अग्नि पुराण — पृष्ठ 511–520

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 511–520

पृष्ठ 511

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सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः फं श्रीं श्रीं श्रीं ह्रीं क्षे वच्छे क्षे क्षे हूं फट् ह्रीं नमः नवेयं त्वरिता ( प्रोक्ता ) पुनर्ज्ञेयाऽर्चिता जये वच्छेऽथ शिरसे स्वाहा त्वरितायाः शिवः स्मृतः हूं नेत्रत्रयाय वौषड्ह्लींमन्तं च फडन्तकम् क्षेमकारी च ह्रींकारी फट्कारी नव शक्तयः ह्वह्नीं नले बहुतुण्डे चखगे ह्वीं खेचरे ज्वालिनि छेदनि करालि ख खे छे खे खरहाङ्गी ह्नीं क्षे ह्रीं फे बे फेफे वक्त्रे वरी के पुटि पुटि घोरे हूं गुप्ताङ्गानि च तत्त्वानि त्वरितायाः पुनर्वदे फां ज्वल ज्वलेति च शिखा वर्म ' इले हुं हुं हुम् ५०७ । ॐ ह्रां क्षे वच्छे क्षे क्षो ह्रीं फट् ॥४ ॥

। ह्रौं सिंहायेत्यासनं स्याद्ध्रीं क्षे हृदयमीरितम् ॥५ ॥

। क्षे ह्वह्नीं शिखायै वौषट् स्याद्भवेत्झें कवचाय हुम् ॥६ ॥

। ह्रींकारी खेचरी चण्डा छेदनी क्षोभणी क्रिया ॥७ ॥

। अथ दूती: प्रवक्ष्यामि पूज्या इन्द्रादिगाश्च ताः ॥८ ॥

ज्वल ख खे छ च्छे शवविभीषणे च च्छे चण्डे वक्षे कपिले ह क्षे हरूं कूं तेजीवति रौद्रि मातः फट् ब्रह्म वेतालि मध्ये ॥९ ॥

। ह्रौं ह्रूं हः हृदये प्रोक्तं ह्रीं ह्वश्च शिरः स्मृतम् ॥१० ॥

। क्रों क्षं श्रीं नेत्रमित्युक्तं क्षौमस्त्रं त्रै ततश्च फट् ॥ हुं खे वच्छे क्षेः, ह्रीं थें हुं फट् वा ॥११ ॥

हुं शिरश्चैवमध्ये स्यात्पूर्वादो खे सदा शिवे । व ईशश्छे मनोन्मानी ' मक्षे तार्थो ह्रीं च माधवः ॥ क्षे ब्रह्मा हुं तथाऽऽदित्यो दारुणं फट् स्मृताः सदा ॥१२ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये त्वरितापूजादिविधिकथनं नाम सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥१४७ ॥

ज्ञान और अर्चन विजय - काल में होना चाहिए । ' ॐ ह्रौं सिंहाय ' इस मन्त्र से आसन तथा ' ध्रीं क्षे ' इत्यादि मन्त्र से हृदय का पूजन कहा गया है ॥ २-५ ॥ अब मैं उन देवताओं का नाम बतला रहा हूँ जिनकी पूजा त्वरिता शक्ति के साथ मण्डल के विभिन्न कोणों पर होती है । उनके पूजन के विभिन्न मन्त्र हैं । शिखा के लिए मन्त्र है- ' ह्नीं वौषट् ' कवच के लिए मन्त्र हैं ' क्षे हुम् ' नेत्रत्रय का मन्त्र है ' हरूं वौषट् ' इन मन्त्रों के अन्त में ' ह्रीं और फट् ' का भी प्रयोग किया जाता है । नौ शक्तियाँ हैं - ह्रींकारी, खेचरी, चण्डा, छेदनी, क्षोभणी, क्रिया, क्षेमकारी, ह्रींकारी और फट्कारी । अब मैं त्वरिता की दूतियों का वर्णन करूँगा जो कि पूर्व इत्यादि दिशाओं में पूज्य हैं । इनके मन्त्र हैं- ' ह्रीं नले बहुतुण्डे ………… ‘ ब्रह्मवेतालि मध्ये ' ॥६ - ९ ॥ अब मैं त्वरिता के गुह्याङ्गों और तत्त्वों का वर्णन करूँगा - ' ह्रीं ह्रूं ह: ' मन्त्र हृदय पर कहा जाता है । ' ह्वीं ह्वः ' मन्त्र का प्रयोग सिर में किया जाता है । शिखा का मन्त्र है - ' हां ज्वल ज्वल ' । कवच का मन्त्र है - ' इले ह्वं हुं हुम् ' । नेत्र का मन्त्र है ' क्रौं क्षं श्रीं ' । अस्त्र के मन्त्र हैं- ' क्षौं फट् हुं खे वच्छे क्षे: ह्नीं र्क्षे हम् फट् । ' सिर और मध्य में हं पूर्वादि दिशाओं में क्रमशः ' खे सदाशिवे, व ईशः, छे मनोन्मनी, मक्षे तार्क्षः, ह्नीं माघवः, शें ब्रह्मा, हुम् आदित्यः, दारुणं फट् ' का उल्लेख एवं पूजन करे । ये आठ दिशाओं में पूजनीय देवता बताये गये हैं ॥१०-१२ । श्री अग्निमहापुराण में त्वरिता पूजा विधि वर्णन नामक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥१४७ ॥

१ क. ङ. च. स्मृतम् । २ क. ङ. हन्तीः । च. आहुतीः । ख. ग. भूतिः । ३ क. ङ. ह्रीं । ४ ख. ग. धर्म । च. चर्म । ५ क. ख. ग. ङ. च. ' नोन्मनी । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 512

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५०८ अग्निपुराणम् अथाष्टाचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः सङ्ग्रामविजयपूजा ईश्वर उवाच ( ' ॐ डे ख ख्यां सूर्याय ) सङ्ग्रामविजयाय नमः । ह्रां ह्रीं हूं ह्वं ह्रीं ह्नः ॥१ ॥

षडङ्गानि तु सूर्यस्य सङ्ग्रामे जयदस्य हि ॥२ ॥

ॐ हं खं खलौल्काय स्वाहा । ( ` स्यूं हुं हुं क्रूम, ॐ ह्रों क्रेम ॥ ३ ॥

प्रभूतं विमलं सारमाराध्यं परमं सुखम् । ) धर्मं ज्ञानं च वैरोग्यमैश्वर्याद्यष्टकं यजेत् || ४ || अनन्तासनं सिंहासनं पद्मासनमतः परम् । कर्णिका केशराण्येव सूर्यसोमाग्निमण्डलम् ॥५ ॥

दीप्ता सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिर्विमला तथा । अमोघा विद्युता पूज्या नवमी सर्वतोमुखी || ६ || सत्त्वं रजस्तमश्चैवं प्रकृतिं पुरुषं तथा । आत्मानं चान्तरात्मानं परमात्मानमर्चयेत् ॥७ ॥

सर्वे सिन्धुसमायुक्ता मायानिलसमन्विताः । उषा प्रभा च सन्ध्या च साया माया बलान्विताः ॥८ ॥

विन्दुविष्णुसमायुक्ता द्वारपालास्तथाऽष्टकम् । सूर्यं चण्डं प्रचण्डं च पूजयेद्गन्धकादिभिः ॥ पूजया जपहोमाद्यैर्युद्धादौ विजयो भवेत् ॥९ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये सङ्ग्रामविजयपूजाकथनं नामाष्टाचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४८ ॥

अध्याय १४८ संग्राम विजय - -1 पूजा ईश्वर बोले - सङ्ग्राम में विजय प्रदान करनेवाले सूर्य के छह अङ्ग हैं । उनके मन्त्र हैं - ॐ डे ख ख्यां सूर्याय सङ्ग्राम विजयाय नमः । ह्वां ह्रीं ह्रूं ह्रूं ह्रीं ह्नः । ॐ हं खं खशोल्काय स्वाहा । ॐ स्फूं हूं हुं क्रूम् ॐ ह्नों क्रेम् । प्रभूत, विमल, सार, आराध्य, परमसुख, धर्म, ज्ञान और वैराग्य- इस ऐश्वर्याद्यष्टक का पूजन करना चाहिए ॥१-४ ॥ इसके बाद अनन्तासन, सिंहासन, पद्मासन, कर्णिका, केशर, सूर्य, सोम और अग्निमण्डल का यजन करना चाहिए । दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता और सर्वतोमुखी शक्तियाँ भी पूज्य हैं । इसके अनन्तर सत्त्व, रजस्, तमस्, प्रकृति, पुरुष, आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा का पूजन करना चाहिए । सिन्धु से युक्त समी पदार्थ, माया और वायु से सम्बद्ध सभी पदार्थ, उषा, प्रभा, सन्ध्या, साया, माया, बलान्विता, विन्दु और विष्णु से युक्त सभी पदार्थ, द्वारपाल, सूर्य, चण्ड और प्रचण्ड का पूजन सुगन्धित पदार्थ इत्यादि से करना चाहिए । इस प्रकार की पूजा, जप, तप और होम इत्यादि से युद्धादि में विजय होती है ॥५ - ९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में संग्राम विजय पूजा वर्णन नामक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त || १४८ १ ॐ डे ख ” सूर्याय क. ख. ग. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । २ स्कूं हूं परमं सुखम् क. ङ. पुस्कयोर्नास्ति ॥ ३ क. ङ. धूमा । ४ क. ख. ग. घ. ङ. ' र्वे बिन्दु स ' ॥ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 513

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एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ५० ९ अथैकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः लक्षकोटिहोमः ईश्वर उवाच होमाद्रणादौ विजयो राज्याप्तिर्विघ्ननाशनम् अन्तर्जले च गायत्रीं ' जप्त्वा ' षोडशधाऽऽचरेत् । भैक्ष्ययावकभक्षी च फलमूलाशनोऽपि वा यावत्समाप्तिर्भवति लक्षहोमस्य पार्वति सर्वोत्पातसमुत्पत्तौ पञ्चभिर्दशभिर्द्विजैः मङ्गल्यं परमं नास्ति यदस्मादतिरिच्यते । न तस्य शत्रवः संख्ये जातु तिष्ठन्ति कर्हिचित् । राक्षसाद्याश्च शाम्यन्ति सर्वे च रिपवो रणे । शतं चाथ सहस्त्रं वा यथेष्टां भूतिमाप्नुयात् ॥ कृच्छ्रेण शुद्धिमुत्पाद्य प्राणायामशतेन च ॥१ ॥

प्राणायामांश्च पूर्वाह्ने जुहुयात्पावके हविः ॥२ ॥

। क्षीरश ( स ) तुघृताहार एकमाहारमाश्रयेत् ॥३ ॥

। दक्षिणा लक्षहोमान्ते गावो वस्त्राणि काञ्चनम् ॥ ४ ॥

। नास्ति लोके स उत्पातो यो ह्यनेन न शाम्यति ॥५ ॥

कोटिहोमं तु यो राजा कारयेत्पूर्ववद्द्विजैः ॥६ ॥

अतिवृष्टिरनावृष्टिर्मूषकाः शलभाः शुकाः ॥७ ॥

कोटिहोमे तु वरयेद्ब्राह्मणांविंशतिस्तथा ॥८ ॥

कोटिहोमं तु यः कुर्याद्द्विजो भूपोऽथ वा च विट् ॥९ ॥

अध्याय १४ ९ लक्षकोटिहोमवर्णन ईश्वर बोले- होम से युद्धादि में विजय, राज्य - प्राप्ति, विघ्ननाश होता है । आयासपूर्वक सौ बार प्राणायाम करके अपने - आपको शुद्ध करके जल में सोलह बार में हवि की आहुति देनी चाहिए ॥१-२ ॥ इस भोजन करना चाहिए । अयि पार्वति! एक लाख बाद गायें, वस्त्र, सोना दक्षिणा में देना चाहिए को इस प्रकार की दक्षिणा देनी चाहिए । संसार न तो कोई ऐसा माङ्गल्य कर्म ही है जो इससे उसके शत्रु सङ्ग्राम में तनिक भी स्थिर नहीं रह गायत्री का जप करके प्राणायाम करना चाहिए और पूर्वाहण में अग्नि कर्म में भिक्षा से प्राप्त जौ, फल, मूल, दुग्ध और सत्तू का एक बार होमों की समाप्ति तक यही विधि होनी चाहिए । एक लाख होम के ॥ ३-४ ॥ सभी उत्पातों के उत्पन्न होने पर पाँच अथवा दस ब्राह्मणों में कोई भी ऐसा उत्पात नहीं है जो इससे शान्त न हो जाता हो और बढ़कर हो । जो राजा ब्राह्मणों के द्वारा पूर्ववत् कोटि होम कराता है पाते हैं । अतिवृष्टि अनावृष्टि, मूषक, शलभ, शुक और राक्षस इत्यादि तो शान्त ही हो जाते हैं, युद्धस्थल में शत्रु भी शान्त हो जाते हैं ॥५-७३ ॥ कोटि होम में यथाशक्ति बीस, सौ अथवा एक हजार ब्राह्मणों का वरण करना चाहिए । इससे कल्याण की प्राप्ति होती है । कोई भी ब्राह्मण, राजा अथवा वैश्य को कोटि होम करने से अभीष्ट की प्राप्ति हो जाती है और वह सशरीर स्वर्गलोक को पहुँच जाता है ॥८ - ९ ३ ॥ गायत्री, १ अत्रेडभाव आर्षः । २ क. ङ. च. दृष्ट्या । ३ क. ङ. भैक्षयावकभैक्षी । ४ क. ङ. ' नेनानुशा ' । ५ कर्हिचित् एतदग्रे न तस्य मास्कोदेशे व्याधिर्वा जायते क्वचित् इत्यधिकं क. ग. घ. ङ. च. पुस्तकेषु । ६ क. ङ. च. परितो । ७ क. ङ. ' ष्टा ' धृतिमा मा च ष्टाँ भुं ( भू ) मिस्त । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 514

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अग्निपुराणम् ५१० दिवं व्रजेत् । गायत्र्या ग्रहमन्त्रैर्वा ' कूष्माण्डैर्जातवेदसैः ॥ १० ॥

यदिच्छेत्प्राप्नुयात्तत्तत्सशरीरो वैष्णवैः 1 । शाक्तेयैः शाम्भवैः सौरैर्मन्त्रैर्होमार्चनात्ततः ॥ ११ ॥

ऐन्द्रवारुणवायव्ययाम्याग्नेयैश्च

स्याल्लक्षहोमोऽखिलार्तिनुत् । सर्वपीडादि ( वि ) नाशाय कोटिहोमो ऽखिलार्थदः ॥ १२ ॥

अयुतेनाल्पसिद्धिः यवत्बीहितिलक्षीरघृतकुशप्रसातिका: * । पङ्कजोशीरबिल्वाम्रदला ' होमे प्रकीर्तिताः ॥१३ ॥

अष्टहस्तप्रमाणेन कोटिहोमेषु खातकम् । तस्यादर्धप्रमाणेन लक्षहोमे विधीयते ॥१४ ॥

होमोऽयुतेन लक्षेण कोट्याद्याज्यैः प्रकीर्तितः ॥१५ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽयुतलक्षकोटिहोमकथनं नामैकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४ ९ ॥ अथ पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः मन्वन्तराणि अग्निरुवाच मन्वन्तराणि वक्ष्यामि आद्यः स्वायंभुवो मनुः । आग्नीध्राद्यास्तस्य सुता और्वाद्याश्च सप्तर्षय इन्द्रश्चैव शतक्रतुः । पारावताः सतुषिता ग्रह, कूष्माण्ड, जातवेदस, ऐन्द्र, वारुण, वायव्य, याम्य, आग्नेय, वैष्णव, शाक्त बाद दस सहस्र होम करने से अल्प सिद्धि प्राप्त होती है और लक्ष - होम से सभी होम सभी पीड़ाओं का नाशक तथा सभी सिद्धियों को देनेवाला है । इस होम में यमो नाम तदा सुराः ॥ १ ॥

देवा: स्वारोचिषेऽन्तरे ॥ २ ॥

और सौरमन्त्रों से पूजन करने के विपत्तियों का नाश होता है, कोटि प्रयुक्त होनेवाली सामग्रियाँ हैं जौ, धान, तिल, दूध, घी, कुश, पसई ( चावल ), कमल, खस, बिल्व और आम्रपत्र । कोटि होमों में आठ हाथ लम्बा गड्ढा खोदा जाता है और लक्ष होम में उसके आधे परिमाण का । आज्य इत्यादि से दस हजार एक लाख तथा एक करोड़ हवनों का विधान किया गया है ॥१०-१५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अयुतलक्ष कोटि वर्णन नामक एक सौ उनचासवाँ अध्याय समाप्त ॥१४९ ॥

अध्याय १५० मन्वन्तर - वर्णन अग्निदेव बोले - अब मैं मन्वन्तरों का वर्णन करूँगा । स्वायम्भुव मनु आदि मनु थे । आग्नीध्र आदि उसके पुत्र थे और उस समय के देवता यम इत्यादि थे । सप्तर्षि थे और्व इत्यादि और इन्द्र थे शतक्रतु । स्वारोचिष मन्वन्तर में पारावत और सतुषित देवता थे । उस समय के देवेन्द्र थे विपश्चित् और ऊर्ज इत्यादि तत्कालीन द्विज थे । चैत्र १ घ, ‘ ष्माण्डीर्जा ’ । २ क. ङ. ' यव्यां याम्यान्ते याश्च वैष्णवी । शा ' । ३ क. ङ. प्रकाशिकाः । ४ ख. ग. “ दशहो ” । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 515

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पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ५११ ' विपश्चित्तत्र देवेन्द्र ' ऊर्जस्तस्मादयो द्विजाः । सुशान्तिरिन्द्रो देवाश्च सुधामाद्या वशि ( सि ) ष्ठजाः । स्वरूपाद्याः सुरगणाः शिखरि ( री ) न्द्रः सुरेश्वरः । रैवते वितथश्चेन्द्रो अमिताभास्तथा सुराः । ' मनोजवश्चाक्षुषेऽथ ' इन्द्रः स्वात्यागयः सुताः । विवस्वतः सुतो विप्रः श्राद्धदेवो मनुस्ततः । वशि ( सि ) ष्ठः काश्यपोऽथात्रिर्जमदग्निः सगोतमः । इक्ष्वाकुप्रमुखाः पुत्रा अंशेन हरिराभवत् । सत्योहरिर्देववरो वैकुण्ठो वामनः क्रमात् । पूर्वजस्य सवर्णोऽसौ सावर्णिर्भविताऽष्टमः । मुनयो बलिरिन्द्रश्च विरजप्रमुखाः सुताः ।

इन्द्रश्चैवाद्भुतस्तेषां सवनाद्या द्विजोत्तमाः ।

चैत्रकिंपुरुषाः पुत्रास्तृतीयश्चोत्तमो मनुः ॥३ ॥

सप्तर्षयोऽजाद्याः ' पुत्राश्चतुर्थस्तामसो मनुः ॥४ ॥

' ज्योतिर्होमादयो विप्राः नव ख्यातिमुखाः सुताः ॥५ ॥

हिरण्यरोमाद्या मुनयो बलबन्धादयः सुताः ॥६ ॥

सुमेधाद्याः महर्षयः पुरुप्रभृतयः सुताः ॥७ ॥

आदित्यवसुरुद्राद्या देवा " इन्द्रः पुरन्दरः ॥८ ॥

विश्वामित्रभरद्वाजौ मुनयः सप्त साम्प्रतम् ॥९ ॥

स्वायंभुवे मानसोऽभूदजितस्तदनन्तरे ॥१० ॥

छायाजः सूर्यपुत्रस्तु भविता चाष्टमो मनुः ॥११ ॥

सुतपाद्या देवगणा दीप्तिमद्द्रौणिकादयः ॥१२ ॥

नवमो दक्षसावर्णिः पाराद्याश्च तदा सुराः ॥१३ ॥

घृतकेत्वादयः पुत्रा ब्रह्मसावर्णिरित्यतः ॥१४ ॥

आदि किन्नर दूसरे मनु के वंशज थे । तीसरे मनु थे उत्तम ॥१-३ ॥ उस समय इन्द्र थे सुशान्ति और देवता थे सुधाम · इत्यादि । वशिष्ठ पुत्र इत्यादि सप्तर्षि थे और इस मनु के पुत्र थे अज आदि । चौथे मनु थे तामस । उस समय के देवता थे स्वरूप इत्यादि और देवेन्द्र थे शिखरीन्द्र । ज्योतिर्होम इत्यादि नव विप्र थे और उसके पुत्र थे ख्यातिमुख इत्यादि । रैवत मनु के समय में इन्द्र थे वितथ, मनु पुत्र थे अमिताभ, हिरण्यरोम आदि मुनि थे और बलबन्ध इत्यादि पुत्र थे ॥४-६ ॥ चाक्षुष मनु के समय मनोजव इन्द्र थे, स्वाति इत्यादि पुत्र, सुमेध आदि महर्षि और पुरु इत्यादि पुत्र थे । वैवस्वत मनु उसके बाद हुए जो ब्राह्मण और श्राद्ध देवता थे । उस समय देवता थे आदित्य, वसु और रुद्र इत्यादि तथा इन्द्र थे पुरन्दर । वशिष्ठ, काश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज इस समय के सात ऋषि हैं ॥७ - ९ ॥ इक्ष्वाकु इत्यादि उनके पुत्र थे जिनके अंश से विष्णु इत्यादि उत्पन्न हुए । तदनन्तर स्वायम्भुव मनु के समय मानस वंश उत्पन्न हुआ जिसके बाद अजित, सत्य, हरि, देववर, वैकुण्ठ और वामन देव भी उत्पन्न हुए । सूर्य और छाया से उत्पन्न होनेवाले आठवें मनु थे । यह मनु अपने पूर्वज के सवर्ण थे इसलिए उन्हें सावर्णि भी कहा गया है । उसके समय में सुतप इत्यादि देवगण तथा तेजस्वी द्रोणिक इत्यादि मुनि थे । इन्द्र थे बलि और पुत्र थे विरज इत्यादि । नवें मनु दक्ष सावर्णि थे जिनके समय में पार आदि देवता थे ॥१०-१३ ॥ इन्द्र थे अद्भुत और सवनादि ब्राह्मण तथा घृतकेतु इत्यादि पुत्र थे । उसके पश्चात् ब्रह्मसावर्णि नामक मनु हुए जिनके देवगण थे सुख इत्यादि, इन्द्र थे शान्ति, १ विपश्चित्तत्र " द्विजाः च. पुस्तके नास्ति । २ ख. ' र्जस्वन्ताद ' । ३ सप्तर्षयो मनुः क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ४ ख. ग. ' योजिद्याः पु ° । ५ क. ख. ग. ङ. च. शिखिरि । ६ क. ख. ग. ङ. च. ' तिधामा । ७ क. ङ. च. ' ताः । दैवतै वि ' । ८ मनोजवः सुताः च. पुस्तके नास्ति । ९ क. ङ. ' थ पुरुप्रभृतयः । १० सुमेधाद्या सुताः क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । ११ क. ङ. देव इन्द्रः प्रवर्धनः व । १२ क. ङ. न्तरम् । स । १३ छायाजः मनुः क.. ङ च. पुस्तकेषु नास्ति । १४ नवमो " सुराः क. ङ. चः पुस्तकेषु नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 516

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५१२ अग्निपुराणम् सुखादयो देवगणास्तेषां शान्तिः शतक्रतुः । धर्मसावर्णिकश्चाथ विहङ्गाद्यास्तदा सुराः । सर्वत्र गाद्या रुद्राख्यः सावर्णिर्भविता मनुः । ' तपस्याद्याः सप्तर्षयः सुता वै देववन्मुखाः । इन्द्रो दिवस्पतिस्तेषां दानवादि विमर्दनः । मनुश्चतुर्दशो भौत्यः शुचिरिन्द्रो भविष्यति । चतुर्दशस्य भौत्यस्य पुत्रा ऊरुमुखा मनोः । देवा यज्ञभुजस्ते तु ( स्तैस्तु ) भूः ( स्व ) पुत्रैः परिपाल्यते । मन्वाद्याश्च हरिर्वेदं द्वापरान्ते बिभेद सः । एकश्चाऽऽसीद्यजुर्वेदस्तं चतुर्धा व्यकल्पयत् । औद्गात्रं सामभिश्चक्रे ब्रह्मत्वं चाप्यथर्वभिः इन्द्रः प्रमतये प्रादाद्वाष्कलाय च संहिताम् । यजुर्वेदतरोः शाखा सप्तविंशन्महामतिः हविष्याद्याश्च मुनयः सुक्षेत्राद्याश्च तत्सुताः ॥ १५ ॥

गणश्चेन्द्रो निश्चराद्या मुनयः पुत्रका मनोः ॥ १६ ॥

ऋतधामा सुरेन्द्रश्च हरिताद्याश्च देवताः ॥ १७ ॥

मनुस्त्रयोदशो रौच्यः सूत्रामाणादयः सुराः ॥ १८ ॥

निर्मोहाद्याः सप्तर्षयश्चित्रसेनादयः सुताः ॥ १ ९ ॥ चाक्षुषाद्याः सुरगणाः अग्निबाह्लादयो द्विजाः ॥ २० ॥

प्रवर्तयन्ति वेदांश्च भुवि सप्तर्षयो दिवः २ ॥ २१ ॥

ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन्मनवस्तु चतुर्दश ॥ २२ ॥

आद्यो वेदश्चतुष्पादः शतसाहस्त्रसंमितः ॥२३ ॥

आध्वर्यवं यजुर्भिस्तु ऋग्भिहौत्रं तथा मुनिः ॥ २४ ॥

। प्रथमं व्यासशिष्यस्तु पैलो ह्यग्वेदपारगः ॥ २५ ॥

' बौध्यादिभ्यो ददौ सोऽपि चतुर्धा निजसंहिताम् ॥२६ ॥

। वैशम्पायननामाऽसौ व्यासशिष्यश्चकार वै ॥ २७ ॥

मुनि हविष्य इत्यादि और पुत्र थे सुक्षेत्र इत्यादि । तदनन्तर धर्मसावर्णिक नामक मनु हुए । उनके समय में देवता थे विहंग इत्यादि, इन्द्र थे गण, मुनि थे निश्चरादि और पुत्र थे सर्वत्रग इत्यादि । फिर रुद्र सावर्णि नामक मनु हुए जिनके समय में इन्द्र थे ऋतधामा और देवता थे हरित आदि ॥१४-१७ ॥ सप्तर्षि थे तपस्या आदि और पुत्र थे देववत् इत्यादि । तेरहवें मनु थे रौच्य । उनके समय में सूत्रमाणादि देवता थे, इन्द्र थे दिवस्पति जो दानव आदि के नाशक थे । उस समय सप्तर्षि थे निर्मोह आदि और पुत्र थे चित्रसेन इत्यादि । चौदहवें मनु थे भौत्य जिनके समय में शुचि नामक इन्द्र थे । उस समय देवता थे चाक्षुष इत्यादि और द्विज थे अग्निबाह्वादि । चौदहवें मनु भौत्य के पुत्र ऊरुमुख थे जो पृथ्वी पर वेदों का प्रचार करनेवाले थे । दिव इत्यादि सप्तर्षि थे । वे सभी देवता यज्ञभोगी थे और उन मनु के पुत्रों द्वारा पृथ्वी की रक्षा की जाती थी । अये ब्रह्मन्! ब्रह्मा के दिन में चौदह मनु हुए हैं ॥१८-२२ ॥ द्वापर के अन्त में विष्णु ने मनु आदि और वेद का विभाजन किया था । आदि वेद के चार पाद हैं जिसमें एक लाख मन्त्र हैं । एक वेद था यजुर्वेद, जिसके चार भेद किये गये । यजुर्वेद के मन्त्रों को आध्वर्यव, ऋग्वेद के मन्त्रों को हौत्र, सामवेद के मन्त्रों को औद्गात्र और अथर्ववेद के मन्त्रों को ब्रह्म कहा जाता है । व्यास के प्रथम शिध्य पैल ऋग्वेद में पारङ्गत थे ॥२३-२५ ॥ इन्द्र ने बुद्धिमान् वाष्कल को एक संहिता प्रदान की जिसने अपनी संहिता को चार भागों में विभक्त करके बौध्य इत्यादि को दे दिया । व्यास के शिष्य बुद्धिमान् वैशम्पायन ने यजुर्वेद वृक्ष की सत्ताईस शाखाएँ इन्हीं शाखाओं को याज्ञवल्क्य इत्यादि ऋषियों ने काण और वाजसनेयी आदि कहा है । व्यास के शिष्य जैमिनि कर दीं ।ने १ क. ङ. च. “ पसाद्याः स ’ । २ क. ङ. च. द्विजाः । ३ इन्द्र संहिताम् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ४ बौध्यादिभ्यो संहिताम् च. पुस्तके नास्ति । " निज-CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 517

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एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ५१३ काण्वा वाजसनेयाद्या याज्ञवल्क्यादिभिः स्मृताः । सामवेदतरोः शाखा व्यासशिष्यः स जैमिनिः

सुमन्तुश्च ' सुकर्मा च एकैकां संहितां ततः । गृह्णते च सुकर्माख्यः ॥ २८ ॥

सुमन्तुश्चाथर्वतरुं सहस्रं संहितां गुरुः ॥२९ ॥

व्यासशिष्यो विभेद तम् । शिष्यानध्यापयामास पैप्पलादीन्सहस्रशः पुराणसंहितां चक्रे सूतो व्यासप्रसादतः ॥३० ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये मन्वन्तरवर्णनं नाम पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥३१ ॥

॥१५० ॥

अथैकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः वर्णेतरधर्माः अग्निरुवाच मन्वादयो भुक्ति मुक्ति ( क्ती ) ' धर्मांश्चीर्त्वाऽऽप्नुवन्ति यान् । प्रोचे परशुरामाय वरुणोक्तं तु ( क्तांस्तु ) पुष्करः ॥१ ॥

पुष्कर उवाच वर्णाश्रमेतराणां ते धर्मान्वक्ष्यामि सर्वदान् । मन्वादिभिर्निगदितान्वासुदेवादितुष्टिदान् ॥२ ॥

अहिंसा सत्यवचनं दया भूतेष्वनुग्रहः । ' तीर्थानुसरणं दानं ब्रह्मचर्यममत्सरः ॥३ ॥

सामवेद की शाखाओं का विभाजन किया था । सुमन्तु और सुकर्मा ने एक - एक संहिता को लेकर उसे हजार शाखाओं में विभक्त कर दिया । व्यास - शिष्य सुमन्तु ने अथर्ववेद तरु को शाखाओं में विभक्त करके पैप्पल आदि सहस्रों शिष्यों को उनका अध्यापन करा दिया । व्यास की कृपा से सूत ने पुराण - संहिता की रचना की ॥ २६-३१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में मन्वन्तर वर्णन नामक एक सौ पचासवाँ अध्याय समाप्त ॥१५० ॥

अध्याय १५१ वर्णेतर धर्मों का वर्णन अग्निदेव बोले - मनु इत्यादि भुक्ति, मुक्ति और धर्मों को कहकर जिन धर्मों को प्राप्त करते हैं उन वर्णोंक्त धर्मों को पुष्कर ने परशुराम से कहा था । पुष्कर बोले- मैं तुमसे वर्णाश्रम धर्मों से भिन्न उन धर्मों को कहूँगा जो सब - कुछ देनेवाले, मनु इत्यादि के द्वारा कहे हुए और वासुदेव इत्यादि देवताओं को प्रसन्न करनेवाले हैं । अये भृगूत्तम! ये धर्म हैं - अहिंसा, सत्य, दया, प्राणियों पर अनुग्रह, तीर्थाटन, दान, ब्रह्मचर्य, अमत्सर, देवता, द्विज और गुरुजनों की सेवा, सभी धर्मों का श्रवण, पितृपूजन, १ क. ङ. सुनामा । २ क. ङ. ' धर्माश्चान्ताष्ट्रवद्विपान् । प्रो ' । ३ क. ङ. च. ' वक्ष्येऽथ स ' । ४ तीर्थानुसरणं " मत्सरः क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ३३ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 518

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अग्निपुराणम् ५१४ देवद्विजातिशुश्रूषा गुरूणां च भृगूत्तम । भक्तिश्च नृपतौ नित्यं तथा सच्छास्त्रनेत्रता । वर्णाश्रमाणां सामान्यं धर्माधर्मं समीरितम् ) । प्रतिग्रहं चा ( हश्चा ) ध्ययनं विप्रकर्माणि निर्दिशेत् ) क्षत्रियस्य सवैश्यस्य कर्मेदं परिकीर्तितम् कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यस्य परिकीर्तितम् मौञ्जी बन्धनतो जन्म विप्रादेश्च द्वितीयकम् चण्डालो ब्राह्मणीपुत्रः शूद्राश्च प्रतिलोमतः पुक्कसः क्षत्रियापुत्रः शूद्रात्स्यात्प्रतिलोमजः । " वैश्यायां प्रतिलोमेभ्यः प्रतिलोमाः सहस्रशः ‘ चण्डालकर्मं निर्दिष्टं वध्यानां घातनं तथा सूतानामश्वसारथ्यं पुक्कसानां च व्याधता ' श्रवणं सर्वधर्माणां पितॄणां पूजनं तथा ॥ ४ ॥

( ' आनृशंस्यं तितिक्षा च तथा चाऽऽस्तिक्यमेव च ॥५ ॥

( ' यजनं याजनं दानं वेदाद्यध्यापनक्रिया ॥ ६ ॥

। दानमध्ययनं चैव यजनं च यथाविधि ॥ ७ ॥

। क्षत्रियस्य विशेषेण पालनं दुष्टनिग्रहः ॥८ ॥

। शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा सर्व शिल्पानि वाऽप्यथ ॥९ ॥

। अनुलोम्येन वर्णानां जातिर्मातृसमा स्मृता ॥१० ॥

। ( ' सूतस्तु क्षत्रियाज्जातो वैश्याद्वै देवलस्तथा ॥११ ॥

) मागधः स्यात्तथा वैश्याच्छूद्रादायोगवो भवेत् ॥ १२ ॥

। विवाहः सदृशैस्तेषां नोत्तमैर्नाधमैस्तथा ॥१३ ॥

। स्त्रीजीवनं तु तद्रक्षा प्रोक्तं वैदेहकस्य च ॥१४ ॥

। स्तुतिक्रिया मागधानां तथा चाऽऽयोगवस्य च ॥ १५ ॥

रङ्गावतरणं प्रोक्तं तथा शिल्पैश्च जीवनम् । बहिर्ग्राम विवासश्च मृतचेलस्य धारणम् ॥१६ ॥

न संस्पर्शस्तथैवान्यैश्चण्डालस्य विधीयते । ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा देहत्यागोऽत्र यः कृतः ॥१७ ॥

राजा में निरन्तर भक्ति, अच्छे - अच्छे शास्त्रों का चिन्तन, आनृशंस्य, तितिक्षा और आस्तिक्य । इस प्रकार वर्णाश्रमों के सामान्य धर्म और अधर्म को कहा गया है ॥ २-५३ ॥ यजन, याजन, दान, वेदादि अध्ययन, अध्यापन और प्रतिग्रह ये ब्राह्मणों के धर्म हैं । क्षत्रिय और वैश्य का सामान्य कर्म है दान, अध्ययन और यथाविधि यजन ॥ ६-७ ॥ क्षत्रिय का विशेष धर्म है प्रजा का पालन और दुष्ट - निग्रह । वैश्य का विशेष कर्म है कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य । शूद्र का कर्म है द्विजों की सेवा अथवा सभी प्रकार के शिल्प ॥८ - ९ ॥ ब्राह्मण आदि का मौञ्जी बन्धन से दूसरा जन्म होता है । अनुलोम विवाह से उत्पन्न होने पर वर्णों की जाति माता के समान होती है । शूद्र पुरुष और ब्राह्मणी पत्नी के प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न होनेवाला पुत्र चाण्डाल कहलाता है । क्षत्रिय पिता और ब्राह्मणी माता से उत्पन्न पुत्र ' देवल ' कहलाता है । शूद्र पुरुष और क्षत्रियजातीया स्त्री के प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न पुत्र पुक्कस कहलाता है । शूद्र पुरुष और वैश्यजातीया स्त्री से उत्पन्न पुत्र मागध कहलाता है ॥१०-१२ ॥ वैश्यजातीया स्त्री में प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न हजारों प्रतिलोम सम्भव हैं इसलिए समान वर्णों में ही विवाह होना चाहिए, उत्तम तथा अधम जातिवालों में परस्पर विवाह नहीं होना चाहिए । चाण्डाल का कर्म वध्यों का वध करना बताया गया है । वैदेहक का कर्म है स्त्रियों का जीवन और उनकी रक्षा सूतों का कर्म है । अश्वों का सारथ्य पुक्कसों का कर्म है, आखेट मागधों का कर्म है स्तुति क्रिया और आयोगव का कर्म रङ्गावतरण तथा शिल्प से जीवनयापन करना है ॥१३-१५३ ॥ उन्हें गाँव के बाहर रहकर मृतकों के वस्त्रों को धारण करना चाहिए । चाण्डाल का स्पर्श दूसरों के द्वारा नहीं होना चाहिए । ब्राह्मणों के लिए अथवा गायों के लिए जो शरीर-१ आनृशंस्यं “ समीरितम् पुस्तके नास्ति । २ वजनं निर्दिशेत् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ३ क. ङ. “ तः । शूद्रस्य क्ष ’ । ४ सूतस्तु प्रतिलोमजः पुस्तके नास्ति । ५ क. ङ. " यां प्रति । ६ चण्डालकर्म तथा क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ७ सूतानाम् " व्याधता । क. ङ पुस्तकयोर्नास्ति । ८ च. वध्यता । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 519

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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ५१५ स्त्रीबालाद्युपपत्तौ वा बाह्यानां सिद्धिकारणम् । संकरे जातयो ज्ञेयाः पितुर्मातुश्च कर्मतः ॥१८ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये वर्णेतरधर्मवर्णनं नामैकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥

अथ द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः गृहस्थवृत्तिः पुष्कर उवाच आजीवं तु यथोक्तेन ब्राह्मणः स्वेन कर्मणा । क्षत्रविट्शूद्रधर्मेण जीवन्नेव तु शूद्रजात् ॥ १ ॥

कृषिवाणिज्यगौरक्ष्यं कुसीदं च द्विजश्चरेत् । गोरसं गुडलवणलाक्षामांसानि वर्जयेत् ॥२ ॥

भूमिं भित्त्वौषधीश्छित्त्वा हत्त्वाकीटपिपीलिकान् । पुनन्ति खलु यज्ञेन कर्षकादेवपूजनात् ॥३ ॥

' हलमष्टगवं धर्मं षड्गवं जीवितार्थिनाम् । चतुर्गवं नृशंसानां द्विगवं धर्मघाटिनाम् ॥४ ॥

ऋतामृताभ्यां जीवेत मृतेन प्रमृतेन वा । सत्यानृताभ्यामपि वा न श्ववृत्या कदाचन ॥५ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये गृहस्थवृत्तिवर्णनं नाम द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥१५२ ॥

त्याग किया जाता है अथवा जो देह त्याग स्त्री और बालक इत्यादि की रक्षा के लिए किया जाता है वह सिद्धियों का कारण होता है । माता और पिता के कर्म से वर्ण - सङ्कर जातियाँ उत्पन्न होती हैं ॥ १६-१८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में वर्णेतरधर्म वर्णन नामक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त ॥१५१ ॥

अध्याय १५२ गृहस्थवृत्ति पुष्कर बोले- ब्राह्मण को अपनी जीविका का निर्वाह उपर्युक्त ब्राह्मणों के कर्मों के द्वारा ही करना चाहिए । अथवा उसे क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के धर्मों से भी निर्वाह करना चाहिए, किन्तु कभी भी केवल शूद्रों का कर्म नहीं करना चाहिए । ब्राह्मण के द्वारा कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा और लेन - देन तो करना चाहिए किन्तु गोरस, गुड़, लवण, लाक्षारस और मांस का परित्याग कर देना चाहिए ॥१-२ ॥ भूमि को तोड़ने में, वनस्पतियों को काटने से कीड़ों और चींटियों की जो हत्या होती है, उसकी पवित्रता के लिए यज्ञ कराना चाहिए । किसान देव - पूजन से ही इन पापों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है । हल में आठ बैलों को जोतना धर्म है, छह बैलों को जीविकोपार्जन करनेवालों के द्वारा जोता है । क्रूर जनों के द्वारा चार बैलों को हल में जोता जाता है । धर्म का हनन करनेवालों के द्वारा हल में केवल दो बैल ही जोते जाते हैं । ऋत और अमृत के द्वारा ही जीवित रहना चाहिए अथवा मृत, प्रमृत, सत्य और अनृत के द्वारा भी जीविकोपार्जन किया जा सकता है किन्तु कुत्ते के समान कभी भी जीवनयापन नहीं करना चाहिए ॥३-५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में गृहस्थवृत्ति - वर्णन नामक एक सौ बावनवाँ अध्याय समाप्त ॥१५२ ॥

१ हलमष्टगवं " जीवितार्थिनाम् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 520

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अग्निपुराणम् ५१६ अथ त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मचर्याद्याश्रमधर्माः पुष्कर उवाच धर्ममाश्रमिणां वक्ष्ये भुक्तिमुक्तिप्रदं शृणु । षोडशर्तुर्निशाः स्त्रीणामाद्यास्तिस्त्रस्तु गर्हिताः || १ || ब्रजेद्युग्मासु पुत्रार्थी ' कर्मा ss धानिकमिष्यते । गर्भस्य स्पष्टताज्ञाने ' सवनं स्पन्दनात्पुरा ॥२ ॥

षष्टेऽष्टमे वा ` सीमन्तं पुत्रीयं नामभं शुभम् । अच्छिन्ननाड्यां कर्तव्यं जातकर्म विचक्षणैः ॥३ ॥

अशौचे तु व्यतिक्रान्ते नामकर्म विधीयते । शर्मान्तं ब्राह्मणस्योक्तं वर्मान्तं क्षत्रियस्य तु || ४ || गुप्तदासात्मकं नाम प्रशस्तं वैश्यशूद्रयोः । बालं निवेदयेद्भर्त्रे तव पुत्रोऽयमित्युत ॥५ ॥

यथाकुलं तु चूड़ाकृद्ब्राह्मणस्योपनायनम् । गर्भाष्टमोऽष्टमे वाऽब्दे गर्भादेकादशे नृपे ॥ ६ ॥

गर्मात्तु द्वादशे वैश्ये षोडशाब्दादितो नहि । मुञ्जानां वल्कलानां तु क्रमान्मौञ्ज्यः प्रकीर्तिताः || ७ || मार्गवैयाघ्रवास्तानि चर्माणि व्रतचारिणाम् । पर्णपिप्पलबिल्वानां क्रमाद्दण्डाः प्रकीर्तिताः ॥ ८ ॥

केशदेशललाटास्यतुल्याः प्रोक्ताः क्रमेण तु । अवक्राः सत्वचः सर्वे ' नाग्निप्लुष्टास्तु दण्डकाः ॥९ ॥

वासोपवीते कार्पासक्षौमोर्णानां यथाक्रमम् । आदिमध्यावसानेषु भवच्छब्दोपलक्षितम् ॥१० ॥

अध्याय १५३ ब्रह्मचर्यादि आश्रम धर्मों का वर्णन पुष्कर बोले - अब मैं आश्रमों में रहनेवाले मनुष्यों के उस धर्म को बतलाऊँगा जो भोग और मोक्ष देनेवाला है, उसे सुनो । स्त्रियों के ऋतुकाल से सोलह रात्रियाँ ( गर्भाधान के लिए ) शुभ मानी गयी हैं किन्तु प्रथम तीन रात्रियाँ ( सहवास के लिए ) निन्दित • बतायी गयी हैं ॥१ ॥ पुत्रकामी को युग्म रात्रियों में सहवास करना चाहिए । अब ( गर्भाधान ) कर्म के सम्बन्ध में बतलाया जा रहा

है । गर्भ के स्पष्ट ज्ञान होने पर उसके स्पन्दन के अनुभव होने के पूर्व ही पुंसवन - संस्कार करना चाहिए ॥२ ॥ छठें तथा आठवें

मास में सीमन्तोन्नयन शुभ माना गया है । विद्वानों के द्वारा जातकर्म नाल कटने के पहले ही होना चाहिए ॥३ ॥ अशौच के समाप्त

होने पर नामकरण - संस्कार किया जाता है । ब्राह्मण के नाम के अन्त में ' शर्मा ', क्षत्रिय के नाम के अन्त में ' वर्मा ' तथा वैश्य और शूद्र के नामों के अन्त में क्रमशः ' गुप्त ' और ' दास ' शब्दों का प्रयोग होता है ॥४-४ ३ ॥ तदनन्तर यह ' तुम्हारा पुत्र हैं ' ऐसा कहकर पति को पुत्र का समर्पण करना चाहिए । तदनन्तर कुलरीति के अनुसार चूड़ाकर्म होना चाहिए । ब्राह्मण का उपनयन - संस्कार गर्भाधान अथवा जन्म के आठवें वर्ष में कर देना चाहिए । क्षत्रिय का उपनयन गर्भाधान के ग्यारहवें वर्ष में होना चाहिए ॥५-६ ॥ वैश्य का उपनयन बारहवें वर्ष में किन्तु उसे सोलहवें वर्ष के बाद तक कभी भी स्थगित नहीं करना चाहिए । मेखलाएँ वर्णों के क्रम से मुञ्ज अथवा वल्कल आदि की बतायी गयी हैं || ७ || चर्म क्रमशः मृग अथवा व्याघ्र इत्यादि के बताये गये हैं । ब्रह्मचारियों के दण्ड वर्णानुसार पर्ण, पीपल और बेल के बताये गये हैं । इन दण्डों की लम्बाई वर्णानुक्रम से केश - स्थान, ललाट अथवा मुख तक होती है । दण्डों को सीधा छाल - युक्त और अग्नि के द्वारा बिना जला हुआ होना चाहिए । वर्णानुक्रम से वस्त्र और उपवीत, कपास, रेशम और ऊन का होना चाहिए । ब्रह्मचर्यों के द्वारा भिक्षाटन में ' भवत् ' शब्द का प्रयोग क्रमशः आदि, मध्य और अन्त में होना चाहिए ॥८-१० ॥ १ क. ङ. कर्मभावकभि । २ क. ङ. ' तास्थाने वमनस्यंदना ' । ३ क. ङ. मन्तक्षत्रियं । ४ ख. ग. घ. नाविप्लु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA