अग्नि पुराण — पृष्ठ 711–720
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 711–720
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एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७०७ ' बलप्रस्थानयोः सर्वे पुरस्तात्संघचारिणः गृहाद्गम्य यदा चासो ( षो ) २ व्याहरन्पुरतः स्थितः याने तद्दर्शनं शस्तं सव्यमङ्गस्य वाऽप्यथ प्रयातस्याग्रतो राम मृगः प्राणहरो भवेत् प्रतिलोमास्तथा राम खरश्च विकृतस्वनः पृष्ठतो निन्दिफलस्तित्तिरस्तु न शस्यते भवन्त्यर्थकरा नित्यं विपरीता विगर्हिताः वाञ्छितार्थ करा ज्ञेया दक्षिणाद्वामतो गताः शूकरी परिपुष्टा च पुंनामानश्च वामतः । कपि श्रीकर्णपिप्यीका रुरुश्येनाश्च दक्षिणाः । ततः संदर्शनं नेष्टं प्रतीपं वानरर्क्षयोः । भवेत्तस्य फलं वाच्यं तदेव दिवसं बुधैः ॥ जयावहा विनिर्दिष्टाः पश्चान्निधनकारिणः ॥२० ॥
। नृपावमानं वदति वामः कलहभोजने ॥२१ ॥
। चौरैर्मोघमथाऽऽख्याति मयूरो भिन्न निःस्वनः ॥२२ ॥
। ऋक्षाखुजम्बुकव्याघ्रसिंहमार्जारगर्दभाः ॥२३ ॥
। वामः कपिञ्जलः श्रेष्ठस्तथा दक्षिणसंस्थितः ॥२४ ॥
। एणा वराहाः पृषता वामा भूत्वा तु दक्षिणाः ॥ २५ ॥
। वृषाश्वजम्बुकव्याघ्राः सिंहमार्जारगर्दभाः ॥२६ ॥
। शिवा श्यामाननाच्छुच्छूः पिङ्गलाः गृहगोधिका ॥२७ ॥
स्त्रीसंज्ञाभासकारूषकपिश्रीकर्णच्छित्कराः ॥२८ ॥
जातोक्षाहिशशक्रोडगोधानां कीर्तनं शुभम् ॥ २ ९ ॥ कार्यकृद्बली शकुनः प्रस्थितस्य हि योऽन्वहम् ॥ ३० ॥
मत्ता भक्ष्यार्थिनी बाला वैरसक्तास्तथैव च ॥ ३१ ॥
रण में या यात्रा - काल में यदि ये उपर्युक्त जीव आगे झुण्ड बनाकर निकलते हुए दिखायी दें तो विजय प्राप्त होती है और यदि पीछे से निकलते दिखायी पड़ें तो ( मृत्यु ) क्षति करनेवाले हुआ करते हैं । घर से निकलते ही यदि सामने बोलता हुआ नीलकण्ठ दिखयी दे तो राजा से अपमान होता है । यदि वही वाम भाग में बैठकर बोलता हुआ नीलकण्ठ दिखायी पड़े तो भोजन में कलह होता है ॥२०- २१ ॥ सवारी पर बैठ चुकने पर यदि बायें या सामने की ओर मोर दिखायी दे तो शुभ हुआ करता है । यात्रा - काल में टूटे - फूटे शब्दोंवाला मयूर चोरों के आक्रमण को बतलाता है । हे राम! यात्रा करनेवाले के आगे की ओर ( दिखलायी पड़नेवाला ) मृग प्राणों का नाश करनेवाला हुआ करता है । रीछ, चूहा, सियार, बाघ, सिंह, बिलाड़ तथा गधा यदि प्रस्थान के समय सामने दिखायी पड़ें तो अशुभ फल होता है । गधे का रेंकना भी अशुभ हुआ करता है । बायें और दायें भाग में दिखायी पड़नेवाला कपिञ्जल पक्षी शुभ हुआ करता है परन्तु पीछे की ओर दिखायी पड़नेवाला निन्दित फल प्रदान करता है । तीतर का किसी भाग में दिखलायी पड़ना शुभ नहीं हुआ करता है । हिरन तथा सुअर आदि बायें भाग से दाहिनी ओर जायँ तो धन की प्राप्ति होती है किन्तु इसके विपरीत होने पर निन्दित फल मिलता है ॥२२-२५३ ॥ बैल, घोड़ा, गीदड़, बाघ, सिंह, बिलाड़ तथा गधा यदि दायें से बायें की ओर जायँ तो अभीष्ट फल प्राप्त होता है । शृगाली, मयूरी, छुछुन्दरी, जाति - विशेष का उलूक, छिपकली, शूकरी तथा कोकिला का बायें से दाहिनी ओर जाना - ये सब पुल्लिंग शकुन माने गये हैं । भास, कारुष, कपिश्रीकर्ण, पिप्पीक, रुरु तथा श्येन का दायीं से बायीं ओर जाना शुभ हुआ करता है । यात्रा-काल में जातिक, सर्प, खरहा, शूकर तथा गोधा का शब्द शुभ माना गया है ॥ २६-२९ ॥ वानर और रीछ का विपरीत दिशा में दिखायी पड़ना शुभ नहीं होता है । पशु - पक्षियों के द्वारा निर्दिष्ट शकुन बलवान् हुआ करते हैं और उसी दिन फल प्रदान कर देते हैं जिस दिन वे होते हैं । अये ब्राह्मण! यात्रा - काल में किसी पशु के कंकाल को खाती हुई, शब्द करती हुई १ क. ङ. रणप्रस्थानयोः । ख. ग. रथप्रस्थानयोः । २ छ. ' हरेत्पुर ' । ३ क. ख. शशा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७०८ अग्निपुराणम् सीमान्तमभ्यन्तरिता विज्ञेया निष्कला द्विज । एकद्वित्रिचतुर्भिस्तु शिवा धन्या रुतैर्भवेत् ॥ ३२ ॥
पञ्चभिश्च तथा षड्भिरधन्या परिकीर्तिता । सप्तभिश्च तथा धन्या निष्फला परतो भवेत् ॥३३ ॥
नृणां रोमांच जननी वाहनानां भयप्रदा । ज्वालानला सूर्यमुखी विज्ञेया भयवर्धिनी || ३४ || प्रथमं सारंगे दृष्टे शुभे देशे शुभं वदेत् । संवत्सरं मनुष्यस्य अशुभे च शुभं तथा ॥ ३५ ॥
तथाविधं नरः पश्येत्सारङ्गं प्रथमेऽहनि । आत्मनश्च तथात्वेन ज्ञातव्यं वत्सरं फलम् । ३६ ॥ इत्यादिमहापुराण आग्नेये शकुनवर्णनं नामैकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३१ ॥
अथ द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः शकुनानि पुष्कर उवाच विशन्ति येन मार्गेण वायसा बहवः पुरम् । तेन मार्गेण रुद्धस्य पुरस्य ग्रहणं भवेत् ॥ १ ॥
सेनायां यदि वा सार्थे ' निविष्टो वायसो ' रुदन् । वामो भयातुरस्त्रस्तो भयं वदति दुस्तरम् || २ || छायाङ्गवाहनोपानच्छत्रवस्त्रादिकुट्टने । मृत्युस्तत्पूजने पूजा तदिष्टकरणे शुभम् ॥३ ॥
या अपने भाग के लिए झगड़ती हुई एक, दो, तीन, चार शृगालियों का ( एक साथ ) शब्द करना शुभ माना जाता है । परन्तु पाँच - छह शृगालियों का एक साथ मिलकर शब्द करना अशुभ हुआ करता है || ३०-३२ २३ ॥ ॥ सात शृगालियों का एक साथ बोलना शुभ हुआ करता है, परन्तु इससे अधिक शृगालियों का ( एक साथ ) बोलना मनुष्यों के लिए रोमाञ्चकारी और वाहनों के लिए भयप्रद होता है । ज्वलामुखी ( नामक शृगाली - विशेष ) का सूर्याभिमुख होकर शब्द करना भयवर्धक हुआ करता है । | शुभ देश में हरिण को देखने से एक ही दिन में शुभ फल मिल जाता है, परन्तु अशुभ देश में देखने से एक वर्ष में शुभ फल मिलता है । इसी प्रकार वर्ष के प्रथम दिन में हरिण देखने से वर्ष भर शुभ फल प्राप्त हुआ करता है ॥३३-३६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में शकुनवर्णन नामक दो सौ इकतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३१ ॥
अध्याय २३२. शकुन - वर्णन पुष्कर बोले- ( शत्रु सेना से अवरुद्ध ) नगर में जिस मार्ग से बहुत से कौए प्रवेश करें उसी मार्ग से उस पर आक्रमण करना चाहिए ॥१ ॥ यदि समूह में बैठा हुआ कौआ भयभीत या त्रस्त होकर रोता हुआ उड़ जाय तो वह सेना की घोर
विपत्ति का सूचक हुआ करता है । यदि यात्रा के समय कौआ मनुष्य की छाया, देह, वाहन, जूते तथा वस्त्र आदि में चोंच मार दे तो उसकी मृत्यु समझनी चाहिए । इसका निराकरण कौए की पूजा करने से किया जा सकता है ॥ २-३ ॥ १ क. ङ. प्रहृष्टो । २ घ. छ. रुवन् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७० ९ प्रोषितागमकृत्काकः कुर्वन्द्वारि गतागतम् । न्यसेद्रक्तं पुरस्ताच्च निवेदयति बन्धनम् यच्चैवोपनयेद्द्रव्यं तस्य लब्धि विनिर्दिशेत् । पुरतो धनलब्धिः स्यादाममांसस्य छर्दने । यातुः काकोऽनुकूलस्तु क्षेमः कर्मक्षमो भवेत् । संमुखेऽभ्येति विरुवन्यात्राघातकरो भवेत् । वामोऽनुलोमगः श्रेष्ठः मध्यमो दक्षिणः स्मृतः । निवेदयति यात्रार्थमभिप्रेतं गृहे गतः । कोटरे वासमानश्च महानर्थकरो भवेत् अमेध्यपूर्णवदनः काकः सर्वार्थसाधकः । स्कन्धावारापसव्यस्थाः श्वानो विप्रविनाशकाः रक्तं दग्धं गृहे द्रव्यं क्षिपन्वह्निनिवेदकः ॥४ ॥
। पीतं द्रव्यं तथा रुक्मरूप्यमेव तु भार्गव ॥५ ॥
द्रव्यं वाऽपनयेद्यत्तु तस्य हानिं विनिर्दिशेत् ॥६ ॥
भूलब्धिः स्यान्मृदः क्षेपे राज्यं रत्नार्पणे महत् ॥७ ॥
न त्वर्थसाधको ज्ञेयः प्रतिकूलो भयावहः ॥८ ॥
वामः काकः स्मृतो धन्यो दक्षिणोऽर्थविनाशकृत ॥९ ॥
प्रतिलोमगतिर्वामो गमनप्रतिषेधकृत् ॥१० ॥
एकाक्षिचरणस्त्वर्कं वीक्षमाणो भयावहः ॥११ ॥
। न शुभस्तूषरे काकः पङ्काङ्कः स तु शस्यते ॥१२ ॥
ज्ञेया पतत्रिणोऽन्येऽपि काकवद्भृगुनन्दन ॥१३ ॥
। इन्द्रस्थाने नरेन्द्रस्य पुरेशस्य तु गोपुरे ॥१४ ॥
दरवाजे पर कौए का आना - जाना प्रवासी के पुनरागमन का सूचक हुआ करता है । घर में कौए का किसी लाल अथवा जली हुई वस्तु का गिराना घर में आग लगने की सूचना दिया करता है । कौए के द्वारा सामने गिरायी हुई लाल वस्तु बन्धन की सूचना दिया करती है । अये भार्गव! कौए के द्वारा सामने गिरायी हुई लाल वस्तु बन्धन की सूचना दिया करती है । अये भार्गव! कौए के द्वारा गिरायी हुई पीली व श्वेत वस्तु क्रमशः सोने या चाँदी की प्राप्ति की सूचना देती है । कौआ ( घर में ) जो वस्तु ले आता है, उसकी प्राप्ति होती है तथा जिस द्रव्य को अपने यहाँ से उठा ले जाता है, उसकी हानि की ओर संकेत करता है ॥४-६ ॥ यदि कौआ सामने की ओर कच्चा मांस काट रहा हो तो धन का लाभ होता है । यदि कौआ ( घर में ) मिट्टी गिरा दे तो भूमि - लाभ और यदि रत्न गिरा दे तो बहुत बड़े राज्य की प्राप्ति होती है । यदि कौआ यात्री के अनुकूल दिखायी पड़े तो यात्री का कल्याण हुआ करता है और वह अपने कार्य में समर्थ होता है, किन्तु यदि वह यात्री प्रतिकूल हो तो वह कार्य की असफलता तथा भय का सूचक हुआ करता है । यात्रा के समय शब्द करता हुआ कौआ यदि सामने जा जाय तो वह यात्रा में बाधा पहुँचाता है । वाम भाग में कौए का आना शुभ हुआ करता है और दक्षिण भाग में आने से वह धन का विनाश करनेवाला हुआ करता है ॥ ७ - ९ ॥ यात्रा करनेवाले की ही दिशा में वाम भाग में कौए का उड़ना श्रेष्ठ और दक्षिण भाग में उड़ना मध्यम कोटि का माना जाता है । परन्तु ( यात्री के ) वाम भाग में उलटी दिशा में उड़नेवाला कौआ यात्री का निषेध करनेवाला हुआ करता है । ( यात्रा के समय ) घर में कौए के आ जाने से यात्रा का प्रयोजन सिद्ध हो जाता है । उस समय एक पैर पर खड़ा हुआ और एक आँख से सूर्य की ओर देखता हुआ कौआ भय उत्पन्न करनेवाला हुआ करता है । घोंसले में बैठे हुए कौए का देखना महान् अनर्थकारी हुआ करता है । ऊसर में बैठा हुआ कौआ शुभ नहीं हुआ करता है । किन्तु कीचड़ में बैठा हुआ कौआ शुभ हुआ करता है ॥१०-१२ ॥ मुँह में अपवित्र वस्तु रखे हुए कौए को देखने से सभी प्रयोजन सिद्ध हो जाते हैं । अये भार्गव! कौए की भाँति अन्य पक्षियों ( के शुभाशुभ शकुनों ) को समझना चाहिए । छावनी के दक्षिण की ओर इन्द्रमन्दिर के सम्मुख अथवा १ क. ङ. ' हानन्दक ' | CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७१० अग्निपुराणम् अन्तर्गृहे गृहेशस्य मरणाय भवेद्भषन् । भयाय दक्षिणं चाङ्गं तथा भुजमदक्षिणम् । मार्गावरोधको मार्गे चौरान्वदति भार्गव । सोपानत्कमुखो धन्यो मांसपूर्णमुखोऽपि च । अवमूत्र्याग्रतो याति यस्य तस्य भयं भवेत् । मङ्गल्यं च तथा द्रव्यं तस्य स्यादर्थसिद्धये । भयाय स्वामिनो ज्ञेयमनिमित्तं रुतं गवाम् । शिवाय स्वामिनो रात्रौ बलीवर्दो नदन्भवेत् । ' अभक्ष्यं भक्षयन्त्यश्च गावो दत्तास्तथा स्वकाः । भूमिं पादैर्विनिघ्नन्त्यो ' दीना भीता भयावहाः महिष्यादिषु चाप्येतत्सर्वं वाच्यं विजानता । जलोपवेशनं नेष्टं भूमौ च परिवर्तनम् । राजप्रासाद के मुख्य द्वार पर भौंकता हुआ कुत्ता क्रमशः यस्य जिघ्राति वामाङ्गं तस्य स्यादर्थसिद्धये ॥१५ ॥
यात्राघातकरो यातुर्भवेत्प्रतिमुखागतः ॥१६ ॥
अलाभोऽस्थिमुखः पापो रज्जुचीरमुखस्तथा ॥ १७ ॥
अमङ्गल्यमुखद्रव्यं केशं चैवाशुभं तथा ॥ १८ ॥
यस्यावमूत्र्य व्रजति शुभं देशं तथा द्रुमम् ॥१९ ॥
श्ववच्च राम विज्ञेयास्तथा वै जम्बुकादयः ॥२० ॥
निशि चौरभयाय स्याद्विकृतं मृत्यवे तथा ॥२१ ॥
उत्सृष्टवृषभो राज्ञो विजयं संप्रयच्छति ॥ २२ ॥
त्यक्तस्नेहाः स्ववत्सेषु गर्भक्षयकरा मताः ॥ २३ ॥
। आर्द्राङ्ग्ग्यो हृष्टरोमाश्च शृङ्गलग्नमृदः शुभाः ॥२४ ॥
आरोहणं तथाऽन्येन सपर्याणस्य वाजिनः ॥ २५ ॥
विपत्करं तुरंगस्य सुप्तं वाऽप्यनिमित्ततः ॥ २६ ॥
ब्राह्मणों, राजा और प्रासादरक्षक की मृत्यु की सूचना दिया करता है । इसी प्रकार घर के अन्दर भौंकनेवाला कुत्ता गृहस्वामी की मृत्यु की सूचना दिया करता है । कुत्ता ( यात्रा के लिए उद्यत ) जिस मनुष्य के वाम अंग को सूँघ लेता है उसका प्रयोजन सिद्ध हो जाता है ॥१३-१५ ॥ किन्तु दाहिने अंग और बायीं भुजा को सूँघने से भय उत्पन्न हुआ करता है । यात्री के सामने से आता हुआ कुत्ता यात्रा में विघ्न उत्पन्न करनेवाला हुआ करता है । अये भार्गव! मार्ग को रोककर खड़ा हो जानेवाला कुत्ता मार्ग में चोरों की सूचना दिया करता है । ( यात्रा के समय ) मुँह में हड्डी लिये कुत्ते को देखने से हानि होती है और रस्सी या चिथड़ा लपेटे हुए कुत्ते को देखना शुभ हुआ करता है । मुख में अमांगलिक वस्तुओं तथा केशों को लिये कुत्ते को ( यात्रा के समय ) देखना अशुभ हुआ करता है ॥१६-१८ ॥ ( यात्रा के समय ) जिसके आगे - आगे मूत्र को विसर्जित करता हुआ कुत्ता चलता रहता है उनका कल्याण होता है । हे राम! कुत्ते की भाँति सियार ( आदि ) का भी उपर्युक्त मांगलिक वस्तुओं और स्थानों के सम्बन्ध से शकुन हुआ करता है । रात्रि में उसका इस प्रकार का शब्द चोरों के भय की सूचना देता है, परन्तु उनका विकृत स्वर ( में रँभाना स्वामी की ) मृत्यु का सूचक होता है । रात्रि में बैल का जोर से रँभाना स्वामी के कल्याण के लिए होता है । छूटा हुआ बैल राजा को विजय प्रदान करता है ॥१९ -२२ ॥ अभक्ष्य तथा ऐसी वस्तुओं का भक्षण करनेवाली जो उन्हें प्रकृति से प्राप्त नहीं है, और अपने बछड़ों से स्नेह रखनेवाली गायें ( स्वामी के परिवार में ) गर्भक्षय की सूचना देती हैं । ऐसी गायें स्वामी के लिए शुभ होती हैं जो पैरों से भूमि खोदती रहती हों, दीन, भयभीत अथवा भयावह हों, जिनके अंग गीले हों, जिनमें रोमाञ्च हो रहा हो, जिनके शरीर में मिट्टी लगी हुई हो । बुद्धिमान् मनुष्य को भैंसों के सम्बन्ध में भी इस प्रकार ( शुभाशुभ ) समझना चाहिए ॥२३- -२४३ ॥ जिसके ऊपर काठी रखी हुई है उस घोड़े के ऊपर ( स्वामी के अतिरिक्त ) किसी अन्य का सवार होना, घोड़े का जल में बैठ जाना और भूमि पर लोटना अनिष्टकारक हुआ करता है । घोड़े का अकारण सोना भी विपत्तिकारक हुआ करता है । घोड़े का अकस्मात् १ छ. अभय । २ क. ङ. न्त्यो दिवाभी । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७११ यवमोदकयोद्वेषस्त्वकस्माच्च न शस्यते । क्रीडन्बकैः कपोतैश्च सारिकाभिर्मृतिं वदेत् । वामपादेन च तथा विलिखंश्च वसुन्धराम् । भयाय स्यात्सकृन्मूत्री तथा निद्राविलाननः । यात्राविघातमाचष्टे वामपार्श्वं तथा स्पृशन् । ग्रामे व्रजति नागश्चेन्मैथुनं देशहा भवेत् । आरोहणं न चेद्दद्यात्प्रतीपं वा गृहं व्रजेत् । वामं दक्षिणपादेन पादमाक्रमते शुभः । वृषोऽश्वः कुञ्जरो वाऽपि रिपुसैन्यगतोऽशुभः । प्रतिकूलग्रहतु तथा संमुखमारुतात् । हृष्टा नराश्चानुलोमा ग्रहा वैजयलक्षणम् । प्राचीपश्चिमकैशानी सौम्या प्रेष्ठा शुभा च दिक् वदनाद्रुधिरोत्पत्तिर्वेपनं न च शस्यते ॥२७ ॥
साश्रुनेत्रो जिह्वया च पादलेही विनष्टये ॥ २८ ॥
स्वपेद्वा वामपार्श्वेन दिवा वा न शुभप्रदः ॥ २ ९ ॥ आरोहणं न चेद्दद्यात्प्रतीपं वा गृहं व्रजेत् ॥ ३० ॥
हेषमाणः शत्रुयोधं पादस्पर्शी जयावहः ॥ ३१ ॥
प्रसूता नागवनिता मत्ता चान्ताय भूपतेः ॥ ३२ ॥
मदं वा वारणो जह्याद्राजघातकरो भवेत् ॥३३ ॥
दक्षिणं च तथा दन्तं परिमाष्टि करेण च ॥ ३४ ॥
खण्डमेघातिवृष्ट्या तु सेनानाशमवाप्नुयात् ॥३५ ॥
यात्राकाले रणे वाऽपि च्छत्रादिपतनं भयम् ॥ ३६ ॥
काकैर्योधाभिभवनं क्रव्याद्भिर्मण्डलक्षयः ॥ ॥३७ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये शकुनवर्णनं नाम द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३२ ॥
यव तथा मोदक से द्वेष करने लगना अच्छा नहीं माना जाता है । इसी प्रकार उसके मुँह से ( बिना किसी कारण के ) रक्त बहना और उसका काँपना भी अशुभ हुआ करता है ॥ २५-२७ ॥ घोड़े का बगुले, कबूतर एवं मैना के साथ खेल करना मृत्यु का सूचक है । ( घोड़े का ) आँखों में आँसू भरकर अपनी चिह्ना से पैर चाटना ( स्वामी के ) विनाश का द्योतक है । ( घोड़े का ) बायें पैर से भूमि खोदना तथा बायें करवट होकर दिन में सोना शुभ ( फल ) का देनेवाला नहीं है । ( घोड़े का ) भय के कारण ( दिन में ) एक बार मूत्र विसर्जित करना, ( अकारण ) निद्रालु रहना, ( सवार को ) अपने ऊपर चढ़ने न देना अथवा उलटे घर को ही भागना और अपने वाम पार्श्व को छूना यात्रा में हानि करनेवाला हुआ करता है ॥ २८-३०३ ॥ पाद - स्पर्श करते ही शत्रु योद्धा के ऊपर ( जोर - जोर से ) हिनहिनाने लगनेवाला हुआ करता है । गाँव में मैथुन करनेवाला हाथी देश को नष्ट करनेवाला हुआ करता है । नवप्रसूता हथिनी यदि पागल हो जाय तो वह राजा के विनाश के लिए हुआ करती है । यदि हाथी ( अपने ऊपर किसी को ) चढ़ने न दे, उलटे घर भाग जाय या मद टपकाये तो वह राजा का विनाश करनेवाला हुआ करता है ॥३१-३३ ॥ दाहिने पैर से बायें पैर को बाँधनेवाला या सूँड़ से अपने दाहिने दाँत को रगड़नेवाला हाथी शुभ हुआ करता है । बैल, हाथी तथा घोड़े यदि शत्रु की सेना में मिल जायँ तो अमङ्गल समझना चाहिए । बादल के टुकड़े से होनेवाली अतिवृष्टि सेना का विनाश कर डालती है ॥ ३४-३५ ॥ यात्रा -काल में या रण में यदि ग्रह - नक्षत्र प्रतिकूल हों और सामने की ओर वायु चल रहा हो तथा ( राज ) छत्र आदि गिर पड़े तो भय समझना चाहिए । प्रसन्न प्रजा और अनुकूल ग्रह विजय के लक्षण हुआ करते हैं । योद्धाओं के ऊपर कौए आक्रमण करें तो पराजय समझना चाहिए । सेना के प्रयाण के लिए पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा पूर्वोत्तर दिशा शुभ हुआ करती है ॥३६-३७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में शकुन - वर्णन नामक दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३२ ॥
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७१२ अग्निपुराणम् अथ त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः यात्रामण्डलचिन्तादि कथनम् पुष्कर उवाच सर्वयात्रां प्रवक्ष्यामि राजधर्मसमाश्रयात् । प्रतिलोमे च विध्वस्ते शुक्रे यात्रां ' विवर्जयेत् । वैधृतौ च व्यतीपाते नागे च शकुनौ तथा । विपत्तारे नैधने च प्रत्यरौ चाथ जन्मनि । उदीची च तथा प्राची तयोरैक्यं प्रकीर्तितम् । वाय्वग्निदिक्समुद्भूतं परिधं न तु लङ्घयेत् । कृत्तिकाद्यानिपूर्वेण माघाद्यानि च याम्यतः सर्वद्वाराणि शस्तानि च्छायामानं वदामि ते भौमे पञ्चदशैवोक्ताश्चतुर्दश तथा बुधे अस्तं गते नीचगते विकले प्रतिलोमे बुधे यात्रां दिक्पतौ च चतुष्पादे च किंस्तुघ्ने तथा यात्रां गण्डे विवर्जयेद्यात्रां रिक्तायां च पश्चिमा दक्षिणा या दिक्तयोरैक्यं आदित्यचन्द्रसौरास्तु दिवसाश्च न । मैत्राद्यान्यपरे चाथ वासवाद्यानि । आदित्ये विंशतिज्ञेयाश्चन्द्रे षोडश । त्रयोदश तथा जीवे शुक्रे द्वादश रिपुराशिगे ॥ १ ॥
तथा ग्रहे ॥ २ ॥
विवर्जयेत् || ३ || तिथावपि || ४ || तथैव च ॥ ५ ॥
शोभनाः ॥ ६ ॥
वाऽप्युदक् || ७ || कीर्तिताः ॥८ ॥
कीर्तिताः ॥९ ॥
अध्याय २३३ यात्रामण्डलचिन्ता पुष्कर बोले- ( अब मैं ) राजधर्म से सम्बद्ध होने के कारण समस्त यात्राओं का वर्णन करूँगा । जब शुक्र अस्त हो, नीचे स्थान में चला गया हो, शत्रु राशि पर स्थित हो या नष्ट हो गया हो तब यात्रा नहीं करनी चाहिए । बुध, दिक्पति और ग्रह की प्रतिकूलता में तथा वैधृति, व्यतीपात, नाग, शकुनि, चतुष्पाद और किंस्तुघ्न योग में ( भी ) यात्रा का परित्याग कर देना चाहिए ॥१-३ ॥ विपत्तार, नैधन, प्रत्यरि, जन्म तथा गण्ड योग में और रिक्ता तिथि में भी यात्रा वर्जनीय हुआ करती है । ( यात्रा विचार से ) उत्तर तथा पूर्व और पश्चिम तथा दक्षिण दिशाओं को एक माना गया है । पश्चिमोत्तर और दक्षिण - पूर्व दिशाओं के दिक्शूल का उल्लंघन नहीं करना चाहिए । ( यात्रा के लिए ) रविवार, सोमवार और शनिवार शुभ नहीं हुआ करते हैं ॥४-६ ॥ कृत्तिका से लेकर सात नक्षत्र - समूह पूर्व दिशा में रहते हैं, मघा आदि सात नक्षत्र दक्षिण दिशा में रहते हैं, अनुराधा आदि सात नक्षत्र पश्चिम दिशा में रहते हैं तथा धनिष्ठा आदि सात नक्षत्र उत्तर दिशा में रहते हैं । ( अग्निकोण से वायुकोण तक परिध दण्ड रहा करता है, अतः इस प्रकार यात्रा करनी चाहिए, जिससे परिध दण्ड का उल्लंघन न हो ) पूर्वोक्त नक्षत्र उन - उन दिशाओं के द्वार हैं, सभी द्वार उन - उन दिशाओं के लिए उत्तम हैं । अब मैं तुम्हें छाया का मान बताता हूँ । रविवार को बीस, सोमवार को सोलह, मङ्गलवार को पन्द्रह, बुध को चौदह, बृहस्पति को तेरह, शुक्र को बारह तथा शनिवार को ग्यारह अंगुल ' छायामान ' १ ख. ग. घ. छ. विसर्जयेत् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७१३ एकादश तथा सौरे सर्वकर्मसु कीर्तिताः शकुनादौ शुभे यायाज्जयाय हरिमास्मरन् स्वाम्यमात्यस्तथा दुर्गः कोषो दण्डस्तथैव च । सप्ताङ्गस्य तु राज्यस्य विघ्नकर्तृन्विनाशयेत् । आत्ममण्डलमेवात्र प्रथमं मण्डलं भवेत् उपेतस्तु सुहृज्ज्ञेयः शत्रुमित्रमतः परम् । एतत्पुरस्तात्कथितं पश्चादपि निबोध मे आसारस्तु ततोऽन्यः स्यादाक्रन्दासार उच्यते नात्रापि निश्चयः शक्यो वक्तुं मनुजपुंगव निग्रहानुग्रहेऽशक्तः सर्वेषामपि यो भवेत् ' न कस्यचिद्रिपुर्मित्रं कारणाच्छत्रुमित्रके । त्रिविधा रिपवो ज्ञेयाः कुल्यानन्तरकृत्रिमाः अनन्तरोऽपि यः शत्रुः सोऽपि मे कृत्रिमो मतः । जन्मलग्ने शक्रचापे संमुखे न व्रजेन्नरः ॥१० ॥
। वक्ष्ये मण्डलचिन्तां ते कर्तव्यं राजरक्षणम् ॥११ ॥
मित्रं जनपदश्चैव राज्यं सप्ताङ्गमुच्यते ॥१२ ॥
मण्डलेषु च सर्वेषु वृद्धिः कार्या महीक्षिता ॥१३ ॥
। सामन्तास्तस्य विज्ञेया रिपवो मण्डलस्य तु ॥१४ ॥
मित्रमित्रं ततो ज्ञेयं मित्रमित्ररिपुस्ततः ॥१५ ॥
। पाणिग्राहस्ततः पश्चात्ततस्त्वाक्रन्द उच्यते ।१६ ॥ । जिगीषोः शत्रुयुक्तस्य विमुक्तस्य तथा द्विज ॥ १७ ॥
। निग्रहानुग्रहे शक्तो मध्यस्थः परिकीर्तितः ॥१८ ॥
। उदासीनः स कथितो बलवान्पृथिवीपतिः ॥१९ ॥
मण्डलं तव सम्प्रोक्तमेतद्द्वादशराजकम् ॥२० ॥
। पूर्वपूर्वो गुरुस्तेषां दुश्चिकित्स्यतमो मतः ॥ २१ ॥
। पाणिग्राहो भवेच्छत्रोर्मित्राणि रिपवस्तथा ॥ २२ ॥
कहा गया है, जो सभी कर्मों के लिए विहित है । जन्म लग्न में तथा सामने इन्द्रधनुष उदित हुआ हो तो मनुष्य यात्रा न करे । शुभ शकुन आदि होने पर श्रीहरि का स्मरण करते हुए विजय यात्रा करनी चाहिए ॥७-१०३ ॥ अब मैं तुमसे ( राज ) मण्डल के विषय में बतलाऊँगा जिससे राजा की रक्षा करनी चाहिए । स्वामी, अमात्य, दुर्ग, कोष, दण्ड, मित्र तथा देश — ये सातों राज्य के अङ्ग हुआ करते हैं ॥ ११-१२ ॥ ( राजा को ) सप्ताङ्ग राज्य में विघ्न डालनेवाले का सर्वनाश कर देना चाहिए । राजा को अपने ( मित्रों और हितैषियों ) के मण्डल में वृद्धि करना चाहिए । पहला मण्डल तो वह राज्य है, जिसके ऊपर राजा शासन करता है । सामन्तों को शत्रु समझना चाहिए, किन्तु जो सामन्त राजा में आसक्त हों उन्हें मित्र समझना चाहिए । इसी प्रकार शत्रु के मित्र, मित्र के मित्र और मित्र के मित्र शत्रु को भी समझना चाहिए । यह बात मैं पहले भी कह चुका हूँ, अब भी जान लो । तत्पश्चात् उसके पाणिग्राह, आक्रन्द, आसार और आक्रन्द के आसार हुआ करते हैं ॥१३-१६३ ॥ विजय की इच्छा रखनेवाले शत्रुयुक्त राजा के लिए मण्डल आवश्यक है या शत्रुमुक्त के लिए यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता है । सबका निग्रह और अनुग्रह करने में समर्थ राजा मध्यस्थ कहलाता है और उसमें असमर्थ होता हुआ बलवान् राजा भी उदासीन कहलाता है ॥१७-१९ ॥ यों तो न किसी का कोई मित्र है न शत्रु, परन्तु कारणवश मनुष्य के शत्रु मित्र हुआ करते हैं । मैंने तुम्हें बारह राजाओं का यह मण्डल बतला दिया है । शत्रु तीन प्रकार के होते हैं - कुलक्रमागत, बाद में होनेवाले व्यक्तिगत और कृत्रिम । उनमें क्रमशः पूर्व - पूर्व शत्रु ( बादवाले की अपेक्षा ) दुर्निवार्य होता है । बाद में होनेवाला व्यक्तिगत शत्रु भी कृत्रिम है-ऐसा मेरा विचार है । ( शत्रु राजा का ) पाणिग्राह और उसके शत्रु ( आक्रमणकारी राजा के ) मित्र हुआ करते हैं । पाष्णिग्राह १ क. जयेत् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७१४ अग्निपुराणम् पाणिग्राहमुपायैश्च शमयेच्च तथा स्वकम् । मित्रेण शत्रोरुच्छेदं प्रशंसन्ति पुरातनाः ॥२३ ॥
मित्रं च शत्रुतामेति सामन्तत्वादनन्तरम् । शत्रुं जिगीषुरुच्छिन्द्यात्स्वयं शक्नोति चेद्यदि || २४ || प्रतापवृद्धौ तेनापि नामित्राज्जायते भयम् । यथाऽस्य नोद्विजेल्लोको विश्वासश्च यथा भवेत् ॥ २५ ॥
जिगीषुर्धर्मविजयी तथा लोकं वशं नयेत् ॥२६ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये यात्रामण्डलचिन्ताकथनं नाम त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२३३ ॥
अथ चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः षाड्गुण्यम् पुष्कर उवाच सामभेदौ मया प्रोक्तौ दानदण्डौ तथैव च । दण्डः स्वदेशे कथितः परदेशे ब्रवीमि ते ॥१ ॥
प्रकाशश्चाप्रकाशश्च द्विविधो दण्ड उच्यते । ' लुण्ठनं ग्रामघातश्च सस्यघातोऽग्निदीपनम् ॥२ ॥
प्रकाशोऽथ विषं वह्निर्विविधैः पुरुषैर्वधः । दूषणं चैव साधूनामुदकानां च दूषणम् ॥३ ॥
दण्डप्रणयनं प्रोक्तमुपेक्षां शृणु भार्गव । यदा मन्येत नृपती रणे न मम विग्रहः ॥ ४ ॥
को ( युद्ध के अतिरिक्त अन्य ) उपायों से शान्त करना चाहिए । प्राचीन लोगों का मत है कि मित्र के द्वारा शत्रु का नाश कराना चाहिए ॥२०- २३ ॥ सामन्त होने के कारण मित्र भी कालान्तर में शत्रु बन जाता है । शत्रु को जीतनेवाले राजा में यदि सामर्थ्य हो तो शत्रु का उन्मूलन स्वयं करना चाहिए । राजा का पराक्रम बढ़ने से शत्रु से भय नहीं रह जाता है । विजयाभिलाषी और धर्म से ( दूसरों पर ) विजय प्राप्त करनेवाले राजा को वही करना चाहिए जिससे प्रजा उद्विग्न न हो और उस पर विश्वास करे । इस प्रकार उसे प्रजाओं को अपने वश में कर लेना चाहिए ॥२४-२६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में यात्रामण्डल चिन्ताकथन नामक दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३३ ॥
अध्याय २३४ षाड्गुण्य पुष्कर बोले- मैं साम, भेद और दान दण्ड के विषय में बता चुका हूँ और अपने देश में दिये जानेवाले दण्ड के विषय में भी कह चुका हूँ । अब मैं दूसरे दण्ड के विषय में भी बतलाऊँगा । दण्ड दो प्रकार का कहा गया है-प्रकाश और अप्रकाश । लूट लेना, गाँव नष्ट कर देना तथा आग लगा देना - ये दण्ड प्रकाश दण्ड कहलाते हैं । विष देना, अग्नि देना, अनेक मनुष्यों के द्वारा मिलकर किसी एक का वध करना और शुद्ध जल को दूषित करना - ये सब अप्रकाश दण्ड कहलाते हैं ॥१-३ ॥ अये भृगुनन्दन! मैं दण्डविधान तो बतला चुका हूँ अब ( शत्रु की ) उपेक्षा के सम्बन्ध में सुनो । जब राजा यह समझे कि युद्ध करने से भी शत्रु के साथ मेरा विग्रह ( मनमुटाव ) न बढ़ेगा, १ क. ङ. पतनं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७१५ अनर्थायानुबन्धः स्यात्संधिना च तथा भवेत् भेददण्डानुबन्धः स्यात्तदोपेक्षां समाश्रयेत् न चाहमस्य शक्नोमि तत्रोपेक्षां समाश्रयेत् मायोपायं प्रवक्ष्यामि उत्पातैरनृतैश्चरन् स्थूलस्य तस्य पुच्छस्थां कृत्वोल्कां विपुलां द्विज एवमन्ये दर्शनीया उत्पाता बहवोऽपि च साम्वत्सरास्तापसाश्च नाशं ब्रूयुः परस्य च देवतानां प्रसादश्च कीर्तनीयः परस्य तु एवं ब्रूयाद्रणे प्राप्ते भग्नाः सर्वे परे इति देवाज्ञाबृंहितो राजा संनद्धः समरं प्रति चतुरङ्गं बलं राजा सहायार्थं दिवौकसाम् छिन्नानि रिपुशीर्षाणि प्रासादाग्रेषु दर्शयेत् अनुबन्ध ( जान - बूझकर उपद्रव ) करने से अनर्थ हो । सामलब्धास्पदं चात्र दानं चार्थक्षयंकरम् ॥५ ॥
। न चायं मम शक्नोति ' किंचित्कर्तुमुपद्रवम् ॥६ ॥
। अवज्ञोपहतस्तत्र राज्ञा कार्यो रिपुर्भवेत् ॥७ ॥॥ शत्रोरुद्वेजनं शत्रोः शिविरस्थस्य पक्षिणः ॥८ ॥
। विसृजेच्च ततश्चैवमुल्कापातं प्रदर्शयेत् ॥९ ॥
। उद्वेजनं तथा कुर्यात्कुहकैर्विविधैर्द्विषाम् ॥१० ॥
। जिगीषुः पृथिवीं राजा तेन चोद्वेजयेत्परान् ॥ ११ ॥
। आगतं नो मित्रबलं प्रहरध्वमभीतवत् ॥१२ ॥
। क्ष्वेडाः किलकिलाः कार्या वाच्यः शत्रुर्हतस्तथा ॥१३ ॥
। इन्द्रजालं प्रवक्ष्यामि इन्द्रं कालेन दर्शयेत् ॥१४ ॥
। बलं तु दर्शयेत्प्राप्तं रक्तवृष्टिं चरेद्रिपौ ॥१५ ॥
। षाड्गुण्यं संप्रवक्ष्यामि तद्वरौ संधिविग्रहौ ॥ १६ ॥
जायगा, सन्धि करने से भी वही होगा, साम के प्रयोग से लाभ होगा, दान प्रयोग से अर्थक्षय होगा और फूट डालने से दण्ड का परिणाम निकलेगा तब उसे शत्रु की उपेक्षा का आश्रय लेना चाहिए । ( राजा जब समझ ले कि ) यह शत्रु मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है और मैं भी इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता हूँ तब उपेक्षा का आश्रय लेना चाहिए । राजा को चाहिए कि ( अपने ) शत्रु को अवज्ञा से ही मार डाले ॥४-७ ॥ अब मैं छल के उपायों को बतलाऊँगा । उत्पातों और झूठी बातों से शत्रु को उद्विग्न कर देना चाहिए । अये द्विज! शिविर में रहनेवाले मोटे पक्षी की पूँछ में बड़ी - सी उल्का बाँधकर छोड़ दे । इस प्रकार शत्रुओं को बहुत से उल्कापात तथा अन्य प्रकार के बहुत से उत्पात कर - करके दिखाता रहे ॥८ - ९ ॥ इस प्रकार विविध प्रकार की ऐन्द्रजालिक क्रियाओं से शत्रुओं को उद्विग्न करना चाहिए । ज्योतिषियों तथा तपस्वियों से शत्रु के विनाश की घोषणा करवानी चाहिए । पृथ्वी को जीतने की इच्छा करनेवाले राजा को ( विविध उपायों से ) शत्रुओं की उद्विग्न करते रहना चाहिए ॥१०-११ ॥ मुझे देवताओं की कृपा प्राप्त है, शत्रु की नहीं यह संवाद शत्रु तक पहुँचाते रहना चाहिए । ( युद्ध में ऐसी घोषणा करानी चाहिए ) - सैनिको! हमारी मित्र सेना आ पहुँची है, आप लोग निर्भीक होकर ( शत्रु के ऊपर ) प्रहार कीजिये । रण में इस प्रकार कहना चाहिए कि सारे शत्रु मर चुके हैं । रण में शत्रुओं को ललकारते रहना चाहिए । किलकारियाँ भरते रहना चाहिए । यह घोषणा भी करते रहना चाहिए कि शत्रु मर गया है । इस प्रकार ज्योतिषियों से आज्ञा लेकर राजा को लड़ाई के लिए संनद्ध हो जाना चाहिए । अब मैं इन्द्रजाल के सम्बन्ध में बतलाऊँगा । राजा समयानुसार इन्द्र की माया का प्रदर्शन करे ॥१२-१४ ॥ उसमें राजा को यह दिखाना चाहिए कि देवताओं की चतुरङ्गिणी सेना उसकी सहायता के लिए आ गयी है । तत्पश्चात् इन्द्रजाल से शत्रु के ऊपर रक्त की वर्षा करनी चाहिए । इसी प्रकार शत्रु के कटे हुए सिरों को महलों के ऊपर लटकते हुए दिखाना चाहिए । अब षाड्गुण्य का वर्णन करूँगा, जिसमें सन्धि १ क. ङ. ' ति कश्चित्क ' । २ क. ङ. परस्परम् । जि ' । ३ क. ङ. इन्द्रजाले । ४ क. ङ. ' ग्रे प्रद ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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७१६ अग्निपुराणम् सन्धिश्च विग्रहश्चैव यानमासनमेव च पणबन्धः स्मृतः संधिरपकारस्तु विग्रहः विग्रहेण स्वके देशे स्थितिरासनमुच्यते उदासीनो मध्यमो वा संशयात्संश्रयः स्मृतः हीनेन विग्रहः कार्यः स्वयं राज्ञा बलीयसा आसीनः कर्मविच्छेदं शक्तः कर्त्तु रिपोर्यदा अशुद्धपाणिर्बलवान्द्वैधीभावं समाश्रयेत् संश्रयस्तेन वक्तव्यो गुणानामधमो गुणः बहुलाभकरं पश्चात्तदा राजा समाश्रयेत् इत्यादिमहापुराण आग्नेये षाड्गुण्यवर्णनं । द्वैधीभावः संशयश्च षड्गुणाः परिकीर्तिताः ॥ १७ ॥
। जिगीषोः शत्रुविषये यानं यात्राऽभिधीयते ॥ १८ ॥
। बलार्धेन प्रयाणं तु द्वैधीभावः स उच्यते ॥ १ ९ ॥ । समेन संधिरन्वेष्योऽहीनेन च बलीयसा ॥ २० ॥
। तत्रापि शुद्धपाणिस्तु बलीयांसं समाश्रयेत् ॥ २१ ॥
। अशुद्धपाणिश्चाऽऽसीत विगृह्य वसुधाधिपः ॥ २२ ॥
। बलिना विगृहीतस्तु योऽसन्देहेन पार्थिवः ॥ २३ ॥
। बहुक्षयव्यायायासं तेषां यानं प्रकीर्तितम् ॥ २४ ॥
। सर्वशक्तिविहीनस्तु तदा कुर्यात्तु संश्रयम् ॥ २५ ॥
नाम चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३४ ॥
और विग्रह सबसे श्रेष्ठ है । षाड्गुण्य में आनेवाले हैं - सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव तथा संशय ॥१५-१७ ॥ किसी शर्त के अनुसार बँधने को सन्धि कहते हैं और विग्रह कहते हैं अपकार को । विजय की इच्छा से शत्रु पर चढ़ाई करने को यान कहते हैं । शत्रु से विग्रह करके अपने देश में रहना आसन है । आधी सेना लेकर ( युद्ध के लिए ) कूच करना द्वैधीभाव है । उदासीन अथवा मध्यम कोटि के शत्रु के आश्रय में रहने को संश्रय ( संशय ) कहते हैं । सन्धि उससे करनी चाहिए जो समान हो, अपने से हीन न हो अथवा अपने से बलवान् हो । बलवान् राजा को अपने से हीन शत्रु के साथ विग्रह करना चाहिए । यदि राजा के पीछे कोई शत्रु न हो तो उसे बलवान् राजा का आश्रय लेना चाहिए ॥१८-२१ ॥ पीछे की ओर पार्ष्णिग्राह शत्रु के रहने पर भी यदि राजा यह समझे कि वह शत्रु की गति में आधी सेना से ही विघ्न डाल सकता है तो उसे उतनी ही सेना भेजनी चाहिए । बलवान् शत्रु के साथ विग्रह में लगे हुए राजा के द्वारा उसका आश्रय ग्रहण कर लेना अधम गुण माना गया है । ऐसी स्थिति में संश्रय, विनाश, व्यय और आयास का कारण हुआ करता है । राजा को ( अपने शत्रु का ) आश्रय तभी लेना चाहिए, जब वह बाद में लाभकारी हो अथवा जब ( राजा की ) सारी शक्ति नष्ट हो चुकी हो ॥ २२-२५ ॥ श्री अग्निमहानुराण में षाड्गुण्य - वर्णन नामक दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३४ ॥
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