थितो ध्रुवः ॥ २७ ॥

ऊर्ध्वोत्तरमृषिभ्यस्तु ध्रुवो यत्र व्यवस्थितः ॥ २८ ॥

निर्धूतदोषपङ्कानां ( णां ) यतीनां स्थानमुत्तमम् ॥२९ ॥

दिवि रूपं हरेर्ज्ञेयं शिशुमाराकृति प्रभो ॥ ३० ॥

। ( स रसोऽधिष्ठितो ' देवैरादित्यैर्ऋषिभिर्वरैः १ ° ॥३१ ॥

। हिमोष्णवारिवर्षाणां कारणं भगवान्रविः ॥ ३२ ॥

धारण करती है उसी प्रकार जगत् को विष्णुशक्ति धारण किये रहती है । उसी प्रधान प्रतिपादिका विष्णुशक्ति का आश्रय लेकर देवता आदि उत्पन्न होते हैं । वे विष्णु ही स्वयं ब्रह्म हैं, जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है । अये मुनिदेव! सूर्यदेव के रथ का परिमाण नौ हजार योजन है ॥ १५-२१ ॥ अये मुनिश्रेष्ठ! उस रथ का ईशादण्ड ( हरीश ) उससे दूना है । उसकी धुरी का परिमाण एक करोड़ पचास लाख सत्तर हजार योजन है । उस रथ में एक चक्र है जिसमें तीन नाभि, पाँच अरे और छह नेमियाँ ( जिस पर हल चढ़ायी जाती है ) हैं । ( उत्तरायण और दक्षिणायन भेद से ) उसके दो मार्ग हैं । यह कालचक्र समस्त संवत्सर से युक्त है । अये महामते! विवस्वान् ( सूर्य ) के रथ की दूसरी धुरी चालीस हजार और साढ़े पाँच ( योजन ) है । उन दोनों युगों के अर्ध भाग का परिमाण भी धुरी के बराबर ही है । उस रथ की धुरी का आधार तथा छोटी धुरी का परिमाण युगार्ध के बराबर होता है ॥२२-२५३ ॥ उत्तमव्रतधारिन्! गायत्री आदि सात छन्द ही उस रथ के घोड़े हैं । सूर्य का उदय और अस्त ही उसके दिखायी देने और न दिखायी देने का कारण है । जितने प्रदेश में वसिष्ठ के साथ ध्रुव अवस्थित रहते हैं उतने प्रदेश में प्रलय होता है । सप्तर्षियों से ऊपर उत्तर की ओर जहाँ पर ध्रुव की स्थिति है, वह आकाश में तीसरा तेजोमय दिव्यलोक है । निर्दोष और निष्पाप यतियों का वही उत्तम स्थान है । वहाँ से गङ्गा निकलती हैं, जो स्मरणमात्र से ही पापों का सर्वनाश कर दिया करती हैं । वहाँ भगवान् विष्णु मगर के रूप में विद्यमान रहते हैं ॥२६-३० ॥ उस मगर की पूँछ पर स्थित होकर ध्रुव स्वयं घूमता है और अन्य ग्रहों को भी घुमाता रहता है । वहाँ देवता, आदित्य, ऋषि, गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष, नाग तथा राक्षस रथ पर आरूढ़ रहा करते हैं । सर्दी, गर्मी तथा वर्षा १ क. ख. ग. ङ. च. ‘ पादकम् । २ क. ङ. च. ब्रह्मा । ३ क. ङ. ' मिन्यक्षयार्थके । सं ० । ख. ग. ' मिध्यक्षयात्मके । सं ० । ४ क. ङ. च. ' तो बुधः । क्षय । ५ ख. ग. घ. छ. ' प्लवे । ज ' । ६ च. ' ति सर्वपापप्रणाश । ७ ख. ग. घ. छ. प्रभो । ८ स रथोऽधिष्ठितो सर्पराक्षसैः नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । ९ च. ' तो दैत्यैरा ' । १० च. ' भिर्भटैः । ग ं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA