अग्नि पुराण — पृष्ठ 671–680

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 671–680

पृष्ठ 671

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अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ६६७

दिशः नः परमं योगमपत्यं मत्समं तथा । ब्रह्म चैवाक्षयं देव शमं चैव परं विभो ॥११ ॥

अक्षयत्वं च वंशस्य धर्मे च मतिमक्षयाम् ॥१२ ॥

अग्निरुवाच वशिष्ठेन स्तुतः शम्भुस्तुष्टः श्रीपर्वते पुरा । वशिष्ठाय वरं दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥१३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये गायत्रीनिर्वाणकथनं नाम सप्तदशाधिकद्विशततमोध्यायः ॥२१७ ॥

अथाष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः राज्याभिषेककथनम् अग्निरुवाच

पुष्करेण च रामाय राजधर्मं हि पृच्छते । यथाऽऽदौ कथितं तद्वद्वशिष्ठ कथयामि ते॥१ ॥

पुष्कर उवाच राजधर्मं प्रवक्ष्यामि सर्वस्माद्राजधर्मतः । ' राजा भवेच्छत्रुहन्ता प्रजापालः ' सुदण्डवान् ॥२ ॥

` पालयिष्यामि वः सर्वान्धर्मस्थान्न्रतमाचरेत् । संवत्सरं स वृणुयात्पुरोहितमथ * द्विजम् ॥३ ॥

मुझे परम योग का उपदेश दीजिये । ( मुझे ) मेरे समान सन्तान दीजिये । अक्षय ब्रह्म ( विद्या ) दीजिये । शान्ति दीजिये । जिस वंश का नाश न हो, ऐसा वंश दीजिये । धर्म में दृढ़ बुद्धि प्रदान कीजिये ॥११-१२ ॥ अग्निदेव बोले - पूर्वकाल में श्रीपर्वत पर वशिष्ठ द्वारा ( इस तरह ) स्तुति किये जाने पर भगवान् शङ्कर वशिष्ठ को वरदान देकर अन्तर्धान हो गये ॥ १३ ॥

श्री अग्निमहापुराण में गायत्री निर्वाण - कथन नामक दो सौ सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥२१७ ॥

अध्याय २१८ राज्याभिषेक- -कथन अग्निदेव बोले - हे वशिष्ठ! प्राचीनकाल में राम के प्रश्न करने पर पुष्कर ने जिस प्रकार राजधर्म का वर्णन किया था, वह मैं तुम्हें बतला रहा हूँ ॥१ ॥

पुष्कर बोले- मैं राजा के अन्य कर्त्तव्यों से भिन्न राजधर्म को बतला रहा हूँ । राजा को शत्रुनाशक, प्रजापालक को ) दण्ड देनेवाला होना चाहिए । उसे यह संकल्प करना चाहिए- ' मैं धर्म पर आरूढ़ प्रजाओं तथा ( अपराधियों पुरोहित तथा नीतिनिपुण मन्त्रियों और धर्म को जाननेवाली ( पतिव्रता ) का पालन करूँगा । ' उसे ज्योतिष शास्त्रवेत्ता, विप्र १ क. ख. ग. घ. ङ. च. ' जा हरिः शत्रु । २ क. ख. ग. घ. ङ. च. सदण्डवान् । ३ घ. छ. पालयिष्यति । ४ क. ख. ग. ङ. च. ' थर्त्विज ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 672

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६६८ अग्निपुराणम् मन्त्रिणश्चाखिलात्मज्ञान्महिषीं धर्मलक्षणाम् । कुर्यान्मृते नृपे नात्र कालस्य नियमः स्मृतः । घोषयित्वा जयं राज्ञो राजा भद्रासने स्थितः । पुरोधसाऽभिषेकात्प्राक्कार्यैन्द्री शान्तिरेव च । वैष्णवानैन्द्रमन्त्रांस्तु सावित्रान्वैश्वदैवतान् । अपराजितां च कलशं वह्नेर्दक्षिणपार्श्वगम् । प्रदक्षिणावर्तशिखस्तप्तजाम्बूनदप्रभः

अनुलोमः सुगंधिश्च स्वस्तिकाकारसंनिभः ) ।

न व्रजेयुश्च मध्येन मार्जारमृगपक्षिणः ॥

वल्मीकाग्रमृदा कर्णौ वदनं केशवालयात् । करिदन्तोद्धृतमृदा दक्षिणं तु तथा भुजम् । “ सरोमृदा तथा पृष्ठमुदरं संगमान्मृ ( ममृ ) दा ।

वेश्याद्वारमृदा राज्ञः कटिशौचं विधीयते ।

सांवत्सरं नृपः काले ससंभारोऽभिषेचनम् ॥४ ॥

तिलैः सिद्धार्थकैः स्नानं साम्वत्सरपुरोहितैः ॥५ ॥

अभयं ' घोषयेद्वद्वान्मोचयेद्राज्य पालके ॥ ६ ॥

उपवास्याभिषेकाहे वेद्यग्नौ जुहुयान्मनून् ॥७ ॥

सौम्यान्स्वस्त्ययनं शर्म आयुष्याभयदान्मनून् ॥८ ॥

संपातवन्तं हैमं च पूजयेद्गन्धपुष्पकैः ॥९ ॥

( रथौघमेघनिर्घोषो विधूमश्च हुताशनः ॥ १० ॥

प्रसन्नार्चिर्महाज्वालः स्फुलिङ्गरहितो हितः ॥ ११ ॥

पर्वताग्रमृदा तावन्मूर्धानं शोधयेन्नृपः ॥१२ ॥

इन्द्रलयमृदा ग्रीवां हृदयं तु नृपाजिरात् ॥ १३ ॥

वृषशृङ्गोद्धृतमृदा वामं चैव तथा भुजम् ॥१४ ॥

नदीतटद्वयमृदा पार्श्वे संशोधयेत्तथा ॥ १५ ॥

यज्ञस्थानात्तथैथोरु गोस्थानाज्जानुनी तथा ॥ १६ ॥

स्त्री को रानी के रूप में वरण करना चाहिए । राज्य - प्राप्ति के एक वर्ष बाद राजा का अभिषेक बड़े समारोह के साथ मनाना चाहिए ॥२-४ ॥ एक राजा के मर जाने पर दूसरे को राजा बना देना चाहिए, इसमें काल का नियम नहीं है । राजा को श्वेत सरसों तथा तिल ( मिश्रित जल ) से स्नानकर भद्रासन पर बैठना चाहिए । तदनन्तर पुरोहित को राजा का जयघोष करना चाहिए । राजा को ( प्रजा को ) अभयदान देना चाहिए और बन्दियों को बन्धनमुक्त कर देना चाहिए ॥५-६ ॥ अभिषेक से पूर्व पुरोहित को इन्द्रशान्ति का आयोजन करना चाहिए । अभिषेक के दिन राजा को उपवास करके वेदी की अग्नि में वैष्णव मन्त्र, ऐन्द्र मन्त्र, सावित्र मन्त्र, वैश्वदेव मन्त्र, सौम्य मन्त्र तथा कल्याण, आयु और अभय देनेवाले मन्त्रों से हवन करना चाहिए । अग्नि के दक्षिण भाग में अपराजिता ( लता - विशेष ) से वेष्टित तथा आम्रपल्लव युक्त स्वर्णकलश की स्थापना कर गन्ध, पुष्प आदि से उसकी पूजा करनी चाहिए || ७ - ९ ॥ अग्नि की प्रभा तप्त सुवर्ण के समान हो तथा उसकी शिखा ( लपटें ) घूमनेवाली हों । उसका शब्द रथसमूह तथा मेघ के गर्जन के समान होना चाहिए । उसमें धुआँ नहीं होना चाहिए । वह अनुलोम ( सीधा ) हो, सुगन्धयुक्त हो तथा उसकी आकृति स्वस्तिक के समान हो, उसमें चमक हो, बड़ी - बड़ी ज्वालाएँ हों और चिनगारियाँ न निकलती हों । उसके बीच से होकर बिलाव और पशु - पक्षी न निकलने पायें । राजा को पर्वत के शिखर की मिट्टी से अपने मस्तक को शुद्ध करना चाहिए ॥१०-१२ ॥ वल्मीक की मिट्टी से कानों को, विष्णु मन्दिर की मिट्टी से मुख को, इन्द्रालय की मिट्टी से ग्रीवा को, राजा के चतुःशाल की मिट्टी से हृदय को, हाथी के सूँड़ से उखाड़ी हुई मिट्टी से बायीं भुजा को, सरोवर की मिट्टी से पीठ को, नदियों के संगम की मिट्टी से उदर को, नदी के दोनों की मिट्टी से दोनों पाश्र्व को शुद्ध करना चाहिए ॥१३-१५ ॥ वेश्यागृह की मिट्टी से कमर को, यज्ञस्थल तटों उरुओं को, गोशाला की मिट्टी से घुटनों को, अश्वशाला की मिट्टी से जङ्घाओं को, रथचक्र की मिट्टी से की मिट्टी से चरणों को १ छ. " येदुर्गान्मो ' । २ क. ङ. च. ' ज्यकालिके । ३ ' रथौघमेघ संनिभः ' ग. पुस्तके नास्ति । ४ ख. ग. सदोमृदा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 673

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अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ६६ ९ अश्वस्थानात्तथा जङ्घे रथचक्रमृदाऽङ्घिनके । अभिषिञ्चेदमात्यानां चतुष्टयमथो घटैः । रूप्यकुम्भेन ( ण ) याम्ये च क्षीरपूर्णेन क्षत्रियः । मृण्मयेन जलेनोदक्शूद्रामात्योऽभिषेचयेत् । कुर्वीत मधुना विप्रश्छन्दोगश्च कुशोदकैः । विधाय वह्निरक्षां तु सदस्येषु यथाविधि । तैस्तु दद्यान्महाभाग ब्रह्मणानां स्वनैस्तथा । शतच्छिद्रेण पात्रेण सौवर्णेनाभिषेचयेत् । पुष्पैः पुष्पवतीत्येव ब्राह्मणेति च ' बीजकैः । यजुर्वेद्यथर्ववेदी गन्धद्वारेति संस्पृशेत् । गीतवाद्यादिनिर्घोषैश्चामरव्यजनादिभिः । तं पश्येद्दर्पणं राजा घृतं वै मङ्गलादिकम् ।

व्याघ्रचर्मोत्तरां शय्यामुपविष्टः पुरोहितः ।

मूर्धानं पञ्चगव्येन भद्रासनगतं नृपम् ॥१७ ॥

पूर्वतो हेमकुम्भेन घृतपूर्णेन ब्राह्मणः ॥१८ ॥

दध्ना च ताम्रकुम्भेन ( ण ) वैश्यः पश्चिमगेन च ॥१९ ॥

ततोऽभिषेकं नृपतेर्बप्रव द्विजः ॥२० ॥

संपातवन्तं कलशं तथा गत्वा पुरोहितः ॥२१ ॥

राजश्रियाऽभिषेके च ये मन्त्रा परिकीर्तिताः ॥ २२ ॥

ततः पुरोहितो गच्छेद्वेदिमूलं तदेव तु ॥ २३ ॥

या ओषधीत्योषधीभीरथेत्युक्त्वेति ' गन्धकैः ॥२४ ॥

रत्नैराशुः शिशानाश्च ये देवाश्च कुशोदकैः ॥२५ ॥

शिरः कण्ठं रोचनया सर्वतीर्थोदकैर्द्विजाः ॥२६ ॥

सर्वोषधिमयं कुम्भं धारयेयुर्नृपाग्रतः ॥२७ ॥

अभ्यर्च्य विष्णुं ब्रह्माणमिन्द्रादींश्च ग्रहेश्वरान् ॥२८ ॥

मधुपर्कादिकं दत्त्वा पट्टबन्धं प्रकारयेत् ॥ २ ९ ॥

और पञ्चगव्य से मस्तक को शुद्ध करना चाहिए । तदनन्तर अमात्यगण ( भद्रासन पर बैठे हुए ) राजा को चार प्रकार के घड़ों ( के जल ) से स्नान करायें । पूर्व की ओर से ब्राह्मण घृतपूर्ण स्वर्णकलश से राजा का अभिषेक करें ॥१६-१८ ॥ दक्षिण भाग से क्षत्रिय दूध से भरे चाँदी के घड़े से राजा का अभिषेक करें । पश्चिम भाग से वैश्य दधिपूर्ण ताम्रघट से ( राजा का ) अभिषेक करें । उत्तर भाग से शूद्र अमात्य जलपूर्ण मिट्टी के घड़े से ( राजा का ) अभिषेक करें । तदनन्तर ऋग्वेदी ब्राह्मण मधु से और सामवेदी ब्राह्मण कुशोदक से राजा का अभिषेक करें । तत्पश्चात् पुरोहित को सभासदों पर वह्निरक्षा का भार छोड़कर स्वयं आम्रपल्लव हाथ में लेकर ( पहले से ) स्थापित कलश के जल से राजा को स्नान कराना चाहिए । राज्याभिषेक के समय जो मन्त्र बताये गये हैं, उन मन्त्रों का उच्चारण करते हुए पुरोहित ब्राह्मण का ( मङ्गल ) ध्वनि के साथ ( राजा का ) अभिषेक करे ॥१९ -२२३ ॥ तत्पश्चात् पुरोहित वेदी के समीप जाकर सौ छिद्रों से युक्त स्वर्णपात्र से ( राजा का ) अभिषेक करे । ' या ओषधी ' इस मन्त्र को पढ़ते हुए ओषधियों से, ' रथेत्युक्तत्वा ' पढ़कर गन्धों से, ' पुष्पवती ' पढ़कर पुष्पों से, ‘ ब्राह्मणेति ' पढ़कर बीजों से, ' आशुः शिशानः ' पढ़कर रत्नों से और ' ये देवाश्च ' पढ़कर कुशोदक से अभिषेक करना चाहिए ॥२३-२५ ॥ तदनन्तर यजुर्वेदी और अथर्ववेदी ब्राह्मण को ' गन्ध द्वारा ' मन्त्र को पढ़ते हुए गोरोचन से राजा के सिर तथा कण्ठ का स्पर्श करना चाहिए । पश्चात् ब्राह्मणों को समस्त तीर्थों के जल और सर्वोषधियों से परिपूर्ण घट को राजा के आगे रख देना चाहिए । उस समय गाना - बजाना, जयनाद आदि होते रहना चाहिए तथा चामर और पङ्खा आदि झलते रहना चाहिए ॥ २६-२७ ॥ तब राजा को कलश, दर्पण, घी तथा मांगलिक वस्तुओं को देकर विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र तथा ग्रहेश्वरों की अर्चना करनी चाहिए । तदनन्तर व्याघ्रचर्म से ढँकी हुई शय्या पर बैठे हुए पुरोहित को राजा को १ क. ख. ग. ङ. च. ' थे अक्षेति । २ ग. जीवकैः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 674

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६७० अग्निपुराणम् राज्ञो मुकुटबन्धश्च पञ्चचर्मोत्तरं ददेत् । ध्रुवाद्यैरिति च विशेद्वृषजं वृषभांशजम् ' ॥३० ॥

द्वीपिजं सिंहजं व्याघ्रजातं चर्म तदासने । अमात्यसचिवादींश्च प्रतिहारः प्रदर्शयेत् ॥ ३१ ॥

गोजाविगृहदानाद्यैः सावत्सरपुरोहितौ । पूजयित्वा द्विजान्प्रार्च्य ह्यन्यान्भूगोन्नमुख्यकैः ॥३२ ॥

वह्निं प्रदक्षिणीकृत्य गुरुं नत्वाऽथ पृष्ठतः । वृषमालभ्य गां वत्सं पूजयित्वाऽथ मन्त्रितम् ॥ ३३ ॥

अश्वमारुह्य नागं च पूजयेत्तं समारुहेत् । परिभ्रमेद्राजमार्गे बलयुक्तः प्रदक्षिणम् ॥३४ ॥

पुरं विशेच्च दानाद्यैः प्रार्चं सर्वान्विसर्जयेत् ” ॥३५ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये राज्याभिषेककथनं नामाष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१८ ॥

अथैकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः अभिषेकमन्त्राः पुष्कर उवाच राजदेवाद्यभिषेकमन्त्रान्वक्ष्येऽघमर्दनान् । कुम्भात्कुशोदकैः सिञ्चेत्तेन सर्वं हि सिद्धयति ॥ १ ॥

मधुपर्क आदि देकर उसके ऊपर पगड़ी तथा मुकुट आदि बाँधना चाहिए ॥ २८-२९ ३ ॥ ' ध्रुवाद्यैः ' इस मन्त्र को पढ़ते हुए राजा को पञ्चचर्मावृत आसन प्रदान करना चाहिए । ये पाँच चर्म वृष, मृग, हाथी, सिंह तथा व्याघ्र के होने चाहिए । तत्पश्चात् पुरोहित को चाहिए कि वह राजा से द्वारपाल, अमात्य, सचिव आदि को मिलाये । राजा को गाय, बकरा, भेंड़ा, भवन आदि का दान करके ज्योतिषी तथा पुरोहित का पूजन करना चाहिए । अन्य ब्राह्मणों को भी भूमि, गौ, अन्न आदि देना चाहिए ॥३०-३२ ॥ तदनन्तर अग्नि की प्रदक्षिणा करके गुरु को प्रणाम करना चाहिए तथा पृष्ठ भाग से वृष का आलम्भन कर जबड़े सहित गौ का पूजन करना चाहिए । फिर घोड़े तथा हाथी की पूजा करके उन पर सवारी करनी चाहिए । तदनन्तर दल - बल के साथ राजमार्ग से नगर भर का चक्कर लगाते हुए लोगों को दान आदि से सन्तुष्ट करके विदा करना चाहिए ॥ ३३-३५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में राज्याभिषेक कथन नामक दो सौ अठारहवाँ अध्याय समाप्त ॥२१८ ॥

अध्याय २१ ९ अभिषेक - मन्त्र पुष्कर बोले - अब मैं राजा तथा देवताओं के अभिषेक मन्त्रों को बतलाऊँगा, जो पापों का नाश करनेवाले हुआ करते हैं । घड़े से कुशोदक लेकर ( राजा तथा देवता को ) स्नान कराने से सब कार्य सिद्ध होते हैं । अभिषेक के समय १ क. ङ. च. ञ्चवर्मोत्तरच्छदे । ध्रु । २ घ. छ. वृषदंशजम् । ३ क. ङ. प्रार्थ्य । ४ क. पुस्तके श्लोकार्धमधिकं तद्यथा-- " एवं कृत्वा तु विधिवद्राज्याभिषेकमाचरेत् " इति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 675

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एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ६७१ सुरास्त्वामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः भवन्तु विजयायैत इन्द्राद्या दश दिग्गजाः भृगुरत्रिर्वशिष्ठश्च सनकश्च सनन्दनः । मरीचिः कश्यपः ' पातु ' प्रजेशं पृथिवीपतिम् । क्रव्यादाश्चोपहूताश्च आज्यपाश्च सुकालिनः आदित्याद्याः कश्यपस्य ' बहुपुत्रस्य वल्लभाः अश्विन्याद्याश्च चन्द्रस्य ' पुलहस्य तथा प्रियाः श्येनी भासी तथा क्रौञ्च धृतराष्ट्री शुकी तथा आयतिर्नियती रात्रिर्निद्रा लोकस्थितौ स्थिताः गौरी शिवा च ऋद्धिश्च वेला या चैव नड्वला महाकल्पश्च कल्पश्च मन्वन्तरयुगानि च । ऋतवश्च तथा मासा: पक्षा रात्र्यहनी तथा सूर्याद्याश्च ग्रहाः पान्तु मनुः स्वायंभुवादिकः रैवतश्चाक्षुषः षष्ठो वैवस्वत इहेरितः दक्षजो रौच्यभौत्यौ च मनवस्तु चतुर्दश यह कहना चाहिए कि- देवगण तुम्हारा अभिषेक करें इन्द्र आदि दस दिक्पाल तुम्हारी विजय के साधक । वासुदेवः संकर्षणः प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः ॥२ ॥

। रुद्रो धर्मो मनुर्दक्षो रुचिः श्रद्धा च सर्वदा ॥३ ॥

सनत्कुमारोऽङ्गिराश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ॥४ ॥

प्रभासुरा बर्हिषद अग्निष्वात्ताश्च पान्तु ते ॥५ ॥

। अग्निभिश्चाभिषिञ्चन्तु लक्ष्म्याद्या धर्मवल्लभाः ॥६ ॥

। कृशाश्वस्याग्निपुत्रस्य भार्याश्चारिष्टनेमिनः ॥७ ॥

। भूता च कपिशा दंष्ट्री सुरसा सरमा दनुः ॥८ ॥

। एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु अरुणश्चार्कसारथिः ॥९ ॥

। उमा मेना शची पान्तु धूमोर्णा निर्ऋतिर्जया ॥१० ॥

। असिक्नी च तथा ज्योत्स्ना देवपल्यो वनस्पतिः ॥ ११ ॥

संवत्सराणि वर्षाणि पान्तु त्वामयनद्वयम् ॥१२ ॥

। सन्ध्यातिथिमुहूर्ताश्च कालस्यावयवाश्च ' ये ॥१३ ॥

। स्वयम्भुवः स्वारोचिष ' उत्तमस्तामसो मनुः ॥१४ ॥

। ' सावर्णिब्रह्मपुत्रश्च धर्मपुत्रश्च रुद्रजः ॥१५ ॥

। विश्वभुक्च विपश्चिच्च सुचितिश्च शिखी विभुः ॥१६ ॥

। ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा बनें ॥ १-२३ ॥ रुद्र, धर्म, मनु, दक्ष, रुचि, श्रद्धा, भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, सनक, सनत्कुमार, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि तथा कश्यप तुम्हारी रक्षा करते रहें । आप प्रजा के स्वामी तथा पृथिवीपति हैं । प्रभासुर, बर्हिषद तथा अग्निष्वात्त तुम्हारी रक्षा करते रहें ॥ ३-५ ॥ क्रव्याद, उपहूत, आज्यपान करनेवाले, सुकालि, अग्नियों के साथ तुम्हारा अभिषेक करें । लक्ष्मी आदि धर्म की पत्नियाँ, अदिति आदि बहुपुत्र, कश्यप की पत्नियाँ, अरिष्टनेमि आदि अग्निपुत्र, कृशाश्व पत्नियाँ, अश्विनी आदि चन्द्रमा की पत्नियाँ और भूता, कपिशा, दंष्ट्री, सुरसा, सरमा, दनु, श्येनी, भासी, क्रौञ्ची, धृतराष्ट्री, शुकी आदि पुलह की पत्नियाँ तुम्हारा अभिषेक करें । तथा सूर्य - सारथि अरुण तुम्हारी रक्षा करें ॥६ - ९ ॥ आयति, नियति, रात्रि, निद्रा, उमा, मेना, शची, धूमा, ऊर्णा, निर्ऋति, जया, गौरी, शिवा, ऋद्धि, वेला, नड्वला, असिक्नी, ज्योत्स्ना, देवपत्नियाँ, वनस्पति, महाकल्प, कल्प, मन्वन्तर, युग, संवत्सर तथा वर्ष, तुम्हारी रक्षा करते रहें । दोनों अयन, ऋतु, मास, पक्ष, रात्रि, दिन, सन्ध्या, तिथि, मुहूर्त्त तथा कालावयव, सूर्यादि ग्रह तथा स्वायंभुव आदि मनु तुम्हारी रक्षा करते रहें ॥ १०-१३३ ॥ स्वायंभुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, ब्रह्मपुत्र, धर्मपुत्र, रुद्रज, दक्षज, रौच्य, भौत्य - ये चौदहों मनु, विश्वभुक्, विपश्चित्, सुचित्ति, शिखी, विभु, मनोजव, ओजस्वी, बली, अद्भुत, शान्ति, १ छ. पान्तु । २ छ. प्रजेशाः । ३ छ. पृथिवीपतिः । ४ च. देवपुत्रस्य । ५ क. ङ. च. पुलस्त्यस्य । ६ ख. ग. ङ. छ. ‘ था पल्यस्त्वा ° । ७ क. ङ. घ. छ. वाकृतिः । सू । ८ ख. ग. घ. छ. ' ष औत्तमिस्ता । ९ क. ख. ग. घ. ङ. छ. वर्णो ब्रह्म ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 676

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६७२ अग्निपुराणम् मनोजवस्तथौजस्वी बलिरद्भुतशान्तयः । रैवन्तश्च कुमारश्च तथा वत्सविनायकः । एते त्वामभिषिञ्चन्तु सुरमुख्याः समागताः दश चाङ्गिरसो ' वेदास्त्वाऽभिषिञ्चन्तु सिद्धये । हविष्मांश्च गरिष्ठा च ऋतः सत्यश्च पान्तु वः पुरूरवा अद्रिवाश्च विश्वेदेवाश्च रोचनः । अजैकपादहिर्बुघ्न्यो धूमकेतुश्च रुद्रजाः भवनो भावनः पान्तु स्वजन्यः स्वजनस्तथा प्रसवश्चाव्ययश्चैव दक्षश्च भृगवः सुरा वीतिहोत्रो नयः सांध्यो हंसो नारायणोऽवतु धाता मित्रोऽर्मया पूषा शक्रोऽथ वरुणो भगः एकज्योतिश्च द्विज्योतिस्त्रिश्च ( च ) तुर्ज्योतिरेव च इन्द्रश्च मेत्यादिशतु ततः प्रतिमकृत्तथा ऋतजित्सत्यजिच्चैव सुषेणः सेनजित्तथा ऋतश्च ऋतवाग्धाता विधाता धारणो ध्रुवः ईदृक्षश्चाप्यदृक्षश्च एतादृगमिताशनः धर्ता धुर्यो धुरिर्भीम (? ) अभिमुक्तोऽक्षपात्सहः वृषश्च ऋतधामा च दिवस्पृक्कविरिन्द्रकः ॥१७ ॥

वीरभद्रश्च नन्दी च विश्वकर्मा पुरोजवः ॥ १८ ॥

। नासत्यौ देवभिषजौ ध्रुवाद्या वसवोऽष्ट च ॥ १ ९ ॥ आत्मा ह्यायुर्मनो दक्षो मदः प्राणस्तर्थव च ॥ २० ॥

। क्रतुर्दक्षो वसुः सत्यः कालकामो धुर्जि ॥ २१ ॥

अङ्गारकाद्याः सूर्यस्त्वां निर्ऋतिश्च तथा यमः ॥ २२ ॥

। भरतश्च तथा मृत्युः कापालिरथ किङ्किणिः ॥ २३ ॥

। क्रतुश्रवाश्च मूर्धा च याजनोऽभ्युशनास्तथा ॥ २४ ॥

। मनोनुमन्ता प्राणश्च नवोऽपानश्च वीर्यवान् ॥२५ ॥

। विभुश्चैव प्रभुश्चैव ' देवश्रेष्ठा जगद्धिताः ॥ २६ ॥

। त्वष्टा विवस्वान्सविता विष्णुर्द्वादशभास्कराः ॥ २७ ॥

। एकशक्रो द्विशक्रश्च त्रिशक्रश्च महाबलः ॥ २८ ॥

। मितश्च संमितश्चैव अमितश्च महाबलः ॥ २ ९ ॥ । अतिमित्रोऽनुमित्रश्च पुरुमित्रोऽपराजितः ॥ ३० ॥

। विधारणो महातेजा वासवस्य परः सखा ॥ ३१ ॥

। क्रीडितश्च सदृक्षश्च सरभश्च महातपाः ॥ ३२ ॥

। धृतिर्वसुरनाधृष्यो रामः कामो जयो विराट् ॥ ३३ ॥

वृष, ऋतधामा, दिवस्पृक्, कवि, इन्द्र, रैवन्त, कुमार, वत्सविनायक, वीरभद्र, नन्दी, विश्वकर्मा तथा पुरोजव आदि यहाँ पर आये हुए प्रमुख देवगण तुम्हारा अभिषेक करें ॥ १४-१८३ ॥ नासत्य, अश्विनीकुमार, ध्रुव आदि आठों वसु, दस अङ्गिरस और ( चारों ) वेद तुम्हारा अभिषेक करें । आत्मा, आयु, मन, दक्ष, मद, प्राण, हविष्मान्, गरिष्ठ, ऋतु तथा सत्य तुम्हारी रक्षा करते रहें । क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, कालकाम, धुरि, जय, पुरूरवा, आद्रव, विश्वेदेव, रोचन, अंगारक, सूर्य, निर्ऋति, यम, अज, एकपाद, अहिर्बुध्न्य, धूमकेतु, रुद्रज, भरत, मृत्यु, कापालि, किंकिणि, भवन, भावन, स्वजन्य तथा स्वजन तुम्हारी रक्षा करते रहें ॥१९ -२३ ॥ क्रतुश्रव, मूर्धा, याजन, उशना, प्रसव, अव्यय, दक्ष, भृगु, सूर, मन, अनुमन्ता, प्राण, नव, अपान, वीर्यवान्, वीतिहोत्र, नय, साध्य, हंस तथा नारायण तुम्हारी रक्षा करें ॥ २४-२५३ ॥ विभु, प्रभु, देवश्रेष्ठ, जगद्धित, धाता, मित्र, अर्यमा, पूषा, शक्र, वरुण, भग, त्वष्टा, विवस्वान्, सविता, विष्णु, बारहों आदित्य, एकज्योति, द्विज्योति, त्रिज्योति, चतुर्ज्योति, एकशक्र, द्विशक्र, त्रिशक्र, महाबल, इन्द्र, प्रतिमकृत्, मित, संमित, अमित, ऋतजित्, सत्यजित्, सुषेण, सेनजित्, अतिमित्र, अनुमित्र, पुरुमित्र, अपराजित, ऋत, ऋतवाक्, धाता, विधाता, धारण, ध्रुव, विधारण, महातेजा, इन्द्रमित्र, ईदृक्ष, अदृक्ष, एतादृक्, अमिताशी, क्रीडित, सदृक्ष, सरभ, महातप, धर्ता, धुर्य, धुरि, अभिमुक्त, अक्षपान, सह, धृति, अनाधृष्य, राम, काम, जय, विराट्, देवगण और उनचासों वायु तुम्हारी रक्षा करते रहें ॥२६-३३३ ॥ १ क. ख. ग. ङ. सो देवास्त्वाऽ ° । २ क. ङ. कालः का ' । ३ क. ङ. घ. छ. ' वा माद्रवा " । ४ क. ङ. रुद्रकाः । ५ क. ख. ग. घ. ङ. नरोऽपा ' । ६ ग. देवज्येष्ठा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ६७३ देवा एकोनपञ्चाशन्मरुतस्त्वामवन्तु ते । ऊर्णायुरुग्रसेनश्च धृतराष्ट्रश्च नन्दकः । एते त्वामभिषिञ्चन्तु गन्धर्वा विजयायते । अनवद्या सुकेशी च मेनका सहजन्यया । प्रम्लोचा चोर्वशी रम्भा पञ्चचूडा तिलोत्तमा । प्रह्लादो विरोचनोऽथ बलिर्बाणोथ तत्सुतः । हेतिश्चैव प्रहेतिश्च विद्युत्स्फूर्जथुरग्रकाः । पिङ्गाक्षो द्युतिमांश्चैव पुष्पवन्तो जयावहः । पिशाचा ऊर्ध्वकेशाद्या भूता भूम्यादिवासिनः । गुहः स्कन्दो विशाखस्त्वां नैगमेयोऽभिषिञ्चतु । गरुडश्चारुणः पान्तु संपातिप्रमुखाः खगाः । ऐरावतो महापद्मः कम्बलाश्वतरावुभौ । कुमुदैरावणौ पद्मः पुष्पदन्तोऽथ वामनः । पैतामहस्तथा हंसो वृषभः शंकरस्य च । उच्चैःश्रवाश्चाश्वपतिस्तथा धन्वन्तरिः सदा । नन्दकोऽस्त्राणि रक्षन्तु धर्मश्च व्यवसायकः ।

बालखिल्यादिमुनयो व्यासवाल्मीकिमुख्यकाः ।

चित्राङ्गदश्चित्ररथश्चित्रसेनश्च वै कलिः ॥ ३४ ॥

हाहाहूहूर्नारदश्च विश्वावसुश्च तुम्बुरुः ॥३५ ॥

पान्तु ते ' मुनयो मुख्या दिव्याश्चाप्सरसां गणाः ॥३६ ॥

क्रतुस्थला घृताची च विश्वाची पुञ्जिकस्थला ॥३७ ॥

चित्रलेखा लक्ष्मणा च पुण्डरीका च वारुणी ॥ ३८ ॥

एते चान्येऽभिषिञ्चन्तु दानवा राक्षसास्तथा ॥३९ ॥

यक्षः सिद्धात्मकः पातु मणिभद्रश्च नन्दनः ॥४० ॥

शङ्खः पद्मश्च मकरः कच्छपश्च निधिर्जये ॥४१ ॥

महाकालं पुरस्कृत्य नरसिंहं च मातरः ॥ ४२ ॥

डाकिन्यो याश्च योगिन्यः खेचराभूचराश्च याः ॥४३ ॥

अनन्ताद्या महानागाः शेषवासुकितक्षकाः ॥४४ ॥

शङ्खः कर्कोटकश्चैव धृतराष्ट्रो धनञ्जयः ॥ ४५ ॥

सुप्रतीकाञ्जनो नागाः पान्तु त्वां सर्वतः सदा ॥४६ ॥

दुर्गासिंहश्च पान्तु त्वां यमस्य महिषस्तथा ॥४७ ॥

कौस्तुभः ३ शङ्खराजश्च व्रजं शूलं च चक्रकम् ॥४८ ॥

चित्रगुप्तश्च दण्डश्च पिङ्गलो मृत्युकालकौ ॥४९ ॥

पृथुर्दिलीपो भरतो दुष्यन्तः ' शत्रुजिद्बली ॥ ५० ॥

चित्राङ्गद, चित्ररथ, चित्रसेन, कलि, ऊर्णायु, उग्रसेन, धृतराष्ट्र, नन्दक, हाहा, हूहू, नारद, विश्वावसु तथा तुम्बुरु तुम्हारा अभिषेक करें । गन्धर्व तुम्हें विजय प्रदान करें ॥ ३४-३५३ ॥ प्रमुख मुनिगण, अनवद्या, सुकेशी, मेनका, सहजन्या, क्रतुस्थला, घृताची, विश्वाची, पुंजिकस्थला, प्रम्लोचा, उर्वशी, रम्भा, पञ्चचूड़ा, तिलोत्तमा, चित्रलेखा, लक्ष्मणा, पुण्डरीका, वारुणी - ये दिव्य अप्सराएँ, प्रह्लाद, विरोचन, बलि, बाण, बाणपुत्र- ये तथा अन्य दानव और राक्षस तुम्हारा अभिषेक करें ॥३६-३९ ॥ हेति, प्रहेति, विद्युत्, स्फूर्जथु, अग्रक, यक्ष, सिद्धात्मक, मणिभद्र, नन्दन, पिंगाक्ष, द्युतिमान्, पुष्पवान्, जयावह, शंख, पद्म, मकर, कच्छप, निधि, पिशाच, ऊर्ध्वकेश, आदिभूत, भूमि आदि पर निवास करनेवाले जीव, महाकाल, नरसिंह, मातृगण, गुह, स्कन्द, विशाख तथा नैगमेय तुम्हारा अभिषेक करें ॥४०-४२ ॥ डाकिनी, योगिनी, खेचर, भूचर, गरुड़, अरुण, संपाति आदि पक्षी, अनन्त, शेष, वासुकि, तक्षक आदि महानाग, ऐरावत, महापद्म, कम्बल, अश्वतर, शंख, कर्कोटक, धृतराष्ट्र, धनञ्जय, कुमुद, ऐरावण, पद्म, पुष्पदन्त, वामन, सुप्रतीक, अञ्जन आदि गज तुम्हारी सब ओर से रक्षा करते रहें ॥ ४३-४६ ॥ ब्रह्मा का हंस, शंकर का वृष, दुर्गा का सिंह, यम का महिष, अश्वपति, उच्चैःश्रवा, धन्वन्तरि, कौस्तुभ, शंखराज, वज्र, शूल, चक्र, नन्दक तथा अस्त्र तुम्हारी रक्षा करते रहें । धर्म, व्यवसायक, चित्रगुप्त, दण्ड, पिङ्गल, मृत्यु, काल, बालखिल्य, व्यास, वाल्मीकि आदि मुनि, पृथु, दिलीप, भरत, दुष्यन्त, शत्रुजित्, १ ख. च. कुरवो । ग. कुरुवा । घ. छ. कुरूपा । २ ख. ग. घ. छ. ' त्सुताः । ए ' । ३ क. ङ. च. भः पाञ्चजन्यश्च । ४ घ. छ. शक्रजि । ४३ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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६७४ अग्निपुराणम् ' मनुः ककुत्स्थश्चानेना ` युवनाश्वो जयद्रथः । वास्तुदेवाः पञ्चविंशत्तत्त्वानि विजयाय ते । पीतरक्तः क्षितिश्चैव श्वेतभौमो रसातलम् । उत्तराः कुरवः पान्तु रम्यो हिरण्यकस्तथा । हरिवर्षः किंपुरुष इन्द्रद्वीपः कशेरुमान् । गान्धर्वो वारुणो यश्च नवमः पातु राज्यदः । श्वेतश्च शृङ्गवान्मेरुर्माल्यवान्गन्धमादनः विन्ध्यश्च पारियात्रश्च गिरयः शान्तिदास्तु ते आयुर्वेदश्च गान्धर्वधनुर्वेदोपवेदकाः छन्दोऽङ्गानि च वेदाश्च मीमांसा न्यायविस्तरः सांख्यं योगः पाशुपतं वेदा वै पञ्चरात्रकम् दुर्गा विद्या च गान्धारी पान्तु त्वां शान्तिदाश्च ते चत्वारः सागराः पान्तु तीर्थानि विविधानि च गयाशीर्षो ब्रह्मशिरस्तीर्थमुत्तरमानसम् भृगुतीर्थं प्रभासं च तथा चामरकण्टकम् गङ्गाद्वारकुशावर्तौ विन्ध्यको नीलपर्वतः मान्धाता मुचकुन्दश्च पान्तु त्वां च पुरूरवाः ॥५१ ॥

रुक्मभौमः शिलाभौमः पातालो नीलमूर्तिकः ॥५२ ॥

भूर्लोकोऽथ भुवर्मुख्या ' जम्बूद्वीपादयः श्रिये ॥ ५३ ॥

भद्राश्वः केतुमालश्च वर्षश्चैव बलाहकः ॥५४ ॥

ताम्रवर्णो गभस्तिमान्नागद्वीपश्च सौम्यकः ॥५५ ॥

हिमवान्हेमकूटश्च निषधो नील एव च ॥ ५६ ॥

। महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षवान्गिरिः ॥ ५७ ॥

। ऋग्वेदाद्याः षडङ्गानि इतिहासपुराणकम् ॥५८ ॥

। शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं ज्योतिषां गतिः ॥ ५ ९ ॥ । धर्मशास्त्रं पुराणं च विद्याह्येताश्चतुर्दश ॥ ६० ॥

। कृतान्तपञ्चकं ह्येतद्गायत्री च शिवा तथा ॥ ६१ ॥

। लवणेक्षुसुरासर्पिर्दधिदुग्धजलाब्धयः ॥६२ ॥

। पुष्करश्च प्रयागश्च प्रभासो नैमिषः परः ॥ ६३ ॥

। कालोदको नन्दिकुण्डतीर्थं पञ्चनदस्तथा ॥ ६४ ॥

। जम्बूमार्गश्च विमलः कपिलस्य तथाऽऽश्रमः ॥ ६५ ॥

। वराहपर्वतश्चैव तीर्थं कनखलं तथा ॥ ६६ ॥

कालंजरश्च केदारो रुद्रकोटिस्तथैव च । वाराणसी महातीर्थं बदर्याश्रम एव च ॥ ६७ ॥

बली, मनु, ककुत्स्थ, अनेना, युवनाश्व, जयद्रथ, मान्धाता, मुचकुन्द तथा पुरूरवा तुम्हारी रक्षा करते रहें ॥ ४७-५१ ॥ वास्तुदेव तथा पचीस तत्त्व तुम्हारी विजय के लिए हों । रुक्मभौम, शिलाभौम, पाताल, नीलमूर्तिक, पीतरक्त, क्षिति, श्वेतभौम, रसातल, भूर्लोक, भुवर्लोक तथा जम्बूद्वीप आदि तुम्हारा कल्याण करते रहें । उत्तरकुरु तुम्हारी रक्षा करते रहें । रम्य, हिरण्यक, भद्राश्व, केतुमाल, वर्ष, बलाहक, हरिवर्ष, किंपुरुष, इन्द्रद्वीप, कशेरुमान, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्यक, गान्धर्व तथा ' वारुण तुम्हारी रक्षा करते रहें ॥ ५२-५५३ ॥ हिमवान्, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत, शृङ्गवान्, मेरु, माल्यवान्, गन्धमादन, महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्षवान्, विन्ध्य, पारियात्र आदि पर्वत तुम्हें शान्ति प्रदान करें । इतिहास, पुराण, आयुर्वेद, गान्धर्ववेद, धनुर्वेद, उपवेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छन्दस्, वेद, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र - ये चौदहों विद्याएँ और सांख्य, योग, पाशुपत ( तन्त्र ), पञ्चरात्र, कृतान्तपञ्चक, गायत्री, शिवा, दुर्गा, विद्या तथा गान्धारी तुम्हारी रक्षा करती रहें ॥५६-६१३ ॥ लवण, इक्षु, मद्य, घी, दही, दूध तथा जल के समुद्र, चार सागर, विविध तीर्थ - पुष्कर, प्रयाग, प्रभास, नैमिष, गयाशीर्ष, ब्रह्मशिर, उत्तरमानस, कालोदक, नन्दिकुण्ड, पञ्चनद, भृगुतीर्थ, प्रभास, अमरकण्टक, जम्बूमार्ग, विमल, कपिलाश्रम, गङ्गाद्वार, कुशावर्त, विन्ध्यक, नीलपर्वत, वराहपर्वत, कनखल, कालञ्जर, केदार, रुद्रकोटि, वाराणसी, महातीर्थ बदरिकाश्रम तुम्हारा अभिषेक करें एवं तुम्हारी रक्षा करें ॥६२-६७ ॥ १ घ. छ. मल्लः । २ ङ. पावनाश्वो । ३ क. ङ. वासुदेवः । ४ ग. ' दयश्च ये । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ६७५ द्वारका श्रीगिरिस्तीर्थं तीर्थं च पुरुषोत्तमः । शालग्रामोऽथ वाराहः सिन्धुसागरसंगमः ॥ ६८ ॥

फल्गुतीर्थं विन्दुसरः करवीराश्रमस्तथा । नद्यो गङ्गासरस्वत्यः शतगुर्गण्डकी तथा ॥६९ ॥

अच्छोदा च विपाशा च वितस्ता देविका नदी । कावेरी ' वरुणा चैव निश्चिरा गोमती नदी ॥७० ॥

पारा चर्मण्वती रूपा मन्दाकिनी महानदी । तापी पयोष्णी वेणा च गौरी वैतरणी तथा ॥७१ ॥

गोदावरी भीमरथी तुङ्ग भद्राऽरणी तथा । चन्द्रभागा शिवा गौरी अभिषिञ्चन्तु पान्तु च ॥७२ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽभिषेकमन्त्रकथनं नामैकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥२१९ ॥

अथ विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः सहायसम्पत्तिः पुष्कर उवाच सोऽभिषिक्तः सहामात्योजयेच्छत्रून्नृपोत्तमः । राज्ञा सेनापतिः कार्यो ब्राह्मणः क्षत्रियोऽथ वा ॥१ ॥

कुलीनो नीतिशास्त्रज्ञः प्रतिहारश्च नीतिवित् । दूतश्च प्रियवादी स्यादक्षीणोऽतिबलान्वितः ॥२ ॥

ताम्बूलधारी ना स्त्री वा भक्तः ' क्लेशसहप्रियः । सांधिविग्रहिकः कार्यः षाड्गुण्यादिविशारदः ॥३ ॥

द्वारका, श्रीगिरि, पुरुषोत्तम, शालग्राम, वाराह, सिन्धुसागरसंगम, फल्गुतीर्थ, विन्दुसर, करवीराश्रम, गंगा, सरस्वती, शतद्रु, गण्डकी, अच्छोदा, विपाशा, वितस्ता, देविका नदी, कावेरी, वरुणा, निश्चिरा, गोमती नदी, पारा, चर्मण्वती, रूपा, मन्दाकिनी, महानदी, तापी, पयोष्णी, वेणा, गौरी, वैतरणी, गोदावरी, भीमरथी, तुंगभद्रा, अरणी, चन्द्रभागा, शिवा तथा गौरी तुम्हारा अभिषेक करें और तुम्हारी रक्षा करती रहें ॥६८-७२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अभिषेक मन्त्र - कथन नामक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२१९ ॥

अध्याय २२० सहायसम्पत्ति पुष्कर बोले- इस प्रकार अभिषिक्त होकर श्रेष्ठ राजा को मन्त्री के साथ शत्रुओं के ऊपर विजय प्राप्त करना चाहिए । राजा, ब्राह्मण या क्षत्रिय को अपना सेनापति बनाये ॥ १ ॥ राजा का द्वारपाल कुलीन, नीतिशास्त्रज्ञाता

तथा ( राज ) नीति जाननेवाला होना चाहिए । दूत को प्रियवक्ता, बलवान् और हृष्ट - पुष्ट होना चाहिए । ताम्बूल वहन करने के लिए पुरुष या स्त्री होनी चाहिए, परन्तु उसे ( राजा की ) भक्त, प्रिय और क्लेश को सहन करनेवाली होना चाहिए । सांधि - विग्रहिक को सन्धिविग्रह आदि छह गुणों से सम्पन्न होना चाहिए ॥ २-३ ॥ रक्षक को १ क. ङ वरदा । २ ग. परा । ३ ग. घ. छ. ' द्राऽग्रणी । ४ ग. घ. छ. वः । ४ क. ङ. भुक्तः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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६७६ अग्निपुराणम् खड्गधारी रक्षकः स्यात्सारथिः स्याद्बलादिवित् । सभासदस्तु धर्मज्ञा ' लेखकोऽक्षरविद्धितः । रत्नादिज्ञो धनाध्यक्षो ह्यर्थद्वारे हितो नरः । जितश्रमो गजारोहो हयाध्यक्षो हयादिवत् । यन्त्रमुक्ते पाणिमुक्ते अमुक्ते मुक्तधारिते । वृद्धश्चान्तःपुराध्यक्षः पञ्चाशद्वार्षिकाः स्त्रियः । जाग्रत्स्यादायुधागारे ज्ञात्वा वृत्तिर्विधीयते । उत्तमाधममध्यानि ) पुरुषाणि ( न्वि ) नियोजयेत् । धर्मिष्ठान्धर्मकार्येषु शूरान्सङ्ग्रामकर्मसु । स्त्रीषु षण्ढाग्नियुञ्जीत तीक्ष्णान्दारुणकर्मसु । धर्मे चार्थे च कामे च नियुञ्जीताधमेऽधमान् सूदाध्यक्षो हितो विज्ञो महानसगतो हि सः ॥४ ॥

आह्वानकालविज्ञाः स्युर्हिता दौवारिका जनाः ॥ ५ ॥

स्यादायुर्वेदविद्वैद्यो गजाध्यक्षोऽथ हस्तिवित् ॥६ ॥

दुर्गाध्यक्षो हितो धीमान्स्थपतिर्वास्तुवेदवित् ॥७ ॥

अस्त्राचार्यो नियुद्धे च कुशलो नृपतेर्हितः ॥ ८ ॥

सप्तत्यब्दास्तु पुरुषाश्चरेयुः सर्वकर्मसु ॥९ ॥

उत्तमाधममध्यानि ( ' बुद्ध्वा कर्माणि पार्थिवः ॥१० ॥

जयेच्छुः पृथिवीं राजा सहायानान'येद्धितान् ॥११ ॥

निपुणानर्थकृत्येषु सर्वत्र च तथा शुचीन् ॥ १२ ॥

यो यत्र विदितो राज्ञा शुचित्वेन तु तं नरम् ॥१३ ॥

। राजायथार्ह कुर्याच्च उपधाभिः परीक्षितान् ॥१४ ॥

खड्गधारी तथा सारथी को सेना आदि का ज्ञाता होना चाहिए । भण्डारी को ( राजा का ) हितचिन्तक, ( पाकशास्त्र का ) ज्ञाता तथा रसोई में रहनेवाला होना चाहिए । सभासद ( सदस्य ) को धर्मज्ञ होना चाहिए । लेखक सुन्दर और शुद्ध लिखनेवाला तथा हितैषी होना चाहिए । द्वारपाल ( राजा का ) शुभचिन्तक तथा ऐसा होना चाहिए जिसे यह ज्ञात हो कि उसे कब बुलाया जा सकता है ॥४-५ ॥ धनाध्यक्ष ( खजाञ्ची ) रत्न आदि को परखनेवाला और खजाने का रक्षक ( राजा का ) हितैषी होना चाहिए । वैद्य आयुर्वेद का ज्ञाता हो और गजाध्यक्ष हाथियों ( के स्वभाव ) की जानकारी रखनेवाला हो । महावत परिश्रमी होना चाहिए । अश्वाध्यक्ष अश्वों का ज्ञाता होना चाहिए । दुर्ग का अध्यक्ष हितचिन्तक तथा बुद्धिमान् होना चाहिए । स्थपति ( कारीगर ) को वास्तुवेद ( भवन निर्माण - कला ) का ज्ञाता होना चाहिए ॥६-७ ॥ जिसे यन्त्रों ( मशीनों ), धनुष - बाणों तथा खड्ग आदि से युद्ध करना आता हो ऐसा अस्त्राचार्य राजा के लिए हितकारक हुआ करता है । अन्तःपुर का अधिकारी वृद्ध होना चाहिए । यदि वह स्त्री हो तो पचास वर्ष की और यदि पुरुष हो तो सत्तर वर्ष का होना चाहिए । ये लोग सभी काम किया करते हैं ॥८ - ९ ॥ अस्त्रागार के रक्षक को सतत जागरूक रहना चाहिए जो ( अवसर ) जानकर कार्य कर सके । राजा को उत्तम, मध्यम और अधम कार्यों की दृष्टि से उत्तम, मध्यम और अधम कोटि के मनुष्यों को नियुक्त करना चाहिए । पृथ्वी को जीतने की इच्छा करनेवाले राजा को हितैषी सहायकों की नियुक्ति करनी चाहिए । धर्मनिष्ठों को धर्मकार्य में, शूरों को संग्राम कार्य में, चतुरों को अर्थ कार्य में और निष्कपटों को सभी कार्यों के लिए नियुक्त करना चाहिए ॥१०-१२ ॥ स्त्रियों के लिए नपुंसकों को और कठोर कर्मों के लिए तीक्ष्ण पुरुषों को नियुक्त करना चाहिए । जो जिस कार्य के योग्य हो उसको उसी में लगाना चाहिए । परन्तु नियुक्ति से पहले नियोज्यों के धर्म आदि की परीक्षा कर लेनी चाहिए । हाथियों के वन का अध्यक्ष वनचरों १ क. ङ. “ को रक्षको हितः । २ घ. छ. ' ध्यक्ष अ ( स्त्व ) नुद्वा ' । ३ क. ङ. मान्स्थाप्यते वास्तु ’ । ४‘बुद्ध्वा मध्यानि ' क. ङ. पुस्तकयोः नास्ति । ५ क. ङ. च. ' यान्मानयेद्द्विजान् । ६ क. ङ. ' णान्गृहकृ । ७ क. ङ. विहितो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USAS