अग्नि पुराण — पृष्ठ 581–590

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च मनुष्याणां तु हरणे ' स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य च भक्ष्यभोज्यापहरणे ' यानशय्यासनस्य च तृणकाष्ठद्रुमाणां च शुष्कान्नस्य गुडस्य च पितुः पत्नीं च भगिनीमाचार्यतनयां तथा गुरुतल्पेऽभिभाष्यैनस्तप्ते स्वर्णाद्ययोमये चान्द्रायणान्वा त्रीन्मासानभ्यस्य गुरुतल्पगः ) यत्पुंसः परदारेषु तच्चैनां कारयेद्व्रतम् सपिण्डापत्यदारेषु प्राणत्यागो विधीयते तद्भैक्ष्यभुग्जपन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति चाण्डालीं पुक्कसीँ वाऽपि स्नुषां च भगिनीं सखीम् मातुलानीं स्वसारं च सगोत्रामन्यमिच्छतीम् ५७७ । अयस्कांस्योपलानां च द्वादशाहं कणान्नभुक् ॥४३ ॥

। वापीकूपतडागानां शुद्धिश्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥४४ ॥

। पुष्पमूलफलानां च पञ्चगव्यं विशोधनम् ॥४५ ॥

। चेलचर्मामिषाणां च त्रिरात्रं स्यादभोजनम् ॥४६ ॥

। ( आचार्याणीं ' ( नीं ) सुतांस्वांचगच्छंश्चगुरुतल्पगः ॥४७ ॥

। सूर्मी ज्वलन्तीं चाऽऽश्लिप्य मृत्युना स विशुध्यति ॥४८ ॥

। एवमेव विधिं कुर्याद्योषित्सु पतितास्वपि ॥४९ ॥

। रेतः सिक्त्वा कुमारीषु चाण्डालीषु सुतासु च ॥५० ॥

। यत्करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनं ' द्विजः ॥५१ ॥

। पितृव्यदारगमने भ्रातृभार्यागमे तथा ॥५२ ॥

। मातुः पितुः स्वसारं च निक्षिप्तां शरणागताम् ॥५३ ॥

। शिष्यभार्या गुरोर्भार्या गत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥५४ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये प्रायश्चित्तवर्णनं नाम त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१७३ ॥

पीनेवाले को एक वर्ष तक कृच्छ्र - व्रत का आचरण करना चाहिए । मणि, मोती मूँगा, ताँबा, चाँदी, लोहा, काँसा और पत्थर चुरानेवाले को बारह दिन तक किनकी खाकर रहना चाहिए । मनुष्यों, स्त्रियों, खेतों, घरों, बावलियों और तालाबों का अपहरण करनेवाले की शुद्धि चान्द्रायण - व्रत से मानी गयी है ॥४२-४४ ॥ भक्ष्य, भोजन, सवारी, शय्या, आसन, पुष्पकन्द और फलों को चुरानेवाले की शुद्धि पञ्चगव्य से हो जाती है ॥४५ ॥ तृण, काष्ठ, वृक्ष, शुष्कान्न, गुड़, वस्त्र,

चमड़ा और मांस चुरानेवाले को तीन रातों तक बिना भोजन किये रहना चाहिए । माता, बुआ, आचार्य - पुत्री, आचार्य-पत्नी और अपनी पुत्री से सहवास करनेवाला गुरुतल्पग कहलाता है । इस प्रकार के व्यक्ति को जलते हुए लाल-लाल लोहे से बनी हुई स्त्री - मूर्ति का आलिङ्गन करके आत्मदाह करना चाहिए अथवा उसे तीन महीने तक चान्द्रायण-व्रत करना चाहिए ॥४६-४८ ॥ यही नियम पतित स्त्रियों के साथ सहवास करनेवाले के लिए भी है । जो व्यक्ति परपत्नी के साथ सहवास करता है उसे उस स्त्री से उपर्युक्त व्रत को करवाना चाहिए । कुमारी, चाण्डाल- कन्या, सगोत्र स्त्री और अपनी पुत्री के साथ सहवास करनेवाले के लिए आत्महत्या का विधान है । एक रात्रि शूद्रा के साथ सहवास करनेवाला ब्राह्मण भिक्षान्न खाकर अथवा तीन वर्षों तक अपने मन्त्र का जप करने से शुद्ध होता है ॥४९ -५१३ ॥ चाची, भाई की स्त्री, चाण्डाली, बुआ, बहन की सखी, मौसी, शरण आयी हुई स्त्री, मामी, सगोत्र स्त्री, शिष्यपत्नी, गुरुपत्नी और जिसकी इच्छा न हो ऐसी स्त्री के साथ सहवास करनेवाले को चान्द्रायण - व्रत करना चाहिए ॥५२-५४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में प्रायश्चित्त वर्णन नामक एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥।१७३ ॥ १ च. ' णे यानशय्यासनस्य । २ क. ख. णे परिश ' । ३ आचार्याणीं " गुरुतल्पगः क. ङ पुस्तकयोर्नास्ति । ४ च. ' चार्यस्य स्नुषां चैव ग ' । ५ क. ख. ग. ङ. ' वनाद्विजः । ६ क. ख. ग. ङ. ' सीं व्याधीं ' स्नु ' । • ३७ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 582

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५७८ अग्निपुराणम् अथ चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः प्रायश्चित्तानि अग्निरुवाच ' देवाश्रमार्चनादीनां प्रायश्चित्तं तु लोपतः । पूजालोपे चाष्टशतं जपेद्द्विगुणपूजनम् ॥ ॥१ १ ॥ ॥ पञ्चोपनिषदै मन्त्रैर्हुत्वा ब्राह्मणभोजनम् । सूतिकान्त्यजकोदक्यास्पृष्टे देवे शतं जपेत् || २ || पञ्चोपनिषदैः पूजां द्विगुणं ' स्नानमेव च । विप्रभोज्यं होमलोपे होमस्नानं तथाऽर्चनम् ॥३ ॥

होमद्रव्ये मूषिकाद्यैर्भक्षिते कीटसंयुते । तावन्मात्रं परित्यज्य प्रोक्ष्य ' देवादि पूजयेत् ॥४ ॥

अंकुरार्पणमात्रं तु च्छिन्नं भिन्नं परित्यजेत् । अस्पृश्यैश्चैव संस्पृष्टे अन्यपात्रे तदर्पणम् ॥५ ॥

देवमानुषविघ्नघ्नं पूजाकाले तथैव च । मन्त्रद्रव्यादिव्यत्यासे ' मूलं जप्त्वा पुनर्जपेत् ॥६ ॥

कुम्भे नष्टे शतजपो देवे तु पतिते करात् । भिन्ने नष्टे चोपवासः शतहोमाच्छुभं भवेत् ॥७ ॥

कृते पापेऽनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते । प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं हरिसंस्मरणं परम् ॥८ ॥

अध्याय १७४ प्रायश्चित्त अग्निदेव बोले - किसी देवता आदि के पूजन के छूट जाने पर प्रायश्चित्तस्वरूप उसी देवता के मन्त्र का एक सौ आठ बार जप करना चाहिए और देवता का पूजन दो बार करना चाहिए || १ || पञ्चोपनिषद् मन्त्रों से हवन करके ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए । यदि मूर्ति का स्पर्श गणिका, प्रसूता स्त्री अथवा अन्त्यज जाति के व्यक्ति के द्वारा हो जाय तो उस देवता से सम्बद्ध मन्त्रों का सौ बार जप करना चाहिए ॥२ ॥ यदि असावधानी से कोई होम कार्य करने से रह जाय तो पञ्चोपनिषद्

मन्त्रों से दुगुनी पूजा करके होम स्नान, देवार्चन और ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए । यदि होम की सामग्री को चूहे आदि खा लें या उसमें कीड़े लग जायँ तो उतने अंश को निकालकर और सामग्री को धोकर देवता का पूजन करना चाहिए ॥३-४ ॥ जहाँ देवता को अंकुरमात्र अर्पण करना हो वहाँ उसके छिन्न - भिन्न भाग को छोड़ देना चाहिए । यदि अछूतों के द्वारा उसका स्पर्श हो जाय तो उसे अन्य पात्र में रखकर देवता को अर्पित करना चाहिए । पूजा के समय देवताओं तथा मनुष्यों से उत्पन्न होनेवाले विघ्नों का नाश करने के लिए और मन्त्र तथा द्रव्यादि के उलट जाने पर मूल मन्त्र का पुनः - पुन: जप करना चाहिए ॥५-६ ॥ कलश के नष्ट हो जाने पर मन्त्र का सौ बार जप करना चाहिए । देवता की मूर्ति हाथ से गिर जाने पर, उसके टूट जाने पर और उसके नष्ट हो जाने पर उपवास और सौ बार होम करने पर शुभ होता है || ७ || किसी पाप के हो जाने पर जिस मनुष्य को उसका पश्चात्ताप होता है उसके लिए एकमात्र हरि - स्मरण ही श्रेष्ठ प्रायश्चित्त है ॥८ ॥

१ ख. ग. ‘ श्रयार्च ’ । २ ख. ग. ' श्चित्तमशेषतः । ३ ' च. ' त्रैर्दत्त्वा ब्रा ' । ४ ग. द्विगुणां । ५ ग. प्रेक्ष्य । ६ क. ङ. ' त् । स्पृशेच्चैव तु सं । ७ क. ङ. ' विप्रघ्नं । ८ ख. ग. ' दि चाभ्यासे । ९ च. ' नर्यजेत् । १० क. ङ. शत होमो विभावसौ । कृ ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 583

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चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ५७ ९ चान्द्रायणं पराको वा प्राजापत्यमघौघनुत् गायत्री प्रणवस्तोत्रमन्त्रजप्यमघान्तकम् सूर्येशशक्ति श्रीशादिमन्त्राः कोट्यधिकाः पृथक् ' नृसिंहद्वादशाष्टार्णमालामन्त्राद्यघौघनुत् ’ द्विविद्यारूपको विष्णुरग्निरूपस्तु गीयते प्रवृत्तौ तु निवृत्तौ तु इज्यते भुक्तिमुक्तिदः जप्यं स्तुतिश्च प्रणतिः शरीरस्थाद्यघौघनुत् ' तुलापुरुषमुख्यानि ( णि ) महादानानि षोडश तिथिवारर्क्षसंक्रान्तियोगमन्वादिकालके ' गङ्गा गया प्रयागश्च काश्ययोध्या ह्यवन्तिका शालग्रामप्रभासाद्यं तीर्थं चाघौघघातकम् पुराणं ब्रह्म चाऽऽग्नेयं ब्रह्मा विष्णुर्महेश्वरः । सूर्येशशक्तिश्रीशादिमन्त्रजप्यमघौघनुत् ॥९ ॥

। काद्यैराबीजसंयुक्तैराद्यैराद्यै ' स्तदन्तकैः ॥१० ॥

। ॐ ह्रीमाद्याश्चतुर्थ्यन्ता नामोन्ताः सर्वकामदाः ॥११ ॥

। आग्नेयस्य पुराणस्य पठनं श्रवणादिकम् ॥१२ ॥

। परमात्मा ' देवमुखं सर्ववेदेषु गीयते ॥ १३ ॥

। अग्निरूपस्य विष्णोर्हि हवनं ध्यानमर्चनम् ॥१४ ॥

। ' दश स्वर्णानि दानानि धान्यद्वादशमेव च । १५ ॥ । अन्नदानानि मुख्यानि सर्वाण्यघहराणि हि ॥ १६ ॥

। व्रतादि सूर्येशशक्तिश्रीशादेरघघातनम् ॥१७ ॥

। कुरुक्षेत्रं पुष्करं च नैमिषं पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥

। अहं ब्रह्म परं ज्योतिरिति ध्यानमघौघनुत् ॥ १ ९ ॥ । अवताराः सर्वपूजाः प्रतिष्ठाप्रतिमादिकम् ॥२० ॥

चान्द्रायण, पराक और प्राजापत्य व्रत पापसमूह को नष्ट करनेवाले हैं । सूर्य, ईश्वर, शक्ति और विष्णु आदि के मन्त्रों के जाप भी पापपुञ्ज को नष्ट कर देता है । इसी प्रकार गायत्री और प्रणवस्तोत्र मन्त्रों का जप भी पापों का नाशक होता है । सूर्य, ईश्वर और नारायण आदि के मन्त्र तथा वे मन्त्र जो ' क ' से प्रारम्भ होकर ' र ' से अन्त होते हैं सभी इच्छाओं की पूर्ति करनेवाले हैं किन्तु इन मन्त्रों के आदि में ' ॐ ह्रीं ' आना चाहिए । तदनन्तर चतुर्थी एक वचन में देवता के नाम का प्रयोग करके अन्त में ‘ नम: ' पद का प्रयोग करना चाहिए । नृसिंह के लिए पढ़े गये द्वादशाक्षर और अष्टाक्षर मन्त्रादि पापसमूह को नष्ट करनेवाले होते हैं । उसी प्रकार अग्निपुराण का पाठ और श्रवण भी पापों का नाशक होता है ॥ ९ -१२ ॥ द्विविद्यारूप विष्णु अग्निरूप होता है । जिसका गान सभी वेदों में परमात्मा और देवमुख के रूप में भी किया जाता है । अग्निरूप विष्णु का हवन, ध्यान और अर्चन प्रवृत्ति कर्म और निवृत्ति कर्म में भोग और मोक्ष को प्रदान करनेवाला होता है । अग्नि के मन्त्रों का जप करना, उसकी स्तुति करना अथवा उसको प्रणाम करना सभी शरीरस्थ पापों का नाश कर देता है ॥१३-१४३ ॥ सोने का दस प्रकार का दान, बारह प्रकार का धान्यों का दान, तुलादान, सोलह प्रकार के महादान और मुख्य अन्नदान सभी प्रकार के पापों का नाश करनेवाले हैं ॥१५-१६ ॥ सूर्य, ईश, शक्ति और नारायण आदि के वे व्रतादि जो शुभ तिथि, वार, नक्षत्र, सङ्क्रान्ति और मन्वादि काल में किये जाते हैं, सभी पापों के नाशक होते हैं ॥१७ ॥ गङ्गा, गया, प्रयाग, काशी, अयोध्या, अवन्तिका,

कुरुक्षेत्र, पुष्करक्षेत्र, नैमिषक्षेत्र, पुरुषोत्तमक्षेत्र, शालग्राम और प्रभासादि तीर्थ पाप - पुञ्ज के नाशक हैं । ' अहं ब्रह्म परं ज्योतिः ' इस मन्त्र का जप सभी पापों का नाशक है ॥१८-१९ ॥ अग्निपुराण, ब्रह्मपुराण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, विष्णु के सभी अवतार, १ क. ङ. काष्ठै रात्राञ्जसं । २ च. ' दशस्तोत्रमा ' । ३ क. ग. ङ. ' शार्णं तु मा ' । ४ ' द्विविद्यारूपको " गीयते ' इत्यत्र च. पुस्तके " मुच्यते सर्वपापेभ्यो ह्यग्निरप्यत्र गीयते " इतीदं दृश्यते । ५ क. ङ. ' त्मा सर्वमु ' । ६ क. ङ. ' वृत्तैस्तु निवृत्तैस्तु भुज्य ' । ७ च. ' त् । शतस्वर्णादिपानानि धान्यानि द्वा ' । ८ ' दशस्वर्णानि धान्यद्वादशमेव च ' इत्यत्र “ यदा स्वर्णादिदानादिध्यानाद्या दश मेखलाः । " इति क. ङ. पुस्तकयोर्वर्तते । ९ ख. ग. ' दिलग्नके । व्र ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 584

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५८० अग्निपुराणम् ज्योतिःशास्त्रपुराणानि स्मृतयस्तु तपो व्रतम् । अर्थशात्रं च सर्गाद्या आयुर्वेदो धनुर्मतिः ॥ २१ ॥

शिक्षा छन्दो व्याकरणं निरुक्तं चाभिधानकम् । कल्पो न्यायश्च मीसांसा ह्यन्यत्सर्वं हरिः प्रभुः ॥२२ ॥

एको द्वयोर्यतो यस्मिन्यः सर्वमिति वेद यः । तं दृष्ट्वाऽन्यस्य पापानि विनश्यन्ति हरिश्च सः ॥२३ ॥

विद्याष्टादशरूपश्च ' सूक्ष्मः स्थूलोऽपरो हरिः । ज्योतिः सदक्षरं ब्रह्म परं विष्णुश्च निर्मलः || २४ || इत्यादिमहापुराण आग्नेये प्रायश्चित्तकथनं नाम चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७४ ॥

अथ पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः व्रतपरिभाषा अग्निरुवाच तिथिवारर्क्षदिवसमासर्त्वब्दार्क संक्रमे ' । ( ' नृस्त्रीव्रतादि वक्ष्यामि वशिष्ठ शृणु तत्क्रमात् ॥१ ॥

शास्त्रोदितो हि नियमो व्रतं तच्च तपो मतम् । नियमास्तु विशेषास्तु व्रतस्यैव दमादयः ) ॥२ ॥

व्रतं हि कर्तृसंतापात्तप इत्यभिधीयते । इन्द्रियग्रामनियमान्नियमश्चाभिधीयते ॥३ ॥

अनग्नयस्तु ये विप्रास्तेषां श्रेयोऽभिधीयते । व्रतोपवासनियमैर्नानादानैस्तथा द्विजः ( जाः ) ॥४ ॥

उनकी प्रतिमाएँ, ज्योतिःशास्त्र, पुराण, स्मृतियाँ, तप, व्रत, अर्थशास्त्र, सर्ग इत्यादि, आयुर्वेद, धनुर्वेद, शिक्षा, छन्दस्, व्याकरण, निरुक्त, कोश, कल्प, न्याय, मीमांसा इत्यादि भगवान् हरि के विभिन्न रूप हैं । २०-२२ ॥ जो व्यक्ति परमात्मा को जानता है, यह जानता है कि यह प्रांणी किससे उत्पन्न हुए हैं और किसमें लीन होंगे । उसके दर्शन से ही सारे पापों का नाश होता है क्योंकि वह हरिरूप ही होता है । हरि अष्टादश विद्याओं का रूप है, वह सूक्ष्म, स्थूल और अपर है । वही ज्योति है, वही सत् है, वही अक्षर है । वही परब्रह्म है और वही निर्मल विष्णु है ॥२३-२४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में प्रायश्चित्त कथन नामक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥१७४ ॥

अध्याय १७५ व्रत- परिभाषा अग्निदेव बोले - वशिष्ठ! अब मैं तिथि, दिन, नक्षत्र, मास, ऋतु, वर्ष तथा अयनों में किये जानेवाले स्त्री - पुरुषों के व्रत आदि का क्रमशः वर्णन कर रहा हूँ, सुनो ॥१ ॥ शास्त्रोक्त नियम ही व्रत है । उसी को तप भी कहते हैं । दम आदि

तो इसी व्रत के विशेष नियम हैं । व्रत करने में कष्ट होने के कारण इन्हें तप कहा जाता है और इनके द्वारा इन्द्रिय-समूहों का नियमन करने से यह नियम भी कहलाते हैं ॥२-३ ॥ अये ब्राह्मणो! जो ब्राह्मण अग्न्याधान इत्यादि नहीं करते हैं, उनका कल्याण व्रत, उपवास, नियम तथा विविध ( प्रकार से ) दोनों से हुआ करता है । देवता लोग ऐसे ब्राह्मणों १ ग. च. श्च मूर्तस्थू । २ च. मे । राज्य व्र ' । ३ नृस्त्रीव्रतादि " दमादयः पुस्तकयोर्नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 585

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पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ५८१ ते स्युर्देवादयः प्रीता भुक्तिमुक्तिप्रदायकाः उपवासः स विज्ञेयः सर्वभोगविवर्जितः शाकं मधु परान्नं च त्यजेदुपवसन्स्त्रियम् उपवासे न शस्यन्ति ' दन्तधावनमञ्जनम् असकृज्जलपानाच्च ताम्बूलस्य च भक्षणात् क्षमा सत्यं दया दानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः सर्वव्रतेष्वयं धर्मः सामान्यो दशधा स्मृतः नित्यस्नायी मिताहारो गुरुदेवद्विजार्चकः तिलमुद्गादृते शस्यं शस्ये गोधूमकोद्रवौ शितधान्यं तथा पण्यं मूलं क्षारगणः स्मृतः श्यामाकाश्चैव नीवारा गोधूमाद्या व्रते हिताः चरुभैक्ष्यं सक्तुकणाः शाकं दधिघृतं पयः हविष्यं व्रतनक्तादावग्निकार्यादिके हितम् । उपावृत्तस्य पापेभ्यो यस्तु वासो गुणैः सह ॥५ ॥

। ' कांस्यं मांसं मसूरं च चणकं कोरदूषकम् ॥६ ॥

1 । पुष्पालङ्कारवस्त्राणि धूपगन्धानुलेपनम् ॥७ ॥

। दन्तकाष्ठं पञ्चगव्यं कृत्वा प्रातर्व्रतं चरेत् ॥८ ॥

। उपवासः प्रदुष्येत दिवा स्वप्नाच्च मैथुनात् ॥ ९ ॥

। देवपूजाऽग्निहरणं सन्तोषोऽस्तेयमेव च ॥१० ॥

। पवित्राणि जपेच्चैव जुहुयाच्चैव शक्तितः ॥ ११ ॥

। क्षारं क्षौद्रं च लवणं मधु मांसानि वर्जयेत् ॥१२ ॥

। चीनकं देवधान्यं च शमीधान्यं तथैक्षवम् ' ॥१३ ॥

। ब्रीहिषष्टिकमुद्गाश्च कलायाः सतिला यवाः ॥१४ ॥

। कूष्माण्डालाबुवार्ताकान्पालङ्की पूतिकां त्यजेत् ॥१५ ॥

। श्यामाकशालिनीवारा य ( या ) बकं मूलतण्डुलम् ॥१६ ॥

। मधु मांसं बिहायान्यद्वते वा हितमीरितम् ॥१७ ॥

से प्रसन्न होकर भोग और मोक्ष प्रदान करते हैं । पापों से विमुख होकर गुणों ( धर्मों ) के संसर्ग में रहने को ही उपवास कहा जाता है ॥४-५ ॥ इसमें सभी भोगों का परित्याग कर देना पड़ता है । उपवास के दिन कांस्यपात्र, मांस, मसूर की दाल, चना, कोदो, शाक, मधु, परान्न, स्त्री, पुष्प, अलङ्कार, वस्त्र, धूप, गन्ध, लेप, दन्तधावन तथा अञ्जन का व्यवहार नहीं करना चाहिए । अपितु प्रातःकाल दातून के बदले पञ्चगव्य से मुँह धोकर व्रत का आचरण करना चाहिए ॥६-८ ॥ बार - बार जलपान करने, ताम्बूल भक्षण करने से, दिन में सोने से तथा मैथुन करने से उपवास नष्ट हो जाता है ॥९ ॥ क्षमा, सत्य, दया, दान, शौच, इन्द्रियनिग्रह, देवपूजा, अग्न्याधान, सन्तोष

और अस्तेय - इन दस धर्मों का सभी व्रतों में समान रूप से निर्वाह करना चाहिए ॥१०-१० ३। उस दिन पवित्र मन्त्रों का जप और यथाशक्ति हवन करना चाहिए । नित्यस्नान, अल्पाहार और गुरु, देवता तथा द्विजों का पूजन तो करना ही चाहिए । खारी वस्तुएँ, शहद, लवण, मदिरा तथा मांस का परित्याग कर देना चाहिए ॥११-१२ ॥ तिल, मूँग के अतिरिक्त सभी धान्य, गेहूँ, कोदो, चना, देवधान्य, शमीधान्य ( उड़द ), गुड़, साँवाँ, बाजार की वस्तुएँ तथा मूल इनकी गणना क्षार समूह में होती है । व्रीहि, षष्टिक, मूँग, मटर, तिल, जौ, साँवाँ, नीवार ( फसही के धान ) तथा गेहूँ आदि अन्न व्रत में ग्राह्य हैं ॥१३-१४ ॥ कद्दू, बैगन, लौकी, पालक और पोय ये वस्तुएँ अग्राह्य हैं । चरु, भिक्षान्न, सत्तू, शाक, दही, घी, दूध, साँवाँ, चावल, फसही के चावल, जौ का सत्तू, मूल तण्डुल ( धान्य-विशेष ) तथा हविष्य - ये वस्तुएँ रात्रिव्रत और अग्निकार्य आदि में ग्राह्य हुआ करती हैं ॥ १५-१६ ॥ मधु और मांस को छोड़कर प्रायः अन्य वस्तुएँ व्रत में हितकारक ही मानी जाती हैं । प्राजापत्य व्रत का अनुष्ठान करनेवाले १ ख. ग. ॰स्यं माषं म ' । २ ग. दुष्यन्ति । ३ ख. ग. ' नाक्षमै । ४ क. ङ. ' ते शाम्बं मत्स्यगो । ५ ख. ग. ' म् । स्विन्नं धा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 586

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५८२ अग्निपुराणम् त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम् । ( ` एकैकं ग्रासमश्नीयात्त्र्यहाणि त्रीणि पूर्ववत् । गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । पृथक्सान्तपनं द्रव्यैः षडहः सोपवासकः । द्वादशाहोपवासेन पराक: सर्वपापहा । पौर्णमास्यां पञ्चदशग्रास्यमावास्यभोजनः ' । कपिलागोः पलं मूत्रमर्धाङ्गुष्ठं च गोमयम् । घृतमेकपलं दद्यात्पलमेकं कुशोदकम् । आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णेति वै दधि ब्रह्मकूर्चो भवत्येवमापो हि ष्ठेत्यृचं जपेत् पीत्वा सर्वाघनिर्मुक्तो विष्णुलोकी ह्युपोषितः ' त्र्यहं परं च नाश्नीयात्प्राजापत्यं चरन्द्विजः ॥१८ ॥

त्र्यहं चोपवसेदन्त्यमतिकृच्छ्रं चरन्द्विजः ॥१९ ॥

एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ॥२० ॥

सप्ताहेन तु कृच्छ्रोऽयं महासान्तपनोऽघहा ॥२१ ॥

महापराकस्त्रिगुणस्त्वयमेव प्रकीर्तितः ) ॥२२ ॥

एकापाये ततो वृद्धौ चान्द्रायणमतोऽन्यथा ॥२३ ॥

क्षीरं सप्तपलं दद्याद्दध्नश्चैव पलद्वयम् ॥२४ ॥

गायत्र्याऽऽगृह्य गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम् ॥ २५ ॥

। तेजोऽसीति तथा चाऽऽज्यं देवस्येति कुशोदकम् ॥२६ ॥

। अघमर्षणसूक्तेन संयोज्य प्रणवेन वा ॥ २७ ॥

। उपवासी सायंभोजी ' यतिः षष्ठात्मकालवान् ॥२८ ॥

द्विज को तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सांयकाल और तीन दिन बिना माँगे ही मिले हुए अन्न का भोजन करना चाहिए ॥१७-१८ ॥ तदनन्तर तीन - तीन दिन तक बिना भोजन किये ही रहना चाहिए । ' अतिकृच्छ्र ' नामक व्रत का अनुष्ठान करनेवाला द्विज तीन दिन तक एक - एक ग्रास भोजन करे, तीन दिन पूर्ववत् भोजन करे और अन्त में तीन दिन उपवास करे । ‘ कृच्छ्रसान्तपन ' नामक व्रत गोमूत्र, गोमय, दूध, दही, घी तथा कुशों को धोनेवाला जल पी करके एक रात उपवास करना चाहिए ॥१९ -२० ॥ पृथक् सान्तपन व्रत में उक्त वस्तुओं का उपयोग करते हुए छह दिनों तक उपवास करना होता है । पापनाशक महासान्तपन व्रत में सात दिन तक उपवास करना पड़ता है । बारह दिनों तक उपवास करने से सम्पूर्ण पापों का नाश करनेवाला ' पराक ' नामक व्रत सम्पन्न होता है और छत्तीस दिन तक उपवास करने से ‘ महापराक ’ व्रत निष्पन्न होता है ॥२१-२२ ॥ चान्द्रायण व्रत का अनुष्ठान एक मास तक किया जाता है । इसमें पूर्णिमा के दिन पन्द्रह कवल खाकर उसके बाद प्रतिदिन एक - एक कवल घटाते - घटाते अमावस्या के दिन बिल्कुल भोजन नहीं करना चाहिए । तत्पश्चात् प्रतिदिन एक - एक ग्रास बढ़ाते हुए अगली पूर्णिमा को व्रत समाप्त कर देना चाहिए ॥२३ ॥ कपिला गाय का मूत्र एक पल, गोबर आधे अँगूठे के बराबर, दूध सात पल, दही दो पल,

घी एक पल और कुशों को धोनेवाला जल एक पल लेना चाहिए । गायत्री मन्त्र से कपिला गौ का मूत्र ' गन्धद्वारा ' मन्त्र से गोबर, ‘ आप्यायस्व ' मन्त्र से दूध, ' दधिक्राव्णो ' मन्त्र से दही, ' तेजोऽसि ' मन्त्र से घी और ' देवस्य ' मन्त्र से कुशोदक इकट्ठा करना चाहिए । इस प्रकार से ब्रह्मकूर्च ( व्रत ) का अनुष्ठान करना चाहिए । तदनन्तर ' अघमर्षण ' सूक्त और प्रणव से युक्त ' आपो हि ष्ठा ' ऋचा का जप करना चाहिए । इस प्रकार से बनाये हुए पञ्चगव्य का पान करके और उक्त प्रकार से उपवास करके मनुष्य विष्णुलोक में पहुँच जाता है ॥२४-२७३ ॥ उपवास करनेवाला और सायंकाल भोजन करनेवाला यति, मांस का भक्षण न करनेवाला, अश्वमेधयाग करनेवाला और सत्यवादी मनुष्य १ ख. ग. त्र्यहमन्नं च । २ एकैकं प्रकीर्तितः नास्ति च. पुस्तके । ३ ख. ग. चान्द्रायणं । ४ क. ' वास्यामभो ” । ५ च. नीत्वा । ६ ' क्तो ब्रह्मलो । ७ ख. ग. ' जी यश्च षष्ठान्नका " । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ५८३ मांसवर्जी चाश्वमेधी सत्यवादी दिवं व्रजेत् । देवव्रतवृषोत्सर्गचूडाकरणमेखलाः । दर्शाद्दर्शस्तु चान्द्रः स्यात्रिंशाहश्चैव सावनः । सौरो मासो विवाहादौ यज्ञादौ सावनः स्मृतः । आषाढीमवधिं कृत्वा यः स्यात्पक्षस्तु पञ्चमः । मासि संत्वत्सरे चैव तिथिद्वैधं यदा भवेत् । उपोषितव्यं नक्षत्रं येनास्तं याति भास्करः । युग्माग्निकृतभूतानि- षण्मुन्योर्वसुरन्ध्रयोः । प्रतिपदा त्वमावास्या तिथ्योर्युग्मं महाफलम् । नरेन्द्रमन्त्रिव्रतिनां विवाहोपद्रवादिषु ।

आरब्धदीर्घतपसां न ' राजा व्रतहा स्त्रियाः ।

अग्न्याधेयं प्रतिष्ठां च यज्ञदानव्रतानि च ॥ २ ९ ॥

माङ्गल्यमभिषेकं च मलमासे विवर्जयेत् ॥ ३० ॥

मासः सौरस्तु संक्रान्तेर्नाक्षत्रो भविवर्तनात् ॥ ३१ ॥

आब्दिके पित्रकार्ये च चान्द्रो मासः प्रशस्यते ॥३२ ॥

कुर्याच्छ्राद्धं तत्र रविः कन्यां गच्छतु वा न वा ॥३३ ॥

तत्रोत्तरोत्तमा ज्ञेया पूर्वा तु स्यान्मलिम्लुचा ॥ ३४ ॥

दिवा पुण्यास्तु तिथयो रात्रौ नक्तव्रते शुभाः ॥ ३५ ॥

रुद्रेण द्वादशी युक्ता चतुर्दश्याऽथ पूर्णिमा ॥ ३६ ॥

एतद्व्यस्तं महाघोरं हन्ति पुण्यं पुराकृतम् ॥३७ ॥

सद्यः शौचं समाख्यातं कान्तारापदि संसदि ॥ ३८ ॥

गर्भिणी सूतिका नक्तं कुमारी च रजस्वला ॥ ३ ९ ॥

स्वर्गगामी हुआ करता है । मलमास में अग्न्याधान, देवादिप्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, व्रत, देवव्रत, वृषोत्सर्ग, चूड़ाकरण, मेखला ( मौञ्जीबन्धन ),, मांगलिकोत्सव तथा राज्याभिषेक नहीं करना चाहिए ॥२८-३० ॥ अमावस्या से अमावस्या तक चान्द्रमास कहलाता है । तीन दिनों का सावन मास होता है, सङ्क्रान्ति के अनुसार जिसकी गणना की जाती है वह सौर मास कहलाता है और नक्षत्र के अनुसार जो मास चलता है, उसे नाक्षत्र मास कहते हैं । विवाह आदि में सौर मास, यज्ञ आदि में सावन मास और वार्षिक श्राद्ध में चान्द्रमास प्रशस्त माने गये हैं ॥ ३१-३२ ॥ आषाढ़ी पूर्णिमा को अवधि मानकर उससे आगे आनेवाले पाँचवें पक्ष ( अर्थात् आश्विन कृष्णपक्ष ) में पार्वण श्राद्ध करना चाहिए; चाहे सूर्य कन्या राशि में जाय या न जाय । मास तथा वर्ष की तिथियों में द्विविधा पड़ने पर बाद की तिथि ही उत्तम समझनी चाहिए, पूर्व तिथि तो अधम मानी गयी है ॥ ३३-३४ ॥ जिस नक्षत्र में सूर्य अस्त हो, उसी नक्षत्र में उपवास करना चाहिए । दिन में किये जानेवाले व्रतों के लिए तिथियाँ दिन में ही पुण्य मानी जाती हैं; किन्तु रात्रि के व्रतों में रात्रि की तिथियाँ ही पुण्य हुआ करती हैं ॥ ३५ ॥ साथ - साथ पड़नेवाली द्वितीया और तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी, षष्ठी और

सप्तमी, अष्टमी और नवमी, एकादशी और द्वादशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा तथा अमावस्या और प्रतिपदा तिथियाँ तो महान् फल देनेवाली हुआ करती हैं; किन्तु अलग - अलग आने पर ये तिथियाँ महाभयङ्कर तथा पूर्व पुण्यों का नाश करनेवाली हुआ करती है ॥३६-३७ ॥ राजाओं, मन्त्रियों और व्रतों का आचरण करनेवालों के लिए विवाह, उपद्रव, वन और आपत्तिकाल में सद्यः ( एक ही दिन के लिए ) शौच लगता है । अशौच के कारण ही यदि कोई राजा गर्भिणी, नव प्रसूता, रजस्वला स्त्री तथा ( रजस्वला ) कुमारी - किसी ऐसे व्रत को न कर सकें जो देर में फलदायक हुआ करता है, तो उसे व्रत - भङ्ग का दोष नहीं लगता है । इस प्रकार की स्त्री अथवा ऐसे पुरुष को किसी अन्य से व्रत करा लेना चाहिए ॥३८-३९ ३ ॥ १ ख. ग. कन्यागर्भे तु । २ ख. ग. ' द्वैत ' य ' । ३ क. ग. हादोषं ह । ४ क. ङ. संयति । ग. घ. संपदि । ५ क. ख. न राजो व्रतहं स्त्रि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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५८४ अग्निपुराणम् यदाऽशुद्धा तदाऽन्येन कारयेत क्रियाः सदा ।

दिनत्रयं न भुञ्जीत मुण्डनं शिरसोऽथवा ।

सूतके मृतके कार्यं प्रारब्धं पूजनोज्झितम् ॥

अष्टौ तान्यव्रतघ्नानि आपो मूलं फलं पयः । कीर्तिसन्ततिविद्यादिसौभाग्यारोग्यवृद्धये । इदं व्रतं मया श्रेष्ठं गृहीतं पुरतस्तव । गृहीतेऽस्मिन्न्रतवरे यद्यपूर्णे म्रिये ह्यहम् । व्रतमूर्ति जगद्भूतिं मण्डले सर्वसिद्धये मनसा कल्पितैर्भक्त्या पञ्चगव्यजलैः शुभैः । गन्धपुष्पोदकैर्युक्तमर्घ्यमर्घ्यपते शुभम् । वस्त्रं वस्त्रपते पुण्यं गृहाण कुरु मां सदा सुगन्धिगन्धं विमलं गन्धमूर्ते गृहाण वै

पुष्पं गृहाण पुष्पादिपूर्णं मां कुरु सर्वदा ।

क्रोधत्प्रमादाल्लोभाद्वा व्रतभङ्गो भवेद्यदि ॥ ४० ॥

असामर्थ्ये व्रतकृतौ पत्नीं वा कारयेत्सुतम् ॥४१ ॥

व्रतस्थं मूच्छितं दुग्धपानाद्यैरुद्धरेद्गुरुः ॥ ॥४२ ४२ ॥ ॥

हविर्ब्राह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमौषधम् ॥४३ ॥

नैर्मल्यभुक्तिमुक्त्यर्थं कुर्वे व्रतपते व्रतम् ॥ ४४ ॥

निर्विघ्नां सिद्धिमायातु त्वत्प्रसादाज्जगत्पते ॥४५ ॥

तत्सर्वं पूर्णमेवास्तु प्रसन्ने त्वयि सत्पतौ ॥ ४६ ॥

। ' आवाहये नमस्तुभ्यं संनिधौ भव केशव ॥ ४७ ॥

पञ्चामृतैः स्नापयामि त्वमेव भव पापहा ॥ ४८ ॥

गृहाण पाद्यमाचाममर्थ्यार्हं कुरु मां सदा ॥ ४ ९ ॥

। भूषणाद्यैः सुवस्त्राद्यैश्छादितं व्रतसत्पते ॥५० ॥

। पापगन्धविहीनं मां कुरु त्वं हि सुगन्धिकम् ॥५१ ॥

पुष्पगन्धं सुविमलमायुरारोग्यवृद्धये ॥५२ ॥

क्रोध, प्रमाद या लोभ से व्रतभङ्ग हो जाने पर तीन दिन तक भोजन नहीं करना चाहिए, अथवा अपना सिर मुँड़ा देना चाहिए । व्रत करनेवाले व्यक्ति को अपनी असमर्थता में अपनी पत्नी या पुत्र से व्रत करा लेना चाहिए ॥४०-४१ ॥ जननाशौच तथा मरणाशौच के कारण बीच में छूटे हुए पूर्व प्रारम्भ कर्म का उद्धार ( व्रती का ) गुरु दुग्धपान से कर देता है । मूर्च्छा ( इत्यादि अनिच्छा ) से छूटे हुए व्रत के लिए ये आठ वस्तुएँ व्रतभङ्ग करनेवाली नहीं मानी गयी हैं - जल, मूल, फल, दूध, हवि, ब्राह्मण की इच्छा, गुरु की आज्ञा और ओषधि ॥४२-४३ ॥ ( व्रत करनेवाले को भगवान् विष्णु की प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिए ) ‘ अये व्रतपते! मैं कीर्ति, सन्तति, विद्या, सौभाग्य, आरोग्य, नैर्मल्य तथा भुक्ति - मुक्ति प्राप्त करने के लिए व्रत कर रहा हूँ ॥४४ ॥ अये जगत्पते! आपके सामने मैं यह उत्तम व्रत करने का संकल्प कर रहा हूँ । आपकी

कृपा से यह निर्विघ्न रूप से समाप्त हो जाय ॥४५ ॥ अये सत्पते! यदि मैं इस संकल्पित व्रत को पूर्ण किये बिना ही

मर जाऊँ तो भी यह आपकी प्रसन्नता से सम्पन्न ही समझा जाय ॥४६ ॥ अये केशव! सभी सिद्धियों के लिए मैं इस मण्डल

में व्रतमूर्ति और जगद्विभूति रूप आपका आवाहन कर रहा हूँ । आपको नमस्कार है ॥४७ ॥ आप यहाँ पधारिये । मैं मन

से कल्पित पञ्चगव्य, शुद्ध जल तथा पञ्चामृत से भक्तिपूर्वक आपको स्नान करा रहा हूँ । आप मेरे पापों का सर्वनाश कर डालिये । अये अर्घ्यपते! इस गन्ध, पुष्प और जल से बने हुए अर्घ्य को स्वीकार कीजिये और सदा मुझे अर्घ्य देने योग्य बनाइये ॥४८-४९ ॥ अये वस्त्रपते! अये व्रतसत्पते! इस पवित्र वस्त्र को ग्रहण कीजिये और मुझे सदा वस्त्र और आभूषण आदि से सज्जित करते रहिये ॥५० ॥ अये गन्धपते! आप मेरे इन सुगन्धित निर्मल पदार्थों को लीजिये और मुझे इस तरह

पवित्र कर दीजिये कि पाप की गन्ध भी न रह जाय । मेरे दिये हुए पुष्पों को स्वीकार कीजिये और मुझे सदा पुष्पादि से परिपूर्ण रखिये, क्योंकि निर्मल पुष्प, गन्ध, आयु और आरोग्यवर्धक हुआ करता है ॥५१-५२ ॥ अये सत्पते! गुग्गुलतथा १ ख. ° ब्धं च न चोज्झति । व्र । २ आवाहये केशव क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ३ च. सिद्धये । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ५८५ दशाङ्गं गुग्गुलुघृतयुक्तं धूपं गृहाण वै । दीपमूर्ध्वशिखं दीप्तं गृहाणाखिलभासकम् । अन्नादिकं च नैवेद्यं गृहाणान्नादिसत्पते मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं मया प्रभो । धर्मं देहि धनं देहि सौभाग्यं गुणसन्ततिम् । इमां पूजां व्रतपते गृहीत्वा व्रज साम्प्रतम् । स्नात्वा व्रतवता सर्वव्रतेषु व्रतमूर्तयः जपो होमश्च सामान्य व्रतान्ते दानमेव च । विप्राः प्रपूज्या गुरवो भोज्याः शक्त्या तु दक्षिणा

जलपात्रं ३ चान्नपात्रमृत्तिकाछनमासनम् ।

स ( सु ) धूपधूपितं मां त्वं कुरु धूपित सत्पते ॥५३ ॥

दीपमूर्ते प्रकाशाढ्यं सर्वदोर्ध्वगतिं कुरु ॥५४ ॥

। अन्नादिपूर्णं कुरु मामन्नदं सर्वदायकम् ॥५५ ॥

यत्पूजितं व्रतपते परिपूर्णं तदस्तु मे ॥ ५६ ॥

कीर्ति विद्यां देहि चाऽऽयुः स्वर्गं मोक्षं च देहि मे ॥५७ ॥

पुनरागमनायैव वरदानाय वै प्रभो ॥ ५८ ॥

। पूज्याः सुवर्णजास्ता वै शक्त्या वै भूमिशायिना ॥५९ ॥

चतुर्विंशा द्वादश वा ( शतिर्द्वादश ) पञ्च वा त्रय एककः ' ॥६० ॥

। देया गावः सुवर्णाद्याः पादुकोपानहौ पृथक् ॥६१ ॥

शय्यावस्त्रयुगं कुम्भाः परिभाषेयमीरिता ॥६२ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये व्रतपरिभाषावर्णनं नाम पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१७५ ॥

घृत युक्त दशाङ्ग धूप स्वीकार कीजिये और मुझे भी अच्छी - अच्छी धूपों से धूपित ( सुगन्धित ) कर दीजिये । अये दीपमूर्ते! आप मेरे इस दीपक को स्वीकार कीजिये जो सबको प्रकाशित करनेवाला और ऊर्ध्व शिखावाला है । इसे लेकर मुझे भी तेजोमय तथा ऊर्ध्वगतिवाला बना दीजिये ॥५३-५४ ॥ अये अन्नादिस्वामिन्! नैवेद्य से चढ़ाये हुए अन्न आदि को स्वीकार करके मुझे ऐसा बना दीजिये कि मैं अन्नादि से भरपूर रहूँ और सदा अन्नदान करता रहूँ । अये प्रभो! मैंने बिना मन्त्रों के, बिना विधि - विधान के और बिना भक्ति के आपकी जो कुछ भी पूजा की है, वह सब आपकी कृपा से परिपूर्ण हो ॥५५-५६ ॥ अये व्रतपते! मुझे धर्म दीजिये, धन दीजिये, कीर्ति दीजिये, सौभाग्य दीजिये, गुणी सन्तान दीजिये, विद्या दीजिये तथा स्वर्ग और मोक्ष भी दीजिये । अये विभो! मेरी इस पूजा को स्वीकार करके आप इस समय तो जाइये किन्तु पुनः आकर मुझे दीजियेगा ॥५७-५८ ॥ समस्त व्रतों में व्रती को चाहिए कि वह स्नान करके स्वर्णनिर्मित व्रतमूर्ति ( आराध्यदेव की प्रतिमा ) का पूजन करे, भूमि पर शयन करे और व्रत के अन्त में जप और होम करे । शक्ति के अनुसार चौबीस, बारह, पाँच, तीन या एक ही ब्राह्मण तथा गुरु की पूजा करे और उन्हें भोजन कराकर दक्षिणा में गाय, सोना, खड़ाऊँ, जूते, जल - पात्र, अन्न - पात्र, मृत्तिका, छत्र, आसन, शय्या, दो

वस्त्र तथा घड़ा प्रदान करे । यही व्रतों की परिभाषा बतायी गयी है ॥५९ -६२ ॥

श्री अग्निमहापुराण में व्रतपरिभाषा - वर्णन नामक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥१७५ ॥

१ ' मधु मुस्तं घृतं गन्धो गुग्गुल्वगुरुशैलजम् । सरलं सिद्धसिद्धार्थं दशाङ्गो धूप उच्यते । ' २ क. ग. ङ. एव वा । वि । ३ क. ङ. ' त्रं च मुद्रां च मुद्रिकाद्रवमां । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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५८६ अग्निपुराणम् अथ षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः प्रतिपद्व्रतानि अग्निरुवाच वक्ष्ये प्रतिपदादीनि व्रतान्यखिलदानि ते । कार्तिकाश्वयुजे चैत्रे प्रतिपद्ब्रह्मणस्तिथिः ॥१ ॥

पञ्चदश्यां निराहारः प्रतिपद्यर्चयेदजम् । ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमो गायत्र्या वाऽब्दमेककम् || २ || अक्षमालां स्रुवं दक्षे ' वामे स्रुच ( चं ) कमण्डलुम् । लम्बकूर्चं च जटिलं हैमं ब्रह्माणमर्चयेत् || ३ || शक्त्या क्षीरं प्रदद्यात्तु ब्रह्मा मे प्रीयतामिति । निर्मलो भोगभुक्स्वर्गे भूमौ विप्रो धनी भवेत् || ४ || धन्यं व्रतं प्रवक्ष्यामि अधन्यो धन्यतां व्रजेत् । मार्गशीर्षे प्रतिपदि नक्तं हुत्वाऽप्युपोषितः ॥५ ॥

अग्नये नम इत्यग्नि प्रार्च्याब्दं सर्वभाग्भवेत् । प्रतिपद्येकभक्ताशी समाप्ते कपिलाप्रदः ॥६ ॥

वैश्वानरपदं याति शिखिव्रतमिदं स्मृतम् 11911 इत्यादिमहापुराण आग्नेये प्रतिपद्व्रतवर्णनं नाम षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७६ ॥

अध्याय १७६ प्रतिपद् - व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं तुम्हें प्रतिपदा ( तिथियों ) के व्रत बतलाऊँगा, जो सभी कुछ देनेवाले हैं । आश्विन, कार्तिक तथा चैत की प्रतिपदा ब्रह्मा की तिथि मानी गयी है || १ | उसमें व्रत करने के लिए पञ्चदशी ( पूर्णिमा तथा अमावस्या ) को उपवास करके प्रतिपदा के दिन ब्रह्मा का पूजन करना चाहिए । ब्रह्मा की ऐसी स्वर्णमयी प्रतिमा बनानी चाहिए जिसके दाहिने हाथ में रुद्राक्ष की माला तथा स्रुव और बायें हाथ में स्रुक् तथा कमण्डलु हो, जिसकी दाढ़ी लम्बी हो और जो जटाओं से युक्त हो । ‘ ॐ तत्सत् ब्रह्मणे नमः ' अथवा गायत्री मन्त्र से उस मूर्ति की पूजा करनी चाहिए । फिर ' अये ब्रह्मन्! आप मुझ पर प्रसन्न होइये ' यह कहकर उस मूर्ति के ऊपर यथाशक्ति दूध चढ़ाना चाहिए । इस प्रकार से व्रत तथा पूजन करनेवाला स्वर्ग में उत्तम भोगों का भोग करके तदनन्तर पृथ्वी पर धनी ब्राह्मण होकर जन्म लेता है ॥२-४ ॥ अब मैं एक धन्य ( उत्तम ) व्रत बताता हूँ, जिसे करने से अभागा भी भाग्यवान् बन जाता है । मार्गशीर्ष की प्रतिपदा को दिन में उपवास करके रात्रि में ‘ अग्नये नमः ' कहकर अग्नि की पूजा तथा उसी के लिए हवन करना चाहिए । उस दिन केवल एक अन्न का भोजन करना चाहिए और व्रत की समाप्ति कर कपिला गाय का दान करना चाहिए । ऐसा करने से वैश्वानर ( सूर्य ) लोक की प्राप्ति होती है । इस व्रत को शिखिव्रत ( अग्नि का व्रत ) कहा गया है ॥५-७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में प्रतिपदा व्रत वर्णन नामक एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥१७६ ॥

१ क. ङ. ' मे दण्डक ' । २ क. ङ. ग. क्तं कृत्वाऽ ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA