अग्नि पुराण — पृष्ठ 531–540
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 531–540
पृष्ठ 531
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ५२७ जुहुयादाहुतीः सम्यक्सर्वत्रैव चतुस्त्रयः अन्नेन दध्ना मधुना तथा मांसेन पूरयेत् । अथवा द्वादशाहेन सर्वमेतत्समापयेत् । तथा द्वादशके श्राद्धे कार्यं तदधिकं भवेत् । प्रेताय तत ऊर्ध्वं च तस्यैव पुरुषत्रये । सम्पूज्य दत्त्वा पृथिवी समाना ' इति चाप्यथ । प्रेतपात्रं च पात्रेषु तथैव विनियोजयेत् । मन्त्रवर्जमिदं कर्म शूद्रस्य तु विधीयते । श्राद्धं कुर्याच्च प्रत्यब्दं प्रेते कुम्भान्नमब्दकम् । शक्या गणयितुं लोके न त्वतीताः पितामहाः । देवत्वे यातनास्थाने प्रेतः श्राद्धं कृतं लभेत् । भृग्वग्निपाशकाम्भोभिर्मृतानामात्मघातिनाम् ॥ (? ) पिण्डनिर्वपणं कुर्यात्प्राग्वदेव पृथक्पृथक् ॥२१ ॥
मध्ये चेदधिमासः स्यात्कुर्यादभ्यधिकं तु तत् ॥२२ ॥
संवत्सरस्य मध्ये च यदि स्यादधिमासकः ॥२३ ॥
' संवत्सरे समाप्ते तु श्राद्धं श्राद्धवदाचरेत् ॥२४ ॥
पिण्डान्विनिर्वपेत्तद्वच्चतुरस्तु समाहितः ॥२५ ॥
योजयेत्प्रेतपिण्डं तु पिण्डेष्वन्येषु भार्गव ॥ २६ ॥
पृथक्पृथक्प्रकर्तव्यं कर्मैतत्कर्मपात्रके ॥२७ ॥
सपिण्डीकरणं स्त्रीणां कार्यमेवं तदा भवेत् ॥ २८ ॥
गङ्गायाः सिकता धारा यथा वर्षति वासवे ॥२९ ॥
काले सततगस्थैर्य नास्ति तस्मात्क्रियां चरेत् ॥ ३० ॥
नोपकुर्यान्नरः शोचन्प्रेतस्याऽऽत्मन एव वा ॥ ३१ ॥
पतितानां च नाऽऽशौचं विद्युच्छस्त्रहताश्च ये ॥ ३२ ॥
सर्वत्र बारह आहुतियाँ देनी चाहिए और पहले के समान अलग - अलग पिण्डदान भी करना चाहिए ॥१८-२१ ॥ इन पात्रों को अन्न, दही, मधु तथा मांस से भर देना चाहिए, किन्तु यदि बीच में अधिकमास पड़ जाय तो एक आहुति अधिक देनी चाहिए अथवा इन सभी कृत्यों को बारहवें दिन भी किया जा सकता है । वर्ष के बीच में अधिक मास आ जाने से बारहवें मास में एक श्राद्ध अधिक करना चाहिए, अन्यथा बारह दिनों में ही इस समस्त कार्य को समाप्त कर देना चाहिए । बारहवें श्राद्ध में ही अधिक श्राद्ध कर दिया जाता है । वर्ष की समाप्ति पर पहले के समान ही श्राद्ध करना चाहिए ॥ २२-२४ ॥ जिसके निमित्त श्राद्ध किया जाता है, उसकी तीन पीढ़ियों के लिए तीन पिण्डों का निर्वाप करके चौथे पिण्ड का निर्वाप उसके लिए किया जाता है । उसके पूजन करके ' पृथिवी समाना ' इत्यादि मन्त्र से प्रेतपिण्ड को अन्य पिण्डों में मिलाना चाहिए । इसी प्रकार प्रेतपात्र को भी अन्य पात्रों में मिला देना चाहिए । अलग - अलग पात्रों में अलग - अलग कर्मों को करना चाहिए ॥ २५-२७ ॥ शूद्र को यह कर्म बिना मन्त्र के ही करना चाहिए । स्त्रियों का भी सपिण्डीकरण करना चाहिए । प्रत्येक वर्ष यह श्राद्ध करना चाहिए और प्रतिवर्ष अन्न से परिपूर्ण घड़ा भी पितरों को अर्पित करना चाहिए । जिस प्रकार गङ्गा की रेती अथवा वर्षा से बढ़ी हुई धारा के विन्दुओं की गणना नहीं की जा सकती है उसी प्रकार इस लोक में मरे हुए पितरों की भी गणना नहीं की जा सकती है । इसलिए जितनी जल्दी - जल्दी सम्भव हो, श्राद्ध करना चाहिए जिससे पितरों को प्रेतलोक में किसी प्रकार का कष्ट न होने पाये । मनुष्य को श्राद्ध करते समय शोक नहीं करना चाहिए ॥२८-३१ ॥ पर्वत से कूदकर, अग्नि, पाश, जल से आत्महत्या करनेवालों तथा विद्युत् और शस्त्रों से मृत्यु होने पर कुटुम्बियों १ संवत्सरे श्राद्धवदाचरेत् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । २ क. ङ. हुति । ३ क. ङ. ' तगाम्भीर्ये ना ' । ४ क. ङ. चरेत् । ख. भवेत् । ग. जपेत् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 532
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५२८ अग्निपुराणम् यतिव्रतिब्रह्मचारिनृपकारुकदीक्षिताः । मैथुने कूटधूमे च सद्यः स्नानं विधीयते ) । न च शूद्रं द्विजेनापि तयोर्दोषो हि जायते । सङ्ग्रामे जयमाप्नोति प्रेतेऽनाथे च काष्ठदः । परिक्रम्य ततः स्नानं कुर्युः सर्वे सवाससः । द्वार्यश्मनि पदं दत्त्वा प्रविशेयुस्तथा गृहम् । ` पृथक् शयीरन्मभूमौ च क्रीतलघ्वा ( घ्व ) शनो भवेत् । सिद्धार्थकैस्तिलैर्विद्वान्मज्जेद्वासोऽपरं दधत् । कार्यो नैवाग्निसंस्कारो नैव चास्योदकक्रिया । अस्थिसंचयनातूर्ध्वमङ्गस्पर्शो विधीयते इत्यादिमहापुराण आग्नेये शावाशौचकथनं ( ' राजाज्ञाकारिणो ये च स्नायाद्वै प्रेतगाम्यपि ॥३३ ॥
द्विजं न निर्हरेत्प्रेतं शूद्रेण तु कथञ्चन ॥ ३४ ॥
अनाथविप्रप्रेतस्य वहनात्स्वर्गलोकभाक् ॥ ३५ ॥
संकल्प्य बान्धवं प्रेतमपसव्येन तां चितिम् ॥ ३६ ॥
प्रेताय च तथा दद्युस्त्रींस्त्रींश्चैवोदकाञ्जलीन् ॥३७ ॥
अक्षतान्निक्षिपेद्वह्नौ निम्बपत्रं विदश्य च ॥ ३८ ॥
एकः पिण्डः दशाहे तु श्मश्रुकर्मकरः शुचिः ॥ ३ ९ ॥ अजातदन्ते तनये शिशौ गर्भश्रुते तथा ॥४० ॥
चतुर्थे च दिने कार्यस्तथाऽस्थनां चैव संचयः ॥४१ ॥
॥४२ ॥
नाम सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥१५७ ॥
को अशौच नहीं होता है । शव के साथ जानेवाले यती, व्रती, ब्रह्मचारी, राजा, शिल्पी, दीक्षित तथा राजकर्मचारियों को ( शवदाह के पूर्व ही ) स्नान कर लेना चाहिए । मैथुन के बाद तथा चिता का धुआँ लगने के बाद तुरन्त ही स्नान करना चाहिए । ब्राह्मण के शव को शूद्रों को नहीं ले जाना चाहिए तथा शूद्र के शव को ब्राह्मणों के द्वारा नहीं ले जाना चाहिए क्योंकि इससे दोनों को दोष होता है किन्तु अनाथ ब्राह्मण के शव को ले जाने से शूद्र स्वर्ग का भागी हो जाता है ॥३२-३५ ॥ अनाथ व्यक्ति के मर जाने पर उसकी चिता में लकड़ी लगानेवाले को संग्राम में विजय प्राप्त होती है । चिता में आग लगाकर मृतक के बान्धवों को अपनी बायीं ओर से चिता की परिक्रमा करके वस्त्रों के सहित स्नान करना चाहिए । शव दाह के समय उपस्थित लोगों में से प्रत्येक को मृतक के लिए तीन - तीन जलाञ्जलियाँ देनी चाहिए । श्मशान - स्थल से घर पहुँचकर पहले द्वार पर पत्थर से अपने चरण - तल को रगड़कर घर में प्रवेश करना चाहिए । पहले नीम की पत्तियों को चबाकर अक्षतों को जल मे फेंक देना चाहिए । रात में ( स्त्री से ) अलग सोकर नित्य खरीदा हुआ तथा सूक्ष्म आहार करना चाहिए । दसवें दिन पिण्डदान तथा क्षौर कर्म करने से शुद्धि होती है । विद्वान् व्यक्ति को सफेद सरसों और तिलों के साथ दूसरा वस्त्र धारण करके मज्जन करना जिस बालक की मृत्यु दाँत निकलने से पहले होती है अथवा जिसका गर्भपात हुआ हो ऐसे शिशु का न तो चाहिए दाह- । संस्कार ही होता है और न तो उसे जलाञ्जलि ही दी जाती है । चौथे दिन मृतक की अस्थियों का सञ्चय करना चाहिए अस्थिसञ्चय के बाद अङ्गस्पर्श का विधान बताया गया है ॥३६-४२ ॥ । श्री अग्निमहापुराण में शावाशौच - कथन नामक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय समाप्त ॥१५७॥
१ राजाज्ञाकारिणो विधीयते क. । पुस्तके नास्ति । २ क. ङ. ' तशाम्यति । मैं । ख. ग. ' तमास्पति । मै ं । ३ पृथक् ” शुचिः क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 533
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ५२ ९ अथाष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः स्रावाद्यशौचम् पुष्कर उवाच ' स्त्रावाशौचं प्रवक्ष्यामि मन्वादिमुनिसंमतम् चातुर्मासिकपातान्ते दशाहं पञ्चमासतः । अष्टाहेन तु शूद्रस्य द्वादशाहादतः परम् । न स्नानं हि सपिण्डे स्यात्त्रिरात्रं सप्तमाष्टयोः । आचूडादेकरात्रं स्यादाव्रताच्च त्रिरात्रकम् । अन् तु मृते कृतचूडेऽर्भके तथा । न क्षत्रिये शुद्धिस्त्रिभिर्वैश्ये मृते तथा ॥ रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्रावे त्र्यहेण वा ॥१ ॥
राजन्ये च चतूरात्रं वैश्ये पञ्चाहमेव च ॥२ ॥
स्त्रीणां विशुद्धिरुदिता स्नानमात्रेण वै पितुः ॥३ ॥
(? ) सद्यः शौचं सपिण्डानामादन्तजननात्तथा ॥४ ॥
दशरात्रं भवेदस्मान्मातापित्रोस्त्रिरात्रकम् ' ॥५ ॥
प्रेते न्यूने त्रिभिर्वर्षैर्मृते शुद्धिस्तु नैशिकी ॥६ ॥
शुद्धिः शूद्रे पञ्चभिः स्यात्प्राग्विवाहाद्द्विषट् त्वहः ॥७ ॥
अध्याय १५८ स्रावाशौच -कथन - व पुष्कर बोले- अब मैं गर्भपात से उत्पन्न अशौच के सम्बन्ध में बतलाऊँगा, जो कि मनु इत्यादि मुनियों के द्वारा कहा गया है । यदि गर्भपात चौथे महीने में हो तो अशौच - काल केवल तीन दिनों तक रहता है, किन्तु यदि इसके बाद यह दुर्घटना घटित हो तो अशौच दस दिन तक रहता है । उपर्युक्त स्थिति में क्षत्रिय के लिए चार और वैश्य के लिए पाँच दिनों तक अशौच रहता है । ऐसी स्थिति में शूद्रों का अशौच आठ दिनों तक रहता है । गर्भपात से स्त्री का अशौच तो बारह दिन तक चलता है, किन्तु पिता स्नानमात्र से ही शुद्ध हो जाता है ॥ १-३ ॥ पिता के सपिण्डों को स्नान की आवश्यकता नहीं होती है, किन्तु उसकी सात या आठ पीढ़ियों के व्यक्तियों को तीन रातों तक अशौच रहता है । जिस बच्चे के दाँत नहीं निकलते हैं, उसकी मृत्यु पर सपिण्डों का अशौच तुरन्त ही समाप्त हो जाता है, चूड़ाकरण संस्कार के पहले मृत्यु होने से एक रात्रि तक और ब्रह्मचर्य आश्रम में जाने से पूर्व मृत्यु होने पर अशौच तीन रात्रियों तक रहता है । सामान्य रूप से बालक की मृत्यु पर माता - पिता का अशौच दस रात तक रहता है, किन्तु चूड़ाकरण संस्कार के बाद भी यदि बालक की मृत्यु दाँत निकलने के पहले हो जाती है तो यह अशौच तीन रातों में ही समाप्त हो जाता है । तीन वर्ष से कम अवस्थावाले बालक की मृत्यु पर एक रात में ही शुद्धि हो जाती है ॥४-६ ॥ क्षत्रिय बालक के मरने पर उसके सपिण्डों की शुद्धि दो दिन पर, वैश्य बालक के मरने पर उसके सपिण्डों की तीन दिन पर, तथा शूद्र बालक की मृत्यु हो तो उसके सपिण्डों की पाँच दिनों पर शुद्धि होती है । शूद्र बालक यदि विवाह के पहले मर जाय तो उसे बारह दिनों का अशौच लगता है । जिस अवस्था में १ क. ख. ग. च. ' च । शावा ' । २ ग. ' म् । सजा । ३ क. ग. च. त्र्यहेन ( ण ) । ३४ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 534
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५३० अग्निपुराणम् ( यत्र त्रिरात्रं विप्राणामशौचं संप्रदृश्यते । द्वयब्दे नैवाग्निसंस्कारो मृते तं निखनेद्भुवि । जातदन्तस्य वा कार्या स्यादुपनयनाद्दश । हीने हीनतरे चैव त्र्यहश्चतुरहस्तथा । क्षत्रियो नवसप्ताहाच्छुध्येद्विप्रो गुणैर्युतः । दशाहाच्छुध्यते विप्रो द्वादशाहेन भूमिपः । गुणोत्कर्षे दशाहाप्तौ त्र्यहमेकाहकं त्र्यहे । दासान्तेवासिभृतकाः शिष्याश्चैकत्रवासिनः । मरणादेव कर्तव्यं संयोगो यस्य नाग्निभिः । ब्राह्मण को तीन रात का अशौच लगता है, उसी में तत्र शूद्रे द्वादशाहः षण्नवक्षत्रवैश्ययोः ॥८ ॥
न चोदकक्रिया तस्य नाम्नि चापि कृते सति ॥९ ॥
एकाहाच्छुध्यते विप्रो योऽग्निवेदसमन्वितः ॥१० ॥
पञ्चाहे नाग्निहीनस्तु दशाहाद्ब्राह्मणब्रुवः ॥११ ॥
दशाहात्सगुणो वैश्यो विंशाहाच्छूद्र एव च ॥ १२ ॥
वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति ॥ १३ ॥
एकाहाप्तौ सद्यः ' शौचं सर्वत्रैवं समूहयेत् ॥१४ ॥
स्वामितुल्यमशौचं स्यान्मृते पृथक्पृथग्भवेत् ॥१५ ॥
दाहादूर्ध्वमशौचं स्याद्यस्य वैतानिको विधिः ॥ १६ ॥
शूद्र के लिए बारह दिन का अशौच लगता है । क्षत्रिय के लिए छह दिन, वैश्य के लिए नौ दिनों का अशौच लगता है । दो वर्ष के बालक का अग्नि द्वारा दाहसंस्कार नहीं होता, उसकी मृत्यु होने पर उसे धरती में गाड़ देना चाहिए । उसके लिए बान्धवों को उदक - क्रिया ( जलाञ्जलि - दान ) नहीं करनी चाहिए । अथवा जिसका नामकरण हो गया हो या जिसके दाँत निकल आये हों, उसका दाहसंस्कार तथा उसके निमित्त जलाञ्जलि - दान करना चाहिए । उपनयन के पश्चात् बालक की मृत्यु हो तो दस दिन का अशौच लगता है । जो प्रतिदिन अग्निहोत्र तथा तीनों वेदों का स्वाध्याय करता है, ऐसा ब्राह्मण एक दिन में ही शुद्ध हो जाता है । जो उससे हीन और हीनतर है, अर्थात् जो दो अथवा एक वेद का स्वाध्याय करनेवाला है, उसके लिए तीन एवं चार दिन में शुद्ध होने का विधान है । जो अग्निहोत्र कर्म से रहित है, वह पाँच दिन में शुद्ध होता है । जो केवल ' ब्राह्मण ’ नामधारी है ( वेदाध्ययन या अग्निहोत्र नहीं करता ) वह दस दिन में शुद्ध होता है ॥७-११ ॥ गुणवान् ब्राह्मण सात दिन में शुद्ध होता है । गुणवान् क्षत्रिय नौ दिन में, वैश्य दस दिन में तथा शूद्र बीस दिन में शुद्ध होता है । साधारण ब्राह्मण दस दिन में, साधारण क्षत्रिय बारह दिन में, साधारण वैश्य पन्द्रह दिन में और साधारण शूद्र एक मास में शुद्ध होता है । गुणों की अधिकता होने पर यदि दस दिन का अशौच प्राप्त हो तो वह तीन ही दिन तक रहता है, तीन दिनों तक का अशौच प्राप्त हो तो वह एक ही दिन रहता है तथा एक ही दिन का अशौच प्राप्त हो तो उसमें तत्काल की शुद्धि का विधान है । इसी प्रकार सर्वत्र ऊहा कर लेनी चाहिए । दास, छात्र, भृत्य और शिष्य - ये यदि अपने स्वामी अथवा गुरु के साथ रहते हों तो गुरु अथवा स्वामी की मृत्यु होने पर इन सब को स्वामी एवं गुरु के कुटुम्बीजनों के समान ही पृथक् - पृथक् अशौच लगता है । जिसका अग्नि से संयोग न हो अर्थात् जो अग्निहोत्र न करता हो, उसे सपिण्ड पुरुषों की मृत्यु होने के बाद ही तुरन्त अशौच लगता है, परन्तु जिसके द्वारा नित्य अग्निहोत्र का अनुष्ठान होता हो, उस पुरुष को किसी कुटुम्बी या जातिबन्धु की मृत्यु होने पर जब उसका दाह - संस्कार सम्पन्न हो जाता है, उनके बाद अशौच प्राप्त होता है ॥१२-१६ ॥ सभी वर्ण के लोगों का अशौच एक तिहाई समय बीत १ ङ. सदा । २ क. ङ. ते वाऽपि पृथक् - पृथक् । म ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 535
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः सर्वेषामेव वर्णानां त्रिभागात्स्पर्शनं ' भवेत् । चतुर्थे पञ्चमे चैव सप्तमे नवमे तथा । अहस्त्वदत्तकन्यासु प्रदत्तासु त्र्यहं भवेत् । पितृगोत्रं कुमारीणां व्यूढानां भर्तृगोत्रता ' । दशाहोर पित्रोश्च दुहितुर्मरणे त्र्यहम् । एकाहतो ह्या विवाहादूर्ध्वं हस्तोदकात्र्यहम् । दशाहाच्छुध्यते विप्रो जन्महानौ स्वयोनिषु । एतज्ज्ञेयं सपिण्डानां वक्ष्ये चानौरसादिषु । परपूर्वासु च स्त्रीषु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते । जाने पर शारीरिक स्पर्श का अधिकार प्राप्त हो जाता ५३१ त्रिचतुष्पञ्चदशभिः स्पृश्यवर्णाः क्रमेण तु ॥१७ ॥
अस्थिसंचयनं कार्यं वर्णानामनुपूर्वशः ॥१८ ॥
पक्षिणी संस्कृतास्वेव स्वस्त्रादिषु विधीयते ॥१९ ॥
जलप्रदानं पित्रे च उद्वाहे चोभयत्र तु ॥२० ॥
सद्यः शौचं सपिण्डानां पूर्वं चूडाकृतेर्द्विज ॥२१ ॥
पक्षिणी भ्रातृपुत्रस्य सपिण्डानां च सद्यतः (? ) ॥२२ ॥
षड्भिस्त्रिभिरहै ( है ) केन क्षत्रविट्शूद्रयोनिषु ॥२३ ॥
अनौरसेषु पुत्रेषु भार्यास्वन्यगतासु च ॥ २४ ॥
वृथा संकरजातानां प्रव्रज्यासु च तिष्ठताम् ॥ २५ ॥
है । इस नियम के अनुसार ब्राह्मण आदि वर्ण क्रमशः तीन-चार, पाँच तथा दस दिन के अनन्तर स्पर्श करने योग्य हो जाते हैं । ब्राह्मण आदि वर्णों का अस्थिसञ्चय क्रमशः चार, पाँच, सात तथा नौ दिनों पर करना चाहिए ॥१७-१८ ॥ जिस कन्या का वाग्दान नहीं किया गया है, यदि उसकी मृत्यु हो जाय तो बन्धु - बान्धवों को एक दिन का अशौच लगता है । जिसका वाग्दान हो गया है, किन्तु विवाह नहीं हुआ है, उस कन्या के मरने पर तीन दिन का अशौच लगता है । यदि ब्याही हुई बहन या पुत्री आदि की मृत्यु हो तो दो दिन एक रात का अशौच लगता है । कुमारी कन्याओं का वही गोत्र है, जो पिता का है । जिनका विवाह हो गया है, उन कन्याओं का गोत्र वह है जो उनके पति का है । विवाह हो जाने पर कन्या की मृत्यु हो तो उसके लिए जलाञ्जलि - दान का कर्त्तव्य पिता पर भी लागू होता है, पति पर तो है ही । तात्पर्य यह कि विवाह होने पर पिता और पति - दोनों कुलों में जल - दान की क्रिया प्राप्त होती है । यदि दस दिनों के बाद और चूड़ाकरण के पहले कन्या की मृत्यु हो तो माता - पिता को तीन दिन का अशौच लगता है और सपिण्ड पुरुषों की तत्काल ही शुद्धि होती है । चूड़ाकरण के बाद वाग्दान के पहले तक उन्हें तीन दिन का अशौच प्राप्त होता है । तत्पश्चात् उस कन्या के भतीजों को दो दिन एक रात का अशौच रहता है, किन्तु अन्य सपिण्ड पुरुषों की तत्काल शुद्धि होती है । ब्राह्मण सजातीय पुरुषों के यहाँ जन्म - मरण में सम्मिलित हो तो दस दिन में शुद्ध होता है और क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के यहाँ जन्म-मृत्यु में सम्मिलित होने पर क्रमशः छह, तीन तथा एक दिन में शुद्ध होता है ॥१९ -२३ ॥ यह जो सपिण्ड सम्बन्धी नियम निश्चित किया गया है, वह सपिण्ड पुरुषों से ही सम्बन्ध रखता है, ऐसा जानना चाहिए । अब जो औरस नहीं हैं, ऐसे पुत्र आदि के विषय में बताऊँगा । औरस - भिन्न क्षेत्रज, दत्तक आदि पुत्रों के मरने पर तथा जिसने अपने को छोड़कर दूसरे पुरुष से सम्बन्ध जोड़ लिया हो अथवा जो दूसरे पति को छोड़कर आयी हो और अपनी भार्या बनकर रहती हो, ऐसी स्त्री के मरने पर तीन रात में अशौच की निवृत्ति होती है । स्वधर्म का त्याग करने के कारण जिनका जन्म व्यर्थ हो गया है, जो वर्णसंकर सन्तान हो अर्थात् नीचवर्ण के पुरुष और उच्चवर्ण की स्त्री से जिसका जन्म १ ख. ' थक्स्वकं भवे । २ ख. ग. त्रकम् । ज ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 536
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५३२ अग्निपुराणम् आत्मनस्त्यागिनां चैव निवर्तेतोदकक्रिया । एकाहः सूतके तत्र ' मृतके तु द्वयहो ( हं ) भवेत् । बाले देशान्तरस्थे च पृथक्पिण्डे च संस्थिते । दशाहेन सपिण्डास्तु शुध्यन्ति प्रेतसूतके । सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते । जन्मनामस्मृते वै तत्तत्परं गोत्रमुच्यते । यच्छेषं दशरात्रस्य तावदेवाशुचिर्भवेत् । संवत्सरे व्यतीते तु स्पृष्ट्वैवापो विशुध्यति मृते जामातरि प्रेते दौहित्रे भगिनीसुते मातामह्यां तथाऽऽचार्ये मृते मातामहे त्र्यहम् उपसर्गमृतानां च दाहे ब्रह्मविदां तथा मात्रैकया द्विपितरौ भ्रातरावन्यगामिनौ ॥ २६ ॥
सपिण्डानामशौचं हि समानोदकतां वदे ॥ २७ ॥
सवासा जलमाप्लुत्य सद्य एव विशुध्यति ॥ २८ ॥
त्रिरात्रेण सकुल्यास्तु स्नानाच्छुध्यन्ति गोत्रिणः ॥ २ ९ ॥ समानोदकभावस्तु निवर्तेताऽऽचतुर्दशात् ॥ ३० ॥
विगतं तु विदेशस्थं शृणुयाद्यो ह्यनिर्दशम् ॥ ३१ ॥
अतिक्रान्ते दशाहे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥३२ ॥
। मातुले पक्षिणी रात्रिः शिष्यत्विग्बान्धवेषु च ॥ ३३ ॥
। श्यालके तत्सुते चैव स्नानमात्रं विधीयते ॥ ३४ ॥
। दुर्भिक्षे राष्ट्रसम्पाते आगतायां तथाऽऽपदि ॥ ३५ ॥
। सत्रिव्रति ब्रह्मचारिसङ्ग्रामे देशविप्लवे ॥३६ ॥
हुआ हो, जो संन्यासी बनकर इधर - उधर घूमते - फिरते रहे हों और जो अशास्त्रीय विधि से विधि - बन्धन आदि के द्वारा प्राण - त्याग कर चुके हों, ऐसे लोगों के निमित्त बान्धवों को जलाञ्जलि - दान नहीं करना चाहिए, उनके लिए उदक - क्रिया निवृत्त हो जाती है । एक ही माता द्वारा दो पिताओं से उत्पन्न जो दो भाई हों, उनके जन्म में सपिण्ड पुरुषों को एक दिन का अशौच लगता है और मरने पर दो दिन का । यहाँ तक सपिण्डों का अशौच बताया गया है । अब ' समानोदक ' का बता रहा हूँ ॥ २४-२७ ॥ दाँत निकलने से पहले बालक की मृत्यु हो जाय, कोई सपिण्ड पुरुष देशान्तर में रहकर मरा हो और उसका समाचार सुना जाय तथा किसी असपिण्ड पुरुष की मृत्यु हो जाय तो इन सब अवस्थाओं में ( नियत अशौच का काल बिताकर ) वस्त्र सहित जल में डुबकी लगाने पर तत्काल ही शुद्धि हो जाती है । मृत्यु तथा जन्म के अवसर पर सपिण्ड पुरुष दस दिनों में शुद्ध होते हैं । एक कुल के असपिण्ड पुरुष तीन रात में शुद्ध होते हैं और एक गोत्रवाले पुरुष स्नान करने मात्र से शुद्ध हो जाते हैं । सातवीं पीढ़ी में सपिण्ड भाव की निवृत्ति हो जाती है और चौदहवीं पीढ़ी तक समानोदक सम्बन्ध भी समाप्त हो जाता है । किसी के मत में जन्म और नाम का स्मरण न रहने पर अर्थात् हमारे कुल में अमुक पुरुष हुए थे, इस प्रकार जन्म और नाम दोनों का ज्ञान न रहने पर समानोदक भाव निवृत्त हो जाता है । इसके बाद केवल गोत्र का सम्बन्ध रह जाता है । जो दशाह बीतने के पूर्व परदेश में रहनेवाले किसी जाति - बन्धु की मृत्यु का समाचार सुन लेता है, उसे दशाह में जितने दिन शेष रहते हैं, उतने ही दिन का अशौच लगता है । दशाह बीत जाने पर उक्त समाचार सुने तो तीन रात का अशौच प्राप्त होता है ॥२८-३२ ॥ मृत्यु का समाचार एक वर्ष बाद प्राप्त होने पर जल का स्पर्श करके ही शुद्धि हो जाती है । माता, बहन, शिष्य, ऋत्विग् और बान्धवों की मृत्यु पर अशौच - काल एक रात तक ही रहता है । जामाता, नाती, भाजे, साले और साले के पुत्र की मृत्यु पर शुद्धि के लिए केवल स्नान का ही विधान किया गया है । नाना और नानी की मृत्यु पर अशौच तीन दिनों तक चलता है । दुर्भिक्ष के समय, राष्ट्र के नष्ट हो जाने पर, विपत्ति आने से, बीमारी से, जलकर मरने से, ब्रह्मविद् की मृत्यु पर सत्र करनेवाले, व्रती और ब्रह्मचारी की मृत्यु पर, युद्ध में देश १ ङ. ' के न तथा भ ' । २ ख. ग. ' कजं व ' । ३ ङ. ह्यहर्निशः । ४ ङ. मित्रे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 537
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः दाने यज्ञे विवाहे च सद्यः शौचं विधीयते । असाध्यव्याधियुक्तस्य स्वाध्याये चाक्षमस्य च अपमानात्तथा क्रोधात्स्नेहात्परिभवाद्भयात् । आत्मघाती चैकलक्षं वसेत्स नरकेऽशुचौ । त्रिरात्रं तत्र चाशौचं द्वितीयेचास्थिसंचयम् (: ) । विद्युदग्निहतानां च त्र्यहं शुद्धिः सपिण्डके । पितृमात्रादिपाते तु आर्द्रवासा ह्युपोषितः । यः कश्चित्तु हरेत्प्रेतमसपिण्डं कथंचन । यद्यन्नमत्ति तेषां तु दशाहेनैव शुध्यति । अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजातयः । प्रेतीभूतं द्विजः शूद्रमनुगच्छंस्त्र्यहाच्छुचिः । वर्जयेत्तदहोरात्रं दानश्राद्धादिकामतः । ५३३ विप्रगोनृपहन्तृणामनुक्तं चाऽऽत्मघातिनाम् ॥३७ ॥
। प्रायश्चित्तमनुज्ञातमग्नितोयप्रवेशनम् ॥३८ ॥
उद्बध्य म्रियते नारी पुरुषो वाककथंचन ॥३९ ॥
वृद्धः ' श्रौतस्मृतेर्लुप्तः परित्यजति यस्त्वसून् (: ) ॥४० ॥
तृतीये तूदकं कार्यं चतुर्थे श्राद्धमाचरेत् ॥४१ ॥
पाषण्डाश्रिता भर्तृघ्न्यो नाशौचोदकगाः स्त्रियः ॥४२ ॥
अतीतेऽब्दे प्रकुर्वीत प्रेतकार्यं यथाविधि ॥४३ ॥
स्नात्वा सचैलं स्पृष्टाग्नि घृतं प्राश्य विशुध्यति ॥४४ ॥
अनदन्नन्नमत्रैव न वै तस्मिन्गृहे वसेत् ॥४५ ॥
पदे पदे यज्ञफलं शुद्धिः स्यात्स्नानमात्रतः ॥४६ ॥
मृतस्य बान्धवैः सार्धं कृत्वा च परिदेवनम् ॥ ४७ ॥
शूद्रायाः प्रसवो गेहे शूद्रस्य मरणं तथा ॥ ४८ ॥
में विप्लव होने पर तथा दान, यज्ञ या विवाह में मृत्यु होने पर तुरन्त ही शुद्धि हो जाती है । गोहत्वा करनेवाले, राजहत्या करनेवाले, ब्रह्महत्या करनेवाले और आत्महत्या करनेवाले की मृत्यु होने पर किसी प्रकार अशौच नहीं लगता है ॥३३-३७ ॥ असाध्य व्याधि से युक्त और स्वाध्याय में असमर्थ व्यक्ति के लिए प्रायश्चित्त है - अग्नि तथा जल में प्रवेश । अपमान के कारण, क्रोध के कारण, स्नेह के कारण और पराजय के कारण जो स्त्री अथवा पुरुष फाँसी लगाकर आत्महत्या करता है, वह एक लाख वर्ष तक अपवित्र नरक में रहता है । वृद्ध तथा श्रौत और स्मार्त कर्मों से रहित व्यक्ति की मृत्यु पर तीन रातों तक अशौच रहता है । इनके लिए दूसरे दिन अस्थि - संचय, तीसरे दिन जलक्रिया और चौथे दिन श्राद्धकर्म करना चाहिए ॥३८-४१ ॥ विद्युत् और अग्नि से किसी की मृत्यु होने पर सपिण्ड तीन दिनों में शुद्ध हो जाता है । पाखण्डिनी, अपने पतियों का हनन करनेवाली स्त्रियों की मृत्यु पर किसी प्रकार का अशौच नहीं लगता है । पिता और माता के द्वारा परित्यक्त पुत्र उनकी मृत्यु का समाचार सुनने पर स्नान करने से ही पवित्र हो जाता है और ऐसे पुत्र के द्वारा अपने माता - पिता का श्राद्ध एक वर्ष बाद करना चाहिए । जो व्यक्ति किसी असपिण्ड व्यक्ति के शव का वहन करता है वह वस्त्रों के सहित स्नान करने से और घृत चखने से ही शुद्ध हो जाता है ॥४२-४४ ॥ मृतक के घर में अन्नग्रहण करनेवाले दस दिनों में शुद्ध होते हैं और जो लोग उसके यहाँ अन्न नहीं खाते वे एक ही दिन में शुद्ध हो जाते हैं । किन्तु उन लोगों को मृतक के घर नहीं रहना चाहिए । अनाथ ब्राह्मण के शव को वहन करनेवाले ब्राह्मण पद - पद पर यज्ञ फल प्राप्त करते हैं और उनकी शुद्धि स्नानमात्र से ही हो जाती है । शूद्र के शव के पीछे चलनेवाला ब्राह्मण तीन दिनों में शुद्ध होता है और मृतक के बान्धवों के साथ विलाप करनेवाला भी तीन दिनों में शुद्ध होता है । अगर किसी ब्राह्मण के घर में शूद्रा को प्रसव होता है अथवा उसके घर में किसी शूद्र की मृत्यु होती है तो उसे उस रात और दिन में दान और श्राद्धादि का वर्जन करना चाहिए । इन परिस्थितियों १ ग. ' द्धः शोचस्मृ ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 538
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५३४ अग्निपुराणम् भाण्डानि तु परित्यज्य त्र्यहाभूलेपतः शुचिः । ( ` नयेत्प्रेतं स्नापितं च पूजितं कुसुमैर्दहेत् । गोत्रजस्तु गृहीत्वा तु चितां चाऽऽरोपयेत्तदा । अनाहिताग्निरेकेन लौकिकेनापरस्तथा । असौ स्वर्गाय लोकाय मुखाग्नि प्रददेत्सुतः । एवं मातामहाचार्यप्रेतानां चोदकक्रिया । अपानः शोशुचदयं दशाहं च सुतोऽर्पयेत् । वैश्ये पञ्चदश प्रोक्ता शूद्रे त्रिंशत्प्रकीर्तिताः । विदश्य निम्बपत्राणि नियतो द्वारि वेश्मनः । प्रविशेयुः समालभ्य कृत्वाऽश्मनि पदं शनैः " क्रीतलब्धाशनाः स्नाता आदिकर्त्ता दशाहकृत् न विप्रं श्वेषु तिष्ठत्सु मृतं शूद्रेण नाययेत् ' ॥४९ ॥
नग्नदेहं दहेन्नैव किञ्चिद्देहं परित्यजेत् ॥५० ॥
आहिताग्निर्यथान्यायं दग्धव्यस्त्रिभिरग्निभिः ) ॥ ५१ ॥
अस्मात्त्वमभिजातोऽसि त्वदयं जायतां पुनः ॥ ५२ ॥
सकृत्प्रसिञ्चत्यु ( न्त्यु ) दकं नामगोत्रेण बान्धवाः ॥५३ ॥
कामोदकं सखीप्रेतस्वस्त्रीयश्वशुरर्त्विजाम् ॥५४ ॥
ब्राह्मणे दश पिण्डाः स्युः क्षत्रिये द्वादश स्मृताः ॥ ५५ ॥
पुत्रो वा पुत्रिकाऽन्यो वा पिण्डं दद्याच्च पुत्रवत् ॥५६ ॥
आचम्य चाग्निमुदकं गोमयं गौरसर्षपान् ॥ ५७ ॥
। अक्षारलवणन्नाः स्युर्निर्मांसा भूमिशायिनः ॥५८ ॥
। अभावे ब्रह्मचारी तु कुर्यात्पिण्डोदकादिकम् ॥५९ ॥
में बरतनों को फेंककर भूमि को लीप देने से ही तीन दिनों में शुद्धि होती है । ब्राह्मण के सजातीय लोगों के रहने पर उसके शव का वहन शूद्रों द्वारा नहीं करना चाहिए ॥४५-४९ ॥ शव को स्नान कराकर और पुष्प इत्यादि से उसकी पूजा करके उसका दाह करना चाहिए । शव को बिल्कुल नगा करके दाह करना चाहिए और दाह के समय कुछ शरीर को छोड़ देना चाहिए । किसी व्यक्ति की मृत्यु पर सगोत्र उसे ले जाकर चिता पर रख देता है और वह चिता आहिताग्नि, अनाहिताग्नि और लौकिकाग्नि नामक तीन अग्नियों से जला दी जाती है । मृतक के पुत्र को मुख सबसे पहले यह कहते हुए आग लगानी चाहिए कि ' तुम इसी से उत्पन्न हुए हो, तुम इसी में पुनः मिल जाओ । यह अग्नि तुम्हें स्वर्गलोक ले जाय । ' तदनन्तर मृतक के बान्धवों को मृतक का नाम तथा उसके गोत्र का नाम लेकर उसके ऊपर जल छिड़क देना चाहिए ॥५०-५३ ॥ इस प्रकार नाना और आचार्य की मृत्यु पर जलाञ्जलि दी जाती है । इसके अतिरिक्त मित्र, बहन के श्वशुर और ऋत्विजों की मृत्यु पर भी तर्पण किया जाता है । तर्पण करते समय यह मन्त्र पढ़ना चाहिए कि ‘ जल इसे पवित्र करे, ' ' मैं अमुक का पुत्र हूँ । ' ब्राह्मण के लिए दस और शूद्र के लिए तीस पिण्डों का विधान है । पिण्डदान पुत्र या पुत्रिका आदि पुत्र की तरह कर सकते हैं । दाहकर्म करने के बाद मृतक के पुत्रों तथा बान्धवों को घर लौटकर द्वार पर नीम के पत्तों को चबाकर अग्नि, जल, गोबर और सफेद सरसों का स्पर्श करके तथा धीरे से किसी पत्थर के ऊपर अपने पैर रगड़कर घर में प्रवेश करना चाहिए । मृतक के सम्बन्धियों को क्षार और लवण से रहित तथा निरामिष भोजन करना चाहिए तथा भूमि पर शयन करना चाहिए ॥५४-५८ नित्य खरीदकर भोजन करना चाहिए और स्नान करना चाहिए । यह कर्म दस दिनों तक चलता है । जिस व्यक्ति ॥ ने १ ग. नार्चये । २ नयेत्प्रेतं व्यस्त्रिभिरग्निभिः क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ३ ग. ' पार्थाः स्युः । ४ क्रीतलब्धाशनाः दशाहकृत् च. पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 539
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ५३५ यथेदं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते ( ' सर्वेषां शावमाशौचं मातापित्रोश्च सूतकम् । पुत्रजन्मदिने श्राद्धं कर्तव्यमिति निश्चितम् । मरणं मरणेनैव सूतकं सूतकेन तु सूतके मृतकं चेत्स्यान्मृतके त्वथ सूतकम् समानं लध्वशौचं तु प्रथमेन समापयेत् शावान्तः शाव आयाते पूर्वाशौचेन शुध्यति मृतके सूतके वाऽपि रात्रि मध्येऽन्यदापतेत् । प्रभाते यद्यशौचं स्याच्छुध्येरंश्च त्रिभिर्दिनैः चिता में आग लगायी हो, उसी को दसवें दिन श्राद्ध । जननेऽप्येवमेव स्यान्निपुणां शुद्धिमिच्छताम् ॥६० ॥
मातुकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ॥ ६१ ॥
तदहस्तत्प्रदानार्थं गोहिरण्यादिवाससाम् ॥६२ ॥
। उभयोरपि यत्पूर्वं तेनाऽऽशौचेन शुध्यति ॥ ६३ ॥
। तत्राधिकृत्य मृतकं शौचं कुर्यान्न सूतकम् ॥६४ ॥
। असमानं द्वितीयेन धर्मराजवचो यथा ॥६५ ॥
। गुरुणा लघु बाध्येत लघुना नैव तद्गुरु ॥ ६६ ॥
तच्छेषेणैव शुध्येरन् रात्रिशेषे द्वयहाधिकात् ॥६७ ॥
। उभयत्र दशाहानि कुलस्यान्नं न भुज्यते ॥ ६८ ॥
कर्म करना चाहिए । यदि श्राद्ध के उपयुक्त सामग्री का अभाव हो तो ब्रह्मचर्य रखकर पिण्डदान तथा तर्पण क्रिया कर देनी चाहिए । सपिण्डों में जो अशौच मृत्यु से होता है, वही जन्म से भी होता है । कम - से - कम विशेष शुद्धि की इच्छा करनेवालों को तो इस प्रकार के अशौच को मानना ही चाहिए । मृत्यु से उत्पन्न होनेवाला अशौच सभी कुटुम्बियों को होता है, किन्तु जन्म से उत्पन्न अशौच माता - पिता को ही लगता है । पिता की शुद्धि आचमन करने से ही हो जाती है । पुत्र - जन्म के दिन निश्चित रूप से श्राद्ध करना चाहिए और उस दिन ब्राह्मणों आदि के लिए गो, स्वर्ण और वस्त्रादि का दान करना चाहिए । मरण का अशौच मरण के साथ और सूतक का सूतक के साथ निवृत्त होता है । दोनों में जो पहला अशौच है, उसी के साथ दूसरे की भी शुद्धि होती है ॥ ५ ९ -६३ ॥ जननाशौच में मरणाशौच हो अथवा मरणाशौच में जननाशौच हो जाय तो मरणाशौच के अधिकार में जननाशौच को भी निवृत्त मानकर अपनी शुद्धि का कार्य करना चाहिए । जननाशौच के साथ मरणाशौच की निवृत्ति नहीं होती । यदि एक समान दो अशौच हों ( अर्थात् जन्मसूतक में जन्मसूतक और मरणाशौच में मरणाशौच पड़ जाय ) तो प्रथम अशौच के साथ दूसरे को भी समाप्त कर देना चाहिए और यदि असमान अशौच हो ( अर्थात् जननाशौच में मरणाशौच और मरणाशौच में जननाशौच हो ) तो द्वितीय अशौच के साथ प्रथम को निवृत्त करना चाहिए, ऐसा धर्मराज का वचन है । मरणाशौच के भीतर दूसरा मरणाशौच आने पर वह पहले अशौच के साथ निवृत्त हो जाता है । गुरु अशौच से लघु अशौच बाधित होता है, लघु से गुरु अशौच का बाध नहीं होता है । मृतक अथवा सूतक में यदि अन्तिम रात्रि के मध्यभाग में दूसरा अशौच आ पड़े तो उस शेष समय में ही उसकी भी निवृत्ति हो जाने के कारण सभी सपिण्ड पुरुष शुद्ध हो जाते हैं । यदि रात्रि के अन्तिम भाग में दूसरा अशौच आवे तो दो दिन अधिक बीतने पर अशौच की निवृत्ति होती है तथा यदि अन्तिम रात्रि बिताकर अन्तिम दिन के प्रातःकाल अशौचान्तर प्राप्त हो तो तीन दिन और अधिक बीतने पर सपिण्डों की शुद्धि होती है । दोनों ही प्रकार के अशौचों में दस दिनों तक उस कुल का अन्न नहीं खाया जाता है । अशौच में दान आदि का भी अधिकार नहीं रहता । अशौच में किसी १ सर्वेषां " महोऽन्य ( हरन्य ) था क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
पृष्ठ 540
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५३६ अग्निपुराणम् दानादि विनिवर्तेत भोजने कृत्यमाचरेत् । अज्ञाते पातकं नाऽद्ये भोक्तुरेकमहोऽन्य ( हरन्य ) था ॥ ६ ९ ॥ इत्यादिमहापुराण आग्नेये शावाशौचकथनं नामाष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥
अथैकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः असंस्कृतादिशौचम् पुष्कर उवाच संस्कृतस्यासंस्कृतस्य स्वर्गो मोक्षो हरिस्मृतेः । अस्थ्नां गङ्गाम्भसि क्षेपात्प्रेतस्याभ्युदयो भवेत् ॥ १ ॥
गङ्गातोये नरस्यास्थि ' यावतावद्दिविस्थितिः । आत्मनस्त्यागिनां नास्ति पतितानां तथा क्रिया || २ || तेषामपि तथा ' गाङ्गे तोयेऽस्थनां पतनं हितम् । तेषां दत्तं जलं चान्नं गगने तत्प्रलीयते || ३ ||
अनुग्रहेण महता प्रेतस्य पतितस्य च । नारायणबलिः कार्यस्तेनानुग्रहमश्नुते ॥४ ॥
अक्षयः पुण्डरीकाक्षस्तत्र दत्तं न नश्यति । पतनात्त्रायते यस्मात्तस्मात्पात्रं जनार्दनः ४ || ५ || पततां भुक्तिमुक्तत्यादिप्रद एको हरिर्ध्रुवम् । दृष्ट्वा लोकान्प्रियमाणान्सहायं धर्ममाचरेत् ॥६ ॥
के यहाँ भोजन करने पर प्रायश्चित्त करना चाहिए । अनजान में भोजन करने पर पातक नहीं लगता, जान - बूझकर खानेवालों को एक दिन का अशौच प्राप्त होता है ॥६४-६९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में स्त्रावाशौच कथन नामक एक सौ अठावनवाँ अध्याय समाप्त ॥१५८ ॥
अध्याय १५ ९ असंस्कृतादि - शौच पुष्कर बोले - संस्कृत अथवा असंस्कृत दोनों को हरिस्मरण से स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है । गङ्गाजल में मृतक की अस्थियों को फेंकने से उसकी अभ्युन्नति होती है । मनुष्य की अस्थियाँ जब तक गङ्गाजल में रहती हैं तब तक उसकी स्थिति स्वर्गलोक में बनी रहती है । आत्महत्या करनेवालों तथा पतितों के लिए इन क्रियाओं को नहीं करना चाहिए, तथापि गङ्गाजल में उनकी अस्थियों के रहने से उनका हित तो होता ही है, उनके लिए दिया गया अन्न और जल आकाश में विलीन हो जाता है ॥ १-३ ॥ पतित मृतक के लिए नारायणबलि क्योंकि नारायण के महान् अनुग्रह से उसे उसका कुछ अंश प्राप्त हो जाता है । भगवान् पुण्डरीकाक्ष करनी चाहिए, उन्हें जो भी दिया जाता है उसका ( भी ) नाश नहीं होता है । जनार्दन को पात्र इसलिए अक्षय हैं, अतः वह ( पापों में ) गिरने से रक्षा किया करते हैं । निश्चय ही केवल भगवान् कहा जाता है क्योंकि प्रदान करनेवाले हैं । लोक को नष्ट होता हुआ देखकर विष्णु ही पतितों को भोग और मोक्ष १ क. ङ. यावानार्वङ्गिरःस्थि सहायता रूप धर्म का आचरण करना चाहिए ॥४-६ ॥ भुक्तिमुक्ती हि पदमेको । ' । २ क. ङ. ‘ था गङ्गातोये ह्यापतनं हि । ३ क. ङ. कार्यः स्नेहानु ' । ४ क. “ नः । प्रेतनं CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA