अग्नि पुराण — पृष्ठ 611–620

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 611–620

पृष्ठ 611

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एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ६०७ श्रावणादिषु चाऽऽरभ्य कार्तिकान्तेषु पारणम् । सप्तजन्मसु वैकल्यं व्रतानां सफलं कृते ॥ आयुरारोग्यसौभाग्यराज्यभोगादिमाप्नुयात् ॥६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽखण्डद्वादशीव्रतकथनं नाम नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ० ॥ अथैकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः त्रयोदशीव्रतानि अग्निरुवाच त्रयोदशीव्रतानीह सर्वदानि वदामि ते । अनङ्गेन कृतामादौ वक्ष्येऽनङ्गत्रयोदशीम् ॥१ ॥

त्रयोदश्यां मार्गशीर्षे शुक्लेऽनङ्गहरं यजेत् । मधु संप्राद्र घृतहोमस्तिलाक्षतैः ॥२ ॥

पौषे योगेश्वरं प्रार्च्य चन्दनाशी ' कृताहुति: । ' महेश्वरं ' मौक्तिकाशी माघेऽभ्यर्च्य दिवं व्रजेत् ॥३ ॥

काकोलं प्राश्य नीरं तु फाल्गुने पूजयेद्व्रती । कर्पूराशी स्वरूपं च चैत्रे सौभाग्यवान्भवेत् ॥४ ॥

महारूपं तु वैशाखे यजेज्जातीफलाश्यपि । लवङ्गाशी ' ज्येष्ठमासे प्रद्युम्नं पूजयेद्व्रती ॥५ ॥

श्रावण से प्रारम्भ कर कार्तिक के अन्त में व्रत समाप्त करना चाहिए । इस व्रत के करने से सात जन्मों में किये हुए व्रतों की अपूर्णता सफल हो जाती है और इससे आयु, आरोग्य, सौभाग्य, राज्य तथा भोग आदि की प्राप्ति होती है ॥६ ॥

श्री अग्निमहापुराण में अखण्डद्वादशी व्रत कथन नामक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय समाप्त ॥१९ ० ॥ अध्याय १ ९ १ त्रयोदशी - व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं तुमसे त्रयोदशी व्रत बतलाऊँगा जो सब - कुछ देनेवाला है । सर्वप्रथम इसका अनुष्ठान अनङ्ग ( कामदेव ) ने किया था, इसीलिए इसका नाम अनङ्ग त्रयोदशी पड़ा || १ || मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष की त्रयोदशी में भगवान् शंकर का पूजन करना चाहिए । उस दिन रात्रि में शहद खाकर घी, तिल और अक्षत से हवन करना चाहिए ॥२ ॥ पौष मास की

त्रयोदशी में योगेश्वर ( कृष्ण ) की पूजा तथा हवन करके चन्दन का भक्षण करना चाहिए । माघ मास ( की त्रयोदशी ) में महेश्वर की अर्चना करके मोती खाने से ( व्रत करनेवाला ) स्वर्गगामी होता है || ३ || फाल्गुन ( मास की त्रयोदशी ) में केवल जल पीकर काकोल ( शेष भगवान् ) का पूजन करना चाहिए । चैत्र ( मास की त्रयोदशी ) में कपूर खाकर महेश्वर की पूजा करने से व्रत करनेवाला सौभाग्यवान् होता है । वैशाख ( मास की त्रयोदशी ) में महारूप शंकर की अर्चना करके जातीफल का भक्षण करना चाहिए । ज्येष्ठ मास ( की त्रयोदशी ) में तिल और जल खाकर प्रद्युम्न का पूजन करना चाहिए ॥४-५ ॥ आषाढ़ ( की त्रयोदशी ) १ क. ङ. च. हरि ' । २ क. ख. ग. ङ. ' शी हुता ' । ३ ' महेश्वरं व्रजेत् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ४ च. नाद्येश्वरं । ५ क. ङ. च. चीनं । ६ ख. ग. घ. ष्ठदिने प्र ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 612

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अग्निपुराणम् ६०८

तिलोदाशी तथाऽऽषाढे उमाभर्तारमर्चयेत् । श्रावणे गन्धतोयाशी पूजयेच्छूलपाणिनम् ॥६ ॥

सद्योजातं भाद्रपदे प्राशिता गुरुमर्चयेत् । सुवर्णवारि सम्प्राश्य आश्विने त्रिदशाधिपम् ॥७ ॥

विश्वेश्वरं कार्तिके तु मदनाशी यजेदवती । शिवं हैमं तु वर्षान्ते संछाद्याऽम्रदलेन तु ॥८ ॥

वस्त्रेण पूजयित्वा तु दद्याद्विप्राय गां तथा । शयनं छत्रकलशान्पादुकारसभाजनम् ॥९ ॥

त्रयोदश्यां सिते चैत्रे रतिप्रीतियुतं स्मरन् । अशोकाख्यं नगं लिख्य सिन्दूररजनीमुखैः ॥१० ॥

अब्दं यजेत्तु कामार्थी कामत्रयोदशीव्रतम् ॥११ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये त्रयोदशीव्रतकथनं नामैकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ १ ॥ अथ द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः चतुर्दशीव्रतानि अग्निरुवाच व्रतं वक्ष्ये चतुर्दश्यां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । कार्तिके तु चतुर्दश्यां निराहारो यजेच्छिवम् ॥१ ॥

( ' वर्ष भोगधनायुष्मान्कुर्वञ्शिवचतुर्दशीम् । ` मार्गशीर्षे सितेऽष्टम्यां तृतीयायां मुनिव्रतः ॥२ ॥

द्वादश्यां वा चतुर्दश्यां फलाहारो यजेत्सुरम् । त्यक्त्वा फलानि दद्यात्तु कुर्वन्फलचतुर्दशीम् ॥३ ॥

में गन्धजल पीकर शूलपाणि ( शंकर ) की पूजा करनी चाहिए । भादों मास ( की त्रयोदशी ) में केवल जल पीकर सद्योजात ( शिव ) की आराधना करनी चाहिए । आश्विन ( मास की त्रयोदशी ) में सुवर्ण जल पीकर देवेश्वर ( शिव ) की पूजा करनी चाहिए || ६-७ ॥ कार्तिक ( की त्रयोदशी ) में मदन ( सोमरस ) पीकर विश्वेश्वर का पूजन करे । इस प्रकार वर्ष भर व्रत करके अन्त में भगवान् शिव की स्वर्णप्रतिमा को आम्रपत्र तथा वस्त्र से ढँककर उसका पूजन करना चाहिए तथा ब्राह्मण को गाय, शय्या, छत्र, कलश, पादुका तथा रसपात्र दान करना चाहिए ॥८ - ९ ॥ अपनी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले व्यक्ति को चैत्र - शुक्लपक्ष की त्रयोदशी में कामदेव का स्मरण करते हुए सिन्दूर से अशोक वृक्ष का चित्र बनाकर एक वर्ष तक ' कामत्रयोदशीव्रत ' करना चाहिए ॥१०-११ ॥ श्री अग्निमहापुराण में त्रयोदशी व्रत कथन नामक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥१९ १ ॥ अध्याय १ ९ २ चतुर्दशी व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं भुक्ति - मुक्ति को देनेवाला चतुर्दशी व्रत बतलाऊँगा । कार्तिक की चतुर्दशी में निराहार रहकर शिव की पूजा करनी चाहिए || १ || एक वर्ष तक शिवचतुर्दशी व्रत करने से भोग, धन और आयु की प्राप्ति होती है । मार्गशीर्ष - शुक्लपक्ष की अष्टमी, द्वादशी तथा चतुर्दशी में फलाहार करके व्रती को देवयजन करना फल- -चतुर्दशी करनेवाले व्यक्ति को फलों का दान करना चाहिए ॥२-३ ॥ शुक्ल तथा कृष्ण दोनों चाहिए । पक्षों की चतुर्दशी १ वर्षं यष्टिसु क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । २ मार्गशीर्षे इत्यारभ्य फलचतुर्दशीमित्यन्तःख. पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 613

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द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ६० ९ चतुर्दश्यामथाष्टम्यां पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः । अनश्नन्पूजयेच्छंभुं स्वर्ग्युभयचतुर्दशीम् || ४ || कृष्णाष्टम्यां तु नक्तेन तथा कृष्णचतुर्दशीम् । इह भोगानवाप्नोति परत्र च शुभां गतिम् ॥५ ॥

कार्तिके च चतुर्दश्यां कृष्णायां स्नानकृत्सुखी । आराधिते महेन्द्रे तु ध्वजाकारासु यष्टिषु ) ॥६ ॥

ततः शुक्लचतुर्दश्यामनन्तं पूजयेद्धरिम् । कृत्वा दर्भमयं चैव वारिधानी समन्वितम् ॥७ ॥

शालिप्रस्थस्य पिष्टस्य पूपनाम्नः कृतस्य च । अर्धं विप्राय दातव्यमर्धमात्मनि योजयेत् ' ॥ ८ ॥

कर्तव्यं सरितां चान्ते कथां कृत्वा हरेरिति । अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नान्समभ्युद्धर वासुदेव ॥९ ॥

अनन्तरूपे विनियोजयस्व ह्यनन्तरूपाय नमो नमस्ते 1 । अनेन पूजयित्वाऽथ सूत्रं बद्ध्वा तु मन्त्रितम् ॥ स्वके करे वा कण्ठे वा त्वनन्तव्रतकृत्सुखी ॥१० ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये नानाचतुर्दशीव्रतकथनं नाम द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१९ २ ॥ तथा अष्टमी में बिना कुछ खाये शम्भु की अर्चना करनी चाहिए । दोनों पक्षों की चतुर्दशी स्वर्ग को देनेवाली हुआ करती है । कृष्णपक्ष की अष्टमी तथा चतुर्दशी में रात्रि में व्रत रखने से इस लोक में भोग तथा परलोक में शुभ गति की प्राप्ति होती है ॥४-५ ॥ कार्तिक कृष्णपक्ष की चतुर्दशी में स्नानकर ध्वजाकार यष्टियों ( स्तम्भों ) में महेन्द्र की आराधना करने से सुख प्राप्त होता है । भाद्र शुक्लपक्ष की चतुर्दशी में अनन्त भगवान् की पूजा करनी चाहिए । ( उस दिन ) कुश की अनन्त प्रतिमा बनाकर उसे कलश पर स्थापित करके पूजा करनी चाहिए ॥६-७ ॥ पिसे हुए चावलों का पुआ बनाकर नैवेद्य चढ़ाना चाहिए । तत्पश्चात् नैवेद्य का आधा भाग ब्राह्मणों को देकर आधा भाग स्वयं ग्रहण करना चाहिए || ८ || अनन्त की पूजा तथा उनकी कथा नदी - तट पर करनी चाहिए । तदनन्तर – ‘ अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नान्समभ्युद्धर वासुदेव । अनन्तरूपे विनियोजयस्व ह्यनन्तरूपाय नमो नमस्ते ॥ ' इस मन्त्र से अनन्तदेव की पूजा करके अभिमन्त्रित किया हुआ अनन्त का डोरा भुजा या कण्ठ में बाँधना चाहिए । इस प्रकार अनन्तव्रत करनेवाला व्यक्ति सुखी होता है ॥९ -१० ॥ श्री अग्निमहापुराण में चतुर्दशी व्रत कथन नामक एक सौ बानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥१९ २ ॥ १ ख. ग. भोजयेत् । क. ङ. च. भोजनम् । २ क. ङ. " न्तसूत्राय । ३ ९ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 614

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अग्निपुराणम् ६१० अथ त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः शिवरात्रिव्रतम् अग्निरुवाच शिवरात्रिव्रतं वक्ष्ये भुक्तिमुक्तिप्रदं शृणु । माघफाल्गुनयोर्मध्ये कृष्णा या तु चतुर्दशी || १ || कामयुक्ता तु सोपोष्या कुर्वञ्जागरणं व्रती । शिवरात्रिव्रतं कुर्वे चतुर्दश्यामभोजनम् ॥२ ॥

रात्रिजागरणेनैव पूजयामि शिवं व्रती । आवाहयाम्यहं शंभुं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥३ ॥

नरकार्णवकोत्तारनावं शिव नमोऽस्तु ते । नमः शिवाय शान्ताय प्रजाराज्यादिदायिने || ४ || ' सौभाग्यारोग्य ' विद्यार्थं स्वर्गमार्गप्रदायिने 1 । धर्मं देहि धनं देहि कामभोगादि देहि मे ॥ ५ ॥

गुणकीर्तिसुखं देहि स्वर्गं मोक्षं च देहि मे । लुब्धकः प्राप्तवान्पुण्यं पापीसुन्दरसेनकः ॥ ६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये शिवरात्रिव्रतकथनं नाम त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१९ ३ ॥ अध्याय १ ९ ३ शिवरात्रि- व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं भोग और मोक्ष देनेवाला शिवरात्रि- व्रत बतलाऊँगा, उसे सुनो । माघ और फाल्गुन के बीच में पड़नेवाली कृष्णपक्ष की चतुर्दशी में ( किसी बात की ) कामना करनेवाले व्यक्ति को ( इस दिन ) उपवास तथा रात्रि में जागरण करना चाहिए । उसे यह कहना चाहिए कि मैं चतुर्दशी में बिना भोजन किये शिवरात्रि व्रत करूँगा, मैं व्रत कर रहा हूँ अतः रात्रि में जागरण करते हुए भगवान् शंकर का आवाहन कर रहा हूँ जो भोग और मोक्ष देनेवाले हैं ॥१-३ ॥ हे शिव! आप नरक के सागर से उद्धार कराने के लिए नौका रूप हैं । आपको नमस्कार है । प्रजा तथा राज्य को दिलानेवाले भगवान् शंकर को नमस्कार है । सौभाग्य, आरोग्य, विद्या और स्वर्ग को प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है । आप मुझे धर्म, धन, काम, भोग, गुण, कीर्ति, सुख, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान कीजिये । पूर्व काल में सुन्दरसेन नामक पापी व्याध ने ( भी ) इस व्रत के प्रभाव से सद्गति को प्राप्त कर लिया था ॥४-६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में शिवरात्रि- व्रत कथन नामक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥१९ ३ ॥ १ सौभाग्यारोग्य " प्रदायिने क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । २ ख. ग. “ द्यान्नस्व ” । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 615

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चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ६११ अथ चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः अशोकपूर्णिमादिव्रतम् अग्निरुवाच अशोकपूर्णिमां वक्ष्ये भूधरं च भुवं यजेत् । फाल्गुन्यां सितपक्षायां वर्षं स्याद्भुक्तिमुक्तिभाक् ॥१ ॥

कार्तिक्यां तु बृषोत्सर्गं कृत्वा नक्तं समाचरेत् । पित्र्या याऽमावसी ( स्या ) तस्यां पितॄणां दत्तमक्षयम् । पञ्चदश्यां च माघस्य पूज्याजं स्वर्गमाप्नुयात् । पञ्चदश्यां व्रती ज्येष्ठे वटमूले महासतीम् । प्ररूढैः कण्ठसूत्रैश्च रजन्यां कुङ्कुमादिभिः । नमः सावित्र्यै सत्यवते नैवेद्यं चार्पयेद्विजे । सावित्री प्रीयतां देवी सौभाग्यादिकमाप्नुयात् शैवं पदमवाप्नोति उपोष्याब्दं पितॄनिष्ट्वा वक्ष्ये सावित्र्यमावास्यां त्रिरात्रोपोषिता नारी वटावलम्बनं कृत्वा वेश्म गत्वा द्विजान्भोज्य वृषव्रतमिदं परम् ॥२ ॥

निष्पापः स्वर्गमाप्नुयात् ॥३ ॥

भुक्तिमुक्तिकरीं शुभाम् ॥४ ॥

सप्तधान्यैः प्रपूजयेत् ॥५ ॥

नृत्यगीतैः प्रभातके ॥६ ॥

स्वयं भुक्त्वा विसर्जयेत् ॥७ ॥

॥८ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये तिथिव्रतवर्णनं नाम चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१९ ४ ॥ अध्याय १ ९ ४ अशोकपूर्णिमादि - व्रत अग्निदेव बोले- ( अब ) मैं अशोकपूर्णिमा व्रत बतलाऊँगा । इसमें पर्वत तथा पृथ्वी की पूजा करनी चाहिए । फाल्गुन की पूर्णिमा में एक वर्ष तक यह व्रत करने से भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥ १ ॥ कार्तिक की पूर्णिमा में वृषभ ( बैल )

का दान करके रात्रिव्रत करना चाहिए । इस व्रत का नाम वृषव्रत है । इसके करने से शिवलोक की प्राप्ति होती है । ( आश्विन कृष्ण की ) पितृविसर्जनी अमावस्या में पितरों का यजन करने से मनुष्य निष्पाप होकर स्वर्ग को चला जाता है । माघ की अमावस्या ( पंचदशी ) या पूर्णिमा में ब्रह्मा की पूजा करने से सब - कुछ प्राप्त हो जाता है ॥२-४ ॥ अब मैं भोग और मोक्ष को दिलानेवाली सावित्री अमावस्या के विषय में बतलाऊँगा । तीन रात उपवास करके ज्येष्ठ मास की अमावस्या के दिन प्रातःकाल स्त्री को वट वृक्ष के मूल में सप्तधान्य, लम्बे कण्ठसूत्र तथा कुंकुम आदि से महासती गौरी का पूजन करके वटस्पर्श तथा नृत्य - गीत करना चाहिए और ' नमः सावित्र्यै सत्यवते ' कहकर ब्राह्मणों को नैवेद्य देना चाहिए । बाद में घर जाकर ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए और ' सावित्री देवी प्रसन्न हों ' ऐसा कहते हुए स्वयं भी भोजन करके व्रत समाप्त करना चाहिए । इस व्रत को करने से सौभाग्य आदि की प्राप्ति होती है ॥५-८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में तिथिव्रत - वर्णन नामक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥१९ ४ ॥ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 616

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अग्निपुराणम् ६१२ अथ पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः वारव्रतानि अग्निरुवाच वारव्रतानि वक्ष्यामि भुक्तिमुक्तिप्रदानि हि । करः पुनर्वसुः सूर्ये स्नाने सर्वौषधी शुभा || १ || श्राद्धी चाऽऽदित्यवारे तु सप्तजन्मस्वरोगभाक् । सङ्क्रान्तौ सूर्यवारो यः सोऽर्कस्य हृदयः शुभः || २ || कृत्वा हस्ते सूर्यवारं नक्तेनाब्दं स सर्वभाक् । चित्राभसोमवाराणि सप्त कृत्वा सुखी भवेत् || ३ || स्वात्यां गृहीत्वा चाङ्गारं सप्तनक्त्यार्तिवर्जितः । विशाखायां बुधं गृह्य सप्तनक्ती ग्रहार्तिनुत् || ४ || अनुराधे देवगुरुं सप्तनक्ती ग्रहार्तिनुत् । शुक्रं ज्येष्ठासु संगृह्य सप्तनक्ती ग्रहार्तिनुत् ॥ मूले शनैश्चरं गृह्य सप्तनक्ती ग्रहार्तिनुत् 11411 इत्यादिमहापुराण आग्नेये वारव्रतवर्णनं नाम पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ५ ॥ अध्याय १ ९ ५ वार - व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं भुक्ति - मुक्ति प्रदान करनेवाले दिन - व्रतों के सम्बन्ध में कहूँगा । हस्त तथा पुनर्वसु नक्षत्र से युक्त रविवार के दिन ' सर्वोषधि ' से स्नान करना चाहिए || १ || रविवार को श्राद्ध करनेवाला व्यक्ति सात जन्म तक नीरोग रहता है । संक्रान्ति में पड़नेवाला रविवार सूर्य का शुभ हृदय माना गया है । हस्त नक्षत्र के रविवार को रात्रिव्रत करने से मनुष्य की सब अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं । चित्रा नक्षत्र के सात सोमवारों को व्रत करने से सुख की प्राप्ति होती है ॥ २-३ ॥ स्वाती नक्षत्र के सात मंगलवारों को व्रत करने से पीड़ाशान्ति होती है । विशाखा नक्षत्र के सात बुधवारों को व्रत करने से ग्रहशान्ति होती है । अनुराधा नक्षत्र के सात बृहस्पतिवारों को, ज्येष्ठा नक्षत्र के सात शुक्रवारों को और मूल नक्षत्र के सात शनिवारों को व्रत करने से ग्रहों की पीड़ा शान्त हो जाती है ॥४-५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में वार - व्रत वर्णन नामक एक सौ पञ्चानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥१९ ५ ॥ १ ग. घ. कर । २ ग. ङ. पूज्य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 617

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षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ६१३ अथ षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः नक्षत्रव्रतानि अग्निरुवाच नक्षत्रव्रतकं वक्ष्ये भे हरिः पूजितोऽर्थदः मूले पादौ यजेज्जङ्घे रोहिणीष्वर्चयेद्धरिम् । मेढ्रं पूर्वोत्तराष्वेव कटिं वै कृत्तिकासु च स्तनौ चैवानुराधासु धनिष्ठासु च पृष्ठकम् । आश्लेषासु नखान्पूज्य कण्ठं ज्येष्ठासु पूजयेत् । यजेत्स्वातिषु दन्ताग्रमास्यं वारुणभेऽर्चयेत् । चित्रासु चाऽऽर्द्रासु ' कचानब्दान्ते स्वर्णकं हरिम् । नक्षत्रपुरुषो विष्णुः पूजनीय: शिवात्मकः । कार्तिके कृत्तिकायां च मृगशीर्षे मृगास्यके ॥ नक्षत्रपुरुषं चाऽऽदौ चैत्रमासे हरिं यजेत् ॥१ ॥

जानुनी चाश्विनीयोगे आषाढासूरसंज्ञके ॥२ ॥

। पार्श्वे भाद्रपदाभ्यां तु कुक्षिं वै रेवतीषु च ॥ ३ ॥

भुजौ पूज्यौ विशाखासु पुनर्वस्वङ्गुलीर्यजेत् ॥४ ॥

श्रोत्रे विष्णोश्च श्रवणे मुखं पुण्ये हरेर्यजेत् ॥५ ॥

मघासु नासां नयने मृगशीर्षे ललाटकम् ॥६ ॥

गुडपूर्णे घटेऽभ्यर्च्य शय्यागोर्थादि दक्षिणा ॥७ ॥

शांभवनीयव्रतकृन्मासभे पूजयेद्धरिम् ॥८ ॥

नामभिः केशवाद्यैस्तु अच्युताय नमोऽपि वा ॥ ९ ॥

अध्याय १ ९ ६ नक्षत्र - व्रत अग्निदेव बोले - अब मैं नक्षत्र - व्रत बतलाऊँगा । ( किसी भी ) नक्षत्र में विष्णु की पूजा करने ( सभी ) से कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं । चैत्रमास में पहले नक्षत्रपुरुष भगवान् विष्णु की आराधना करनी चाहिए ॥१ ॥ मूल

नक्षत्र में उनके चरणों की, रोहिणी में जङ्घाओं की, अश्विनी में जानुओं की, आषाढ़ ( भरणी ) में ऊरुओं की, पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ में लिंग की, कृत्तिका में कटि की, भाद्रपद में पार्श्व की, रेवती में कुक्षि की, अनुराधा में स्तनों की, धनिष्ठा में पीठ की, विशाखा में भुजाओं की, पुनर्वसु में अँगुलियों की, आश्लेषा में नाखूनों की, ज्येष्ठा में कण्ठ की पूजा करनी चाहिए ॥२-४३ ॥ श्रवण में कानों की, पुष्य में मुख की, स्वाती में दाँतों की, शतभिषा में मुख की, मघा में नासिका की, मृगशिरा में ललाट की, चित्रा और आर्द्रा में केशों की पूजा करनी चाहिए । वर्ष के अन्त में गुड़ से भरे हुए घड़े पर विष्णु की स्वर्णप्रतिमा की अर्चना करके शय्या, गाय, द्रव्य तथा दक्षिणा दान करना चाहिए ॥५-७ ॥ नक्षत्रपुरुष विष्णु का पूजन शिवरूप समझकर करना चाहिए । शांभवनीय व्रत करनेवाले व्यक्ति को मास नक्षत्र में हरि का पूजन करना चाहिए ॥ ८ ॥ कार्तिक में कृत्तिका नक्षत्र में और

मार्गशीर्ष में मृगशिरा नक्षत्र में केशव आदि नामों से अच्युत ( भगवान् विष्णु ) को नमस्कार करना चाहिए ॥९ ॥

१ ख. ग. कराब्दा " । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 618

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अग्निपुराणम् ६१४ मासनक्षत्रगं हरिम् । शांभवायनीयव्रतकं करिष्ये भुक्तिमुक्तिदम् ॥१० ॥

कार्तिके कृत्तिकाभेऽह्नि केशवादि महामूर्तिमच्युतं सर्वदायकम् । कार्तिकादौ सदा देयमन्नं मासचतुष्टयम् । देवाय ब्राह्मणेभ्यश्च नक्तं नैवेद्यमाशयेत् । अर्वाग्विसर्जनाद्द्द्रव्यं नैवेद्यं सर्वमुच्यते । नमो नमस्तेऽच्युत मे क्षयोऽस्तु, ऐश्वर्यवित्तादिसदाऽक्षयं मे, यथाऽच्युतस्त्वं परतः परस्तात्, तथाऽच्युतं त्वं कुरु वांछितं मे, अच्युतानन्द गोविन्द प्रसीद ' यदभीप्सितम् । सप्तवर्षाणि सम्पूज्य भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् । मार्गशीर्षे मृगशिरे ( शीर्षे ) गोमूत्राशी यजेद्धरिम् । ` ददात्यनन्तं च पुनस्तदेवान्यत्र जन्मनि । कार्तिक मास के कृत्तिका नक्षत्र में मासों और नक्षत्रों आवाहयाम्यहं देवमायुरारोग्यवृद्धिदम् ॥ ११ ॥

फाल्गुनादौ च कृशरमाषाढादौ च पायसम् ॥१२ ॥

पञ्चगव्यजले स्नातस्तस्यैव प्राशनाच्छुचिः ॥१३ ॥

विसर्जिते जगन्नाथे निर्माल्यं भवति क्षणात् ॥१४ ॥

पापस्य वृद्धिं समुपैति पुण्यम् ।

क्ष मा संततिरभ्युपैतु ॥१५ ॥

स ब्रह्मभूतः परतः परात्मन् ।

मया कृतं पापहराप्रमेय ॥१६ ॥

अक्षयं माममेयात्मन्कुरुष्व पुरुषोत्तम ॥१७ ॥

अनन्तव्रतमाख्यास्ये नक्षत्रव्रतकेऽर्थदम् ॥१८ ॥

अनन्तं सर्वकामानामनन्तो भगवान्फलम् ॥१९ ॥

अनन्तपुण्योपचयं करोत्येतन्महाव्रतम् ॥२० ॥

में व्याप्त रहनेवाले भगवान् विष्णु की पूजा करनी चाहिए । पहले ' मैं भुक्ति - मुक्तिदायक शांभवनीय व्रत करूँगा ' यह संकल्प करे ॥ १० ॥ तदनन्तर ' आयु, आरोग्य और सौभाग्यवर्द्धक तथा

सब - कुछ देनेवाले केशव आदि महामूर्तिरूप विष्णु भगवान् का आवाहन करता हूँ । ' कहकर आवाहन करना चाहिए । कार्तिक आदि चार मासों में सदा अन्नदान करना चाहिए । फाल्गुन आदि में कृशर ( खिचड़ी ) तथा आषाढ़ आदि में खीर से देवता तथा ब्राह्मणों का भोग लगाना चाहिए ॥११-१२३ ॥ व्रत के दिन पञ्चगव्य मिश्रित जल से स्नान करने तथा उसी जल का पान करनेवाला ( व्यक्ति ) पवित्र होता है । पूजा समाप्त होने के पूर्व चढ़ायी हुई वस्तु नैवेद्य कहलाती है तथा जगन्नाथ ( विष्णु ) का विसर्जन कर देने के पश्चात् दिया हुआ नैवेद्य निर्माल्य हो जाता है ॥ १३-१४ ॥ नैवेद्य का भोग लगाने के बाद भगवान् की प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिए- ' हे अच्युत! आपको नमस्कार है । आपकी कृपा से मेरे पाप का नाश तथा धर्म की वृद्धि होती रहे । मुझे ऐश्वर्य तथा धन आदि अक्षय रूप से प्राप्त होते रहें । मेरी सन्तान कभी नष्ट न हों । जैसे आप कभी नष्ट न होनेवाले, श्रेष्ठतम, ब्रह्मभूत तथा परमात्मा हैं, उसी प्रकार मुझे अध: पतन से रहित और सफल मनोरथ कर दीजिये । हे अप्रमेयात्मन्! मेरे पापों का हरण कीजिये । अच्युत! अनन्त! गोविन्द! कृपा कीजिये । मेरी कामनाओं को सफल कीजिये । पुरुषोत्तम! मुझे अविनश्वर बना दीजिये । ' इस प्रकार सात वर्ष भगवान् की आराधना करने से भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥१५-१७ ॥ अब मैं नक्षत्र व्रत से सम्बन्ध रखनेवाले और मनोरथों को पूर्ण करनेवाले व्रत को बताऊँगा । मार्गशीर्ष के मृगशिरा नक्षत्र में गोमूत्र पानकर अनन्त भगवान् की आराधना करे । ऐसा करने से अनन्त भगवान् अनेक जन्मों में महान् और अनन्तफल देनेवाले होते हैं । यह महाव्रत अनन्त पुण्य की वृद्धि तथा अभीष्ट प्राप्ति को अक्षय कर देता है ॥१८-२०३ ॥ इस व्रत में १ ग. ॰द पदमीप्सि ’ । क. ङ. “ द् परमेश्वर । अ ’ । २ ‘ ददात्यनन्तं जन्मनि ' इत्यत्र क. ङ. पुस्तकयोः ‘ वेदे द्वे लक्षजन्मानिपुनरात्मानमात्मनि ' इति दृश्यते । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ६१५ यथाभिलषितप्राप्ति करोत्यक्षयमेव च । ( ' पादादि पूज्य नक्ते तु भुञ्जीयात्तैल वर्जितम् ॥२१ ॥

घृतेनानन्तमुद्दिश्य होमो मासचतुष्टयम् । चैत्रादौ शालिना होमः पयसा श्रावणादिषु ) ॥ २२ ॥

मान्धाताऽभूद्युवनाश्वादनन्तव्रतकात्सुतः ॥२३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये नक्षत्रव्रतवर्णनं नाम षष्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ६ ॥ अथ सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः दिवसव्रतानि अग्निरुवाच दिवसव्रतकं वक्ष्ये ह्यादौ धेनुव्रतं वदे । यश्चोभयमुखीं दद्यात्प्रभूतकनकान्विताम् ॥१ ॥

दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेत्स याति परमं पदम् । त्र्यहं पयोव्रतं कृत्वा काञ्चनं कल्पपादपम् ॥२ ॥

दत्त्वा ब्रह्मपदं याति कल्पवृक्षव्रतं स्मृतम् । दद्याद्विशत्पलादूर्ध्वं महीं कृत्वा तु काञ्चनीम् ॥३ ॥

दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेद्रुद्रगः स्याद्दिवाव्रती । पक्षे पक्षे त्रिरात्रं तु भक्तेनैकेन यः क्षपेत् ॥४ ॥

विपुलं धनमाप्नोति त्रिरात्रव्रतकृद्दिनम् । मासे मासे त्रिरात्राशी एकभक्ती गणेशताम् ॥५ ॥

एकाहार, भगवान् के चरण आदि का पूजन तथा तेलरहित भोजन किया जाता है । अनन्त देव के उद्देश्य से चार मास तक घृत से हवन करना चाहिए । चैत्र आदि मासों में चावल से और श्रावण आदि मासों में खीर से हवन करना चाहिए । पूर्वकाल में इसी अनन्त व्रत के प्रभाव से युवनाश्व को मान्धाता नामक पुत्र प्राप्त हुआ था ॥२१-२३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नक्षत्रव्रत - वर्णन नामक एक सौ छियानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥१९ ६ ॥ अध्याय १ ९ ७ दिवस - व्रत अग्निदेव बोले - - अ अब मैं दिवसव्रत बतलाऊँगा, इसलिए सर्वप्रथम धेनुव्रत ( ही ) बता देता हूँ । जो व्यक्ति एक दिन केवल दूध पीकर रहता है तथा ( मुख और पूँछ ) दोनों ओर बहुत से सोने से युक्त गाय का दान करता है, उसे परम पद की प्राप्ति होती है । तीन दिन केवल दुग्धपान कर स्वर्ण - निर्मित कल्पवृक्ष दान करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मपद को प्राप्त कर लेता है । इसे कल्पवृक्ष व्रत कहते हैं ॥१-२ २३ ॥ एक दिन दुग्धाहार करते हुए बीस पल ( ८० तोले ) सोने की बनी हुई पृथ्वी ( की प्रतिमा ) दान करने से रुद्रलोक की प्राप्ति होती है । प्रत्येक पक्ष में तीन रातें एकाहार करके बिता देने से विपुल धन की प्राप्ति होती है । प्रत्येक मास में तीन रात तक एकाहार करने से गणेशत्व की प्राप्ति हो जाती है ॥३-५ ॥ १ ' पादादि ंतैलवर्जितम् ' क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । २ च. ' द्याद्विसर्जनादू ' । ३ ख. ग. ' कभुक्तिगणेश्वरम् । य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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६१६ अग्निपुराणम् यस्त्रिरात्रव्रतं कुर्यात्समुद्दिश्य जनार्दनम् । ' नवम्यां च सिते पक्षे नरो मार्गशिरस्यथ । ४ ॐ नमो ' वासुदेवाय सहस्त्रं वा शतं जपेत् । द्वादश्यां पूजयेद्विष्णुं ' कार्तिके कारयेद्व्रतम् छञोपवीतपात्राणि ' ददत्संप्रार्थयेद्विजान् । भवद्भिस्तदनुज्ञातं परिपूर्ण भवत्विति कार्तिकव्रतकं वक्ष्ये भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ( ` कार्तिकस्य सितेऽभ्यर्च्य विष्णुं देवो विमानगः त्रिरात्रं पयसः पानमुपवासपरस्त्र्यहम् ) पञ्चरात्रं पयःपीत्वा दध्याहारो ह्युपोषितः यवागूं यावकं शाकं दधि क्षीरं घृतं जलम् कुलानां शतमादाय स याति भवनं हरेः ॥ ६ ॥

प्रारभेत त्रिरात्राणां अष्टम्यामेकभक्ताशी । विप्रान्संभोज्य वस्त्राणि व्रतेऽस्मिन्दुष्करे चापि । भुक्तभोगो व्रजेद्विष्णुं । दशम्यां पञ्चगव्याशी 1 । चैत्रे त्रिरात्रं नक्काशी " । षष्ठ्यादि कार्तिके शुक्ले व्रतं तु विधिवद्व्रती ॥७ ॥

दिनत्रयमुपावसेत् ॥८ ॥

शयनान्यासनानि च ॥ ९ ॥

विकलं यदभून्मम ॥१० ॥

त्रिरात्रव्रतकव्रत ' ॥११ ॥

एकादश्यामुपोषितः ॥ १२ ॥

अजापञ्चप्रदः सुखी ॥१३ ॥

कृच्छ्रो माहेन्द्र उच्यते ॥१४ ॥

। एकादश्यां कार्तिके तु कृच्छ्रोऽयं भास्करोऽ " र्थदः ॥१५ ॥

। पञ्चम्यादि सिते पक्षे कृच्छ्रः सान्तपनः स्मृतः ॥१६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये दिवसव्रतकथनं नाम सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१९ ७ ॥ जो मनुष्य जनार्दन ( भगवान् विष्णु ) के उद्देश्य से त्रिरात्र - व्रत करता है, वह सौ पीढ़ियों का उद्धार करके वैकुण्ठ को चला जाता है । मार्गशीर्ष - शुक्लपक्ष की नवमी में विधिपूर्वक त्रिरात्र - व्रत करना चाहिए ॥६-७ ॥ व्रत के दिन ‘ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' मन्त्र का सौ बार या सहस्र बार जप करना चाहिए । अष्टमी में एकाहार रहकर तीन दिन तक उपवास करना चाहिए । द्वादशी के दिन विष्णु का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए । उन्हें वस्त्र, शय्या, आसन, छत्र, यज्ञोपवीत तथा पात्र दान करके यह प्रार्थना करनी चाहिए - ' इस कठिन व्रत में जो कुछ भी न्यूनता रह गयी हो वह आपकी अनुज्ञा से परिपूर्ण हो जाय ॥८-१० ०६३ ॥ ॥ अनन्तर मैं भुक्ति - मुक्तिदायक कार्तिक व्रत का वर्णन करूँगा । कार्तिक शुक्लपक्ष की दशमी में पञ्चगव्य का पान करना चाहिए और एकादशी में उपवास करके भगवान् विष्णु का पूजन करना चाहिए ॥११-१२ ॥ ऐसा करने से मनुष्य विमान में बैठकर वैकुण्ठ को चला जाता है । चैत्र में त्रिरात्र व्रत तथा पाँच बकरियों का दान करने से मनुष्य सुखी हो जाता है । तीन रात तक दुग्धपान और बाद में तीन दिन तक उपवास करके कार्तिक शुक्लपक्ष की षष्ठी आदि में कृच्छ्र माहेन्द्र नामक व्रत किया जाता है ॥१३-१४ ॥ पाँच रात दुग्धपान तथा दही का भोजन करके कार्तिक की एकादशी में उपवास करके कृच्छ्र भास्कर नामक व्रत किया जाता है, जो सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाला हुआ करता है । उसी मास में शुक्लपक्ष की पञ्चमी आदि तिथियों में कृच्छ्रसान्तपन नामक व्रत किया जाता है । इसमें यवागू ( माँड़ ), यावक ( जौ का सत्तू ), शाक, दही, दूध, घी तथा जल ग्रहण करना चाहिए ॥१५-१६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में दिवस - व्रत कथन नामक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥१९ ७ ॥ ५ ख. ग १. क मो. भगवते ख. ग. “ भ्यां चाऽऽदिमे प । २ ख. ग. च. शतं । ३ ग. विधिरब्रवीत् । ४'ॐ नमो शतं जपेत् ' नास्ति च. पुस्तके । वा ' । ६ क. ङ. ' र्तिक्यां पार । ७ क. ङ. दश संप्रा । ८ क. ख. ' त्रशत ' । ९ कार्तिकस्य अहम् ' पुस्तके नास्ति । १० ख. ग. ' शी स्त्रजा ' प ' । ११ च. ' रोऽन्नद । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA