अग्नि पुराण — पृष्ठ 451–460
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 451–460
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द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ' हन्याल्लिप्ता गतागामिपिण्डसंख्याफलान्तरैः द्वितीयोच्चरिते वर्गे वैपरीत्यमिति स्थितिः रविकर्मविपरीता तिथिनाडी समायुता सषष्टिकं प्रदेयं तत्षट्याधिक्ये च तत्त्यजेत् तिथिस्त्रिभागं संयुक्ता ऋणेन च तथान्विता रविचन्द्रौ समौ कृत्वा योगो भवति निश्चलः तिथिश्च द्विगुणैकोना कृताङ्गैः करणं निशि प्रथमे तिथ्यर्धतो हि किंस्तुघ्नं प्रतिपन्मुखे इत्यादिमहापुराण आग्नेये कालगणनं ४४७ । षष्ट्याऽऽप्तं प्रथमोच्चार्ये हानौ देयं धने धनम् ॥१८ ॥
। तिथिर्द्विगुणिता कार्या षड्भागपरिवर्जिताः ॥१९ ॥
। ऋणे शुद्धे तु नाड्यः स्युर्ऋणं शुध्येत नो यदा ॥२० ॥
। नक्षत्रं तिथिमिश्रं स्याच्चतुर्भिर्गुणितः तिथिः ॥२१ ॥
। ' तिथिरत्र ' चिता कार्या ' तद्वेदाद्योगशोधनम् ॥२२ ॥
। एकोना तिथिर्द्विगुणा सप्तभिन्नाकृतिर्द्विधा ' ॥२३ ॥
। कृष्णचतुर्दश्यन्ते शकुनिः पर्वणीह चतुष्पदम् ॥ ॥२४ ॥
नाम द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
पहले गत तथा ऐष्य खण्डाओं के अन्तर से कला को गुणा करके तदनन्तर उसे साठ ( ६० ) से भाग देना चाहिए । और भजनफल को प्रथमोच्चार में ऋण फल रहने पर धन और धनफल रहने पर भी धन ही करना चाहिए किन्तु द्वितीयोच्चारित में इससे विपरीत क्रिया करनी चाहिए । पहले तिथि को दुगुना करके योगफल से घटा देना चाहिए ॥१८-१९ ॥ सूर्यसंस्कार के विपरीत तिथिदण्ड को मिलाना चाहिए । ऋणफल को घटाने पर स्पष्ट रूप से तिथि का दण्ड इत्यादि मान होता है । यदि ऋणफल न घटे तो उसमें साठ ( ६० ) का योग कर देना चाहिए । यदि फल ही साठ से अधिक हो तो उसमें साठ घटाकर शेष का संस्कार करना चाहिए । इससे तिथि के साथ - साथ नक्षत्र का भी मान निकल आयेगा । उसके बाद चौगुनी तिथि में तिथि का त्रिभाग मिलाकर उसमें ऋणफल निकाल देना चाहिए । २०-२१३ ॥ तिथि का मान तो स्पष्ट ही है । सूर्य और चन्द्रमा को योग करके भी योग का मान निकल आता है । तिथि की संख्या से एक घटाकर उससे दूना करके फिर गुणनफल से एक घटाने पर चर इत्यादि करण बन जाते हैं । कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के उत्तरार्ध से शकुनि, चतुष्पद, किंस्तुघ्न और नाग नामक स्थिर करण बनते हैं । इस प्रकार शुक्लपक्ष की प्रतिपदा में किंस्तुघ्न करण होता है ॥२२-२४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में कालगणना नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय समाप्त ॥१२२ ॥
१ घ. च. छ. ' प्ता मता । २ ख. ग. ' ष्ट्र्यात्सप्रथमोच्चार्य हा । ३ क. ' थमे द्वार्ये ( हार्ये ) हा ० । ४ क. वहेपैप । ५ च. ' ता । पारिक ' । ६ क. ङ. ' थिवद्रजिता । ख. ' थिवगुटिता । ६ ग. ' रत्रोचि । ७ क. ङ. ' र्या भवेदा । ८ ख. तच्छेदा ' । ९ क. ङ. च. ' प्तच्छिन्ना ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४४८ अथ त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः युद्धजयार्णवीयनानायोगाभिधानम् अग्निरुवाच वक्ष्ये जयशुभाद्यर्थं सारं युद्धजयार्णवे । अ इ उ ए ओ स्वराः स्युः क्रमान्नन्दादिका तिथिः || १ || कादिहान्ता भौमरवी ज्ञसोमौ गुरुभार्गवौ । शनिर्दक्षिणनाड्यां तु भौमार्कशनयः " परे ॥ २ ॥
रवार्णवः खरसैर्गुण्यो रुद्रैर्भागं समाहरेत् । रसाहतं तु तत्कृत्वा पूर्वभागेन ( ण ) भाजयेत् ॥३ ॥
वह्निभिश्चाऽऽहतं कृत्वा रूपं तत्रैव निक्षिपेत् । स्पन्दनं नाड्याः पलानि सप्रमाणस्पन्दनं पुनः ॥४ ॥
अनेनैव तु मानेन उदयन्ति दिने दिने । स्फुरणैस्त्रिभिरुच्छ्वास उच्छ्वासैस्तु पलं स्मृतम् ॥५ ॥
षष्टिभिश्च पलैर्लिप्ता लिप्ताषष्टिस्त्वहर्निशम् । पञ्चमार्धोदये बालकुमारयुववृद्धकाः ॥६ ॥
' मृत्युर्येनोदयस्तेन ' चास्तमेकादशांशकैः । कुलागमे भवेद्भङ्गः समृत्युः पञ्चमोऽपि वा । | ७ || अध्याय १२३ वृद्धजयार्णव आदि अनेक योगाभिधान - वर्णन अग्निदेव बोले - अब मैं स्वरोदय चक्र का वर्णन करूँगा, जिसकी सहायता से युद्ध में विजय और शुभ आदि का ज्ञान किया जा सकता है । अलग - अलग कोष्ठकों में अ, इ, उ, ए, ओ - स्वरों को लिखकर नीचे क्रमश: नन्दा ( प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी ) आदि तिथियाँ लिखनी चाहिए ॥१ ॥ फिर क से ह तक व्यञ्जनवर्णों को लिखकर उनके नीचे मङ्गल,
रवि, बुध, सोम, गुरु, शुक्र तथा शनि लिखना चाहिए । किन्तु शनि, मङ्गल तथा सूर्य को चक्र के दाहिनी ओर रखना चाहिए । चालीस को साठ से गुणा करके ग्यारह से भाग दे, लब्धि छह से गुणा करके पुनः ग्यारह से भाग दे, लब्धि को तीन से गुणा करके एक जोड़ दे तो उतने ही बार नाड़ी का स्फुरण पल होता है । इसी प्रकार नाड़ी का स्फुरण होता रहता है । तीन स्फुरणों से उच्छ्वास होता है, छह उच्छ्वासों के पल कहे जाते हैं । साठ पलों से लिप्त दण्ड और साठ दण्डों से रात - दिन होते हैं । अ, इ आदि पाँचों स्वरों की क्रम से बाल, कुमार, युवा, वृद्ध एवं मृत्यु संज्ञाएँ होती हैं । एक स्वर के उदय के बाद दूसरे स्वर का उदय पाँचवें स्वर पर होता है, जो स्वर उदय काल में रहता है, वही स्वर अस्त काल में भी रहता है । उदय और अस्त काल एकादशांश के तुल्य होता है, जब मृत्यु स्वर का उदय हो तो उस समय युद्ध - यात्रा करने से मृत्यु होती है । तीन स्फुरण का एक उच्छ्वास होता है, छह उच्छ्वास का एक पल होता है, साठ पल का दण्ड ( घटी ) होता है । साठ ( ६० ) दण्ड का एक अहोरात्र होता है । अर्धयाम बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत्युसंज्ञक होते हैं । जिनका उदय होता है उसी का अस्त होता है । स्वरों का मान एकादशांश के तुल्य होता है, कुल आगम में यात्रा करने से पराजित होना पड़ता है और मृत्यु स्वर के उदय में युद्ध करने पर मृत्यु के साथ पराजय होती १ क. ङ. ए तु स्व ' । ख. ग. ए ओ मो ' स्व ' । च. ए उ उ स्व । २ क. ङ. दि तास्ता भौ ' । ३ ख ' भास्करौ । श । ४ क. ङ. ' र्कमनयोः प ' । ५ क. च. रे ' । खतुरः षरसौम्येन रु ' । ६ क. ङ. ' त् । जप ॐ र । ख. ग. त् । जयद ओन र ' । ७ क. सायनं तु । ८ च. ' दयास्ते । ९ क. ङ. ' स्तेषां वास्तुमे ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ४४ ९ स्वरोदयचक्रम् शनिचक्रे चार्धमासं ग्रहाणामुदयः क्रमात् । त्रिभागैः पञ्चदशभिः शनिभागस्तु मृत्युदः ॥८ ॥
शनिचक्रम् दशकोटिसहस्राणि ' अर्बुदं न्यर्बुदं हरेत ' । त्रयोदश च लक्षाणि प्रमाणं कूर्मरूपिणः मघादौ कृत्तिकाद्यन्तस्तद्देशान्तः शनिस्थितौ ॥ ॥९ ॥
कूर्मचक्रम् राचहुचक्रे च सप्तोर्ध्वमधः सप्त च संलिखेत् । वाय्वग्न्योश्चैव नैर्ऋत्ये पूर्णिमाऽऽग्नेय भागतः ॥१० अमावस्यां वायवे च राहुर्वैतिथिरूपकः । रकारं दक्षभागे तु हकारं वायवे लिखेत् ॥११ ॥ ॥
प्रतिपदादौ ककारादीन्सकारं नैर्ऋते पुनः 1 । राहोर्मुखे तु भङ्गः स्यादिति ' राहुरुदाहृतः ॥१२ ॥
विष्टिरग्नौ पौर्णमास्यां करालीन्द्र तृतीयकम् । चतुर्दश्यां तु वायव्ये चतुर्थ्यां वरुणाश्रये । रौद्रश्चैव तथा श्वेतो मैत्रः सारभटस्तथा । रावणो १० विजयश्चैव नन्दी वरुण एव च । रौद्रे रौद्राणि कुर्वीत श्वेते स्नानादिकं चरेत् । है ॥२-७ ॥ शनिचक्र में ग्रहों का उदय क्रमशः पन्द्रह मृत्युदायक कहा जाता है || ८ || कूर्मरूप का प्रमाण है घोरा याम्यां तु सप्तम्यां दशम्यां रौद्रसौम्यगा ॥१३ ॥
शुक्लाष्टम्यां दक्षिणे च एकादश्यां भृशं त्यजेत् ॥१४ ॥
सावित्रो विरोचनश्च जयदेवोऽभिजित्तथा ॥१५ ॥
यमसौम्यौ भवश्चान्ते दश पञ्च मुहूर्तकाः ॥ १६ ॥
मैत्रे कन्याविवाहादि शुभं सारभटे चरेत् ॥१७ ॥
भागों में विभक्त होकर आधे मास होता है । इनमें शनि का भाग दस करोड़, हजार, अरब, खरब और तेरह लाख । मघा नक्षत्र के आदि चरण से कृत्तिका नक्षत्र तक, उस देश में शनि की स्थिति होती है । मघा से कृत्तिका तक शनिक्षेत्र है ॥९ ॥
राहुचक्र के लिए सात खड़ी रेखा एवं सात पड़ी रेखा बनानी चाहिए । उसमें वायुकोण से नैर्ऋत्य को लिये हुए अग्निकोण तक शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक की तिथियों को लिखना चाहिए एवं अग्निकोण से ईशान को लिये हुए वायुकोण तक कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक की तिथियों को लिखना चाहिए । इस तरह तिथिरूप राहु का न्यास होता है । रकार को दक्षिण दिशा में लिखे और ' ह ' कार को वायुकोण में लिखे । प्रतिपदादि तिथियों के सहारे ' क ' कारादि अक्षरों को भी लिखे । नैर्ऋत्यकोण में ' सकार ' लिखे । इस तरह राहुचक्र तैयार हो जाता है । राहु-मुख में यात्रा करने से यात्रा - भङ्ग होता है ॥१०-१२ । अग्निकोण में ' विष्टि ' नाम की तथा पौर्णमासी की पूर्व दिशा में ' कराली ' नाम की तृतीया, दक्षिण दिशा में ' घोरा ' नाम की सप्तमी तथा दशमी, ईशानकोण में दशमी को, वायव्यकोण में चतुर्दशी को, पश्चिम दिशा में चतुर्थी को और दक्षिण दिशा में शुक्लपक्ष की अष्टमी तथा एकादशी को ( भद्रा ) रहती है । इसका प्रत्येक शुभ कार्यों में सर्वथा त्याग करना चाहिए ॥१३-१४ ॥ रौद्र, श्वेत, मैत्र, सारभट, सावित्र, विरोचन, जयदेव, अभिजित्, रावण, विजय, नन्दी, वरुण, यम, सौम्य, भव ये पन्द्रह मुहूर्त लिखना चाहिए । मैत्र में कन्या - विवाह आदि कार्य और सारभट में ( साधारण ) शुभ कार्य करना चाहिए ॥१५-१७ ॥ सावित्र में स्थापनादि कार्य और विरोचन १ ख. ग. घ. छ. ' र्बुदान्य ' । २ च. क्रमात् । ३ ख. ग. छ. ' दशे च । ४ क. पकारं । ख. ग. दकारं । च. एकारं । ५ क. स्यात्तिथीनां तु उदा । ६ ख. ग. छ. ' राणीन्द्रे । ७ क. ङ. च. ' यकाः । घो । ८ च. श्रवणात्रये । ९ च. सरितो । १० ङ. च. वारुणो । ३ ९ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४५० सावित्रे स्थापनाद्यं वा विरोचने नृपक्रिया । जयदेवे जयं कुर्याद्रावणे ' रणकर्म च ॥। १८ ॥
विजये कृषिवाणिज्यं पटबन्धं च नन्दिनि । वरुणे च तडागादि नाशकर्म यमे चरेत् ॥१९ ॥
सौम्ये सौम्यादि कुर्वीत भवेल्लग्नमहर्दिवा । योगा नाम्नाऽविरुद्धाः स्युर्योगा नाम्नैव शोभनाः ॥ २० ॥
राहुरिन्द्रात्समीरं च वायोर्दक्षं यमाच्छिवम् । शिवादाप्यं जलादग्निरग्नेः सौम्यं ततस्त्रयम् ॥ २१ ॥
ततश्च संक्रमं हन्ति चतस्रो घटिका भ्रमन् ॥२२ ॥
राहुचक्रम् चण्डीन्द्राणी ' वाराही च मुशली गिरिकर्णिका । बला चातिबला क्षीरी मल्लिकाजातियूथिकाः || २३ || यथालाभं धारयेत्ताः श्वेतार्कश्च शतावरी । गुडूची वागुरी दिव्या ओषध्यो धारिता जये ॥ २४ ॥
ॐ नमो भैरवाय " खड्गपरशुहस्ताय ॐ ६ ह्रूं विघ्नविनाशाय ॐ ह्रूं फट् ॥२५ ॥
अनेनैव तु मन्त्रेण शिखाबन्धादिकृज्जये ' । ' तिलकं चाञ्जनं चैव धूपलेपनमेव च ॥ २६ ॥
स्नानपानानि तैलानि योगधूलिमतः शृणु । सुभगा मनःशिला तालं लाक्षारससमन्वितम् ॥२७ ॥
तरुणीक्षीर संयुक्तो ललाटे तिलको वशे । विष्णुक्रान्ता च सर्पाक्षी सहदेवी " च रोचना ॥ २८ ॥
अजादुग्धेन " संपिष्टं तिलको वश्यकारकः । प्रियंगुकुङ्कुमं कुष्ठं मोहनी तगरं घृतम् ॥२९ ॥
में राजकार्य करना चाहिए । जयदेव में विजय सम्बन्धी कार्य और रावण में युद्धकार्य करना चाहिए ॥१८ ॥ विजय में
खेती - व्यापार, नन्दी में वस्त्र - गृह - निर्माण, वरुण में तालाब आदि खोदने का कार्य, यम में नाशकार्य और सौम्य में सौम्यकार्य करना चाहिए । क्योंकि इन मुहूर्तों में लग्न रात - दिन रहता है । योग नाम से अविरुद्ध होते हैं और नाम से ही वे सुन्दर होते हैं ॥१९ -२० ॥ राहु इन्द्रदिशा से वायुदिशा में, वायुदिशा से यमदिशा में, यमदिशा से शिवदिशा में, शिवदिशा से जलदिशा में, जलदिशा से अग्निदिशा में, अग्निदिशा से सौम्यदिशा में तीन - तीन दिशा करके चार घटिकाओं का भ्रमण करके सङ्क्रम का नाश करता है ॥२१-२२ ॥ चण्डी, इन्द्राणी, वाराही ( बिलाई कन्द ), मुशली, गिरिकर्णिका ( विष्णुक्रान्ता ), बला ( बलिआरा ), अतिबला, क्षीरी, मल्लिका, यूथिका, जाती, श्वेत अर्क, शतावरी, गुडूची, वागुरी-इन दिव्य ओषधियों को धारण करके संग्राम में जाने से विजय प्राप्त होती है ॥२३-२४ ॥ “ ॐ नमो भैरवाय खड्गपरशुहस्ताय ”, “ ॐ हूं विघ्नविनाशाय ॐ हूं फट् ” इस मन्त्र से शिखा बाँधकर संग्राम करे तो विजय प्राप्त होती है । अब तिलक, अञ्जन, धूपलेपन, स्नान - पान, तेल और योगधूलि का विवरण सुनो ॥२५-२६३ ॥ सुभगा ( नीलदूर्वा ), मनःशिला, कैवर्ती, मोथा तथा हरिताल को लाक्षारस और युवती स्त्री के दूध के साथ पीसकर ललाट पर तिलक लगाने से वशीकरण होता है । विष्णुक्रान्ता, सर्पाक्षी ( महिषकन्द ), सहदेवी तथा गोरोचन को बकरी के दूध के साथ पीसकर तैयार किया हुआ तिलक वशीकरण करनेवाला होता है ॥२७-२८३ ॥ प्रियंगु, कुङ्कुम, कुष्ठ ( कूट ), मोहनी, तगर तथा घी से तैयार किये हुए १ च. ' र्याद्वारणे । २ च. वाराही । ३ च. क्षीरा । ४ ख. च. जपेत् । ५ घ. छ. खण्डप ' । ६ क. ङ. च. हूं । ७ क. ङ. च. हूं । ८ क. ङ. च. ज्जपेत् । ति । ९ क ° कं वा जलं चै । १० क. ‘ गवृत्तिम ' । ११ क. ङ. च. महादेवी । घ. छ. सहदेव । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ४५१ तिलको वश्यकृच्चैव रोचना रक्तचन्दनम् । निशा मनःशिला तालं प्रियंगुः सर्षपास्तथा ॥३० ॥
मोहनी हरिता कान्ता सहदेवी शिखा तथा । मातुलुङ्गरसैः ' पिष्टं ललाटे तिलको वशे ॥ ३१ ॥
सेन्द्राः सुरा वशं यान्ति किं पुनः क्षुद्रमानुषाः । मञ्जिष्ठा चन्दनं रक्तं कटुकन्दा विलासिनी ॥ ३२ ॥
पुनर्नवासमायुक्तो लेपोऽयं भास्करो वशे । चन्दनं नागपुष्पं च मञ्जिष्ठा तगरं वचा ॥३३ ॥
लोध्रं प्रियंगुरजनी मांसीतैलं वशंकरम् ॥३४ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये युद्धजयार्णवीयनानायोगाभिधानं नाम त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१२३ ॥
अथ चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः युद्धजयार्णवीयज्योतिःशास्त्रसारः अग्निरुवाच ज्योतिःशास्त्रादिसारं च वक्ष्ये युद्धजयार्णवे । वेलामन्त्रौषधाद्यं च यथोमामीश्रोऽब्रवीत् ” ॥१ ॥
देव्युवाच देवैर्जिता दानवाश्च येनोपायेन तद्वद । शुभाशुभविवेकाद्यं " ज्ञानं युद्धजयार्णवम् ॥२ ॥
तिलक में वशीकरण की शक्ति रहती है । गोरोचन, रक्तचन्दन, निशा ( हरिद्रा ), मनःशिला, हरिताल, प्रियंगु, सरसों, मोहनी, हरिता, कान्ता, सहदेवी और शिखा को विजौरा नींबू के रस में पीसकर ललाट पर तिलक लगाने से इन्द्र आदि देवता भी वशीभूत हो जाते हैं, छुद्र मनुष्यों का तो कहना ही क्या? ॥२९ - ३१३ ॥ मजीठ, रक्तचन्दन, कटुकन्दा, विलासिनी और पुनर्नवा को पीसकर लेप करने से सूर्य भी वश में होते हैं । चन्दन, नागपुष्प, मजीठ, तगर, बच, लोध, प्रियंगु, रजनी तथा जटामासी का तेल, वशीकरण के लिए उपयुक्त होता है ॥ ३२-३४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में युद्धजयार्णवीय नामक अनेक योगों का अभिधान - वर्णन नामक एक सौ तेईसवाँ अध्याय समाप्त ॥१२३ ॥
अध्याय १२४ युद्धजयार्णवीय ज्योतिःशास्त्र अग्निदेव बोले - अब मैं तुमसे युद्धजयोत्सव सम्बन्धी ज्योतिःशास्त्र का -तत्त्व, समय, मन्त्र तथा ओषधि का विवरण बताऊँगा, जैसा कि शिव ने पार्वती से बताया था ॥१ ॥
देवी बोलीं - जिस उपाय से देवताओं ने दानवों पर विजय प्राप्त की थी वह उपाय तथा शुभाशुभ का विवेक उत्पन्न करनेवाली युद्धजयार्णवीय विद्या मुझे बताइये ॥२ ॥
१ क. ङ. च. अजलिङ्गरसैः पि । २ ख. ग. च. पिण्ड ' । ३ घ. छ. ' वे । बिना म । ४ क. ङ. च. ' त् । उमोवा ’ । ५ क. ङ. च. ज्ञानयुद्धं ज ' । ६ ख. ग. ' नं सुदुर्जयं तु वै । ई । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४५२ ईश्वर उवाच मूलदेवेच्छया जाता शक्तिः पञ्चदशाक्षरा । मन्त्रपीठं प्रवक्ष्यामि पञ्चमन्त्रसमुद्भवम् । ऋग्यजुः सामाथर्वाख्यवेदमन्त्राः क्रमेण ते । ईशः सप्तशिखा देवाः शब्दाद्याः पञ्च च स्वराः । काष्ठमध्ये यथा वह्निरप्रवृद्धो न दृश्यते । आदौ शक्तिः समुत्पन्ना ओंकारस्वरभूषिता । जातो नाद उकारस्तु नदते हृदि संस्थितः । अकारोऽव्यक्त उत्पन्नो भोगमोक्षप्रदः परः । गन्धो न बीजः प्राणाख्य इडा शक्तिः स्थिरा स्मृता क्रूरा'शक्तिरीबीजः स्याद्धरबीजोऽग्निरूपवान् ए शान्तिर्वार्युपस्पर्शो यश्चोदानश्चला क्रिया चराचरं ततो जातं यामाराध्याखिलार्थवित् ॥३ ॥
ते मन्त्राः सर्वमन्त्राणां जीविते मरणे स्थिताः ॥४ ॥
सद्योजातादयो मन्त्रा ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रकः ॥५ ॥
अ इ उ ए ओं ' कलाश्च मूलं ब्रह्मेतिकीर्तितम् ॥६ ॥
विद्यमाना तथा देहे शिवशक्ति दृश्यते ॥ ७ ॥
ततो विन्दुर्महादेवि एकारेण व्यवस्थितः ॥८ ॥
अर्धचन्द्र इकारस्तु मोक्षमार्गस्य बोधकः ॥ ९ ॥
अकार ऐश्वरे भूमिर्निवृत्तिश्च कला स्मृता ॥ १० ॥
। इकारश्च प्रतिष्ठाख्यो रसोयानश्च पिङ्गला ' ॥ ११ ॥
। विद्यासमाना गान्धारी शक्तिश्च " दहनी स्मृता ॥ १२ ॥
। ओंकारः शान्त्यतीताख्यः १२ खशब्दयूथपालिनः ३ ॥१३ ॥
ईश्वर बोले - आदि देव ( ब्रह्मा ) की इच्छा से पन्द्रह अक्षरोंवाली एक शक्ति उत्पन्न हुई, जिससे चराचर जगत् की सृष्टि हुई और जिसकी आराधना कर मैं सर्वज्ञ हुआ हूँ । मैं तुमको मन्त्रपीठ का विवरण दे रहा हूँ, जिसकी उत्पत्ति पाँच मन्त्रों से हुई है और वे मन्त्र क्रमशः ऋक्, यजुष्, साम तथा अथर्व नाम के वेद मन्त्र हैं । सद्योजात आदि मन्त्र, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश, सप्तशिखा, देव शब्द आदि पञ्चतन्मात्राएँ अ, इ, उ, ए, ओं - स्वर और कलाएँ इन सबका मूल ब्रह्म है ॥३-६ ॥ जैसे लकड़ी के भीतर स्थित सूक्ष्म अग्नि बिना जले दृष्टिगोचर नहीं होती है, वैसे ही देह में विद्यमान शिवशक्ति दिखायी नहीं पड़ती है || ७ || अयि, महादेवि! पहले ॐकार शब्द से भूषित शक्ति उत्पन्न हुई फिर एकार से युक्त विन्दु की उत्पत्ति हुई || ८ || तत्पश्चात् नाद से उकार उत्पन्न हुआ, जो हृदय में स्थित होकर शब्द करता है । तदनन्तर अर्धचन्द्राकार इकार की उत्पत्ति हुई, जो मोक्षमार्ग का बोधक है ॥९ ॥ तदनन्तर भोग - मोक्ष - दायक
अव्यक्त अकार उत्पन्न हुआ । वह अकार ब्रह्म का ऐश्वर्य और निवृत्ति कला है || १० || गन्ध रूप में अकार की इडा शक्ति स्थिर शक्ति है । वह अकार प्राणस्वर बीजमन्त्र है । इकार की संज्ञा प्रतिष्ठा है । वह क्रूर शक्ति पिङ्गला तथा अपान वायु का आश्रय है, रस रूप में उसका बीजमन्त्र इकार है ॥११ ॥ शिव का बीजमन्त्र अग्निस्वरूप है । इसकी
शक्तियों के नाम विद्या, समाना, गान्धारी तथा दहनी हैं । एकार को शान्ति जल का आचमन और यकार को उदान वायु तथा चलन क्रिया समझना चाहिए । ओंकार ब्रह्म का स्वरूप शान्ति अतीत नामक है ।१२-१३ ॥ जिन स्वरवर्ण १ क. ङ. ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । ई । २ घ. छ. शक्राद्याः । ३ घ. छ. ओ । ४ क. ङ. हिंदुग्धमध्ये यथावृतम् । वि । ५ क. ङ. शिवे भक्ति ' । ६ ख. " न्धो वीचज: प्रा ' । ७ क. ङ. रम्येपालश्च । घ. छ. शक्तोऽथ बी ।८ ख. ' ला । कुर्याच्छत्तिर्हि बी " । ९ क. ङ. शक्तोऽथ बी । १० क. ङ. स्वाधर । ११ क. ङ. शक्तीश्वरमही स्मृ ' । १२ क. ख. ङ. ' ख्यः स्वंश ' । ग, " ख्यः सश " । १३ घ. छ. ' पाणिनः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ४५३ ' पञ्च वर्गाः ' स्वरा ' जातः कुजज्ञगुरुभार्गवाः एतन्मूलमतः सर्वं ज्ञायते सचराचरम् उमा सोमः स्वयं शक्तिर्वामा ज्येष्ठा च रौद्र्यपि रत्नानाडीत्रयं चैव स्थूला सूक्ष्मः परोऽपरः प्लाव्यमानं यथाऽऽत्मानं चिन्तयेत्तं दिवानिशंम् अंगुष्ठादौ न्यसेदङ्गान्नेत्रमध्येऽथ " देहके शून्यो निरालयः शब्दः " स्पर्शस्तिर्यङ्नतं? स्पृशेत् सर्वस्थानविनिर्मुक्तो'३ गन्धो मध्ये च मूलकम् शक्तिव्यूहेन सोमोऽर्को हरिस्तत्र व्यवस्थितः कालानलसमाकारं प्रस्फुरन्तं शिवात्मकम् । शनिः क्रमादकाराद्याः ककाराद्यास्त्वधः स्थिताः ॥१४ ॥
। विद्यापीठं प्रवक्ष्यामि प्रणवः ' शिव ईरितः ॥१५ ॥
। ब्रह्मा विष्णुः क्रमाद्रुद्रो ' । चिन्तयेच्छ्वेतवर्णं तं । अजरत्वं भवेद्देवि । मृत्युञ्जयं ततः प्रार्च्य । रूपस्योर्ध्वगतिः प्रोक्ता । नाभिमूले स्थितं कन्दं " । दशवायुसमोपेतं । तज्जीवं जीवलोकस्य गुणाः सर्गादयस्त्रयः ॥१६ ॥
मुञ्चमानं परामृतम् ॥१७ ॥
' शिवत्वमुपगच्छति ' ॥१८ ॥
रणादौ विजयी भवेत् ॥१९ ॥
जलस्याधः समाश्रिता ॥२० ॥
शिवरूपं तु मण्डितम् ॥२१ ॥
पञ्चतन्मात्रमण्डितम् ॥२२ ॥
स्थावरस्य चरस्य च ॥ तस्मिन्नष्टे मृतं मन्ये मन्त्रपीठेऽनिलात्मकम् ॥२३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये युद्धजयार्णवीयज्योतिःशास्त्रसारवर्णनं नाम चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥
के स्वामी पाँच श्रेणियों में विभक्त हैं जो क्रमशः मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि के लाक्षणिक रूप हैं । ककार आदि वर्ण अधोवर्ती हैं । यह शब्द ब्रह्म सबका मूल है । इसी से सम्पूर्ण चराचर जगत् का ज्ञान होता है ॥१४-१४३ ॥ अब मैं विद्यापीठ का वर्णन करूँगा । शिव द्वारा प्रतिपादित प्रणव में उमा, सोम, शक्ति, वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, तीनों गुण सत्त्व, रज और तम तीनों प्रमुख नाड़ियाँ इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना और स्थूल, सूक्ष्म, पर तथा अपर रूप विद्यमान है ॥१५-१६३ ॥ अयि देवि! प्रणव का ध्यान इस प्रकार करना चाहिए कि उसका वर्ण श्वेत है, उससे अमृत टपक रहा है और उस अमृत में मैं बह रहा हूँ । दिन - रात ऐसा ध्यान करने से मनुष्य अजर होकर शिवत्व को प्राप्त कर लेता है ॥१७-१८ ॥ नेत्र के भीतर मृत्युञ्जय ( शिव ) का ध्यान करके अङ्गुष्ठ आदि में अङ्गन्यास करने से मनुष्य सङ्ग्राम आदि में विजयी होता है ॥ १ ९ ॥ पञ्चतन्मात्राओं में शब्द की गति शून्य और निरालय होती है । स्पर्श की गति तिरछी और झुकी हुई होती है । रूप की गति ऊर्ध्व, जल की गति निम्न और गन्ध की गति सब स्थानों से मुक्त होती है । नाभिमूल में स्थित कन्द शिवरूप है और वहाँ शक्तिव्यूह के साथ सूर्य, चन्द्र तथा हरि अवस्थित रहते हैं ॥२०-२१३ ॥ उनके मध्य में दस प्रकार की वायुओं से युक्त, पञ्चतन्मात्राओं से विभूषित और कालाग्नि के समान जाज्वल्यमान शिवरूप प्रणव की अवस्थिति रहती है । वह जीवलोक का जीव है तथा चराचर जगत का आधार है । मन्त्रपीठ से उसके हट जाने पर वायुरूप जीव नष्ट हो जाता है ॥२२-२३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में युद्धजयार्णवीय ज्योतिःशास्त्र वर्णन नामक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१२४ ॥
१ क. ङ. ' ञ्चरक्षाः स्व ' । २ क. ङ. ' राज्जाताः । ३ ख. ग. ज्ञाताः । ४ क. ङ. सित । च. स्थिर । ५ क. ख. ङ. च. ' णाः स्वर्गा ' । ६ च. ' येच्छुभव ' । ७ ङ. ' म् । पृच्छ्यमानं यदाऽऽत्मा । च. ' म् । प्रार्च्यमानं तथाऽऽ । ८ च. ' वेद्वाऽपि शि ' । ९ च. ' त्वमधिग ' । १० ख. ग. घ. छ. ' न्नेत्रं म । ११ ख. घ. स्पर्श तिर्य । १२ ख. ग. च. ' र्यग्गतं । १३ क. ङ. ' र्वकालवि ' । च. र्वज्ञानं । १४ क. ङ. गन्धं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४५४ अथ पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः युद्धजयार्णवीयनानाचक्राणि ' ईश्वर उवाच ॐ ह्रीं कर्णमोटनि बहुरूपे बहुदंष्ट्रे हूं फट्, ॐ हः, ॐ ग्रस ग्रस कृन्त कृन्त च्छक च्छक हूं फट्, नमः ॥१ ॥
पठ्यमानो ह्ययं मन्त्रः क्रुद्धः संरक्तलोचनः । मारणे पातने वाऽपि मोहनोच्चाटने कर्णमोटी महाविद्या सर्ववर्णेषु रक्षिका ॥२ ॥
( इति ) नानाविद्या ( द्या:) पञ्चोदयं प्रवक्ष्यामि स्वरोदय समाश्रितम् । नाभिहृदन्तरं यावत्तावच्चरति मारुतः ॥३ ॥
उच्चाटयेद्रणादौ तु कर्णाक्षीणि प्रभेदयेत् । करोति साधकः क्रुद्धो जपहोमपरायणः ॥४ ॥
हृदयात्पायुकं ज्वरदाहारिमारणे । कण्ठोद्भवो रसो वायुः शान्तिकं पौष्टिकं रसम् ° ॥५ ॥
दिव्यं स्तम्भं समाकर्षं कण्ठं गन्धो ' नासान्तिको ' भ्रुवः । गन्धलीनं मनः कृत्वा स्तम्भयेन्नात्र संशयः ॥ ६ ॥
स्तम्भनं कीलनाद्यं च करोत्येव हि साधकः । चण्डघण्टा कराली च सुमुखी दुर्मुखी तथा ॥७ ॥
अध्याय १२५ युद्धजयार्णवीय नाना चक्र महेश्वर बोले - ‘ ॐ ह्रीं कर्णमोटनि बहुरूपे बहुदंष्ट्रे हूं फट्, ॐ हः, ॐ ग्रस ग्रस कृन्त च्छक च्छक हूं फट्, नमः ' - आँखें लालकर क्रोधूर्वक इस मन्त्र का जप करने से मारण - मोहन - उच्चाटन तथा पातन ( पदच्युति ) क्रियाएँ सिद्ध होती हैं । यह सर्ववर्णरक्षिका, कर्णमोटी, महाविद्या का मन्त्र है ॥१-२ ॥ नाना प्रकार की विद्याएँ समाप्त हुईं । अब मैं स्वरोदय सहित पञ्चोदय का वर्णन करूँगा । नाभि से हृदय तक जितना स्थान है, उतने स्थान में वायु का सञ्चरण होता है ॥३ ॥ कुछ साधक को जप और होम करते हुए रण के आदि में उच्चाटन और कान तथा आँखों
का भेदन करना चाहिए । जिस समय वायु का सञ्चार हृदय से कण्ठ की ओर हो रहा हो, उस समय शत्रु के ज्वर, दाह और मारण का प्रयत्न करना चाहिए । जिस समय साधक की वायु कण्ठ से उत्पन्न हो रही हो, उस समय शान्तिक और पौष्टिक कर्मों को करना चाहिए ॥४-५ ॥ गन्ध का स्थान नासिका के अन्त में भ्रू तक हो तो साधक को स्तम्भन तथा आकर्षण करते समय मन को गन्ध में ही लगा देना चाहिए । इस प्रकार से किया गया स्तम्भन अवश्य ही अभीष्ट फल देनेवाला हुआ करता है, इसमें कोई संशय नहीं है । इसी प्रकार साधक को स्तम्भन और कीलन आदि का अनुष्ठान करना चाहिए । चण्डघण्टा, कराली, सुमुखी, दुर्मुखी, रेवती, प्रथमा, घोरा - इन देवियों की पूजा वायुचक्र में करनी १ च. अग्निरुवाच । २ च. हूँ । ३ ख. ग. ' र्णघाटैनवेदरूपे दंष्ट्रे हं फट्, अहः नमः । ४ क. ' मोटे लङ्के क्रूररूपे दंष्ट्रे हुं फट्, फट्, हां हां ग्र ' । ५ क. ङ. ' हृद्यन्त ' । घ. छ ,. असकृत्कृतच्छकत हृदान्त । ६ ख. हूं ग फट् . " त्यादुकं । ७ क. ङ. रसः । ख. वशम् । ८ ख. नाशान्ति । ९ क. ङ. भवः । ख. च. घुवः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ४५५ रेवती प्रथमा घोरा वायुचक्रे ' तु ता यजेत् । सौम्या च भीषणी देवी जया च विजया तथा । शुष्ककाया प्राणहरा रसचक्रे स्थिता अमूः । संहारी जातहारी च दंष्ट्राला ' शुष्करेवती । भद्रकाली सुभद्रा च भद्रभीमा सुभद्रिका । द्वात्रिंशन्मातरश्चक्रे अष्टाष्टक्रमशः स्थिताः । भूतभेदेन ' तीर्थानि यथा तोयं महीतले । वामदक्षिणयोगेन दशधा सम्प्रवर्तते 1 । ब्रह्माण्डेन कपालेन ११ पिबेत् परमामृतम् । अआकचटतपयाः श आद्यो वर्ग ईरितः । उऊगझडदबलाः सो वर्गश्च तृतीयकः । ओ औ अं अः, ङञणना मो वर्गः पञ्चमो भवेत् । बालः कुमारो युवा स्याद् वृद्धो मृत्युश्च नामतः ।
कृत्तिका प्रतिपद्भौम " आत्मनो लाभदः स्मृतः ।
उच्चाटकारिका देव्यः स्थितास्तेजसि संस्थिताः ॥८ ॥
अजिता चापराजिता महाकोटी च रौद्रया ॥९ ॥
विरूपाक्षी परा दिव्यास्तथा चाऽऽकाशमातरः ॥१० ॥
' पिपीलिका ' पुष्टिहरा महापुष्टिप्रवर्धना ॥ ११ ॥
" स्थिरा च निष्ठुरा दिव्या निष्कम्पा गदिनी तथा ॥१२ ॥
एक एव रविश्चन्द्र ' एकश्चैकैकशक्तिका ॥१३ ॥
प्राण एको मण्डलैश्च भिद्यते भूतपञ्जरे ॥१४ ॥
' वि ( बि ) न्दुमुण्डविचित्रं च तत्त्ववस्त्रेण वेष्टितम् ॥१५ ॥
पञ्चवर्गबलाद्युद्धे जपो भवति तच्छृणु ॥१६ ॥
इईखछठथफराः षो वर्गश्च द्वितीयकः ॥ १७ ॥
एऐघझढधभवा हो वर्गश्च चतुर्थकः ॥ १८ ॥
वर्णाश्चाभ्युदये नृणां चत्वारिंशच्च पञ्च च ॥ १ ९ ॥
आत्मपीडाशोषकः स्यादुदासीनश्च कालकः ॥२० ॥
षष्ठी भौमो मघा पीडा आर्द्रा चैकादशी कुजः ॥ २१ ॥
चाहिए । उच्चाटन करनेवाली देवियों का तेजश्चक्र निवास - स्थान है और उनके नाम हैं - विरूपाक्षी, परा, दिव्या, आकाशमाता, संहारी, जातहारी, दंष्ट्राला, शुष्करेवती, पिपीलिका, पुष्टिहरा, महापुष्टिप्रवर्धना, भद्रकाली, सुभद्रा, भद्रभीमा, सुभद्रिका, स्थिरा, निष्ठुरा, निष्कम्पा तथा गदिनी ॥६-१२ ॥ ये बत्तीस देवियाँ आठ - आठ करके निवास करती हैं, उनमें से सूर्य - चन्द्र एक ही शक्ति है । उनकी शक्तियाँ भूतभेद से एक ही हैं । जैसे भूतल पर नदी के जलों के स्थान - भेद से तीर्थ संज्ञा होती है; उसी प्रकार प्राण एक ही होते हुए कई मण्डलों में विभक्त हो जाता है । वह वाम, दक्षिण के योग से दस प्रकार का होता है । ये देवियाँ पञ्चमहाभूतरूपी वस्त्र से वेष्टित विन्दु रूपी मुण्ड से टपकते हुए परमामृत को ब्रह्माण्डरूपी कपाल में रख करके पान करती हैं ॥ १३-१५३ ॥ पञ्चवर्ग के बल से युद्ध में जिस प्रकार विजय प्राप्त होती है, वह सुनो । अ, आ, क, च, ट, त, प, य और श - यह पहला वर्ग है । इ, ई, ख, छ, ठ, थ, फ, र और ष- यह दूसरा वर्ग है । उ, ऊ, ग, झ, ड, द, ब, ल और स - यह तीसरा वर्ग है । ए, ऐ, घ, झ, ढ, ध, भ, व और ह यह चौथा वर्ग है । ओ, औ, अं, अः, ङ, ञ, ण, न और म - यह पाँचवाँ वर्ग है । ये पैंतालीस अक्षर मनुष्यों के लिए कल्याणकारक होते हैं । इनके अनुसार मनुष्य, बालक, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत्यु ये पाँच नाम हैं । आत्मपीड़ा, शोषक तथा उदासीन ये तीन काल हैं ॥१६-२० । कृत्तिका नक्षत्र, प्रतिपदा तिथि और १ ख. घ. छ. ' क्रेषु ता । २ क. ङ. ' हारा जिनहा । ३ क. ख. ग. ङ. दंष्ट्राणी । ४ क. ख. ग. ङ शुकरे । ५ क. ङ. पिलि ' । ६ क. ' ष्टिहारा च. म ' । ७ स्थिरा गदिनी तथा क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ८ क. ख. ङ. ' श्चैके सशक्तिकाः । भू । ९ क. ङ. भिन्नानि । १० क. ङ. ' पञ्च च । वा ' । ११ क. ङ. विष्णुमण्डविचित्रं च तत्त्वै वा । १२ क. ङ. ' वेत्परमयाऽम् । १३ क. ङ. कार्तिकी । १४ क. ङ. ' म अश्वारोहादयः स्मृताः । ष ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४५६ अग्निपुराणम् मृत्युर्मघा द्वितीया ज्ञो ' लाभश्चाऽऽर्द्रा च सप्तमी । ' बुधोऽहनि भरणीज्ञः श्रवणं काल ईदृश: ॥ २२ ॥
जीवो लाभाय च भवेत्तृतीया पूर्वफाल्गुनी । जीवोष्टमी धनिष्ठाऽऽर्द्रा जीवोऽश्लेषा त्रयोदशी ॥ २३ ॥
मृत्यौ शुक्रश्चतुर्थी स्यात् पूर्वभाद्रपदा श्रिये । पूर्वाषाढा च नवमी शुक्रः पीडाकरो भवेत् || २४ || भरणी ' भूतजा शुक्रो यमदण्डो हि ' हानिकृत् । कृत्तिका पञ्चमी मन्दो लाभाय तिथिरीरिता ॥ २५ ॥
आ ( अ ) श्लेषा दशमी मन्दों योगः पीडाकरो भवेत् । मघा शनिः पूर्णिमा च योगो मृत्युकरः स्मृतः॥२६ ॥
इति तिथियोगः ( गाः ) " पूर्वोत्तराग्निनैर्ऋत्यदक्षिणानिलचन्द्रगाः ' । ` ब्रह्माद्याः ॰स्युर्दृष्टयः स्युः प्रतिपन्नवमीमुखाः ॥ २७ ॥
राशिभिः सहिता दृष्टा ग्रहाद्याः सिद्धये स्मृताः । मेषाद्याश्चतुरः कुम्भा " जयः १२ पूर्णेऽन्यथा मृतिः ॥२८ ॥
सूर्यादि रिक्ता पूर्णा च क्रमादेवं प्रदापयेत् । रणे सूर्ये फलं नास्ति सोमे भङ्गः प्रशाम्यति ॥ २ ९ ॥ कुजेन कलहं विद्याद्बुधः कामाय वै गुरुः । जयाय " मनसे शुक्रो मन्दे भङ्गो रणे भवेत् ॥ ३० ॥
देयानि पिङ्गलाचक्रे सूर्यगानि ( णि ) च भानि हि । मुखे नेत्रे ललाटेऽथ शिरोहस्तोरुपादके ॥३१ ॥
मङ्गलवार का योग लाभकारक होता है । मघा नक्षत्र, षष्ठी तिथि और मङ्गलवार का योग पीड़ाकारक होता है । मङ्गलवार, एकादशी तिथि, आर्द्रा नक्षत्र मृत्युकारक होता है ॥ २१ ॥ मघा नक्षत्र, द्वितीया तिथि और बुधवार का योग, आर्द्रा नक्षत्र,
सप्तमी तिथि, बुधवार का योग लाभकारक होता है । भरणी नक्षत्र बुधवार को हानिकारक होता है, श्रवण नक्षत्र बुधवार का योग कालसंज्ञक होता है । पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, तृतीया तिथि और बृहस्पतिवार का योग लाभकारक होता है । गुरुवार को धनिष्ठा और आर्द्रा नक्षत्र, अष्टमी तिथि, आश्लेषा नक्षत्र, त्रयोदशी तिथि और बृहस्पतिवार का योग मृत्युकारक होता है । पूर्वभाद्रपद नक्षत्र, चतुर्थी तिथि और शुक्रवार का योग श्रीवर्धक होता है । पूर्वाषाढ़ नक्षत्र, नवमी तिथि और शुक्रवार का योग पीड़ाकारक होता है । भरणी नक्षत्र, चतुर्दशी तिथि और शुक्रवार का योग यम से दण्ड दिलानेवाला तथा हानिकारक होता है । कृत्तिका नक्षत्र, पञ्चमी तिथि तथा शनिवार का योग लाभकारक होता है । आश्लेषा नक्षत्र दशमी तिथि और शनिवार का योग पीड़ाकारक होता है । मघा नक्षत्र, पूर्णिमा तिथि तथा शनिवार, होता है ॥२२-२६ ॥ पूर्व दिशा, उत्तर दिशा, अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, दक्षिण का योग मृत्युकारक ईशानकोण की ओर हो और सभी ग्रह राशियों के साथ दिशा, वायव्य, पश्चिम दिशा और वृष, मिथुन, कर्क तथा देखे जायँ, तो वे सिद्धि प्रदान करनेवाले कहे गये हैं । मेघ, करानेवाली कुम्भ राशि यदि पूर्णातिथि ( पञ्चमी, दशमी, अमावस्या ) के साथ रहें, तो विजय प्रदान होती है, अन्यथा मृत्यु होती है ॥२७-२८ ॥ इसी प्रकार रविवार को रिक्ता ( नवमी, चतुर्थी तथा पूर्णातिथि पड़ जाने से विजय होती है । युद्ध में सूर्य कोई फल नहीं देता है, चन्द्रमा, चतुर्दशी ) है । मङ्गल कलह को बढ़ाता है, बुध अभीष्ट सिद्ध करता है, बृहस्पति अशुभ फल का शमन करता पराजय उत्पन्न करता है ॥२९ -३० ॥ ( पिङ्गला विजय दिलाता है तथा शुक्र उत्साह और शनि ( पक्षि ) चक्र से शुभाशुभ कहते हैं- ) एक पक्षी का आकार लिखकर ६ क. ङ १. मन्त्रो क. ङ ।. ७ ‘ ज्ञो क. भवाद्रातिथिस ङ. ‘ ऋत्ये । २ घ. छ. बुधे हानिर्भ ' । ३ क. ङ. ' दाश्च ये । ४ क. ङ. मृतजा । ५ घ. छ. हानिकम् स्युः । ११ क. ङ. म्भा द । ८ क. घ. छ. " न्द्रमाः । व्र । ९ ख. ' ह्या ( ह्या ) स्त्रिषु पृष्ठे स्युः । १० क. ङ. ' स्युस्त्रिदण्डी । यजेत्पूर्णोऽन्य ' । १२ ख. जयपू । १३ क. ङ. लं भाति सो । १४ क. ङ. शनये । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA