अग्नि पुराण — पृष्ठ 421–430
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 421–430
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पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ४१७ मतङ्गेशं सुसिद्धेशं नत्वा चेदमुदीरयेत् । प्रमाणं देवताः सन्तु लोकपालाश्च साक्षिणः ॥३५ ॥
मयाऽऽगत्य मतङ्गेऽस्मिन् पितॄणां निष्कृतिः कृता । स्नानतर्पणश्राद्धादि ब्राह्मतीर्थेऽथ कूपके ॥ ३६ ॥
तत्कूपयूपयोर्मध्ये ' श्राद्धं कुलशतोद्धृतौ महाबोधितरुं नत्वा धर्मवान्स्वर्गलोकभाक् ॥ ३७ ॥
तृतीये ब्रह्मसरसि स्नानं कुर्याद्यतव्रतः । स्नानं ब्रह्मसरस्तीर्थे करोमि ब्रह्मभूतये ॥३८ ॥
पितॄणां ब्रह्मलोकाय ब्रह्मर्षिगणसेविते । तर्पणं श्राद्धकृत्पिण्डं प्रदद्यात्तु प्रसेचनम् ॥ कुर्याच्च वायपेयार्थी ब्रह्मयूपप्रदक्षिणम् ॥३९ ॥
एको मुनिः कुम्भकुशाग्रहस्त आम्रस्य मूले सलिलं ददाति ।
आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च तृप्ता एका क्रिया द्व्यर्थक प्रसिद्धा ॥४० ॥
ब्रह्माणं च नमस्कृत्य ' कुलानां शतमुद्धरेत् । फल्गुतीर्थे चतुर्थेऽह्नि स्नात्वा देवादितर्पणम् ॥४१ ॥
कृत्वा श्राद्धं सपिण्डं च गयाशिरसि कारयेत् । पञ्चक्रोशं गयाक्षेत्रं क्रोशमेकं गयाशिरः ॥ ४२ ॥
तत्र पिण्डप्रदानेन कुलानां शतमुद्धरेत् । पुण्डपृष्ठे पदं न्यस्तं महादेवेन धीमता ॥४३ ॥
मुण्डपृष्ठे शिरः साक्षाद्गयाशिर उदाहृतम् । साक्षाद्गयाशिरस्तत्र फल्गुतीर्थाश्रमं कृतम् ॥४४ ॥
अमृतं तत्र वहति पितॄणां दत्तमक्षयम् । स्नात्वा दशाश्वमेधे तु दृष्ट्वा देवं पितामहम् ॥४५ ॥
वापी में स्नान करके ही उसे श्राद्ध और पिण्डदान करना चाहिए । तदनन्तर सिद्धेश्वर मतङ्गेश को नमस्कार करते हुए यह कहना चाहिए – ' समस्त देवता प्रमाण हैं और ये लोकपाल साक्षी हैं कि मैंने इस मतङ्ग - तीर्थ में आकर पितरों का उद्धार कर दिया है । ' तत्पश्चात् ब्राह्मतीर्थ में एक छोटे - से कुएँ के समीप स्नान, तर्पण तथा श्राद्ध आदि कर्म करे । उस कुएँ तथा वहाँ पर स्थित यूप के बीच में श्राद्ध करने से ( श्राद्ध करनेवाले के ) सौ कुलों का उद्धार हो जाता है । गया में महाबोधि वृक्ष को नमस्कार करके धर्मात्मा व्यक्ति स्वर्ग का भागी बन जाता है ॥ ३४-३७ ॥ तीसरे दिन गयायात्री नियमपूर्वक ब्रह्मसर में स्नान करे और स्नान करते हुए यह ध्यान करता रहे - " मैं ब्रह्मा तथा ऋषियों से सेवित इस ब्रह्म सरोवर नामक तीर्थ में स्नान करता हूँ, जिससे मुझे ब्रह्मविभूति की प्राप्ति हो जाय, और मेरे पितरों को ब्रह्मलोक प्राप्त हो जाय । " तदनन्तर तर्पण, श्राद्ध और पिण्डदान करना चाहिए । वाजपेय यज्ञ करने के इच्छुक को ब्रह्मयूप की प्रदक्षिणा तथा उसके ऊपर जल का सिञ्चन करना चाहिए । मुनि अपने हाथ में जल से भरा हुआ घड़ा और कुश लेकर आम्र वृक्ष की जड़ में पानी डाल रहा है । इससे आम्रवृक्ष भी सींचे जा रहे हैं और पितर भी तृप्त हो रहे हैं । इसलिए यह प्रसिद्ध है कि एक कर्म दो फलों को देनेवाला भी हुआ करता है ॥३८-४० ॥ वहाँ पर भगवान् ब्रह्मा को नमस्कार करके मनुष्य सौ कुलों का उद्धार कर देता है । चौथे दिन गयायात्री फल्गुतीर्थ में स्नान तथा देवताओं आदि का तर्पण करके गयाशिर नामक स्थान में पिण्डदान के साथ श्राद्ध कर्म कराये । गयाक्षेत्र पाँच कोस तक और गयाशिर एक कोस तक ( फैला हुआ ) है । वहाँ ( गयाशिर में ) पिण्डदान करने से सौ कुलों का उद्धार हो जाता है । मुण्डपृष्ठ में बुद्धिमान् भगवान् शङ्कर ने अपना पैर रखा था और वहीं पर गयासुर का सिर भी रखा गया था । इसलिए उस स्थान को गयाशिर कहते हैं । वहीं पर फल्गुतीर्थ - आश्रम भी बना हुआ है । वहाँ अमृत ( के समान जल ) बहता रहता है, जिसमें तर्पण करने से पितरों को अक्षय जल प्राप्त होता है । तदनन्तर दशाश्वमेध में स्नान करके, भगवान् ब्रह्मा का दर्शन करके और भगवान् शङ्कर के चरणों का स्पर्श करके मनुष्य बार - बार यहाँ जन्म नहीं लिया करता हैं ॥४१-४५ ॥ १ क. ङ. च. ' पपृष्ठयो । २ क. ङ. च. ' र्याच्च सद्व्रतः । ३ क. ख. ग. घ. पुरस्कृत्य । ४ क. ङ. च. ' श्रयं कृ ' । २७ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४१८ रुद्रपादं नरः स्पृष्ट्वा नेह भूयोऽभिजायते ।
नरकस्था दिवं यान्ति स्वर्गस्था मोक्षमाप्नुयुः ।
पिण्डदानं तण्डुलैश्च गोधूमैस्तिलमिश्रितैः ॥
तथा विष्णुपदे श्राद्धपिण्डदो ह्यणमुक्तिकृत् ॥
तथा ब्रह्मपदे श्राद्धी ब्रह्मलोकं नयेत्पितॄन् । पदे चाऽऽहवनीयस्य श्राद्धी यज्ञफलं लभेत् अगस्त्यकार्तिकेयस्य ' श्राद्धी तारयते कुलम् कनकेशपदं नत्वा गया केदारकं नमेत् विशालोऽपि गयाशीर्षे पिण्डदोऽभूच्च पुत्रवान् कथं पुत्रादयः स्युर्मे द्विजा ऊचुर्विशालकम् विशालोऽपि गयाशीर्षे पितृपिण्डान्ददौ ततः के यूयं तेषु चैवैकः सितां प्रोचे विशालकम् शमीपत्रप्रमाणेन पिण्डं दत्त्वा गयाशिरे ॥४६ ॥
पायसेनाथ पिष्टेन सक्तुना चरुणा तथा ॥४७ ॥
पिण्डं दत्त्वा रुद्रपते कुलानां शतमुद्धरेत् ॥४८ ॥
पित्रादीनां शतकुलं स्वात्मानं तारयेन्नरः ॥ ॥४९ ४ ९ ॥ ॥ दक्षिणाग्निपदे तद्वद्गार्हपत्यपदे तथा ॥५० ॥
। आवसथ्यस्य चन्द्रस्य सूर्यस्य च गणस्य च ॥ ५१ ॥
। आदित्यस्य रथं नत्वा कर्णादित्यं नमेन्नरः ॥ ५२ ॥
। सर्वपापविनिर्मुक्तः पितॄन् ब्रह्मपुरं नयेत् ॥ ५३ ॥
। विशालायां विशालोऽभूद्राजपुत्रोऽब्रवीद्विजान् ॥५४ ॥
। गयायां पिण्डदानेन तव सर्वं भविष्यति ॥ ५५ ॥
। दृष्ट्वाऽऽकाशे सितं रक्तं पुरुषांस्तांश्च पृष्टवान् ॥ ५६ ॥
। अहं सितस्ते जनक इन्द्रलोकं गतः शुभात् ॥५७ ॥
गयाशिर में शमीपत्र के बराबर पिण्डदान देने से नरक में रहनेवाले पितर स्वर्ग चले जाते हैं और स्वर्ग में निवास करनेवाले पितरों को मोक्ष प्राप्त हो जाता है । खीर, पिसान, सत्तू, चरु, तण्डुल तथा तिलमिश्रित गेहूँ का पिण्ड ( बनाकर उसका ) दान करना चाहिए । भगवान् रुद्र के चरणों में इस प्रकार से बनाये गये पिण्ड का दान करने से सौ कुलों का उद्धार हो जाता है ॥४६-४८ ॥ उसी प्रकार भगवान् विष्णु के चरणों में पिण्ड अर्पित करने से ( पितृ, देव और ऋषि ऋणों से छुटकारा पाकर मनुष्य अपने पिता आदि के सौ कुलों का उद्धार तो कर ही देता है, अपना भी निस्तार कर लेता है । भगवान् ब्रह्मा के चरणों में श्राद्ध करनेवाला मनुष्य पितरों को ब्रह्मलोक पहुँचा देता है । दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि और आहवनीयाग्नि में श्राद्ध करनेवाला व्यक्ति ( सभी ) यज्ञों का फल प्राप्त कर लेता है । आवसथ्याग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, गणपति, अगस्त्य तथा कार्तिकेय के निमित्त श्राद्ध करनेवाला मनुष्य अपने कुल का उद्धार कर देता है । गयायात्री पहले सूर्य के रथ को नमस्कार करके बाद में कर्णादित्य को नमस्कार करे । तदनन्तर उसे कनकेश्वर तथा गया - केदार नामक तीर्थों का नमस्कार करना चाहिए । ऐसा करनेवाला व्यक्ति सभी पापों से छुटकारा पाकर पितरों को ब्रह्मपुर में पहुँचा देता है ॥४९ -५३ ॥ गया में पिण्डदान करने से विशाल नामक ( विदिशा के ) राजा ने भी पुत्र प्राप्त कर लिया था ( उसकी कथा इस प्रकार है ) -विशाला नामक नगरी में एक राजकुमार था- विशाल । ( एक बार ) उसने ब्राह्मणों से पूछा, ' मुझे पुत्रादि की प्राप्ति कैसे हो सकेगी? ' ब्राह्मणों ने उत्तर दिया- ' गया में पिण्डदान करने से तुम्हें सब - कुछ प्राप्त हो सकेगा ' ॥५४-५५ ॥ तदनन्तर विशाल ने गया में ( जाकर ) पिण्डदान किया । उसने आकाश में श्वेत और रक्त ( आदि ) वर्णवाले पुरुषों को देखकर उनसे प्रश्न किया कि ' तुम लोग कौन हो? ' उनमें से एक पुरुष, जो श्वेत था, विशाल से बोला - ' मैं श्वेतवर्णवाला तुम्हारा पिता हूँ । मैंने शुभ कर्मों से इन्द्रलोक को प्राप्त कर लिया है । अये पुत्र! ये १ क. ङ. च. शिला ' । २ क. ङ. च. स्वात्मनोत्तार ' । ३ ख. ग. घ. ' दे वाऽऽह ' । ४ क. ङ. च. श्राद्धं । ५ क. ङ. च. ' पदान्यच्च ग ' । ख. ग. ' पदान्यत्र ग ° । ६ क. ङ. च. गतः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः मम रक्तः पिता पुत्र ' कृष्णश्चैव पितामहः पिण्डदानाद्ब्रह्मलोकं ब्रजाम इति ते गताः प्रेतराजः स्वमुक्त्यै च वणिजं चेदमब्रवीत् श्रवणद्वादशीयोगे कुम्भः सान्नश्च सोदकः धनं गृहीत्वा मे गच्छ गयायां पिण्डदो भव प्रेतराजः सह प्रेतैर्मुक्तो नीतो हरेः पुरम् पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे तथैव च ये मे कुले लुप्तपिण्डाः पुत्रदारविवर्जिताः विरूपा आमगर्भा ये ज्ञाताज्ञाताः कुले मम ये केचित्प्रेतरूपेण तिष्ठन्ति पितरो मम पिण्डो देयस्तु सर्वेभ्यः सर्वैर्वे कुलतारकैः पञ्चमेऽह्नि गदालोले स्नायान्मत्रेण बुद्धिमान् ४१ ९ । अब्रवीन्नरकं प्राप्तास्त्वया मुक्तीकृता वयम् ॥५८ ॥
। विशालः प्राप्तपुत्रादी राज्यं कृत्वा हरिं ययौ ॥५९ ॥
। प्रेतैः सर्वैः सहाऽऽर्तः सन्सुकृतं भुज्यते फलम् ॥६० ॥
। दत्तः पुरा स मध्याह्ने जीवनायोपतिष्ठते ॥६१ ॥
। वणिग्धनं गृहीत्वा तु गयायां पिण्डदोऽभवत् ॥६२ ॥
। गयाशीर्षे पिण्डदानादात्मानं स्वपितॄंस्तथा ॥६३ ॥
। गुरुश्वशुरबन्धूनां ये चान्ये बान्धवा मृताः ॥६४ ॥
। क्रियालोपगता ये च जात्यन्धाः पङ्गवस्तथा ॥६५ ॥
। तेषां पिण्डो मया दत्तो ह्यक्षय्यमुपतिष्ठताम् ॥६६ ॥
। ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा ॥६७ ॥
। आत्मनस्तु तथा देयो ह्यक्षयं लोकमिच्छता ॥६८ ॥
। गदाप्रक्षालने तीर्थे गदालोलेऽतिपावने ॥६९ ॥
रक्तवर्णवाले मेरे पितामह हैं । हम सब नरक में पड़े हुए थे । तुमने हम लोगों का उद्धार कर दिया है । तुम्हारे पिण्डदान से हम लोग ब्रह्मलोक को जा रहे हैं ' - इतना कहकर वे लोग चले गये । महाराज विशाल ने पुत्र आदि को प्राप्त करके राज्य का भोग करते हुए ( अन्त में ) विष्णु ( धाम ) को प्राप्त कर लिया ॥ ५६-५९ ॥ एक समय प्रेतराज ने अपनी मुक्ति के लिए एक वणिक् से कहा- ' मैं दुःखी होकर सभी प्रेतों के साथ अपना कर्मफल भोग रहा हूँ । पूर्वकाल में मैंने श्रवणद्वादशी योग में अन्न और जल से भरा हुआ एक घड़ा दान दिया था । वही मध्याह्न में मेरी जीविका का साधन बन जाता है । तुम मेरा धन लेकर गया में जाकर पिण्डदान कर दो । ' बनिये ने धन लेकर गया में जाकर पिण्डदान कर दिया । इससे वह प्रेतराज मुक्त होकर समस्त प्रेतों के साथ वैकुण्ठ चला गया । इसलिए जो व्यक्ति गया में पिण्डदान करता है, वह अपने पितरों को तथा स्वयं अपने - आपको मुक्त कर देता है ॥६०-६३ ॥ ( गया में पिण्डदान करते समय यह ध्यान करते रहना चाहिए ) ' मेरा दिया हुआ महापिण्ड उन लोगों को अक्षय रूप से प्राप्त होता रहे जो मेरे पितृ तथा मातृकुल में मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, जो मेरे श्वशुर, बन्धु तथा बन्धु - बान्धव मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, स्त्री - पुत्र से हीन होने के कारण मेरे कुल के जो लोग पिण्डों के अधिकारी नहीं रह गये हैं, जो ( यज्ञादि ) क्रियाओं से भ्रष्ट हो चुके हैं तथा जो पितृगण जन्मान्ध, पंगु, विरूप, गर्भभ्रष्ट, ज्ञात तथा अज्ञात रूप से मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं । प्रेतयोनि में रहनेवाले मेरे पितृगण भी मेरे पिण्डदान से सदा तृप्त होते रहें । कुल का उद्धार करनेवाले ( अपने ) सभी ( पितरों ) को पिण्डदान देना चाहिए । जो अक्षय लोक की कामना करते हों उन्हें स्वयं अपने लिये ( जीवनकाल में ही ) पिण्डदान करना चाहिए ॥६४-६८ ॥ पाँचवें दिन गयायात्री गदालोल नामक तीर्थ में इस मन्त्र को पढ़ते हुए स्नान करे - ‘ अये जनार्दन! सांसारिक ताप की शान्ति के लिए मैं अत्यन्त पवित्र उस गदालोल नामक तीर्थ में स्नान करता १ क. ङ. च. ' त्र हृष्टश्चै ' । २ ख. ग. ' हः । अवीचिनं ' र ' । ३ क. ङ. च. प्राप्तौ त्वया । ४ ख. ग. मुक्ताः कृ । १ क. ङ. च. मोदः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४२०
संसारगदशान्त्यै जनार्दन । नमोऽक्षयवटायैव ' अक्षय्यस्वर्गदायिने ॥ ७० ॥
स्नानं करोमि सर्वपापक्षयाय च । श्राद्धं वटतले कुर्याद्ब्राह्मणानां च भोजनम् ॥७१ ॥
पित्रादीनामक्षयाय विप्रे कोटिर्भवति भोजिता । किं पुनर्बहुभिर्भुक्तैः पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥७२ ॥
एकस्मिन्भोजिते पितरस्तेन पुत्रिणः । वटं वटेश्वरं नत्वा पूजयेत्प्रपितामहम् ॥७३ ॥
गयायामन्नदाता यः शतमुद्धरेत् । क्रमातोऽक्रमतो वाऽपि गयायात्रा महाफला ॥७४ ॥
अक्षयांल्लभते लोकान्कुलानां इत्यादिमहापुराण आग्नेये गयायात्राविधिवर्णनं नाम पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥
अथ षोडशाधिकशततमोऽध्यायः गयायाञाविधिः अग्निरुवाच गायत्र्यैव महानद्यां स्नातः सन्ध्यां समाचरेत् । गायत्र्यां ' अग्रतः प्रातः श्राद्धं पिण्डमथाक्षयम् ॥ १ ॥
मध्याह्ने चोद्यदि ' स्नात्वा गीतवाद्यैर्द्युपाश्य च । सावित्रीं पुरतः सन्ध्यां पिण्डदानं च तत्तटे ॥२ ॥
हूँ जहाँ गदा धोयी गयी थी । उस अक्षयवट को नमस्कार है जो अक्षय स्वर्ग देनेवाला है । वही पितरों को अक्षय ( लोक प्रदान ) करनेवाला और पापों का सर्वनाश करनेवाला है । ' तत्पश्चात् वट वृक्ष के नीचे श्राद्ध करके ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए ॥६९ -७१ ॥ वहाँ एक ब्राह्मण को भोजन कराने से करोड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल प्राप्त होता है । यदि वहाँ एक ब्राह्मण को भोजन कराने से पितरों को अक्षय लोक की प्राप्ति हो जाती है तो ( अन्यत्र ) बहुत - से ब्राह्मणों को भोजन कराने की आवश्यकता ही क्या? वही पिता पुत्रवान् है जिसका पुत्र गया में अन्नदान किया करता है । गया में वट तथा वटेश्वर लिङ्ग को नमस्कार और भगवान् ब्रह्मा की पूजा करनेवाला ( स्वयं तो ) अक्षय लोक में चला ही जाता है, अपने सौ कुलों का उद्धार भी कर देता है । गया - यात्रा चाहे विधानपूर्वक की जाय या बिना विधान के ही हो, बड़े - बड़े फलों को देनेवाली हुआ करती है ॥७२-७४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में गयायात्रा विधि वर्णन नामक एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥११५ ॥
अध्याय ११६ गया - यात्रा - विधि अग्निदेव बोले - गायत्री - मन्त्र से महानदी में स्नान करके सन्ध्या - वन्दन करना चाहिए । प्रात: काल गायत्री-मन्त्र से ही आगे की ओर श्राद्ध तथा पिण्डदान करना चाहिए । दोपहर के समय स्नान करके महानदी के तट पर सन्ध्योपासन के बाद गीतवाद्यों के साथ सावित्री मन्त्र से अर्चना करके पूर्व की ओर पिण्डदान करना चाहिए । फिर १ क. ङ च. ' व सर्वपापक्षयाय च । पि । २ घ. ' क्षयस्व ' । ३ क. ङ. च. प्रातः । ४ क. ङ. च. " त्र्यामुग्रः । ५ क. ङ. च. वेद्यति । ६ क. ङ. च. ' द्यैर्ह्ययास्य । ७ क. ङ. च. " वित्रीप्लवतः । घ. छ. " वित्रीपु " । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ४२१ अगस्त्यस्य पदे कुर्याद्योनिद्वारं प्रविश्य च । निर्गतो न पुनर्योनिं प्रविशेन्मुच्यते भवात् ॥३ ॥
बलिं काकशिलायां च कुमारं च नमेत्ततः 1 । स्वर्गद्वार्यां सोमकुण्डे वायुतीर्थेऽथ पिण्डदः ॥४ ॥
भवेदाकाशगङ्गायां कपिलायां च पिण्डदः । कपिलेशशिवं नत्वा रुक्मिकुण्डे ' च पिण्डदः ॥५ ॥
कोटितीर्थे च कोटीशं नत्वाऽमोघपदे नरः । गदालोले वानरके गोप्रचारे च पिण्डदः ॥६ ॥
नत्वा गावं ' ( गां वै ) वैतरण्यामेकविंशकुलोद्धृतिः । श्राद्धपिण्डप्रदाता स्यात्क्रौञ्चपादे च पिण्डदः ॥७ ॥
तृतीयायां विशालायां निश्चिरायां च पिण्डदः । ऋणमोक्षे पापमोक्षे भस्मकुण्डेऽथ भस्मना ॥ ८ ॥
स्नानकृन्मुच्यते पापान्नमेद्देवं जनार्दनम् । एष पिण्डो मया दत्तस्तव हस्ते जनार्दन ॥९ ॥
परलोकगते ' मह्यमक्षय्यमुपतिष्ठताम् । गयायां पितृरूपेण स्वयमेव जनार्दनः ॥ १० ॥
तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं मुच्यते वै ऋणत्रयात् । मार्कण्डेयेश्वरं नत्वा नमेद्गृध्रेश्वरं नरः ॥ ११ ॥
मूलक्षेत्रे महेशस्य धारायां पिण्डदो भवेत् । गृध्रकूटे गृध्रवटे धौतपादे च पिण्डदः ॥१२ ॥
पुष्करिण्यां कर्दमाले ' रामतीर्थे च पिण्डदः । प्रभासेशं नमेत्प्रेतशिलायां पिण्डदो भवेत् ॥ १३ ॥
दिव्यान्तरिक्षभूमिष्ठाः पितरो बान्धवादयः । प्रेतादिरूपा मुक्ताः स्युः पिण्डैर्दत्तैर्मयाऽखिलाः ॥१४ ॥
( महामुनि ) अगस्त्य के चरणों में पिण्डदान करके योनिद्वार ( नामक स्नान - स्थान ) में प्रवेश करके निकल जाना चाहिए । ऐसा करने से गर्भ में पुन: नहीं जाना पड़ता है और संसार से मुक्ति मिल जाती है ॥१-३ ॥ तदनन्तर काकशिला में बलि चढ़ाकर कुमार ( कार्तिकेय ) को नमस्कार करना चाहिए । तत्पश्चात् स्वर्गद्वार, सोमकुण्ड तथा वायुतीर्थ में पिण्डदान करके आकाशगंगा और कपिला में पिण्डदान करना चाहिए । उसके बाद कपिलेश शिव को नमस्कार करके रुक्मिकुण्ड में पिण्डदान करना चाहिए । इसके बाद कोटितीर्थ में कोटीश को नमस्कार कर अमोघपद, गदालोल, वानरक तथा गोप्रचार तीर्थों में पिण्ड देना चाहिए । तदनन्तर गौ को प्रणाम करके वैतरणी में श्राद्ध और पिण्डदान करने से इक्कीस कुलों का उद्धार हो जाता है ॥४-६ ॥ तत्पश्चात् क्रौञ्चपाद, तृतीया, विशाला, निश्चरा, ऋणमोक्ष तथा पापमोक्ष तीर्थों में पिण्डदान करना चाहिए । भस्मकुण्ड तीर्थ में भस्म से स्नान करने पर मनुष्य पापों से छुटकारा पा जाता है । उसके बाद जनार्दन ( भगवान् विष्णु ) को यह कहते हुए प्रणाम करना चाहिए- " हे जनार्दन! यह पिण्ड मैं आपके हाथ में दे रहा हूँ । परलोक ज़ाने पर यही पिण्ड मुझे अक्षय रूप से प्राप्त हो जाय । ” गया में स्वयं जनार्दन ( भगवान् विष्णु ) ही पितृरूप में निवास करते हैं । उन पुण्डरीकाक्ष के दर्शन करने से मनुष्य तीन ( पितृ, ऋषि और देव ) ऋणों से मुक्त हो जाता है । तदनन्तर मार्कण्डेयेश्वर तथा गृध्रेश्वर को नमस्कार करना चाहिए ॥७-११ । महेश के मूलक्षेत्र में और धाराक्षेत्र में पिण्डदान करना चाहिए । उसके बाद गृध्रकूट, गृध्रवट, धौतपाद, पुष्करिणी, कर्दमाल और रामतीर्थ में पिण्डदान करना चाहिए । तत्पश्चात् प्रभासेश को नमस्कार करके प्रेतशिला में पिण्डदान करते हुए यह कहना चाहिए - ' जो मेरे पितृगण तथा बान्धव प्रेतरूप में आकाश, अन्तरिक्ष तथा भूमि पर निवास करते हैं वे सभी मेरे दिये हुए पिण्डों को पाकर मुक्त हो जायँगे ' ॥१२-१४ ॥ प्रेतशिला, १ क. ङ. च. रुक्मदण्डे । २ ङ. च. ' ले च न ' । ३ ख. गावो । ४ क. ङ. च. ' यां ग्रीवायां च स पि ° । ५ परलोकगते " जनार्दनः नास्ति क. ङ. च. ग्रन्थेषु । ६ क. ङ. च. नामतीर्थे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४२२ अग्निपुराणम् स्थानत्रये प्रेतशिला गयाशिरसि पावनी । वसिष्ठेशं नमस्कृत्य तदग्रे पिण्डदो भवेत् । गदाधराग्रतो मुण्डपृष्ठे देव्याश्च संनिधौ । पूजयित्वा भयं न स्याद्विषरोगादिनाशनम् सुभद्रां बलभद्रं च प्रपूज्य पुरुषोत्तमम् ) हृषीकेशं नमस्कृत्य तदग्रे पिण्डदो भवेत् महालक्ष्मीं प्रार्च्य गौरीं ' मङ्गलां ' च सरस्वतीम् द्वादशादित्यमभ्यर्च्य वह्नि रेवन्तमिन्द्रकम् प्रपूज्य कार्तिकेयं च निर्विघ्नः सिद्धिमाप्नुयात् सिद्धेश्वरं च रुद्रेशं रामेशं ब्रह्मकेश्वरम् नारायणं वराहं च नारसिंहं नमेच्छ्रिये प्रभासे प्रेतकुण्डे च पिण्डदस्तारयेत्कुलम् ॥१५ ॥
( ' गयानाभौ सुषुम्नायां महाकोष्ठ्यां च पिण्डदः ॥१६ ॥
मुण्डपृष्ठं नमेदादौ क्षेत्रपालादिसंयुतम् ॥१७ ॥
। ब्रह्माणं च नमस्कृत्य ब्रह्मलोकं नयेत्कुलम् । १८ ॥ । सर्वकामसमायुक्तः कुलमुद्धृत्य नाकभाक् ॥१९ ॥
। ' माधवं पूजयित्वा च देवो वैमानिको भवेत् ॥ २० ॥
। पितृनुद्धृत्य स्वर्गस्थो भुक्तभोगोऽत्र शास्त्रधीः ॥२१ ॥
। रोगादिमुक्त: ' स्वर्गी स्याच्छ्रीकपर्दिविनायकम् ॥२२ ॥
। सोमनाथं च कालेशं केदारं प्रपितामहम् ॥२३ ॥
। अष्टलिङ्गानि गुह्यानि पूजयित्वा तु सर्वभाक् ॥२४ ॥
। ब्रह्मविष्णुमहेशाख्यं " त्रिपुरघ्नमशेषदम् ॥ २५ ॥
सीतारामं च गरुडं वामनं सम्प्रपूज्य च । सर्वकामानवाप्नोति ब्रह्मलोकं नयेत्पितॄन् ॥ २६ ॥
गयाशिर तथा प्रभासस्थित प्रेतकुण्ड - इन तीनों स्थानों में पिण्डदान करनेवाला अपने कुल का उद्धार कर देता है ॥१५ ॥
तदनन्तर वसिष्ठेश को नमस्कार करके उनके सामने पिण्डदान करना चाहिए । बाद में गयानाभि, सुषुम्ना, महाकोष्ठी तथा गदाधर के सामने और मुण्डपृष्ठ में देवी के निकट पिण्डदान करना चाहिए । पहले क्षेत्रपाल आदि के साथ मुण्डपृष्ठ को नमस्कार और उनकी पूजा कर लेनी चाहिए । इससे विष, रोग आदि का नाश और अभय की प्राप्ति होती है । भगवान् ब्रह्मा को नमस्कार करने से पितरों को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है । सुभद्रा तथा पुरुषोत्तम ( भगवान् विष्णु ) की पूजा करने से मनुष्य अपने कुल का उद्धार करके सम्पूर्ण कामनाओं को पूराकर स्वर्गलोक का अधिकारी बन जाता है ॥१६-१९ ॥ तत्पश्चात् भगवान् हृषीकेश को नमस्कार करके उनके आगे पिण्डदान करना चाहिए । ( यहाँ ) माधव ( भगवान् कृष्ण ) की पूजा करने से मनुष्य विमान विहारी बन जाता है । तदनन्तर महालक्ष्मी, गौरी, मङ्गला तथा सरस्वती का पूजन करने से मनुष्य पितरों का उद्धार करके स्वर्ग प्राप्त कर लेता है और वहाँ का भोग, भोग चुकने के बाद इस लोक में ( आकर ) शास्त्रों में प्रबुद्ध हो जाता है । उसके बाद द्वादशादित्य, अग्नि, रेवन्त तथा इन्द्र की पूजा करने से मनुष्य रोग आदि से मुक्त होकर स्वर्ग को चला जाता है । भगवान् श्री कपर्दिविनायक तथा कार्तिकेय की पूजा करने से मनुष्य निर्विघ्न रूप से सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥२०- २२३ ॥ सोमनाथ, कालेश, केदार, प्रपितामह, सिद्धेश्वर, रुद्रेश, रामेश तथा ब्रह्मकेश्वर नामक आठ गुह्य - लिङ्गों की पूजा करने से मनुष्य सब - कुछ प्राप्त कर लेता है ॥२३-२४ ॥ उसके बाद श्रीप्राप्ति के लिए ( भगवान् ) नारायण, वराह तथा नृसिंहदेव को नमस्कार करना चाहिए । ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सर्वदायक त्रिपुरघ्न, सीता, राम, गरुड़ तथा वामन की सम्यक्रूप से पूजा करने से मनुष्य की सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और वह अपने पितरों को ब्रह्मलोक में ले जाता है ॥२५-२६ ॥ सभी देवताओं १ गयानाभौ पुरुषोत्तमम् क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । २ क. ङ. च. लोकभाक् । ३ हृषीकेशं पिण्डदो भवेत् नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । ४ क, ङ. च. साधनं । ५ ङ. ' रीं देवीं च मुकुलां तथा । पि । ६ क. ङ. च. मुकुलां । ७ क. ङ. च. ' मिन्दुकं । ८ रोगादि मुक्तः विनायकम् नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । ९ क. ङ. च. नरसिंहं । १० क. ङ. च. ' ख्यं त्रैपुरुषमथौषधम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ४२३ देवैः सार्धं सम्प्रपूज्य देवमादिगदाधरम् । देवरूपा शिला पुण्या ' तस्माद्देवमयी शिला । यन्नाम्ना पातयेत्पिण्डं तं नयेद्ब्रह्म शाश्वतम् ' । मतङ्गस्य पदे श्राद्धी भरताश्रमके भवेत् । तत्र स्यादग्निधारायां ' मधुश्रवसि पिण्डदः । पिण्डदो धेनुकारण्ये पदे धेनोर्नमेच्च गाम् । सन्ध्यामुपास्य सायाह्ने नमेद्देवीं सरस्वतीम् । गयां प्रदक्षिणीकृत्य गयाविप्रान्प्रपूज्य च । स्तुत्वा सम्प्रार्थयेदेवमादिदेवं गदाधरम् । धर्मार्थकाममोक्षार्थं योगदं प्रणमाम्यहम् । ' नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसत्यं ' ब्रह्म नमाम्यहम् ।
देवदेवीवृन्दयुक्तं सर्वदा प्रणमाम्यहम् ।
ऋणत्रयविनिर्मुक्तस्तारयेत्सकलं कुलम् ॥२७ ॥
गयायां न हि तत्स्थानं यत्र तीर्थं न विद्यते ॥ २८ ॥
फल्ग्वीशं फल्गुचण्डीं च प्रणम्याङ्गारकेश्वरम् ॥२९ ॥
हंसतीर्थे कोटितीर्थे यत्र पाण्डुशिलानदः ॥३० ॥
इन्द्रेशं किलिकिलेशं नमेवृद्धिविनायकम् । ३१ ॥
सर्वान्पितॄंस्तारयेच्च सरस्वत्यां च पिण्डदः ॥३२ ॥
त्रिसन्ध्याकृद्भवेद्विप्रो वेदवेदाङ्गपारगः ॥३३ ॥
अन्नदानादिकं सर्वं कृतं तन्नाक्षयं भवेत् ॥३४ ॥
गदाधरं गयावासं पित्रादीनां गतिप्रदम् ॥ ३५ ॥
देहेन्द्रियमनोबुद्धिप्राणाहंकारवर्जितम् ° ॥३६ ॥
आनन्दमद्वयं देवं देवदानववन्दितम् ॥३७ ॥
कलिकल्मषकालार्तिदमनं वनमालिनम् ॥३८ ॥
तथा भगवान् आदि गदाधरदेव की पूजा करने से मनुष्य ( पितृ, देव, ऋषि ) तीनों प्रकार के ऋणों से मुक्त होकर सम्पूर्ण कुल का उद्धार कर देता है । गया स्थित देवमयी शिला देवताओं से युक्त होने के कारण अत्यन्त पवित्र है । गया में तो ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ ( कोई - न - कोई ) तीर्थ न हो ॥२७-२८ ॥ वहाँ पर जिसके नाम से पिण्ड दिया जाता है, उसे शाश्वत ब्रह्मा के समीप पहुँचा दिया जाता है । उसके बाद फल्ग्वीश, पल्गुचण्डी तथा अङ्गारकेश्वर को प्रणाम कर मतङ्ग पद में श्राद्ध करना चाहिए । तदनन्तर भरताश्रम, हंसतीर्थ, कोटितीर्थ, पाण्डुशिलानद, अग्निधारा तथा मधुश्रव में पिण्डदान करना चाहिए । तत्पश्चात् इन्द्रेश, किलिकिलेश तथा बुद्धिविनायक को नमस्कार कर धेनुकारण्य में पिण्डदान और धेनुपद में गौ को प्रणाम करना चाहिए । सरस्वती तीर्थ में पिण्डदान करनेवाला सभी पितरों का उद्धार कर लेता है । वहाँ सन्ध्योपासन करके सायंकाल सरस्वती देवी को नमस्कार करना चाहिए । यहाँ पर त्रिकाल सन्ध्यावन्दन करनेवाला ब्राह्मण वेद, वेदाङ्ग में पारङ्गत हो जाता है ॥२९ -३३ ॥ अन्त में गया की प्रदक्षिणा करके और गया में रहनेवाले ब्राह्मणों की पूजा करके जो कुछ भी अन्नदान किया जाता है, अक्षय ( फलवाला ) हो आदिदेव गदाधर की स्तुति करते हुए इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए कि ' मैं धर्म, अर्थ, काम जाता है । तदनन्तर के लिए गया में निवास करनेवाले और पितरों को ( सद् ) गति प्रदान करनेवाले योगीश्वर भगवान् और मोक्ष की प्राप्ति हूँ । मैं उस ब्रह्मा को ( भी ) नमस्कार करता हूँ जो देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और गदाधरदेव को प्रणाम करता , शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और सत्यस्वरूप है । मैं उस ब्रह्म को नमस्कार करता हूँ जो आनन्द रूप, अहंकार से रहित, नित्य अद्वैत, देव - दानवों से वन्दित और देवताओं तथा देवियों से युक्त है । मैं उस ब्रह्म ( स्वरूप ) भगवान् विष्णु को नमस्कार कर रहा हूँ जो कलिकाल के पापों को शान्त करनेवाले, काल की पीड़ा का दमन करनेवाले, वनमाला को धारण १ क. ङ. च. तस्यां देव ' । २ क. च. ' म् । कर्णीशं कर्णचण्डीं । ३ ख. ग. घ. छ. ' लान्नादः । ४ क. ङ. च. मध्ये ५ घ. छ. रुद्रेशं । ६ क. ङ. च. ' येद्देव ' । ७ क. ङ. च. ' द्धिमनोहं " । ८ घ. छ. ' शुद्धं बुद्धियुक्त ' स ' । ९ ख. ग. ' बुद्धिमु ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४२४ अग्निपुराणम् पालिताखिललोकेशं कुलोद्धरणमानसम् । ' व्यक्ताव्यक्तविभक्तात्माविभक्तात्मानमात्मनि ॥३९ ॥
` स्थितं स्थिरतरं सारं वन्दे घोराघमर्दनम् । आगतोऽस्मि गयां देव पितृकार्ये गदाधर ॥ ४० ॥
त्वं मे साक्षी भवाद्येह अनृणोऽहमृणत्रयात् । साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्मेशानादयस्तथा ॥४१ ॥
मया गयां समासाद्य पितॄणां निष्कृतिः कृता । गयामाहात्म्यपठनाच्छ्राद्धादौ ब्रह्मलोकभाक् ॥४२ पितॄणामक्षयं श्राद्धमक्षयं ब्रह्मलोकदम् ॥४३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये गयायात्राविधिकथनं नाम षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११६ ॥
अथ सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः श्राद्धकल्पः अग्निरुवाच कात्यायनो मुनीनाह यथा श्राद्धं तथा वदे । गयादौ श्राद्धं कुर्वीत संक्रान्त्यादौ विशेषतः || १ || काले चापरपक्षे च चतुर्थ्यामूर्ध्वमेव वा । सम्पाद्य च पदर्थे च पूर्वेद्युश्च निमन्त्रयेत् || २ || करनेवाले, सम्पूर्ण लोकों का पालन करनेवाले और ( पिण्डदान करनेवालों के ) कुल के उद्धार में दत्तचित्त है । मैं उस ब्रह्मा को नमस्कार करता हूँ, जो व्यक्त और अव्यक्त,, विभक्तात्मा और अविभक्तात्मा, आत्मा में स्थित, स्थिततर, साररूप तथा घोर पापों का विनाश करनेवाला है ॥ ३४-३९ ३ ॥ भगवान् गदाधर! मैं पितृकर्म करने के लिए गया आया हूँ । आप मेरे साक्षी हैं, आज से मैं यहाँ तीनों प्रकार के ( देव, ऋषि, पितृ ) ऋणों से उऋण हो गया हूँ । ब्रह्मा, महेश, अनादि ( विष्णु ) आदि देवता मेरे साक्षी हों; मैंने गया में आकर पितरों का उद्धार कर दिया है । श्राद्ध के आदि में ‘ गयामाहात्म्य ' पाठ करने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है और ( गया में किया हुआ श्राद्ध ) अविनश्वर ब्रह्मलोक को प्रदान करनेवाला होता है ॥४०-४३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में गयायात्राविधि - वर्णन नामक एक सौ सोलहवाँ अध्याय समाप्त ॥११६ ॥
अध्याय ११७ श्राद्धकल्प अग्निदेव बोले - जिस प्रकार कात्यायन ने मुनियों को श्राद्ध के सम्बन्ध में बतलाया था, उसी प्रकार मैं आप लोगों से बतलाता हूँ । गया आदि में वैसे तो श्राद्ध करना ही चाहिए, किन्तु सङ्क्रान्ति आदि में उसे विशेष रूप से करना चाहिए । शुक्लपक्ष की चतुर्थी या पंचमी तिथि की रोहिणी नक्षत्र में श्राद्ध करना चाहिए । श्राद्ध से पहले दिन यतियों, १ अस्य श्लोकस्यार्धभागं नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । २ क. ङ. च. स्थिरं । ३ ख. ग. घ. छ. ° ले वाऽप ' । ४ क. ङ. च. संपद्ये च यदाज्ञा च । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ४२५ यतीन्गृहस्थसाधून्वा स्नातकाञ्श्रोत्रियान्द्विजान् । अनवद्यान्कर्मनिष्ठाञ्शिष्टानाचारसंयुतान् ॥३ ॥
वर्जयेच्छ्वित्रिकुष्ठा ( ष्ठ्या ) दीन्न गृह्णीयान्निमन्त्रितान् । ' स्नाताञ्शुचींस्तथाऽऽचान्तान्प्राङ्मुखान्देवकर्मणि ॥४ ॥
उपवेशयेत्त्रीन्पित्र्यानेकैकमुभयत्र ' वा । तदह्नि ब्रह्मचारी स्यादकोपो ऽत्वरितो मृदुः । सर्वांश्च पंक्तिमूर्धन्यान्पृच्छेत्प्रश्ने तथाऽऽसने विश्वान्देवानावाहयिष्ये पृच्छेदावाहयेति च । विश्वेदेवाः शृणुतेमं पितॄनावाहयिष्येति । तिलान्विकीर्याथ जपेदापस्त्वित्यादि ' पात्रके ।
यवोऽसीति यवान्दत्वा पित्रे सर्वत्र वै तिलान् ।
एवं मातामहादेश्च शाकैरपि च कारयेत् ॥५ ॥
सत्योऽप्रमत्तोऽनध्वन्यो ह्यस्वाध्यायश्च वाग्यतः ॥६ ॥
। दर्भानास्तीर्य द्विगुणान्पित्र्ये दैवादिकं चरेत् ॥७ ॥
विश्वे देवास आवाह्य विकीर्याथ यवाञ्जपेत् ॥८ ॥
पृच्छेदावाहयेत्युक्त उशन्तस्त्वा समाह्वयेत् ॥९ ॥
सपवित्रे ' निषिञ्चेद्वा शं नो ' देवीरिति ' तृ ( ह्य ) चा ॥१० ॥
तिलोऽसि सोमदेवत्यो गोसवे " देवनिर्मितः ॥११ ॥
प्रत्नवद्भिः प्रत्तः स्वधया पितृ ( निमा ) ल्लोकान्प्रीणया हि नः स्वधेति ।
श्रीश्चतेति ददेत्पुष्पं पात्रे हैमेऽथ राजते ॥१२ ॥
औदुम्बरे वा खड्गे वा पूर्णपात्रे प्रदक्षिणम् । देवानामपसव्यं तु पितॄणां सव्यमाचरेत् ॥ ( " एकैकस्य एकैकेन सपवित्रकरेषु च ॥१३ ॥
गृहस्थों, साधुओं, स्नातकों, अनिन्द्य कर्म करनेवालों, कर्मनिष्ठों, शिष्यों तथा आचारवान् श्रोत्रिय ब्राह्मणों को निमन्त्रित करना चाहिए ॥१-३ ॥ श्वेत तथा अन्य प्रकार के कुष्ठरोग के रोगियों को तथा ऐसे लोगों को जो कहीं निमन्त्रित हो चुके हैं, छोड़ देना चाहिए । देवकर्म में स्नान तथा आचमन से पवित्र ब्राह्मणों को पूर्वाभिमुख करके बिठाना चाहिए । पितृकर्म में तीन ब्राह्मणों को या दोनों कर्मों में एक - एक ब्राह्मण को ही निमन्त्रित करना चाहिए । मातामह आदि के श्राद्ध के लिए कुछ न हो तो शाक आदि से ही उसे सम्पन्न कर देना चाहिए ॥ ४-५ ॥ श्राद्ध के दिन श्राद्ध करनेवाले को क्रोध, शीघ्रता, असावधानी, यात्रा तथा स्वाध्याय नहीं करना चाहिए, अपितु उसे वाक्संयमी, मृदु, सत्यभाषी तथा ब्रह्मचारी रहना चाहिए । पंक्तिपावन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को कुशासन पर बैठाकर उनका कुशलक्षेम पूछना चाहिए । पितरों के लिए ब्राह्मणों से दूने कुशासनों को बिछाना चाहिए । देवकर्म से श्राद्ध प्रारम्भ करना चाहिए । श्राद्ध करनेवाला- “ मैं सभी देवताओं का आवाहन करूँगा ” इस प्रकार ( पुरोहित से ) पूछे और उसके द्वारा ' बुलाइये ' इस प्रकार अनुमति प्राप्त करके सभी देवताओं का आवाहन करना चाहिए । इस समय यव को भी बिखेरना चाहिए ॥६-८ ॥ ' विश्वेदेवाः शृणुतेमं बहिर्षि मादयध्वम् ' इस मन्त्र का जप करे । तत्पश्चात् पितृकर्म में नियुक्त ब्राह्मणों से पूछे– “ मैं पितरों का आवाहन करूँगा । ' ब्राह्मण कहें - ‘ आवाहन करो । ' तब ‘ उशन्तस्त्वा ० ' इस मन्त्र का पाठ करते हुए आवाहन करे । फिर ‘ अपहता असुरा ० ' इस मन्त्र से तिल बिखेरकर ' आयान्तु नः ' इत्यादि मन्त्र का जप करे । इसके बाद पवित्रक सहित अर्घ्यपात्र में ' शं नो देवी ० ' इस मन्त्र से जल डाले ।९ -१० ॥ उसके बाद ' यवोऽसि ० ' इस मन्त्र से सभी देवताओं को यव प्रदान करे । पितरों को ' तिलोऽसि सोमदेवत्यो ० ' इस मन्त्र का पाठ करते हुए सर्वत्र तिल ही दान करना चाहिए । ‘ श्रीश्चते ० ' इस मन्त्र से सोने या चाँदी के पात्र में फूलों को चढ़ाना चाहिए ॥११-१२ ॥ तदनन्तर गूलर की लकड़ी के पात्र में या तलवार में या पत्तों के बने हुए दोने में पितरों का ध्यान करके उस पात्र की प्रदक्षिणा करनी चाहिए । देवकर्म में १ ख. ग. घ. छ. “ स्तथा दान्ता । २ क. ङ. च. ' न्पित्र्य एकै । घ. छ. ' न्पित्र्यादीने । ३ क. ङ. च. ॰यिष्यति । ४ घ. छ. ` ष्ये च । पृ ° । ५ ख. ग. ' दाहन्वित्या ' । घ. छ. ' दायान्त्वित्यादि पित्र ' । ६ क. ङ. च. समयेऽथ नि । ७ घ. छ. ' वीरभितृ " । ८ क. ॰तिद्वृचा । ९ क. ङ. च. “ सि पितृ दे ' । १० क. ङ. च. गोसवो । ११ एकैकस्य संस्त्रवान्प्रथमे चरेत् नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४२६
या दिव्या आपः पयसा संबभूवुर्या अन्तरिक्षा ( क्ष्या ) उत पार्थिवीर्याः ।
हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता न आपः ' शँ स्योना भवन्तु ॥१४ ॥
विश्वेदेवा एव वोऽर्घः स्वाहा च पितरेष ते 1 । स्वधैवं पितामहादेः संस्त्रवान्प्रथमे चरेत् ॥ १५ ॥
पितृभ्यः स्थानमसीति न्युब्जं पात्रं करोत्यधः । अत्र ' गन्धपुष्पधूपदीपाच्छादनदानकम् ॥१६ ॥
घृताक्तमन्नमुद्धृत्य पृच्छत्यग्नौ करिष्येति । कुरुष्वेत्यभ्यनुज्ञातौ जुहुयात्साग्निकोऽनले ॥१७ ॥
अनग्निकः पितृहस्ते सपवित्रे तु मन्त्रतः । अग्नये कव्यवाहनाथ स्वाहेति प्रथमाऽऽहुतिः ॥ १८ ॥
सोमाय पितृमतेऽथ यमायाङ्गिरसेऽपरे । हुतशेषं चान्नं पात्रे दत्त्वा पात्रे समालभेत् ॥१९ ॥
पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्यमुखेऽमृतेऽमृतंजुहोमि स्वाहेति ।
जप्त्वेदं विष्णुरित्यन्ने द्विजाङ्गुष्ठं निवेशयेत् ॥२० ॥
अपहतेति तिलान्विकीर्यानं प्रदापयेत् । जुषध्वमिति चोक्त्वाऽथ गायत्र्यादि ततो जपेत् ॥ २१ ॥
देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥ २२ ॥
" तृप्ताञ्ज्ञात्वाऽन्नं ' विकिरेदपो दद्यात्सकृत्सकृत् । गायत्रीं पूर्ववज्जप्त्वा मधु ' वातेति वै जपेत् ॥ २३ ॥
तृप्ताः स्थ इति सम्पृच्छेत्तृप्ताः स्म इति वै वदेत् । शेषमन्नमनुज्ञाप्य सर्वमन्नमथैकतः ॥२४ ॥
यज्ञोपवीत को दाहिने कन्धे पर रखना चाहिए । तत्पश्चात् पवित्री पहने हुए हाथ पर एक - एक पात्र ( दोना ) में जल रखकर ‘ या दिव्या आपः ० ' मन्त्र से सभी देवताओं को अर्घ्य प्रदान करे । ( इसी मन्त्र में ) ' पितरेष ते स्वधा ' जोड़कर पितरों को भी अर्घ्य देना चाहिए ॥१३-१५ ॥ उसके बाद ' पितृभ्यः स्थानमसि ० ' कहकर पात्र को टेढ़ा करके नीचे रख देना चाहिए । तदनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा वस्त्र का दान करना चाहिए । तत्पश्चात् घृत मिश्रित अन्न उठाकर पुरोहित से पूछना चाहिए - ' क्या मैं इससे हवन करूँ? ' पुरोहित के द्वारा ' करो ' इस अनुज्ञा को प्राप्त कर लेने पर यदि श्राद्धकर्त्ता साग्निक ( अग्नित्री ) हो तो उसे हवन करना चाहिए । यदि निरग्नि ( अनग्निहोत्री ) हो तो पितर के पवित्रीयुक्त हाथ में अर्थात् ( पितृपात्र में ) मन्त्रपूर्वक उस ( घृतमिश्रित अन्न को ) छोड़ देना चाहिए । ' अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा ' इस मन्त्र से पहली आहुति देनी चाहिए ॥१६-१८ ॥ ' सोमाय पितृमते स्वाहा ' इससे दूसरी आहुति और ' यमाय अङ्गिरसे स्वाहा ' इससे तीसरी आहुति देनी चाहिए । हवन से अवशिष्ट अन्न को पात्र में रखकर उसका स्पर्श करना चाहिए । तदनन्तर ‘ पृथिवी ते पात्रं ० ’ मन्त्र पढ़कर ‘ इदं विष्णुः ० ' कहते हुए अन्न के ऊपर ब्राह्मण का अँगूठा रखवाना चाहिए । फिर ' अपहता ० ' इस मन्त्र से तिल बिखेरकर अन्न दिलवाना चाहिए । तत्पश्चात् ' जुषध्वम् ' कहकर गायत्री आदि का जप करना चाहिए ॥१९ -२१ ॥ उसके बाद ‘ देवताभ्यः ० ’ मन्त्र का पाठ करना चाहिए । पितरों को तृप्त समझकर अन्न बिखेरते हुए बारी - बारी से ( सबको ) जल प्रदान करना चाहिए । फिर पूर्ववत् गायत्री का जप करके ' मधुवाता ० ' इत्यादि मन्त्र का जप करना चाहिए और पूछना चाहिए - ‘ आप तृप्त तो हो गये हैं? ' और स्वयं यह उत्तर भी देना चाहिए - ' हाँ, हम तृप्त हो गये हैं । ' तत्पश्चात् शेष अन्न १ घ. छ. ' पः शिवाः संश्योना सुहवा भ ' । २ क. ङ. च. अन्नं ग ' । ३ क. ङ. च. ' शेषमथो ह्यन्नं कर्ता सर्वं स ' । ४ घ. छ. ' त्रं द्यौः पि ’ । ५ छ. ' मः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्तु ते । तृ ' । ६ ख. ग. ' त्वाऽथविकिरे दर्भे द ' । ७ घ. ङ. च. ' नं प्रकि ' । ८ ख. ग. घ. छ. ' धुमध्विति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA