अग्नि पुराण — पृष्ठ 551–560
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 551–560
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त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः यद्ददाति गयास्थश्च सर्वमानन्त्यमुच्यते । कन्यां प्रजां बन्दिनश्च पशून्मुख्यान्सुतानपि । ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रान्स्वर्णरूप्ये सकुप्यके । प्रतिपत्प्रभृतिष्वेतान्वर्जयित्वा चतुर्दशीम् । स्वर्गं ह्यपत्यमोजश्च शौर्यं क्षेत्रं बलं तथा । प्रवृत्तचक्रतां पुत्रान्वाणिज्यं प्रभुतां तथा । धनं विद्यां भिषक्सिद्धिं रूप्यं गाश्चाप्यजाविकम् । कृत्तिकादिभरण्यन्ते स कामनाप्नुयादिमान् । प्रीणयन्ति मनुष्याणां पितृञ्श्राद्धेन तर्पिताः । प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितामहाः ५४७ तथा वर्षात्रयोदश्यां मघासु च न संशयः ॥ ३३ ॥
घृतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशफैकशफं तथा ॥ ३४ ॥
ज्ञातिश्रैष्ठ्यं सर्वकामानाप्नोति श्राद्धदः सदा ॥३५ ॥
शस्त्रेण तु हता ये वै तेषां तत्र प्रदीयते ॥ ३६ ॥
पुत्रश्रैष्ठ्यं ससौभाग्यमपत्यं मुख्यतां सुतान् ॥ ३७ ॥
अरोगित्वं यशो वीतशोकतां परमां गतिम् ॥ ३८ ॥
अश्वानायुश्च विधिवद्यः श्राद्धं संप्रयच्छति ॥ ३ ९ ॥ वसुरुद्रादितिसुताः पितरः श्राद्धदेवताः ॥४० ॥
आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च ॥४१ ॥
॥४२ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये श्राद्धकल्पवर्णनं नाम त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६३ ॥
पितरों को अनन्तकाल के लिए सुखी और निश्चिन्त कर देते हैं । इसी प्रकार वर्षा ऋतु की त्रयोदशी और मघा नक्षत्र में किया गया श्राद्ध भी पितरों को सुख देनेवाला होता है । श्राद्ध करनेवाले सदा कन्या, प्रजा, बन्दी, पशु, पुत्र, घृत, कृषि, वाणिज्य, दो खुरवाले ( बकरे आदि ) पशु, एक खुरवाले ( घोड़े आदि ), ब्रह्मवर्चस् से युक्त पुत्रों, सोने, चाँदी, जातियों में श्रेष्ठता और सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है ॥३२-३५ ॥ जो लोग आयुधों के द्वारा मारे जाते हैं, उनको छोड़कर अन्य लोगों का श्राद्ध प्रतिपदा और चतुर्दशी के दिन नहीं करना चाहिए । जो व्यक्ति विधिवत् श्राद्ध करता है वह स्वर्ग, सन्तान, ओज, शौर्य, क्षेत्र, बल, पुत्रों में श्रेष्ठता, सौभाग्य, वाणिज्य, प्रभुता, आरोग्य, यश, वीतशोकता, परमगति, धन, विद्या, आयुर्वेद में सिद्धि, चाँदी, गाय, बकरे, भेंड़, अश्व और आयु को प्राप्त कर लेता है । कृत्तिका में प्रारम्भ करके भरणी तक श्राद्ध करनेवालों की सभी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं । श्राद्ध देवता हैं - वसु, रुद्र, आदित्य और पितर - ये मनुष्यों के द्वारा किये हुए पितृश्राद्ध से प्रसन्न हो जाते हैं तथा पितरगण श्राद्ध करनेवालों को आयु, प्रजा, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य प्रदान करते हैं ॥ ३६-४२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में श्राद्धकल्पवर्णन नामक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय समाप्त ॥१६३ ॥
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५४८ अग्निपुराणम् अथ चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः नवग्रहहोमः पुष्कर उवाच श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समारभेत् । सूर्यः सोमो मङ्गलश्च बुधश्चाथ बृहस्पतिः । ताम्रकात्स्फटिकाद्रक्तचन्दनात्स्वर्णकादुभौ । सुवर्णैर्वा यजेल्लिख्य गन्धमण्डलकेषु वा । गन्धाश्च बलयश्चैव धूपो देयस्तु गु ( गौ ) ग्गुलः । आकृष्णेन इमं देवा अग्निर्मूर्द्धादिवः ककुत् । बृहस्पते अतियदर्यस्तथैवाल्पात्परिश्रुतः । ( ' अर्कः पलाशः खदिरो ह्यपामार्गोऽथ पिप्पलः एकैकस्याम ( स्यअ ) ष्टशतमष्टाविंशतिरेव वा ) गुडौदनं पायसं च हविष्यं क्षीरयष्टिकम् ' दृष्ट्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिचरन्पुनः ॥ १ ॥
शुक्रः शनैश्चरो राहुः केतुश्चेति ग्रहाः स्मृताः ॥२ ॥
रजतादयशः सीसाद्ग्रहाः कार्याः क्रमादिमे ॥ ३ ॥
यथावर्णं प्रदेयानि वासांसि कुसुमानि च ॥ ४ ॥
कर्तव्या मन्त्रवन्तश्च चरवः प्रतिदैवतम् ॥५ ॥
उद्बुध्यस्वेति च ऋचो यथासंख्यं प्रकीर्तिताः ॥ ६ ॥
शं नो देवीस्तथा काण्डात्सेतुं कृण्वन्निमास्तथा ॥७ ॥
। उदुम्बर: शमी दूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात् ॥८ ॥
। होतव्या मधुसर्पिर्भ्यां दध्ना चैव समन्विताः ॥ ९ ॥
। दध्योदनं हविः पूपान्मांसं चित्रान्नमेव च ॥१० ॥
अध्याय १६४ नवग्रह- होम पुष्कर बोले- ऐश्वर्य, शान्ति, दृष्टि, आयु और पुष्टि की इच्छा करनेवाले तथा अभिचार कर्म करनेवाले को ग्रहों का यजन करना चाहिए । ग्रह ये हैं - सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतु । इन ग्रहों का निर्माण क्रमशः ताम्र, स्फटिक, रक्तचन्दन, स्वर्ण, चाँदी, लोहा और सीसा से करना चाहिए अथवा सभी ग्रहों का निर्माण सोने से किया जा सकता है । गन्धमण्डलों में ग्रहों का चित्रण करके उनका यजन करना चाहिए । ग्रहों के लिए उनके वर्णों के अनुसार वस्तुओं तथा पुष्पों को समर्पित करना चाहिए ॥१-४ ॥ ग्रहों के लिए गन्ध, कङ्कण और गुग्गुल का धूपदान करना चाहिए । प्रत्येक देवता के लिए मन्त्रों से युक्त चरु का सम्पादन करना चाहिए । उस समय क्रमशः जिन मन्त्रों को पढ़ा जाता है वे हैं - ' आकृष्णेन ', ‘ इमं देवा ', ' अग्निमूर्धा दिवः ककुत् ', ' उद्बुध्यस्व ', ‘ बृहस्पते अति यदर्य ’, ‘ शं नो देवी ', ' काण्डात् ' तथा ‘ केतुं कृण्वन्न ' इत्यादि ॥५-७ ॥ इन ग्रहों के लिए क्रमशः अर्क, पलाश, खदिर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशाओं की समिधाएँ होती हैं । प्रत्येक देवता के लिए एक सौ आठ अथवा अट्ठाईस आहुतियाँ मधु, घृत और दही से देनी चाहिए । ग्रहों के क्रम से ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, जिसमें गुड़ - भात, खीर, हविष्य, मलाई, दही - चावल, हवि, पुआ, मास ( उड़द ) तथा खिचड़ी का प्रयोग होना १ अर्क विंशतिरेव वा पुस्तके नास्ति । २ ख. रषष्टि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ५४ ९ दद्याद्ग्रहक्रमादेतद्द्विजेभ्यो भोजनं बुधः । शक्तितो वा यथालाभं सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ॥११ ॥
धेनुः शङ्खस्तथाऽनड्वान् हेम वासो हयस्तथा । कृष्णा गौरायसश्छाग एता वै दक्षिणाः क्रमात् ॥१२ ॥
यश्च यस्य यदा दूष्यः ' स तं यत्नेन पूजयेत् । ब्रह्मणैषां वरो दत्तः पूजिताः पूजितस्य च ॥१३ ॥
ग्रहाधीना नरेन्द्राणामुच्छ्रयाः पतनानि च । भावाभावौ च जगतस्तस्मात्पूज्यतमा ग्रहाः ॥१४ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये नवग्रहहोमवर्णनं नाम चतुःषष्ट्यधिकशततमोध्यायः ॥१६४ ॥
अथ पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः नानाधर्माः अग्निरुवाच ध्येय आत्मा स्थितो योऽसौ हृदये दीपवत्प्रभुः । अनन्यविषयं कृत्वा मनो बुद्धिः ( द्धि ) स्मृतीन्द्रियम् ॥१ ॥
श्राद्धं तु ध्यायिने देयं गव्यं दधि घृतं पयः । प्रियंगवो मसूराश्च वार्ताकुः कोद्रवो नहि ॥२ ॥
सैंहिकेयो यदा सूर्यं ग्रसते पर्वसंधिषु । हस्तिच्छाया तु सा ज्ञेया श्राद्धदानादिकेऽक्षया ॥३ ॥
पित्रे ( त्र्ये ) चैव यदा सोमो हंसे चैव करे स्थिते । तिथिर्वैवस्वती नाम सा छाया कुञ्जरस्य तु ॥४ ॥
चाहिए । यथाशक्ति और यथालाभ ब्राह्मणों का विधिपूर्वक सत्कार करके ( ग्रहों के क्रम से ) ब्राह्मणों को गाय, शङ्ख, बैल, सोना, वस्त्र, अश्व, काली गाय, लोहा और बकरा दक्षिणा में देना चाहिए ॥८-१२ ॥ जो ग्रह जिसके लिए दूषित हो, उसे उसी ग्रह का पूजन करना चाहिए । ब्रह्मा के द्वारा ग्रहों को यह वर दिया गया है । राजाओं के उत्थान - पतन तथा संसार का अस्तित्व और अनस्तित्व ग्रहों के अधीन है, इसलिए ये ग्रह सबसे अधिक पूज्य हैं ॥१३-१४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नवग्रहहोम वर्णन नामक एक सौ चौंसठहवाँ अध्याय समाप्त ॥१६४ ॥
अध्याय १६५ नाना - धर्म अग्निदेव बोले - मनुष्य को निरन्तर अपनी आत्मा का ध्यान करते रहना चाहिए । वह हृदय में दीपवत् तथा प्रभविष्णु रूप से विद्यमान रहा करती है । मन को बुद्धि, स्मृति और इन्द्रियों को अनन्य भाव से स्थिर कर लेना चाहिए ॥१ ॥ इस प्रकार ध्यान करनेवाले व्यक्ति को श्राद्ध के रूप में द्रव्य, दही, घृत और दूध देना चाहिए ।
किन्तु प्रियंगु, मसूर, वार्ताकु और कोदो देना चाहिए । यदि पर्व की सन्धियों में राहु के द्वारा सूर्य को ग्रस लिया जाता है तो उसे ' हस्तिच्छाया ' योग कहते हैं और उस समय दिया गया श्राद्ध और दान इत्यादि अक्षय होता है ॥२-३ ॥ जब चन्द्रमा पित्र्य, हंस और कर की स्थिति में रहता है उस समय हस्तिच्छाया ' वैवस्वती ' कहलाती है । १ ख. दुष्टः । २ ख. ग. ङ. च. दत्तो यलेन पूजयिष्यथ । ग्र ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ५५० अग्नौकरणशेषं तु न दद्याद् वैश्वदेविके 1
।
न स्त्री दुष्यति जारेण न विप्रो वेदकर्मणा ॥
संत्यजेद्दूषितां नारीमृतुकालेन शुध्यति । ब्रह्मभूतः स एवेह योगी चाऽऽत्मरतोऽमलः । अधर्मो धर्मबुद्धया तु गृहीतस्तैरपण्डितैः । वृत्तिहीनं मनः कृत्वा क्षेत्रज्ञं परमात्मनि । कुटुम्बैः पञ्चभिर्ग्रामः षष्ठस्तत्र महत्तरः । बहिर्मुखानि ( णि ) सर्वाणि कृत्वा चाभिमुखानि वै । सर्वभावविनिर्मुक्तं क्षेत्रज्ञं ब्रह्मणि न्यसेत् । यन्नास्ति सर्वलोकस्य तदस्तीति विरुध्यते । स्वयंवेद्यं हि तद्ब्रह्म कुमारी स्त्रीसुखं यथा संन्यसन्तं द्विजं दृष्ट्वा स्थानाच्चलति भास्करः उपवासव्रतं चैव स्नानं तीर्थं फलं तपः अग्न्यभावे तु विप्रस्य हस्ते दद्यात्तु दक्षिणे ॥५ ॥
बलात्कारोपभुक्ता ' चेद्वैरिहस्तगताऽपि वा ॥ ॥६ ६ ॥ ॥ य आत्मव्यतिरेकेण द्वितीयं नात्र पश्यति ॥७ ॥
विषयेन्द्रियसंयोगात्केचिद्योगं वदन्ति वै ॥ ८ ॥
आत्मनो मनसश्चैव संयोगं च तथाऽपरे ॥९ ॥
एकीकृत्य विमुच्येत बन्धाद्योगोऽयमुत्तमः ॥१० ॥
देवासुरमनुष्यैर्वा स जेतुं नैव शक्यते ॥११ ॥
मनस्येवेन्द्रियग्रामं मनश्चाऽऽत्मनि योजयेत् ॥१२ ॥
एतज्ज्ञानं च ध्यानं च शेषोऽन्यो ग्रन्थविस्तरः ॥१३ ॥
कथ्यमानं तथाऽन्यस्य हृदये नावतिष्ठते ॥१४ ॥
। अयोगी नैव जानाति जात्यन्धो हि घटं यथा ॥ १५ ॥
। एष मे मण्डलं भित्त्वा परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ १६ ॥
। द्विजसम्पादनं चैव सम्पन्नं तस्य तत्फलम् ॥ १७ ॥
अग्निकरण वैश्वदेव अग्नि में नहीं करना चाहिए । अग्नि के अभाव में ब्राह्मण के दाहिने हाथ में दक्षिणा देनी चाहिए ॥४-५ ॥ ब्राह्मण वेदोक्त कर्म से तथा पर पुरुष के द्वारा बलात् सम्भोग किये जाने पर अथवा शत्रुओं के हाथ में पड़ी हुई स्त्री दूषित नहीं होती है । इस प्रकार की दूषित स्त्री की परिशुद्धि ऋतुकाल से हो जाती है । इस संसार में अपने से भिन्न किसी को न देखनेवाला योगी आत्मा में लीन अमल तथा ब्रह्ममय कहलाता है । कुछ लोग विषय और इन्द्रिय के संयोग को योग कहते हैं, किन्तु अब्राह्मणों के द्वारा धर्मबुद्धि से वह अधर्म समझा जाता है । अन्य आचार्य आत्मा और मन के संयोग को ' योग ' कहते हैं || ६ - ९ ॥ क्षेत्रज्ञ मन को वृत्तिहीन तथा एकाग्र करके परमात्मा में लगा देना चाहिए क्योंकि यही उत्तम योग है । मन आदि पाँच इन्द्रिय - समूहों से छठा आत्मा महान् हुआ करता है क्योंकि देवता, दैत्य अथवा मनुष्यों से उसे जीता नहीं जा सकता है । सभी बहिर्मुखी इन्द्रियों को आत्मा के अभिमुख करके उन्हें मन में तथा मन को आत्मा को लीन करना चाहिए ॥ १०-१२ ॥ सभी भावनाओं से विनिर्मुक्त क्षेत्रज्ञ मन को आत्मा में लीन करना चाहिए । यही ज्ञान है और यही ध्यान है, शेष सब - कुछ ग्रन्थ - विस्तार ही है । यह आत्मा अदृश्य है, अतः इसके अस्तित्व के सम्बन्ध में कहने में विरोध प्रतीत होता है तथा वह किसी के मन को प्रभावित भी नहीं करता है । ब्रह्म स्त्री - सुख के समान स्वसंवेद्य है, किन्तु जिस प्रकार उस स्त्री - सुख का ज्ञान कुमारी को नहीं प्राप्त हो सकता है और उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान भी सबको नहीं प्राप्त हो सकता है । जिस प्रकार जन्म से अन्धा व्यक्ति घड़े को नहीं जानता है, उसी प्रकार अयोगी ब्रह्म को नहीं जानता है । संन्यस्त द्विज को देखकर सूर्य भी अपने स्थान से विचलित हो जाता है और वह मेरे मण्डल का भेदन करके ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ॥१३-१६ ॥ उपवास, व्रत, स्नान, तीर्थ, तपस्या तथा उपनयन संस्कार सम्पन्न किये जाने पर अपना फल प्रदान करते हैं । एकाक्षर ( ॐ ) परब्रह्म है, प्राणायाम परम तप है और सावित्री मन्त्र से बढ़कर पवित्र १ क. च. चेच्चौरह ' । २ च. “ मः । कूटस्थैः पञ्चभिर्गामैः सद्योगश्चथाऽपरे । दे । ३ ग. शेषान्ये ग्रन्थविस्तराः । य ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ५५१ एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः । पूर्वं स्त्रियः सुरैर्भुक्ताः सोमगन्धर्ववह्निभिः । असवर्णेन यो गर्भः स्त्रीणां योनौ निषिच्यते । निःसृते तु ततः शल्ये रजसा शुध्यते ततः । श्वपाकेष्वपि भुञ्जानो ध्यानेन हि विशुध्यति । अक्षयाय यतिः श्राद्धे पङ्क्तिपावनपावनः । प्रायश्चित्तं न पश्यामि येन शुध्येत्स आत्महा । विदुरा नाम चाण्डाला जायन्ते नात्र संशयः । चापो विंशतिवर्षाणि शूकरो दशभिस्तथा । ततो दावाग्निदग्धस्तु स्थाणुर्भवति सानुगः । वर्षजायते ब्रह्मराक्षसः । योगमेव निषेवेत नान्यं मन्त्रमघापहम् इत्यादिमहापुराण आग्नेये नानाधर्मवर्णनं सावित्र्यासु परं नास्ति पावनं परमं स्मृतम् ॥१८ ॥
भुञ्जते मानुषाः पश्चान्नैता दुष्यन्ति केनचित् ॥१९ ॥
अशुद्धा तु भवेन्नारी यावच्छल्यं न मुञ्चति ॥२० ॥
ध्यानेन सदृशं नास्ति शोधनं पापकर्मणाम् ॥२१ ॥
आत्मा ध्याता मनो ध्यानं ध्येयो विष्णुः फलं हरिः ॥२२ ॥
आरूढो नैष्ठिकं धर्मं यस्तु प्रच्यवते द्विजः ॥२३ ॥
ये च प्रव्रजिताः पत्न्यां या चैषां बीजसंततिः ॥२४ ॥
शतिको म्रिमते गृध्रः श्वासी द्वादशिकस्तथा ॥ २५ ॥
अपुष्पो विफलो वृक्षो जायते कण्टकावृतः ॥२६ ॥
ततो वर्षशतान्यष्टौ द्वे च तिष्ठत्यचेतनः ॥२७ ॥
प्लवेन लभते मोक्षं कुलस्योत्सादनेन वा ॥ ॥२८ ॥
नाम पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥
करनेवाला भी कुछ नहीं है । स्त्रियों का भोग पहले देवताओं के द्वारा किया जाता है, तदनन्तर सोम, गन्धर्व और अग्नि के द्वारा और उसके बाद उनका भोग मनुष्यों के द्वारा किया जाता है किन्तु यह किसी से भी दूषित नहीं होती है । स्त्री की योनि में असवर्ण पति द्वारा गर्भाधान हो जाने पर स्त्री तब तक अशुद्ध रहती है जब तक गर्भ का प्रसव नहीं हो जाता है ॥१७-२० ॥ तदनन्तर गर्भ का प्रसव होने के बाद पुन: रजोदर्शन होने पर शुद्धि हो जाती है । ध्यान से बढ़कर पापकर्मों को शुद्ध करनेवाला कुछ भी नहीं होता है । चाण्डालों के साथ भोजन करने पर भी मनुष्य ध्यान के द्वारा शुद्ध हो जाता है । आत्मा ध्यान करनेवाला, मन ध्यान, विष्णु ध्येय और फल हरि हैं । अक्षय विष्णु के लिए शब्द से ही यति पंक्ति-पावनों में पवित्र हो जाता है । जो ब्राह्मण अपने नैष्ठिक धर्म से च्युत हो जाता है, उससे उसे मुक्ति दिलानेवाला कोई प्रायश्चित्त मुझे ज्ञात नहीं है, जिससे वह आत्मघाती शुद्ध हो सके ॥२१ - २३३॥ जो संन्यासी स्त्री - सम्भोग के द्वारा गर्भाधान करता है, उनसे विदुर नामक चाण्डालों की उत्पत्ति होती है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है । ये संन्यासी मरने पर सौ वर्षों तक गृध्र, बारह वर्षों तक कुत्ता, बीस वर्षों तक कौआ तथा दस वर्षों तक शूकर के रूप में रहा करते हैं । तत्पश्चात् वे पुष्प और फलरहित तथा काँटों से घिरे हुए वृक्षों के रूम में उत्पन्न होते हैं ॥ २४-२६ ॥ तत्पश्चात् दावाग्नि से भस्म होकर वे पर्वत की चोटी पर स्थान बनकर रह जाते हैं । उसके बाद एक सौ दस वर्षों तक उन्हें निर्जीव होकर रहना पड़ता है और एक हजार वर्ष पूर्ण हो जाने पर वे ब्रह्मराक्षस हो जाते हैं । तदनन्तर बन्दर के रूप में उत्पन्न होने पर अथवा मूल कुल के नाश होने पर वे पुनः मनुष्य - जन्म को प्राप्त करते हैं । सदैव योग का ही अभ्यास करते रहना चाहिए । क्योंकि पापों को नाश करनेवाला उसके अतिरिक्त और कोई साधन है ही नहीं ॥२७-२८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नानाधर्म - वर्णन नामक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय समाप्त ॥१६५ ॥
१ ङ. नान्योपायम ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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५५२ अग्निपुराणम् अथ षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः वर्णधर्मादिकथनम् पुष्कर उवाच वेदस्मार्तं प्रवक्ष्यामि धर्मं वै पञ्चधा स्मृतम् । वर्णत्वमेकमाश्रित्य योऽधिकारः प्रवर्तते ॥ १ ॥
वर्णधर्मः स विज्ञेयो यथोपनयनं त्रिषु । यस्त्वाश्रमं समाश्रित्य पदार्थः संविधीयते || २ || उक्त आश्रमधर्मस्तु भिन्नपिण्डादिको यथा । उभयेन निमित्तेन यो विधि ः संप्रवर्तते || ३ || नैमित्तिकः स विज्ञेयः प्रायश्चित्तविधिर्यथा । ब्रह्मचारी गृही वाऽपि वानप्रस्थो यतिर्नृप ॥४ ॥
उक्त आश्रमधर्मस्तु धर्मः स्यात्पञ्चधाऽपरः । षाड्गुण्यस्याभिधाने यो दृष्टार्थः स उदाहृतः ॥ ५ ॥
स त्रेधा मन्त्रयागाद्य दृष्टार्थं इति मानवाः । उभयार्थो व्यवहारस्तु दण्डधारणमेव च ॥ ६ ॥
तुल्यार्थानां विकल्पः स्याद्यागमूलः प्रकीर्तितः । वेदे तु विहितो धर्मः स्मृतौ तादृश एव च ॥७ ॥।
अनुवादं स्मृतिः सूते कार्यार्थमिति मानवाः । गुणार्थः परिसंख्यार्थो वाऽनुवादो विशेषतः ॥८ ॥
विशेषदृष्ट एवासौ फलार्थ इति मानवाः । स्यादष्टचत्वारिंशद्भिः संस्कारैर्ब्रह्मलोकगः ॥९ ॥
गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तोन्नयनं ततः । जातकर्म नामकृतिरन्नप्राशनचूडकम् ॥१० ॥
अध्याय १६६ वर्ण - धर्म आदि का कथन पुष्कर बोले- - अब मैं वेदों और स्मृतियों में कहे हुए धर्म के विषय में बतला रहा हूँ जो कि पाँच प्रकार का हुआ करता है और जिसे क्रमशः प्रत्येक वर्ण के व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न होना चाहिए । ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-इन तीन जातियों में होनेवाला उपनयन संस्कार उनका वर्णधर्म है ॥१-२ ॥ आश्रमों के अनुसार किया जानेवाला धर्म ‘ आश्रम - धर्म ' कहलाता है; जैसे भिन्न - पिण्डादि क्रियाएँ । ( लौकिक तथा पारलौकिक ) दोनों निमित्तों से जो विधि की जाती है उसे ‘ नैमित्तिक - विधि ' कहते हैं, जैसे- प्रायश्चित्त विधि । आश्रम - धर्म पाँच प्रकार का होता है, जो कि ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी तथा राजा के लिए हुआ करता है । षाड्गुण्य के अभिधान में जिसकी प्रवृत्ति होती है उसे ' दृष्टार्थ ' कहते हैं ॥३-५ ॥ उसके तीन भेद होते हैं । मन्त्र यश - प्रभृति ' अदृष्टार्थ ' हैं, ऐसा मनु आदि कहते हैं । इसके सिवा ‘ उभयार्थक - व्यवहार ', ' दण्डधारण ' और ' तुल्यार्थ - विकल्प ' ये भी यज्ञमूलक धर्म के अंग कहे गये हैं । वेद में धर्म का जिस प्रकार प्रतिपादन किया गया है, स्मृति में भी उसी प्रकार है । कार्य के लिए स्मृति वेदोक्त धर्म का अनुवाद करती है - ऐसा मनु आदि का मत है । इसलिए स्मृतियों में उक्त धर्म वेदोक्त धर्म का गुणार्थ, परिसंख्या, विशेषत: अनुवाद, विशेष दृष्टार्थ अथवा फलार्थ है, यह राजर्षि मनु का सिद्धान्त है ॥६-८३ ॥ निम्नलिखित अड़तालीस संस्कारों से सम्पन्न मनुष्य ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है- ( १ ) गर्भाधान, ( २ ) पुंसवन, ( ३ ) सीमन्तोन्नयन, ( ४ ) जातकर्म, ( ५ ) नामकरण, ( ६ ) अन्नप्राशन, ( ७ ) चूड़ाकर्म, ( ८ ) उपनयन - संस्कार, ( ९ -१२ ) चार वेद - व्रत ( वेदाध्यन ), CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ५५३ संस्कारश्चोपनयनं वेदव्रतचतुष्टयम् । देवयज्ञः पितृयज्ञो मनुष्यभूतयज्ञकौ । पार्वणश्राद्धं श्रावण्याग्रहायणी च चैत्र्यपि अग्न्याधेयमग्निहोत्रं ' दर्शः स्यात्पौर्णमासकः । सौत्रामणिः सप्तसोमसंस्थाऽग्निष्टोम आदितः । अतिरात्रोऽथाप्तोर्यामो ह्यष्टौ चाऽऽत्मगुणास्ततः । अकार्पण्यास्पृहाशौचं यस्यैते स परं व्रजेत् । स्नानभोजनकाले च षट्सु मौनं समाचरेत् दन्तच्छेदनमुष्णं च सप्त शत्रुषु वर्जयेत् । अन्यगोत्रोऽप्यसम्बद्धः प्रेतस्याग्निं ददाति यः उदकं च तृणं भस्म द्वारं पन्थास्तथैव च पञ्चप्राणाहुतीर्दद्यादनामाङ्गुष्ठयोगतः स्नानं स्वधर्मचारिण्या योगः स्याद्यज्ञपञ्चकम् ॥११ ॥
ब्रह्मयज्ञः सप्त पाकयज्ञसंस्थाः पुरोष्टकाः ॥१२ ॥
। आश्वयुजी सप्तहविर्यज्ञसंस्थास्ततः स्मृताः ॥१३ ॥
चातुर्मास्याग्रहायणेष्टिर्निरूढः पशुबन्धकः ॥१४ ॥
अत्यग्निष्टोम ' उक्थ्यश्च षोडशी वाजपेयकः ॥ १५ ॥
दया क्षमाऽनसूया च अनायासोऽथ मङ्गलम् ॥१६ ॥
प्रचारे मैथुने चैव प्रस्रावे दन्तधावने ॥१७ ॥
। पुनर्दानं पृथक्पाकं सामिषं पयसाऽन्वितम् ॥१८ ॥
स्नात्वा पुष्पं न गृह्णीयाद्देवायोग्यं तदीरितम् ॥१९ ॥
। पिण्डं चोदकदानं च स दशाहं समापयेत् ॥ २० ॥
। एभिरन्तरितं कृत्वा पङ्क्तिदोषो न विद्यते ॥ २१ ॥
॥२२ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये वर्णधर्मादिवर्णनं नाम षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१६६ ॥
( १३ ) स्नान ( समावर्तन ), ( १४ ) सहधर्मिणी संयोग ( विवाह ), ( १५-१९ ) पञ्चयज्ञ - देवयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, भूतयज्ञ तथा ब्रह्मयज्ञ, ( २२-२६ ) सातपाक - यज्ञ - संस्था, ( २७-३४ ) अष्टका - अष्टका सहित तीन पार्वणश्राद्ध, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री और आश्वयुजी, ( ३५-४१ ) सात हविर्यज्ञ सस्था - अग्न्याधेय, अग्निहोत्र, दर्श - पौर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रहायणेष्टि, निरूढ पशुबन्ध एवं सौत्रामणि, ( ४२-४८ ) सात सोम संस्था - अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम । आठ आत्मगुण हैं- दया, क्षमा, अनसूया, अनायास, मांगल्य, अकार्पण्य, अस्पृहा तथा शौच । जो इन गुणों से युक्त होता है, वह परमधाम ( स्वर्ग ) को प्राप्त करता है ॥९ -१६३ ॥ मार्गगमन, मैथुन, मल - मूत्रोत्सर्ग, दन्तधावन, स्नान और भोजन- इन छह कार्यों को करते समय मौन धारण करना चाहिए । दान की हुई वस्तु का पुनः दान, पृथक्पाक, घृत के साथ जल पीना, दूध के साथ जल पीना, रात्रि में जल पीना, दाँत से नख आदि काटना एवं बहुत गरम जल पीना - इन बातों का परित्याग कर देना चाहिए । स्नान के पश्चात् पुष्पचयन न करें, क्योंकि वे पुष्प देवता के चढ़ाने योग्य नहीं माने गये हैं । यदि कोई अन्यगोत्रीय असम्बन्धी पुरुष किसी मृतक का अग्नि - संस्कार करता है तो उसे दस दिन तक पिण्ड तथा उदक - दान का कार्य भी पूर्ण करना चाहिए । जल, तृण, भस्म, द्वार एवं मार्ग - इनको बीच में रखकर जाने से पङ्क्तिदोष नहीं माना जाता । भोजन के पूर्व अनामिका और अङ्गुष्ठ के संयोग से पञ्चप्राणों को आहुतियाँ देनी चाहिए ॥१७-२२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में वर्णधर्मादि - वर्णन नामक एक सौ छाछठवाँ अध्याय समाप्त ॥१६६ ॥
१ घ. ‘ हारस्तु द । २ घ. उक्थश्च । ३ ख. ग. घ. ' क्यानमाज्येन पयसा निशि । द । ४ क. ङ. ' मुष्ट च । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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५५४ अग्निपुराणम् अथ सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः अयुतलक्ष कोटिहोमः अग्निरुवाच श्री शान्तिविजयाद्यर्थं ग्रहयज्ञं पुनर्वदे । ग्रहयज्ञोऽयुतहोमलक्षकोट्यात्मकस्त्रिधा ॥१ ॥
वेदेरैशे ह्यग्निकुण्डाद्ग्रहनावाह्य मण्डले । सौम्ये गुरुर्बुधश्चैशे शुक्रः पूर्वदले शशी || २ || आग्नेये दक्षिणे भौमो मध्ये स्याद्भास्करस्तथा । शनिराप्येऽथ नैर्ऋत्ये राहुः केतुश्च वायवे || ३ || ईशश्चोमा गुहो विष्णुर्ब्रह्मेन्द्रौ यमकालकौ । चित्रगुप्तश्चाधिदेवा अग्निरापः क्षितिर्हरिः || ४ || इन्द्र ऐन्द्री देवता च प्रजेशोऽहिर्विधिः क्रमात् । एते प्रत्यधिदेवाश्च गणेशो दुर्गयाऽनिलः || ५ || खमश्विनौ च सम्पूज्य यजेद्बीजैश्च वेदजैः । अर्क: पलाश: खदिरो ह्यपामार्गश्च पिप्पलः || ६ || उदुम्बरः शमी दूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात् । मध्वाज्यदधिसंमिश्रा होतव्याश्चाष्टधा शतम् ॥७ ॥
एकाष्टचतुरः कुम्भान्पूर्य ' पूर्णाहुतिं तथा । वसोर्धारां ततो दद्याद्दक्षिणां च ततो ददेत् ॥८ ॥
यजमानं चतुर्भिस्तैरभिषिञ्चेत्समन्त्रकैः । सुरास्त्वामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ ९ ॥
वासुदेवो जगन्नाथस्तथा संकर्षणः प्रभुः । प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च भवन्तु विजयाय ते ॥१० ॥
अखण्डलोऽग्निर्भगवान्यमो वै नैर्ऋतस्तथा । वरुणः पवनश्चैव धनाध्यक्षस्तथा शिवः ॥ ११ ॥
अध्याय १६७ अयुतलक्षकोटि - होम अग्निदेव बोले - अब मैं ऐश्वर्य, शान्ति और विजय इत्यादि के लिए ग्रहयज्ञ का वर्णन कर रहा हूँ । यह ग्रहयज्ञ तीन प्रकार का होता है जिसमें दस हजार, एक लाख और एक करोड़ आहुतियाँ दी जाती हैं || १ || वेदी के मध्य में अग्निकुण्ड से ग्रहों को मण्डल में आहूत करके पश्चिम दिशा में बृहस्पति, ईशानकोण में बुध, पूर्वदल के ऊपर शुक्र, आग्नेयकोण में चन्द्रमा, दक्षिण की ओर मङ्गल, मध्य में सूर्य, पश्चिम में शनि, नैर्ऋत्य में राहु और वायव्यकोण में केतु की स्थापना करनी चाहिए । ईश, उमा, गुह, विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, यम, काल, चित्रगुप्त, अग्नि, जल, पृथ्वी, विष्णु, इन्द्र, प्रजेश, सर्प और ब्रह्मा - ये देवता तथा गणेश, दुर्गा, वायु, आकाश और अश्विनीकुमारों का पूजन करके वेदों के बीज मन्त्रों से उनका यजन करना चाहिए ॥ २-५३ ॥ अर्क, पलाश, खदिर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा, कुश और समिधाओं को क्रमशः शहद, घी तथा दही में डुबोकर एक सौ आठ आहुतियाँ देनी चाहिए । तेरह घड़ों को भरकर वसुधारा के रूप में पूर्णाहुति और उसके पश्चात् दक्षिणा देनी चाहिए ॥६-८ ॥ यजमान का चार घड़ों के जल से मन्त्रों के साथ अभिषेक करना चाहिए । मन्त्र यह है कि - ब्रह्मा, विष्णु, महेश, वासुदेव, जगन्नाथ, बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध - ये देवता आपका अभिषेक करके आपकी विजय करते रहें । इन्द्र, अग्नि, यम, भगवान्, १ क. ङ. न्पूज्य पृष्टास्ततो ददेत् । व ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ५५५ ब्रह्मणा सहितः शेषो दिक्पालाः पान्तु वः सदा । बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिस्तुष्टिः कान्तिश्च मातरः । आदित्यश्चन्द्रमा भौमो बुधजीवसितार्कजाः । देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । देवपत्न्यो द्रुमा नागा दैत्याश्चाप्सरसां गणाः । औषधानि च रत्नानि कालस्यावयवाश्च ये । एते त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वकामार्थसिद्धये सर्वकामार्थसिद्धये ॥ कपिले सर्वदेवानां पूजनीयाऽसि रोहिणि । पुण्यस्त्वं शङ्ख पुण्यानां मङ्गलानां च मङ्गलम् । धर्म त्वं वृषरूपेण जगदानन्दकारकः । हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः । पीतवस्त्रयुगं यस्माद्वासुदेवस्य वल्लभम् । विष्णुस्त्वं मत्स्यरूपेण यस्मादमृतसम्भवः ।
यस्मात्वं पृथिवी सर्वा धेनुः केशवसंनिभा ।
कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया मतिः ॥१२ ॥
एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु धर्मपल्यः समागताः ॥१३ ॥
ग्रहास्त्वामभिषिञ्चन्तु राहुः केतुश्च तर्पिताः ॥१४ ॥
ऋषयो मनवो गावो देवमातर एव च ॥ १५ ॥
अस्त्राणि सर्वशस्त्राणि राजानो वाहनानि च ॥ १६ ॥
सरितः सागराः शैलास्तीर्थानि जलदा नदाः ॥ १७ ॥
अलङ्कृतस्ततो अलङ्कृतस्ततो दद्याद्धेमगोऽन्नभुवादिकम् ॥१८ ॥
तीर्थदेवमयी यस्मादतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥। १ ९ ॥ विष्णुना विधृतो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥२० ॥
अष्टमूर्तैरधिष्ठानमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥२१ ॥
अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ २२ ॥
प्रदानात्तस्य वै विष्णुरतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ २३ ॥
चन्द्रार्कवाहनो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥२४ ॥
सर्वपापहरा नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ २५ ॥
नैर्ऋत, वरुण, पवन, कुबेर, शिव, ब्रह्मा, शेष, दिक्पाल आपकी सदा रक्षा करते रहें । कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, मति, लज्जा, शान्ति, तुष्टि और कान्ति ये माताएँ हैं । ये धर्मपत्नियाँ आकर आपका अभिषेक करें ॥९ -१३ ॥ आदित्य, चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि, राहु और केतु सन्तुष्ट होकर आप लोगों का अभिषेक करते रहें । देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, ऋषि, मनु, गौयें, देवमाताएँ, देवपत्नियाँ, वृक्ष, नाग, दैत्य, अप्सराएँ, अस्त्र, शस्त्र, राजा, वाहन, ओषधियाँ, रत्न, कालविभाग, नदियाँ, सागर, पर्वत, तीर्थ, मेघ और नद ये सब लोग सभी कामनाओं की सिद्धि के लिए आपका अभिषेक करें । इस प्रकार अलंकृत होकर स्वर्ण, गो, अन्न और भूमि आदि का दान करना चाहिए ॥१४-१८ ॥ अयि कपिले! अयि रोहिणी, आप सभी देवताओं के पूज्य हैं । आप तीर्थों और देवताओं से युक्त हैं, इसलिए आप हमें शान्ति प्रदान करें । हे धर्म! आप वृष रूप से संसार को आनन्द प्रदान करनेवाले हैं । आप अष्टमूर्ति के स्थान हैं, इसलिए आप हमें शान्ति प्रदान कीजिये । हे शङ्ख, आप पुण्यों के पुण्य और मङ्गलों के मङ्गल हैं, आपको विष्णु निरन्तर धारण किये रहते हैं, इसलिए आप मेरी रक्षा करें । हे हेम, आप हिरण्यगर्भ के गर्भ में स्थित रहनेवाले, सूर्य के बीज और अनन्त पुण्य फलों को देनेवाले हैं, इसलिए आप हमें शान्ति प्रदान कीजिये । पीताम्बर का जोड़ा भगवान् वासुदेव को प्रिय है और उसके दान से विष्णु प्रसन्न होते हैं, अतः मुझे शान्ति प्रदान कीजिये ॥१९ -२३ ॥ हे विष्णु, आप मत्स्य रूप में अमृत से उत्पन्न होनेवाले तथा चन्द्रमा और सूर्य को नित्य वहन करनेवाले हैं, अतः आप मुझे शान्ति प्रदान कीजिये । हे पृथ्वी, आप भगवान् विष्णु के समान कामनाओं को पूर्ण करनेवाली और नित्य सभी पापों को नष्ट करनेवाली हैं । अतः आप मुझे शान्ति प्रदान CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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५५६ अग्निपुराणम् यस्मादायसकर्माणि तवाधीनानि सर्वदा । ' यस्मात्त्वं सर्वयज्ञानामङ्गत्वेन व्यवस्थितः 1 । गवामङ्गेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश । यस्मादशून्यं शयनं केशवस्य शिवस्य च । तथा रत्नेषु सर्वेषु सर्वे देवाः प्रतिष्ठिताः । यथा भूमिप्रदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् । ग्रहयज्ञोऽयुतहोमो दक्षिणाभी रणे जितिः । सर्वकामाप्तये लक्षकोटिहोमद्वयं मतम् । मेखलायोनिसंयुक्तं कुण्डं चत्वार ऋत्विजः । चतुर्हस्तं द्विहस्तं वा तार्क्ष्यं चात्राधिकं यजेत् । विषयापहरो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे । वसोर्धारां ततो दद्याच्छय्याभूषादिकं ददेत् । ( ' पुत्रान्नराज्यविजयभुक्तिमुक्त्यादि ' चाऽऽप्नुयात् लाङ्गलाद्यायुधादीनि अतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥२६ ॥
योनिर्विभावसोर्नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ २७ ॥
यस्मात्तस्माच्छिवं मे यादिहलोके परत्र च ॥ २८ । शय्या ममाप्यशून्याऽस्तु दत्ता जन्मनि जन्मनि ॥२९ ॥
तथा शान्तिं प्रयच्छन्तु रत्नदानेन मे सुराः ॥ ३० ॥
दानान्यन्यानि मे शान्तिर्भूमिदानाद्भवत्विह ॥ ३१ ॥
विवाहोत्सवयज्ञेषु प्रतिष्ठादिषु कर्मसु ॥ ३२ ॥
गृहदेशे मण्डपेऽथ अयुते हस्तमात्रकम् ॥ ३३ ॥
स्वयमेकोऽपि वा लक्षे सर्वं दशगुणं हि तत् ॥ ३४ ॥
सामध्वनिशरीरस्त्वं वाहनं परमेष्ठिनः ॥३५ ॥
पूर्ववत्कुण्डमामन्त्र्य लक्षहोमं समाचरेत् । ३६ ॥ तत्रापि दश चाष्टौ च लक्षहोमे तथर्त्विजः ॥३७ ॥
। दक्षिणाभिः फलेनास्माच्छत्रुघ्नः कोटिहोमकः ॥ ३८ ॥
कीजिये । लोहे के जितने भी कर्म हैं, वे सब आपके अधीन रहते हैं और हल इत्यादि आपके आयुध हैं, इसलिए आप मुझे शान्ति प्रदान कीजिये । आप सभी यज्ञों के अङ्ग रूप में व्यवस्थित रहनेवाले तथा सूर्य के उत्पत्ति - स्थान हैं, इसलिए आप मुझे नित्य शान्ति प्रदान कीजिये || २४ - २७ ॥ गायों के अङ्गों में चौदह भुवन रहा करते हैं, इसलिए इस लोक और परलोक में मेरा कल्याण हो । विष्णु और शिव की शय्या सदैव अशून्य रहा करती है, इसलिए प्रत्येक जन्म में दान की हुई शय्या मेरे लिये अशून्य रहे । सभी रत्नों में सभी देवता प्रतिष्ठित रहा करते हैं, इसलिए वे देवता रत्नदान से मुझे शान्ति प्रदान करें । अन्नदान भूदान के सोलहवें अंश को भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं, इसलिए इस लोक में भूदान से मेरी शान्ति हो । २८-३१ ॥ ग्रह- यज्ञ, अयुत होम और दक्षिणाओं से रण में विजय तथा विवाहोत्सव आदि यज्ञों में और ( देव ) प्रतिष्ठादि कर्मों में सफलता प्राप्त होती है । सभी कर्मों की प्राप्ति के लिए लक्ष और कोटि होम माने गये हैं । अयुत होम में गृहदेश स्थित मण्डल में एक हाथ लम्बा तथा मेखला और योनि से युक्त कुण्ड का निर्माण करना चाहिए । चार ऋत्विज होते हैं, किन्तु लक्ष होम में स्वयं एक ऋत्विज भी रह सकता है जो दस गुणों से युक्त रहा करता है । इसमें चार अथवा दो हाथ लम्बे गरुड़ की आकृति का निर्माण करके उसका यजन करना चाहिए और पूर्ववत् कुण्ड को आमन्त्रित करके लक्ष होम का अनुष्ठान करना चाहिए । आमन्त्रण मन्त्र यह है - ‘ आपका शरीर सामध्वनि का है, आप विष्णु के वाहन हैं, ' आप सांसारिक विषयों का अपहरण करनेवाले हैं, इसलिए आप मुझे शान्ति प्रदान कीजिये ' ॥३२-३६ ॥ तदनन्तर वसुधारा तथा शय्या और भूषण आदि का दान करना चाहिए । लक्ष होम में अट्ठारह ऋत्विज होते हैं । इससे पुत्र, अन्न, राज्य, विजय, भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है । दक्षिणा के द्वारा कोटिहोम शत्रुओं का नाशक होता है । कोटि होम में कुण्ड चार अथवा आठ हाथ का होता है जिसमें बारह, १ यस्मात्त्वं “ व्यवस्थितः ग. पुस्तके नास्ति । २ पुत्रान्नराज्य गच्छति च पुस्तके नास्ति । ३ ख. ' त्रान्स्वरा ं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA