अग्नि पुराण — पृष्ठ 701–710

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 701–710

पृष्ठ 701

अग्नि पुराण, पृष्ठ 701 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ६ ९ ७ स तस्योत्पाद्य तुष्टिं तु राज्ञे दद्यात्ततो दमम् । स दण्डं प्राप्नुयान्मासं दण्ड्यः स्यात्प्राणिताडने । शेषेऽप्येकादशगुणं तस्य दण्डं प्रकल्पयेत् । येन येन यथाङ्गेन स्तेनो नृषु विचेष्टते । ब्राह्मणः शाकधान्यादि ह्यल्पं गृह्णन्न दोषभाक् । गृहक्षेत्रापहर्तारं तथा पल्यभिगामिनम् राजा गवाभिचारेभ्यो हन्याच्चैवाऽऽततायिनः । अदण्ड्यास्त्री भवेद्राज्ञा वरयन्ती पतिं स्वयम् । भर्तारं लङ्घयेद्यातां श्वभिः संघातयेत्स्त्रियम् । ज्यायसा दूषिता नारी मुण्डनं समवाप्नुयात् । क्षत्रियः प्रथमं वैश्यो दण्ड्यः शूद्रागमो भवेत् । वेतनं द्विगुणं दद्याद्दण्डं च द्विगुणं तथा यस्तु रज्जुं घटं कूपाद्धरेच्छिन्द्याच्च तां प्रपाम् ॥३४ ॥

धान्यं दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोभ्यधिकं वधः ॥३५ ॥

सुवर्णरजतादीनां नृस्त्रीणां हरणे वधः ॥ ३६ ॥

तत्तदेव हरेदस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः ॥ ३७ ॥

गोदेवार्थं हरंश्चापि हन्याद्दुष्टं वधोद्यतम् ॥ ३८ ॥

। अग्निदं गरदं हन्त्यात्तथा चाभ्युद्यतायुधम् ॥३९ ॥

परस्त्रियं न भाषेत प्रतिषिद्धो विशेन्न हि ॥४० ॥

उत्तमां सेवमानं स्त्रीं जघन्यो वधमर्हति ॥ ४१ ॥

सवर्णदूषितां कुर्यात्पिण्डमात्रोपजीविनीम् ॥४२ ॥

वैश्यागमे तु विप्रस्य क्षत्रियस्यान्त्यजागमे ॥४३ ॥

गृहीत्वा वेतनं वेश्या लोभादन्यत्र गच्छति ॥४४ ॥

। भार्या पुत्राश्च दासाश्च शिष्यो भ्राता च सोदरः ॥४५ ॥

करता है, उसे द्रव्य के स्वामी को सन्तुष्ट करके राजा को दण्ड देना चाहिए । कुएँ से रस्सी तथा घड़ा चुरानेवाला और प्याऊ को तोड़नेवाला एक मास दण्ड का भागी हुआ करता है । प्राणियों को पीटनेवाला भी दण्डनीय हुआ करता है । दस घड़ों से अधिक अन्न चुरानेवाले का वध कर देना चाहिए ॥ ३३-३५ ॥ ( यदि वध न किया जाय तो ) जितना अन्न चुराया गया है, उससे ग्यारह गुना अधिक अन्न दण्ड देना चाहिए । सोना, चाँदी, पुरुष, स्त्री आदि का अपहरण करनेवाला भी वध्य हुआ करता है । चोर जिस अङ्ग से मनुष्यों का अपकार किया करता है उसके उसी अङ्ग को काट देना चाहिए । ब्राह्मण यदि थोड़ा - सा शाक धान्य आदि चुरा ले तो वह दोष का भागी नहीं हुआ करता है । गौ तथा देवता के लिए थोड़ी - सी चोरी करने से दोष नहीं लगता है । वध करने के लिए उद्यत दुष्ट ( ही ) का वध करवा देना चाहिए ॥३६ - ३८ ॥ राजा को घर तथा खेल का अपहरण करनेवाले, परस्त्रीगमन करनेवाले, आग लगानेवाले, विष देनेवाले, किसी को मारने के लिए अस्त्र उठानेवाले तथा गोहत्या करनेवाले आततायियों को मरवा डालना चाहिए । मना किये जाने पर परस्त्री से बातचीत न करना चाहिए और न सहवास करना चाहिए । अपनी इच्छा से पति का वरण करनेवाली स्त्री दण्ड की भागी नहीं होती है, किन्तु अपने से उत्तम ( कुल की ) स्त्री से सम्भोग करनेवाला पापी वध के योग्य हुआ करता है ॥ ३ ९ -४१ ॥ जो स्त्री अपने पति का उल्लंघन करती है उसे कुत्तों से कटवा डालना चाहिए । समान वर्ण के पुरुष के द्वारा दूषित की गयी स्त्री को पिण्ड मात्र भोजन पर जीवनयापन करने का दण्ड देना चाहिए । उत्तम वर्ण के पुरुष से दूषित स्त्री के केश कटवा देना चाहिए । वैश्य कुल की स्त्री के साथ समागम करनेवाले ब्राह्मण, शूद्रा के साथ समागम करनेवाले क्षत्रिय के लिए भी यही दण्ड है । शूद्रा के साथ व्यभिचार करनेवाले क्षत्रिय और वैश्य के ऊपर ढाई सौ पण दण्ड करना चाहिए । एक से वेतन लेकर लोभवश दूसरे के पास जानेवाली वेश्या को ( वेतन से ) दुगुना दण्ड देना चाहिए ॥४२ - ४४३ ॥ भार्या, पुत्र, दास, शिष्य, भ्राता तथा सहोदर CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 702

अग्नि पुराण, पृष्ठ 702 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६ ९ ८ अग्निपुराणम् कृतापराधास्ताड्याः स्युः रज्ज्वा बेणुदलेन वा । रक्षार्थाधिकृतैर्यैस्तु प्रजाभ्योऽर्थो विलुप्यते । ( ' ये नियुक्ता स्वकार्येषु हन्युः कार्याणि कर्मिणाम् । अमात्यः प्राड्विवाको वा यः कुर्यात्कार्यमन्यथा । गुरुतल्पे भगः कार्यः सुरापाने सुराध्वजः । शूद्रादीन्घातयेद्राजा पापान्विप्रान्प्रवासयेत् ग्रामेष्वपि च ये केच्चिच्चौराणां भक्तदायकाः राष्ट्रेषु राष्ट्राधिकृतान्सामन्तान्पापिनो हरेत् तेषां छित्त्वा नृपो हस्तौ तीक्ष्णे शूले निवेशयेत् समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वमेध्यमनापदि प्रतिमासंक्रमभिदो दद्युः पञ्चशतानि ते समाप्युयान्नर पूर्वं दमं मध्यममेव वा भाई यदि अपराध करे तो उसे रस्सी या बाँस के फट्टे पृष्ठेन मस्तके हन्याच्चौ ( च्चो ) रस्याप्नोति किल्बिषम् ॥४६ ॥

तेषां सर्वस्वमादाय राजा कुर्यात्प्रवासनम् ॥४७ ॥

निर्घृणाः क्रूरमनसस्तान्निःस्वान्कारयेन्नृपः ॥४८ ॥

तस्य सर्वस्वमादाय तं राजा विप्रवासयेत् ) ॥४९ ॥

स्तेयेषु श्वपदं विद्याद्ब्रह्महत्या ( घाते ) शिरः पुमान् ॥५० ॥

। महापातकिनां वित्तं वरुणायोपपादयेत् ॥५१ ॥

। भाण्डारकोषदाश्चैव सर्वास्तानपि घातयेत् ॥ ५२ ॥

। संधिं कृत्वा तु ये चौर्यं रात्रौ कुर्वन्ति तस्कराः ॥ ५३ ॥

। तडागदेवतागारभेदकान्घातयेन्नृपः 114811 । स हि कार्षापणं दण्ड्यस्तममेध्यं च शोधयेत् ॥५५ ॥

। समैश्च विषमं यो वा चरते मूल्यतोऽपि वा ॥ ५६ ॥

। द्रव्यमादाय वणिजामनर्घेणावरुन्धताम् ॥५७ ॥

से पीटना चाहिए परन्तु चाहे चोर ही क्यों न हो पीठ पर ( ही ) पीटना चाहिए सिर पर नहीं क्योंकि ऐसा करनेवाला पाप का भागी होता है । प्रजा की रक्षा के निमित्त नियुक्त किये गये अधिकारियों के द्वारा प्रजा के धन का अपहरण कर लिये जाने पर उनका सब - कुछ छीनकर उन्हें देश से निकाल देना चाहिए । किसी कार्य को करने के लिए नियुक्त किये गये मनुष्य यदि उस कार्य को न करके लोगों से घृणा और दुष्टता करने लगें तो राजा को चाहिए कि इन्हें धनहीन कर दे ॥४५-४८ ॥ वह मन्त्री या प्राड्विवाक ( न्यायाधीश ) जो कार्य को बिगाड़ देता है उसका सर्वस्व छीनकर उसे निर्वासित कर देना चाहिए । गुरुपत्नीगामी के शरीर में योनि का चिह्न बना देना चाहिए, मद्यपान करनेवाले के शरीर में मदिरालय की ध्वजा का, चोरी करनेवाले की देह में कुत्ते के पैर का और ब्रह्महत्या करनेवाले की देह में मनुष्य के सिर का चिह्न बनवा देना चाहिए । राजा को चाहिए कि वह पापकर्म करनेवाले शूद्रों को मरवा डाले, ब्राह्मणों को देश से निकाल दे और महापापियों के धन को वरुण देवता की आराधना में लगा दे ॥४९-५१ ॥ ग्रामों में भी जो लोग चोरों की सहायता करते हैं या उन्हें भाण्डार तथा कोष ( आदि ) देते हैं, उन सबको भी मरवा डालना चाहिए । राज्याधिकारी तथा सामन्त आदि यदि पापकर्म करें तो उनका भी सर्वस्व छीन लेना चाहिए । जो चोर रात्रि में सेंध काटकर चोरी करते हैं, उनके दोनों हाथों को कटवाकर उन्हें शूली पर चढ़ा देना चाहिए । राजा को चाहिए कि तालाब और देवालय तोड़नेवालों को मृत्यु दण्ड दे ॥५२-५४ ॥ जो बिना आपत्तिकाल के राजमार्ग में अपवित्र वस्तु डालता है, उसे एक कार्षापण दण्ड देकर उसी से अपवित्र वस्तु की शुद्धि करवानी चाहिए । प्रतिमा तथा पुल ( आदि ) को भङ्ग करनेवाले पर पाँच सौ कार्षापण दण्ड करना चाहिए । ईमानदार लोगों के साथ वस्तु के गुण या मूल्य को अधिक बतलाकर व्यापार करनेवालों के ऊपर ढाई सौ या पाँच सौ दण्ड करना चाहिए और ( उन ) व्यापारियों के द्रव्य को लेकर बिना १ ये नियुक्ता विप्रवासयेत् च. पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 703

अग्नि पुराण, पृष्ठ 703 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ६ ९९ राजा पृथक्पृथक्कुर्याद्दण्डमुत्तमसाहसम् । मध्यमं प्राप्नुयाद्दण्डं कूटकर्ता तथोत्तमम् । अभक्ष्यभक्ष्ये विप्रे वा शूद्रे वा कृष्णलो दमः । एभिश्च व्यवहर्ता यः स दाप्यो दममुत्तमम् । विकर्णकरनासौष्ठीं कृत्वा गोभिः प्रवासयेत् । राजपत्न्यभिगामी च दग्धव्यास्तु कटाग्निना । पारजायिकचौरौ च मुञ्चतो दण्ड उत्तमः । यो मन्येताजितोऽस्मीति न्यायेनापि पराजितः । आह्वानकारी वध्यः स्यादनाहूतमथाऽऽह्वयन् । हीनः पुरुषकारेण तं दण्ड्याद्दाण्डिको धनम् इत्यादिमहापुराण आग्नेये दण्डप्रणयनकथनं द्रव्याणां दूषको यश्च प्रतिच्छन्दकविक्रयी ॥५८ ॥

कलहापकृतं देयं दण्डश्च द्विगुणस्ततः ॥५९ ॥

तुलाशासनकर्ता च कूटकृन्नाशकस्य च ॥६० ॥

विषाग्निदां पतिगुरुविप्रापत्यप्रमापिणीम् ' ॥६१ ॥

क्षेत्रवेश्मग्रामवनविदारकास्तथा नराः ॥६२ ॥

ऊनं वाऽप्यधिकं वाऽपि लिखेद्यो राजशासनम् ॥६३ ॥

राजयानासनारोदुर्दण्ड उत्तम साहसः ॥६४ ॥

तमायान्तं पुनर्जित्वा दण्डयेद्विगुणं दमम् ॥६५ ॥

दाण्डिकस्य च यो हस्ताभिमुक्तः पलायते ॥६६ ॥

॥६७ ॥

नाम सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२२७ ॥

मूल्य के ही अपने अधिकार में कर लेना चाहिए ॥५५-५७ ॥ राजा को ( अलग - अलग अपराधों के लिए ) पृथक्-पृथक् साहस अथवा उत्तम दण्ड देना चाहिए । जो ( व्यापारिक दृष्टि से भाव घटाने या बढ़ाने के लिए ) चीजों को बिगाड़ देता है या उनकी नकल करता है उसे पाँच सौ पण का दण्ड देना चाहिए । लोगों के साथ छल करनेवाले के ऊपर एक सहस्र पण का दण्ड देना चाहिए । झगड़ा करके अपकार करनेवाले के ऊपर दुगुना ( दो हजार पण ) दण्ड होना चाहिए । अभक्ष्य का भक्षण करनेवाले ब्राह्मण या शूद्र के ऊपर एक कृष्णल दण्ड करना चाहिए । धूर्त व्यापारी, ठगनेवाले तथा हत्या करनेवाले के साथ जो व्यवहार करता है, उसे एक उत्तम ( सहस्र पण ) दण्ड देना चाहिए ॥५८-६०३ ॥ जो स्त्री किसी को विष दे या अग्नि दे या पति, गुरु, सन्तान तथा ब्राह्मण की हत्या करे, उसके कान, नाक, ओष्ठ और हाथ काटकर देश से निकाल देना चाहिए । राजाज्ञा को घटा - बढ़ाकर लिखनेवाले तथा लम्पट और चोर को ( बिना दण्ड दिये हुए ) छोड़ देनेवाले के ऊपर एक सहस्र पण दण्ड करना चाहिए । राजा के आसन तथा उसकी सवारी पर बैठनेवाला उत्तम साहस ( एक हजार पण ) के दण्ड का भागी हुआ करता है ॥६१-६४ ॥ जो न्यायतः पराजित हो जाने पर अपनी हार न माने, उसके पराजय की घोषणा करके दुगुना ( दो हजार पण ) दण्ड देना चाहिए । लड़ाई न चाहनेवाले को ललकारनेवाले को मृत्युदण्ड देना चाहिए । यदि ( कोई अपराधी ) दण्ड देनेवाले के हाथ से निकल जाय तो उस दण्ड देनेवाले को शक्ति से हीन समझना चाहिए और उसके ऊपर धन का दण्ड करना चाहिए ॥६५-६७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में दण्डप्रणयन - कथन नामक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त ॥२२७ ॥

१ क. ङ. ' माथिनीम् । २ घ. न्तं पराजित्य द ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 704

अग्नि पुराण, पृष्ठ 704 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् ७०० अथाष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः युद्धयात्रा पुष्कर उवाच यदा मन्येत नृपतिराक्रन्देन बलीयसा । पाणिग्राहोऽभिभूतो मे तदा यात्रां प्रयोजयेत् ॥ १ ॥

पुष्टा योधा भृता भृत्याः प्रभूतं च बलं मम । मूलरक्षासमर्थोऽस्मि तैर्वृत्वा शिविरे व्रजेत् ॥ २ ॥

शत्रोर्वा व्यसने यायाद्दैवाद्यैः पीडितं परम् ' । भूकम्पो यां दिशं याति यां च केतुर्व्यदूषयत् ॥३ ॥

विद्विष्टनाशकं सैन्यं संभूतान्तः प्रकोपनम् । शरीरस्फुरणे धन्ये तथा सुस्वप्नदर्शने || ४ || निमित्ते शकुने धन्ये जाते शत्रुपुरं व्रजेत् । पदातिनागबहुलां सेनां प्रावृषि योजयेत् ॥ ५ ॥

हेमन्ते शिशिरे चैव रथवाजिसमाकुलाम् । चतुरङ्गबलोपेतां वसन्ते वा शरन्मुखे ॥ ६ ॥

सेना पदातिबहुला शत्रूञ्जयति सर्वदा ॥ अङ्गदक्षिणभागे तु शस्त्रं प्रस्फुरणं भवेत् || ७ ७ || ॥ अध्याय २२८ युद्ध - यात्रा पुष्कर बोले- राजा को युद्ध - यात्रा तब करनी चाहिए जब वह यह समझे कि मेरा मित्र बलवती सेना के द्वारा हार चुका है ॥१ ॥ ( राजा को यह विचार करना चाहिए कि ) ' मेरे योद्धा हृष्ट - पुष्ट हैं, सेवकों का ( भलीभाँति )

भरण - पोषण किया गया है, मेरे पास बहुत - सा सैन्यदल है, अतएव मैं अपनी निधि की रक्षा करने में समर्थ हूँ । ' तदनन्तर इस प्रकार के योद्धाओं, सेवकों और सेना से घिरकर उसे शिविर में प्रवेश करना चाहिए || २ || ( युद्ध के लिए ) तभी जाना चाहिए जब शत्रु दुर्व्यसन में फँसा हो या दैव आदि ( के प्रकोप ) से पीड़ित हो । जिस दिशा में भूकम्प हुआ हो तथा पुच्छल तारा दिखायी पड़ा हो उसी दिशा में यात्रा करनी चाहिए । जब शत्रु को नष्ट करने के लिए सैन्य पर्याप्त हो, उसके ऊपर बड़ा क्रोध आ रहा हो, शरीर में शुभ स्फुरण हो रहा हो, सुन्दर स्वप्न तथा मंगलकारी शकुन हो रहा हो, तब शत्रु के नगर की ओर यात्रा करनी चाहिए ॥३-५ ॥ वर्षा ऋतु में ( सेना में ) पदातियों तथा हाथियों की अधिकता होनी चाहिए । हेमन्त तथा शिशिर ऋतु में ( सेना में ) रथों और घोड़ों की बहुलता होनी चाहिए । वसन्त अथवा शरद् में चतुरिङ्गणी ( हाथी, घोड़े, रथ, पदाति से युक्त ) सेना की प्रचुरता होनी चाहिए । जिसमें पैदल सेना की अधिकता हो वह ( सेना ) सदैव शत्रुओं के ऊपर विजय प्राप्त कर लेती है । ( पुरुष के ) अङ्ग के दाहिने भाग का फड़कना शुभ हुआ करता है ॥६-७ ॥ वाम भाग का १ ख. पुरम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 705

अग्नि पुराण, पृष्ठ 705 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७०१ न शस्तं तु तथा वामे पृष्ठस्य हृदयस्य च । लाञ्छनं पिटकं चैव विज्ञेयं स्फुरणं तथा ॥ । विपर्ययेणाभिहितं सव्ये स्त्रीणां शुभं भवेत् III इत्यादिमहापुराण आग्नेये युद्धयात्रावर्णनं नामाष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२८ ॥

अथैकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः स्वप्नशुभाशुभदुःस्वप्नहरणकथनम् पुष्कर उवाच स्वप्नं शुभाशुभं वक्ष्ये दुःस्वप्नहरणं तथा । नाभिं विनाऽन्यत्र गात्रे तृणवृक्षसमुद्भवः ॥१ ॥

चूर्णनं मूर्ध्नि कांस्यानां मुण्डनं नग्नता तथा । मलिनाम्बरधारित्वमभ्यङ्गः पङ्कदिग्धता ॥२ ॥

उच्चात्प्रपतनं चैव विवाहो गीतमेव च । तन्त्रीवाद्यविनोदश्च दोलारोहणमेव च ॥३ ॥

अर्जनं पद्मलोहानां सर्पाणामथ मारणम् । रक्तपुष्पद्रुमाणां च चण्डालस्य तथैव च ॥४ ॥

वराहश्वखरोष्ट्राणां तथा चाऽऽरोहणक्रिया । भक्षणं पक्षिमांसानां तैलस्य कृशरस्य च ॥ ५ ॥

मातुः प्रवेशो जठरे चितारोहणमेव च । शक्रध्वजाभिपतनं पतनं शशिसूर्ययोः ॥६ ॥

दिव्यान्तरिक्षभौमानामुत्पातानां च दर्शनम् । देवद्विजातिभूपानां ' गुरूणां कोष एव च ॥७ ॥

फड़कना अशुभ का सूचक हुआ करता है । इसी प्रकार पीठ तथा हृदय के ऊपर तिल का होना तथा फड़कना ( भी ) अशुभ हुआ करता है । इसके विपरीत स्त्रियों के वाम भाग का फड़कना ही शुभ हुआ करता है ॥८ ॥

श्री अग्निमहापुराण में युद्धयात्रा - वर्णन नामक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त ॥२२८ ॥

अध्याय २२ ९ स्वप्नशुभाशुभदुःस्वप्नहरण - कथन पुष्कर बोले - अब मैं शुभाशुभ का विवेचन करूँगा तथा दुःस्वप्न का उपाय भी बतलाऊँगा । नाभि को छोड़कर तृण और वृक्षों का उगना अशुभसूचक है || १ || मस्तक पर कांस्यपात्रों का टूटना, मुण्डन कराना, नग्न होना, मलिन वस्त्र पहनना, शरीर में उबटन लगाना, कीचड़ में फँसना, ऊँचाई से गिरना, विवाह देखना या करना, गीत गाना या सुनना, वीणा बजाना, विनोद करना, झूले पर चढ़ना, कमल तथा लोहा प्राप्त करना, साँपों को मारना, लाल पुष्पों के वृक्षों को देखना, चाण्डाल को देखना, शूकर, कुत्ते, गधे तथा ऊँट पर सवारी करना, पक्षियों का मांस, तेल तथा खिचड़ी खाना, माता के उदर में प्रवेश करना, चिता पर चढ़ना, इन्द्रध्वज और सूर्य - चन्द्र का गिरना ( स्वप्न अशुभसूचक हैं ) ॥२-६ ॥ आकाश, अन्तरिक्ष और पृथ्वी पर उत्पातों को देखना, देवता तथा ब्राह्मण, राजा तथा गुरु का क्रोध, नृत्य तथा हास्य करना १ ख. ग. छ. ° भूतानां । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 706

अग्नि पुराण, पृष्ठ 706 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७०२ अग्निपुराणम् नर्तनं हसनं चैव विवाहो गीतमेव च । स्त्रोतोवहाधोगमनं स्नानं गोमयवारिणा । आलिङ्गनं कुमारीणां ' पुरुषाणां च मैथुनम् । दक्षिणाशाप्रगमनं व्याधिनाऽभिभवस्तथा गृहाणां चैव पतनं गृहसंमार्जनं तथा परादभिभवश्चैव तस्माच्च व्यसनोद्भवः स्नेहपानावगाही च रक्तमाल्यानुलेपनम् ( भूयश्च स्वपनं तद्वत्कार्यं स्नानं द्विजार्चनं तथा स्तुतिप्रपठनं पुंसूक्तादिजपस्तथा षड्भिर्मासैर्द्वितीये तु त्रिभिर्मासैस्त्रियामिकाः एकस्यामथ चेद्रात्रो शुभं वा यदि वाऽशुभम् तस्मात्तु शोभने स्वप्ने पश्चात्स्वापो न शस्यते द्रुमाणां श्वेतपुष्पाणां गगने च यथा द्विज तन्त्रीवाद्यविहीनानां वाद्यानामपि वादनम् ॥८ ॥

पङ्कोदकेन च तथा मशी ( षी ) तोयेन वाऽप्यथ ॥९ ॥

हानिश्चैव स्वगात्राणां विरेको वमनक्रिया ॥१० ॥

। फलानामुपहानिश्च धातूनां भेदनं तथा ॥११ ॥

। क्रीडा पिशाचक्रव्यादवानरान्त्यनरैरपि ॥१२ ॥

। काषायवस्त्रधारित्वं तद्वस्त्रैः क्रीडनं तथा ॥ १३ ॥

। इत्यधन्यानि स्वप्नानि तेषामकथनं शुभम् ॥१४ ॥

। तिलैर्होमो हरिब्रह्मशिवार्कगणपूजनम् ॥१५ ॥

। स्वप्नास्तु प्रथमे यामे संवत्सरविपाकिनः ॥१६ ॥

। चतुर्थे त्वर्धमान दशाहादरुणोदये ॥१७ ॥

। पश्चाद्दृष्टस्तु यस्तत्र तस्य पाकं विनिर्दिशेत् ॥१८ ॥

। शैलप्रासादनागाश्ववृषभारोहणं हितम् ॥१९ ॥

। द्रुमतृणोद्भवो नाभौ तथा च बहुबाहुता ॥२० ॥

या देखना, संगीत सुनना या गाना, तन्त्रीवाद्यों से रहित अन्य बाजों का बजाना, नीचे की ओर बहती हुई जलधारा को देखना, गोबर या पङ्क या स्याही मिले हुए जल से स्नान करना, कुमारियों का आलिंगन करना, पुरुषों के साथ मैथुन करना, अपने अङ्गों का हानि देखना, विरेचन या वमन होना, दक्षिण दिशा में यात्रा करना,, रोगग्रस्त होना, फलों की बर्बादी देखना, धातुओं में छिद्र देखना, ग्रहों का पतन देखना, घर में झाड़ू देना, पिशाच, राक्षस, वानर तथा चाण्डालों के साथ क्रीड़ा करना, शत्रु से पराजित होना, दुर्व्यसन में फँसना, कषाय वस्त्र धारण करना, कषाय वस्त्रों से खेल करना, तेल पीना या उससे स्नान करना, रक्तमाला पहनना, रक्त चन्दन लगाना - ये सब अशुभ स्वप्न हैं । इनका न कहना ही शुभ हुआ करता है ॥७-१४ ॥ इनके देखने पर पुनः सो जाना चाहिए । पश्चात् स्नान, द्विजपूजन, तिल से हवन, विष्णु, ब्रह्मा, शिव, सूर्य तथा गणपति की पूजा, स्तुतिपाठ तथा पुरुषसूक्त आदि का जप करना चाहिए । रात्रि के पहले पहर में स्वप्न देखने से उसका फल एक वर्ष में मिलता है, दूसरे पहर में स्वप्न देखने से छह मास में, तीसरे पहर में स्वप्न देखने से तीन मास में, चौथे पहर में स्वप्न देखने से पन्द्रह दिनों में और अरुणोदय काल में स्वप्न देखने से उसका फल दस दिनों में मिल जाता है । एक ही रात्रि में यदि अच्छा - बुरा दोनों प्रकार का स्वप्न दिखायी पड़े तो जो स्वप्न पीछे दिखायी देता है उसी के अनुसार फल मिलता है ॥१५-१८ ॥ अतः सुन्दर स्वप्न दिखायी पड़ने पर बाद में सोना नहीं चाहिए । स्वप्न में पर्वत, प्रासाद, हाथी, घोड़ा तथा बैल पर चढ़ना शुभ हुआ करता है । आकाश में श्वेत पुष्प तथा वृक्षों का देखना, नाभि में तृण, वृक्षों का उत्पन्न होना, अनेक भुजाओं तथा १ च. ' णां तासामेव च । २ भूयश्च वाऽशुभम् क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति... CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 707

अग्नि पुराण, पृष्ठ 707 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७०३ तथा च बहुशीर्षत्वं पलितोद्भव एव च चन्द्रार्कताराग्रहणं परिमार्जन च भूम्यम्बुधाराग्रहणं शत्रूणां चैव विक्रिया भक्षणं चाऽऽर्द्रमांसानां पायसस्य च भक्षणम् सुरारुधिरमद्यानां पानं क्षीरस्य वाऽप्यथ मुखेन दोहनं शस्तं महिषाणां तथा गवाम् प्रसादो देवविप्रेभ्यो गुरुभ्यश्च तथा द्विज ' चन्द्राभ्रष्टेन वा राम ज्ञेयं राज्यप्रदं हि तत् मरणं वह्निलाभश्च वह्निदाहो गृहादिषु यस्तु पश्यति स्वप्नान्ते राजानं कुञ्जरं हयम् वृषेभगृहशैलाग्रवृक्षारोहणरोदनम् । सुशुक्लमाल्यधारित्वं सुशुक्लाम्बरधारिता ॥२१ ॥

। शक्रध्वजालिङ्गनं च ध्वजोच्छ्राय क्रिया तथा ॥२२ ॥

1 । जयो विवादे द्यूते च संग्रामे च तथा द्विज ॥ २३ ॥

। दर्शनं रुधिरस्यापि स्नानं वा रुधिरेण च ॥ २४ ॥

। अस्त्रैर्विचेष्टनं भूमौ । सिंहीनां हस्तिनीनां च । अम्भसा चाभिषेकस्तु । राज्याभिषेकश्च तथा । लब्धिश्च राजलिङ्गानां । हिरण्यं वृषभं गां च । घृतविष्ठानुलेपो वा निर्मलं गगनं तथा ॥ २५ ॥

वडवानां तथैव च ॥ २६ ॥

गवां शृङ्गच्युतेन च ॥ २७ ॥

छेदनं शिरसोऽप्यथ ॥२८ ॥

तन्त्रीवाद्याभिवादनम् ॥ २ ९ ॥ ' कुटुम्बस्तस्य वर्धते ॥ ३० ॥

अगम्यागमनं तथा ॥ ३१ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये स्वप्नशुभाशुभदुःस्वप्नहरणकथनं नामैकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२ ९ ॥ सिरों का होना, बाल पकना, शुक्ल माला धारण करना, शुक्ल वस्त्र पहनना, सूर्य, चन्द्रमा तथा ताराओं को पकड़ना तथा परिमार्जन करना, इन्द्रध्वज का आलिङ्गन करना, ध्वजा फहराना, पृथ्वी पर जलधारा को पकड़ना ( रोकना ), शत्रुओं को परास्त करना, विवाद, द्यूत तथा संग्राम में विजय प्राप्त करना शुभसूचक स्वप्न हैं ॥१९ -२३ ॥ ताजा मांस खाना, खीर खाना, शोणित देखना या शोणित से नहाना, सुरा, रुधिर, दूध और मद्यपान करना, पृथ्वी पर अस्त्र चलाना, निर्मल आकाश देखना, गाय, भैंस, शेरनी, हस्तिनी तथा घोड़ी को मुँह से दुहना, देव, ब्राह्मण तथा गुरु को प्रसन्न देखना, गौ के सींग या चन्द्रमा से गिरते हुए जल से अभिषेक करना, राज्याभिषेक तथा शिरश्छेदन देखना, मृत्यु, अग्नि - प्रवेश, गृहादि में अग्निदाह तथा राजा के छत्र, चामर आदि चिह्नों को देखना और वीणा बजाकर किसी को अभिवादन करते हुए देखना शुभ माना गया है । चन्द्रमा से गिरे हुए जल से अभिषेक देखने से राज्य की प्राप्ति होती है । स्वप्नान्त में राजा, हाथी, घोड़ा, सोना, बैल तथा गाय को देखनेवाले का परिवार बढ़ता है । बैल, हाथी, घर, पर्वत की चोटी तथा वृक्ष पर चढ़ना, रोना, घी अथवा विष्ठा का लेप लगाना और अगम्यागमन करना शुभ हुआ करता है ॥ २४-३१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में स्वप्नशुभाशुभ दुःस्वप्न हरण - कथन नामक दो सौ उन्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २२ ९ ॥ १ क. ङ. प्रासादे । २ क. ङ. चन्द्रदृष्टे । ३ ङ. ' णं च हि लोभं । ४ क. ङ. ' टुम्बं तस्य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 708

अग्नि पुराण, पृष्ठ 708 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७०४ अग्निपुराणम् अथ त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः शकुनानि पुष्कर उवाच सितवस्त्रं प्रसन्नाम्भः फलीवृक्षो नभोऽमलम् । कार्पासं तृणशुष्कं च गोमयं वै धनानि च । अयः पङ्कं चर्मकेशावुन्मत्तं च नपुंसकम् । गर्भिणी स्त्री ` च विधवाः पिण्याकादीनि वै मृतम् । अशो वाद्यशब्दश्च भिन्नभैरवझर्झरः । गच्छेति पश्चाच्छब्दोऽग्रयः पुरस्तात्तु विगर्हितः । अनिष्टशब्दा ' मृत्यर्थं क्रव्यादश्च ध्वजादिगः । शिरोघातश्च हाराद्यैश्छत्रवासादिपातनम् द्वितीयं तु ततो दृष्ट्वा विरुद्धं प्रविशेद्गृहम्

मांसं मत्स्या दूरशब्दा वृद्ध एकः पशुस्त्वजः ।

औषधानि च युक्तानि धान्यं कृष्णमशोभनम् ॥१ ॥

अङ्गारं ' गृहसर्जी च मुण्डाभ्यक्तं च नग्नकम् ॥२ ॥

चण्डालश्वपचाद्याश्च नरा बन्धनपालकाः ॥३ ॥

तुषभस्मकपालास्थिभिन्नभाण्डमशस्तकम् ॥४ ॥

एहीति पुरतः शब्दः शस्यते न तु पृष्ठतः ॥५ ॥

क्व यासि तिष्ठ मा गच्छ किं ते तत्र गतस्य च ॥६ ॥

स्खलनं वाहनानां च शस्त्रभङ्गस्तथैव च ॥७ ॥

। हरिमभ्यर्च्य संस्तुत्य स्यादमङ्गल्यनाशनम् ॥ ८ ॥

। श्वेताः सुमनसः श्रेष्ठाः पूर्णकुम्भो महोत्तमः ॥ ९ ॥

गावस्तुरङ्गमा नागा देवाश्च ज्वलितोऽनलः ॥१० ॥

अध्याय २३० शकुन - वर्णन पुष्कर बोले- श्वेत वस्त्र,, निर्मल जल, फल से युक्त वृक्ष, निर्मल आकाश तथा ओषधियाँ- ये शुभ शकुन हैं । कपास, सूखा तृण, गोबर, धन, अंगार, गुड़, शालवृक्ष, मुण्डित, तेल लगाये या नंगे मनुष्य को देखना अशोभनीय होता है ॥१-२ ॥ लोहा, कीचड़, चमड़ा, केश, उन्मत्त, नपुंसक, चाण्डाल आदि कारागार के रक्षक, गर्भिणी स्त्री, विधवा स्त्री, शव, भूसी, भस्म, कपाल, हड्डी, फूटे बर्तन, खली, इनका देखना अशुभ हुआ करता है । भैरवझल्लरी को छोड़कर ( अन्य ) बाजों का शब्द - अपशकुन हुआ करता है । ' आइये - आइये ' शब्द सामने से सुनायी पड़ना अच्छा है परन्तु पीछे से सुनायी पड़ना अशुभ है ॥३-५ ॥ ' कहाँ जा रहे हैं ', ' खड़े रहिये ', ' मत जाइये ', ' वहाँ आपके जाने से क्या लाभ’– इस प्रकार के शब्द अनिष्ट और जानेवाले की मृत्यु के सूचक हुआ करते हैं । मांसभक्षी पक्षियों का ध्वजा के ऊपर गिरना, वाहन का लड़खड़ाना, शस्त्रभङ्ग, सिर में चोट लगना, हार आदि के साथ छाते और वस्त्र आदि का गिरना - ये सब अपशकुन हैं और इनके अमंगल का नाश भगवान् विष्णु की पूजा और स्तुति से हुआ करता है ॥ ६-८ ॥ दूसरा उपाय यह है कि इस प्रकार के विरुद्ध शकुन को देखकर घर लौट जाय । श्वेत पुष्प श्रेष्ठ हुआ करते हैं, पूर्ण कुम्भ अत्यन्त शुभ है, मांस, मछली, दूर का शब्द, एक वृद्ध, बकरा, गायें, घोड़े, हाथी, देवप्रतिमाएँ, प्रज्वलित अग्नि, १ क. ङ. गुडसर्जी । घ. गुडसप । २ क. ख. ग. ङ. च. वधकाः । ३ घ. ' वभुर्भुरः । ४ ङ. मृ पूर्व । ५ ख. ग. च. च वस्त्र । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 709

अग्नि पुराण, पृष्ठ 709 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७०५ ' दूर्वाऽऽर्द्रगोमयं वेश्या स्वर्ण रूप्यं च रत्नकम् । वचासिद्धार्थकौषध्यो ` मुद्ग आयुधखड्गकम् ॥११ छत्रं पीठं राजलिंगं शवं रुदितवर्जितम् । फलं घृतं दधि पयो अ ( ह्य ) क्षतादर्शमाक्षिकम् ॥१२ ॥ ॥

शङ्ख इक्षुः शुभं वाक्यं भक्तवादित्रगीतकम् । गम्भीरमेघस्तनितं तडित्तुष्टिश्च मानो ॥ एकतः सर्वलिङ्गानि मनसस्तुष्टिरेकतः ॥१३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये शकुनवर्णनं नाम त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२३० ॥

अथैकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः शकुनानि पुष्कर उवाच

तिष्ठतो गमने प्रश्ने पुरुषस्य शुभाशुभम् । निवेदयन्ति शकुना देशस्य नगरस्य च ॥ १ ॥

सर्वः पापफलोदीप्तो निर्दिष्टो दैवचिन्तकैः । शान्तः शुभफलश्चैव देवज्ञैः समुदाहृतः ॥२ ॥

षट्प्रकारा विनिर्दिष्टाः शकुनानां च दीप्तयः । वेलादिग्देशकरणरुतजातिविभेदतः ॥३ ॥

पूर्वा पूर्वा च विज्ञेया सा तेषां बलवत्तरा । दिवाचरो रात्रिचरस्तथा रात्रौ ( त्रि ) दिवाचरः ॥४ ॥

क्रूरेषु दीप्ता विज्ञेया ऋक्षलग्नग्रहादिषु । धूमिता सा तु विज्ञेया यां गमिष्यति भास्करः ॥५ ॥

दूर्वा, ताजा गोबर, वेश्या, सोना, चाँदी, रत्न, बच तथा सिद्धार्थ ( श्वेत सरसों ) आदि ओषधियाँ, मूँग, तलवार आदि अस्त्र, छत्र, आसन, राजा का चिह्न, रोदनवर्जित शव, फल, घी, दही, जल, अक्षत, दर्पण, मधु, शंख, ईख, शुभवाक्य, स्वामिभक्त, बाजा बजानेवालों का गीत, गम्भीर मेघगर्जन, विद्युत् और मानसिक प्रसन्नता - ये सब शुभ शकुन हुआ करते हैं । एक मानसिकता प्रसन्नता ही ( सभी ) शकुनों से बढ़कर है ॥९ -१३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में शकुन - वर्णन नामक दो सौ तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २३० ॥

अध्याय २३१ शकुन - वर्णन पुष्कर बोले- देश तथा नगर में रहनेवाले अथवा वहाँ से जानेवाले पुरुष का शुभाशुभ पक्षी बतला दिया करते हैं । दैवज्ञों ने पक्षियों के उच्च स्वर को पापफलवाला और धीमे स्वर को शुभफलवाला कहा है । समय, दिशा, देश, करण, रुत ( शब्द ) तथा जाति के भेद से पक्षियों का स्वर छह प्रकार का हुआ करता है ॥१-३ ॥ इनमें पूर्व - पूर्व का स्वर उत्तरोत्तर स्वर की अपेक्षा अधिक बलवान् हुआ करता है । दिन में दिखायी पड़नेवाला पक्षी यदि रात्रि में शब्द करे और रात्रि में दिखायी देनेवाला दिन में शब्द करे तो यह समझना चाहिए कि वह क्रूर नक्षत्र, लग्न और ग्रह आदि से प्रभावित हैं । जिस दिशा में सूर्य जायगा १ ग. ' ass गो । २ क. ङ. मृद । ४५ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 710

अग्नि पुराण, पृष्ठ 710 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७०६ अग्निपुराणम् यस्यां स्थितः सा ज्वलिता मुक्ता चाङ्गारिणी मता दीप्तायां दिशि दिग्दीप्तं शकुनं परिकीर्तितम् देशे चैवाशुभे ज्ञेयो देशदीप्तो द्विजोत्तम रुतदीप्तश्च कथितो भिन्नभैरवनिःस्वनः दीप्ताच्छान्तो विनिर्दिष्टः सर्वैर्भेदैः प्रयत्नतः गोश्वोष्ट्रगर्दभश्वानः सारिका गृहगोधिका अजाविशुकनागेन्द्राः कोलो महिषवायसौ मार्जारकुक्कुटौ ग्राम्यौ तौ चैव वनगोचरौ गोकर्णशिखिचक्राह्वखरहारीतवायसाः शतघ्नचटकश्यामचास ( ष ) श्येनकपिञ्जलाः खञ्जरीटकदात्यूहशुकराजीवकुक्कुटाः वागुर्युलूकशरभक्रौञ्चाः शशककच्छपाः हंसाश्च मृगमार्जारनकुलर्क्षभुजंगमाः श्वाविवृषभगोमायुवृककोकिलसारसा: ' उसे धूमिता कहते हैं ॥४-५ ॥ जिसमें वह स्थित है । एतास्तिस्रः स्मृता दीप्ताः पञ्च शान्तास्तथाऽपराः ॥६ ॥

1 । ग्रामेऽरण्यावने ग्राम्यास्तथा निन्दितपादपः ॥७ ॥

। क्रियादीप्तो विनिर्दिष्टः स्वजात्यनुचितक्रियः ॥८ ॥

। जातिदीप्तस्तथा ज्ञेयः केवलं मांसभोजनः ॥ ९ ॥

। मिश्रैर्मिश्रो विनिर्दिष्टस्तस्य वाच्यं फलाफलम् ॥१० ॥

। चटका भासकूर्माद्याः कथिता ग्रामवासिनः ॥ ११ ॥

। ग्राम्यारण्या विनिर्दिष्टाः सर्वेऽन्ये वनगोचराः ॥ १२ ॥

। तयोर्भवति विज्ञानं नित्यं वै रूपभेदतः ॥ १३ ॥

। कुलाहकुक्कुभश्येनफेरुखञ्जनवानराः ॥१४ ॥

। तित्तिरिः शतपत्रश्च कपोतश्च तथा त्रयः ॥१५ ॥

। भारद्वाजश्च सारङ्ग इति ज्ञेया दिवाचराः ॥१६ ॥

। लोमासिकाः पिङ्गलिकाः कथिता रात्रिगोचराः ॥१७ ॥

। वृकारिसिंहव्याघ्रोष्ट्रग्रामशूकरमानुषाः ॥१८ ॥

। तुरंगकौ पीननरा (? ) गोधा ह्युभयचारिणः ॥ १ ९ ॥ उसे ज्वलिता कहते हैं और जिस दिशा को वह छोड़ आया है उसे अंगारिणी कहते हैं । इन तीन दिशाओं को दीप्त और शेष पाँच दिशाओं को शान्त कहते हैं । दीप्त दिशा में शब्द करनेवाला पक्षी दिग्दीप्त कहलाता है । जहाँ गाँव में जंगली पशु हों तथा वन में ग्राम्य पशु हों, वह देश निन्दित है । इसी प्रकार जहाँ निन्दित वृक्ष हों वह भी अशुभ है । अये द्विजोत्तम! अशुभ देश में शब्द करनेवाला पक्षी भी देश फल को प्राप्त करता है । अपने स्वभाव से अनुचित व्यवहार करनेवाला पक्षी अशुभ क्रियावाला कहलाता है ॥६-८ ॥ भैरव शब्द करनेवाला पक्षी अपने शब्द के कारण अशुभ माना जाता है । केवल मांस का आहार करनेवाले पक्षी स्वभाव से अशुभ हुआ करते हैं । सभी प्रकार के भेदों से प्रयत्नपूर्वक उच्च ध्वनि ( वाले पक्षी ) से शान्त ध्वनि ( वाले पक्षी ) का निर्देश कर दिया गया है । अब उसके फलाफल को कहना है । गाय, घोड़ा, ऊँट, गधा, कुत्ता, मैना, छिपकली, गौरैया, भास ( पक्षी - विशेष ) तथा कछुये आदि ग्रामवासी जीव कहलाते हैं ॥९ -११ । बकरी, भेंड़ा तोता, हाथी, सूकर, महिष, कौआ - ये ( जीव ) ग्राम्य और आरण्य दोनों कहलाते हैं । ( इनके अतिरिक्त ) अन्य जीव वन्य हैं । बिलाड़ और मुर्गा ग्राम्य होते हुए वन में भी देखे जाते हैं । रूपभेद से उनकी पहचान का निश्चय हो जाता है ॥१२-१३ ॥ साँप, मयूर, चक्रवाक, गधा, हारिल, कौआ, कुलाह, जंगली मुर्गा, बाज, गीदड़, खंजन, बन्दर, ( मादा ) बिच्छू, गौरैया, श्यामा, नीलकण्ठ, चातक, कठफोड़वा, कबूतर, खंजरीट, जलकाक, तोता, सारस, कुक्कुट, शरदूलपक्षी और सारङ्ग - ये दिवाचर जीव हैं ॥१४- १६ ॥ वागुरि, उलूक, शरभ, क्रौञ्च, शशक, कच्छप, शृगाली, पिंगरिक - ये रात्रिचर ( जीव ) हैं || १७ || हंस, मृग, बिलाड़, नेवला, रीछ, सर्प, कुत्ता, सिंह, बाघ, ऊँट, ग्राम्यशूकर, मनुष्य, साही, बैल, गीदड़, भेड़िया, कोयल, सारस, पीननर और गोह - ये उभयचर हैं ॥१८-१९ ॥ १ क. ङ. ‘ साः । कुरङ्गगोपीततरा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA