अग्नि पुराण — पृष्ठ 461–470
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 461–470
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पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ४५७ ' पादे मृतिस्त्रिऋक्षे स्यात्त्रीणि पक्षेऽर्थनाशनम् । कुक्षिस्थिते फलं स्याच्च राहुचक्रं वदाम्यहम् । सोमाद्भुताशनं वह्नेरप्यामाप्याच्छिवालयम् । ' भुङ्कते चतस्त्रो नाड्य ( डी ) स्तु ' राहुः ' पृष्ठेजयो रणे । ' आग्नेयादि शिवान्तं च पूर्णिमाम्पदितः प्रिये । ऐशान्याग्नेयनैर्ऋत्यवायव्ये फणिराहुकः । तृतीया कृष्णपक्षे तु सप्तमी दशमी तथा । पञ्चदशी विष्टयः स्युः पूर्णिमाऽऽग्नेयवायवे । गृध्रोलूकश्येनकाश्च पिङ्गलः कौशिकः क्रमात् । आदौ साध्यो " हुतो मन्त्र उच्चाटे पल्लवः स्मृतः ।
शान्तौ प्रीतौ नमस्कारो वौषट्पुष्टौ ' वशादिषु ।
मुखस्थे च भवेत्पीडा शिरःस्थे कार्यनाशनम् ॥३२ ॥
इन्द्राच्च नैर्ऋतं गच्छेन्नैर्ऋतात्सोममेव च ॥ ३३ ॥
रुद्राद्यमं यमाद्वायुं वायोश्चन्द्रं व्रजेत्पुनः ॥ ३४ ॥
' अग्रतो मृत्युमाप्नोति तिथिराहुं वदामि ते ॥ ३५ ॥
पूर्वे कृष्णाष्टमीं यावद्राहुदृष्टौ जयो ' भवेत् ॥ ३६ ॥
मेषाद्या दिशि पूर्वादौ यत्राऽऽदित्योऽग्रतो ' मृतिः ॥ ३७ ॥
चतुर्दशी तथा शुक्ले चतुर्थ्येकादशी तिथिः ॥ ३८ ॥
अकचटतपयशा वर्गाः सूर्योदयोग्रहाः ॥३९ ॥
सारसश्च मयूरश्च " गोवत्सः पक्षिणः स्मृताः ॥४० ॥
वश्ये ज्वरे तथाऽऽकर्षे प्रयोगः सिद्धिकारकः ॥४१ ॥
हुं ' मृत्यौ प्रीतिसंनाशे विद्वेषोच्चाटने च फट् ॥४२ ॥
उसके मुख, नेत्र, ललाट, सिर, हस्त, कुक्षि, चरण तथा पङ्ख में सूर्य के नक्षत्र से तीन - तीन नक्षत्र लिखे । पैरवाले तीन नक्षत्रों में रण करने से मृत्यु होती है तथा पङ्खवाले तीन नक्षत्रों में धन का नाश होता है । मुखवाले तीन नक्षत्रों में पीड़ा होती है और सिरवाले तीन नक्षत्रों में कार्य का नाश होता है । कुक्षिवाले तीन नक्षत्रों में रण करने से उत्तम फल होता है ॥३१-३२ ॥ अब मैं राहु - चक्र का वर्णन कर रहा हूँ । राहु पूर्व दिशा से नैर्ऋतकोण, नैर्ऋतकोण से उत्तर दिशा, उत्तर दिशा से अग्निकोण, अग्निकोण से पश्चिम दिशा, पश्चिम दिशा से ईशानकोण, ईशानकोण से दक्षिण दिशा, दक्षिण दिशा से वायुकोण और वायुकोण से पुनः उत्तर दिशा में आ जाता है, परन्तु वह प्रत्येक दिशा में चार घड़ी तक ही ठहरता है । यदि राहु की स्थिति रणयात्री की पृष्ठदिशा में हो, तो उसे विजय - लाभ होता है और यदि वह रणयात्री के सामने की ओर हो, तो उसकी मृत्यु होती है । अब मैं तिथियों के साथ राहु के सम्पर्क के विषय में बता रहा हूँ ॥३३-३५ ॥ हे प्रिये! अग्निकोण से प्रारम्भ करके और पूर्वोत्तर कोणों तक जितने भी दिक्भाग हैं, उन्हें पूर्णिमा के बाद प्रतिपदा से राहु के समान अशुभ समझना चाहिए । इसलिए उस दिन इन दिशाओं की ओर की गयी यात्रा अजयप्रद होती है । कृष्णपक्ष की अष्टमी के दिन पूर्व दिशा राहु - युक्त मानी जाती है । उस दिन पूर्वोत्तर, दक्षिण - पूर्व, पश्चिमोत्तर और दक्षिण – पश्चिम में केतु राहु के समान कार्य करता है । मेष राशि में पूर्व की ओर की गयी यात्रा अत्यन्त अशुभ मानी गयी है ॥३६-३७ ॥ कृष्णपक्ष की तृतीया, सप्तमी और दशमी, चतुर्दशी तिथियाँ, शुक्लपक्ष की चतुर्थी और एकादशी, पूर्णिमा और अष्टमी तिथियाँ भद्रासंज्ञक अशुभ मानी गयी हैं । जो दक्षिण - पूर्व और पश्चिमोत्तर दिशाओं को प्रभावित करती हैं । अ, क, च, ट, त, प, य और श वर्ग सूर्यादि ग्रहों के हैं । इन चक्रों में जो पक्षी कहे गये हैं, वे हैं गृध्र, उलूक, श्येन, पिङ्गल, कौशिक, सारस, मयूर और गोवत्स । पहले होम के बाद सिद्ध करना चाहिए । मन्त्र शान्ति, वशीकरण ज्वर और आकर्षण में नमः सिद्धिकारक माना गया है किन्तु पल्लवयुत मन्त्र उच्चाटन करने में, शान्ति और प्रीतिकर्मों में नमस्कार मन्त्र, पुष्टि और १ पादे " पक्षेऽर्थनाशनम् नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । २ ख. भुजे । ३ ख. राहु पृ ' । ४ क. ' पृष्ठे ज ' । ५ अग्रतो वदामि ते नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । ६ क. ङ. ' ग्नेय्यां दिशि वाऽन्ते च । ७ क. ङ. ' हु पुष्टे ज ' । ८ ख. ग. घ. छ. भयो । ९ ख. ग. ‘ त्यो गतो । १० घ. छ. गोरङ्कुः । ११ क. ङ. भृतो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४५८ अग्निपुराणम् ` वषट्सुते च ' दीप्त्यादौ मन्त्राणां जातयश्च षट् । ओषधीः सम्प्रवक्ष्यामि महारक्षाविधायिनीः ॥४३ ॥
महाकाली तथा चण्डी " वाराही चेश्वरी तथा । सुदर्शना तथेन्द्राणी गात्रस्था रक्षयन्ति तम् ॥ ४४ ॥
बला चातिबला भीरुर्मुसली सहदेव्यपि । जाती च मल्लिका यूथी गारुडी भृङ्गराजकः ॥४५ ॥
चक्ररूपा महौषध्यो धारिता विजयादिदाः । ग्रहणे च महादेवि उद्धृताः शुभदायिकाः ॥४६ ॥
मृदा च कुञ्जरं कृत्वा सर्वलक्षणलक्षितम् । तस्य पादतले कृत्वा स्तम्भयेच्छत्रुमात्मनः ॥४७ ॥
' नासाग्रे चैकवृक्षे च वज्राहतप्रदेशके । वल्मीकमृदमाहृत्य मातरौ योजयेत्ततः ॥४८ ॥
ॐ नमो महाभैरवाय विकृतदंष्ट्रोग्ररूपाय । पिङ्गलाक्षाय त्रिशूलखड्गधराय वौषट् ॥ ४ ९ ॥ पूजयेत्कर्दमां " देवीं स्तम्भयेच्छस्त्रजालकम् । अग्निकार्यं प्रवक्ष्यामि रणादौ जयवर्धनम् || ५० ॥ श्मशाने निशि काष्ठाग्नौ नग्नो मुक्तशिखो नरः । दक्षिणास्यस्तु जुहुयान्नृमांसं रुधिरं विषम् ॥ १ तुषास्थिखण्डमिश्रं तु शत्रुनाम्ना शताष्टकम् ॥५१ ॥
ॐ नमो भगवति कौमारि लल लल ३ लालय लालय घण्टादेवि, अमुकं " मारय मारय सहसा नमोऽस्तु ते १५ भगवति विद्ये १६ स्वाहा ॥५२ ॥
अनया विद्यया १७ होमान्धत्वं " जायते रिपोः ॥५३ ॥
ॐ वज्रकाय वज्रतुण्ड कपिल पिङ्गल करालवदनोर्ध्वकेश महाबल रक्तमुख तडिज्जिह्व वशीकरण आदि में वौषट् मन्त्र, मृत्यु और प्रीति नाश में ' हुं ' मन्त्र, विद्वेष और उच्चाटन में फट् मन्त्र तथा दीप्ति आदि में वषट् मन्त्र प्रयुक्त होता है । इस प्रकार मन्त्रों की छह जातियाँ हैं ॥ ३८-४२ ॥ अब मैं अत्यन्त रक्षा करनेवाली ओषधियों का वर्णन कर रहा हूँ । महाकाली, चण्डी, वाराही, ईश्वरी, सुदर्शना तथा इन्द्राणी को शरीर में धारण करने से शरीर की रक्षा होती है । अयि महादेवि! बला ( बरिअण ), अतिबला, भीरु ( शतावरि ), मुशली, सहदेवी, जाती, मल्लिका, यूथी, गारुडी, भृङ्गराज और चक्ररूपा -इन ओषधियों को ग्रहण के दिन उखाड़कर धारण करने से विजय आदि का लाभ होता है ॥४३-४६ ॥ समस्त लक्षणों से युक्त मिट्टी का हाथी बनाकर उसके पैर के नीचे शत्रु की मूर्ति को दबा देने से शत्रु का स्तम्भन होता है । पर्वत के ऊपर अथवा एक वृक्षवाले स्थान में या बिजली से आहत प्रदेश में वल्मीक से मिट्टी लेकर दो माताओं का आवाहन करे ॥४७-४८ ॥ तदनन्तर ' ॐ नमो महाभैरवाय विकृतदंष्ट्रोग्ररूपाय, पिङ्गलाक्षाय त्रिशूल खड्गधराय वौषट् ’ - इस मन्त्र का जप करके कर्दमा देवी की पूजा करने से शत्रु के अस्त्रों का स्तम्भन होता है ॥४९-४ ९ ३ ॥ अब मैं उस अग्नि का कार्य बताऊँगा, जिससे युद्ध आदि में जय की वृद्धि होती है । रात्रि में श्मशान में जाकर नग्न होकर चोटी खोलकर दक्षिण की ओर उन्मुख बैठकर लकड़ी की अग्नि में मनुष्य के मांस,, शोणित, अस्थि, विष तथा भूसी से शत्रु के नाम पर एक सौ आठ बार ' ॐ नमो भगवति कौमारि लल लल भगवति विद्ये स्वाहा ' इस मन्त्र से हवन करना चाहिए । ऐसा करने से शत्रु अन्धा हो जाता है ॥५०-५३ ॥ ' ॐ वज्रकाय १ क. ङ. ' षडष्टौ । २ ख. हरू । ३ क. ङ. ' षट्, लाभे च ग्रीष्मादौ । ४ ख. दिष्ट्यादौ । ५ क. ङ. च. दण्डी ६ क. ङ. र्मुशली । ७ क. ङ. भस्म । ८ क. ङ. नागाग्रे । ९ क. ङ. च. भैरवाय । १० क. ङ. च. पिङ्गाक्षाय । ११ १४ क क.. ङ ङ.. ‘ कं च. तारय ' य खड्गखट्वाङ्गबन्धाय । १२ ख. ग. घ. छ. ' र्दमं देवि स्त ' । १३ क. ' ल प्रेतुक प्रेतुक ला ॥ तारय स । १५ क. ङ. भवति । १६ क. ङ. बेधे । १७ क. ङ. होमोद्दत्तत्वं । १८ ख. ग. ' दधत्व ’ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ४५ ९ महारौद्र दंष्ट्रोत्कट कह ' ' करालिन् ' महादृढप्रहार ' लङ्केश्वर ' सेतुबन्ध ' शैलप्रवाह गगनचर, एह्येहि भगवन्महावलपराक्रम भैरवो ज्ञापयति, एह्येहि महारौद्र दीर्घलाङ्गूलेन, अमुकं वेष्टय वेष्टय ' जम्भय जम्भय ' खन खन वै हं फट् ॥५४ ॥
अष्ट ( ष्टा ) त्रिंशच्छतं देवि हनुमान्सर्वकर्मकृत् " । " पठेह ( द्ध ) नुमत्संदेशाद्भङ्गमायान्ति शत्रवः ॥५५ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये युद्धजयार्णवीयनानाचक्रप्रतिपादनं नाम पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥
अथ षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः नक्षत्रनिर्णयः ईश्वर उवाच वक्ष्याम्यृक्षात्मकं पिण्डं शुभाशुभविवृद्धये ॥ यस्मिन्नृक्षे भवेत्सूर्यस्तदादौ त्रीणि मूर्धनि ॥ ॥ | १ || एकं मुखे द्वयं नेत्रे हस्तपादे चतुष्टयम् । हृदि पञ्च सुते जानौ ४ आयुर्वृद्धिं विचिन्तयेत् ॥२ ॥
शिरःस्थे तु भवेद्राज्यं पिण्डतो वक्त्रयोगतः । नेत्रयोः कान्तिसौभाग्यं हृदये द्रव्यसंग्रहः ॥३ ॥
वज्रतुण्ड ' ' ' ' वैते हूं फट् ’ – इस मन्त्र का अड़तीस सौ बार जप करने से निखिलकर्मकर्त्ता हनुमान् के प्रभाव से शत्रुओं का नाश हो जाता है ॥५४-५५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में युद्धजयार्थ नानाचक्र - प्रतिपादन नामक एक सौ पचीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१२५ ॥
अध्याय १२६ नक्षत्र -निर्णय - ि महादेव बोले- अब मैं शुभ और अशुभ की वृद्धि के लिए नक्षत्रों के पिण्ड का वर्णन करूँगा । जिस नक्षत्र में सूर्य की स्थिति हो, उससे प्रारम्भ करके तीन नक्षत्रों तक ( मनुष्याकार ) नक्षत्र पिण्ड के मस्तक, उत्तरोत्तर एक नक्षत्र मुख, दो नक्षत्र नेत्र, चार नक्षत्र हाथ - पैर और पाँच नक्षत्र हृदय, भुजा तथा घुटना समझना चाहिए । अब यदि यात्रोत्सुक मनुष्य का जन्म नक्षत्र उस पिण्ड के मस्तक स्थान में पड़े तो उसे राज्य - लाभ समझना चाहिए, मुख तथा नेत्र के स्थान में जन्म - नक्षत्र पड़ने से कांति तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है । हृदय - स्थान में पड़ने से द्रव्य-१ ख. ग. ' हृत्करा ° । २ क. ङ. कहकरा । ३ क. ख. ग. ङ. ' लिनि महा । ४ क. ङ. ' हादंष्ट्रप्र ' । ५ ख. ग. प्रकार । ६ ख. ग. केतुबन्ध । ७ क. ङ. ' तुरथशै । ८ घ. छ. ' य ज ° । ९ क. ङ. ' य षड्गय षड्गय रोम हूं हूं फ ' । १० क. ङ. ' त् ॥ फट्, ह । ११ घ. छ. पटे हनुमत्संदर्श - नाद्भ ' । १२ ख. ग. त्संदर्शनाद्भ । १३ क. ङ. ' ञ्चयुते भानौ ह्यायु १४ ख. ग. च. जातौ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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४६० अग्निपुराणम् हस्ते धृतं तस्करत्वं गतासुरध्वगः पदे । अशुभः ' सूर्यकुम्भः स्याच्छुभः पूर्वादिसंस्थितः । अष्टाविंशल्लिखे (? ) द्विन्दून्पुनर्भाज्यास्त्रिभिस्त्रिभिः । यस्मिन्नृक्षे स्थितो राहुस्तदृक्षं फणिमूर्धनि । वक्त्रे सप्तगत ऋक्षे म्रियते सर्व आह्ववे । ' उदरस्थेन पूजा च जयश्चैवाऽऽत्मनस्तथा । ' पुच्छस्थितेन कीर्तिः स्याद्राहुदृष्टे च भे मृतिः । रविः शुक्रो बुधश्चैव सोमः सौरिर्गुरुस्तथा । सौरिं रविं च राहुं च कृत्वा यत्नेन पृष्ठतः रोहिणी चोत्तरास्त्रिस्त्रो मृगः पञ्चस्थिराणि हि क्षिप्राणि पञ्च भान्येव यात्रार्थी चैव योजयेत् संग्रह होता है । हस्त - स्थान में पड़ने से चोरी करने प्राण जाने का भय समझना चाहिए । जिस नक्षत्र में कुम्भाष्टके भानि लिख्य सूर्यकुम्भस्तु रिक्तकः ॥ ४ ॥
' फणिराहुं प्रवक्ष्यामि जयाजयविवेकदम् ॥५ ॥
अथ ऋक्षाणि चत्वारि रेखास्तत्रैव दापयेत् ॥ ६ ॥
' तदादि विन्यसेद्भानि सप्तविंशत्क्रमेण (? ) तु ॥७ ॥
स्कन्धे भङ्गं ' वियानीयात्सप्तभेषु च मध्यतः ॥ ८ ॥
कटिदेशे स्थिते योध आहवे हरते परान् ॥९ ॥
पुनरन्यं प्र ( त्यत्प्र ) वक्ष्यामि रविराहुबलं तव ॥ १० ॥
लोहितः सैंहिकश्चैव एते यामर्धभागिनः ॥ ११ ॥
। स जयेत्सैन्यसंघातं द्यूतमध्वानमाहवम् ॥१२ ॥
। अश्विनी रेवती स्वाती धनिष्ठा शततारका ॥ १३ ॥
। अनुराधा हस्तमूलं मृगः पुष्यं पुनर्वसुः ॥ १४ ॥
की सम्भावना होती है और चरण - स्थान में पड़ने से मार्ग में सूर्य स्थित हो, उससे प्रारम्भ करके आठ नक्षत्रों को सूर्य आदि ग्रहों के नाम से रखे हुए आठ घड़ों के ऊपर लिखकर पूर्व आदि दिशाओं में स्थापित कर देना चाहिए । उनमें सूर्यकुम्भ का नाम ‘ रिक्तक ' है । यात्रा - काल में वह जिसके जन्म - नक्षत्र के अनुसार पड़ेगा उसके लिए अशुभ होगा किन्तु दूसरे कुम्भ शुभदायक होंगे । अब मैं जय और पराजय का विवेक उत्पन्न करनेवाले फणिराहु का वर्णन करूँगा ॥१-५ ॥ अट्ठाईस विन्दुओं को बनाकर उसे तीन से विभक्त कर देना चाहिए । फिर चार नक्षत्र बनाकर चार रेखाएँ खींचनी चाहिए । जिस नक्षत्र में राहु स्थित हो, उसे सर्प का मस्तक समझना चाहिए । उस नक्षत्र से प्रारम्भ करके पुनः क्रमशः सत्ताईसवें नक्षत्रों का नाम लिखना चाहिए ॥६-७ ॥ यदि मुख्य स्थानीय सात नक्षत्रों में से कोई भी नक्षत्र किसी युद्ध-यात्री के जन्म - नक्षत्र के अनुसार पड़े तो संग्राम में उसकी मृत्यु समझनी चाहिए । स्कन्धस्थानीय सात नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र जन्म के अनुसार पड़े तो भङ्ग - पराजय समझनी चाहिए । उदरस्थानीय नक्षत्र यदि जन्म - नक्षत्र के अनुसार पड़े तो सम्मान तथा विजय समझना चाहिए । कटिस्थानीय नक्षत्र यदि जन्म - नक्षत्र के अनुसार पड़े तो वह युद्ध में दूसरों का प्राण हरण करनेवाला होता है ॥८ - ९ ॥ यदि पुच्छस्थानीय नक्षत्र जन्म - नक्षत्र के अनुसार पड़े तो कीर्ति बढ़ती है और उस नक्षत्र पर राहु की दृष्टि पड़ जाने से वह मृत्युकारक बन जाता है । अब मैं तुम्हें सूर्य और राहु का बल बताऊँगा ॥१० ॥ रवि, शुक्र, बुध, सोम, शनि, बृहस्पति, मङ्गल और राहु को यत्नपूर्वक पृष्ठभाग में करके
जो यात्रा करता है, वह सैन्य - समूह को जीत लेता है । इन ग्रहों को पृष्ठभाग में करके यात्रा करने से द्यूत, मार्ग तथा संग्राम में सफलता मिलती है । रोहिणी, उत्तराषाढ़, उत्तरभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, मृगशिरा - ये पाँच नक्षत्र स्थिरसंज्ञक १ क. ङ. ' तायुर । २ क. ङ. ' ख्य पूर्वकु ' । ३ क. ङ. पूर्वकुम्भः । ४ क. ङ. पाणिनास्तं । ख. ग. फलिराहुं । ५ तदादि सप्तविंशत्क्रमेण तु नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । ६ क. ङ. तु । चक्रे सप्तगते राहुः क्रिय । ७ क. ङ. ' त्सप्ताहेषु । ८ क. प्तमेषु । ग. प्तमेषु च मध्यमः । उ । ९ क. ङ. ' दयस्थे ' । १० क. ङ. प्रत्युत्थितेन । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ४६१ सर्वकार्येषु चैतानि ज्येष्ठा चित्रा विशाखया । स्थावरेषु स्थिरं ह्यक्षं यात्रायां क्षिप्रमुत्तमम् । दारुणे दारुणं कुर्याद्वक्ष्ये चाधोमुखादिकम् । पूर्वात्रयमधोवक्त्रं कर्मं चाधोमुखं चरेत् । स्थापनं नौकाकूपादि विधानं खननं तथा । अनुराधा मृगो ज्येष्ठा नव वै पार्श्वतोमुखाः । आरामगृहप्रासादं प्राकारं क्षेत्रतोरणम् । द्वादशी सूर्वदग्धा तु चन्द्रेणैकादशी तथा । षष्ठी च गुरुणा दग्धा द्वितीया भृगुणा तथा । द्वितीया ' द्वादशी चैव सप्तमी वै तृतीयया । विशाखा कृत्तिका चैव उत्तरे द्वे पुनर्वसुः ।
लाभो हानिर्जयो वृद्धिः पुत्रजन्म तथैव च ।
' पूर्वास्तिस्रोऽग्निर्भरणी मघार्द्राश्लेषा दारुणाः ॥१५ ॥
` सौभाग्यार्थे मृदून्येव उग्रेषूग्रं तु कारयेत् ॥१६ ॥
कृत्तिका भरण्या ( ण्य ) श्लेषा विशाखा पित्तनैर्ऋतम् ॥१७ ॥
एषुकूपतडागादि विद्याकर्म भिषक्क्रिया ॥ १८ ॥
रेवती चाश्विनी चित्रा हस्तः स्वा ( स्तस्वा ) ती पुनर्वसुः ॥१९ ॥
एषु राज्याभिषेकं च पबट्टन्धं गजाश्वयोः ॥२० ॥
ध्वजचिह्नपताकाश्च सर्वानेतांश्च कारयेत् ॥२१ ॥
भौमेन दशमी दग्धा ' तृतीया वै बुधेन च ॥ २२ ॥
सप्तमी सूर्यपुत्रेण त्रिपुष्करमथो वदे ॥२३ ॥
रविर्भीमस्तथा सौरिः षडेतास्तु ( ते तु ) त्रिपुष्कराः ॥२४ ॥
पूर्वभाद्रपदा चैव षडेते तु त्रिपुष्कराः ॥ २५ ॥
नष्टं भ्रष्टं विनष्टं वा तत्सर्वं त्रिगुणं भवेत् ॥ २६ ॥
हैं । अश्विनी, रेवती, स्वाती, धनिष्ठा और शततारका ये पाँच नक्षत्र ' क्षिप्र ' संज्ञक हैं । यात्री को इनका लाभ उठाना चाहिए । अनुराधा, हस्त, मूल, मृगशिरा, पुष्य, पुनर्वसु, ज्येष्ठा, चित्रा और विशाखा - ये नक्षत्र सभी कार्यों के लिए शुभ माने गये हैं । पूर्वाषाढ़, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वभाद्रपद, कृत्तिका, भरणी, मघा, आर्द्रा, अश्लेषा ये नक्षत्र ' दारुण ' कहलाते हैं ॥११-१५ ॥ स्थिरता सम्बन्धी कार्य में स्थिरसंज्ञक नक्षत्र और यात्रा में क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्र उत्तम होते हैं । सौभाग्य के कार्य में मृदुसंज्ञक नक्षत्र, उग्रता के कार्य में उग्रसंज्ञक नक्षत्र और भयङ्कर कार्यों में दारुणसंज्ञक नक्षत्र उत्तम होते हैं ॥१६-१७ ॥ अब मैं उन कार्यों को बताऊँगा जो अधोमुख नक्षत्र हैं । कृत्तिका, भरणी, अश्लेषा, विशाखा, भरणी, पूर्वाषाढ़, पूर्वभाद्रपद, पूर्वाफाल्गुनी ने नक्षत्र अधोमुखसंज्ञक नक्षत्रों में कुआँ, तालाब आदि की प्रतिष्ठा, शिक्षारम्भ, चिकित्सारम्भ, स्थापनाकार्य, नौका और कूपादि का निर्माण तथा खोदाई का कार्य करना चाहिए । अनुराधा, ज्येष्ठा, मृगशिरा, रेवती, अश्विनी, चित्रा, हस्त, स्वाती और पुनर्वसु इन नौ नक्षत्रों में पार्श्वमुख कहे जाते हैं ( तिर्यक् ) कार्य करना चाहिए । इनमें राज्याभिषेक, हाथी, घोड़े का पट्टबन्धन, बगीचा, गृह, प्रासाद ( महल ), चहारदीवारी, खेत की मेंड़ और ध्वजा - पताकादि वस्तुओं का निर्माण करना चाहिए ॥१८-२१ । रविवार को द्वादशी, सोमवार को एकादशी, मङ्गलवार को दशमी, बुधवार को तृतीया, बृहस्पतिवार को षष्ठी, शुक्रवार को द्वितीया और शनिवार को सप्तमी तिथियाँ दग्धतिथियाँ मानी जाती हैं । द्वितीया, द्वादशी, सप्तमी, रविवार, मङ्गलवार तथा शनिवार इनको मिलाकर त्रिपुष्कर योग होता है ॥२२-२४ ॥ विशाखा, कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, पूर्वभाद्रपद - ये छहों नक्षत्र १ पूर्वास्तिस्रो दारुणाः क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । २ सौभाग्यार्थे कारयेत् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ३ क. ङ. ' शाखाऽपि च नै । ४ क. ङ. प्रोक्ता । ५ क. ङ. तृतीया । ६ क. ङ. दृष्टं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४६२ अश्विनी भरणी चैव अश्लेषा पुष्यमेव च । एतानि दृढचक्षूंषि पश्यन्ति च दिशो दश । आषाढे रेवती चित्रा केकराणि पुनर्वसुः । कृत्तिका रोहिणी सौम्यं फल्गुनी मघा तथा । पूर्वभाद्रपदा चैव चिपिटानि च तानि हि हस्त उत्तरभाद्रश्च ‘ आर्द्राऽऽषाढा तथैव च पुनर्वक्ष्यामि गण्डान्तमृक्षमध्ये यथा स्थितम् उभयोर्याममात्र * तु वर्जयेत्तत्प्रयत्नतः द्वितीयं गण्डमाख्यातं तृतीयं भैरवि शृणु न कुर्याच्छुभकर्माणि यदीच्छेदात्मजीवितम् स्वातिश्चैव विशाखा च श्रवणं सप्तमं पुनः ॥२७ ॥
यात्रासु दूरगस्यापि आगमः पुण्यगोचरे ॥२८ ॥
एषु पञ्चसु ऋक्षेषु निर्गतस्याऽऽगमो भवेत् ॥ २ ९ ॥ मूलं ज्येष्ठाऽनुराधा च घनिष्ठा शततारकाः ॥३० ॥
। अध्वानं व्रजमानस्य पुनरेवाऽऽगमो भवेत् ॥ ३१ ॥
। नष्टार्थाश्चैव दृश्यन्ते सङ्ग्रामो नैव विद्यते ॥ ३२ ॥
1 । रेवत्यन्ते ( न्तं ) चतुष्कं ' तु अश्विन्यादि चतुष्टयम् ॥३३ ॥
। अश्लेषान्ते मघादौ तु ' घटिकानां चतुष्टयम् ॥३४ ॥
। ज्येष्ठामूलभयोर्मध्य उग्ररूपं तु यामकम् ॥३५ ॥
। दारके जातकाले च म्रियेते पितृमातरौ ॥ ३६ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये नक्षत्रनिर्णयप्रतिपादनं नाम षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१२६ ॥
त्रिपुष्करसंज्ञक कहलाते हैं । पूर्वोक्त तिथिवार नक्षत्र के योग से त्रिपुष्कर योग होता है । इस योग में लाभ, हानि, वृद्धि, पुत्र- जन्म, नाश, विनाश तथा भ्रष्टता ये सभी तिगुनी हो जाती हैं ॥ २५-२६ ॥ अश्विनी, भरणी, अश्लेषा, पुष्य, स्वाती, विशाखा और श्रवण - ये सात नक्षत्र दृढ़ नेत्रवाले हैं, जो दसों दिशाओं को देखते हैं । | इन नक्षत्रों में खोया हुआ तथा यात्रा करनेवाला बड़े पुण्य से ही लौटता है ॥२७-२८ ॥ दोनों आषाढ़ नक्षत्र, रेवती, चित्रा, पुनर्वसु ये पाँच नक्षत्र ‘ केकर ' हैं, अर्थात् ' मध्याक्ष ' हैं । इनमें गयी हुई वस्तु विलम्ब से मिलती है । कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, पूर्वाफाल्गुनी, मघा, मूल, ज्येष्ठा, अनुराधा, धनिष्ठा शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद - ये नक्षत्र ' चिपिटाक्ष ' अर्थात् ' मन्दाक्ष ' हैं । इनमें गयी हुई वस्तु तथा मार्ग चलनेवाला व्यक्ति कुछ ही विलम्ब में लौट आता है ॥२९ -३१ ॥ हस्त, उत्तरभाद्रपद, आर्द्रा तथा आषाढ़ा नक्षत्रों में यात्रा करने से अभीष्ट सिद्धि नहीं होती है तथा इनमें प्रारम्भ किया हुआ संग्राम भी टिकता नहीं है । अब मैं गण्डान्त - दोष के विषय में कहूँगा जो नक्षत्रों के बीच में पड़ता है । रेवती नक्षत्र में अन्त के दो दण्ड का समय और अश्विनी नक्षत्र में आदि के दो दण्ड के समय का यत्नपूर्वक त्याग कर देना चाहिए ( यह प्रथम गण्डान्त - दोष है ) । अश्लेषा नक्षत्र में अन्त के दो दण्डों का समय और मघा नक्षत्र में आदि के दो दण्डों का समय दूसरा गण्डान्त - दोष कहलाता है । अयि भैरवि! तीसरा गण्डान्त - दोष सुनो, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र में मध्य के दो दण्डों का समय उग्र रूप धारण करता है अर्थात् गण्डान्त-दोष कहलाता है । इसलिए यदि जीवन की अभिलाषा हो तो इस गण्डान्त योग में शुभकर्म नहीं करना चाहिए । इस योग में जिस शिशु का जन्म होता है उसके माता - पिता मर जाते हैं ॥३२-३६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नक्षत्र - निर्णय का प्रतिपादन नामक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१२६ ॥
१ क. ङ. ' ण्यचोत्तरे । २ क. ङ. आषाढ़ा । ३ घ. छ. ' तुर्नाडो अ ' । ४ क. ङ. ' र्यानमा ' । ५ घ. छ. ' ष्ठाभमूलयो । ६ मध्यम पदलोपी समासः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ४६३ अथ सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः नानाबलानि ईश्वर उवाच विष्कम्भे घटिकास्तिस्रः शूले पञ्च विवर्जयेत् । ' षट्षड्गण्डेऽतिगण्डे च नव व्याघातवज्रयोः ॥१ ॥
परिघे च व्यतीपात उभयोरपि तद्दिनम् । वैधृते ( तौ ) तद्दिनं चैव यात्रायुद्धादिकं त्यजेत् ॥२ ॥
ग्रहैः शुभाशुभं वक्ष्ये देवि मेषादिराशितः । चन्द्रशुक्रौ च जन्मस्थौ वर्जितौ शुभदायकौ ॥३ ॥
द्वितीयो मङ्गलोऽथार्कः सौरिश्चैव तु सैंहिकः । द्रव्यनाशमलाभं च आहवे भङ्गमादिशेत् ॥४ ॥
सोमो बुधो भृगुर्जीवो द्वितीयस्थाः शुभावहाः । तृतीयस्थो यदा भानुः शनिभौमो भृगुस्तथा ॥५ ॥
बुधश्चैवेन्द्र राहुश्च सर्वे ते फलदा ग्रहाः । बुधशुक्रौ चतुर्थी च शेषाश्चैव भयावहाः ॥६ ॥
पञ्चमस्थो यदा जीवः शुक्रः सौम्यश्च चन्द्रमाः । ददेत चेप्सितं लाभं षष्ठे स्थाने ' शुभो रविः ॥७ ॥
चन्द्रः सौरिर्मङ्गलश्च ग्रहा देवि स्वराशितः । बुधश्च शुभदः षष्ठे त्यजेत्षष्ठं गुरुं भृगुम् ॥८ ॥
सप्तमोऽर्कः शनिर्भीमो राहुर्हान्यै सुखाय च । जीवो भृगुश्च सौम्यश्च ज्ञशुक्रौ चाष्टमौ शुभौ ॥९ ॥
अध्याय १२७ नाना - बल - वर्णन महेश्वर बोले - विष्कम्भ योग में तीन घड़ी, शूल योग में पाँच घटी, गण्ड योग में छह घट, अतिगण्ड योग में छह घट, व्याघात और वज्र योग में नव घटी, वैधृत, व्याघात, वज्र, परिघ और व्यतीपात योग में उस ( एक ) दिन तक यात्रा तथा युद्ध आदि कार्य नहीं करना चाहिए ॥१-२ ॥ अयि देवि! अब मैं मेष आदि राशियों के अनुसार ग्रहों द्वारा मिलनेवाले शुभाशुभ कर्मों का वर्णन करूँगा । जन्मराशि में स्थित चन्द्रमा और शुक्र शुभदायक होते हैं । मङ्गल, रवि, शनि तथा राहु के दूसरे स्थान में पड़ने से द्रव्य का नाश अथवा अलाभ होता है और रण में पराजय होती है ॥३-४ ॥ सोम, बुध, बृहस्पति तथा शुक्र के दूसरे स्थान में रहने से शुभ फल मिलता है । यदि सूर्य, शनि, मङ्गल, शुक्र, बुध, सोम तथा राहु की स्थिति तृतीय स्थान में हो तो वे शुभ फल देनेवाले होते हैं । चौथे स्थान में बुध और शुक्र सुन्दर फल देते हैं और शेष ग्रह भयानक फल देते हैं ॥५-६ ॥ पाँचवें स्थान में बृहस्पति, शुक्र, बुध तथा चन्द्रमा अभीष्ट फल प्रदान करते हैं । छठे स्थान में सूर्य शुभ होता है || ७ || अयि देवि! यात्रा करनेवाले मनुष्य की राशि से छठे स्थान में यदि चन्द्रमा, शनि, मङ्गल तथा बुध ग्रह पड़ें तो शुभ फल होता है । छठे स्थान में गुरु तथा शुक्र वर्जनीय हैं ॥८ ॥ सातवें स्थान में शनि, मङ्गल तथा राहु हानिकारक होते हैं, जबकि इसी स्थान में गुरु,
शुक्र तथा बुध का आना सुखदायक होता है । आठवें स्थान में बुध तथा शुक्र शुभदायक होते हैं और शेष ग्रहों का १ क. ङ. षट् च गण्डातिगण्डेति न ' । २ क.. ङ ' तत्क्षणम् । ३ च. ' वो भानुश्चैव शनिस्तथा । द्वितीयस्थो यदा राहुः सर्वे । ४ क. ङ. ' श्च ग्रहादेव स्वराशितः । बु । ५ क. ङ. शुभै । ६ क. ङ. ' जेयुश्च गु ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४६४ ' शेषा ग्रहास्तथा हान्यै ज्ञभृगू नवमौ शुभौ । शनिर्भीमश्च राहुश्च चन्द्रः सौम्यः शुभावहः । बुधशुक्रौ द्वादशस्थ शेषान्द्वादशागांस्त्यजेत् । मीनो मेषोऽथ मिथुनं चतस्रो नाडयो (? ) वृषः । धनुर्नको घटश्चैव सूर्यगो ' राशिराद्यकः । कुलीरो मकरश्चैव मकरश्चैव तुलामेषादयश्चराः । स्थिरो वृषो हरिः कुम्भो वृश्चिकः स्थिरकार्यके । मिथुनं कन्यका मीनो धनुश्च द्विस्वभावकः । यात्रा वाणिज्य सङ्ग्रामे विवाहे राजदर्शने । अश्विनी‘त्रिंशत्ताराश्च ( राच ) तुरगस्याऽऽकृतिर्यथा । यमभे तु यदा वृष्टिः पक्षमेकं तु वर्षति इत्यादिमहापुराण आग्नेये नानाबलवर्णनं शेषा हान्यै च लाभाय दशमी भृगुभास्करौ ॥१० ॥
शुभाश्चैकादशे सर्वे वर्जयेद्दशमं गुरुम् ॥११ ॥
अहोरात्रे द्वादश स्यू राशयस्तान्वदाम्यहम् ॥१२ ॥
' षट्कषट्कर्कसिंहकन्याश्च तुलापञ्च च वृश्चिकः ॥१३ ॥
चरस्थिरद्विस्वभावा मेषाद्याः स्युर्यथाक्रमम् ॥ १४ ॥
चरकार्यं जयं काममाचरेच्च शुभाशुभम् ॥१५ ॥
शीघ्रः समागमो नास्ति रोगार्तो नैव मुच्यते ॥ १६ ॥
द्विस्वभावाः शुभाश्चैते सर्वकार्येषु नित्यशः ॥ १७ ॥
वृद्धिं जयं तथा लाभं युद्धे जयमवाप्नुयात् ॥१८ ॥
यदत्र कुरुते वृष्टिमेकरात्रं प्रवर्षति ॥ ॥१९ ॥
नामसप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१२७ ॥
फल अनिष्ट होता है । नवम स्थान में बुध तथा शुक्र शुभकारक होते हैं और शेष ग्रह हानिकारक होते हैं । दशम स्थान में शुक्र तथा सूर्य लाभदायक होते हैं और शनि, मङ्गल, राहु, चन्द्रमा तथा बुध शुभ फल देनेवाले होते हैं । दशम स्थान में बृहस्पति त्याज्य है । एकादश स्थान में सभी ग्रह शुभ होते हैं । बारहवें स्थान में बुध और शुक्र ग्राह्य तथा अन्य ग्रह वर्जनीय हैं ॥९ -११ ॥ अहोरात्र में बारह राशियाँ होती हैं । अब मैं उन्हें बताऊँगा ॥१२ ॥ मीन, मेष, मिथुन इन लग्नों का
मान चार घटी, वृष, कर्क, सिंह, कन्या और तुला इन लग्नों का मान छह - छह घटी तथा वृश्चिक, धनु, मकर और कुम्भ लग्न का मान पाँच - पाँच घटी है । सूर्य से मेषादि राशियाँ हैं । मेषादि राशियों का स्वभाव चल, अचल तथा चलाचल होते हैं ॥१३-१४ ॥ इनमें कर्क, मकर, तुला तथा मेष राशियाँ चर स्वभाव की होती हैं । अतः इनमें चरकार्य, विजय तथा शुभाशुभ कर्म करना चाहिए । वृष, सिंह, कुम्भ तथा वृश्चिक अचल स्थिर स्वभाव की होती हैं । अत: इनमें स्थिर कार्य करना चाहिए । इनमें यात्रा करने से शीघ्र समागम नहीं होता है और चिकित्सा प्रारम्भ करने से रोग से मुक्ति नहीं मिलती है ॥१५-१६ ॥ मिथुन, कन्या, मीन तथा धनु राशियाँ दोनों स्वभाववाली होती हैं । इनमें किये जानेवाले सभी कामों में सफलता मिल जाती है । द्विस्वभाववाली राशियों में यात्रा, व्यापार, संग्राम, विवाह तथा राज - दर्शन करने में सफलता, लाभ, वृद्धि तथा जय आदि की प्राप्ति होती है ॥१७-१८ ॥ अश्विनी नक्षत्र तीस ताराओं से संवलित है । इसकी आकृति घोड़े के समान होती है । इसमें प्रारम्भ होनेवाली वर्षा एक पक्ष तक बरसती है ॥१९ ॥
श्री अग्निमहापुराण में नाना - बल - वर्णन नामक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त ॥१२७ ॥
५ ‘ षट्षट्कर्कसिंहकन्यास्तुला १ शेषा " शुभौ नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । २ क. ङ. ' रौ । गतिभौं । ३ घ. छ. ' शमे गु ' । ४ क. ङ. ' दशोऽग्नौ शे ' । ' इति पाठो युक्तः । ६ क. ङ. रात्रिराद्यकम् । च । ७ क. ङ. शीघ्रागमो यमो । ८ ख. ग. घ. छ. ' नी विंशतारा । ९ क. ङ. वृष्टिः पक्ष । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ४६५ अथाष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः कोटचक्रम् ईश्वर उवाच कोटचक्रं प्रवक्ष्यामि चतुरस्त्रं पुरं लिखेत् । नाडीत्रितयचिह्याढ्यं मेषाद्याः पूर्वदिड्मुखाः । भरणी दक्षिणे देया विशाखा नैर्ऋते न्यसेत् । धनिष्ठां चोत्तरे न्यस्य ऐशान्यां रेवती तथा । रोहिणी पुष्यफल्गुन्यः स्वाती ज्येष्ठा क्रमेण तु । कोटमध्ये तु या नाडी कथयामि प्रयत्नतः । उत्तराफल्गुनी याम्ये चित्रानैर्ऋतसंस्थिता ।
पूर्वभाद्रपदा सौम्ये रेवती ईश गोचरे ।
चतुरस्त्रं पुनर्मध्ये तन्मध्ये चतुरस्रकम् ॥१ ॥
कृत्तिका पूर्वभागे तु अश्लेषाऽऽग्नेयगोचरे ॥२ ॥
अनुराधां पश्चिमे च श्रवणं वायुगोचरे ॥३ ॥
बाह्यनाड्यां स्थितान्येव अष्टौ ह्यक्षाणि ' यत्नतः ॥४ ॥
अभिजिच्छततारा तु अश्विनी मध्यनाडिका ॥५ ॥
मृगश्चाभ्यन्तरे पूर्वं तस्याऽऽग्नेये पुनर्वसुः ॥ ६ ॥
मूलं तु पश्चिमे न्यस्योत्तराषाढां तु वायवे ॥७ ॥
कोटस्याभ्यन्तरे नाडी ह्यक्षाष्टकसमन्विता ॥८ ॥
अध्याय १२८ कोटचक्र - वर्णन महेश्वर बोले- अब मैं कोटचक्र का वर्णन करूँगा । सर्वप्रथम एक चौकोर चित्र बनाना चाहिए । इसके बीच में एक और चौकोर चित्र बनाकर उसके अन्दर तक एक और चौकोर चित्र बना लेना चाहिए ॥१ ॥ उसे तीन नाड़ियों
के चिह्नों से चिह्नित करके पूर्व दिशा की ओर मेषादि का चित्रण करना चाहिए । पूर्व की ओर कृत्तिका और आग्नेयकोण की ओर अश्लेषा का चित्रण करना चाहिए । दक्षिण की ओर भरणी और नैर्ऋत्यकोण में विशाखा का सन्निवेश करना चाहिए । पश्चिम की ओर अनुराधा और वायव्यकोण में श्रवण नक्षत्र का अङ्कन करना चाहिए ॥२-३ ॥ उत्तर की ओर धनिष्ठा और ईशानकोण में रेवती को चित्रित कर देना चाहिए । इस प्रकार बाह्य नाड़ी में यत्नपूर्वक आठ नक्षत्रों को स्थापित करना चाहिए, जिनके नाम हैं- रोहिणी, पुष्य, फल्गुनी, स्वाती, ज्येष्ठा, अभिजित् और शततारा । मध्यवर्ग में अश्विनी का चित्रण करना चाहिए ॥४-५ ॥ अब मैं यत्नपूर्वक उस नाड़ी का वर्णन करूँगा जो कोट के बीच में होती है । उसके बीच में मृगशिरा और आग्नेयकोण में पुनर्वसु नक्षत्र रहते हैं । दक्षिण दिशा की ओर उत्तराफाल्गुनी और नैर्ऋतकोण में चित्रा नक्षत्र रहता है । पश्चिम की ओर मूल नक्षत्र का न्यास करके वायव्यकोण में उत्तराषाढ़ नक्षत्र का अङ्कन करना चाहिए ॥६-७ ॥ उत्तर दिशा की ओर पूर्वाभाद्रपद और ईशानकोण में रेवती का चित्रण करना चाहिए । कोट के आभ्यन्तर की नाड़ी भी आठ नक्षत्रों से युक्त होती है, जिनके नाम हैं - आर्द्रा, हस्त, आषाढ़ और १ क. ङ. पादतः । २ क. ङ. तः । मूलाश्चा । ३ क. ख. ग. ङ. च. न्यस्य उत्तराषाढां वा । ३० CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ४६६ आर्द्राहस्तस्तथाऽऽषाढा ' चतुष्कं चोत्तरात्रिकम् । ( ` मध्येस्तम्भचतुष्कं तु दद्यात्कोटस्य कोटरे || ९ || एवं दुर्गस्य विन्यासं बाह्ये स्थानं ' दिशाधिपात् ) । आगन्तुको यदा योद्धा ऋक्षवान्स्यात्फलान्वितः ॥१० ॥
कोटमध्ये ग्रहाः सौम्या यदा ऋक्षान्विताः पुनः । जयं मध्येस्थितानां तु भङ्गमागामिनो विदुः ॥ ११ ॥
प्रवेशभे प्रवेष्टव्यं निर्गमभे च निर्गमे ( च्छे ) त् । भृगुः सौम्यस्तथा भौम ऋक्षान्तं सकलं यदा ॥१२ ॥
तदा भङ्गं विजानीयाज्जयमागन्तुकस्य च । प्रवेशर्क्षचतुष्के तु संग्रामं चाऽऽरमेद्यदा ॥ तदा सिध्यति तद्दुर्गं न कुर्यात्तत्र विस्मयम् ॥१३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये कोटचक्रवर्णनं नामाष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥
अथैकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः अर्घकाण्डम् ईश्वर उवाच ( ६ अर्घमानं प्रवक्ष्यामि उल्कापातोऽथ भूश्चला ) । निर्घातो ग्रहणं वेशो ' दिशां दाहो भवेद्यदा ॥ १ ॥
तीन प्रकार के उत्तरा नक्षत्र । इस प्रकार से दुर्ग का निर्माण करना चाहिए । नक्षत्र - विशेष के नाम के दिन में आनेवाला विजयार्थी यदि कोट के मध्य में आकर उस नक्षत्र से चिह्नित दिशा से आक्रमण करता है तो वह निश्चय ही विजय को प्राप्त करता है । ज्योतिर्विद् व्यूहादि के मध्य में पड़े हुए उन वीरों की भी विजय को निश्चित बतलाते हैं, जबकि आक्रमणकारी शत्रु की स्थिति और उनके आगमन की दिशा शुभ नक्षत्रों से सम्बद्ध रहा करती है ॥८ - ११ ॥ जब कोई अच्छा नक्षत्र अपने ग्रह में प्रवेश करता है उस समय दुर्ग में प्रवेश करना चाहिए और जिस समय वह अपने ग्रह से निर्गमन करता है उस समय दुर्ग से निर्गमन करना चाहिए । जिस समय बृहस्पति, सोम तथा मङ्गल अपने ग्रह में प्रवेश करते हैं उस समय आक्रमण करने से आगन्तुक योद्धा की विजय निश्चित है । दुर्ग में प्रवेश करने के लिए शुभ माने जानेवाले नक्षत्रों के समय में युद्ध का आरम्भ करने पर दुर्ग में सफलता निश्चित है, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए ॥१२-१३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में कोटचक्र - वर्णन नामक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त ॥१२८ ॥
अध्याय १२ ९ अर्धकाण्ड - वर्णन महेश्वर बोले - अब मैं अर्घमान ( वस्तुओं के भाव ) के सम्बन्ध में बताऊँगा । जिस मास में उल्कापात, भूकम्प, तूफान, ग्रहण, वेश ( सूर्य चन्द्रमा के मण्डल ) तथा दिग्दाह होता है, उस मास में वस्तुओं के भाव में वृद्धि समझनी १ क. ङ. “ ढा मूलाद्यं चोत्तरान्तिक ' । २ मध्य दिशाधिपात् नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । ३ ख. ग. वाह्याटालदि । ४ ख. ग. ' पान् । आ ’ । ५ के. ङ. " मं कारयेद्य ' । ६ अर्धमानं " भूश्चला नास्ति ख. पुस्तके । ७ क. ङ. भूतलम् । नि । ८ क. ङ. वेगो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA