अग्नि पुराण — पृष्ठ 681–690

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 681–690

पृष्ठ 681

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विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ६७७ समन्त्री च यथान्यायात्कुर्याद्धस्तिवनेचरान् । यस्मिन्कर्मणि कौशल्यं यस्य तस्मिन्नियोजयेत् विना दायादकृत्येषु तत्र ते हि ' सभा मताः । दुष्टानप्यथ वाऽदुष्टान्संश्रयेत प्रयत्नतः ` देशान्तरागतान्पार्श्वेचारैर्ज्ञात्वा हि पूजयेत् । भृत्यं विशिष्टं विज्ञेयाः कुभृत्याश्च तथैकतः । जनस्याविहितान्सौम्यांस्तथाऽज्ञातान्परस्परम् तथा प्रव्रजिताकारान्बलाबलविवेकिनः । रागापरागौ भृत्यानां जनस्य च गुणागुणान् ।

अनुरागकरं कर्म चरेज्जह्याद्विरागजम् ।

तत्पदान्वेषणे यत्तानध्यक्षांस्तत्र कारयेत् ॥१५ ॥

। पितृपैतामहान्भृत्यान्सर्वकर्मसु योजयेत् ॥१६ ॥

परराजगृहात्प्राप्ताञ्जनान्संश्रयकाम्यया ॥१७ ॥

। दुष्टं ज्ञात्वा विश्वसेन्न तद्वृत्तिं वर्तयेद्वशे ॥ १८ ॥

शत्रवोऽग्निर्विषं सर्पो निस्त्रिंशमपि चैकतः ॥१९ ॥

चारचक्षुर्भवेद्राजा नियुञ्जीत सदा चरान् ॥२० ॥

। वणिजो मन्त्रकुशलान्सांवत्सरचिकित्सकान् ॥२१ ॥

नैकस्य राजा श्रद्दध्याच्छ्रद्दध्याद्बहुवाक्यतः ॥२२ ॥

शुभानामशुभानां च ज्ञानं कुर्याद्वशाय च ॥ २३ ॥

जनानुरागया लक्ष्म्या राजा स्याज्जनरञ्जनात् ॥२४ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये सहायसम्पत्तिवर्णनं नाम विंशत्यधिकद्विशततमोध्यायः ॥ २२० ॥

में से किसी एक दक्ष वनचर को बनाना चाहिए ॥ १३-१५ ॥ जो जिस कार्य में निपुण हो उसे उसी कार्य में लगाना चाहिए । पितृ - पितामह से चले आनेवाले नौकरों तथा दाय आदि के विवादों को छोड़कर अन्य सभी कामों में लगाना चाहिए । दूसरे राज्य को छोड़कर शरण पाने की इच्छा से आया हुआ व्यक्ति चाहे दुर्जन हो या सज्जन उसे आश्रय अवश्य देना चाहिए । यदि शरणार्थी दुष्ट हो तो उसका विश्वास न करे, अपितु उसकी जीविका को अपने अधीन रखे ॥१६-१८ ॥ देशान्तर से आये हुए के विषय में गुप्तचर द्वारा पता लगाकर यथावत् व्यवहार करना चाहिए । दुष्ट सेवक एक साथ शत्रु, अग्नि, विष, सर्प तथा तलवार है । राजा को गुप्तचरों की दृष्टि से देखना चाहिए । इसके लिए उसे ऐसे गुप्तचरों को नियुक्त करना चाहिए जो मनुष्य से अज्ञात रहें । बनिये, मन्त्र - तन्त्र करनेवालों, ज्योतिषियों, चिकित्सकों, संन्यासी के वेश में रहनेवालों और बलाबल की परीक्षा करनेवालों के ऊपर एक आदमी के कहने से ही राजा को विश्वास नहीं कर लेना चाहिए, अपितु बहुत आदमियों के कहने से ही उन पर श्रद्धा करनी चाहिए ॥१९ -२२ ॥ उसे सेवकों के अनुराग - विराग, प्रजा के गुण-अवगुण तथा शुभ - अशुभ कर्मों का ज्ञान रखना चाहिए । राजा को ऐसा ही कार्य करना चाहिए जिससे लोगों का अनुराग बढ़े । ऐसा कर्म जिससे प्रजा में विराग उत्पन्न हो, छोड़ देना चाहिए । राज्यलक्ष्मी वही है जो जनता का अनुरञ्जन करती रहे और उसी ( जन - रञ्जन ) से राजा राजा कहलाता है ॥२३-२४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में सहाय सम्पत्ति वर्णन नामक दो सौ बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२२० ॥

१ घ. छ. समागताः । २ क. ख. ग. ङ. च. न्तरग ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 682

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६७८ अग्निपुराणम् अथैकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः अनुजीविवृत्तम् पुष्कर उवाच भृत्यः कुर्यात्तु राजाज्ञां ' शिष्यवत्सु स्त्रियः पतेः ( त्युः ) । रहोगतस्य वक्तव्यमप्रियं यद्धितं भवेत् । राज्ञश्च न तथा कार्यं वेशभाषाविचेष्टितम् । संसर्गं न व्रजेद्भृत्यो राज्ञो गुह्यं च गोपयेत् । राज्ञा यच्छ्रावितं गुह्यं न तल्लोके प्रकाशयेत् । ' वस्त्रं रत्नमलङ्कारं राज्ञा दत्तं च धारयेत् जृम्भा निष्ठीवनं कासं कोपं पर्यङ्किकाश्रयम्

स्वगुणाख्यापने युक्त्या परानेव नियोजयेत् ।

न क्षिपेद्वचनं राज्ञो अ ( ह्य ) नुकूलं प्रियं वदेत् ॥१ ॥

न नियुक्तो हरेद्वित्तं नोपेक्षेत्तस्य मानकम् ॥ २ ॥

अन्तःपुरचराध्यक्षों * वैरभूतैर्निराकृतैः ॥ ३ ॥

प्रदर्श्य कौशलं किंचिद्राजानं तु विशेषयेत् ॥ ४ ॥

आज्ञाप्यमाने वाऽन्यस्मिन्किं करोमीति वा वदेत् ॥५ ॥

। " नानिर्दिष्टो द्वारि विशेन्नायोग्ये ( ग्य ) भुविराजदृक् ॥६ ॥

। भृकुटीं वातमुद्गारं तत्समीपे विवर्जयेत् ॥७ ॥

शाठ्यं लौल्यं सपेशून्यं ( शु ) नास्तिक्यं क्षुद्रता तथा ॥८ ॥

अध्याय २२१ अनुजीविवृत्त पुष्कर बोले- सेवक को राजा की आज्ञा का पालन उसी प्रकार करना चाहिए जिस प्रकार शिष्य गुरु की और पतिव्रता स्त्री पति की आज्ञा का पालन करती है । उसे राजा का वचन भंग नहीं करना चाहिए तथा उसे सदैव राजा के अनुकूल रहकर प्रिय बोलना चाहिए ॥१ ॥ जब राजा एकान्त में हो तब अप्रिय बात भी कही जा सकती है, यदि वह हितकर

हो । ( कोष में ) नियुक्त होने पर धन का अपहरण नहीं करना चाहिए और न तो राजा के सम्मान के विरुद्ध ही कोई कर्म करना चाहिए ॥२ ॥ अन्तःपुर के अधिकारी को उस व्यक्ति के साथ सम्पर्क नहीं करना चाहिए और न राजा के सम्मान

के विरुद्ध ही कोई कार्य करना चाहिए । राजा के वेश - भाषा तथा चाल - ढाल का अनुकरण नहीं करना चाहिए ॥३ ॥ अन्तःपुर

के अधिकारी को उस व्यक्ति के साथ सम्पर्क नहीं रखना चाहिए जो राजा से उपेक्षित हो तथा उससे वैर रखता हो । सेवक को राजा की गुप्त बात को छिपाये रखना चाहिए । उसे अपने कौशल से राजा को विशेषता प्रदान करनी चाहिए । राजा के द्वारा कही हुई बात को जनता में प्रकट नहीं करना चाहिए ॥४-५ ॥ राजा के द्वारा आज्ञा प्राप्त होने पर उसे तुरन्त कहना चाहिए कि मैं क्या करूँ? उसे राजा के दिये हुए वस्त्र, रत्न तथा आभूषण को धारण करना चाहिए । उसे अनिर्दिष्ट द्वार से प्रवेश नहीं करना चाहिए और जो स्थान जाने योग्य नहीं है वहाँ जाना भी नहीं चाहिए । राजा के समीप जँभाई लेना, थूकना, खाँसना, क्रोध करना, पलँग पर लेटना, त्यौरी चढ़ाना, अपानवायु छोड़ना और डकारना ( आदि ) नहीं करना चाहिए ॥६-७ ॥ उसे युक्तिपूर्वक दूसरों को अपने गुणों की प्रशंसा में लगाना चाहिए । राजा के सेवक को सदैव शठता, १ घ. छ. वत्सच्छ्रियः । २ क. ङ. ' तेः । नाऽऽक्षिपे ' । ३ क. ङ. ' क्षेन्नास्य । ४ क. ङ. ' क्षो वरैर्भृत्यैर्नि । ५ क. ङ. न । ६ क. ङ. ॰स्त्रं पत्रम् । ७ क. ङ. र्दिष्टे द्वा ' । ८ ख. घ. छ. ' र्यन्तिका ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 683

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द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ६७ ९ चापल्यं च परित्याज्यं नित्यं राजानुजीविना । श्रुतेन विद्याशिल्पैश्च संयोज्याऽऽत्मानमात्मना ॥९ ॥

राजसेवां ततः कुर्याद्भूतये भूतिवर्धनः । नमस्कार्या सदा चास्य पुत्रवल्लभमन्त्रिणः ॥१० ॥

सचिवैर्नास्य विश्वासो राजचित्तप्रियं चरेत् । त्यजेद्विरक्तं रक्तात्तु वृत्तिमीहेत राजवित् ॥११ ॥

अपृष्टश्चास्य न ब्रूयात्कामं कुर्यात्तथाऽऽपदि । प्रसन्नो वाक्यसंग्राही रहस्ये न च शङ्कते ॥१२ ॥

कुशलादिपरिप्रश्नं संप्रयच्छति चाऽऽसनम् । तत्कथाश्रवणाद्धृष्टो अ ( ह्य ) प्रियाण्यपि नन्दते ॥१३ ॥

अल्पं दत्तं प्रगृह्णाति स्मरेत्कथान्तरेष्वपि । इति रक्तस्य कर्तव्या सेवाऽन्यस्यविवर्जयेत् ॥१४ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽनुजीविवृत्तकथनं नामैकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२१ ॥

अथ द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः दुर्गसम्पत्तिः पुष्कर उवाच दुर्गसम्पत्तिमाख्यास्ये दुर्गदेशे वसेनृपः । वैश्यशूद्रजनप्रायो ह्यनाहार्यस्तथा परैः ॥१ ॥

लोभ, पिशुनता, नास्तिकता, क्षुद्रता तथा चपलता का परित्याग कर देना चाहिए । उसे श्रुत, वेद, शास्त्र, विद्या और शिल्प में निपुण होना चाहिए ॥८ - ९ ॥ तत्पश्चात् राजा की नौकरी करनी चाहिए क्योंकि ऐसा व्यक्ति राजा के ऐश्वर्य को बढ़ानेवाला हुआ करता है । उसे राजा के पुत्रों, मित्रों तथा मन्त्रियों को नमस्कार करना चाहिए । उसे सचिवों पर विश्वास न करके सदैव राजा के मन को रुचिकर लगनेवाला कार्य करना चाहिए । जो ( राजा से ) विरक्त हों उनका परित्याग करना चाहिए तथा ( राजा में ) अनुरक्त रहनेवाले से व्यवहार ( ज्ञान ) की इच्छा करनी चाहिए । उसे बिना पूछे कुछ बोलना नहीं चाहिए और विपत्ति में ( अपनी ) इच्छा से कार्य करना चाहिए । उसे प्रसन्नचित्त और वाक्यसंयमी होना चाहिए तथा एकान्त में सशंकित नहीं रहना चाहिए ॥ १०-१२ ॥ आसन पर बैठ जाने के बाद उसे राजा से कुशलमंगल पूछना चाहिए । राजा का समाचार सुनकर आनन्दित होना चाहिए और उसकी अप्रिय बातों से भी अप्रसन्न नहीं होना चाहिए । राजा थोड़ा - बहुत जो कुछ दे उसे ले लेना चाहिए और बातचीत में उसका स्मरण करते रहना चाहिए । इस प्रकार से ( अपने में ) अनुरक्त राजा की सेवा करनी चाहिए तथा अपने से विरक्त राजा की सेवा को छोड़ देना चाहिए ॥१३-१४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अनुजीविवृत्त - कथन नामक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२२१ ॥

अध्याय २२२ दुर्गसम्पत्ति पुष्कर ' बोले- - अब मैं दुर्ग ( किले ) की सम्पत्ति के विषय में कहूँगा । राजा को दुर्ग में निवास करना चाहिए । १ क. ङ. ' मं ब्रूयाद्यथाविधि । प्र । २ इति विवर्जयेत् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ३ घ. छ. र्तव्यं सेवामान्य ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 684

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६८० अग्निपुराणम् किंचिद्ब्राह्मणसंयुक्तो बहुकर्मकरस्तथा परैरपीडितः पुष्पफलधान्यसमन्वितः षण्णामेकतमं दुर्गं तत्र कृत्वा वसेद्बली ( ' वाक्ष चैवाम्बुदुर्गं च गिरिदुर्गं च भार्गव पुरं तत्र च हट्टाद्यं देवतायतनादिकम् राजरक्षां प्रवक्ष्यामि रक्ष्यो भूपो विषादितः शतावरी छिन्नरुहा विषघ्नी तण्डुलीयकम् मण्डूकपर्णी वाराही धात्र्यानन्दकमेव च वास्तुलक्षणसंयुक्ते वसन्दुर्गे सुरान्यजेत् ) । अदेवमातृको ' भक्तजलो देशः प्रशस्यते ॥२ ॥

। अगम्यः परचक्राणां व्यालतस्करवर्जितः ॥३ ॥

। धुनुर्दुर्गं महीदुर्गं नरदुर्गं तथैव च ॥४ ॥

। सर्वोत्तमं शैलदुर्गमभेद्यं चान्यभेदनम् ) ॥५ ॥

। ( ' अनुयन्त्रायुधोपेतं सोदकं दुर्गमुत्तमम् ॥६ ॥

। पञ्चाङ्गस्तु शिरीषः स्यान्मूत्रपिष्टो विषार्दनः ॥७ ॥

। कोषातकी च कलारी ब्राह्मी चित्रपटोलिका ॥८ ॥

। उन्मादिनी सोमराजी विषघ्नं रत्नमेव च ॥ ९ ॥

। प्रजाश्च पालदुष्टाञ्जयेद्दानानि दापयेत् ॥१० ॥

देवद्रव्यादिहरणात्कल्पं तु नरकं वसेत् । देवालयानि कुर्वीत देवपूजारतो नृपः ॥११ ॥

सुरालयाः पालनीयाः स्थापनीयाश्च देवताः । मृण्मयाद्दारुजं पुण्यं दारुजादिष्टकामयम् ॥१२ ॥

ऐष्टकाच्छैलजं पुण्यं शैलजात्स्वर्णरत्नजम् । क्रीडन्सुरगृहं कुर्वन्भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् ॥१३ ॥

दुर्गदेश में वैश्य और शूद्रों की अधिकता होनी चाहिए और ऐसा होना चाहिए जिससे शत्रुओं से अपहरण न हो सके । वहाँ ब्राह्मणों को कम किन्तु शिल्पकारों को अधिक संख्या में होना चाहिए । वह देश प्रशंसनीय हुआ करता है जिसमें जल का समुचित वितरण हो और ( जो जल के लिए ) देवताओं के ऊपर निर्भर न हो ॥१ २ ॥ उसे शत्रु से सुरक्षित तथा पुष्प, फल और अन्न से समृद्ध होना चाहिए । उसे शत्रु- समूह से अगम्य तथा सर्प और चोर आदि से रहित होना चाहिए ॥३ ॥ बलवान् राजा को छह दुर्गों में से कोई एक दुर्ग बनवाकर उसके अन्दर निवास करना चाहिए ।

अये भृगुपुत्र! उक्त छह दुर्गों के नाम ये हैं- धनुदुर्ग, महीदुर्ग, नरदुर्ग, रक्षदुर्ग, जलदुर्ग तथा गिरिदुर्ग । इनमें सर्वश्रेष्ठ गिरिदुर्ग होता है क्योंकि वह स्वयं अभेद्य होता हुआ दूसरे का भेदन करनेवाला हुआ करता है । वहाँ पुर, हाट तथा देवालय होने चाहिए, यन्त्रों तथा आयुधों से युक्त जलदुर्ग अच्छा होता है ॥४-६ ॥ अब मैं राजा के सम्बन्ध में बतलाऊँगा । राजा की रक्षा विष आदि से करनी चाहिए । मूत्र में पिसा हुआ पञ्चाङ्ग ( पत्र, मूत्र, फल, फूल तथा छाल से युक्त ) शिरीष विष का नाशक है । शतावरी, छिन्नरुहा, तण्डुलीयक, कोषातकी, कहारी, ब्राह्मी, चित्रपटोलिका, मण्डूकपर्णी, वाराही, धात्री, आनन्दक, उन्मादिनी, सोमराजी- ये ओषधियाँ तथा रत्न भी विषनाशक हैं । वास्तुविद्या के लक्षणों से युक्त दुर्ग में रहते हुए राजा को दुष्टों पर विजय प्राप्त करना चाहिए तथा दान दिलाना चाहिए ॥७-१० ॥ देवता के द्रव्य आदि का अपहरण करने से एक कल्प तक नरक में निवास करना पड़ता है । राजा को देवालयों का निर्माण तथा देवपूजन करते रहना चाहिए । उसे देवालयों की रक्षा तथा देवताओं की स्थापना करनी चाहिए । मिट्टी के बने हुए देवालय से लकड़ी का बनवाया हुआ मन्दिर ( अधिक ) पुण्यवान् होता है । लकड़ी की अपेक्षा ईंटों का, ईंटों की अपेक्षा पत्थर का और पत्थर की अपेक्षा सोने और रत्नों का बनवाया हुआ मन्दिर ( अधिक ) पुण्य देनेवाला हुआ करता है । खेल - खेल में देवालय बनवाने से ( भी ) भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥११-१३ ॥ ( देवालय १ ङ. भुक्तजनो । २ क. ङ. ' लसूकर " । ३ ग. महादुर्गं । ४ क. ङ. नखदुर्गं । ५ वा चान्यभदेनम्, पुस्तके नास्ति ६ अनुयन्त्रायुधोपेतं " सुरान्यजेत् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति ॥ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 685

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द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ६८१ चित्रकृद्गीतवाद्यादिप्रेक्षणीयादिदानकृत् पूजयेत्पालयेद्विप्राद्विजस्वं न हरेनृपः हरन्नरकमाप्नोति यावदाभूतसंप्लवम् नैवास्ति ब्राह्मणवधात्पापं गुरुतरं क्वचित् ब्राह्मणा हि ' महाभागास्तान्नमस्येत्सदैव तु साध्वीस्त्रीणां पालनं च राजा कुर्याच्च धार्मिकः सुसंस्कृतोपस्करया व्यये च मुक्तहस्तया मृते भर्तरि स्वर्यायाद्ब्रह्मचर्ये स्थिताऽङ्गना मण्डनं वर्जयेन्नारी तथा प्रोषितभर्तृका धारयेन्मङ्गलार्थाय किंचिदाभरणं तथा श्रियः सम्पूजनं कार्यं गृहसम्मार्जनादिकम् । तैलाज्यमधुदुग्धाद्यैः स्नाप्य देवं दिवं व्रजेत् ॥ १४ ॥

। सुवर्णमेकं गामेकां भूमेरप्येकमङ्गुलम् ॥१५ ॥

। दुराचारं न द्विषेच्च सर्वपापेष्वपि स्थितम् ॥१६ ॥

। अदैवं दैवतं कुर्युः कुर्युर्दैवमदैवतम् ॥१७ ॥

। ब्राह्मणी रुदती हन्ति कुलं राज्यं प्रजास्तथा ॥ १८ ॥

। स्त्रिया प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्यैकदक्षया ॥१९ ॥

। यस्मै दद्यात्पिता त्वेनां शुश्रूषेत्तं पतिं सदा ॥ २० ॥

। परवेश्मरुचिर्न स्यान्न स्यात् कलहशालिनी ॥२१ ॥

। देवताराधनपरा तिष्ठेद्भहिते रता ॥२२ ॥

। भर्त्राग्निं या विशेन्नारी साऽपि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥२३ ॥

। द्वादश्यां कार्तिके विष्णुं गां सवत्सा ददेत्तथा ॥२४ ॥

में ) चित्रकारी, गीत, वाद्य, प्रदर्शनी तथा दान करने से और तेल, घी, मधु आदि से ( देवताओं को ) स्नान कराने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । राजा को विप्रों का पालन और सम्मान करना चाहिए, और उनके धन का अपहरण नहीं करना चाहिए । क्योंकि ( ब्राह्मण की ) एक भी स्वर्ण मुद्रा, एक भी गौ तथा एक अंगुल भी भूमि का अपहरण करने से आकल्पान्त नरक वास करना पड़ता है । ब्राह्मण चाहे दुराचारी हो या महापापी, उससे द्वेष नहीं करना चाहिए ॥१४-१६ ॥ ब्राह्मण हत्या से बढ़कर कोई पाप होता ही नहीं है । ब्राह्मण दुर्भाग्य को सौभाग्य और सौभाग्य को दुर्भाग्य बना सकता है । महाभाग्यशाली ब्राह्मणों को सदैव प्रणाम करना चाहिए । रोती हुई ब्राह्मणी कुल, राज्य तथा प्रजा का नाश कर देती है ॥१७-१८ ॥ धार्मिक राजा को पतिव्रता स्त्रियों का पालन करना चाहिए । स्त्री को प्रसन्नचित्त, गृहकार्य में निपुण, शरीर और गृहस्थी के सामान को साफ - सुथरा तथा सुन्दर ढंग से रखनेवाली और मितव्ययिनी होना चाहिए, ( स्त्री का ) पिता उसे जिसे दे दे, उस पति की सदा सेवा करनी चाहिए ॥१९ -२० ॥ पति के मर जाने पर स्त्री को ब्रह्मचर्य से रहना चाहिए । इससे उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है । उसे दूसरे के घर में रुचि नहीं करनी चाहिए और झगड़ालू भी नहीं होना चाहिए । जिसका पति परदेश में हो उसे श्रृंगार छोड़ देना चाहिए । उसे अपने पति के कल्याण की कामना से देवाराधन में तत्पर रहना चाहिए । मंगल ( की सूचना ) के लिए कुछ आभूषण अवश्य पहने रहना चाहिए ॥२१ - २२३ ॥ जो स्त्री अपने पति के साथ अग्नि में प्रवेश कर जाती है, उसे भी स्वर्ग की प्राप्ति होती है । स्त्री को पूजा करनी चाहिए तथा झाडू आदि से घर को साफ रखना चाहिए । कार्तिक मास में द्वादशी को भगवान् विष्णु की पूजा करके बछड़े के साथ गोदान करना चाहिए । क्योंकि सत्याचरण - व्रत के प्रभाव से ही सावित्री ने अपने पति की रक्षा कर ली थी ॥२३-२४३ ॥ १ च. ' न हिंस्यात्स । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 686

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६८२ अग्निपुराणम् सावित्र्या रक्षितो भर्ता ' सत्याचारव्रतेन च । सप्तम्यां मार्गशीर्षे तु सितेऽभ्यर्च्य दिवाकरम् ॥२५ ॥

पुत्रानाप्नोति च स्त्रीह नात्र कार्या विचारणा ॥२६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये दुर्गसम्पत्तिवर्णनं नाम द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२२ ॥

अथ त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः राजधर्माः पुष्कर उवाच ग्रामस्याधिपतिं कुर्याद्दशग्रामाधिपं नृपः । शतग्रामाधिपं चान्यं तथैव विषयेश्वरम् ॥१ ॥

तेषां भोगविभागश्च भवेत्कर्मानुरूपतः 1 । नित्यमेव तथा कार्यं तेषां चारैः परीक्षणम् ॥२ ॥

ग्रामे दोषान्समुत्पन्नान्ग्रामेशः प्रशमं नयेत् । अशक्यो दशपालस्य स तु गत्वा निवेदयेत् ॥३ ॥

श्रुत्वाऽपि दशपालोऽपि तत्र युक्तिमुपाचरेत् । वित्ताद्याप्नोति राजा वै विषयात्तु सुरक्षितात् ॥४ ॥

धनवान्धर्ममाप्नोति धनवान्काममश्नुते । उच्छिद्यन्ते विना ह्यर्थेः क्रिया ग्रीष्मे सरिद्यथा ॥ ५ ॥

विशेषो नास्ति लोकेषु पतितस्याधनस्य च । पतितान्नतु गृह्णाति दरिद्रो न प्रयच्छति ॥ ६ ॥

मार्गशीर्ष में शुक्लपक्ष की सप्तमी में सूर्य की पूजा करनेवाली स्त्री पुत्रों को प्राप्त करती है, इसमें संशय नहीं करना चाहिए ॥२५-२६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में दुर्गसम्पत्ति - वर्णन नामक दो सौ बाईसवाँ अध्याय समाप्त ॥२२२ ॥

अध्याय २२३ राजधर्म पुष्कर बोले- राजा को एक गाँव का, दस ग्रामों का, सौ ग्रामों का और सम्पूर्ण राज्य का एक मुखिया नियुक्त करना चाहिए । इन्हें क्रमशः ग्रामाधिपति, दशग्रामाधिपति, शतग्रामाधिपति और विषयेश्वर कहा जाता है ॥१ ॥ वेतन उनके कार्य

के अनुरूप ही होना चाहिए । गुप्तचरों के द्वारा नित्य ही उनकी परीक्षा करते रहना चाहिए । गाँव में होनेवाले उत्पातों को ग्रामाधिपति को शान्त करना चाहिए । यदि वह इसमें असमर्थ हो तो उसे दशग्रामाधिपति को शान्त करना चाहिए ॥२-३ दशग्रामाधिपति को भी सुनते ही उसे दूर करने का उपाय करना चाहिए क्योंकि यदि राज्य सुरक्षित रहता है तो राजा को उससे ॥ धन आदि का लाभ रहता है और धनवान् व्यक्ति को धर्म तथा सुख की प्राप्ति होती है । धन के बिना सभी क्रियाएँ उसी प्रकार से नष्ट हो जाती हैं जिस प्रकार ग्रीष्म ऋतु में नदियाँ । लोक में पतित और निर्धन में कोई अन्तर नहीं हुआ करता पतित से कोई ( दान ) लेता नहीं है और दरिद्र ( कुछ ) दे ही नहीं सकता है ॥४-६ ॥ धनहीन है, क्योंकि की स्त्री भी उसके वश में १ क. ङ. सत्यवान्सुब ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 687

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त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ६८३ धनहीनस्य भार्याऽपि नैव स्याद्वशवर्तिनी नित्यं राज्ञा तथा भाव्यं गर्भिणी सहधर्मिणी किं यज्ञैस्तपसा तस्य प्रजा यस्य न रक्षिताः अरक्षिताः प्रजा यस्य नरकं तस्य मन्दिरम् ( धर्मागमो रक्षणाच्च पापमाप्नोत्यरक्षणात् भक्ष्यमाणाः प्रजा रक्ष्याः कायस्थैश्च विशेषतः अरक्षिता सा भवति तेषामेवेह भोजनम् ( ' कोषे प्रवेशयेदर्थं नित्यं चार्धं द्विजे ददेत् चतुर्थमष्टमं भागं तथा षोडशमं ( कं ) द्विजः अनृतं तु वदन्दण्ड्यः सुवित्तस्यांशमष्टमम् अर्वाक्त्र्यब्दाद्धरेत्स्वामी परेण नृपतिर्हरेत् संपाद्य रूपसंख्यादीन्स्वामी तद्द्रव्यमर्हति । राष्ट्रपीडाकरो राजा नरके वसते चिरम् ॥७ ॥

। यथा स्वं सुखमुत्सृत्य गर्भस्य सुखमावहेत् ॥८ ॥

। सुरक्षिताः प्रजा यस्य स्वर्गस्तस्य गृहोपमः ॥ ९ ॥

। राजा षड्भागमादत्ते सुकृतादुष्कृतादपि ॥१० ॥

। सुभगा विटभीतेव राजवल्लभतस्करैः ॥११ ॥

। रक्षिता तद्भयेभ्यस्तु राज्ञो भवति सा प्रजा ॥१२ ॥

। दुष्टसंमर्दनं कुर्याच्छास्त्रोक्तं करमादरेत् ) ॥१३ ॥

। निधिं द्विजोत्तमः प्राप्य गृह्णीयात्सकलं तथा ॥१४ ॥

। वर्णक्रमेण दद्याच्च निधिं पात्रे तु धर्मतः ॥ १५ ॥

। प्रणष्टस्वामिकमृक्थं राजा त्र्यब्दं निधापयेत् ॥ १६ ॥

। ममेदमिति यो ब्रूयात्सोऽर्थयुक्तो यथाविधि ॥१७ ॥

। बालदायादिकमृक्थं तावद्राजाऽनुपालयेत् ॥१८ ॥

नहीं हुआ करती है । राष्ट्र को पीड़ा पहुँचानेवाला राजा चिरकाल तक नरक में निवास करता है । राजा को ( प्रजा के प्रति ) वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसे कि गर्भवती स्त्री अपने सुख की चिन्ता को छोड़कर गर्भ के सुख का ध्यान रखती है ॥७-८ ॥ उस राजा के यज्ञ और तप से क्या लाभ, जिसकी प्रजा ( ही ) सुरक्षित नहीं है । जिसकी प्रजा सुखी है उसके लिए घर ही स्वर्ग है; परन्तु जिसकी प्रजा दुःखी है, उसके लिए घर ही नरक है । राजा, प्रजा के पुण्य और दोनों के षष्ठांश का भागी हुआ करता है । प्रजा की रक्षा करने से राजा को धर्मलाभ होता है और रक्षा न करने से पाप उसे पाप का भागी होना पड़ता है । विटों से संत्रस्त सुन्दरी स्त्री के समान राजकर्मचारियों, चोरों तथा विशेषकर कायस्थों से सतायी जानेवाली प्रजा की रक्षा करनी चाहिए । उनके भय से मुक्त प्रजा ही वास्तव में राजा की प्रजा हुआ करती है ॥९ -१२ ॥ अरक्षित प्रजा तो उन दुष्टों का भोजनमात्र बनकर रह जाती है । इसलिए राजा को दुष्टों का दमन करना और शास्त्रानुकूल प्रजा से कर लेते रहना चाहिए और आधा भाग ब्राह्मणों को दान में दे देना चाहिए । श्रेष्ठ ब्राह्मण चाहिए को राजा से प्राप्त सम्पूर्ण निधि को लेकर उसके चौथे, आठवें तथा सोलहवें भाग को वर्णक्रम से सुपात्रों में न्यायपूर्वक बाँट देना चाहिए । मिथ्या बोलनेवाले पर उसके धन का अष्टमांश दण्ड देना चाहिए । जिस धन का स्वामी नष्ट हो गया हो उस धन को राजा को तीन वर्ष तक अपने पास धरोहर के रूप में रखना चाहिए ॥१३-१६ ॥ यदि उसके पहले ही धन का कोई अधिकारी राजा से आकर निवेदन करे कि ' यह धन मेरा है ' तथा उसका रूप, संख्या आदि चिह्न का उस बताये तो राजा को उसे वह धन लौटा देना चाहिए । जिस सम्पत्ति का अधिकारी बालक हो, देख - रेख राजा को पता तब तक करना चाहिए जब तक वह बालक योग्य न हो जाय अथवा उसका शैशव समाप्त न हो जाय ॥१७-१८३ ॥ १ ग. घ. छ. स्यादुपव ं । २ क. ङ. येन । ३ ' राजा तस्करैः ' पुस्तके नास्ति । ४ ' धर्मागमो करमाददेत् ' क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ५ ' कोषे दद्यात्स्वयं ' पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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६८४ अग्निपुराणम् यावत्स्यात्स समावृत्तो यावद्वाऽतीतशैशवः । पतिव्रतासु च स्त्रीषु विधवास्वातुरासु च । ताञ्शिष्याच्चौरदण्डेन धार्मिकः पृथिवीपतिः । चौररक्षाधिकारिभ्यो राजाऽपि हृतमाप्नुयात् । न तद्राज्ञा प्रदातव्यं गृहे यद्गृहगैर्हृतम् । शुल्कांशं परदेशाच्च क्षयव्ययप्रकाशकम् । विंशांशं लाभमादद्याद्दण्डनीयस्ततोऽन्यथा । तरेषु दासदोषेण नष्टं दासस्तु दापयेत् । राजावन्यार्थमादद्याद्देशकालानुरूपकम् । गन्धौषधिरसानां च ' पुष्पमूलफलस्य च । वैदलानां च भाण्डानां सर्वश्याश्ममयस्य च । प्रियं चापि न वाऽऽदद्याद्ब्राह्मणेभ्यस्तथा करम् । तस्य सीदति तद्राष्ट्रं व्याधिदुर्भिक्षतस्करैः । इसी प्रकार जिस स्त्री का पुत्र छोटा हो अथवा जिसके बालपुत्रासु चैवं स्याद्रक्षणं निष्कुलासु च ॥१९ ॥

जीवन्तीनां तु तासां ये संहरेयुश्च बान्धवाः ॥ २० ॥

सामान्यतो हृतं चौरैस्तद्वै दद्यात्स्वयं ) नृपः ॥ २१ ॥

अहृते यो हृतं ब्रूयान्निःसार्यो दण्ड्य एव सः ॥२२ ॥

स्वराष्ट्रपण्यादादद्याद्राजा विंशतिमं द्विज ॥ २३ ॥

ज्ञात्वा संकल्पयेच्छुल्कं लाभं वणिग्यथाऽऽप्नुयात् ॥२४ ॥

स्त्रीणां प्रव्रजितानां च तरशुल्कं विवर्जयेत् ॥ २५ ॥

शूकधान्येषु षड्भागं शिम्बधान्ये तथाऽष्टमम् ॥२६ ॥

पञ्चषड्भागमादद्याद्राजा पशुहिरण्ययोः ॥२७ ॥

पत्रशाकतृणानां च वंशवैणवचर्मणाम् ॥ २८ ॥

षड्भागमेव चाऽऽदद्यान्मधुमांसस्य सर्पिषः ३ ॥ २ ९ ॥ यस्य राज्ञस्तु विषये श्रोत्रियः सीदति क्षुधा ॥ ३० ॥

श्रुतं वित्तं च विज्ञाय वृत्तिं तस्य प्रकल्पयेत् ॥ ३१ ॥

कुल में कोई हो ही नहीं, जो विधवा हो, दुःखी हो और पतिव्रता हो उसकी भी रक्षा करनी चाहिए । धार्मिक राजा को चाहिए कि इन ( स्त्रियों के ) जीवनकाल में ही उनकी सम्पत्ति का अपहरण करनेवालों को चोरों की भाँति दण्ड दे । सामान्यतः यदि उनका धन चोरों के द्वारा चुरा लिया जाय तो राजा को अपनी ओर से ( इन्हें ) उतना धन देना चाहिए ॥ १ ९ -२१ ॥ घर में घर के ही किसी व्यक्ति के द्वारा चुरायी गयी वस्तु के लिए राजा को ( कुछ ) नहीं देना चाहिए । अये द्विज! अपने राष्ट्र की विक्रेय वस्तुओं का बीसवाँ भाग राजा को कर के रूप में लेना चाहिए । बाहर से आये हुए विक्रेय वस्तु के कर - निर्धारण में उनके निर्माण के मूल्य, आवागमन में टूट-फूट और व्यापारी के द्वारा प्राप्त लाभ को ध्यान में रखना चाहिए ॥२२-२४ ॥ किसी भी दशा में यह कर बीसवें भाग से अधिक नहीं होना चाहिए । इसमें विघ्न डाल देना चाहिए । स्त्रियों और संन्यासियों से कर नहीं लेना चाहिए ॥२५ ॥

शुक धान्य और शिमि धान्य में व्यापार करनेवाले सेवकों के द्वारा घाट या सीमा का कर छिपाये जाने पर राजा को उक्त धान्य का क्रमशः षष्ठांश और अष्टमांश ले लेना चाहिए । राजा को वन्य सम्पत्ति पर देशकाल के अनुरूप कर लगाना चाहिए । राजा को पशुधन और सुवर्ण पर क्रमशः पञ्चमांश और षष्ठांश कर लेना चाहिए ॥ २६-२७ ॥ सुगन्धित पदार्थों, ओषधि, रस, पुष्प, मूल, फल, पत्र, शाक, तृण, बाँस, चर्म, बाँस के पात्र पर षष्ठांश कर लेना चाहिए । मधु, मांस तथा घी का भी छठा भाग कर रूप में लेना चाहिए । ब्राह्मणों से कर कभी नहीं लेना चाहिए, चाहे कितनी भी आवश्यकता क्यों न हो । जिस राजा के राज्य में श्रोत्रिय ब्राह्मण भूख से पीड़ित रहा करते हैं उसके राज्य में दुर्भिक्ष, व्याधि का उपद्रव हुआ करता है ॥२८-३०३ ॥ श्रोत्रिय ब्राह्मण का समाचार पाकर उनकी जीविका तथा चोरों का प्रबन्ध कर देना चाहिए । १ घ. छ. दासांस्तु दा । २ क. ङ. फलपुष्पौषधीषु । ३ ख. ग. घ. छ. षः । म्रियन्नपि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ६८५ रक्षेच्च सर्वतस्त्वेनं पिता पुत्रमिवौरसम् । संरक्ष्यमाणो राज्ञा यः कुरुते धर्ममन्वहम् ॥ ३२ ॥

तेनाऽऽयुर्वर्धते राज्ञो द्रविणं राष्ट्रमेव च । कर्म कुर्युर्नरेन्द्रस्य मासेनैकं च शिल्पिनः ॥३३ ॥

भुक्तमात्रेण ये चान्ये स्वशरीरोपजीविनः ॥३४ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये राजधर्मकथनं नाम त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२२३ ॥

अथ चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः राजधर्माः पुष्कर उवाच वक्ष्येऽन्तः पुरचिन्तां च धर्माद्याः पुरुषार्थकाः । अन्योन्यरक्षया तेषां सेवा कार्या स्त्रिया नृपैः ॥ १ ॥

धर्ममूलोऽर्थविटपस्तथा ' कामफलो महान् । त्रिवर्गपादपस्तत्र रक्षया फलभाग्भवेत् ॥२ ॥

' कामाधीनाः स्त्रियो राम तदर्थं रत्नसंग्रहः । सेव्यास्ता नातिसेव्याश्च भूभुजा विषयैषिणः ॥ ३ ॥

आहारो मैथुनं निद्रा सेव्या नाति हि रुग्भवेत् । मञ्चाधिकारे कर्तव्याः स्त्रियः सेव्याः स्वरात्मिका ॥४ ॥

राजा को ब्राह्मण की रक्षा उसी प्रकार से करनी चाहिए जिस प्रकार से पिता अपने औरस पुत्र की रक्षा करता है । राजा की देख - रेख में जो श्रोत्रिय ब्राह्मण प्रतिदिन धर्माचरण किया करते हैं उससे राजा की आयु बढ़ती है, उसका धन बढ़ता है और उसका राष्ट्र भी बढ़ता है । कारीगरों को मास में राजा का एक कार्य ( बिना पारिश्रमिक के ) कर देना चाहिए और जो व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें अपने शरीर पर आश्रित रहना पड़ता है, उन्हें केवल भोजन से राजा का कार्य करना चाहिए ॥३१-३४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में राजधर्म कथन नामक दो सौ तेईसवाँ अध्याय समाप्त ॥२२३ ॥

अध्याय २२४ राजधर्म बोले- - अब मैं अन्तःपुर के नियमों के सम्बन्ध में बतलाऊँगा । धर्म, अर्थ आदि पुरुषार्थों की एक - दूसरे पुष्कर के द्वारा रक्षा करते हुए स्त्री सहित राजाओं को इनका सेवन करना चाहिए । क्योंकि त्रिवर्ग वृक्ष का मूल धर्म है, शाखा अर्थ है और महान् फल काम है । अतएव उस वृक्ष की रक्षा करने से फल की प्राप्ति होती है ॥१-२ ॥ हे राम! स्त्रियाँ काम के अधीन हुआ करती हैं । इसलिए उनके लिए रत्न ( आदि धन ) का संग्रह करना चाहिए । विषयाभिलाषी राजा को उन कामिनियों का सेवन तो करना चाहिए परन्तु अत्यधिक सेवन नहीं करना चाहिए । क्योंकि आहार, निद्रा और मैथुन का अत्यधिक सेवन करने से रोग उत्पन्न होता है । राजा को शय्या का अधिकार अपनी परमप्रिय १ ग. घ. छ. कर्मफलो । २ क. ङ. कामाधाराः । ३ क. ङ. ' त् । नवाधि । ख. ' त् । न चाधि । च. ' त् । न चाभिचारे । ४ छ. स्वरामिकाः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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६८६ अग्निपुराणम् दुष्टान्याचरते या तु नाभिनन्दति तत्कथाम् । चुम्बिता माष्टि वदनं दत्तं न बहु मन्यते । स्पृष्टा धुनोति गात्राणि गात्रं च विरुणद्धि या । न पश्यत्यग्रदत्तं तु जघनं च निगूहति तत्कामितासु च स्त्रीषु मध्यस्थेव च लक्ष्यते या सा विरक्ता तां त्यक्त्वा सानुरागां स्त्रियं भजेत् दृश्यमाना तथाऽन्यत्र दृष्टिं क्षिपति चञ्चलाम् विवृणोति तथाऽङ्गानि स्वस्या गुह्यानि भार्गव तद्दर्शने च कुरुते बालालिङ्गनचुम्बनम् ' स्पृष्टा पुलकितैरङ्गैः स्वेदेनैव च भज्यते ततः स्वल्पमपि प्राप्य करोति परमां मुदम् करजाङ्काङ्कतान्यस्य फलानि प्रेषयत्यपि आलिङ्गनैश्च गात्राणि लिम्पतीवामृतेन या ऐक्यं द्विषद्भिर्व्रजति गर्वं वहति ॥५ ॥

स्वपित्यादौ प्रसुप्ताऽपि तथा पश्चाद्विबुध्यते ॥६ ॥

ईषच्छृणोति वाक्यानि प्रियाण्यपि पराङ्मुखी ॥७ ॥

। दृष्टे विवर्णवदना मित्रेष्वथ पराङ्मुखी ॥ ८ ॥

। ज्ञातमण्डनकालाऽपि न करोति च मण्डनम् ॥९ ॥

। दृष्ट्वैव हृष्टा भवति वीक्षते च पराङ्मुखी ॥ १० ॥

। तथाऽप्युपावर्तयितुं नैव शक्नोत्यशेषतः ॥११ ॥

। गर्हितं च तथैवाङ्गं प्रयत्नेन निगूहति ॥ १२ ॥

। आभाष्यमाणा भवति सत्यवाक्या तथैव च ॥१३ ॥

। करोति च तथा राम सुलभद्रव्ययाचनम् ॥१४ ॥

। नामसंकीर्तनादेव मुदिता बहु मन्यते ॥१५ ॥

1 । तत्प्रेषितं च हृदये विन्यसत्यपि चाऽऽदरात् ॥१६ ॥

। सुप्ते स्वपित्यथाऽऽदौ च तथा तस्य विबुध्यते ॥१७ ॥

स्त्री को ही देना चाहिए ॥ ३-४ ॥ जो कामिनी दुष्ट आचरण करती है, उसकी ( राजा की ) प्रशंसा नहीं करती, उसके विरोधियों से नाता जोड़ती है, उच्छृंखलतापूर्वक गर्व करती है, चुम्बन करने पर मुँह पोंछ लेती है, ( दान ) देने पर कुछ नहीं समझती है, ( राजा के ) पहले ही सो जाती है तथा सोने पर भी बाद में उठती है ॥५-६ ॥ जो स्पर्श करने पर अङ्गों को झिटक देती है तथा अङ्गों को छिपा लेती है, प्रिय बातों को भी पराङ्मुख होकर कम सुनती है, सामने दी हुई चीज की ओर देखती नहीं है, जघन को छिपा लेती है, देखने पर उसका मुख पीला पड़ जाता है, ( पति के ) मित्रों से पराङ्मुख रहती है, मित्रों की कामिनियों के बीच मध्यस्थ की भाँति प्रतीत होती है, शृंगार का समय जानती हुई भी शृंगार नहीं करती है और विरक्त रहती है - ऐसी स्त्री का परित्याग करके राजा को उस स्त्री का सेवन करना चाहिए जो उसमें अनुरक्त हो ॥७ - ९ ३ ॥ जो ( राजा को ) देखते ही प्रसन्न हो उठती है, दूसरी ओर से पराङ्मुख होकर उसे देखने लगती है, देखी जाने पर अपनी चञ्चल दृष्टि दूसरी ओर घुमा लेती है, किन्तु ( अनुरागातिरेक के कारण ) पूर्णरूप से उसकी ओर से विमुख नहीं हो सकती है, जो अपने गुप्ताङ्गों को प्रकट कर देती है किन्तु अपने दूषित अङ्गों को यत्नपूर्वक छिपा लेती है ॥१०-१२ ॥ पति को देखने पर उसका आलिङ्गन - चुम्बन करती है, बातचीत में सच बोलती है और थोड़ी भी अभीष्ट वस्तु प्राप्त करके अत्यन्त आनन्दित हो उठती है, नाम लेने से ही प्रसन्न होकर अपने को धन्य समझने लगती है, नखचिह्न से चिह्नित फलों को भेजने पर भी उसको सम्मानपूर्वक हृदय से लगा लेती है । शरीर का आलिंगन इस प्रकार से करती है मानो उसके ऊपर अमृत का लेप कर रही हो, ( पतिदेव के ) सोने के बाद सोती है और उसके पहले ही जाग उठती है । जङ्घाओं का स्पर्श करके सोये हुए पति १ ख. छ. वीक्षिते । २ क. ङ. म्बने । आ ' । ३ क ङ ङ्गैः सा स्वेदैर्न CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation