अग्नि पुराण — पृष्ठ 541–550
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 541–550
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एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ५३७ मृतोऽपि बान्धवः शक्तो नानुगन्तुं नरं मृतम् । जायावर्जं हि सर्वस्य याम्यः पन्था विभिद्यते ॥७ ॥
धर्म एको व्रजत्येनं यत्रक्वचनगामिनम् । श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चाऽऽपराह्निकम् ॥८ ॥
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वाऽस्य न वा कृतम् । ' क्षेत्रापणगृहासक्तमन्यत्रगतमानसम् ॥९ ॥
वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति । न कालस्य प्रियः कश्चिद्वेष्यश्चास्य न विद्यते ॥१० ॥
आयुष्ये कर्मणि क्षीणे प्रसह्य हरते जनम् । नाप्राप्तकालो म्रियते विद्धः शरशतैरपि ॥ ११ ॥
कुशाग्रेणापि संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति । औषधानि न मन्त्रान्द्यास्त्रायन्ते मृत्युनाऽन्वितम् ॥१२ ॥
वत्सवत्प्राकृतं कर्म कर्तारं विन्दति ध्रुवम् । अव्यक्तादि व्यक्तमध्यमव्यक्तनिधनं जगत् ॥१३ ॥
कौमारादि यथा देहे तथा देहान्तरागमः । नवमन्यद्यथा वस्त्रं गृह्णात्येवं शरीरकम् ॥
` देही नित्यमवध्योऽयं यतः शोकं ततस्त्यजेत् ॥१४ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽसंस्कृतादिशौचकथनं नामैकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१५९ ॥
मरे हुए व्यक्ति का अनुगमन उसके बान्धव मरकर भी नहीं कर सकते हैं । जाया को छोड़कर सभी के लिए यम के मार्ग भिन्न - भिन्न हो जाते हैं । केवल धर्म ही मनुष्य का अनुगमन करता है, फिर वह चाहे कहीं भी ( नरक या स्वर्ग ) जानेवाला हो । अतः जो ( धर्म ) कल होनेवाला है उसे आज ही कर लेना चाहिए और जिसे अपराह्न में करना हो उसे पूर्वाह्न में ही कर डालना श्रेयस्कर है । मृत्यु किसी के लिए यह प्रतीक्षा नहीं करती है कि उसने यह कर्म किया है अथवा नहीं । चाहे कोई व्यक्ति खेत, दुकान या घर में आसक्त हो अथवा अन्यत्र मन लगाया हुआ हो, मृत्यु आकर उसे उसी प्रकार उठा ले जाती है, जैसे भेड़िया भेड़ को उठा ले जाता है । मृत्यु के लिए न कोई शत्रु है न मित्र ॥७-१० ॥ अतः वह आयु और कर्म के क्षीण हो जाने पर हठात् मनुष्य का अपहरण कर ले जाती है । जिसकी मृत्यु नहीं है वह सैकड़ों बाणों से बींधे जाने पर भी मृत्यु को प्राप्त नहीं हो सकता है, किन्तु जिसका काल आ गया है वह कुशाग्र के स्पर्श से भी जीवित नहीं रहता है । मृत्यु से ग्रसित मनुष्य की न तो ओषधि ही रक्षा कर सकती है और न मन्त्र इत्यादि । किया हुआ कर्म ( गाय के पीछे दौड़नेवाले ) बछड़े के समान कर्त्ता के पीछे लगा रहता है । संसार केवल मध्य में ही व्यक्त है, उसका आदि और अन्त तो अव्यक्त ही रहता है । शरीर में जिस प्रकार कौमार्य आदि अवस्थाएँ हैं वैसे ही दूसरा शरीर प्राप्त करना ( मृत्यु ) है । आत्मा नवीन वस्त्र की भाँति दूसरा शरीर ग्रहण करनेवाली हुआ करती है, क्योंकि वह स्वयं तो नित्य और अवध्य है । अतएव मृत्यु पर शोक नहीं करना चाहिए ॥११-१४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में असंस्कृतादिशौचवर्णन नामक एक सौ उनसठवाँ अध्याय समाप्त ॥१५९ ॥
१ क. ङ. क्षेत्रपरगृ । २ देही " ततस्त्यजेत् ङ. पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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५३८ अग्निपुराणम् अथ षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः वानप्रस्थाश्रमः पुष्कर उवाच वानप्रस्थयतीनां च धर्मं वक्ष्ये यथा शृणु । जटित्वमग्निहोत्रित्वं ' भूशय्याऽजिनधारणम् ॥१ ॥
व वासः पयोमूलनीवारफलवृत्तिता । प्रतिग्रहनिवृत्तिश्च त्रिः स्नानं ब्रह्मचारिता || २ || देवातिथीनां पूजा च धर्मोऽयं वनवासिनः । गृही ह्यपत्यापत्यं च दृष्ट्वाऽरण्य समाश्रयेत् ॥३ ॥
तृतीयमायुषो भागमेकाकी वा सभार्यकः । ग्रीष्मे पञ्चतपा नित्यं वर्षास्वभ्रावकाशिकाः || ४ || आर्द्रवासाश्च हेमन्ते तपश्चग्रं चरेद्बली । अपरावृत्तिमास्थाय व्रजेद्दिशमजिह्मगः ॥५ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये वानप्रस्थाश्रमकथनं नाम षष्ट्यधिकशततमोऽध्ययः ॥ १६० ॥
अध्याय १६० वानप्रस्थाश्रम पुष्कर बोले- -अब मैं वानप्रस्थियों के धर्म को कह रहा हूँ, उसे सुनो! उसे जटाधारी, अग्निहोत्र करनेवाला, भूशायी और मृगचर्म धारण करनेवाला होना चाहिए । उसे वन में रहकर जल, मूल, नीवार और फलों के ऊपर जीवन-यापन करना चाहिए । उसे प्रतिग्रह का अधिकार नहीं होता है । वह तीन बार स्नान करनेवाला और ब्रह्मचारी होता है । वानप्रस्थी का धर्म है देवता और अतिथि की पूजा । गृहस्थ को पुत्र के पुत्र ( पौत्र ) का मुख देखकर तीसरे भाग में वानप्रस्थ लेना चाहिए । वह अकेले अथवा सपत्नीक वानप्रस्थ ले सकता है । उसे ग्रीष्म आयु के पञ्चाग्नि का सेवन करना चाहिए । वर्षा में खुले आकाश के नीचे रहना चाहिए और हेमन्त में निरन्तर चाहिए । इस प्रकार उसे उग्र तपस्या करनी चाहिए । उसे अपरावृत्ति में गीले वस्त्र धारण करना में रहकर सरल भाव से दिशाओं में चला जाना चाहिए ॥१-५ ॥ श्री अग्निहापुराण में वानप्रस्थाश्रम वर्णन नामक एक सौ साठवाँ अध्याय समाप्त॥१६० ॥
१ क. ङ. ' होतृत्व ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ५३ ९ अथैकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः यतिधर्माः पुष्कर उवाच यतिधर्मं प्रवक्ष्यामि ज्ञानमोक्षादिदर्शकम् । यदह्नि विरजेद्धीरस्तदह्नि च परिव्रजेत् । आत्मन्यग्नीन्समारोप्य प्रव्रजेद् ब्राह्मणो गृहात् । ' उपेक्षकोऽसंचयि ( य ) को मुनिर्ज्ञानसमन्वितः । समता चैव सर्वस्मिन्नेतन्मुक्तस्य लक्षणम् । कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा । सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत् विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने । माधूरकरमसंक्लृप्तं प्राक्प्रणीतमयाचितम् चतुर्थमायुषो ' भागं प्राप्य सङ्गात्परिव्रजेत् ॥१ ॥
प्राजापत्यां निरुप्येष्टि सर्ववेदसदक्षिणाम् ॥२ ॥
एक एव चरेन्नित्यं ग्राममन्नार्थमाश्रयेत् ॥३ ॥
कपालं वृक्षमूलं च कुचेलमसहायता ॥४ ॥
नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवनम् ॥५ ॥
दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ॥ ६ ॥
। अलाबुदारुपत्राणि मृण्मयं वैष्णवं यतेः ॥७ ॥
वृत्ते शरावसम्पाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत् ॥८ ॥
। तात्कालिकं चोपपन्नं भैक्षं पञ्चविधं स्मृतम् ॥९ ॥
अध्याय १६१ यतिधर्म - वर्णन पुष्कर बोले - अब मैं यतियों के धर्म के विषय में बतला रहा हूँ जो ज्ञान और मोक्ष का दर्शन करानेवाला है । आयु के चतुर्थ भाग में पहुँचकर आसक्ति से संन्यास ले लेना चाहिए । ब्राह्मण को सभी वेदों से युक्त प्राजापत्य इष्टि का निरूपण करके ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर अपने - आपमें अग्नि को आरोपित करके घर से निकल जाना चाहिए । नित्य अकेले भ्रमण करते हुए संन्यासी को भोजनार्थ गाँव में जाना चाहिए ॥१-३ ॥ उसे संसार की उपेक्षा करनेवाला, असंग्रही और ज्ञानवान् होना चाहिए । संन्यासी के लक्षण हैं - कपाल ( धारण करना ), वृक्षमूल, मोटे वस्त्र, एकाकीपन और सब में समान दृष्टि । उसे न तो जीवन से मोह होता है और न मृत्यु से । जिस प्रकार सेवक अपने स्वामी की प्रतीक्षा किया करता है उसी प्रकार संन्यासी को काल की प्रतीक्षा करनी चाहिए । उसे देख - देखकर भूमि पर पैर रखना चाहिए तथा छानकर जल पीना चाहिए ॥४-६ ॥ सत्य से युक्त वाणी बोलना चाहिए तथा इस प्रकार का आचरण करना चाहिए जिसके लिए मन समर्थन करे । यति का पात्र लौकी, लकड़ी, मिट्टी और बाँस का होना चाहिए । यति को भिक्षा माँगने के लिए उस समय निकलना चाहिए जब रसोई का धुआँ समाप्त हो चुका हो, मुसल को उपयोग के बाद छोड़ दिया गया हो, आग ठण्डी पड़ गयी हो, सारे बर्तनों को उलटकर रख दिय गया हो । भिक्षा पाँच प्रकार की बतलायी गयी है - मधुकरी, असंक्लप्त, प्राक्प्रणीत, अयाचित और तात्कालिक । यति को या तो करपात्री १ क. ङ. “ गं त्यक्त्वा सं ं । २ क. ङ. उत्पक्षको मुनिर्ज्ञानं तथा चैवस ' । ३ क. ङ. कथान ' वृक्षमूलानि कुवेर म ' । ४ ख. ग. " मे सन्नमु ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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५४० अग्निपुराणम् पाणिपात्री भवेद्द्वाऽपी पात्रे पात्रात्समाचरेत् शुद्धभावश्चरेद्धर्मं यत्र तत्राऽऽश्रमे रतः फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बु प्रसादकम् ' अजिह्मः पण्डकः पङ्गुरन्धो बधिर एव च अह्नि रात्र्यां च याञ्जन्तून्हिनस्त्यज्ञानतो यतिः अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः चतुर्विधं भैक्षवस्तु कुटीचकबहूदकौ एकदण्डी त्रिदण्डी वा योगी मुच्येत बन्धनात् यमाः पञ्चाथ नियमाः शौचं सन्तोषणं तपः प्राणायामस्तु द्विविधः सगर्भोऽगर्भ एव च । अवेक्षेत गतिं नृणां कर्मदोषसमुद्भवाम् ॥१० ॥
। समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥११ ॥
। न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति ॥१२ ॥
। सद्भिश्च मुच्यतेऽसद्धिरज्ञानात्संसृतो द्विजः ॥ १३ ॥
। तेषां स्नात्वा विशुद्ध्यर्थं प्राणायामान्षडाचरेत् ॥१४ ॥
। चर्मावनद्धं दुर्गन्धं पूर्णं मूत्रपुरीषयोः ॥ १५ ॥
। रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत् ॥ १६ ॥
। ह्रीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥१७ ॥
। हंसः परमहंसश्च यो यः पश्चात् स उत्तम: ॥१८ ॥
। अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ ॥१९ ॥
। स्वाध्यायेश्वरपूजा च पद्मकाद्यासनं यतेः ॥२० ॥
। जपध्यानयुतो गर्भो विपरीतस्त्वगर्भकः ॥२१ ॥
होना चाहिए अथवा दिये गये बर्तन से अपने बर्तन में भिक्षा को ग्रहण करना चाहिए । उसे कर्म से उत्पन्न होनेवाली मनुष्यों की गति का निर्विघ्न निरीक्षण करते हुए शुद्ध भाव से अपने आश्रम के अनुसार आचरण करना चाहिए ॥७– १०३ ॥ उसे सभी प्राणियों में समदृष्टि होना चाहिए क्योंकि केवल चिह्न ही धर्म का कारण नहीं हो सकता है । यद्यपि कतक वृक्ष का फल जल को स्वच्छ करनेवाला हुआ करता है, किन्तु उसके नाम के ग्रहण मात्र करने से ही जल की शुद्धि नहीं होती है । संन्यासी को सरल, नपुंसक, पङ्गु, अन्धे और बहरे की सेवा में निरत रहना चाहिए सज्जनों की संगति में रहकर दुर्जनों का साथ छोड़ देना चाहिए । रात्रि अथवा दिन में अज्ञानवश । उसे की हिंसा कर डालता है, उसकी शुद्धि के लिए उसे स्नान करके छह प्राणायामों यति जिन जन्तुओं १४ ॥ संन्यासी को अपने शरीर के सम्बन्ध में यह समझना का आचरण करना चाहिए ॥११-युक्त, मांस और रक्त से सना चाहिए कि वह एक अस्थि - पञ्जर है जो स्नायुओं से से समन्वित हुआ, चमड़े से ढका हुआ, दुर्गन्धयुक्त, मल - मूत्र से भरा हुआ, वृद्धावस्था और शोक रोगों का आगार, दुःखी और मलिन तथा अनित्य है । इसलिए उसका परित्याग १६ ॥ धर्म के दस लक्षण हैं - धैर्य, क्षमा, इन्द्रियदमन, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह कर देना चाहिए ॥१५-भिक्षु चार प्रकार के कहे गये हैं - कुटीचक, बहूदक, लज्जा, विद्या, सत्य और अक्रोध । संन्यासी श्रेष्ठ, हंस और परमहंस । इनमें पूर्व की अपेक्षा उत्तरवर्ती कोटि के कहे गये हैं॥१७-१८ ॥ एकदण्डी अथवा त्रिदण्डी योगी बन्धन से छुटकारा पा जाते हैं - अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह और पाँच हैं । पाँच यम पूजा । पद्मासन आदि यतियों नियम हैं - शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-के आसन कहे गये हैं । प्राणायाम दो प्रकार का है - सगर्भ और अगर्भ । जप औरध्यान १ ख. ` ह्यः खञ्जकः । २ ख. च । षड्भिश्च । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ५४१ प्रत्येकं त्रिविधः सोऽपि पूरकुम्भकरेचकैः रेचनाद्रेचकः प्रोक्तो मात्राभेदेन च त्रिधा । तालो लघ्वक्षरो मात्रा प्रणवादि चरेच्छनैः मनोधृतिर्धारणा स्यात्समाधिर्ब्रह्मणि स्थितिः विज्ञानमानन्दं ब्रह्म तत्त्वमस्यहमस्मि तत् । देहेन्द्रियमनोबुद्धिप्राणाहंकारवर्जितम् नित्यशुद्धबुद्ध मुक्तसत्यमानन्दमद्वयम् । योऽसावादित्यपुरुषः सोऽसावहमखण्ड ओम् भावशुद्धश्च ब्रह्माण्डं भित्त्वा ब्रह्म भवेन्नरः ततो व्रजेन्नवम्यादौ ह्यतुसंधिषु वापयेत् ॥ पूरणात्पूरको वायोर्निश्चलत्वाच्च कुम्भकः ॥ २२ ॥
द्वादशस्तु चतुर्विंशः षट्त्रिंशन्मात्रिकोऽपरः ॥२३ ॥
। प्रत्याहारो जापकानां ध्यानमीश्वरचिन्तनम् ॥२४ ॥
। अयमात्मा परं ब्रह्म सत्यं ज्ञानमनन्तकम् ॥२५ ॥
परं ब्रह्म ज्योतिरात्मा वासुदेवो विमुक्त ओम् ॥२६ ॥
। जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादिमुक्तं ब्रह्म तुरीयकम् ॥ २७ ॥
अहं ब्रह्म परं ज्योतिरक्षरं सर्वगं हरिः ॥ २८ ॥
। सर्वारम्भपरित्यागी समदुःखसुखः क्षमी ॥२९ ॥
। आषाढ्यां पौर्णमास्यां च चातुर्मास्यं व्रतं चरेत् ॥ ३० ॥
प्रायश्चित्तं यतीनां च ध्यानं वायुयमस्तथा ॥३१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये यतिधर्मकथनं नामैकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१६१ ॥
से युक्त गर्भ तथा उससे विपरीत अगर्भ कहा गया है । पूरक, कुम्भक, रेचक से उसमें से प्रत्येक के तीन - तीन भेद हो जाते हैं । वायु को अपने अन्दर भरना पूरक कहलाता है, उसको रोकना कुम्भक है और उसे छोड़ना रेचक कहलाता है ॥१९ -२२ ॥ मात्रा भेद से इनके भी तीन - तीन भेद हो जाते हैं । पहला द्वादशमात्रा, दूसरा चतुर्विंश मात्रा और तीसरा छत्तीस मात्रावाला कहा गया है । एक मात्रा काल वह है जो एक ह्रस्व स्वर के उच्चारण में लगता है । प्रणव आदि मन्त्रों के उच्चारण के साथ जापक को प्रत्याहार का उच्चारण करना चाहिए । ध्यान कहते हैं मन को धारण करने को । ब्रह्म में स्थिति समाधि कहलाती है । यह आत्मा ही परब्रह्म है । वह सत्य, ज्ञान और अनन्त भी है ॥ २३-२५ ॥ विशेष ज्ञान को ही ब्रह्मानन्द कहते हैं, जो इस प्रकार है- ' तत्त्वमसि ' ' अहमस्मि तत् ' यह आत्मा परब्रह्म है, ज्योतिरूप है, वासुदेव - स्वरूप है और यह मुक्त भी है । ब्रह्म वह है जो देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहङ्कार से रहित तथा जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीयावस्थाओं से मुक्त रहा करता है । नित्य, अद्वैत है । संन्यासी को इस प्रकार ध्यान करना चाहिए कि - ' ॐ मैं परब्रह्म हूँ और विष्णुरूप है । यह जो आदित्य पुरुष है, वही मैं हूँ । ' मनुष्य सभी कुछ क्षमाशील और भावशुद्ध होकर ब्रह्माण्ड का भेदन करके ईश्वर ( मय ) हो जाता व्रत का आचरण करना चाहिए । तदनन्तर ऋतुओं के सन्धिकाल में नवमी आदि पड़ना चाहिए । यतियों का प्रायश्चित्त है - ध्यान और प्राणायाम ॥ २६-३१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में यतिधर्म कथन नामक एक सौ इकसठवाँ शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्य, आनन्द और जो कि ज्योतिरूप, अक्षर, सर्वव्यापक छोड़कर सुख - दुःख में समान रहकर है । आषाढ़ की पूर्णमासी में चातुर्मास्य तिथियों में पुनः भ्रमण के लिए निकल अध्याय समाप्त ॥१६१ ॥
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५४२ अग्निपुराणम् अथ द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः धर्मशास्त्रकथनम् पुष्कर उवाच मनुर्विष्णुर्याज्ञवल्क्यो ' हारीतोऽत्रिर्यमोऽङ्गिराः । आपस्तम्बोशनोव्यासाः कात्यायनबृहस्पती । तथा वक्ष्ये समासेन भुक्तिमुक्तिप्रदं शृणु । काम्यं कर्म प्रवृत्तं स्यान्निवृत्तं ज्ञानपूर्वकम् । अहिंसा गुरुसेवा च निःश्रेयसकरं परम् । ` तच्चाग्न्यं सर्वविद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः समं पश्यन्नात्मयाजी स्वाराज्यमधिगच्छति एतद्विजन्मसामर्थ्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः इहैव लोके तिष्ठन्हि ब्रह्मभूयाय कल्पते ' हस्ते चौषधिवारे च पञ्चम्यां श्रावणस्य च वशिष्ठदक्षसंवर्तशातातपपराशराः ॥१ ॥
गौतमः शङ्खलिखितौ धर्ममेते यथाऽब्रुवन् ॥२ ॥
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ॥३ ॥
वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः ॥४ ॥
सर्वेषामपि चैतेषामात्मज्ञानं परं स्मृतम् ॥५ ॥
। सर्वभूतेषु चाऽऽत्मानं सर्वभूतानि चाऽऽत्मनि ॥६ ॥
। आत्मज्ञाने स ( श ) मे च स्याद्वेदाभ्यासे च यत्नवान् ॥७ ॥
। वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो यत्र तत्राऽऽश्रमे वसन् ॥८ ॥
। स्वाध्यायानामुपाकर्म श्रावण्यां श्रवणेन तु ॥९ ॥
। ' पौषमासस्य रोहिण्यामष्टकायामथापि वा ॥ १० ॥
अध्याय १६२ धर्मशास्त्रकथन पुष्कर बोले - अब मैं संक्षेप में उस धर्म के सम्बन्ध में बतलाऊँगा जिसे पहले मनु, विष्णु, याज्ञवल्क्य, हारीत, अत्रि, यम, अङ्गिरस, वशिष्ठ, संवर्त, शातातप, पराशर, आपस्तम्ब, उशना, व्यास, कात्यायन, बृहस्पति, गौतम और शङ्खलिखित ने बताया था, उसे सुनिये । वैदिक कर्म दो प्रकार के होते हैं - प्रवृत्त कर्म और निवृत्त कर्म ॥१-३ ॥ प्रवृत्त कर्म को ' काम्य ' भी कहते हैं और निवृत्त वह है जिसे ज्ञानपूर्वक किया जाता है । वेदाभ्यास, तपस्या, ज्ञान, इन्द्रियसंयम, अहिंसा और गुरुसेवा परम निःश्रेयस्कर कर्म हैं । इन सबमें आत्मज्ञान श्रेष्ठ माना गया है ॥४-५ ॥ वह सभी विद्याओं में श्रेष्ठ है क्योंकि उससे अमरत्व की प्राप्ति होती है । सभी प्राणियों में अपने - आपको और अपने में सभी प्राणियों को समान रूप से देखनेवाला, आत्मयाजी, स्वराज्य को प्राप्त कर लेता है । आत्मज्ञान की इच्छा के शान्त हो जाने पर वेदाभ्यास में यत्न करना चाहिए । यह सामान्य रूप से द्विजातियों का तथा विशेष रूप से ब्राह्मणों का सामर्थ्य है । जो व्यक्ति वेद और शास्त्रों के अर्थों के तत्त्वज्ञानियों के आश्रम में रहता है, वह इस लोक में रहते हुए ही ब्रह्म के समान हो जाता है ॥६-८३ ॥ स्वाध्याय का उपाकर्म श्रावणी के दिन श्रवण नक्षत्र में, हस्त नक्षत्र में, चन्द्रवार के दिन अथवा श्रावण की पञ्चमी के दिन होना चाहिए । यह कर्म पौष मास में रोहिणी नक्षत्र में और अष्टमी के १ च. ' ल्क्यो मरीचोऽत्रि ' । २ क. ङ. तत्त्वाश्रीस । ३ ख. ग. ' स्ते वौषधिभावे वा प ° । ६ ग. ‘ माघस्य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ५४३ जलान्ते छन्दसां कुर्यादुत्सर्ग विधिवद्बहिः उपाकर्मणि चोत्सर्गे स्वशाखा श्रोत्रिये तथा समाप्तवेदं ह्यनिशमारण्यकमधीत्य च ऋतुसंधिषु भुक्त्वा वा श्राद्धिकं प्रतिगृह्य च कृतेऽन्तरे त्वहोरात्रं शक्रपाते तथोच्छ्रये अमेध्य शवशूद्रान्त्यश्मशानपतितान्तिके भुक्त्वाऽऽर्द्रपाणिम्भोन्तरर्धरात्रेऽतिमारुते धावतः प्राणिबाधे च विशिष्टे गृहमागते सप्तत्रिंशदनध्यायानेतांस्तात्कालिकान्विदुः । त्र्यहं प्रेतेष्वनध्यायः शिष्यत्विग्गुरुबन्धुषु ॥११ ॥
। सन्ध्यागर्जितनिर्घाते भूकम्पोल्कानिपातने ॥१२ ॥
। पञ्चदश्यां चतुर्दश्यामष्टम्यां राहुसूतके ॥१३ ॥
। पशुमण्डूकनकुलश्वाहिमार्जारशूकरैः ॥१४ ॥
। श्वक्रोष्टुगर्दभोलूक ' मासवाणर्तुनिस्वने ॥१५ ॥
। अशुभासु च तारासु विद्युत्स्तनितसम्प्लवे ॥१६ ॥
। पांशुवर्षे दिशां दाहे सन्ध्यानीहारभीतिषु ॥१७ ॥
। खरोष्ट्रयानहस्त्यश्वनौकावृक्षादिरोहणे 11 ॥१८ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये धर्मशास्त्रवर्णनं नाम द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६२ ॥
दिन भी किया जा सकता है । जलाञ्जलि के बाद विधिवत् छन्दों का उत्सर्ग करना चाहिए । शिष्य, ऋत्विग्, गुरु और बन्धु की मृत्यु पर तीन दिन तक अनध्याय रहता है ॥९ - ११ ॥ उपाकर्म में अपनी शाखा के श्रोत्रिय के निधन होने पर, सन्ध्या - काल में मेघों की गर्जना, भूकम्प तथा उत्कापात के समय, वेद की समाप्ति, आरण्यकों के अध्ययन के पश्चात् अमावस्या, चतुर्दशी, अष्टमी, राहु - सूतक के समय, ऋतुओं की सन्धियों में भोजन करके, श्राद्ध ग्रहण करके, पशुओं, मेंढक, नेवले, कुत्ते, सर्प, बिल्ली और शूकरों के द्वारा रास्ता काट जाने पर, इन्द्रध्वज की पताका उतारने तथा फहराने के दिन, कुत्ते, गीदड़, गर्दभ, उल्लू के शब्द करने पर, अमेध्य, शव, शूद्र, श्मशान और पतित के संसर्ग में, अशुभ नक्षत्रों में, विद्युत्गर्जन होने पर भोजन करके गीले हाथ जल में, अर्ध रात्रि में, आँधी चलने पर, बवण्डर उठने पर, दिशाओं के जलने पर, सन्ध्या - काल में, नीहारिकाओं के भय उत्पन्न होने पर, दौड़ते हुए प्राणियों की बाधा उत्पन्न होने पर, विशिष्ट व्यक्ति के घर आने पर और गधे, ऊँट, सवारी, हाथी, घोड़े, नाव तथा वृक्षादि पर चढ़ने के बाद इन सैंतीस प्रकार की स्थितियों में अनध्याय करना चाहिए, ऐसा विद्वानों का विचार है ॥ १२-१८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में धर्मशास्त्र वर्णन नामक एक सौ बासठवाँ अध्याय समाप्त ॥१६२ ॥
१ क. ङ. ' हिः । अहं ज्योतिरनाध्यायशिष्यत्वं क्रतबु । २ ख. ग. ' कसामवाणार्तनि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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५४४ अग्निपुराणम् अथ त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः श्राद्धकल्पकथनम् पुष्कर उवाच श्राद्धकल्पं प्रवक्ष्यामि भुक्तिमुक्तिप्रदं शृणु । प्रार्थ्योपवेशयेत्पीठे युग्मान्दैवेऽथ पित्र्यके । मातामहानामप्येवं तन्त्रं वा वैश्वदेविकम् I । आवाहयेदनुज्ञातो विश्वेदेवास इत्यृचा । शं नो देव्याः पयः क्षिप्त्वा यवोऽसीति यवांस्तथा । दत्त्वोदकं गन्धमाल्यं धूपदानं प्रदीपकम् । द्विगुणांस्तु कुशान्कृत्वा ह्युशन्तस्त्वेत्यृचा पितॄन् । ' यवार्थास्तु तिलैः कार्याः कुर्यादर्घ्यादि पूर्ववत् ( ` पितृभ्यः स्थानमसीति न्युब्जं पात्रं करोत्यधः निमन्त्र्य विप्रान्पूर्वेद्युः स्वागतेनापराह्णतः ॥१ ॥
अयुग्मान्प्राङ्मुखान्दैवे त्रीन्पित्र्ये चैकमेव वा ॥ २ ॥
पाणिप्रक्षालनं दत्त्वा विष्टरार्थं कुशानपि ॥३ ॥
यवैरन्ववकीर्याथ भाजने सपवित्रके ॥४ ॥
या दिव्या इति मन्त्रेण हस्ते ह्यर्धं विनिक्षिपेत् ॥५ ॥
अपसव्यं ततः कृत्वा पितॄणामप्रदक्षिणम् ॥६ ॥
आवाह्य तदनुज्ञातो जपेदायान्तु नस्ततः ॥ ७ ॥
। दत्त्वाऽर्घ्यं संस्रवाशेषान्पात्रे कृत्वा विधानतः ॥८ ॥
। अग्नौ करिष्य आदाय पृच्छत्यन्नं घृतप्लुतम् ॥९ ॥
अध्याय १६३ श्राद्धकल्प का वर्णन पुष्कर बोले- अब मैं श्राद्धकल्प के विषय में बतलाऊँगा, उसे सुनो । यह कल्प भोग और मोक्ष देनेवाला है । ( श्राद्ध के ) एक दिन पूर्व ब्राह्मणों को आमन्त्रित करना चाहिए और दूसरे दिन अपराह्न से उनका स्वागत - पूजन करके उन्हें एक आसन पर बिठलाना चाहिए । दैव श्राद्ध - कल्प में युग्म संख्या में तथा पितृ - श्राद्ध में अयुग्म संख्या में ब्राह्मणों को बैठाना चाहिए । देव पितृ - कर्मों में ब्राह्मणों को प्राङ्मुख बैठाना चाहिए । पितृ - कर्म में ब्राह्मणों की संख्या एक अथवा तीन हो सकती है ॥१-२ ॥ यही कर्म मातामह के श्राद्ध में और वैश्वदेविक कर्म में भी है । ब्राह्मणों के हाथों को धुलाकर आसन के लिए कुशों को बिछाकर ' विश्वेदेवास ' इत्यादि ऋचा से पितरों का आवाहन करना चाहिए । जौ को उन पात्रों के ऊपर बिखेर देना चाहिए जिनमें पवित्रक रखे हों । ' शं नो देवी ' इत्यादि मन्त्र से जल छिड़ककर ‘ यवोऽसीति ' मन्त्र से जौ बिखेरना चाहिए तथा ' या देव्या ' इत्यादि मन्त्र से अर्घ को हाथ में ग्रहण करना चाहिए । जल गन्ध, माल्य, धूप और दीप का दान करके श्राद्धकर्म करनेवाले को बायीं से दायीं ओर उनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिए, पितरों के लिए दूनी संख्या में कुशों को बिछाकर ' उशन्तस्त्वा ' इत्यादि ऋचा से पितरों का । और ‘ आयान्तु नः ’ इत्यादि मन्त्र का जप करना चाहिए ॥३-७ ॥ यहाँ पर जौ के स्थान आवाहन करना चाहिए चाहिए तथा अन्य अर्घ्य इत्यादि कर्म को पूर्ववत् करना चाहिए पर तिल का प्रयोग करना । तदनन्तर अर्घ्य देकर पात्र को उलट देना चाहिए १ ख. ग. " वाद्यैस्तु । २ पितृभ्य विशेषतः क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ५४५ कुरुष्वेति ह्यनुज्ञातो हुत्त्वाऽग्नौ पितृयज्ञवत् । यथालाभोपपन्नेषु रौप्येषु तु विशेषतः ) कृत्वेदं विष्णुरित्यन्ने द्विजाङ्गुष्ठं निवेशयेत् जप्त्वा यथासुखं वाच्यं भुञ्जीरंस्तेऽपि वाग्यताः अन्नामादाय तृप्ताःस्थ शेषं चैवान्नमस्य च सर्वमन्नमुपादाय सतिलं दक्षिणामुखः । मातामहानामप्येवं दद्यादाचमनं ततः दत्त्वा तु दक्षिणां शक्त्या स्वधाकारमुदाहरेत् । कुर्युरस्तु स्वधेत्युक्ते भूमौ सिञ्चेत्तत्तो जलम् दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः सन्ततिरेव च ।
इत्युक्त्वा तु प्रिया वाचः प्रणिपत्य विसर्जयेत् ।
हुतशेषं प्रदद्यात्तु भाजनेषु समाहितः ॥ १० ॥
। दत्त्वाऽन्नं पृथिवी पात्रमिति पात्राभिमन्त्रणम् ॥११ ॥
। सव्याहृतिकां गायत्रीं मधु वाता इति त्र्यृ ( तृ ) चम् ॥१२ ॥
। अन्नमिष्टं हविष्यं च दद्याज्जप्त्वा पवित्रकम् ॥१३ ॥
। तदन्नंविकिरेद्भूमौ दद्याच्चापः सकृत्सकृत् ॥१४ ॥
उच्छिष्टसंनिधौ पिण्डान्प्रदद्यात्पितृयज्ञवत् ॥१५ ॥
। स्वस्तिवाच्यं ततः कुर्यादक्षय्योदकमेव च ॥१६ ॥
वाच्यतामित्यनुज्ञातः स्वपितृभ्यः स्वधोच्यताम् ' ॥१७ ॥
। प्रीयन्तामिति वा दैवं विश्वेदेवा जलं ददेत् ' ॥ १८ ॥
श्रद्धा च नो मा व्यगमद्बहु देयं च नोऽस्त्विति ॥१९ ॥
वाजे वाज इति प्रीतपितृपूर्वं विसर्जनम् ॥ २० ॥
तथा इस मन्त्र का पाठ करना चाहिए कि ' आप मेरे पितरों के स्थान हैं । ' तदनन्तर घृत में भीगे हुए अन्न को लेकर ' क्या मैं यह करूँ ऐसा पूछता है और ' ऐसा कीजिये ' इस अनुज्ञा के प्राप्त होने पर पितृ - यज्ञ के समान अग्नि में आहुतियाँ देकर, ध्यानावस्थित होकर बचे हुए हविष् को बर्तनों में डाल देना चाहिए । बर्तन जैसे भी प्राप्त हो सके, वैसे हो सकते हैं, किन्तु चाँदी के पात्रों की विशेषता हुआ करती है । अन्न देकर ‘ पृथ्वीपात्रम् ' इत्यादि मन्त्र से पात्रों का अभिमन्त्रण करना चाहिए ॥८ - ११ ॥ यह कहने के बाद ' इदं विष्णुं ' इत्यादि मन्त्र से अन्न में अँगूठे को गड़ाना चाहिए और व्याहृतियों के साथ ' मधुवाता ' इत्यादि तीन गायत्री मन्त्रों को पढ़ना चाहिए । इस मन्त्र का जप करके तथा बिना कुछ बोले हुए स्वयं भी उसके शेष का भक्षण करना चाहिए और मन्त्र का जप करते हुए अभीष्ट अन्न और पवित्रक का दान करना चाहिए । ' उस अन्न को लेकर तथा बचे हुए अन्न को भी लेकर तृप्त हो जाइये । ' इत्यादि कहकर अन्न को पृथ्वी पर बिखेर देना चाहिए और बार - बार जल भी डालते रहना चाहिए । तिल के साथ सभी अन्न को लेकर, दक्षिणाभिमुख होकर, पितृ - यज्ञ के समान पहले के स्थान में पिण्डदान करना चाहिए ॥१२-१५ ॥ इसी प्रकार मातामहों का भी पिण्डदान करना चाहिए । तत्पश्चात् आचमन, स्वस्तिवाचन तथा अक्षय्योदक आदि क्रियाएँ करनी चाहिए और यथाशक्ति दक्षिणा देकर ' स्वधा ' का उच्चारण करना चाहिए । ‘ उच्चारण कीजिये ’ – इस प्रकार अनुज्ञा प्राप्त करके अपने पितरों के लिए स्वधा का उच्चारण करना चाहिए तथा ' अस्तु स्वधा ' का उच्चारण करके पृथ्वी पर जल छिड़क देना चाहिए अथवा ' प्रीयन्ताम् ' इत्यादि कहकर विश्वेदेवताओं के लिए जल देना चाहिए । तदनन्तर ब्राह्मणों के द्वारा इस प्रकार आशीर्वचन बोलने पर कि ' हम लोगों के दानदाताओं की वृद्धि हो, उनके वेदों और सन्तानों की भी वृद्धि हो, हम लोगों में उनकी श्रद्धा का नाश न हो तथा वे हमें बहुत - कुछ दे सकें ' ब्राह्मणों को प्रणाम करके विसर्जन करना चाहिए । ' वाजे वाज ' इत्यादि मन्त्र का पाठ करते हुए प्रीतिपूर्वक ब्राह्मणों का विसर्जन करना चाहिए ॥१६-२० ॥ पहले जिस अर्घपात्र में अन्न १ क. ख. ङ. ' वानुमान्य च । २ क. ' म् । ब्रूगुर ' । ३ ग. ङ. ददत् । ४ ख. प्रीत्या पि ° । ३५ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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५४६ अग्निपुराणम् यस्मिंस्तु संस्रवाः पूर्वमर्घपात्रे निपातिताः । प्रदक्षिणमनुव्रज्य भुक्त्वा तु पितृसेवितम् । एवं प्रदक्षिणं कृत्वा वृद्धौ नान्दीमुखान्पितॄन् । एकोद्दिष्टं दैवहीनमेकार्थैकपवित्रकम् । उपतिष्ठतामित्यक्षय्यस्थाने पितृविसर्जने गन्धोदकतिलैर्युक्तं कुर्यात्पात्रचतुष्टयम् । ये समाना इति द्वाभ्यां शेषं पूर्ववदाचरेत् अर्वाक्सपिण्डीकरणं यस्य संवत्सराद्भवेत् मृताहनि च कर्तव्यं प्रतिमासं तु वत्सरम् हविष्यान्नेन वै मासं पायसेन तु वत्सरम् ऐणरौरववाराहशाशैर्मासैर्यथाक्रमम् खड्गामिषं महाशल्कं मधुयुक्तान्नमेव च को डाला गया था, उस पितृ - पात्र को सीधा करके तथा पितरों के भोजन से बचे हुए अंश का भोजन पितृपात्रं तदुत्तानं कृत्वा विप्रान्विसर्जयेत् ॥२१ ॥
ब्रह्मचारी भवेत्तां तु रजनीं ब्राह्मणैः सह ॥ २२ ॥
यजेत दधिकर्कन्धुमिश्रान्पिण्डान्यवैः क्रियाः ॥ २३ ॥
आवाहनाग्नौकरणरहितं ह्यपसव्यवत् ॥२४ ॥
। अभिरम्यतामिति वदेद् ब्रूयुस्तेऽभिरताः स्म ह ॥२५ ॥
अर्घार्थपितृपात्रेषु ' प्रेतपात्रं प्रसेचयेत् ॥२६ ॥
। एतत्सपिण्डीकरणमेकोद्दिष्टं स्त्रिया सह ॥ २७ ॥
। तस्याप्यन्नं सोदकुम्भं दद्यात्संवत्सरं द्विजे ॥ २८ ॥
। प्रति संवत्सरं कार्यं श्राद्धं वै मासिकान्नवत् ॥ २ ९ ॥ । मात्स्यहारिणकौरभ्रशाकुनच्छागपार्षतैः ॥३० ॥
मासवृद्ध्याऽभितृप्यन्ति दत्तैरेव पितामहाः ॥ ३१ ॥
। लोहामिषं कालशाकं मांसं वार्धोनसस्य च ॥ ३२ ॥
ब्राह्मणों को विसर्जित करना चाहिए । तदनन्तर प्रदक्षिणा करके करके ब्राह्मणों के साथ उस रात ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए । वृद्ध श्राद्ध में इस प्रकार से परिक्रमा करके नान्दीमुख आदि पितरों को दही और बेर से मिले हुए पिण्डों का दान करके शेष क्रियाएँ जौ से करनी चाहिए । एकोद्दिष्ट श्राद्ध बिना वैश्वदेव के तथा एक अर्घ्य और एक पवित्रक से युक्त होता है । यह श्राद्ध आवाहन तथा अग्निकरण क्रियाओं से रहित हुआ करता है और इसमें जनेऊ को अपसव्य रखना पड़ता है ॥२१-२४ ॥ पितरों को विसर्जित करते समय अक्षय्य स्थान के ऊपर ' उपतिष्ठताम् ' इत्यादि मन्त्र का जप करना चाहिए । यजमान को ब्राह्मणों को सम्बोधित करके कहना चाहिए कि ' आप सन्तुष्ट हों ' और ब्राह्मणों को उसका उत्तर देते हुए यह कहना चाहिए कि ' हम सन्तुष्ट हैं । ' चार बर्तनों का सुगन्धित जल तथा तिलों से भर-भरकर रखना चाहिए । अर्घ्य देने के लिए प्रेतपात्र को पितृपात्रों के ऊपर धोना चाहिए और उस समय ' ये समाना ’ इत्यादि दो मन्त्रों का पाठ करना चाहिए । यही एकोद्दिष्ट है और इसमें बताये गये पिण्डदान के नियमों का पालन मृत स्त्रियों के सम्बन्ध में भी करना चाहिए । इसके बाद एक वर्ष के अन्दर सपिण्डीकरण संस्कार करना चाहिए । इसमें भी ब्राह्मण जाति के लिए जल से भरा हुआ घड़ा और पिण्डों का दान किया जाता है ॥२५-२८ ॥ यह श्राद्ध प्रत्येक वर्ष उसी महीने और दिन में करना चाहिए जिस दिन मृत्यु होती है । मासिक श्राद्ध के समान इसे भी प्रत्येक वर्ष करना चाहिए, किन्तु मासिक श्राद्ध हविष्यान्न से किया जाता है और वार्षिक श्राद्ध खीर से । यह श्राद्ध क्रमशः मछली, हिरन का मांस, कौरभ पक्षी का मांस, बकरे का मांस, हिरन - विशेष का मांस, सुअर का मांस तथा खरहे के मांस से किया जाता है । इस प्रकार मांस की बलि देने से पितामह सन्तुष्ट होते हैं ॥२९ -३१ ॥ गया में अपने पितरों को गैंडे का मांस, मछली का मांस, शहदयुक्त अन्न, बुड्ढे बकरे का मांस और कालशाक आदि की बलि देनेवाले अपने १ ग. ' र्थमभिपा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA