अग्नि पुराण — पृष्ठ 561–570
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 561–570
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अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ५५७ चतुर्हस्तं चाष्टहस्तं कुण्डं द्वादश च द्विजाः । पञ्चविंशं षोडशं वा पटे द्वारे चतुष्टयम् ॥ ३ ९ ॥ कोटिहोमी सर्वकामी विष्णुलोकं स गच्छति । होमस्तु ग्रहमन्त्रैर्वा गायत्र्या वैष्णवैरपि ॥ ४० ॥
जातवेदोमुखैः शैवैर्वैदिकैः प्रथितैरपि । तिलैर्यवैघृतैर्धान्यैरश्वमेधफलादिभाक् ॥४१ ॥
विद्वेषणाभिचारेषु ' त्रिकोणं कुण्डमिष्यते । समिधो वामहस्तेन श्येना स्थ्यनलसंयुताः ॥४२ ॥
रक्तभूषैर्मुक्तकेशैर्ध्यायद्भिरशिवं रिपोः । दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु यो द्वेष्टि हुंभडिति च ॥४३ ॥
छिन्द्यात्क्षुरेण प्रतिमां पिष्टरूपं रिपुं ' हनेत् । यजेदेकं पीडकं वा यः स कृत्वा दिवं व्रजेत् ॥४४ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽयुतलक्षकोटिहोमवर्णनं नाम सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१६७ ॥
अथाष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः महापातकादिकथनम् पुष्कर उवाच दण्डं कुर्यान्नृपो नॄणां प्रायश्चित्तमकुर्वताम् । कामतोऽकामतो वाऽपि प्रायश्चित्तं कृतं चरेत् ॥ १ ॥
पचीस या सोलह ब्राह्मण रहा करते हैं । कोटिहोम करनेवाला सभी कामनाओं को प्राप्त करके विष्णुलोक को चला जाता है ॥३७-३९ ३ ॥ इस होम में ग्रह मन्त्रों अथवा गायत्री छन्द में निबद्ध विष्णु, अग्नि, शिव आदि वैदिक मन्त्रों का प्रयोग करना चाहिए । तिल, यव, घृत और धान्य से हवन करने पर अश्वमेध इत्यादि फलों की प्राप्ति होती है । विद्वेष अथवा अभिचार कर्मों में कुण्ड का आकार त्रिकोण के समान होता है, जिसमें बायें हाथ से श्येन की अस्थियों तथा अग्नि से युक्त समिधाओं को देकर रक्त आभूषणों और छिटके हुए केशों को धारण करके शत्रु के अमङ्गल का ध्यान इस मन्त्र से करना चाहिए- जो मुझसे द्वेष करता है, उसका नाश हो, ' हुं फट् ' । तदनन्तर छुरे से अपने शत्रु की प्रतिमा को काटकर, पीठे से बनी शत्रु की आकृति को दो भागों में काट देना चाहिए अथवा एक ही पीडक कर्म को किया जा सकता है, जिसके करने से मनुष्य स्वर्गलोक में पहुँच जाता है ॥४०-४४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में कोटिहोम वर्णन नामक एक सौ सरसठवाँ अध्याय समाप्त ॥१६७ ॥
अध्याय १६८ महापातकादि - कथन पुष्कर बोले- राजा को प्रायश्चित्त न करनेवाले मनुष्यों को दण्ड देना चाहिए । कोई भी दुष्कर्म चाहे इच्छा से किया गया हो अथवा अनिच्छा से, उसके लिए प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥१ ॥ मत्त, क्रुद्ध और रोगियों के अन्न का भक्षण
१ ग. ' णातिचा ' । २ ख. ङ. ' नास्थिलक्षसं । ३ ग. भूमौ मुक्त ' । ४ क. ङ. हरेत् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ५५८ मत्तक्रुद्धातुराणां च न भुञ्जीत कदाचन । गणान्नं गणिकान्नं च वार्धुषेर्गायकस्य च । रजकस्य नृशंसस्य बन्दिनः कितवस्य च । कुण्डगोलस्त्रीजितानां वेदविक्रयिणस्तथा । कर्मारस्य निषादस्य चेलनिर्णेजकस्य च ) । आरूढपतितस्यान्नं विद्विष्टान्नं न वर्जयेत् । ब्राह्मणान्नं च शूद्रेण नाद्याच्चैव निमन्त्रितः । मत्या भुक्त्वाऽऽचरेत्कृच्छ्रं रेतो विण्मूत्रमेव च । अनिर्दशं च प्रेतान्नं गवाऽऽघ्रातं तथैव च । तप्तकृच्छ्रं प्रकुर्वीत अशौचे कृच्छ्रमाचरेत् । मृतपञ्चनखात्कूपादमेध्येन सकृद्युतात् सर्वत्र शूद्रे पादः स्याद्द्द्वित्रयं वैश्यभूपयोः प्राश्य मूत्रपुरीषाणि द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् महापातकिना स्पृष्टं यच्च स्पृष्टमुदक्यया ॥२ ॥
अभिशप्तस्य षण्डस्य यस्याश्चोपपतिर्गृहे ॥३ ॥
( मिथ्यातपस्विनश्चैव चौरदण्डिकयोस्तथा ॥४ ॥
शैलूषतन्तुवायान्नं कृतघ्नस्यान्नमेव च ॥५ ॥
मिथ्याप्रव्रजितस्यान्नं पुंश्चल्यास्तैलिकस्य च ॥६ ॥
तथैव ब्राह्मणस्यान्नं ब्राह्मणेनानिमन्त्रतः ॥७ ॥
एषामन्यतमस्यान्नममत्या वा त्र्यहं क्षिपेत् ॥८ ॥
चण्डालश्वपचान्नं तु भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥९ ॥
शूद्रोच्छिष्टं शुनोच्छिष्टं पतितान्नं तथैव च ॥१० ॥
अशौचे यस्य यो भुङ्क्ते सोऽप्यशुद्धस्तथा भवेत् ॥११ ॥
। अपः पीत्वा त्र्यहं तिष्ठेत्सोपवासो द्विजोत्तमः ॥१२ ॥
। विवराहखरोष्ट्राणां गोमायोः कपिकाकयोः ॥ १३ ॥
। शुष्काणि जग्ध्वा मांसानि प्रेतान्नं करकाणि च ॥१४ ॥
नहीं करना चाहिए तथा महापातकियों और ऋतुमती स्त्रियों के द्वारा जिस अन्न का स्पर्श किया गया हो, उसे भी नहीं खाना चाहिए । सामूहिक अन्न, गणिकान्न, गायक, अभिशप्त, नपुंसक तथा उपपति के साथ रहनेवाली स्त्री के द्वारा पकाये गये भोजन को भी ग्रहण नहीं करना चाहिए ॥२-३ ॥ इसी प्रकार धोबी, क्रूर, बन्दी, छली, मिथ्यातपस्वी, चोर, दण्ड देनेवाले, झगड़ालू, स्त्रियों को जीतनेवाले, वेदविक्रयी, नट, जुलाहा, कृतघ्न, कुम्हार, निषाद, मिथ्यासंन्यासी, पुंश्चली स्त्री, तेली, पतित और शत्रु के अन्न को वर्जित करना चाहिए ॥४-६३ ॥ ब्राह्मण के द्वारा निमन्त्रित न किये जाने पर उसका ( ब्राह्मण को ) अन्न नहीं खाना चाहिए । निमन्त्रित किये जाने पर भी शूद्र को ब्राह्मण का अन्न नहीं खाना चाहिए । इनमें से किसी का भी अन्न खाने पर ब्राह्मण को तीन दिनों तक व्रत रखना चाहिए ॥७-८ ॥ अन्य लोगों को कृच्छ्र चान्द्रायण - व्रत करना चाहिए । चाण्डाल का अन्न रेतस्, मल और मूत्र के समान है, जिसे खाकर चान्द्रायण - व्रत करना चाहिए । प्रेत - अन्न, गाय के द्वारा सूँघा हुआ, शूद्र का जूठा, कुत्ते का जूठा तथा पतितों का अन्न खाने से तप्तकृच्छ्र नामक व्रत करना चाहिए । यही कर्म यदि अशौच की स्थिति में हो तो कृच्छ्र व्रत करना चाहिए । जिसके अशौच में कोई भोजन करता है, वह भी उसके जैसा अशुद्ध हो जाता है ॥९-११ ॥ जिस कुएँ में पञ्चनखपशु मरे हों अथवा अमेध्य - पदार्थों से युक्त हो, उसका जल पीकर श्रेष्ठ ब्राह्मण को तीन दिनों तक उपवास करना चाहिए । शूद्र को ( ब्राह्मण की अपेक्षा ) चतुर्थांश और वैश्य तथा राजा को क्रमशः आधे और तीन - चौथाई अंशों का पाप लगता है । मूषक, शूकर, गधा, ऊँट, गीदड़, बन्दर और कौए को खाने से मल - मूत्र भक्षण करने पर ब्राह्मण को चान्द्रायण - व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए | १२-१३३ ॥ शुष्क मांस, प्रेतान्न, करक नामक पक्षी, मांस खानेवाले पक्षियों, शूकर, उष्ट्र, गोमय, बन्दर, कौए, गाय, मनुष्य, गदहा, घोड़ा, ग्रामीण, कुक्कुट और हाथी का मांस खाने पर तप्तकृच्छ्र १ क. ङ. खण्डस्य । २ क. ख. ग. ङ. च. यस्य चोप । ३ मिथ्यातपस्विनश्चैव चेलनिर्णेजकस्य च, क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ५५ ९ क्रव्यादशूकरोष्ट्राणां गोमायोः कपिकाकयोः । मांसं जग्ध्वा कुञ्जरस्य तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति लशुनं गृञ्जनं चाद्यात्प्राजापत्यादिना शुचिः पेलुगव्यं च पेयूषं तथा श्लेष्मातकं मृदम् । अनुपाकृतमांसानि देवान्नानि हवींषि च । सर्वक्षीराणि वर्ज्यानि तासां चैवाप्यनिर्दशम् । भक्ष्याः पञ्चनखाः प्रोक्ताः परिशेषाश्च वर्जिताः । ( ` यवगोधूमजं सर्वं पयसश्चैव विक्रियाः । अग्निहोत्रपरीद्धाग्निर्ब्राह्मणः कामचारतः । ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः । अनृते च समुत्कर्षो राजगामि च पैशुनम् । ब्रह्मोज्झ्यवेदनिन्दा च कौटसाक्ष्यं सुहृद्वधः ।
निक्षेपस्यापहरणं नराश्वरजतस्य च ।
गोनराश्वखरोष्ट्राणां छत्राकं ग्रामकुक्कुटम् ॥१५ ॥
। आमश्राद्धे तथा भुक्त्वा ब्रह्मचारी मधु त्वदन् ॥१६ ॥
। भुक्त्वा चान्द्रायणं कुर्यान्मां ( न्मा ) संश्चाऽऽत्मकृतंतथा े ॥१७ ॥
वृथा कृशरसंयावपायसापूपशष्कुलीः ॥१८ ॥
गवां च महिषीणां च वर्जयित्वा तथाऽप्यजाम् ॥१९ ॥
शशकः शल्यकी गोधा खड्गः कूर्मस्तथैव च ॥२० ॥
पाठीनरोहितान्मत्स्यन्सिंहतुण्डाश्च भक्षयेत् ॥ २१ ॥
वागषाड्गवचक्रादीन्सस्नेहमुषितं तथा ॥२२ ॥
चान्द्रायणं चरेन्मासं ' वीरहत्यासमं हि तत् ) ॥ २३ ॥
महान्ति पातकान्याहुः ' संयोगश्चैव तैः सह ॥२४ ॥
गुरोश्चालीकनिर्बन्धः समानं ब्रह्महत्ययाँ ॥२५ ॥
गर्हितान्नाज्ययोर्जग्धिः सुरापानसमानि षट् ॥ २६ ॥
भूमिवज्रमणीनां च रुक्मस्तेयसमं स्मृतम् ॥२७ ॥
व्रत से शुद्धि होती है । आमश्राद्ध के बाद ब्रह्मचारी यदि मदिरापान कर ले, लहसुन खा ले या चुकन्दर खा ले, तो वह प्राजापत्यादि कर्मों से शुद्ध होता है, किन्तु यदि उपर्युक्त पशुओं का मांस जान - बूझकर खा ले तो चान्द्रायण - व्रत करना चाहिए ॥१४-१७ ॥ पेलुगव्य ( अण्डकोष का मांस ), पेयूष ( प्रसूता गौ आदि का सात दिन के अन्दर का दूध ), श्लेष्मातक, मिट्टी, दूषित खिचड़ी, लप्सी, खीर, पूआ, पूरी, संस्काररहित मांस, देवान्न और हवि खाने पर चान्द्रायण - व्रत करे । गाय, भैंस और बकरी का दूध छोड़कर अन्य पशु का दूध नहीं पीना चाहिए । खरगोश, साही, घड़ियाल, गैंड़ा और कछुआ - ये पाँच नाखूनोंवाले भक्ष्य कहे गये हैं । शेष पशुओं का भक्षण वर्जित है । पहिना, रोहू और सिंही मछलियों को खाना चाहिए ॥ १८-२१ ॥ अग्निहोत्री को कोई ऐसा पदार्थ नहीं खाना चाहिए, जो गेहूँ, जौ, जमे हुए दूध अथवा वच से बना हो, इसी प्रकार ऐसे पदार्थों का, जिनका कि चिकनाहट नष्ट हो गया हो, भक्षण नहीं करना चाहिए । उपर्युक्त मछलियों को जान - बूझकर खानेवाले अग्निहोत्री ब्राह्मण को एक मास तक बद्धवीरासन लगाकर चान्द्रायण - व्रत करना चाहिए । ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी, गुरुपत्नी- -समागम करना तथा ऐसे व्यक्तियों के साथ सयोग - ये पाँच महापातक कहे गये हैं । असत्य का समुत्कर्ष, राजा के पास चुगली और गुरु पर मिथ्या दोषारोपण - ब्रह्महत्या के समान हैं ॥२२-२५ ॥ ब्रह्म का परित्याग, वेदनिन्दा, कूटसाक्ष्य, मित्रवध, किसी निन्दनीय व्यक्ति के अन्न और मक्खन को खाना सुरापान के समान है । धरोहर का अपहरण तथा मनुष्य, अश्व, चाँदी, पृथ्वी, वज्र और मणियों का अपहरण सोने की चोरी के समान माना जाता है । अपने से सम्बद्ध स्त्रियों, कुमारियों, १ ख. ग. ङ. ॰सं क्रव्यभुजस्तथा । २ ख. ङ. ' था । शेलुं ग । ३ यवगोधूमजं हि तत् च. पुस्तके नास्ति । ४ क. ख. ग. ङ. याः । रागखाण्डवचूकादी । ५ ख. ग. घ. ' खध्यास ' । ६ ख. ग. ' योगाश्चै ' । ७ ख. ' या । ब्रह्मोज्ञ वे । ८ क. ङ. मृ । रजकाश्मकयो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ५६० रेतः सेकः स्वयोनीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च । गोवधोऽयाज्यसंयाज्यं पारदार्यात्मविक्रयः । परिवेत्ता चानुजेन परिवेदनमेव च । कन्याया दूषणं चैव वार्धुष्यं व्रतलोपनम् । व्रात्यता बान्धवत्यागो भृताध्यापनमेव च । सर्वाकारेष्वधीकारो महायन्त्रप्रवर्तनम् ' इन्धनार्थमशुष्काणां द्रुमाणां चैव पातनम् आत्मार्थं च क्रियारम्भो निन्दितान्नादनं तथा " असच्छास्त्राधिगमनं दौः शील्यं व्यसनक्रिया स्त्रीशूद्रविट्क्षत्रवधो नास्तिक्यं चोपपातकम् भैक्ष्यं पुंसि च मैथुन्यं जातिभ्रंशकरं स्मृतम् संकीर्णकरणं ज्ञेयं मीनाहिनकुलस्य च सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु गुरुतल्पसमं विदुः ॥२८ ॥
गुरुमातृपितृत्यागः स्वाध्यायाग्न्योः सुतस्य च ॥ २ ९ ॥ तयोर्दानं च कन्यायास्तयोरेव च याजनम् ॥ ३० ॥
तडागारामदाराणामपत्यस्य च विक्रयः ॥३१ ॥
भृताच्चाध्ययनादानमविक्रेयस्य विक्रयः ॥३२ ॥
। ' हिंसौषधीनां स्त्र्याजीवः क्रियालङ्घनमेव च ॥३३ ॥
। योषितां ग्रहणं चैव स्त्रीनिन्दकसमागमः ॥३४ ॥
। ' अनाहिताग्नितास्तेयमृतानां चाऽऽतपक्रिया ॥ ३५ ॥
। धान्यकुप्यपशुस्तेयं मद्यस्त्रीनिषेवणम् ॥३६ ॥
। ब्राह्मणस्य रुजः कृत्यं घ्रातिरघ्घ्रेयमद्ययोः “ ॥३७ ॥
। श्वखरोष्ट्रमृगेन्द्राणामजाव्योश्चैव मारणम् ॥३८ ॥
। निन्दितेभ्यो धनादानं वाणिज्यं शूद्रसेवनम् ॥ ३ ९ ॥
अपात्रीकरणं ज्ञेयमसत्यस्य च भाषणम् । कृमिकीटकयोर्हत्या मद्यानुगतभोजनम् ॥
फलैधः कुसुमस्तेयमधैर्यं च मलावहम् ॥४० ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये महापातकादिवर्णनं नामाष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६८ ॥
अन्त्यज जाति की स्त्रियों, मित्र - स्त्री और पुत्र की स्त्री के साथ किया गया सहवास, गुरुपत्नी के साथ किये हुए सहवास के समान है ॥२६-२८ ॥ गोहत्या, अयोग्य को यजन करना, परस्त्रीगमन, आत्मविक्रय, गुरु, माता, पिता, स्वाध्याय, अग्नि और पुत्र का परित्याग, बड़े भाई के रहते हुए छोटे भाई का विवाह, ऐसे व्यक्ति के साथ कन्या का विवाह, ऐसे व्यक्ति को यजन करना, कन्यादूषण, व्रतलोप, तालाब, आराम, स्त्रियों- पुत्रों का विक्रय, व्रात्यता, बान्धवत्याग, भृताध्यापन, भृत से अध्ययन अथवा दान लेना, अविक्रेय वस्तु को बेचना, सुवर्ण आदि की खान का काम करना, विशाल यन्त्र चलाना, ओषधियों का विनाश, स्त्रियों के ऊपर जीवन - निर्वाह, अपने कार्य का उल्लंघन ( ये सभी जाति से च्युत करानेवाली क्रियाएँ हैं ) ॥२९-३३ ॥ ईंधन के लिए हरे वृक्षों का काटना, स्त्रियों का ग्रहण, स्त्रीनिन्दकों के साथ समागम, केवल अपने स्वार्थ के लिए किसी कार्य को करना, निन्द्य अन्न का ग्रहण करना, अनाहिताग्नि होना, चोरी, सन्तप्त करना, असत् शास्त्र का अध्ययन, दुश्शीलता, व्यसनक्रिया, धान्य, धातु और पशु की चोरी, मद्यपान करनेवाली स्त्रियों के साथ समागम, स्त्री, शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय का वध, नास्तिक्य, उपपातक, ब्राह्मण को सताना, मद्यादि का बेचना, भिक्षाटन और पुरुषों के साथ मैथुन ( ये सभी जाति से च्युत करनेवाली क्रियाएँ हैं ) ॥३४-३७३ ॥ इसी प्रकार कुत्ते, गधे, ऊँट, सिंह, बकरे और भेंड़ का मारना, संकीर्ण कृत्य, मछली, सर्प और नेवले को मारना, निन्दितों से धान्य का ग्रहण करना, वाणिज्य, शूद्रों की सेवा, मिथ्याभाषण, कृमि और कीटों की हत्या, मद्यपान के साथ भोजन करना, फल, ईंधन, पुष्पों का चुराना, अधीरता और मलिनता भी अपात्रीकरण के कारण हैं ॥३८-४० ॥ श्री अग्निमहापुराण में महापातकादि वर्णन नामक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय समाप्त ॥१६८ ॥
१ क. ङ. रिवृत्ता अनु ॰। २ च. ' कारायुधाका ' । ३ ख. ग. च. ' हामन्त्र ' । ४ क. ङ. हिंस्त्रौषधीनां स्त्रीजी ' । ५ क. च. ' यालम्बन ' । ६ अनाहिताग्नितः चाऽऽतपक्रिया इत्यत्र " अनाहिताग्नितास्तेयमृणानां चानयक्रिया " इत्यर्थं वर्तते । ७ क. ङ. ॰नं कौशाढ्यं वामन ' । ८ क. ङ. ' योः । ब्राह्मयं पुं ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ५६१ अथैकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः प्रायश्चित्तानि पुष्कर उवाच एतत्प्रभृतिपापानां प्रायश्चित्तं वदामि ते भिक्षेताऽऽत्मविशुद्ध्यर्थं कृत्वा शवशिरोध्वजम् यजेत वाऽश्वमेधेन स्वर्जिता गोसवेन वा सर्वस्वं वा वेदविदे ब्राह्मणायोपपादयेत् उपपातकसंयुक्तो गोघ्नो मासं यवान्पिबेत् चतुर्थकालमश्नीयादक्षारलवणं मितम् दिवाऽनुगच्छेद्गाश्चैव तिष्ठन्नूर्ध्वं रजः पिबेत् अविद्यमाने सर्वस्वं वेदविद्भ्यो निवेदयेत् योजने पादहीनं स्याच्चरेत्सर्वं निपातने । ब्रह्महा द्वादशाब्दानि कुटीं कृत्वा वने वसेत् ॥१ ॥
। ' प्रास्येदात्मानमग्नौ वा समिद्धेत्त्रिरवाक्शिराः ॥२ ॥
। जपन्वाऽन्यतमं वेदं योजनानां शतं व्रजेत् ॥३ ॥
। व्रतैरेतैर्व्यपोहन्ति महापातकिनो मलम् ॥४ ॥
। कृतवापो वसेद्गोष्ठे चर्मणा तेन संवृतः ॥ ५ ॥
। गोमूत्रेण चरेत्स्नानं द्वौ मासौ ' नियतेन्द्रियः ॥६ ॥
। वृक्षभैकादशा गास्तु दद्याद्विचरतिव्रतः ॥७ ॥
। पादमेकं चरेद्रोधे द्वौ पादौ बन्धने चरेत् ॥ ८ ॥
। कान्तारेष्वथ दुर्गेषु विषमेषु भयेषु च ॥९ ॥
अध्याय १६ ९ प्रायश्चित्त - वर्णन पुष्कर बोले- अब मैं इन पापों का प्रायश्चित्त बतला रहा हूँ । ब्रह्महत्या करनेवालों को वन में कुटी बनाकर बारह वर्षों तक रहना चाहिए || १ | उस व्यक्ति की आत्मशुद्धि के लिए कपाल को लेकर भिक्षा माँगनी चाहिए अथवा अग्नि मे कूद पड़ना चाहिए अथवा उसे अश्वमेध या गोमेध यज्ञ करना चाहिए और किसी एक वेद का जप करते हुए सौ योजन ( अपने घर से दूर ) निकल जाना चाहिए ॥ २-३ ॥ अथवा उसे वेदविद् ब्राह्मण के लिए सर्वस्व दान करना चाहिए । इन व्रतों से महापातकियों के मल का नाश हो जाता है । गोहत्या के उपपातक से युक्त व्यक्ति को एक मास तक यव के जल का पान करना चाहिए और उसे गोचर्म को धारण करके गोशाला में निवास करना चाहिए ॥४-५ ॥ चतुर्थकाल में उसे थोड़ा - सा भोजन करना चाहिए, जिसमें न तो क्षार हो और न लवण । उसे दो मास तक इन्द्रियों को वश में करके गोमूत्र से स्नान करना चाहिए । उसे दिन में गायों के पीछे चलकर उनके द्वारा उड़ायी गयी धूलि का सेवन करना चाहिए । तदनन्तर व्रत समाप्त होने पर उसे ग्यारह बैल और इतनी ही गायों का दान करना चाहिए ॥६-७ ॥ यदि इतना न कर सके तो उसके पास जो कुछ भी हो, उसे ही वेदविद् ब्राह्मणों को दान करना चाहिए । यदि जिस गाय की हत्या की गयी है, वह गोशाले में बँधी हो तो उपर्युक्त व्रत के चतुर्थांश का आचरण करना चाहिए । जब अपने खूँटे में बँधी हुई गाय की हत्या हो जाय तो उपर्युक्त व्रत के अर्धांश का आचरण करना चाहिए । जहाँ जुते हुए बैल की हत्या हो, वहाँ तीन - चौथाई व्रत करना चाहिए और साधारण रूप से उसकी हत्या करने में सम्पूर्ण व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए । वनों, दुर्गों, विषम स्थानों तथा विपत्ति में पड़े हुए पशुओं १ च. प्राणेदातारम ' । २ ख. ग. यामौ । ३६ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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५६२ अग्निपुराणम् यदि तत्र विपत्तिः स्यादेकपादो विधीयते । दमने ' दामने रोधे शकटस्य नियोजने । शृङ्गभङ्गेऽस्थिभङ्गे च लाङ्गलच्छेदने तथा । गोमतीं च जपेद्विद्यां गोस्तुतिं गोमतीं स्मरेत् । पादं पादं तु हत्यायाश्चरेयुस्ते पृथक्पृथक् । एतदेव व्रतं कुर्युरुपपातकिनस्तथा । अवकीर्णी तु कालेन गर्दभेन चतुष्पथे कृत्वाऽग्निं विधिवद्धीमानन्ततस्तु समित्यृचा अथवा गार्दभं चर्म वसित्वाऽब्दं चरेन्महीम् सुरां पीत्वा द्विजो मोहादग्निवर्णासुरां पिबेत् सुवर्णस्तेयकृद्विप्रो राजानमभिगम्य तु घण्टाभरणदोषेण तथैवार्धं विनिर्दिशेत् ॥१० ॥
स्तम्भशृङ्खलपाशेषु मृ मृते पादोनमाचरेत् ॥११ ॥
यावकं तु पिबेत्तावद्यावत्सुस्था तु गौर्भवेत् ॥ १२ ॥
एका चेद्बहुभिर्देवाद्यत्र व्यापादिता भवेत् ॥ १३ ॥
उपकारे क्रियमाणे विपत्तौ नास्ति पातकम् ॥१४ ॥
अवकीर्णी च शुद्धयर्थं चान्द्रायणमथापि वा ॥ १५ ॥
। पाकयज्ञविधानेन यजेत निर्ऋतिं निशि ॥ १६ ॥
। चन्द्रेन्द्रगुरुवह्नीनां जुहुयात्सर्पिषाऽऽहुतिम् ॥१७ ॥
। हत्वा गर्भमविज्ञातं ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ॥ १८ ॥
॥ गोमूत्रमग्निवर्णं वा पिबेदुदकमेव वा ॥१९ ॥
। स्वकर्म ख्यापयन्ब्रूयान्मां भवाननुशास्त्विति ॥२० ॥
की हत्या होने पर व्रत के चतुर्थांश का ही अनुष्ठान करना चाहिए । यदि गाय अथवा बैल की हत्या घण्टा तथा अन्य आभूषणों के कारण हो जाय तो आधे व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए ॥८-१० ॥ यदि गाय या बैल की हत्या उस समय हो जाय, जब उसे जोता जा रहा हो, या वह अपने निश्चित स्थान की ओर ले जाया जा रहा हो तो तीन - चौथाई व्रत करना चाहिए । गाय की सींग, हड्डियों अथवा दुम के टूट जाने पर तब तक जौ का जल पीते रहना चाहिए, जब तक कि गाय स्वस्थ न हो जाय । ऐसे व्यक्ति को गोमती का जप और स्मरण तथा गाय की स्तुति करनी चाहिए । यदि गायों का एक झुण्ड ही दैवयोग से नष्ट हो जाय तो प्रत्येक गाय के लिए उपर्युक्त व्रत के चतुर्थांश का अनुष्ठान करना चाहिए । किन्तु यदि गाय की हत्या उस समय हो जाय जब कोई ऐसा कार्य किया जा रहा हो जिससे उसका उपकार ही होना चाहिए तो कुछ भी प्रायश्चित्त नहीं करना पड़ता है ॥११-१४ ॥ यही प्रायश्चित्त उन्हें भी करना चाहिए, जो उपपातकी हों अथवा जिन्होंने अपनी प्रतिज्ञा को भंग किया हो । इन लोगों को अपनी शुद्धि के लिए चान्द्रायण - व्रत भी करना चाहिए । अपनी प्रतिज्ञा भंग करनेवाले व्यक्ति को चौराहे पर गर्दभ के द्वारा तथा पाक - यज्ञविधान से रात्रि में निर्ऋति का यजन करना चाहिए ॥१५-१६ ॥ बुद्धिमान् व्यक्ति को विधिवत् अग्नि - समिन्धन करके चन्द्रमा, इन्द्र, बृहस्पति और अग्नि के लिए आज्याहुतियाँ देनी चाहिए अथवा उसे गदहे के चर्म को पहनकर एक वर्ष तक पृथ्वी पर विचरण करना चाहिए । अज्ञान में गर्भ का हनन करनेवाले को ब्रह्महत्या के व्रत का पालन करना चाहिए ॥१७-१८ ॥ यदि कोई ब्राह्मण मोहवश मदिरा का पान कर ले तो उसे अग्निवर्ण सुरा का, अग्नि के समान वर्णवाले गोमूत्र अथवा केवल जल का पान करना चाहिए । सोने की चोरी करनेवाले ब्राह्मण को राजा के समीप जाकर अपने कर्म की सूचना देते हुए यह कहना चाहिए कि ' आप मुझे आज्ञा दें । ' राजा को दूसरे के हाथ से एक मूसल लेकर १ क. ङ. च. वामने । २ क. ङ. पावकं । ३ स्वकर्म भवाननुशास्त्विति क. ग. ङ. पुस्तकेषु नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ५६३ गृहीत्वा मुशलं राजा सकृद्धन्यात्स्वयं गतम् गुरुतल्पो निकृत्यैव शिश्नं च वृषणं स्वयम् ` चान्द्रायणान्वा त्रीन्मासानभ्यसेन्नियतेन्द्रियः चरेच्छां ( त्सां ) तपनं कृच्छ्रं प्राजापत्यमनिच्छया । मलिनीकरणीयेषु तप्तं स्याद्यावकं त्र्यहम् । वैश्येऽष्टमांश वृत्तस्थे शूद्रे ज्ञेयस्तु षोडशः । श्वगोधोलूककाकांश्च शूद्रहत्याव्रतं चरेत् । अमत्यैव प्रमाप्य स्त्रीं शूद्रहत्याव्रतं चरेत् । द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वाऽन्यवेश्मतः । भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य च । तृणकाष्ठद्रुमाणां तु शुष्कान्नस्य गुडस्य च ॥ विधेन शुध्यते स्तेनो ब्राह्मणस्तपसैव वा ॥ २१ ॥
। निधाय चाञ्जलौ गच्छेदानिपाताच्च नैर्ऋतिम् ॥२२ ॥
। जातिभ्रंशकरं कर्म कृत्वाऽन्यतममिच्छया ॥२३ ॥
संकरीपात्रकृत्यासु मासं शोधनमैन्दवम् ॥२४ ॥
तुरीयो ब्रह्महत्यायाः क्षत्रियस्य वधे स्मृतः ॥२५ ॥
मार्जारनकुलौ हत्वा चाषं मण्डूकमेव च ॥ २६ ॥
चतुर्णामपि वर्णानां नारीं ' हत्वाऽनवस्थिताम् ॥२७ ॥
सर्पादीनां वधे नक्तमनस्थ्नां वायुसंयमः ॥ २८ ॥
चरेच्छां ( त्सां ) तपनं कृच्छ्रं व्रतं निर्वाप्य शुध्यति ॥ २ ९ ॥ पुष्पमूलफलानां च पञ्चगव्यं विशोधनम् ॥३० ॥
चेलचर्मामिषाणां तु त्रिरात्रं स्यादभोजनम् ॥३१ ॥
उसे एक ही प्रहार में मार डालना चाहिए, क्योंकि चोर वध से शुद्ध होता है और ब्राह्मण तपस्या से शुद्ध होता है ॥१९-२१ ॥ गुरुपत्नी से समागम करनेवाले को स्वयं अपने लिङ्ग और अण्डकोश को काटकर अपनी अञ्जलि में रखकर नैर्ऋत्य दिशा की ओर तब तक जाना चाहिए जब तक वह गिर न जाय अथवा उसे अपनी इन्द्रियों को वश में करके तीन मास तक चान्द्रायण - व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए । ऐसा कर्म करके जिससे मनुष्य जाति से भ्रष्ट हो जाय, ‘ सान्तपन ' नामक व्रत करना चाहिए । अनिच्छा से यह कर्म करने पर ' प्राजापत्य ' व्रत करना चाहिए ॥२२-२३३ ॥ ‘ इन्दु ' व्रत नामक तपस्या उस पाप के प्रायश्चित्तस्वरूप करना चाहिए जो विजातीय स्त्री - पुरुष के विवाह के समय उपस्थित रहने से होता है । ऐसे कर्मों में जिनसे मनुष्य मलिन हो जाते हैं, तीन दिन तक ' यावक ' नामक व्रत करना चाहिए । ब्रह्महत्या के पाप का चतुर्थांश पाप क्षत्रिय के वध करने से, उसका आठवाँ भाग वैश्य की हत्या करने से, सोलहवाँ भाग शूद्र की हत्या करने से होता है । बिल्ली, नेवले, गौरैया, मेंढक, कुत्ते, गो, उलूक और कौए की हत्या करने पर शूद्र की हत्या के समान व्रत करना चाहिए ॥२४-२६३ ॥ चारों में से किसी वर्ण की हत्या होने पर शूद्रहत्या का प्रायश्चित्त करे । स्त्री की अज्ञानवश हत्या करके भी शूद्रहत्या का प्रायश्चित्त करे । सर्पादि का वध होने पर ' नक्तव्रत ' और अस्थिहीन जीवों की हत्या होने पर ' प्राणायाम ' करे । दूसरे के घर से थोड़े मूल्य की वस्तुओं के चुरानेवाले को ‘ कृच्छ्रसान्तपन व्रत ’ करना चाहिए ॥२७-२९ ॥ भोज्य पदार्थों, शय्या, यान, आसन, पुष्प, कन्द और फलों को चुरानेवाले की शुद्धि पञ्चगव्य का भक्षण ( करके ) करना चाहिए । तृण, काष्ठ, वृक्ष, शुष्कान्न, गुड़, वस्त्र, चर्म और मांस चुरानेवाले के लिए तीन रात्रियों तक भोजन न करना ही प्रायश्चित्त है ॥३०-३१ ॥ मणि, मोती, मूँगा, ताँबा, १ क. ङ. बन्धेन । २ ग. घ. ङ. च. स्तेयो । ३ ख. ' यणं वा त्री । ४ क. ङ. ' त्वा वार्षम ' । च. ' त्वा वर्षमन्त्रक । ५ ग. ' त्वा व्रतस्थि । ६ ग. च. सर्वादीनां । ७ क. ङ. च. । वेणु च । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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५६४ अग्निपुराणम् मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च । कार्पासकीटजीर्णानां द्विशफैकशफस्य च । गुरुतल्पव्रतं कुर्याद्रेतः सिक्त्वा स्वयोनिषु । पितृष्वस्त्रेयीं भगिनीं स्वस्त्रीयां मातुरेव च । अमानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु । मैथुनं वा समासेव्य पुंसि योषिति वा द्विजः । चाण्डालान्त्यस्त्रियोर्गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च विप्रदुष्यं स्त्रियं भर्त्ता निरुन्ध्यादेकवेश्मनि सा चेत्पुनः प्रदुष्येत सदृशेनोपमन्त्रिता यत्करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनं द्विजः अयः कांस्योपलानां च द्वादशाह ' कणान्नभुक् ॥३२ ॥
पक्षिगन्धौषधीनां तु ' रज्ज्वा चैव त्र्यहं पयः ॥३३ ॥
सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च ॥ ३४ ॥
मातुश्च भ्रातुराप्तस्य गत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ ३५ ॥
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥ ३६ ॥
गोयानेऽप्सु दिवा चैव सवासाः स्नानमाचरेत् ॥ ३७ ॥
। पतत्यज्ञानतो विप्रो ज्ञानात्साम्यं तु गच्छति ॥ ३८ ॥
। यत्पुंसः परदारेषु तदेनां चारयेद्व्रतम् ॥३९ ॥
। कृच्छ्रं चान्द्रायणं चैव तदस्याः पावनं स्मृतम् ॥४० ॥
। तद्भैक्ष्यभुग्जपेन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति ॥४१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये प्रायश्चित्तवर्णनं नामैकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६ ९ ॥ चाँदी, लोहा, काँसा अथवा पत्थर की चोरी करनेवाला बारह दिन तक अन्न का कणमात्र खाकर रहे । कपास, रेशम, ऊन तथा दो खुरवाले बैल आदि, एक खुरवाले घोड़े आदि पशु, पक्षी, सुगन्धित द्रव्य, औषध अथवा रस्सी चुरानेवाला तीन दिन तक दूध पीकर रहे । मित्र - पत्नी, पुत्रवधू, कुमारी और चाण्डाली में वीर्यपात करके गुरुपत्नीगमन का प्रायश्चित्त करे । फुफेरी बहन, मौसेरी बहन और सगी ममेरी बहन से गमन करनेवाला चान्द्रायण - व्रत करे ॥ ३२-३५ ॥ मनुष्येतर योनि में, रजस्वला स्त्री में, योनि के सिवा अन्य स्थान में अथवा जल में वीर्यपात करनेवाला मनुष्य ' कृच्छ्र - सान्तपन-व्रत ' करे । पुरुष अथवा स्त्री के साथ बैलगाड़ी पर, जल में या दिन में मैथुन करके ब्राह्मण वस्त्रों सहित स्नान करे ॥३६-३७ ॥ चाण्डाल और अन्त्यज जाति की स्त्री के साथ सहवास करनेवाला, उसके साथ भोजन करनेवाला अथवा उससे किसी वस्तु को ग्रहण करनेवाला ब्राह्मण यदि अज्ञान में ऐसा करता है तो पतित हो जाता है । यदि जान - बूझकर ऐसा करता है तो वह उसके समान हो जाता है । दुष्ट स्त्री को उसका पति एकान्त घर में रखता है और परस्त्रीगामी पुरुष से उसे शिक्षा दिलवाता है । यदि वह स्त्री इस प्रकार व्रत की शिक्षा दिये जाने के बाद भी वैसा ही कार्य करे तो वह ‘ कृच्छ्रचान्द्रायण व्रत ’ करके ही पवित्र हो सकती है । जो ब्राह्मण एक रात में रजस्वला कुमारी के साथ सहवास करता है वह तीन वर्षों तक भिक्षान्न खाकर और उपयुक्त मन्त्र का जप करके शुद्ध होता है ॥३८-४१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में प्रायश्चित्त वर्णन नामक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥१६९ ॥
१ क. ङ. ' हं गणा ' । २ गै. तु लाजाश्चैव । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ५६५ अथ सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः प्रायश्चित्तानि पुष्कर उवाच ' महापापानुयुक्तानां प्रायश्चित्तानि वच्मि ते ` याजनाध्यापनाद्यौनान्न ' तु यानाशनासनात् । स तस्यैव व्रतं कुर्यात्तत्संसर्गस्य शुद्धये निन्दितेऽहनि सायाह्ने ज्ञात्यृत्विग्गुरुसंनिधौ । अहोरात्रमुपासीरन्नशौचं बान्धवैः सह ज्येष्ठांशं प्राप्नुयाच्चास्य यवीयान्गुणतोऽधिकः । तेनैव सार्धं प्राश्येयुः स्नात्वा पुण्यजलाशये । वस्त्रान्नपानं देयं तु वसेयुश्च गृहान्तिके । तांश्चारयित्वा त्रीन्कृच्छ्रान्यथाविध्युपनाययेत् ॥ संवत्सरेण पतति पतितेन सहाऽऽचरन् ॥१ ॥
यो येन पतितेनैषां संसर्गं याति मानवः ॥ २ ॥
। पतितस्योदकं कार्यं सपिण्डैर्बान्धवैः सह ॥ ३ ॥
दासीघटमपां पूर्णं ४ पर्यस्येत्प्रेतवत्पदा ॥४ ॥
। निवर्तयेरंस्तस्मात्तु ज्येष्ठांशं भाषणादिके ॥५ ॥
प्रायश्चित्ते तु चरिते पूर्णं कुम्भमपां नवम् ॥६ ॥
एवमेव विधिं कुर्युर्योषित्सु पतितास्वपि ॥७ ॥
तेषां द्विजानां सावित्री नानूद्येत यथाविधि ॥८ ॥
विकर्मस्थाः परित्यक्तास्तेषामप्येतदादिशेत् ॥९ ॥
अध्याय १७० प्रायश्चित्त - वर्णन पुष्कर बोले- अब मैं तुमसे महापापियों के प्रायश्चित्तों को कह रहा हूँ । एक वर्ष तक किसी पतित व्यक्ति के संसर्ग में रहनेवाला स्वयं पतित हो जाता है ॥ १ ॥ यहाँ पर संसर्ग का अभिप्राय है यज्ञ कराना, पढ़ाना और यौन-सम्बन्ध रखना । जो मनुष्य जिस पतित का संसर्ग करता है, वह उसके संसर्गजनति दोष की शुद्धि के लिए उस पतित
के लिए विहित प्रायश्चित्त करे । पतित व्यक्ति के सपिण्ड और बन्धुओं को उसकी शुद्धि के लिए उदकक्रिया करनी चाहिए ॥२-३ ॥ पतित के सपिण्ड और बान्धवों को एक साथ निन्दित दिन में, सन्ध्या के समय, जाति भाई, ऋत्विक् और गुरुजनों के निकट, पतित पुरुष की जीवितावस्था में ही उसकी उदकक्रिया करनी चाहिए । तत्पश्चात् जल से भरे हुए घड़े को दासी द्वारा लात से फेंकवा दे । पतित के सपिण्ड एवं बान्धव एक दिन - रात अशौच मानें । उसके बाद वे पतित के साथ सम्भाषण न करें और धन में उसे ज्येष्ठांश भी न दें । पतित का छोटा भाई गुणों में श्रेष्ठ होने के कारण ज्येष्ठांश का अधिकारी होता है । यदि पतित बाद में प्रायश्चित्त कर ले, तो उसके सपिण्ड और बान्धव उसके साथ पवित्र जलाशय में स्नान करके जल से भरे हुए नवीन कुम्भ को जल में फेंक दें । पतित स्त्रियों के सम्बन्ध में भी यही कार्य करें, परन्तु उसको अन्न, वस्त्र और घर के समीप रहने का स्थान देना चाहिए ॥४-७३ ॥ जिन ब्राह्मणों को समय पर विधि के अनुसार गायत्री उपदेश प्राप्त नहीं हुआ है, उनसे तीन प्राजापत्य कराकर उनका विधिवत् उपनयन - संस्कार करावे । १ ख. ग. ' पापोपपापानां । २ ख. ग. ' नाध्ययनादौ वा न तु । ३ क. ङ. ' नादीनामनुया । ४ क. ङ. ' र्ण प्रयस्ये । ५ क. ङ. ' त्तु श्रेष्ठसंभाषणादिकम् । ज्ये ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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५६६ अग्निपुराणम् जपित्वा त्रीणि सावित्र्याः सहस्राणि समाहितः । व्रात्यानां यजनं कृत्वा परेषामन्त्यकर्म च । शरणागतं परित्यज्य वेदं विप्लाव्य च द्विजः । श्वशृगालखरैर्दष्टो ग्राम्यैः क्रव्याभिरेव च ' । स्नातकव्रतलोपे च कर्मत्यागो ह्यभोजनम् । स्नात्वाऽनश्नन्नहः शेषमभिवाद्य प्रसादयेत् । कृच्छ्रातिकृच्छ्रं कुर्वीत विप्रस्योत्पाद्य शोणितम् । सम्यग्ज्ञातस्तु कालेन तस्य कुर्वीत शोधनम् । प्राजापत्यं तु शूद्राणां शेषं तदनुसारतः कृत्वा गृहे ततो द्वारि तेषां दद्याद्भुताशनम् । द्रव्याणां परिशेषाणां द्रव्यशुद्धिर्विधीयते शुध्येयुरुपवासेन पञ्चगव्येन वाऽप्यथ मासं गोष्ठे पयः पीत्वा मुच्यतेऽसत्परिग्रहात् ॥१० ॥
अभिचारमहीनानां त्रिभिः कृच्छ्रर्व्यपोहति ॥ ॥११ ११ ॥॥ संवत्सरं यताहारस्तत्पापमपसेधति ॥१२ ॥
नरोष्ट्राश्वैर्वराहैश्च प्राणायामेन शुध्यति ॥ १३ ॥
हुंकारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वंकारं च गरीयसः ॥ १४ ॥
' अवगूर्य चरेत्कृच्छ्रमतिकृच्छ्रं निपातने ॥ १५ ॥
चाण्डालादिरविज्ञातो यस्य तिष्ठेत वेश्मनि ॥ १६ ॥
चान्द्रायणं पराकं वा द्विजानां तु विशोधनम् ॥ १७ ॥
। गुडं कुसुम्भं लवणं तथा धान्यानि यानि च ॥ १८ ॥
मृण्मयानां तु भाण्डानां त्याग एव विधीयते ॥१९ ॥
। कूपैकपानसक्ता ये स्पर्शात्संकल्पदूषिताः ॥२० ॥
। यस्तु संस्पृश्य चण्डालमश्नीयाच्च स्वकामतः ॥२१ ॥
निषिद्ध कर्मों का आचरण करने से जिन ब्राह्मणों का परित्याग कर दिया गया हो, उनके लिए भी इसी प्रकार का उपदेश करे । ब्राह्मण संयत - चित्त होकर तीन सहस्र गायत्री का जप करके गौशाला में एक मास तक दूध पीकर निन्दित प्रतिग्रह के पापग्रह से छूट जाता है । संस्कारहीन मनुष्यों का यज्ञ कराकर गुरुजनों के सिवा दूसरों का अन्त्येष्टि कर्म, अभिचार कर्म अथवा अहीनयज्ञ कराकर ब्राह्मण तीन प्राजापत्य व्रत करने पर शुद्ध होता है । जो द्विज शरणागत का परित्याग करता है और अनधिकारी को वेद का उपदेश करता है, वह एक वर्ष तक नियमित आहार करके उस पाप से मुक्त हो जाता है ॥८-१२ ॥ कुत्ते, गीदड़, गधे, ग्राम्य, मांसभक्षी पशुओं, मनुष्य, ऊँट और घोड़े के द्वारा जिस व्यक्ति को काट लिया गया हो, वह प्राणायाम से शुद्ध हो जाता है ॥१३ ॥ व्रत भङ्ग होने पर और कर्म का परित्याग करने पर उपवास करना
चाहिए । ओंकार का उच्चारण करनेवाले ब्राह्मण का उपहास करनेवाले ब्राह्मण को स्नान और उपवास करके और दिन के शेष भाग में उपहसित ब्राह्मण का अभिवादन करके उसे प्रसन्न करना चाहिए । ब्राह्मण का रक्त निकालने पर ' कृच्छ्रातिकृच्छ्र ' नामक व्रत करना चाहिए । जिस व्यक्ति के घर में अज्ञान से चाण्डाल रहता है उसे ' पराक ' नामक व्रत करना पड़ता है किन्तु यदि वह चाण्डाल जान - बूझकर ब्राह्मण के घर रह जाय तो उस ब्राह्मण को चान्द्रायण - व्रत करना चाहिए ॥१४-१७ ॥ इन्हीं परिस्थितियों में शूद्र को प्राजापत्य व्रत करना चाहिए । उस समय घर में नमक, गुड़, कुसुम्भ का पुष्प अथवा अन्य जो भी धान्य हों उन्हें पहले द्वार पर रखकर फिर अग्नि में डाल देना चाहिए किन्तु मिट्टी के बर्तनों का त्याग ही करना चाहिए । अन्य द्रव्यों की शुद्धि द्रव्य शुद्धि के नियमों के अनुसार करनी चाहिए । चाण्डाल के साथ एक ही कुएँ का जल पीने से अशुद्धि से दूषित मनुष्य एक दिन के उपवास अथवा पञ्चगव्य पान से शुद्ध होता है । जो व्यक्ति चाण्डाल का स्पर्श करके जान - बूझकर कुछ खा लेता है उसे चान्द्रायण अथवा तप्तकृच्छ्र नामक व्रत १ क. ख. च. नानाश्वोष्ट्रैर्वा । २ क. ङ. ' वगूह्य च ' । ३ ख. च. स्पर्शसंक । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA