अग्नि पुराण — पृष्ठ 591–600

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 591–600

पृष्ठ 591

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सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ५८७ अथ सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः द्वितीयाव्रतानि अग्निरुवाच द्वितीयाव्रतकं वक्ष्ये भुक्तिमुक्त्यादिदायकम् । पुष्पाहारो द्वितीयायामश्विनौ पूजयेत्सुरौ ॥ १ ॥

अब्दं स्वरूपसौभाग्यं स्वर्गभाग्जायते व्रती । अब्दमुपोषितः स्वर्गं गच्छेन्न नरकं व्रती । कृष्णपक्षे द्वितीयायां श्रावणस्य चरेदिदम् । गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं मे यातु धर्मार्थकामदम् । पितरो मा प्रणश्यन्तु मत्तो दाम्पत्यभेदतः । तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा मे विभिद्यताम् । शय्या ममाप्यशून्याऽस्तु तथैव मधुसूदन । प्रतिमासं च सोमाय दद्यादर्घ्यं समन्त्रकम् कार्तिके शुक्लपक्षस्य अशून्यशयनं वक्ष्ये श्रीवत्सधारिञ्श्रीकान्त अग्नयो मा प्रणश्यन्तु लक्ष्म्या वियुज्यते देवो लक्ष्म्या न शून्यं वरद लक्ष्मीं विष्णुं यजेदब्दं । गगनाङ्गणसंदीप द्वितीयायां यमं यजेत् ॥२ ॥

अवैधव्यादिदायकम् ॥३ ॥

श्रीधाम श्रीपतेऽव्यय ॥४ ॥

मा प्रणश्यन्तु देवताः ॥५ ॥

न कदाचिद्यथा भवान् ॥६ ॥

यथा ते शयनं विभो || ७ || दद्याच्छय्यां फलानि च ॥८ ॥

दुग्धाब्धिमथनोद्भव ॥९ ॥

अध्याय १७७ द्वितीया - व्रत अग्निदेव बोले - मैं भोग और मोझ को देनेवाले द्वितीया व्रत के विषय में बताऊँगा । द्वितीया ' में व्रत करनेवाले को केवल पुष्पाहार करना चाहिए तथा अश्विनीकुमार नामक दो देवताओं का पूजन करना चाहिए ॥१ ॥। एक वर्ष

ऐसा करने से व्रती को सुन्दर रूप, सौभाग्य तथा स्वर्ग की प्राप्ति होती है । कार्तिक शुक्लपक्ष की द्वितीया में यम की पूजा करनी चाहिए । एक वर्ष उपवास रहकर ऐसा करने से व्रती स्वर्ग को जाता है, नरक को नहीं । अब मैं अवैधव्य आदि ( फलों को ) देनेवाले अशून्यशयन नामक व्रत के सम्बन्ध में बताऊँगा ॥ २-३ ॥ यह व्रत श्रावण कृष्ण द्वितीया में किया जाता है । उस दिन पहले भगवान् की इस प्रकार से प्रार्थना करे -'श्रीवत्सधारिन्! श्रीकान्त! श्रीधामन्! श्रीपते! अव्यय! धर्म, अर्थ और काम को देनेवाला मेरा यह गार्हस्थ्य ( जीवन ) कभी नष्ट न हो । तीनों अग्नि ( दक्षिणाग्नि, आहवनीयाग्नि, गार्हपत्याग्नि ) कभी बुझने न पायें । हमारे दाम्पत्य के नष्ट होने से देवताओं ( के कर्मों ) का नाश न होने पाये और न पितरों ( के कर्म ) का ही नाश हो । अये देवाधिदेव! जैसे आप कभी लक्ष्मी से वियुक्त नहीं होते हैं वैसे मेरे स्त्री - सम्बन्ध को कभी नष्ट न होने दीजिये ॥४-६३ ॥ अये वरद! अये विभो मधुसूदन! जैसे आपकी शय्या कभी लक्ष्मी से शून्य नहीं होती है वैसे मेरी भी शय्या कभी सूनी न होने पाये । तदनन्तर एक वर्ष तक लक्ष्मी और विष्णु का पूजन करते हुए शय्या और फल का दान करना चाहिए ॥ ७-८ ॥ प्रत्येक मास में चन्द्रमा को यह कहते हुए अर्घ्य देना चाहिए- ' अये गगन रूपी प्राङ्गण के दीपक! क्षीरसागर से उत्पन्न होनेवाले! अपनी आभा से १ इससे अव्यवहित उत्तर कार्तिक का नाम आया है । आत्साहचर्यात् यहाँ द्वितीया से आश्विन की द्वितीया का अर्थ लेना चाहिए । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 592

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५८८ अग्निपुराणम् ' भाभासितादिगाभोग रमानुज नमोऽस्तु ते । घं टं हं सं श्रियै नमो दशरूपमहात्मने । दीपान्नभाजनैर्युक्तं छत्रोपानहमासनम् । यत एवं च कुरुते भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् । नक्तभोजी द्वितीयायां पूजयेद्बलकेशवौ । अथ विष्णुव्रतं वक्ष्ये मनोवाञ्छितदायकम् । ( “ पूर्वं सिद्धार्थकैः स्नानं ततः कृष्णतिलैः स्मृतम् मुरा मांसी वचा कुष्ठं शैलेयं रजनीद्वयम् ) । नाम्ना कृष्णाच्युतानन्त हृषीकेशेति पूजयेत् शशिचन्द्रशशाङ्केन्दुसंज्ञाभिश्चार्घ्य इन्दवे ‘ षण्मासं पारणं ' चाब्दं प्राप्नुयात्सकलं व्रती ॐ श्रं श्रीधराय नमः सोमात्मानं हरिं यजेत् ॥१० ॥

घृतेन होमो नक्तं च शय्यां दद्याद्द्विजातये ॥११ ॥

सोदकुम्भं च प्रतिमां विप्रायाथ च पात्रकम् ॥१२ ॥

कान्तिव्रतं प्रवक्ष्यामि कार्तिकस्य सिते चरेत् ॥ १३ ॥

वर्षं प्राप्नोति वै कान्तिमायुरारोग्यकादिकम् ॥१४ ॥

पौषशुक्लद्वितीयादि कृत्वा दिनचतुष्टयम् ॥१५ ॥

। वचया च तृतीयेऽह्नि सर्वौषध्या चतुर्थके ॥ १६ ॥

सटी चम्पकमुस्तं च सर्वौषधिगणः स्मृतः ॥ १७ ॥

। पादे नाभ्यां चक्षुषि च क्रमाच्छिरसि पुष्पकैः ॥१८ ॥

। नक्तं भुञ्जीत च नरो यावत्तिष्ठति चन्द्रमाः ॥१९ ॥

। एतद्द्व्रतं नृपैः स्त्रीभिः कृतं पूर्वं सुरादिभिः ॥२० ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये द्वितीयाव्रतकथनं नाम सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१७७ ॥

दिग्दिगन्त को आलोकित करनेवाले! लक्ष्मी के अनुज! आपको नमस्कार है । ' ॐ श्रं श्रीधराय नमः ' कहते हुए चन्द्रात्मा भगवान् विष्णु का यजन करना चाहिए ॥९ - १० ॥ ' घं टं हं सं श्रियै नमो दशरूपमहात्मने ' इस मन्त्र से रात्रि में घी से हवन करना चाहिए । तदनन्तर ब्राह्मण को शय्या, दीप, अन्न से भरा हुआ पात्र, छाता, जूता, जलपूर्ण घट, पात्र तथा प्रतिमा प्रदान करना चाहिए । जो व्यक्ति ऐसा करता है उसे भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है । अब मैं कान्तिव्रत बतला रहा हूँ । कार्तिक शुक्लपक्ष की द्वितीया में इसका अनुष्ठान करना चाहिए । उस दिन ( केवल ) रात्रि में भोजन करके बलभद्र तथा कृष्ण की पूजा करनी चाहिए || ११-१३३ । एक वर्ष ऐसा करने से कान्ति, आयु तथा आरोग्य आदि की प्राप्ति होती है । इसी प्रकार मनोवांछित फल देनेवाले विष्णु - व्रत को भी बतलाऊँगा । पौष शुक्ल द्वितीया से लेकर चार दिनों तक विशेष स्नान करे । पहले दिन सफेद सरसों से, दूसरे दिन काले तिल से, तीसरे दिन बच से और चौथे दिन सर्वौषध से स्नान करना चाहिए । मुरा, जटामासी, बच, कुष्ठ ( कूट ), शैलेय, दोनों प्रकार की रजनी, सटी, चम्पक तथा मुस्ता ( मोथा ) इनकी गणना सर्वोषधि में की जाती है ॥१४-१७ ॥ तदनन्तर ' कृष्ण, अच्युत, अनन्त, हृषीकेश ' – इन नामों से भगवान् विष्णु की पूजा करनी चाहिए और क्रमशः उनके चरण, नाभि, नेत्र तथा सिर के ऊपर पुष्पों को चढ़ाना चाहिए । फिर शशि, चन्द्र, शशाङ्क तथा इन्दु नामों से चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करे । विष्णु - व्रत के व्रती को रात्रि में चन्द्रमा के रहते ही भोजन कर लेना चाहिए । इस प्रकार एक वर्ष और छह महीने व्रत करने से व्रती की सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं । प्राचीनकाल में राजा, स्त्रियाँ तथा देवता इस व्रत का अनुष्ठान किया करते थे ॥१८-२० ॥ श्री अग्निमहापुराण में द्वितीया - व्रत - कथन नामक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥१७७ ॥

१ ग. भासा सि ' । २ ख. ग. श्री । ३ ख. ग. ' द् द्वितीयके । दी । ४ ख. ' त् । ऊर्जव्र ' । ५ पूर्वं रजनीद्वमम् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ६ क. ख. ङ. ' ण्मासात्पार ' । ७ च. ॰णं कृत्वा प्रा ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 593

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अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ५८ ९ अथाष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः तृतीयाव्रतानि अग्निरुवाच तृतीयाव्रतान्याख्यास्ये भुक्तिमुक्तिप्रदानि ते । ललितायां तृतीयायां मूलगौरीव्रतं शृणु ॥१ ॥

तृतीयायां चैत्रशुक्ले ऊढा गौरी हरेण हि । तिलस्नातोऽर्चयेच्छंभुं गौर्यां ' हैमफलादिभिः ॥२ ॥

नमोऽस्तु पाटलायै च पादौ देव्याः शिवस्य च । शिवायेति च संकीर्त्य जयायै गुल्फयोर्यजेत् ॥ ३ ॥

त्रिपुरघ्नाय रुद्राय भवान्यै जङ्ङ्घयोर्द्वयोः । शिवं रुद्रायेश्वराय विजयायै च जानुनी || ४ || ईशायेति कटिं देव्याः शंकरायेति शंकरम् । कुक्षिद्वयं च कोटव्यै शूलिनं शूलपाणये ॥५ ॥

मङ्गलायै नमस्तुभ्यमुदरं चाभिपूजयेत् । सर्वात्मने नमो रुद्रमैशान्यै च कुचद्वयम् ॥६ ॥

" शिवं देवात्मने तद्वत्ह्लादिन्यै कण्ठमर्चयेत् । महादेवायच शिवमनन्तायै करद्वयम् ॥७ ॥

त्रिलोचनायेति हरं बाहुं कालानलप्रिये । सौभाग्यायै महेशाय भूषणानि प्रपूजयेत् ॥८ ॥

अशोकमधुवासिन्यै ईश्वरायेति चोष्ठकौ । चतुर्मुखप्रिया चाऽऽस्यं हराय स्थाणवे नमः ॥९ ॥

अध्याय १७८ तृतीया - व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं तृतीया के व्रतों का वर्णन करूँगा । ये व्रत भोग और मोक्ष दिलानेवाले हुआ करते हैं । ललिता नामक तृतीया में मूलगौरी व्रत किया जाता है ॥ १ ॥ चैत्र शुक्लपक्ष की तृतीया में भगवान् शिव ने गौरी से विवाह किया था ।

अत: उस दिन तिल से स्नान कर सुवर्ण तथा फल आदि से गौरी और शंकर की अर्चना करनी चाहिए ॥२ ॥ ' पाटलायै नमः ’

कहकर देवी के तथा ‘ शिवाय नमः ' कहकर महादेव के चरणों की पूजा करे । ' जयायै नमः ' से देवी के तथा ' त्रिपुरघ्नाय नमः ' से शिव के गुल्फों ( टखनों ) की पूजा करे । ' भवान्यै नमः ' से गौरी की तथा ' रुद्राय नमः ' से शिव की जङ्घाओं का पूजन करे । ‘ विजयायै नमः ' से पार्वती के और ' रुद्रायेश्वराय नमः ' से शिव के घुटनों की पूजा करनी चाहिए ॥ ३-४ ॥ ' ईशाय नमः ' से देवी की तथा ‘ शंकराय नमः ' से शंकर के कटिप्रदेश का पूजन करे । ' कोटव्यै नमः ' से देवी की और ' शूलपाणये नमः ' से देव की कुक्षियों का पूजन करे । ' मंगलायै नमः ' से गौरी के और ' सर्वात्मने नमः ' से शिव के उदर की पूजा करे । ' ऐशान्यै नम: ' से देवी के कुचों का और ' ईशानाय नमः ' से शम्भु का पूजन करे । ' हादिन्यै नमः ' से से शम्भु की पूजा करे ॥ ५-६३ ॥ ' अनन्तायै नमः ' से गौरी की और ' महादेवाय नमः ' से ‘ कालानलप्रियायै नमः ’ से देवी की तथा ' त्रिलोचनाय नमः ' से भगवान् शंकर की भुजाओं की से पार्वती के और ' महेशाय नमः ' से शङ्कर के आभूषणों का पूजन करना चाहिए ॥७-८ ॥ देवी के और ‘ ईश्वराय नमः ' से शम्भु के ओष्ठों की पूजा करे । ' चतुर्मुखप्रियायै नमः ' से १ ग. मूलागौ । क. ङ. मूलंगौ । २ क. ङ. ' र्या हेमफलार्थिभिः । ३ क. ङ. देव्यै । ४ ङ. च. वं वेदार्थतत्त्वज्ञं रुपिण्यै क ' । ६ क. ङ. रं चान्तका ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA देवी की तथा ' देवात्मने नमः ' शिव के हाथों का पूजन करे । अर्चना करे । ' सौभाग्यायै नमः ' ' अशोकमधुवासिन्यै नमः ' से देवी के और ' हराय स्थाणवे च. ' वं भद्रायै । ५ क. ख. ग.

पृष्ठ 594

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५ ९ ० अग्निपुराणम् नमोऽर्धनारीशहरममिताङ्ग्यै च नासिकाम् । शर्वाय पुरहन्तारं वासन्त्यै ' चैव तालुकम् । भीमोग्राय सुरूपिण्यै शिरः सर्वात्मने नमः । कदम्बं करवीरं च बाणमम्लानकुङ्कुमम् । उमामहेश्वरौ पूज्य सौभाग्याष्टकमग्रतः । तृणराजेक्षुलवणं कुस्तुम्बरुमथाष्टकम् । प्रातः स्नात्वा समभ्यर्च्य विप्रदाम्पत्यमर्चयेत् । शृङ्गोदकं गोमयं च मन्दारं बिल्वपत्रकम् गोमूत्राज्यं कृष्णतिलं पञ्चगव्यं क्रमाशनम् । वासुदेवी तथा गौरी मङ्गला कमला सती फलमेकं परित्याज्यं व्रतान्ते ' शयनं ददेत् गुरुं च मिथुनान्यर्च्य वस्त्राद्यैर्भुक्तिमुक्तिभाक् नम उग्राय लोकेशं ललितेति पुनर्भुवौ ॥१० ॥

नमः श्रीकण्ठनाथायै शितिकण्ठाय केशकम् ॥११ ॥

मल्लिकाशोककमलकुन्दं तगरमालती ॥१२ ॥

सिन्धुवारं च मासेषु सर्वेषु क्रमशः स्मृतम् ॥१३ ॥

स्थापयेद्धृतनिष्पावकुसुम्भक्षीर जीरकम् ॥ ॥१४ १४ ॥ ॥ चैत्रे शृङ्गोदकं प्राश्य देवदेव्यग्रतः स्वपेत् ॥ १५ ॥

तदष्टकं द्विजे दद्याल्ललिता प्रीयतां मम ॥१६ ॥

। कुशोदकं दधिक्षीरं कार्तिके पृषदाज्यकम् ॥१७ ॥

ललिता विजया भद्रा भवानी कुमुदा शिवा ॥ १८ ॥

। चैत्रादौ दानकाले च प्रीयतामिति वाचयेत् ॥ १ ९ ॥ । उमामहेश्वरं हैमं वृषभं च गवा सह ॥२० ॥

। सौभाग्यारोग्यरूपायुः सौभाग्यशयनव्रतात् ॥२१ ॥

नमः ' से महादेव जी के मुखों की अर्चना करनी चाहिए ॥९ ॥ ' अमिताङ्ग्यै नमः ' से गौरी की और ' अर्धनारीश्वराय

नम: ' से शिव की नासिका की पूजा करे । ' ललितायै नमः ' से पार्वती की और ' उग्राय नमः ' से शिव की भौंहों का पूजन करे ॥१० ॥ ‘ वासन्त्यै नमः ' से देवी के तथा ' शर्वाय नमः ' से महादेव के तालु का पूजन करे । ‘ श्रीकण्ठनाथायै

नमः ' से उमा के और ' शितिकण्ठाय नमः ' से शिव के केशों की पूजा करे । ' सुरूपिण्यै नमः ' से देवी के और ‘ भीमोग्राय सर्वात्मने नम ' से महादेव जी के सिर की अर्चना करे ॥११ - ११३ ॥ पुनः मालती, अशोक, कमल, कुन्द, तगर, कदम्ब, करवीर, बाण, आमला, कुंकुम तथा सिन्धुवार से उमा - महेश्वर की पूजा करके उसके आगे घी, निष्पाव ( राजभाष ), कुसुम्भ ( कुसुम ), क्षीर, जीर, ताल, इक्षुलवण और कुस्तुम्बुरु ( धनियाँ ) -इन आठ शुभ पदार्थों को रखना चाहिए । तदनन्तर शृङ्गोदक पीकर उमा - महेश्वर के समीप सोवे ॥ १३-१५ ॥ प्रातःकाल स्नानकर गौरीशंकर की पूजा करके विप्र - दम्पती की पूजा करे । ' ललिता ' देवी मेरे ऊपर प्रसन्न होवें, यह कहकर उन्हें उक्त आठ वस्तुएँ प्रदान करे ॥१६ ॥ कार्तिक मास में क्रमशः शृङ्गोदक, दधि, क्षीर, दही, घी, गोमूत्र - घी, कृष्णतिल तथा

पञ्चगव्य का पान करना चाहिए । चैत्र आदि मासों में उक्त वस्तुओं को देते समय यह पढ़ना चाहिए कि ' ललिता, विजया, भद्रा, भवानी, कुमुदा, शिवा, वासुदेवी, गौरी, मङ्गला, कमला और सती मुझसे प्रसन्न हों ॥१७-१९ ॥ उस व्रत में किसी एक फल का त्याग करना पड़ता है । व्रत की समाप्ति पर गुरु तथा गुरु - पत्नी की पूजा करके उन्हें शय्या, वस्त्र; उमा - महेश्वर की स्वर्ण प्रतिमा और गाय - बैल देना चाहिए । इस प्रकार उक्त व्रत के अनुष्ठान से मनुष्य को सौभाग्य, आरोग्य, रूप, आयु, भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥२०- २१ ॥ भाद्रपद, वैशाख तथा मार्गशीर्ष १ ख. ग. च. “ न्त्यैच तथाऽलकं । २ ख. ग. च. ' थाय सितकेशाय दोहयेत् । भी । ३ ग. घ. ' जीवक ' । ४ क. ङ. ' म् । पञ्चरा ं । ५ क. ङ. ॰र्च्य पूजयेच्चापि कुम्भकम् । त ' । ६ क. ङ. कूपोद ' । ७ क. च. ' व्यं कुशासन ' । ८ ख. ग. ` न्ते तर्पणं चरेत् । ९ ख. ग. ' श्वरौ हैमी वृ ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 595

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अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ५ ९ १ नभस्ये वाऽथ वैशाखे कुर्यान्मार्गशिरस्यथ । प्रतिपक्षं ततः प्रार्च्य व्रतान्ते मिथुनानि च । उक्तो मार्गो द्वितीयोऽयं सौभाग्यव्रतमावदे । समाप्ते शयनं दद्याद्गृहं चोपस्करान्वितम् ' । ' सौभाग्यार्थं तृतीयोक्ता गौरीलोकादिदायिनी । ' दमनकतृतीयाकृच्चैत्रे दमनकैर्यजेत् । गौरी काली उमा भद्रा दुर्गा कान्तिः सरस्वती । मार्गतृतीयामारभ्य सौभाग्यं स्वर्गमाप्नुयात् शुक्लपक्षे तृतीयायां ललितायै नमो यजेत् ॥२२ ॥

चतुर्विंशतिमभ्यर्च्य वस्त्राद्यैर्भुक्तिमुक्तिभाक् ॥२३ ॥

फाल्गुनादितृतीयायां लवणं यस्तु वर्जयेत् ॥२४ ॥

सम्पूज्य विप्रमिथुनं भवानी प्रीयतामिति ॥ २५ ॥

माघे भाद्रे च वैशाखे तृतीयाव्रतकृत्तथा ॥ २६ ॥

आत्मतृतीया मार्गस्य प्रार्येच्छाभोजनादिना ॥ २७ ॥

वैष्णवी लक्ष्मीः प्रकृतिः शिवा नारायणी क्रमात् ॥ ॥२८ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये तृतीयाव्रतकथनं नामाष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ॥

के शुक्लपक्ष की तृतीया में, ' ललितायै नमः ' कहते हुए ललिता देवी की अर्चना करनी चाहिए और उस दिन व्रत रखकर चौबीस ब्राह्मण - पतियों को वस्त्रादि से सम्मानित करना चाहिए । ऐसा व्रत करने से भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥२२-२३ ॥ अब मैं इस सौभाग्य- व्रत का दूसरा ढंग बतलाऊँगा । फाल्गुन कृष्णपक्ष की तृतीया में नमक छोड़कर व्रत करना चाहिए और व्रत समाप्ति पर विप्रदम्पती का पूजन करके ' गौरी मेरे ऊपर प्रसन्न हों ' इस प्रकार कहते हुए उन्हें शय्या तथा अन्य घरेलू और साज - सज्जा की सामग्री देनी चाहिए ॥ २४-२५ ॥ यह तृतीया सौभाग्य तथा गौरीलोक को दिलानेवाली है । माघ, भाद्रपद, वैशाख तथा चैत्र की तृतीया का नाम दमनक है । अतः उस दिन दमनकों ( कुन्द - पुष्पों ) से पूजन करना चाहिए । मार्गशीर्ष की तृतीया का नाम आत्मतृतीया है । उस दिन ब्राह्मण - दम्पती को यथेष्ट भोजन आदि से प्रसन्न करके क्रमशः गौरी, काली, उमा, भद्रा, दुर्गा, कान्ति, सरस्वती, वैष्णवी, लक्ष्मी, प्रकृति, शिवा तथा नारायणी की पूजा करनी चाहिए । ऐसा करने से सौभाग्य तथा स्वर्ग की प्राप्ति होती है ॥ २६-२८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में तृतीया - व्रत कथन नामक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥१७८ ॥

१ क. ङ. ‘ म् । अलङ्काराणि सर्वाणि भ ° । २ सौभाग्यार्थं " स्वर्गमवाप्नुयात् च. पुस्तके नास्ति । ३ क. ङ. ' नस्य तृतीया च चैत्रे । ४ क. ङ. ' या मद्राक्षे प्रा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 596

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अग्निपुराणम् ५ ९ २ अथैकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः चतुर्थी व्रतानि अग्निरुवाच चतुर्थीव्रतान्याख्यास्ये भुक्तिमुक्तिप्रदानि ते । माघे शुक्लचतुर्थ्यां तु पञ्चम्यां च तिलान्नादी ' वर्षान्निर्विघ्नतः सुखी । गं स्वाहा मूलमन्त्रोऽयं आगच्छोल्काय चाऽऽवाह्य गच्छोल्काय विसर्जनम् । ऊल्कान्तैर्गादिगन्धाद्यैः ॐ महोल्काय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती मासि भाद्रपदे चापि चतुर्थीकृच्छिवं व्रजेत् उपवासी ' यजेद्गणम् ॥१ ॥

गामाद्यं हृदयादिकम् ॥२ ॥

पूजयेन्मोदकादिभिः ॥३ ॥

प्रचोदयात् ॥ ॥४ ॥

चतुर्थ्यङ्गारकेऽभ्यर्च्य गणं सर्वमवाप्नुयात् । चतुर्थ्यां फाल्गुने नक्तमविघ्नाख्या चतुर्थ्यपि ॥ ५ ॥

चतुर्थ्यां दमनैः पूज्य चैत्रे प्रार्च्य गणं सुखी ॥६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये चतुर्थीव्रतकथनं नामैकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१७९ ॥

अध्याय १७ ९ चतुर्थी व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं तुमको भुक्ति - मुक्तिदायक चतुर्थी व्रत बताऊँगा । माघ शुक्लपक्ष की चतुर्थी में गणेश जी की आराधना करनी चाहिए || १ || पञ्चमी में तिल भोजन से मनुष्य सुखी हो जाता है तथा विघ्न - बाधा से रहित हो जाता है । ‘ गं स्वाहा ' यह गणेश जी का मूलमन्त्र है । ' गां ' का उच्चारण करके हृदयादिन्यास करना चाहिए ॥२ ॥ ‘ आगच्छोल्काय ' कहकर आवाहन तथा ' गच्छोल्काय ' कहकर ( गणेश का ) विसर्जन करना चाहिए ।

गन्ध, पुष्प, मोदक आदि से गणेश का पूजन कर ' ॐ महोल्काय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् । ' इस मन्त्र ( गायत्री ) से जप करना चाहिए । ३-३ ३३ ॥ भादों की चतुर्थी में गणपति की पूजा और व्रत करने से शिवलोक की प्राप्ति होती है । फाल्गुन की चतुर्थी का नाम अविघ्ना है । उस दिन रात्रि में गणेश - पूजन करना चाहिए । चैत्र की चतुर्थी में कुन्दपुष्पों से गणेश की पूजा करने से मनुष्य सुखी होता है ॥५-६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में चतुर्थी व्रत कथन नामक एक सौ उन्यासीवाँ अध्याय समाप्त ॥१७९ ॥

१ क. ङ. ' जेद्गुरुम् । प ' । २ क. ङ. वर्षं निर्वि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 597

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अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ५ ९ ३ अथाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः पञ्चमीव्रतानि अग्निरुवाच ' पञ्चमीव्रतकं वक्ष्ये आरोग्यस्वर्गमोक्षदम् । नभोनभस्याश्विने च कार्तिके शुक्लपक्षके ॥१ ॥

वासुकिस्तक्षकः पूज्यः कालीयो मणिभद्रकः । ऐरावतो धृतराष्ट्रः कर्कोटकधनञ्जयौ ॥२ ॥

एते प्रयच्छन्त्यभयमायुर्विद्यायशः श्रियम् ॥३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये पञ्चमीव्रतकथनं नामाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८० ॥

अथैकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः षष्ठी व्रतानि अग्निरुवाच षष्ठी व्रतानि वक्ष्यामि कार्तिकादौ समाचरेत् । षष्ठ्यां फलाशनोऽर्ध्याद्यैर्भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् ॥१ ॥

अध्याय १८० पञ्चमी - व्रत अग्निदेव बोले- अब मैं पञ्चमी - व्रत का वर्णन करूँगा जो आरोग्य, स्वर्ग और मोक्ष देनेवाला है । श्रावण, भाद्र, आश्विन तथा कार्तिक के शुक्लपक्ष की पञ्चमी में वासुकि, तक्षक, कालीय तथा धनञ्जय ( नामक सर्पों ) की पूजा करनी चाहिए । इससे ये ( सर्प ) अभय, आयु, विद्या, यश तथा ऐश्वर्य प्रदान किया करते हैं ॥१-३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में पञ्चमी - व्रत नामक एक सौ अस्सीवाँ

अध्याय समाप्त ॥। १८० ॥

अध्याय १८१ षष्ठी - व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं षष्ठी - व्रत बतलाऊँगा । कार्तिक आदि मास की षष्ठी में फलाहार करके सूर्य को अर्घ्य आदि का समर्पण करने से भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है । भादों की षष्ठी में अक्षयस्कन्दषष्ठीव्रत का वर्णन १ च. ‘ तमाख्यास्ये आ ' । २ क. ङ. ' ज्यः सर्वसौख्यप्रदायकः । ३ ऐरावतो धनञ्जयौ नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । ४ च. ' मात्मविद्या ' । ३८ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 598

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५ ९ ४ अग्निपुराणम् स्कन्दषष्ठीव्रतं प्रोक्तं भाद्रे षष्ठ्यामथाक्षयम् । कृष्णषष्ठीव्रतं वक्ष्ये मार्गशीर्षे अनाहारो वर्षमेकं भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् इत्यादिमहापुराण आग्नेये षष्ठीव्रतकथनं नामैकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः अथद्वयशीत्यधिकशततमोऽध्यायः सप्तमीव्रतानि अग्निरुवाच चरेच्च तत् ॥ ॥२ ॥

॥ १८१ ॥

सप्तमीव्रतकं वक्ष्ये सर्वेषां भुक्तिमुक्तिदम् । माघमासे ऽब्जके ' शुक्ले सूर्यं प्रार्च्य विशोकभाक् ॥१ ॥

सर्वावाप्तिस्तु सप्तम्यां मासि भाद्रेऽर्कपूजनात् । पौषे मासि सितेऽनश्नन्प्रार्च्यार्कं पापनाशनम् ॥२ ॥

कृष्णपक्षे तु माघस्य सर्वावाप्तिस्तु सप्तमी । फाल्गुने तु सिते नन्दा सप्तमी चार्कपूजनात् || ३ || मार्गशीर्षे सिते प्रार्च्य सप्तमी चापराजिता । मार्गशीर्षे सिते चाब्दं पुत्रीया सप्तमी स्त्रियाः || ४ || इत्यादिमहापुराण आग्नेये सप्तमीव्रतकथनं नाम दूयशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१८२ ॥

किया गया है । मार्गशीर्ष में कृष्णपक्ष की षष्ठी का व्रत करना चाहिए । एक वर्ष निराहार रहकर यह व्रत करने से भोग एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥१-२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में षष्ठी - व्रत कथन नामक एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय समाप्त ॥१८१ ॥

अध्याय १८२ सप्तमी- -व्रत अग्निदेव बोले - -अब अ मैं सप्तमी - व्रत बतलाऊँगा जो भोग और मोक्ष देनेवाला है । माघ शुक्ल की सप्तमी में कमल से सूर्य की अर्चना करने से मनुष्य शोकरहित हो जाता है ॥१ ॥ भादों की सप्तमी में सूर्य - पूजन करने

से सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति हो जाती है । पौष शुक्ल सप्तमी में उपवास करके सूर्य की पूजा करने से पाप नष्ट हो जाते हैं ॥२ ॥ माघ कृष्णपक्ष की सप्तमी के दिन सूर्य की पूजा करने से सभी अभिलाषाएँ पूरी हो जाती हैं । फाल्गुन

शुक्लपक्ष की सप्तमी का नाम नन्दा है । उसमें सूर्य की पूजा करने से आनन्द की प्राप्ति होती है । मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष की सप्तमी का नाम अपराजिता है । उसमें सूर्य - पूजन करने से पराजय नहीं होती है । उक्त सप्तमी में सूर्य का पूजन करने से स्त्रियाँ पुत्रवती हुआ करती हैं ॥३-४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में सप्तमी - व्रत कथन नामक एक सौ बयासीवाँ अध्याय समाप्त ॥१८२ ॥ १ च. ' से कुजे शु ' । ख. ग. ' से शुक्लपक्ष सू ' । २ मार्गशीर्षे " चापरा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ५ ९ ५ ॥१ ॥ अथ त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

अष्टमीव्रतानि अग्निरुवाच वक्ष्ये व्रतानि चाष्टम्यां रोहिण्यां प्रथमं व्रतम् । मासि भाद्रपदेऽष्टम्यां रोहिण्यामर्धरात्रके ॥१ ॥

` कृष्णो जातो यतस्तस्यां जयन्ती स्यात्ततोऽष्टमी । सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते चोपवासतः ॥२ ॥

कृष्णपक्षे भाद्रपदे अष्टम्यां रोहिणीयुते । उपोषितोऽर्चयेत्कृष्णं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥३ ॥

३ आवाहयाम्यहं कृष्णं बलभद्रं च देवकीम् । वसुदेवं यशोदां गाः पूजयामि नमोऽस्तु ते ॥४ ॥

योगाय योगपतये योगेशाय नमो नमः । योगादिसम्भवायैव गोविन्दाय नमो नमः ॥५ ॥

( स्नानं कृष्णाय दद्यात्तु अर्घ्यं चानेन दापयेत् । यज्ञाय यज्ञेश्वराय यज्ञानां पतये नमः ॥ ६ ॥

यज्ञादिसम्भवायैव गोविन्दाय नमो नमः ) । गृहाण देव पुष्पाणि सुगन्धीनि प्रियाणि ते ॥७ ॥

सर्वकामप्रदो देव भव मे देववन्दित । धूपधूपित धूपत्वं धूपितैस्त्वं गृहाण मे ॥८ ॥

सुगन्ध ( न्धि ) धूपगन्धाढ्यं कुरु मां सर्वदा हरे । दीपदीप्त महादीपं दीपदीप्तिद सर्वदा ॥९ ॥

अध्याय १८३ अष्टमी - व्रत अग्निदेव बोले- - अब मैं रोहिणी नक्षत्र में अष्टमी - व्रत का वर्णन करूँगा । भाद्रपद की अष्टमी में जब रोहिणी नक्षत्र था, अर्धरात्रि के समय ( भगवान् ) कृष्ण अवतरित हुए थे । अतः उस ( अष्टमी ) में ( कृष्ण ) जयन्ती मनायी जाती है । उसमें उपवास करने से सात जन्मों के पापों का नाश हो जाता है ॥१-२ ॥ रोहिणी नक्षत्र की भाद्र कृष्णपक्ष की अष्टमी में उपवास करके भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले ( भगवान् ) कृष्ण, बलभद्र, देवकी, वसुदेव, यशोदा तथा गायों का आवाहन कर रहा हूँ । मैं उनकी पूजा कर रहा हूँ । आप सबको नमस्कार है ॥३-४ ॥ ' योग, योगपति तथा योगेश को बार - बार नमस्कार है । योग आदि के कारण गोविन्द ( कृष्ण ) को बार - बार नमस्कार है । ' यह कहते हुए भगवान् कृष्ण को अर्घ्य प्रदान करना चाहिए । यज्ञ, यज्ञेश्वर, यज्ञाधिपति तथा यज्ञ के कारणभूत गोविन्द को नमस्कार है । हे देव! इन पुष्पों को स्वीकार करें जो सुगन्धित और आपको अत्यन्त प्रिय हैं ॥५-७ ॥ हे देवताओं के द्वारा वन्दित देव! मेरी सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण कर दीजिये । धूपों से सुवासित मेरा धूप स्वीकार कीजिये और हे हरे! मुझे भी सदा सुगन्धित धूपों से सुवासित करते रहिये । दीपों से प्रकाशित! दीपों को ज्योति प्रदान करनेवाले! मेरे द्वारा अर्पित इस महादीप को स्वीकार कीजिये और मुझे ऊर्ध्व गति प्रदान कर दीजिये ॥८ - ९ ३ ॥ १ च. ' दे कृष्णे रो । २ कृष्णो जातो " चोपवासतः नास्ति च. पुस्तके । ३ ' आवाहयाम्यहं देवकीम् ' ग. पुस्तके नास्ति । ४ स्नानं नमो नमः ' क. ख. पुस्तकयोर्नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 600

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५ ९ ६ अग्निपुराणम् मया दत्तं गृहाण त्वं कुरु चोर्ध्वगतिं च माम् । विश्वादिसम्भवायैव गोविन्दाय निवेदितम् धर्मादिसम्भवायै गोविन्द शयनं कुरु सर्वादिसम्भवायैव गोविन्दाय च पावनम् गृहाणार्घ्यं शशाङ्केदं रोहिण्या सहितो मम देवकीं वसुदेवं च यशोदां बन्दकं नलम् वस्त्रहेमादिकं दद्याद्ब्राह्मणान्भोजयेद्व्रती वर्षे वर्षे तु यः कुर्यात्पुत्रार्थी वेत्ति नो भयम् धर्मं कामं च सौभाग्यं स्वर्गं मोक्षं च देहि मे विश्वाय विश्वपतये विश्वेशाय नमो नमः ॥ १० ॥

। धर्माय धर्मपतये धर्मेशाय नमो नमः ॥ ११ ॥

। सर्वाय सर्वपतये सर्वेशाय नमो नमः ॥ १२ ॥

। क्षीरोदार्णवसम्भूत अग्निनेत्रसमुद्भवः ॥१३ ॥

। स्थण्डिले स्थापयेद्देवं सचन्द्रां रोहिणीं यजेत् ॥१४ ॥

1 । अर्धरात्रे पयोधाराः पातयेद्गुडसर्पिषा ॥१५ ॥

। जन्माष्टमीव्रतकरः पुत्रवान्विष्णुलोकभाक् ॥ १६ ॥

। पुत्रान्देहि धनं देहि ' आयुरारोग्य संततिम् ॥ १७ ॥

॥१८ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये जयन्त्यष्टमीव्रतकथनं नाम त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥

विश्वरूप, विश्वपति तथा विश्वेश को बार - बार नमस्कार है । विश्व के आदि कारण गोविन्द ( कृष्ण ) को मेरा सब - कुछ समर्पित है । धर्मरूप, धर्मपति, धर्मेश तथा धर्म के आदि कारण को बार - बार नमस्कार है । गोविन्द! ( अब ) आप शयन कीजिये । सर्वस्वरूप, सर्वपति, सर्वेश, सर्वसम्भव गोविन्द को नमस्कार है ॥ १०-१२ ॥ क्षीर - समुद्र में उत्पन्न होनेवाले! शशाङ्क! रोहिणी के साथ आप मेरे इस अर्घ्य को स्वीकार कीजिये । तदनन्तर एक चबूतरे के ऊपर रोहिणी के साथ चन्द्रमा, कृष्ण, देवकी, वसुदेव, यशोदा, नन्द तथा बलराम की स्थापना करके उनकी पूजा करनी चाहिए । आधी रात के समय गुड़ तथा घी मिलाये हुए दूध की धारा छोड़ते हुए उन्हें वस्त्र और सुवर्ण आदि समर्पण करे । तत्पश्चात् ब्राह्मण - भोजन कराना चाहिए ॥१३-१५३ ॥ जन्माष्टमी का व्रत करनेवाला पुत्रवान् और वैकुण्ठगामी हुआ करता है । ' हे भगवन्! मुझे पुत्र दीजिये, सन्तान दीजिये, धर्म दीजिये, काम ( पुरुषार्थ ) दीजिये, सौभाग्य दीजिये, स्वर्ग दीजिये और मोक्ष दीजिये ' इस प्रकार कहते हुए जो पुत्रकामी प्रतिवर्ष अष्टमी - व्रत करता है, उसे ( किसी प्रकार का ) भय नहीं रह जाता ॥१६-१८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में जयन्त्यष्टमी व्रत कथन नामक एक सौ तिरासीवाँ अध्याय समाप्त ॥१८३ ॥

१ ख. च. “ येद्धृतस ं । २ ख. ग. ग्यसन्मति ' । ३ च. ङ. ' म् । आयुर्धर्मं च । क. ङ. ' म् । कामं भोगंच । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA