अग्नि पुराण — पृष्ठ 621–630
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 621–630
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अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ६१७ अथाष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः मासव्रतानि अग्निरुवाच मासव्रतकमाख्यास्ये भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । वैशाखे पुष्पलवणं त्यक्त्वा गोदो नृपो भवेत् । आषाढादि चतुर्मासं प्रातःस्नायी च विष्णुगः । गुडव्रतस्तृतीयायां गौरीशः स्यान्महाव्रती । एकभक्तव्रती तद्वद्द्द्वादशीव्रतकं पृथक् । श्रावणादिचतुर्मासं व्रतैः सर्वं लभेदवती । चातुर्मास्यव्रतानां तु कुर्वीत परिकल्पनम् ।
इदं व्रतं मया देव गृहीतं पुरतस्तव ।
आषाढादिचतुर्मासमभ्यङ्गं वर्जयेत्सुधीः ' ॥१ ॥
गोदो मासोपवासी च भीमव्रतकरो हरिः ॥२ ॥
माघे मास्यथ चैत्रे वा गुडधेनुप्रदो भवेत् ॥ ३ ॥
मार्गशीर्षादिमासेषु नक्तकृद्विष्णुलोकभाक् ॥४ ॥
फलव्रती चतुर्मासं फलं त्यक्त्वा प्रदापयेत् ॥५ ॥
आषाढस्य सिते पक्ष एकादश्यामुपोषितः ॥६ ॥
' आषाढ्यां चाथ संक्रान्तौ कर्कटस्य हरिं यजेत् ॥७ ॥
निर्विघ्नां सिद्धिमायातु प्रसन्ने त्वयि केशव ॥ ८ ॥
अध्याय १ ९ ८ मास - व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं भोग और मोक्ष को देनेवाला मास - व्रत बतलाऊँगा । ( मास - व्रत करनेवाले ) बुद्धिमान् मनुष्य को आषाढ़ आदि चार मासों में शरीर में उबटन नहीं लगाना चाहिए || १ || वैशाख में पुष्प तथा लवण का त्याग करके गोदान करनेवाला व्यक्ति राजा होता है । एक मास तक उपवास तथा गोदान करनेवाला भीमव्रती विष्णु ( सायुज्य मोक्ष को प्राप्त कर लेता ) है || २ || आषाढ़ से लेकर चार मास तक प्रातः स्नान करनेवाला व्यक्ति विष्णुलोक में पहुँच जाता है । माघ तथा चैत्र मास गुड़, धेनु का दान करनेवाला भी उसी लोक में पहुँच जाता है ॥३ ॥ तृतीया
गुड़ का व्रत करनेवाला महाव्रती साक्षात् शिव हो जाता है । मार्गशीर्ष आदि मासों में रात्रिव्रत करनेवाला विष्णुलोक को प्राप्त कर लेता है ॥४ ॥ इसी प्रकार एकाहार रहकर द्वादशी व्रत करनेवाला भी वैकुण्ठगामी होता है । फलव्रती
अर्थात् फल का व्रत करनेवाले को चार मास तक फल त्यागकर अन्त में ब्राह्मणों को फलों का ही दान करना चाहिए ॥५ ॥ श्रावण आदि चार मासों में व्रत करने से सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं । आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी
में उपवास करने से चातुर्मास्य व्रत करने का फल होता है । आषाढ़ की पूर्णिमा तथा कर्क राशि की सङ्क्रान्ति में विष्णु का पूजन करना चाहिए ॥६-७ ॥ अनन्तर यह प्रार्थना करनी चाहिए - ' हे देव! मैंने आपके सामने यह व्रत करने का संकल्प लिया है । केशव! आपकी कृपा से यह निर्विघ्न समाप्त हो जाय ॥८ ॥ हे जनार्दन! यदि मैं इस संकल्पित
१ ख. ग. ' त्सुखी । वै ' । २ क. ङ. ' ढ्यां वृषसं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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६१८ अग्निपुराणम् गृहीतेऽस्मिन्त्रते देव यद्यपूर्णे म्रिये ह्यहम् । ' मांसादि त्यक्त्वा विप्रः स्यात्तैलत्यागी हरिं यजेत् । चान्द्रायणी विष्णुलोकी मौनी स्यान्मुक्तिभाजनम् । दुग्धाद्याहारवान्स्वर्गी पञ्चगव्याम्बुभुक्तथा । ( ` मांसवर्जी यवाहारो रसवर्जी हरिं व्रजेत् । द्वादश्यां पूजयेद्विष्णुं प्रलिप्याब्जोत्पलादिभिः । ॐ नमो वासुदेवाय मालत्या मालया यजेत् । सर्वलभेद्धरिं प्रार्च्य मासोपवासकव्रती ) इत्यादिमहापुराण आग्नेये मासव्रतकथनं तन्मे भवतु सम्पूर्णं त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ॥९ ॥
एकान्तरोपवासी च ' त्रिरात्री विष्णुलोकभाक् ॥१० ॥
प्राजापत्यव्रती स्वर्गी सक्तुयावकभक्षकः ॥११ ॥
शाकमूलफलाहारी नरो विष्णुपुरीं व्रजेत् ॥ १२ ॥
कौमुदव्रतमाख्यास्ये आश्विने समुपोषितः ॥१३ ॥
घृतेन तिलतैलेन दीपनैवेद्यमर्पयेत् ॥१४ ॥
धर्मकामार्थमोक्षांश्च प्राप्नुयात्कौमुदव्रती ॥ १५ ॥
॥१६ ॥
नामाष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ८ ॥ व्रत को समाप्त करने के पहले ही मर जाऊँ तो भी आपकी कृपा से यह परिपूर्ण हो जाय । ' ब्राह्मण को मांस, तेल आदि का परित्याग करके ही भगवान् विष्णु की आराधना करनी चाहिए । तीन रात लगातार उपवास करके व्रती विष्णुलोक को प्राप्त कर लेता है ॥९ -१० ॥ चान्द्रायणी अर्थात् चान्द्रायण व्रत करनेवाले वैकुण्ठगामी होते हैं और मौनी मुक्ति प्राप्त करता है । प्राजापत्यव्रती स्वर्ग प्राप्त करता है । केवल सत्तू, हलुवा, दूध, पंचगव्य, शाक, मूल तथा फल का आहार करनेवाला व्यक्ति विष्णुपुरी चला जाता है ॥११-१२ ॥ मांस तथा रस का त्याग करके ( केवल ) जौ का आहार करनेवाला व्रती विष्णु को प्राप्त कर लेता है । अब मैं कौमुदव्रत का वर्णन करूँगा । यह व्रत आश्विन में किया जाता है । ( आश्विन ) मास की द्वादशी में उपवास करके कमल पुष्प आदि से विष्णु का पूजन घृत तथा तिल के तेल से दीपक जलाकर नैवेद्य देना चाहिए । तदनन्तर मालती की माला करना चाहिए । मन्त्र का जप करना चाहिए । इस प्रकार कौमुद - व्रत करनेवाले को धर्म, अर्थ पर ‘ ॐ नमो वासुदेवाय ’
एक मास तक उपवास, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
रखकर विष्णु का पूजन करने से सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥१३-१६ ॥
श्री अग्निमहापुराण में मासव्रत कथन नामक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥१९ ८ ॥ १ ख. ‘ मांसत्यागी तु वि ’ । २ घ. ' रात्रं वि ' । ३ ' मासवर्जी मासोपवासकव्रती ' पुस्तकेनास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ६१ ९ ॥ अथ नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः नानाव्रतानि अग्निरुवाच ऋतुव्रतान्यहं वक्ष्ये भुक्तिमुक्तिप्रदानि ते । इन्धनानि तु यो दद्याद्वर्षादि चतुरो ह्यतून् ॥१ ॥
घृतधेनुप्रदश्चान्ते ब्राह्मणोऽग्निव्रती भवेत् । कृत्वा मौनं तु सन्ध्यायां मासान्ते घृतकुम्भदः ॥२ ॥
तिलघण्टा वस्त्रदाता सुखी सारस्वतव्रती । पञ्चामृतेन स्नपनं कृत्वाऽब्दं धेनुदो नृपः ॥ ३ ॥
एकादश्यां तु नक्ताशी चैत्रे भक्तं निवेदयेत् 1 । हैमं विष्णोः पदं याति मासान्ते विष्णुसद्व्रती ॥४ ॥
` पायसाशी गोयुगदः श्रीभाग्देवीव्रती भवेत् । निवेद्य पितृदेवेभ्यो यो भुङ्क्ते स भवेन्नृपः ॥५ ॥
वर्षव्रतानि चोक्तानि संक्रान्तिव्रतकं वदे । संक्रान्तौ स्वर्गलोकी स्याद्रात्रिजागरणान्नरः ॥६ ॥
अमावस्यां तु संक्रान्तौ शिवार्कयजनात्तथा । उत्तरे त्वयने चेज्यः प्रातःस्नानेन केशवः ॥७ ॥
द्वात्रिंशत्पलमानेन सर्वपापैः प्रमुच्यते । घृतक्षीरादिनाऽऽस्नाप्य प्राप्नोति विषुवादिषु ॥८ ॥
स्त्रीणामुमावतं श्रीदं तृतीयास्वष्टमीषु च । गौरी महेश्वरं चापि यजेत्सौभाग्यमाप्नुयात् ॥९ ॥
अध्याय १ ९९ नाना - व्रत अग्निदेव बोले- अब मैं भुक्ति - मुक्ति देनेवाले ऋतुओं के व्रतों का वर्णन करूँगा । अग्निव्रत करनेवाले ब्राह्मण को चाहिए कि वह वर्षा आदि चार मासों में ईंधन तथा व्रतान्त में घृतधेनु का दान करे । सारस्वतव्रती को सन्ध्या काल में मौन धारण करना चाहिए और मासान्त में सुख प्राप्त करने हेतु घृतपूर्ण कुम्भ, तिल, वस्त्र और घण्टा का दान करना चाहिए ॥१- - २३ ॥ राजा को एक वर्ष तक पञ्चामृत से स्नान करके अन्त में गोदान करना चाहिए । चैत्र में रात्रिव्रत करनेवाला व्यक्ति एकादशी के दिन भगवान् विष्णु को भात का नैवेद्य समर्पित करे तथा मासान्त में ब्राह्मण को विष्णु की स्वर्ण प्रतिमा का दान दे । ऐसा करने से उसे ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है । जो व्यक्ति पितृदेवों को भोग लगाकर भोजन करता है, वह राजा होता है ॥३-५ ॥ वर्षव्रत तो बताये जा चुके हैं । अब मैं संक्रान्ति - व्रत बतला रहा हूँ । संक्रान्ति में रात्रि भर जागरण करने से मनुष्य स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेता है । अमावस्या तथा संक्रान्ति में शिव और सूर्य पूजन करने से भी स्वर्ग की प्राप्ति होती है । उत्तरायण में प्रात: काल स्नान करके बत्तीस पल ( तिल - पुष्पादि से ) केशव की पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है ॥६-७३ ॥ अयनादि में घी, दूध आदि से शिव को स्नान कराने से रुद्रलोक की प्राप्ति होती है । तृतीया और अष्टमी में उमा का पूजन करने से स्त्रियों को श्री की प्राप्ति होती है । गौरी और शंकर की अर्चना करने से भी सौभाग्य की प्राप्ति होती है ॥८ - ९ ॥ उमा-१ क. ख. ङ. सुधीः । २ पायसाशी भवेत् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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६२० अग्निपुराणम् उमामहेश्वरौ प्रार्च्य अवियोगादि चाऽऽप्नुयात् । मूलव्रतकरी स्त्री च उमेशव्रतकारिणी ॥१० ॥
सूर्यभक्ता तु या नारी ध्रुवं सा पुरुषो भवेत् ॥११ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये नानाव्रतवर्णनं नाम नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९९ ॥ अथ द्विशततमोऽध्यायः दीपदानव्रतम् अग्निरुवाच दीपदानव्रतं वक्ष्ये भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । देवद्विजातिकगृहे दीपदोऽब्दं स सर्वभाक् ॥। १ ॥ चा ( च ) तुर्मासे ( सं ) विष्णुलोकी कार्तिके स्वर्गलोक्यपि । दीपदानात्परं नास्ति न भूतं न भविष्यति || २ || दीपेनाऽऽयुश्च चक्षुष्मान्दीपाल्लक्ष्मीसुतादिकम् । सौभाग्यं दीपदः प्राप्य स्वर्गलोके महीयते || ३ ||
विदर्भराजदुहिता ललिता ' दीपदानभाक् । चारुधर्मक्ष्मापपत्नी शतभार्यादिकाऽभवत् ॥४ ॥
ददौ दीपसहस्त्रं सा विष्णोरायतने सती । पृष्टा सा दीपमाहात्म्यं सपत्नीभ्य उवाच ह ॥ ५ ॥
महेश्वर की आराधना करने से विरहजन्य दुःख नहीं हुआ करता है । जो स्त्री सूर्य की भक्ति करती है, वह नि: सन्देह अग्रिम जन्म में पुरुष होती है ॥१०-११ ॥ श्री अग्निमहापुाण में नानाव्रत - वर्णन नामक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥१९९ ॥
अध्याय २०० दीपदान - व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं भोग और मोक्ष देनेवाला दीपदानव्रत बतलाऊँगा । देवता तथा एक वर्ष तक दीपदान करने से सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ १ ॥ चातुर्मास्य द्विजाति के घर में
में दीपदान करने से विष्णुलोक और स्वर्गलोक और विशेष करके कार्तिक करता है और न होगा ही ॥ २ ॥ दीपदान की प्राप्ति होती है ॥ दीपदान से बढ़कर न तो कोई दान हुआ
स्वर्गलोक से मनुष्य आयु, नेत्र, लक्ष्मी, पुत्र तथा सौभाग्य आदि प्राप्त करके में भी पूज्य हो जाता है ॥३ ॥ विदर्भराज की एक कन्या थी- ललिता । वह महाराज
थी । वह इसी दीपदान के प्रभाव से महाराज चारुधर्म की सौ पत्नियों चारुधर्म की पत्नी गयी थी । उसने विष्णु - मन्दिर में एक हजार दीपों में से सर्वप्रथम ( अर्थात् राजमहिषी ) बन रहस्य ) पूछने पर दीपदान का दान किया था और सपनियों द्वारा ( अपनी महनीयता का का माहात्म्य इस प्रकार बतलाया था ॥४-५ ॥ १ क. ङ. " दार्थभा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्विशततमोऽध्यायः ६२१ ललितोवाच सौवीरराजस्य पुरा मैत्रेयोऽभूत्पुरोहितः कार्तिके दीपकस्तेन दत्तः संप्रेरितो मया निर्वाणवान्प्रदीप्तोऽभूद्वर्त्या मूषिकया तदा असंकल्पितमप्यस्य प्रेरणं यत्कृतं मया जातिस्मरा ह्यतो दीपान्प्रयच्छामि त्वहर्निशम् जायते दीपहर्ता तु मूको वा जड़ एव च विक्रोशमानांश्च नरान्यमकिंकर आह तान् यदा प्रमादिभिः पूर्वमत्यन्तसमुपेक्षितः तत्राप्यतिमूढात्मा किं भोगानभिधावति भुज्यते च कृतं पूर्वमेतत्किं वो न चिन्तितम् मुहूर्तविषयास्वादोऽनेककोट्यब्ददुःखदः 1 । तेन चाऽऽयतनं विष्णोः कारितं देविकातटे ॥६ ॥
। वक्त्रप्रान्तन नश्यन्त्या मार्जारस्य तदा भयात् ॥७ ॥
। मृता राजात्मजा जाता राजपत्नी शताधिका ॥८ ॥
। विष्ण्वायतनदीपस्य तस्येदं भुज्यते फलम् ॥ ९ ॥॥ एकादश्यां दीपदो वै विमाने दिवि मोदते ॥ १० ॥
। अन्धे तमसि दुष्पारे नरके पतते किल ॥ ११ ॥
। विलापैरलमत्रापि किं वो विलपिते फलम् ॥१२ ॥
। जन्तुर्जन्मसहस्रेभ्यो ह्येकस्मिन्मानुषो यदि ॥ १३ ॥
। ' स्वहितं विषयास्वादैः क्रन्दनं तदिहाऽऽगतम् ॥१४ ॥
। परस्त्रीषु कुचाभ्यङ्गं प्रीतये दुःखदं हि वः ॥१५ ॥
। परस्त्रीहारि यद्गीतं हा मातः किं विलप्यते ॥१६ ॥
ललित ने कहा - प्राचीनकाल में सौवीरराज के एक पुरोहित थे मैत्रेय । उसकी प्रेरणा से राजा ने देविका नदी के तट पर विष्णु का एक मन्दिर बनवाया था । मेरे कहने पर राजा ने कार्तिक मास में उस मन्दिर में दीपदान किया था ॥६-६३ ॥ परन्तु बिलाव के डर से एक चुहिया ने उस दीप की बत्ती को काट दिया जिससे वह दीप बुझ गया । तो भी उस दीप के लिए जो मैंने प्रेरणा की थी, उसका यह फल हुआ कि इस जन्म में मैं राजकुमारी होकर राजा की सौ पत्नियों में सबसे श्रेष्ठ बन गयी हूँ ॥ ७-८ ॥ इस प्रकार मेरे द्वारा बिना सोचे - समझे जो विष्णु मन्दिर के दीपक की वर्तिका बढ़ा दी गयी, उसी पुण्य का फल मैं भोग रही हूँ । इसी से मुझे अपने पूर्वजन्म का स्मरण भी है । इसलिए मैं सदा दीपदान करती हूँ । एकादशी को दीपदान करनेवाला स्वर्गलोक में विमान पर आरूढ़ होकर प्रमुदित होता है । दीपक को चुरानेवाला मनुष्य गूँगा और जड़ हो जाता है । वह दुस्तर और अन्धकार से परिपूर्ण नरक में गिर जाता है ॥९ -११ ॥ वहाँ चिल्लाते हुए जीवों से यमदूत पूछता है- ' तुम लोग क्यों विलाप कर रहे हो? अब विलाप करने से क्या होगा? जबकि पहले ही तुमने प्रमादवश धर्म की उपेक्षा कर दी थी । जीव को हजारों जन्मों के बाद मनुष्य - शरीर प्राप्त हुआ करता है, फिर भी वह अत्यन्त मूढ़ जीव भोग के पीछे ही दौड़ता रहता है ॥१२-१३३ ॥ तुमने तो विषयों का रसास्वादन करने में ही अपना कल्याण समझा था । अब यहाँ क्यों रो रहे हो? क्या तुमने यह नहीं सोचा था कि पहले ही किया हुआ कर्म इस जन्म में प्रतिफलित हो जाता है । परस्त्रियों का कुचमर्दन पहले जितना सुखकर होता है बाद में उतना ही दुःखद होता है ॥ १४-१५ ॥ एक क्षण तक किया जानेवाला विषयास्वाद करोड़ों वर्षों तक दुःख दिया करता है । परस्त्रीहरण के समय तुमने जो गीत गाया था, वही इस समय हाय! माँ! के विलाप १ क. ङ. हसितं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ६२२ हरेर्नाम्नि जिह्वया परिकीर्तने । ' वर्तितैलेऽल्पमूल्येऽपि यदग्निर्लभ्यते सदा ॥१७ ॥
कोऽतिभारो हृतस्तद्वोऽतिदुःखदम् । इदानीं किं विलापेन सहध्वं यदुपागतम् ॥१८ ॥
दानाशक्तैर्हरेर्दीपो अग्निरुवाच ललितोक्तं च ताः श्रुत्वा दीपदानाद्दिवं ययुः । तस्माद्दीपप्रदानेन व्रतानामधिकं फलम् ॥१९ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये दीपदानवर्णनं नाम द्विशततमोऽध्यायः ॥ २०० ॥
अथैकाधिकद्विशततमोऽध्यायः नवव्यूहार्चनम् अग्निरुवाच नवव्यूहार्चनं वक्ष्ये नारदाय हरीरितम् । मण्डलेऽब्जेऽर्चयेन्मध्ये अबीजं वासुदेवकम् ॥१ ॥
आबीजं च संकर्षणम् प्रद्युम्नं च दक्षिणे । अः अनिरुद्धं नैर्ऋते ॐ नारायणमप्सु च ॥२ ॥
तत्सद्ब्रह्माणमनिले ` ह्रूं विष्णुं क्षौं नृसिंहकम् । उत्तरे भूर्वराहं च ईशे द्वारि च पश्चिमे ॥३ ॥
में परिणत हो रहा है । जिह्वा से विष्णु के नाम का संकीर्त्तन करने में कौन - सा बड़ा भार पड़ता था? थोड़े - से मूल्य के दीया - बत्ती से सदा अग्नि प्राप्त हुआ करती है ॥१६-१७ ॥ तुम लोगों ने दीपदान करना तो दूर रहा, ( उलटे ) दूसरों के दिये हुए दीपों को चुराया था । उसी का प्रतिफल इस समय मिल रहा है । इसलिए विलाप करने से क्या लाभ? जो आ पड़ा है, उसे सहन करो ॥१८ ॥
अग्निदेव बोले - ललिता के मुँह से दीपदान का माहात्म्य सुनकर सभी स्त्रियाँ स्वर्गलोक पहुँच गयीं । इसलिए दीपदान करने से व्रतों का और अधिक फल प्राप्त होता है ॥१९ ॥
श्री अग्निमहापुराण में दीपदान - वर्णन नामक दो सौवाँ अध्याय समाप्त ॥ २०० ॥
अध्याय २०१ नवव्यूह - अर्चन अग्निदेव बोले- - अब मैं नवव्यूह - पूजन की विधि बतलाऊँगा जिसे भगवान् विष्णु ने नारद से कहा था । कमलाकार चक्र के बीच में वासुदेव ( कृष्ण ) और संकर्षण ( बलराम ) का पूजन ( क्रमशः ) ' अ ' और ' आ ' बीजमन्त्रों से करना चाहिए । दक्षिण में प्रद्युम्न, दक्षिण - पश्चिम में ' अ: ' बीजमन्त्र से अनिरुद्ध, पश्चिम में ' ॐ ' मन्त्र से नारायण का पूजन करना चाहिए ॥१-२ ॥ पश्चिमोत्तर में ' तत् सत् ' मन्त्र से ब्रह्मा, उत्तर में ' हरू ' मन्त्र से विष्णु और ‘ क्षौं ' मन्त्र से नृसिंह तथा पूर्वोत्तर में भूः मन्त्र से वाराह भगवान् का पूजन करना चाहिए । ( चक्र के ) पश्चिम द्वार देश १ वर्तितैले " सदा च. पुस्तके नास्ति । २ क. ङ. हूं । ३ क. ङ. “ राहश्च हस्ते वामे च प ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः ६२३ ' कं टं सं शं गरुत्मन्तं पूर्ववक्त्रं च ' दक्षिणे बं णं मं क्षं कोणे शं च थं दं भं हं श्रियं यजेत् पीठस्य पश्चिमे धं वं वनमालां च पश्चिमे दशमाक्रमाद्विष्णोर्नमोऽनन्तमधोऽर्चयेत् तोरणानि वितानं च अग्न्यनिलेन्दुबीजकैः ' अम्बरस्थं ततो ध्यात्वा सूक्ष्मरूपमथाऽऽत्मनः तदैव चाऽऽत्मनो बीजममृतं प्लवसंस्कृतम् । उत्पन्नोऽस्मि स्वयं विष्णुर्बीजं द्वादशकं न्यसेत् वक्षोमूर्धशिखापृष्ठलोचनेषु न्यसेत्पुनः यथाऽऽत्मनि तथा देवे शिष्यदेहे न्यसेत्तथा । सनिर्माल्या मण्डलादौ बद्धनेत्राश्च शिष्यकाः ॥ खं छं वं हुं फडिति च खं ठं फं शं गदां विधौ ॥४ ॥
। दक्षिणे चोत्तरे पुष्टिं गं डं बं शं स्वबीजकम् ॥५ ॥
। श्रीवत्सं चैव सं हं लं छं तं यं कौस्तुभं जले ॥ ६ ॥
। दशाङ्गादिमहेन्द्रादीन्पूर्वादौ चतुरो घटान् ॥७ ॥
। मण्डलानि क्रमाद्भूयात्वा " तनुं वन्द्य ततः प्लवेत् ॥८ ॥
। सितामृते निमग्नं च चन्द्रबिम्बात्स्रुतेन च ॥९ ॥
उत्पद्यमानं पुरुषमात्मानमुपकल्पयेत् ॥१० ॥
। हच्छिरस्तु शिखा चैव कवचं चास्त्रमेव च ॥११ ॥
। अस्त्रं करद्वये न्यस्य ततो दिव्यतनुर्भवेत् ॥१२ ॥
अनिर्माल्या स्मृता पूजा यद्धरेः पूजनं हृदि ॥ १३ ॥
पुष्पं क्षिपेयुर्यन्मूर्ती तस्य तन्नाम कारयेत् ॥१४ ॥
में ' कंटं सं शं ' मन्त्र से पूर्वाभिमुख गरुड़, दक्षिण में ' खं छं वं हुं फट् ', ' खं ठं फं शं ' मन्त्र से गदा, पूर्व में ' बं णं मं क्षं शं धं दं भं हं ' मन्त्र से लक्ष्मी और दक्षिणोत्तर में ' गंडं बं शं ' मन्त्र से पुष्टि का पूजन करना चाहिए ॥३-५ ॥ पीठ के पश्चिम भाग में ' धं वं ' मन्त्र से वनमाला तथा श्रीवत्स और ' सं हं लं चं तं यं ' मन्त्र से जल में कौस्तुभ की पूजा करनी चाहिए । क्रमशः भगवान् विष्णु का दशविध अङ्गपूजन करना चाहिए । ' नमोऽनन्तम् ' मन्त्र से मण्डल के नीचे की ओर भगवान् अनन्त देव का पूजन करना चाहिए । फिर क्रमशः महेन्द्र आदि देवताओं तथा उनका दशविध अङ्गपूजन करना चाहिए । ( मण्डल के ) पूर्व आदि चारों द्वारों पर चार घड़ों को रखकर देवार्चन करना चाहिए । मण्डल के चारों द्वारों तथा उसके ऊपर वितान ( रूप में फैले हुए आकाश ) को अग्नि, वायु और चन्द्र बीजों से व्याप्त समझना चाहिए ॥६-८ ॥ तदनन्तर आचार्य को सम्पूर्ण विश्व में अपनी आत्मा को व्याप्त समझना चाहिए । उसे आत्म - बीज का भी ध्यान करना चाहिए । जो चन्द्रकिरण से निकलनेवाला, अमृत के स्वच्छ विन्दुओं से युक्त और ऊपर से उसके शरीर में व्याप्त हो रहा है । तत्पश्चात् उसे अपने - आपको बीज से उत्पन्न पूर्ण पुरुष और विष्णु का रूप समझना चाहिए । बीजमन्त्र से हृदय, सिर, शिखा, कवच और अस्त्र का न्यास करके पुनः वक्षःस्थल, मूर्धा, शिखा, पृष्ठ और नेत्रों का न्यास करना चाहिए । अस्त्र और दोनों हाथों का न्यास करके ( आचार्य ) सुन्दर शरीरवाले हो जाते हैं ॥ ९ -१२ ॥ अपने समान ही देवता तथा शिष्य के शरीर का न्यास करना चाहिए । हृदय में हरि की पूजा की जाती है, वह अनिर्माल्य ( अनुच्छिष्ट ) होती है और मण्डलादि में ( की हुई पूजा ) सनिर्माल्य ( सोच्छिष्ट ) हुआ करती है । शिष्य आँखें मूँदकर जिस मूर्ति के ऊपर फूल चढ़ायें उनसे उसके नाम का उच्चारण करवाना चाहिए ॥१३-१४ ॥ तदनन्तर आचार्य अपने १ क. ङ. कं ठं च सं गुरुं सत्त्वं पूर्वचक्रं च । २ क. ङ. ' णे । जं लं सं हं फ ' । ३ क. ङ. ' धौ । चन्द्रपक्षं क्षौणसुखं त्वं ढं भं । ४ क. ख. ङ. ' मार्ग ' क्र ' । ५ क. ख. ग. तरुं दग्ध्वा त ' । ६ च. अनवस्थं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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६२४ अग्निपुराणम् निवेश्य वामतः शिष्यांस्तिलव्रीहिघृतं हुनेत् । शतमष्टोत्तरं हुत्वा सहस्रं कण्यशुद्धये ' ॥१५ ॥
नवव्यूहस्य मूर्तीनामङ्गानां च शताधिकम् । पूर्णान्दत्त्वा दीक्षयेत्तान्गुरुः पूज्यश्च तैर्धनैः ॥ १६ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये नवव्यूहार्चनं नामैकाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२०१ ॥
अथ द्वयधिकद्विशततमोऽध्यायः पुष्पवर्गकथनम् अग्निरुवाच पुष्पगन्धधूपदीपनैवेद्यैस्तुष्यते हरिः । पुष्पाणि देवयोग्यानि योग्यानि वदामि ते ॥१ ॥
पुष्पं श्रेष्ठं मालती च तमालो भुक्तिमुक्तिमान् । मल्लिका सर्वपापघ्नी यूथिका विष्णुलोकदा || २ || अतिमुक्तमयं तद्वत्पाटला विष्णुलोकदा । करवीरैर्विष्णुलोकी जपापुष्पैश्च पुण्यवान् ॥३ || ३ || ॥ ` पावन्तीकुब्जकाद्यैश्च तगरैर्विष्णुलोकभाक् । कर्णिकारैर्विष्णुलोकः कुरुण्ठैः पापनाशनम् ॥४ ॥
पद्मैश्च केतकीभिश्च कुन्दपुष्पैः परा गतिः । बाणपुष्पैर्बर्बराभिः कृष्णाभिर्हरिलोकभाक् ॥५ ॥
शिष्यों को अपने वाम भाग में बिठाकर तिल, व्रीहि तथा घी से एक सौ आठ आहुतियाँ देनी चाहिए । शरीर - शुद्धि के लिए एक सहस्र आहुतियाँ देनी चाहिए । नवव्यूह की मूर्तियों को प्रसन्न करने के लिए एक सौ आहुतियाँ और देनी चाहिए । तदनन्तर आचार्य ( सम्यक् प्रकार से पूर्ण उन ) शिष्यों को दीक्षा दे और शिष्यों को चाहिए कि वे धन से अपने गुरु का सम्मान करें ॥१५-१६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नवव्यूहार्चन नामक दो सौ एक अध्याय समाप्त ॥२०१ ॥
अध्याय २०२ पुष्पवर्ग - कथन अग्निदेव बोले - पुष्प, गन्ध, धूप, दीप तथा नैवेद्य से भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं । इसलिए मैं तुम्हें यह बता रहा हूँ कि कौन से पुष्प देवताओं के अनुकूल होते हैं ॥१ ॥ मालती पुष्प सर्वश्रेष्ठ हुआ करता है । तमाल
भुक्ति - मुक्ति देनेवाला है । मल्लिका सम्पूर्ण पापों का संहार करनेवाली है । जूही विष्णुलोक को पहुँचानेवाली है ॥२ ॥ अतिमुक्त ( वासन्ती लता ) तथा पाटल भी वैकुण्ठलोक देनेवाले हैं । करवीर ( पुष्प ) से विष्णुलोक
की प्राप्ति होती है और जपापुष्प ( गुड़हल ) से पुण्य मिलता है । पावन्ती, कुब्जक, तगर तथा कनेर वैकुण्ठ मिलता है । कुरुण्ठ से पापों का सर्वनाश होता है । कमल, केतकी तथा कुन्द - पुष्पों आदि से है । बाणपुष्प तथा काले बर्बरों से वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है ॥३-५ ॥ अशोक से सद्गति मिलती , तिलक तथा आटरूष से मुक्ति १ क. ङ. कार्यमुद्वहेत् । न ' । २ च. पाटलाकुब्जका ' । ३ ख. कुरवैः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्वयधिकद्विशततमोऽध्यायः ६२५ अशोकैस्तिलकस्तद्वदाटरूषभवैस्तथा विष्णुलोकी भृङ्गराजैस्तमालस्य दलैस्तथा पद्मं कोकनदं पुण्यं शताब्जमालया हरिः किंशुकैर्मुनिपुष्पैस्तु गोकर्णैर्नागकर्णकैः ः कूष्माण्डतिमिरोत्थैश्च कुशकाश ' शरोद्भवैः भुक्तिर्मुक्तिः पापहानिर्भक्त्या सर्वैस्तु तुष्यति स्ववनेऽन्यवने पुष्पैस्त्रिगुणं वनजैः फलम् काञ्चनारैस्तथोन्मत्तैर्गिरिकर्णिकया तथा । सुगन्धैर्ब्रह्मपद्यैश्च पुष्पैर्नीलोत्पलैर्हरिः । कुटजैः कर्कटीपुष्पैः केतकीं न शिवे ददेत् । अहिंसा इन्द्रियजयः क्षान्तिर्ज्ञानं दया श्रुतम् । ( अहिंसा प्रथमं पुष्पं पुष्पमिन्द्रियनिग्रहः । शमः पुष्पं तपः पुष्पं ध्यानं पुष्पं च सप्तमम् ॥ मुक्तिभागी बिल्वपत्रैः शमीपत्रैः परा गतिः ॥६ ॥
। तुलसी कृष्णगौराख्या कह्लारोत्पलकानि च॥७ ॥
। नीपार्जुनकदम्बैश्च बकुलैश्च सुगन्धिभिः ॥ ८ ॥
। सन्ध्यापुष्पैर्बिल्वतकैरञ्जनीकेतकीभवैः ॥९ ॥
। द्यूतादिभिर्मरुबकैः पत्रैरन्यैः सुगन्धकैः ॥१० ॥
। स्वर्णलक्षाधिकं पुष्पं माला कोटिगुणाधिका ॥११ ॥
। विशीर्णैर्नार्चयेद्विष्णुं नाधिकाङ्गैर्न मोटितेः ॥ १२ ॥
कुटजैः शाल्मलीयैश्च शिरीषैर्नरकादिकम् ॥१३ ॥
अर्कमन्दारधत्तूरकुसुमैरर्च्यते हरः ॥१४ ॥
कूष्माण्डनिम्बसम्भूतं पैशाचं गन्धवर्जितम् ॥१५ ॥
भावाष्टपुष्पैः सम्पूज्य देवान्स्याद्भुक्तिमुक्तिभाक् ॥१६ ॥
सर्वपुष्पं दयाभूते पुष्पं शान्तिर्विशिष्यते ॥ १७ ॥
सत्यं चैवाष्टमं पुष्पमेतैस्तुष्यति केशवः ॥ १८ ॥
मिलती है । बिल्वपत्र तथा शमीपत्र से उत्तम गति की प्राप्ति होती है ॥६ ॥ भृङ्गराज, तमालपत्र, तुलसीपत्र, कृष्णगौर,
रक्तकमल, नीलकमल, श्वेतकमल, कोकनद तथा शताब्ज की माला से भगवान् विष्णु की प्राप्ति होती है । नीप, अर्जुन, कदम्ब, बकुल, किंशुक, अगस्त्य, गोकर्ण, नागकर्ण, सन्ध्या पुष्प, बिल्वतक, रञ्जनी आदि पुष्पों तथा कूष्माण्ड, तिमिर, कुश, काश, सरपत, द्यूत और मरुबक आदि के सुगन्धित पत्रों से भोग और मोक्ष मिलता है तथा पापों का नाश होता है । भक्तिपूर्वक ( दी हुई ) सभी वस्तुओं से भगवान् विष्णु सन्तुष्ट होते हैं ॥ ७-१०३ ॥ एक लाख स्वर्णमुद्रा दान करने की अपेक्षा भगवान् के ऊपर चढ़ाये गये एक पुष्प का फल अधिक हुआ करता है और पुष्पमाला चढ़ाने का फल तो करोड़ गुना अधिक होता है । अपनी वाटिका या दूसरे की वाटिका के पुष्पों की अपेक्षा वन्य पुष्पों ( को अर्पित करने ) का तिगुना फल होता है । गिरे हुए, न्यूनाधिक या कटे - फटे पुष्पों से विष्णु की पूजा नहीं करनी चाहिए । कचनार, धतूरे, गिरिकर्णिका, कुटज, शाल्मली तथा शिरीष के पुष्पों से भूत - प्रेत आदि की पूजा करनी चाहिए । सुगन्धित ब्रह्मपद्म, नीलकमल, अर्क, मन्दार तथा धतूरे के पुष्पों से शिव की पूजा होती है ॥११-१४ ॥ कुटज, कर्कटीपुष्प तथा केतकी शिव जी के ऊपर नहीं चढ़ाना चाहिए । कूष्माण्ड, निम्ब तथा और भी गन्धहीन पुष्प पिशाचों के लिए हुआ करते हैं । अहिंसा, इन्द्रियजय, क्षमा, ज्ञान, दया, वेदाध्ययन तथा भाव- इन आठों पुष्पों से देवताओं की पूजा करके मनुष्य भुक्ति - मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ १५-१६ ॥ प्रथम पुष्प अहिंसा, दूसरा पुष्प इन्द्रियनिग्रह, तीसरा प्राणियों पर दया, चौथा शान्ति, पाँचवाँ शम, छठा तप, सातवाँ ध्यान और आठवाँ पुष्प सत्य है । इन्हीं आठ पुष्पों से पूजा करने से भगवान् विष्णु सन्तुष्ट होते हैं ॥१७-१८३ ॥ अये पुरुषश्रेष्ठ! इनसे अतिरिक्त १ क. ङ. “ शतोद्म ' । २ ख. ग. ' वैः । कृतारामैश्च मरुकैः । ३ क. ङ. ' णं च निजैः । ४ अहिंसा परितुष्यति ख. ग. च. पुस्तकेषु नास्ति । ४० CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् ६२६ एतैरेवाष्टभिः पुष्पैस्तुष्यत्येवार्चितो हरिः । पुष्पान्तराणि सन्त्यत्र बाह्यानि मनुजोत्तम ॥१९ ॥
भक्त्यादयान्वितैर्विष्णुः पूजितः परितुष्यति ) । वारुणं सलिलं पुष्पं सौम्यं घृतपयोदधि ॥ २० ॥
प्राजापत्यं तथाऽन्नादि आग्नेयं धूपदीपकम् । फलपुष्पादिकं चैव वानस्पत्यं तु पञ्चमम् ॥२१ ॥
पार्थिवं कुशमूलाद्यं वायव्यं गन्धचन्दनम् । श्रद्धाख्यं विष्णुपुष्पं च सर्वदा चाष्टपुष्पिका ॥२२ ॥
आसनं मूर्तिपञ्चाङ्गं विष्णुर्वा चाष्टपुष्पिकाः ( का ) । विष्णोस्तु वासुदेवाद्यैरीशानाद्यैः शिवस्य वा ॥ २३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये पुष्पवर्गवर्णनं नाम द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥
अथ त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः नरकस्वरूपम् अग्निरुवाच पुष्पाद्यैः पूजनाद्विष्णोर्न याति नरकान्वदे । ' आयुषोऽन्ते नरः प्राणैरनिच्छन्नपि मुच्यते ॥ | १ || जलमग्निर्विषं शस्त्रं क्षुद्व्याधिः पतनं गिरेः । निमित्तं किंचिदासाद्य देही प्राणैर्विमुच्यते ॥२ ॥
अन्यच्छरीरमादत्ते यातनीयं स्वकर्मभिः । भुङ्क्तेऽथ पापकृदुःखं सुखं धर्माय संगतः || ३ || पुष्प तो केवल दिखावटी हैं । ( भूतों पर ) दया करनेवाले व्यक्तियों के द्वारा भक्तिपूर्वक पूजा करने से भगवान् विष्णु परितुष्ट हो जाते हैं ॥१९ -१ ९ ३ ॥ वरुण के लिए पुष्प और जल, चन्द्रमा के लिए घी, दूध, दही, प्रजापति के लिए अन्नादि, अग्नि के लिए धूपदीप, वनस्पति के लिए फल - पुष्प आदि, पृथ्वी के लिए कुश और मूल आदि, वायु के लिए गन्ध और चन्दन तथा विष्णु के लिए श्रद्धा - पुष्प ( अभीष्ट हुआ करते हैं । ) सदैव करनी चाहिए । उनकी मूर्ति को आसन पर सुप्रतिष्ठित करके वासुदेव आदि नामों से शिव की पूजा ईशान आदि नामों से करनी चाहिए ॥२०-२३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में पुष्पवर्ग - वर्णन नामक दो सौ दो अध्याय अध्याय २०३ नरक - स्वरूप अग्निदेव बोले - पुष्प आदि से भगवान् विष्णु की पूजा करने से नरकों में इन आठ पुष्पों से विष्णु की पूजा उनका पूजन करना चाहिए, किन्तु समाप्त ॥२०२ ॥
नहीं जाना पड़ता है । आयु समाप्त होने पर मनुष्य न चाहते हुए भी प्राणों से मुक्त हो जाता है ॥१ ॥ जल, अग्नि, विष, शस्त्र, क्षुधा, व्याधि तथा पर्वतों
से गिरना - इनमें से किसी को निमित्त बनाकर मनुष्य प्राणों का त्याग कर देता है ॥२ ॥ अनन्तर दूसरे शरीर को प्राप्त
करता है और कर्मानुसार यातनाओं का भोग प्राप्त करता है । उसमें पापी दुःख भोगता है किन्तु धर्मवान् व्यक्ति सुख १ ख. ' णं वाऽनिलं । २ आयुषोऽन्ते मुच्यते च. पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA