अग्नि पुराण — पृष्ठ 791–800

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 791–800

पृष्ठ 791

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सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७८७ अप्रजा ( ज ) स्त्रीधनं भर्तुर्ब्राह्मयादिषु चतुर्ष्वपि । दुहितृणां प्रसूता चेच्छेषेषु पितृगामि तत् ॥ ३२ ॥

दत्त्वा कन्यां हरन्दण्ड्यो व्ययं दद्याच्च सोदयम् । मृतायां दत्तमादद्यात्परिशोध्योभयव्ययम्॥३३ ॥

दुर्भिक्षे धर्मकार्ये च व्याधौ संप्रतिरोधके । गृहीतं स्त्रीधनं भर्त्ता न स्त्रियै दातुमर्हति ॥३४ ॥

अधिवित्तस्त्रियै दद्यादाधिवेदनिकं समम् । न दत्तं स्त्रीधनं यस्यै दत्ते त्वर्धं प्रकीर्तितम् ॥ ३५ ॥

विभागनिवे ज्ञातिबन्धुसाक्ष्यभिलेखितैः । विभागभावना ज्ञेया गृहक्षेत्रैश्च यौतकैः ॥ ३६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये दायविभागकथनं नाम षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५६ ॥

अथ सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः सीमाविवादादिनिर्णयः अग्निरुवाच सीम्नो विवादे क्षेत्रस्य सामन्ताः स्थविरादयः । गोपाः सीमाकर्षिणो ये सर्वे च वनगोचराः ॥१ ॥

प्रणेयुरेते सीमानं " स्थूलाङ्गारतुषद्रुमैः । सेतुवल्मीकनिम्नास्थिचैत्याद्यैरुपलक्षिताम् ॥२ ॥

सामन्ता वा समग्रामाश्चत्वारोऽष्टादशापि वा । रक्तस्त्रग्वसनाः समां नयेयुः क्षितिचारिणः ॥३ ॥

उसका धन पुत्रियों को प्राप्त होगा, किन्तु अन्य प्रकार के विवाहों से विवाहित स्त्री का धन ( उसके सन्तानरहित मर जाने पर ) उसके माता - पिता को प्राप्त हो जाता है । कन्या को देकर उसे पुनः वापस लेनेवाला दण्ड का भागी तो होता ही है, उसे ब्याजसहित सम्पूर्ण व्यय किया हुआ धन भी देना पड़ता है । यदि ( सगाई हो जाने के बाद ) कन्या की मृत्यु हो जाय तो दोनों ओर के व्यय किये हुए धन को काटकर शेष धन ( जो कि कन्या की सगाई के समय दिया गया हो ) वापस ले लेना चाहिए || ३१-३३ ॥ दुर्भिक्ष में, धर्मकृत्य में, व्याधि में और बन्धन में पड़ जाने पर लिया गया स्त्रीधन पति के द्वारा स्त्री को वापस नहीं करना पड़ता है । पति के द्वारा दूसरी स्त्री से विवाह कर लेने से जो स्त्री अपदस्थ हो जाती है और जिसे स्त्रीधन प्राप्त नहीं होता है, उसे ( दूसरी स्त्री से विवाह करने में व्यय किये गये धन के ) समान धन देना चाहिए । यदि उसे स्त्रीधन मिल चुका हो तो ( दूसरी स्त्री से विवाह करने में व्यय किये गये धन का ) आधा धन देना चाहिए । किसी के द्वारा विभाजन छिपाने पर जान - पहचानवाले मनुष्यों, बन्धुओं, लेखों तथा विभाजित किये हुए घरों और खेतों से विभाजन को प्रमाणित किया जा सकता है ॥३४-३६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में दायविभाग कथन नामक दो सौ छप्पनवाँ अध्याय समाप्त ॥२५६ ॥

अध्याय २५७ सीमाविवादादिनिर्णय अग्निदेव बोले - खेत की सीमा के लिए विवाद उठ खड़ा होने पर सामन्तगण, वृद्ध गोप और वनेचर मोटे-मोटे कोयले, भूसा, वृक्ष, सेतु ( पुल ), वल्मीक, ढाल प्रदेश, हड्डी तथा पत्थरों के ढेर आदि से सीमा का निर्णय करें । चार या आठ या दस सामन्त या गाँव के लोग रक्त, वस्त्र और माला पहनकर सीमा का निर्णय करने के लिए १ क. ‘ र्तुब्रह्मादि । ख. ग. ' तुर्ब्राह्मादि । २ ख. ग. छ. ' रा गणाः । गो । ३ छ. ' राः । नयेयु । ४ क. ङ. छ. नं स्थला ' । ५ ख. ग. छ. तिधारि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 792

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७८८ अग्निपुराणम् अनृते तु पृथग्दण्ड्या राज्ञा मध्यमसाहसम् । आरामायतनग्रामनिपानोद्यानवेश्मसु । मर्यादायाः प्रभे ( वा ) देषु क्षेत्रस्य हरणे तथा । न निषेध्योऽप्लबाधस्तु सेतुः कल्याणकारकः । स्वामिने योऽनिवेद्यैव क्षेत्रे सेतुं प्रकल्पयेत् फालाहतमपि क्षेत्रं यो न कुर्यान्न कारयेत् । ` माषानष्टौ तु महिषी सस्यघातस्य कारिणी । भक्षयित्वोपविष्टानां द्विगुणो वसतां दमः ' यावत्सस्यं विनष्टं तु तावत्क्षेत्री फलं लभेत् पथि ग्रामविवीतान्नेक्षेत्रे दोषो विद्यते अभावे ज्ञातृचिह्नानां राजा सीम्नः प्रवर्तकः ॥४ ॥

एष एव विधिर्ज्ञेयो वर्षाम्बुप्रवहेषु च ॥५ ॥

मर्यादायाश्च दण्ड्याः स्युरधमोत्तममध्यमाः ॥६ ॥

परभूमिं हरन्कूपः स्वल्पक्षेत्रो बहूदकः ॥७ ॥

। ( ' उत्पन्ने स्वामिनो भोगस्तदभावे महीपतेः २ ॥८ ॥

स प्रदाप्यो ऽकृष्टफलं क्षेत्रमन्येन कारयेत् ) ॥९ ॥

दण्डनीया तदर्धं तु गौस्तदर्धमजाविकम् ॥१० ॥

। सममेषां " विधीयेत खरोष्ट्रं महीषीसमम् ॥११ ॥

। पालस्ताड्योऽथ गोस्वामी पूर्वोक्तं दण्डमर्हति ॥१२ ॥

। अकामतः कामच चौरवद्दण्डमर्हति ॥१३ ॥

पैदल ही वहाँ जायँ । उस विवाद में मिथ्या झूठ बोलनेवाला राजा पैदल ही वहाँ जाय । उस विवाद में मिथ्या झूठ बोलनेवाला राजा द्वारा मध्यम साहस के दण्ड का भागी होता है । यदि वहाँ कोई ( सीमानिर्धारण के लिए ) चिह्न न दिखायी दे तो राजा को अपनी इच्छानुसार सीमा का निर्धारण कर देना चाहिए ॥१-४ ॥ उपवन, देवालय, गाँव, प्याऊ, उद्यान, गृह तथा वर्षा - जल प्रवाह आदि के सम्बन्ध में भी यही विधान है । सीमा को भंग करने पर, खेत का अपहरण करने पर तथा मर्यादा का अपहरण करने पर क्रमशः उत्तम, मध्यम तथा अधम साहस के दण्ड का अधिकारी होता है । किसी ( व्यक्ति के लिए ) थोड़ी - सी बाधा उत्पन्न करके ( बहुतों के लिए ) कल्याणकारी सेतु ( के निर्माण का ) निषेध नहीं करना चाहिए । इसी प्रकार ( भूमि को ग्रहण करनेवाले कुएँ के निर्माण को भी नहीं रोकना चाहिए क्योंकि ) वह थोड़ा - सा स्थान लेकर अत्यधिक जल देनेवाला होता है । क्षेत्र स्वामी की अनुमति प्राप्त किये बिना ( किसी दूसरे के ) खेत में बाँध बाँधने पर उस बाँध की सहायता से उत्पन्न होनेवाले लाभ पर ( क्षेत्र ) स्वामी का अधिकार होता है और उसके अभाव में उसका लाभ राजा को प्राप्त होता है । जो व्यक्ति हल चले हुए खेत में भी न स्वयं खेती करता है और न दूसरे से ही करवाता है, उससे खेत की उपज ही नहीं अपितु पूरा खेत ही जोतनेवाले को दिलवा देना चाहिए ॥५ - ९ ॥ दूसरे की खेती को नष्ट करनेवाली भैंस के स्वामी को आठ मास का दण्ड देना चाहिए, गाय के स्वामी को चार तथा भेंड़ - बकरे के स्वामी को दो मास का दण्ड देना चाहिए । खेत इत्यादि खाकर उसमें इन पशुओं के बैठ जाने पर ( उसके स्वामी के ऊपर ) दुगुना दण्ड किया जाता है । जहाँ पर घास तथा ईंधन संग्रह किया गया हो वहाँ पर भी ( इन पशुओं के द्वारा हानि पहुँचाने पर ) दण्ड समान हुआ करता है । गधे और ऊँट के द्वारा ( खेत आदि को क्षति पहुँचाने पर ) दण्ड भैंस के समान ही देना चाहिए । इसके अतिरिक्त पशु के द्वारा जितनी फसल नष्ट हो क्षेत्र-स्वामी को उतना ही फल प्राप्त होना चाहिए, ग्वाले को पीटना चाहिए और गाय के स्वामी को उपर्युक्त दण्ड देना चाहिए । पशुओं के स्वामी की इच्छा के बिना यदि पशु मार्ग में, घास ईंधन के भांडार अथवा खेत में चले जायँ तो वह दोषी नहीं होता है, किन्तु पशु - स्वामी की इच्छा से ऐसा होने पर वह चोर के समान दण्ड का भागी होता है ॥१०-१३ ॥ १ उत्पन्ने कारयेत् च. पुस्तके नास्ति । २ क. ख. ङ. " तेः । फला " । ३ छ. माषान ं । ४ छ. नां यथोक्ताद्विगुणो द ' । ५ छ. विवीतेऽपि ' ख ' । ६ क. ङ. ' वत्संख्यं वि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 793

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सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः महोक्षोत्सृष्टपशवः सूतिकाऽऽगन्तुका च गौः यथार्पितान् पशून्गोपः सायं प्रत्यर्पयेत्तथा पालदोषविनाशे तु पाले दण्डो विधीयते ग्रामेच्छया गोपचारो भूमिराजवशेन वा धनुः शतं परीणाहो ग्रामक्षेत्रान्तरं भवेत् स्वं लभेतान्यविक्रीतं क्रेतुर्दोषोऽप्रकाशिते नष्टापहृतमासाद्य हर्तारं ग्राहयेन्नरम् विक्रेतुर्दर्शनाच्छुद्धिः स्वामी द्रव्यं नृपो दमम् आगमेनोपभोगेन नष्टं भाव्यमतोऽन्यथा हृतं प्रनष्टं यो द्रव्यं परहस्तादवाप्नुयात् ७८ ९ । पालो येषां तु ते मोच्या दैवराजपरिप्लुताः ॥१४ ॥

। प्रमादमृतनष्टांश्च प्रदाप्यः कृतवेतनः ॥१५ ॥

। अर्धत्रयोदशपणः स्वामिनो द्रव्यमेव च ॥१६ ॥

। द्विजस्तृणैधः पुष्पाणि सर्वतः सर्वदाऽऽहरेत् ॥१७ ॥

। द्वे शते खर्वटस्य स्यान्नगरस्य चतुःशतम् ॥१८ ॥

। हीनाद्रहो हीनमूल्ये वेलाहीने च तस्करः ॥ १ ९ ॥ । देशकालातिपत्तौ वा गृहीत्वा स्वयमर्पयेत् ॥२० ॥

। क्रेता मूल्यं समाप्नोति तस्माद्यस्तत्र विक्रयी ॥ २१ ॥

। पञ्चबन्धो दमस्तस्य राज्ञस्तेनाप्यभाविते ॥ २२ ॥

। अनिवेद्य नृपे दण्ड्यः स तु षष्णवतिं पणान् ॥२३ ॥

साँड़ ( देवता आदि के निमित्त ) छोड़े हुए पशु, बच्चा देनेवाली, अपने यूथ से भटक जानेवाली, रक्षकविहीन तथा दैव और राजा के द्वारा पीड़ित किये गये पशुओं को छोड़ देना चाहिए । प्रात: काल जिस दशा में पशु ग्वाले को दिये गये हों उन्हें उसी दशा में ( पशु - स्वामी को ) वापस कर देना चाहिए । सवेतन ग्वाले के प्रमाद से पशुओं के मर जाने या ( अन्य प्रकार से ) नष्ट हो जाने पर पशु - स्वामी को पशुओं का मूल्य दिलाना चाहिए । ग्वाले के ( प्रमाद आदि ) दोष से पशुओं के नष्ट होने पर ग्वाले के ऊपर साढ़े तेरह पणों का दण्ड लगता है और ( पशुओं के ) स्वामी को ( पशुओं के मूल्य के बराबर ) द्रव्य देना पड़ता है । गाँव ( वालों की ) इच्छा से या राजा की इच्छा से गोचारण के लिए भूमि का निर्धारण कर देना चाहिए ॥ १४-१७ ॥ ग्राम और क्षेत्र के बीच में सौ धनुष का अन्तर होना चाहिए, छोटे नगर और क्षेत्र के बीच दो सौ धनुष का अन्तर होना चाहिए और नगर तथा क्षेत्र के बीच में चार सौ धनुष का अन्तर होना चाहिए । किसी अन्य के द्वारा ( जो वास्तव में सम्पत्ति का स्वामी नहीं है ) बेची हुई सम्पत्ति को ( ( धन-स्वामी ) खरीदार से वापस ले सकता है, क्योंकि दोष उस खरीदार का होता है जो ( ऐसी सम्पत्ति को ) चुपचाप खरीद लेता है । दीन व्यक्ति से, चुपचाप बहुत कम मूल्य पर और कुसमय पर ( किसी वस्तु को ) खरीदनेवाला चोर ( समझा जाता ) है । खोयी अथवा चोरी गयी हुई वस्तु के खरीदार को चाहिए कि वह चुरानेवाले को पकड़वा दे । यदि देश और काल की बाधा के कारण ऐसा सम्भव न हो तो खरीदार को चाहिए कि वह ( चोर से खरीदे हुए ) इन धन को स्वयं ले जाकर ( वास्तविक ) धन - स्वामी को दे दे ॥१८-२० ॥ अनधिकृत रूप से बेचनेवाले का पता लग जाने पर अपराध की शुद्धि तब हो जाती है जब बेचनेवाले से ( वास्तविक ) धन - स्वामी को उसका धन प्रप्त हो जाय, राजा को दण्ड का धन प्राप्त हो जाय और खरीदनेवाले को ( मूल्य रूप में दिया हुआ ) उसका धन उपलब्ध हो जाय । खोयी हुई वस्तु के सम्बन्ध में ( अधिकार को ) उसके प्राप्ति - स्थान अथवा उपभोग के द्वारा सिद्ध करना चाहिए, अन्यथा उस वस्तु पर अधिकार सिद्ध करनेवाले व्यक्ति को राजा को ( उसके मूल्य का ) पञ्चमांश दण्ड रूप में देना पड़ता है । राजा को सूचित किये बिना ही जो व्यक्ति खोयी हुई अथवा चोरी गयी वस्तु को ले लेता १ ख. ग्रासेच्छ ' । २ छ. ' तः स्ववदा । ३ क. ङ. कर्तारं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 794

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७ ९ ० अग्निपुराणम् शौल्विकैः स्थानपालैर्वा नष्टापहृतमाहृतम् । पणानेकशफे दद्याच्चतुरः पञ्च मानुषे । स्वकुटुम्बाविरोधेन यं दारसुतादृते । प्रतिग्रहः प्रकाशः स्यात्स्थावरस्य विशेषतः 1 । दशैकपञ्चसप्ताहमासत्र्यहार्धमासिकम् अग्नौ सुवर्णमक्षीणं द्विपलं रजते शते । शते दशपला वृद्धिरौर्णे कार्पासिके तथा । कार्मिके रोमबद्धे च त्रिंशद्भागः क्षयो मतः । देशं कालं च भोगं च ज्ञात्वा नष्टे बलाबलम् । बलाद्दासीकृतश्चौरैर्विक्रीतश्चापि मुच्यते । है वह छियानबे पण के दण्ड का भागी होता है । खोयी अर्वाक्संवत्सरात्स्वामी लभते परतो नृपः ॥२४ ॥

महिषोष्ट्रगवां द्वौ द्वौ पादं पादमजाविके ॥ २५ ॥

नान्वये सति स्वस्वं देयं यच्चान्यसंश्रुतम् ॥२६ ॥

देयं प्रतिश्रुतं चैव दत्त्वा नापहरेत्पुनः ॥ २७ ॥

बीजायोवाह्यरत्नस्त्री दोह्यपुंसां प्रतीक्षणम् ॥ २८ ॥

अष्टौ त्रपुषि ( णि ) सीसे च ताम्रे पञ्चदशायसि ॥२९ ॥

मध्ये पञ्चपला ज्ञेया सूक्ष्मे ' तु त्रिपला मता ॥ ३० ॥

न क्षयो न च वृद्धिस्तु कौशेये वल्कलेषु च ॥ ३१ ॥

द्रव्याणां कुशला ब्रूयुर्यत्तद्दाप्यमसंशयम् ॥३२ ॥

स्वामिप्राणप्रदो २ भक्तत्यागान्निष्क्रयणादपि ॥३३ ॥

हुई या चोरी गयी जो वस्तु शुल्काधिकारियों अथवा स्थानरक्षकों को प्राप्त हो जाती है उसे एक वर्ष तक उसका स्वामी ले सकता है, किन्तु तदनन्तर उसे राजा ले लेता है ॥२१-२४ ॥ एक खुरवाले ( अश्व आदि ) के खोकर पुनः मिलने पर उसके स्वामी द्वारा ( राजा को उसकी रक्षा के लिए ) चार पण देने पड़ते हैं, मनुष्य के लिए पाँच, भैंस, ऊँट और गाय के लिए दो - दो तथा बकरे और भेंड़ों के लिए चौथाई - चौथाई पण देना पड़ता है । किसी को उतना ही धन देना चाहिए, जिससे अपने कुटुम्ब ( के हित ) का विरोध न हो, किन्तु स्त्री-पुत्र का दान नहीं करना चाहिए । जो परिवारहीन हो वह सब - कुछ दे सकता है, किन्तु किसी से प्रतिज्ञा किया हुआ धन अवश्य देना चाहिए । दी हुई वस्तु, विशेषतया स्थावर वस्तु को सबके सामने ही स्वीकार करना चाहिए, जिसे देने की प्रतिज्ञा की जाय उसे ( अवश्य ) देना चाहिए और देकर ( पुनः उस वस्तु को ) वापस नहीं लेना चाहिए ॥२५-२७ ॥ बीज, धातु, सवारी, रत्न, स्त्री, दूध देनेवाले पशु और मनुष्य ( के खरीदते समय उन ) के परीक्षण के लिए क्रमश: दस दिन, एक दिन, पाँच दिन, सात दिन, एक मास, तीन दिन और पन्द्रह दिन का समय रहता है । अग्नि में ( डालने से ) सोना नहीं घटता है, सौ पल चाँदी में दो पल घट जाते हैं, ( सौ पल ) टीन तथा सीसे में आठ पल, ताँबे में पाँच पल और लोहे में दस पल घट जाते हैं । ( तागे से वस्त्र बनाने पर माँड़ आदि लगाने के कारण ) ऊन तथा कपास के सौ पल भार के तागे में दस पल वृद्धि हो जाती है । मध्यम श्रेणी ( के वस्त्र ) में पाँच पल तथा सूक्ष्म ( वस्त्र ) में तीन पल वृद्धि हो जाती है । कामदार ( जड़ाऊ ) तथा रोम से बने हुए वस्त्र में ( कुल भार का एक तिहाई भाग ) घट जाता है, किन्तु रेशमी तथा वल्कल वस्त्रों में न तो क्षय होता है और न वृद्धि । किसी वस्तु के नष्ट हो जाने पर देश, काल, भोग और बलाबल को ध्यान में रखते हुए उसके कुशल ज्ञाता जितने क्षय का निश्चय करते हैं उतना देना ही पड़ता है - इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥२८-३२ ॥ जिसे बलपूर्वक दास बनाया गया हो, चोरों के द्वारा बेच दिया गया हो या जिसने अपने स्वामी प्राणों की रक्षा की हो वह ( दासता में जाने से लेकर स्वामी के ) उपयुक्त द्रव्य को अथवा ( स्वामी से लिये चुकाकर १ ख. सौम्ये । २ च. ' गात्तन्निष्क्रयाद ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 795

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सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७ ९ १ प्रव्रज्यावसितो राज्ञो दास आमरणान्तिकः कृतशिष्योऽपि निवसेत्कृतकालं गुरोर्गृहे राजा कृत्वा पुरे स्थानं ब्राह्मणान्यस्य तत्र तु निजधर्माविरोधेन यस्तु सामयिको भवेत् गणद्रव्यं हरेद्यस्तु संविदं लंघयेच्च यः कर्तव्यं वचनं सर्वैः समूहहितवादिनाम् ' समूहकार्यप्रहितो यल्लभेत्तत्तदर्पयेत् ( वेदज्ञाः शुचयोऽलुब्धाः भवेयुः कार्यचिन्तकाः श्रेणिनैगमपाषण्डिगणानामप्ययं विधिः गृहीतवेतनः कर्म त्यजन्द्विगुणमावहेत् । वर्णानामानुलोम्येन दास्यं न प्रतिलोमतः ॥ ३४ ॥

। अन्तेवासी गुरुप्राप्तभोजनस्तत्फलप्रदः ॥ ३५ ॥

। त्रैविद्यं वृत्तिमद्ब्रूयात्स्वधर्मः पाल्यतामिति ॥ ३६ ॥

। सोऽपि यत्नेन संरक्ष्यो धर्मो राजकृतश्च यः ॥ ३७ ॥

। सर्वस्वहरणं कृत्वा त्वं राष्ट्राद्विप्रवासयेत् ॥३८ ॥

। यस्तत्र विपरीतः स्यात्स दाप्यः प्रथमं दमम् ॥३९ ॥

। एकादशगुणं दाप्यो यद्यसौ नार्पयेत्स्वयम् ॥४० ॥

। कर्तव्यं वचनं तेषां समूहहितवादिनाम् ) ॥४१ ॥

। भेदं चैषां नृपो रक्षेत्पूर्ववृत्तिं च पालयेत् ॥४२ ॥

। अगृहीते समं दाप्यो भृत्यै रक्ष्य उपस्करः ॥४३ ॥

गये ) धन को चुकाकर मुक्त कर दिया जाता है । संन्यास को छोड़कर राजा की दासता में आया हुआ व्यक्ति मरण-पर्यन्त राजा का दास बना रहता है । दासता वर्णों के अनुलोमक्रम से होती है, प्रतिलोमक्रम से नहीं । शिल्प ( आदि कार्यों ) में पारंगत हो जाने पर भी शिष्य को पूर्वनिर्धारित समय तक गुरु के घर में रहना चाहिए और अपने शिल्प आदि का फल अपने गुरु को देते रहना चाहिए ॥ ३३-३५ ॥ राजा को अपने नगर में ( गृह आदि ) स्थान बनाकर वहाँ ब्राह्मणों को बसा देना चाहिए । फिर उन्हें जीविका से सम्पन्न करके उनसे यह कहना चाहिए कि वे अपने धर्म का पालन करते रहें । अपने धर्म के अनुकूल रहते हुए उस धर्म का यत्नपूर्वक पालन करते रहना चाहिए जो सामयिक अथवा राजा के द्वारा निर्धारित किया गया हो । जो गण के द्रव्य का अपहरण करता है, अथवा ( राजा तथा समाज के साथ की गयी ) सन्धि का उल्लंघन करता है, उसका सर्वस्व हरण करके उसे राष्ट्र से निष्कासित कर देना चाहिए । सब लोगों के हित की बात करनेवालों की बात का पालन सभी को करना चाहिए । जो उसके विपरीत कार्य करता है उसे प्रथम साहस का दण्ड दिया जाता है ॥३६-३९ ॥ समूह के कार्य के लिए भेजे जाने पर ( सेवक को ) जो-जो वस्तु प्राप्त हो, उसे अपने स्वामी को दे देना चाहिए । जो स्वामी स्वयं इस प्रकार से प्राप्त वस्तु को नहीं दे देता है, उससे वस्तु का ग्यारह गुना दिलाया जाता है । सामूहिक कार्यकर्त्ताओं को वेदज्ञ, पवित्र, लालचरहित तथा निर्धारित कार्य का ( सतत ) चिन्तन करनेवाला होना चाहिए । ऐसे सार्वजनिक कार्यकर्त्ताओं की बात सबको माननी चाहिए । यही नियम श्रेणि, नैगम और पाखण्डियों के लिए भी होता है । राजा को उसके पृथक् - पृथक् भेदों को सुरक्षित रखना चाहिए तथा उनकी परम्परा से चली आनेवाली वृत्ति की भी रक्षा करते रहना चाहिए ॥४०-४२ ॥ किसी कार्य के लिए वेतन लेकर उस काम को छोड़ देने पर वेतन से दुगुना धन ( दण्ड रूप में ) देना पड़ता है । बिना वेतन लिये ( किन्तु कार्य करना स्वीकार कर लेने पर ) कार्य न करने पर वेतन के समान दण्ड दिया जाता है । नौकरों के द्वारा ( साधनरूप में प्राप्त होनेवाले ) उपकरणों की रक्षा करनी चाहिए । जो व्यक्ति बिना पारिश्रमिक निश्चित किये हुए १ ख. ग. छ. शिल्पोऽपि । २ ख. तेषां । ३ ग. छ. ' दिभिः । य ' । ४ वेदज्ञाः समूहहितवादिनाम् ङ. पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 796

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७ ९ २ अग्निपुराणम् दाप्यस्तु दशमं भागं वाणिज्यपशुसस्यतः देशं कालं च योऽतीयात्कर्म कुर्याच्च योऽन्यथा यो यावत्कुरुते कर्म तावत्तस्य तु वेतनम् अराजदैविकं नष्टं भाण्डं दाप्यस्तु वाहकः प्रक्रान्ते सप्तमं भागं चतुर्थं पथि संत्यजन् ग्लहे शतिकवृद्धेस्तु समिकः पञ्चकं शतम् । स सम्यक्पालितो दद्याद्राज्ञे भागं यथाकृतम् प्राप्ते नृपतिना भागे प्रसिद्धे धूर्तमण्डले द्रष्टारो व्यवहाराणां साक्षिणश्च त एव हि द्यूतमेकमुखं कार्यं तस्करज्ञानकारणात् । अनिश्चित्य भृतिं यस्तु कारयेत्स महीक्षिता ॥४४ ॥

। तत्र तु स्वामिनश्छन्दोऽधिकं देयं कृतेऽधिके ॥४५ ॥

। उभयोरप्यसाध्यं चेत्साध्ये कुर्याद्यथाश्रुतम् ॥४६ ॥

। प्रस्थानविघ्नकृच्चैव प्रदाप्यो द्विगुणां भृतिम् ॥४७ ॥

। भृतिमर्धपथे सर्वां प्रदाप्यस्त्याजकोऽपि च ॥ ४८ ॥

गृह्णीयाद्धर्तकितवादितराद्दशकं शतम् ॥४९ ॥

। जितमुद्ग्राहयेज्जेत्रे दद्यात्सत्यं वचः क्षमी ॥ ५० ॥

। जितं समभिके स्थाने दापयेदन्यथा न तु ॥ ५१ ॥

। राज्ञा सचिह्ना निर्वास्याः कूटाक्षोपधिदेविनः ॥५२ ॥

। एष एव विधिर्ज्ञेयः प्राणिद्यूते समाह्वये ॥५३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये सीमाविवादादिनिर्णयकथनं नाम सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५७ ॥

किसी से कुछ कर्म कराता है उसे राजा के द्वारा वाणिज्य, पशु अथवा धान्य का दसवाँ भाग ( पारिश्रमिक के रूप में ) दिलाना चाहिए । जो सेवक देश और काल का अतिक्रमण करता है तथा जो अन्यथा कार्य करता है ( और इस प्रकार अपने स्वामी को हानि पहुँचाता है ) उसे स्वामी अपनी इच्छानुसार पारिश्रमिक देता है ( न कि पूर्व निर्धारित पारिश्रमिक ) । किन्तु स्वामी का अधिक काम होने पर सेवक को अधिक पारिश्रमिक दिया जाना चाहिए ॥४३-४५ ॥ जो जितना काम करता है उसका उतना ही वेतन होता है । यदि कार्य सिद्ध न हो सके तो भी जितना कार्य चुका हो, उसे ध्यान में रखकर पूर्व निश्चयानुसार वेतन देना चाहिए । वह वाहकं जिससे कोई बर्तन नष्ट हो जाय और जिसमें कि राजा अथवा देव का कोई हाथ न हो तो उसके बर्तन का मूल्य दिलवाना चाहिए । यदि कोई व्यक्ति प्रस्थान में विघ्न उत्पन्न करे तो उससे वेतन का दूना धन दिलाना चाहिए । द्यूत ( आदि ) में सौ गुनी वृद्धि होने पर ( द्यूत ) सभा के स्वामी को धूर्त जुआड़ी से पाँच प्रतिशत लेना चाहिए और अन्य से दस प्रतिशत । जुआ खेलनेवाले की राजा के द्वारा रक्षा की जाती है इसलिए उसे राजा को उसका अंश देना चाहिए । उसे जीते हुए धन को विजेता से धन देकर निकाल देना चाहिए । और क्षमादान होने के कारण उसे सच बात कहनी चाहिए ॥४६-५० सभामण्डप में जहाँ राजा को उसका अंश प्राप्त हो चुका हो, जो प्रसिद्ध हो तथा जो प्रसिद्ध स्थान में हो वहाँ ( अनुचित ॥ ऐसे ढंग से ) जीता हुआ धन ( हारनेवालों को ) दिला देना चाहिए अन्यथा नहीं । ( द्यूत में उत्पन्न होनेवाले विवादों में ) निर्णायक तथा साक्षी वे ( जुआड़ी ) ही होते हैं । जाली पासे से जुआ खेलनेवाले राजा के द्वारा चिह्नाङ्कित से ) बहिष्कृत कर दिये जाने चाहिए । चोर ( आदि ) का पता लगाने के लिए द्यूत में एक ही प्रधान ( निरीक्षक करके ( राज्य चाहिए । प्राणवानों से खेले जानेवाले जुए के सम्बन्ध में भी यह नियम है ॥५१-५३ ) होना श्री अग्निमहापुराण में सीमाविवादादि निर्णय कथन नामक दो सौ सत्तावनवाँ ॥ अध्याय समाप्त ॥२५७ ॥

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पृष्ठ 797

अग्नि पुराण, पृष्ठ 797 का मूल पृष्ठ
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अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्ऽध्यायः ७ ९ ३ अथाष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः वाक्पारुष्यादिप्रकरणम् अग्निरुवाच सत्यासत्यान्यथास्तोत्रैर्न्यूनाङ्गेन्द्रियरोगिणाम् अभिगन्तास्मि । क्षेपं करोति चेद्दण्ड्यः पणानर्धत्रयोदश ॥ १ ॥

भगिनीं मातरं वा तवेति च । शपन्तं दापयेद्राजा पञ्चविंशतिकं अर्थोऽधमेषु द्विगुणः परस्त्रीषूत्तमेषु दमम् ॥२ ॥

च । दण्डप्रणयनं कार्यं वर्णजात्युत्तराधरैः ॥३ ॥

प्रातिलोम्यापवादेषु द्विगुणत्रिगुणा दमाः । वर्णानामानुलोम्येन तस्मादेवार्धहानितः॥४ ॥

बाहुग्रीवानेत्रसक्थिविनाशे वाचिके दमः । शस्तस्ततोऽधिकः पादनासाकर्णकरादिषु ॥५ ॥

अशक्तस्तु वदन्नेवं दण्डनीयः पणान्दश । तथा शक्तः प्रतिभुवं दद्यात्क्षेमाय तस्य तु ॥ ६ ॥

पतनीयकृते क्षेपे क्षेपे दण्डो दण्डो मध्यमसाहसः । उपपातकयुक्ते तु दाप्यः त्रैविद्यनृपदेवानां क्षेप प्रथमसाहसम् ॥७ ॥

उत्तमसाहसः । मध्यमो ज्ञातिपूगानां प्रथमो ग्रामदेशयोः ॥८ ॥

अध्याय २५८ वाक्पारुष्यादिप्रकरण अग्निदेव बोले- जो व्यक्ति सत्य, असत्य अथवा व्याजस्तुतियों के द्वारा ऐसे व्यक्ति का तिरस्कार करता है जो विकलांग, विकलेन्द्रिय अथवा रोगी हो तो उसके ऊपर साढ़े तेरह पणों का दण्ड देना चाहिए । उस व्यक्ति से राजा को पचीस पणों का दण्ड दिलवाना चाहिए, जो किसी व्यक्ति से यह कहता है कि “ मैं तुम्हारी माता अथवा बहन के साथ सहवास करूँगा । " जब यही अपराध अपने से अधम वर्णों के प्रति किया जाता है, परस्त्री अथवा अपने से उच्च वर्णों के प्रति किया जाता है तब दण्ड की मात्रा दुगुनी हो जाती है । ( संक्षेपतः ) दण्ड का निर्धारण वर्ण की उच्चता अथवा नीचता के आधार पर किया जाता है ॥१-३ ॥ अपने से उच्च जातिवाले को अपशब्द कहने पर दण्ड क्रमशः दुगुना और तिगुना होता है, किन्तु अपने से नीची जाति को अपशब्द कहने में दण्ड की मात्रा क्रमशः आधी - आधी होती जाती है । बाहु, ग्रीवा, नेत्र और जंघा को नष्ट करने की धमकी देने पर दण्ड की मात्रा सौ पण होती है किन्तु प्रायः नाक, कान और हाथ काटने की धमकी देने पर दण्ड की मात्रा इसकी आधी अर्थात् पचास पण होती है । यदि इस प्रकार की धमकी देनेवाला व्यक्ति बल में कम हो तो उसे दस पणों का दण्ड देना चाहिए किन्तु यदि इस प्रकार की धमकी देनेवाला शक्ति में अधिक हो तो उसे धमकी दिये जानेवाले व्यक्ति की रक्षा के लिए प्रतिभू प्रस्तुत करना चाहिए ॥४-६ ॥ किसी को पाप लगाने पर मध्यम साहस का दण्ड दिया जाता है और उपपातक का दोष लगाने पर प्रथम साहस के समान दण्ड होता है । ( ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद ) के विद्वानों के प्रति अपशब्द का प्रयोग करने पर उत्तम साहस का दण्ड दिया जाता है, जातियों के समूहों के प्रति अपशब्दों का प्रयोग करने पर मध्यम तथा ग्राम और देशवासियों के प्रति अपशब्द का प्रयोग करने पर प्रथम साहस का दण्ड १ क. ख. ङ. ' शे चाधिकोद ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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७ ९ ४ अग्निपुराणम् असाक्षिकहते चित्रैर्युक्तिभिश्चाऽऽगमेन च ।

भस्मपङ्करजःस्पर्शे दण्डो दशपणः स्मृतः ।

समेष्वेवं परस्त्रीषु द्विगुणस्तूत्तमेषु च ॥

विप्रपीडाकरं छेद्यमङ्गमब्राह्मणस्य तु ॥

उद्गूर्णे हस्तपादे तु दशविंशतिकौ दमौ । पादकेशांशुककरोल्लुञ्चनेषु पणान्दश । शोणितेन विना दुःखं कुर्वन्काष्ठादिभिर्नरः । करपाददतो भङ्गे छेदने कर्णनासयोः । चेष्टा भोजनवाग्रोधे नेत्रादिप्रतिभेदने । एकं घ्नतां बहूनां च यथोक्ताद्विगुणा दमाः ।

दुःखमुत्पादयेद्यस्तु स समुत्थानजं व्ययम् ।

द्रष्टव्यो व्यवहारस्तु कूटचिह्नकृताद्भयात् ॥१ ॥

अमेध्यपाणिनिष्ठयूतस्पर्शने द्विगुणः स्मृतः ॥ १० ॥

हीनेष्वर्धं दमो मोहमदादिभिरदण्डनम् ॥ ११ ॥

उद्गूर्णे प्रथमो दण्डः संस्पर्शे तु तदर्धकः ॥१२

|| १२ || ॥

परस्परं तु सर्वेषां शास्त्रे मध्यमसाहसः ॥१३ ॥

पीडाकर्षांशुकावेष्टपादाध्यासे शतं दमः ॥१४ ॥

द्वात्रिंशतं पणान्दाप्यो द्विगुणं दर्शनेऽसृजः ॥१५ ॥

मध्यो दण्डो व्रणोदभेदे मृतकल्पहते तथा ॥१६ ॥

कन्धराबाहुसक्थ्नां च भङ्गे मध्यमसाहसः ॥१७ ॥

कलहापहृतं देयं दण्डस्तु द्विगुणः स्मृतः ॥१८ ॥

दाप्यो दण्डं च यो यस्मिन्कलहे समुदाहृतः ॥१९ ॥

दिया जाता है । बिना साक्षी के प्रहार का विवाद उत्पन्न होने पर विवाद का निर्णय चिह्नों से, युक्ति से तथा जनश्रुति से करना चाहिए, क्योकि केवल चिह्न बनाये भी जा सकते हैं । किसी के ऊपर भस्म, कीचड़ अथवा धूल फेंकने पर दस पण का दण्ड दिया जाता है । किन्तु ( अश्व और श्लेष्मा आदि ) अमेध्य पदार्थों और धूल आदि फेंकने पर दण्ड की मात्रा उससे दुगुनी हो जाती है । यह नियम बराबरवालों के विरुद्ध किये गये अपराधों के सम्बन्ध में है । किन्तु यदि यही अपराध परस्त्री एवं उत्तम वर्णवालों के प्रति हो तो दण्ड की मात्रा दूनी हो जाती है । दण्ड की मात्रा आधी रह जाती है यदि अपराध अपने से हीन के प्रति किया गया हो । यदि यह अपराध मोह और मद आदि के कारण किया गया हो तो कोई दण्ड नहीं होता है । ७-११ ॥ विप्र को पीड़ित करनेवाले ब्राह्मणेतर जाति ( के अपराधी ) का अङ्ग काट देना चाहिए । यदि हाथ उठाया ही गया हो तो भी प्रथम साहस का दण्ड देना चाहिए । यदि अंग से स्पर्श मात्र किया गया हो तो दण्ड आधा रह जाता है । ( प्रहार करने के लिए ) हाथ और पैर उठाने पर क्रमशः दस और बीस पणों का दण्ड होता है किन्तु परस्पर शस्त्र को उठाने पर सभी ( वर्णों ) में मध्यम साहस का दण्ड दिया जाता है । किसी के चरणों, केशों और वस्त्र को घसीटने पर दस पण का दण्ड होता है । किन्तु किसी को वस्त्र से बाँधकर उसे दृढ़ता से दबाकर जो कोई चरणों से प्रहार करता है उसके ऊपर सौ पणों का दण्ड किया जाता है । बिना रक्त बहाये काष्ठ इत्यादि के द्वारा प्रहार करने पर बत्तीस पणों का दण्ड होता है किन्तु रक्त आ जाने पर दण्ड की मात्रा दुगुनी हो जाती है । हाथ, पैर और दाँत तोड़ देने पर तथा नाक कान काट लेने पर मध्यम साहस का दण्ड दिया जाता है । घाव को खोल देने पर तथा मृत्यु तुल्य प्रहार करने पर, भी यही दण्ड दिया जाता है ॥१२-१६ ॥ गति, भोजन और वाणी को अवरुद्ध करने, आँख आदि को फोडने और कन्धा जंघाओं के तोड़ने पर मध्यम साहस का दण्ड होता है । यदि एक ही व्यक्ति के ऊपर बहुत से व्यक्ति मिलकर, बाहु तथा करें उपर्युक्त दण्ड से दुगुना दण्ड देना चाहिए । कलह में जिस वस्तु का अपहरण प्रहार तो उन सबके ऊपर उसका दण्ड भी दूना होता है । कलह आदि में ताडन आदि से कर लिया जाता है उसे तो देना ही पड़ता है, को दुःख उत्पन्न करनेवाला उस ( व्रण आदि में होनेवाले ) व्यय तो देता ही है, साथ ही उस कलह - विशेष के लिए जो दण्ड निर्धारित किया गया है उसे भी देता है ॥१७-१९ ॥ , CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७ ९ ५ तरिकः स्थलजं शुल्कं गृह्णन्दण्ड्यः पणान्दश अभिघाते तथा भेदे छेदे कुड्यावपातने । दुःखोत्पादि गृहे द्रव्यं क्षिप्रन्प्राणहरं तथा दुःखे च शोणितोत्पादे शाखाङ्गच्छेदने तथा । लिङ्गस्य च्छेदने मृत्तौ ( त्यौ ) मध्यमो मूल्यमेव वा । प्ररोहिशाखिनां शाखास्कन्धसर्वविदारणे । यः साहसं कारयति स दाप्यो द्विगुणं दमम् ।

आर्याक्रोशातिक्रमकृद्भ्रातृभार्याप्रहारकः ।

सामन्तकुलिकादीनामपकारस्य कारकः ॥ ब्राह्मणप्रातिवेश्यानामेतदेव ' निमन्त्रणे ॥२० ॥

पणान्दाप्यः पञ्चदश विंशतिं ` तद्द्वयं तथा ॥२१ ॥

। षोडशाऽऽद्यः पणान्दाप्यो ' द्विगुणो मध्यमं दमम् ॥ २२ ॥

दण्डः क्षुद्रपशूनां स्याद्विपणप्रभृतिः क्रमात् ॥२३ ॥

महापशूनामेतेषु स्थानेषु द्विगुणा दमाः ॥२४ ॥

उपजीव्यद्रुमाणां तु विंशतेर्द्विगुणा दमाः ॥ २५ ॥

( " यस्त्वेवमुक्त्वाऽहं दाता कारयेत्स चतुर्गुणम्॥२६ ॥

( ' संदिष्टस्याप्रदाता च ' समुद्रगृहभेदक: ॥२७ ॥

' पञ्चाशत्पणिको दण्ड एषामिति विनिश्चयः ॥ २८ ॥

स्वच्छन्दविधवागामी विक्रुष्टेनाभिधावकः । अकारेण ( रणं? ) च विक्रोष्टा चाण्डालश्चोत्तमान्स्पृशन् ॥२९ ॥

१ ° शूद्र ( " प्रव्रजितानां च दैवे पै ( पित्र्ये च भोजक: । अयुक्तं शपथं कुर्वन्नयोग्यो योग्यकर्मकृत् ॥ ३० ॥

नाव आदि पर कर लेने का अधिकारी यदि स्थल पर लगनेवाले कर को ले लेता है तो उसे दस पण दण्ड देना पड़ता है । यही दण्ड तब दिया जाता है जब ( श्राद्ध आदि उपयुक्त अवसरों पर ) ब्राह्मणों या पड़ोसियों को निमन्त्रण न दिया जाय । दीवाल पर प्रहार करने के लिए, उसमें छेद करने या उसे तोड़ने के लिए और उसे गिरा देने के लिए क्रमशः पाँच, दस और बीस पण का दण्ड दिया जाता है । साथ ही, ( उसे पुनः बनाने में होनेवाला ) व्यय भी दिलाया जाता है । ( किसी के ) घर में दुःख को उत्पन्न करनेवाले तथा प्राणी नाशक द्रव्य को फेंकने पर प्रथम अपराध के लिए षोडश पणों का दण्ड दिया जाता है, किन्तु यदि यही अपराध दूसरी बार किया जाता है तो मध्यम साहस का दण्ड दिया जाता है । रक्त को बहानेवाले ( व्रण आदि ) दुःख को उत्पन्न करने पर तथा छोटे - छोटे पशुओं की ( सींग आदि ) शाखाओं या उनके अङ्गों को काटने पर ( अपराध के अनुसार ) क्रमशः दो पणों से प्रारम्भ करके दण्ड दिया जाता है । ( छोटे पशु के ) लिङ्ग को काटने पर या उसे मार डालने पर मध्यम साहस का दण्ड या केवल ( पशु का ) मूल्य ही दिलाना चाहिए किन्तु बड़े - बड़े पशुओं के सम्बन्ध में यही अपराध होने पर दुगुना दण्ड हो जाता है । जिन वृक्षों की शाखाओं से अङ्कुर फूटते हैं उनकी शाखाओं, स्कन्धों या समूल नष्ट करने पर और उपजीव्य वृक्षों का उन्मूलन करने पर बीस पण और उससे दुगुना दण्ड होता है ॥ २० - २५ ॥ जो ' साहस ' कराता है उसके ऊपर ( साहस करनेवाले से ) दुगुना दण्ड किया जाता है । जो व्यक्ति “ मैं तुम्हें कुछ दूँगा ” ऐसा कहकर किसी से ' साहस ' कराता है उसे ( साहस करनेवाले से ) चौगुना दण्ड देना चाहिए । आर्यजनों की निन्दा करनेवाला, भाई की पत्नी का अपहरण करनेवाला, प्रतिज्ञा करके ( किसी वस्तु को ) न देनेवाला और सामन्तों तथा कुलीनों आदि का अपहरण करनेवाला पचास पणों के दण्ड का भागी होता है - यह नियम है । स्वच्छन्दतापूर्वक विधवागामी, ( सहायतार्थ ) पुकारे जाने पर ( सहायता के लिए ) दौड़ न पड़नेवाला, अकारण ( सहायतार्थ ) पुकारनेवाला, उत्तम वर्णों का स्पर्श करनेवाला चाण्डाल, दैव १ छ. ‘ देवानि ’ । २ छ. तत्त्रयं । ३ क. ङ. क्षिप्रप्राण । ४ ख. ग. च. छ. द्वितीयो । ५ यस्त्वेव चतुर्गुणम् च. पुस्तके नास्ति । ६ छ. ° रदः । सं ° । ७ संदिष्ट भेदकः क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ८ ख. ' द्रगृह । ९ पञ्चाशत् धावकः च.पुस्तके नास्ति । १० क. ख. ग. छ. शूद्रः प्र । ११ प्रव्रजितानां वृषशूद्र च. पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 800

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७ ९ ६ अग्निपुराणम् वृषशूद्रपशूनां च पुंस्त्वस्य प्रतिघातकृत् । पितापुत्रस्वसृभ्रातृदंपत्याचार्यशिष्यकाः वसानस्त्रीन्पणान्दण्ड्यो नेजकस्तु परांशुकम् तुलाशासनमानानां कूटकृन्नाणकस्य च अकूटं कूटकं ब्रूते कूटं यश्चाप्यकूटकम् भिषमिथ्याऽऽचरन्दाप्यस्तिर्यक्षु प्रथमं दमम् अबध्यं यश्च बध्नाति बध्यं यश्च प्रमुञ्चति मानेन तुलया वाऽपि योंऽशमष्टमकं हरेत् भेषजस्नेहलवणगन्धधान्यगुडादिषु संभूय कुर्वतामर्यं सबाधं कारुशिल्पिनाम् राजनि स्थाप्यते योऽर्थः प्रत्यहं तेन विक्रयः स्वदेशपण्ये तु शतं वणिग्गृह्णीत पञ्चकम् साधारणस्यापलापी दासीगर्भविनाशकृत् ॥३१ ॥

। एषामपतितान्योन्यत्यागी च शतदण्डभाक् ॥ ३२ ॥

। ' विक्रयापक्रियादानयाचितेषु पणान्दश ॥३३ ॥

। एभिश्च व्यवहर्ता यः स दाप्यो दण्डमुत्तमम् ॥ ३४ ॥

। स नाणकपरीक्षायां दाप्यः प्रथमसाहसम् ॥३५ ॥

। मानुषे मध्यमं राजमानुषेषूत्तमं तथा ॥ ३६ ॥

। अप्राप्तव्यवहारं च स दाप्यो दममुत्तमम् ॥ ३७ ॥

। द्वाविंशतिपणा ' ( न्दाप्योवृद्धौ हानौ च कल्पितम् ॥३८ ॥

पण्येषु प्रक्षिपन्हीनं पणा ) न्दाप्यस्तु षोडश ॥ ३ ९ ॥ । अर्थस्य ह्रासं वृद्धिं वा सहस्त्रो दण्ड उच्यते ॥ ४० ॥

। क्रयो वारे विक्रयस्तस्माद्वणिजां लाभकृत्स्मृतः ॥४१ ॥

। दशकं पारदेश्ये तु यः सद्यः क्रयविक्रयी ॥४२ ॥

और पितृकार्यों में शूद्रों और संन्यासियों को भोजन करानेवाला, असत्य शपथ खानेवाला, अयोग्य होते हुए भी किसी योग्य कर्म को करनेवाला, शूद्रों, बैलों तथा अन्य पशुओं के पुंस्त्व को नष्ट करनेवाला, सार्वजनिक सम्पत्ति का अपहरण करनेवाला, दासी के गर्भ का विनाश करनेवाला और पिता, पुत्र, बहन, भाई, दम्पति, आचार्य तथा शिष्यों के अनुपयुक्त अवसर पर एक - दूसरे को छोड़ देनेवाला सौ पणों के दण्ड का भागी होता है ॥ २६-३२ ॥ दूसरों के वस्त्रों को धारण करनेवाला धोबी तीन पणों के दण्ड का भागी होता है, किन्तु यदि वह दूसरों के वस्त्रों को बेच देता है, बन्धक रख देता है अथवा माँगने पर उधार दे देता है तो वह दस पणों के दण्ड का भागी होता है । जो व्यक्ति नकली तुला, शासन ( पत्र ), नापने की वस्तुओं और सिक्कों को बनाता है अथवा जो व्यक्ति इनको व्यवहार में लाता है, वे दोनों ही उत्तम साहस के दण्ड के भागी होते हैं । वह सिक्कों की परीक्षा करनेवाला जो सच्चे सिक्के को झूठा बतलाता है अथवा जो झूठे को सच्चा बतलाता है, वह भी उत्तम साहस के दण्ड का भागी होता है ॥३३-३५ ॥ वैद्य यदि पक्षियों की चिकित्सा में असावधानी करे तो वह प्रथम साहस के दण्ड का भागी होता है । साधारण मनुष्यों की चिकित्सा में असावधानी करने पर मध्यम साहस के दण्ड का भागी होता है और राजपुरुषों की चिकित्सा में ऐसा करने पर उत्तम साहस के दण्ड का भागी होता है । जो अबध्य पुरुष को बाँधता है, अथवा बध्य पुरुष को निर्णय के पूर्व ही छोड़ देता है, वह उत्तम साहस के दण्ड का भागी होता है । यह दण्ड ( वस्तु की ) वृद्धि अथवा हानि के अनुपात में न्यूनाधिक हो सकता है । ओषधि, तेल, नमक, सुगन्धित पदार्थ, अन्न तथा गुड़ आदि में निकृष्ट वस्तु को मिलाने पर सोलह पणों का दण्ड दिया जाता है ॥३६-३९ ॥ ( राजा के द्वारा निर्धारित मूल्य में ) वृद्धि अथवा हास को जानते हुए भी जो व्यापारी ( लोभवश ) शिल्पकारों आदि को पीड़ित करने के लिए वस्तुओं का दूसरा ही मूल्य लेने लगते हैं, वे एक हजार पणों के दण्ड के भागी होते हैं । राजा के द्वारा जो मूल्य निर्धारित कर दिया जाता है उसी के अनुसार ( वस्तुओं का ) विक्रय होना ही बेची चाहिए जा । उसी मूल्य के द्वारा किया गया क्रय - विक्रय बनियों के लिए लाभकारी माना गया है । जो वस्तु तुरन्त सके, वह यदि देशी हो तो उस पर पाँच प्रतिशत लाभ लिया जा सकता है । वही वस्तु यदिविदेशी १ छ. “ यावक्रयाधान ’ । २ न्दाप्यो पणा क. पुस्तके नास्ति । ३ क. ङ. च. छ. वा निस्रवस्त ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA