अग्नि पुराण — पृष्ठ 781–790

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 781–790

पृष्ठ 781

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चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७७७ भ्रातॄणामथ दम्पत्योः पितुः पुत्रस्य चैव हि दर्शने प्रत्यये दाने प्रातिभाव्यं विधीयते दर्शनप्रतिभूर्यत्र मृतः प्रात्ययिकोऽपि वा बहवः स्युर्यदि स्वांशैर्दद्युः प्रतिभुवो धनम् प्रतिभूर्दापितो यत्र प्रकाशं धनिनो धनम् ससंततिस्त्रीपशव्यं धान्यं द्विगुणमेव च आधिः प्रणश्येद्द्विगुणे धने यदि न मोक्ष्यते गोप्याधिभोगिनो वृद्धिः सोपकारेऽथ भाविते के लिए तथा जुए के लिए लिया हो । पुत्रों को वह धन । प्रातिभाव्यमृणं साक्ष्यमविभक्तेन च स्मृतम् ॥१२ ॥

। आधौ तु वितथे दाप्या वितथस्य सुता अपि ॥१३ ॥

। न तत्पुत्रा धनं दद्युर्दानाय समुपस्थिताः ॥१४ ॥

। एकच्छायाश्रितेष्वेषु धनिकस्य यथारुचि ॥१५ ॥

। द्विगुणं प्रतिदातव्यमृणिकैस्तस्य तद्भवेत् ॥१६ ॥

। वस्त्रं चतुर्गुणं प्रोक्तं रसश्चाष्टगुणस्तथा ॥१७ ॥

। काले ' कालकृतो नश्येत्फलभोग्यो न नश्यति ॥ १८ ॥

। नष्टो देयो " विनष्टश्च दैवराजकृतादृते ॥१९ ॥

भी नहीं चुकाना पड़ता है जो पिता के ऊपर किये गये दण्ड में शेष रह गया हो या व्यर्थ में ही लिया गया हो । भाइयों, दम्पतियों तथा पिता - पुत्रों के द्वारा संयुक्त रूप से लिये गये ऋण में एक-दूसरे का प्रतिभू ( जमानत करनेवाला ) तथा साक्षी हुआ करता है ॥८-१२ ॥ प्रतिभू के तीन प्रयोजन होते हैं - दर्शन, प्रत्यय और दान । अनधिकृत वस्तु को आधिरूप में रखनेवाले व्यक्ति के पुत्रों को भी ऋण चुकाना पड़ता है । दर्शन और प्रत्यय के लिए जो प्रतिभू होते हैं उनके मरने पर ( और ऋण के वापस न होने की स्थिति में ) उनके पुत्रों को ऋण चुकाना नहीं पड़ता है, किन्तु जो प्रतिभू ऋण को वापस करने का दायित्व अपने ऊपर लेते हैं उनके मरने के बाद उनके पुत्रों को ऋण चुकाना पड़ता है । जहाँ एक ऋण लेनेवाले के लिए ( संयुक्त रूप से ) अनेक प्रतिभू होते हैं वहाँ ( ऋणकर्त्ता के द्वारा ऋण वापस न करने पर ) सभी प्रतिभू अपने - अपने अंश ( के ऋण ) को वापस करने के लिए उत्तरदायी हुआ करते हैं । किन्तु जहाँ एक ऋणकर्त्ता के लिए ( अलग - अलग ) अनेक प्रतिभू हों वहाँ ऋण देनेवाला अपनी इच्छानुसार किसी भी प्रतिभू से अपने धन को वापस ले सकता है । जहाँ पर किसी प्रतिभू को सबके सामने ऋणकर्त्ता. के स्थान में ऋण चुकाना पड़ता है वहाँ ऋण लेनेवालों से प्रतिभू को उसके ऊपर दिये गये धन का दुगुना धन दिलवाना चाहिए ॥१३-१६ ॥ ( आधि के रूप में रखी हुई ) स्त्रियों अथवा पशुओं की सन्तान को छुड़ाने के लिए दुगुना, वस्त्रों को छुड़ाने के लिए चौगुना और रसों को छुड़ाने के लिए आठ गुना धन देना पड़ता है । ऋण में दिया हुआ मूल धन बढ़ते - बढ़ते यदि दुगुना हो जाय तो आधि पर ऋणकर्त्ता का अधिकार समाप्त हो जाता है । यदि कोई आधि विशेष अवधि के लिए रखी गयी हो तो उस अवधि की समाप्ति होते ही आधि पर उसके स्वामी का अधिकार समाप्त हो जाता है; किन्तु यदि कोई आधि ऐसी हो जिसके फल का उपभोग किया जा सके तो उस पर उसके स्वामी का अधिकार कभी भी समाप्त नहीं होता है । ऐसी आधि पर कोई भी ब्याज नहीं लगता है जिसका उपयोग किया जाता रहा हो या जिससे ऋण देनेवाला कोई लाभ प्राप्त करता रहा हो । दैवयोग से अथवा राजा के किसी से नष्ट हुई अथवा खोयी हुई आधि के अतिरिक्त अन्य किसी आधि के खो जाने पर उसे ( उसके स्वामी को ) लौटाना पड़ता १ छ. ॰णं ग्राह्यम ' । २ ख. ग. छ. ' घुर्दानाय ये स्थि ' । ३ ग. छ. धनिने । ४ छ. कालकृतं । ५ ङ. विशिष्टश्च । ६ क. ' श्च देशकालो विभाव्यते । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 782

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७७८ अग्निपुराणम् आधेः स्वीकरणात्सिद्धी रक्ष्यमाणोऽप्यसारताम् । चरित्रं बन्धककृतं सवृद्धं दापयेद्धनम् । उपस्थितस्य मोक्तव्य आधिर्दण्डोऽन्यथा भवेत् । तत्कालकृतमूल्यो वा तत्र तिष्ठेदवृद्धिकः । यदा तु द्विगुणीभूतमृणमाधौ तदा खलु । व्यसनस्थमनाख्याय हस्ते ऽन्यस्य र तदर्पयेत् । न दाप्योऽपहृतं तत्तु राजदैवततस्करैः ।

आजीवन्स्वेच्छ्या दण्ड्यो दाप्यस्तच्चापि सोदयम् ।

यातश्चेदन्य आधेयो धनभाग्वा धनी भवेत् ॥ २० ॥

सत्यंकारकृतं द्रव्यं द्विगुणं प्रतिपादयेत् ॥ २१ ॥

प्रयोजके सति धनं कुलेऽन्यस्याऽऽधिमाप्नुयात् ॥२२ ॥

विना धारणकाद्वाऽपि विक्रीणीते ससाक्षिकम् ॥२३ ॥

मोच्यश्चाऽऽधिस्तदुत्पाद्यः प्रविष्टे द्विगुणे धने ॥ २४ ॥

द्रव्यं तदौपनिधिकं प्रतिदेयं तथैव तत् ॥२५ ॥

प्रेषश्चेन्मार्गिते दत्ते दाप्यो दण्डश्च तत्समः ॥२६ ॥

याचितावाहितन्यासे निक्षेपेष्वप्ययं विधिः ॥ २७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये व्यवहारकथनं नाम चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५४ ॥

है । जैसे ही ( ऋणदाता के द्वारा ) आधि स्वीकार कर ली जाती है वैसे ही व्यवहारपूर्ण हो जाता है । यदि ऋणदाता के द्वारा ( सम्यक् प्रकार से ) रक्षा करने के बाद भी आधि नष्ट हो जाय तो ऋण लेनेवाले को या तो दूसरी वस्तु आधि के रूप में रख देनी चाहिए अन्यथा ऋण देनेवाले को उसका धन वापस कर देना चाहिए ॥१७-२१ ॥ आधि रखनेवाले व्यक्ति को चाहिए कि ऋण को वापस करके आधि को वापस करने के लिए आये हुए ऋणकर्त्ता को आधि वापस कर दे, अन्यथा ऋणदाता दण्ड का भागी होता है । यदि आधि रखनेवाला ( उत्तमर्ण ) उपस्थित न हो ( अर्थात् मर गया हो ) तो ऋण लेनेवाला ( देय ) धन को उस ( उत्तमर्ण ) के कुल को सौंपकर आधि वापस ले सकता है अथवा आघि का तत्कालीन मूल्य निकाल लिया जाता है और तदनन्तर उसके ऊपर ब्याज लगना बन्द हो जाता है । यदि ( आधि को छुड़ाने के समय ) ऋणकर्ता उपस्थित न हो ( अर्थात् मर गया हो या विदेश चला गया हो ) तो ऋण देनेवाले को साथियों के सामने आधि को बेच देना चाहिए । यदि आधि रखने के समय इस प्रकार समझौता हो कि ( ब्याज के सहित ) मूलधन के द्विगुणित हो जाने पर ही ऋण देनेवाला आधि का उपभोग कर सकता है तो जैसे ही आधि से इतना लाभ हो जाय जो मूलधन के दुगुने के समान हो, तो आधि को वापस कर देना चाहिए ॥२२-२४३ ॥ उस आधि द्रव्य को औपनिधिक कहते हैं जिसमें ( चोरी हो जाने इत्यादि का ) भय रहता है और जिस ( के वास्तविक रूप ) को बताये बिना ही ऋणदाता को दे दिया जाता है । उस आधि को ( ऋण का धन प्राप्त करने पर ) उस रूप में वापस कर देना चाहिए । यदि इस प्रकार की आधि राजा अथवा दैव के द्वारा नष्ट हो जाय या उसे चोर चुरा ले तो उसे वापस नहीं करना पड़ता है; किन्तु यदि ऋण देनेवाला ऋणकर्त्ता से ( ऋण देने के लिए ) इस प्रकार की आधि को माँगकर उसे वापस करते समय ऋणदाता को परेशान करे तो वह आघि के समान दण्ड का भागी हुआ करता है । यदि कोई ऋणदाता इस प्रकार की आधि से जान - बूझकर कोई लाभ प्राप्त करे तो वह या उसके उत्तराधिकारी दण्ड के भागी होते हैं । यही नियम न्यास अथवा निक्षेप के विषय में भी है ॥ २५-२७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में व्यवहारकथन नामक दो सौ चौवनवाँ अध्याय समाप्त ॥२५४ ॥

१ क. ' लु । मेध्यश्चा ' । २ क. दुत्पन्ने द्वि । ३ क. ख. ङ. छ. ॰स्य यद ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 783

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पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७७ ९ अथ पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः दिव्यप्रमाणकथनम् अग्निरुवाच तपस्विनो दानशीलाः कुलीनाः सत्यवादिनः पञ्चयज्ञक्रियायुक्ताः साक्षिणः पञ्च वा भयः स्त्रीवृद्धबालकितवमत्तोन्मत्ताभिशस्तकाः ' । ` पतिताप्तार्थसंबन्धिसहायरिपुतस्कराः उभयानुमतः साक्षी भवत्येकोऽपि धर्मवित् राज्ञा सर्वं प्रदाप्यः स्यात्षट्चत्वारिंशकेऽहनि स कूटसाक्षिणां पापैस्तुल्यो दण्डेन चैव हि ये पातककृतां लोका महापातकिनां तथा तान्सर्वान्समवाप्नोति यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ॥ धर्मप्रधाना ऋजवः पुत्रवन्तो धनान्विताः ॥१ ॥

। यथाजाति यथावर्णं सर्वे सर्वेषु वा स्मृताः ॥२ ॥

रङ्गावतारिपाषण्डिकूटकृद्विकलेन्द्रियाः ॥३ ॥

। असाक्षिणः सर्वसाक्ष्ये चौर्यपारुष्यसाहसे ॥४ ॥

। अब्रुवन्हि नरः साक्ष्यमृणं स दशबन्धकम् ॥५ ॥

। न ददाति हि यः साक्ष्यं जानन्नपि नराधमः ॥ ६ ॥

। साक्षिणः श्रावयेद्वादिप्रतिवादिसमीपगान् ॥७ ॥

। अग्निदानां च ये लोका ये च स्त्रीबालघातिनाम् ॥८ ॥

सुकृतं यत्त्वया किंचिज्जन्मान्तरशतैः कृतम् ॥९ ॥

अध्याय २५५ दिव्यप्रमाणकथन अग्निदेव बोले - किसी अभियोग में पाँच या तीन व्यक्तियों की आवश्यकता होती है । उन साक्षियों को तपस्वी, दानशील, कुलीन, सत्यवादी, धर्मात्मा, सीधा - सादा, पुत्रवान्, धनी और पंच महायज्ञों का करनेवाला होना चाहिए । साक्षियों को ( वादी तथा प्रतिवादी को ) समान जाति या वर्ण का होना चाहिए अथवा सभी जातियों के ( वादी - प्रतिवादी ) में सभी जाति के साक्षी रह सकते हैं । स्त्री, वृद्ध, बालक, धूर्त, प्रमत्त, उन्मत्त, व्यभिचारी, नट, पाखंडी, छली, अंगहीन, पतित, पक्षपाती, लोभी तथा चोर - ये लोग साक्षी नहीं हो सकते हैं, किन्तु चोरी तथा साहस के अपराधों में ( ये ) सभी लोग साक्षी हो सकते हैं । दोनों पक्षों की सहमति से एक धार्मिक व्यक्ति को ही साक्षी बनाया जा सकता है । साक्ष्य के लिए प्रस्तुत किया गया व्यक्ति यदि साक्षी बनने से इन्कार करे तो उससे छियालीस दिनों के अन्दर ही ऋण का वह पूरा धन लेना चाहिए, जिस पर ब्याज की दर दस प्रतिशत ( तक ) हो ॥१-५३ ॥ जो दुष्ट व्यक्ति ( वास्तविकता को ) जानते हुए भी साक्षी नहीं देता है वह उतने ही दण्ड और पाप का भागी होता है जितने का झूठी गवाही देनेवाला । वादी और प्रतिवादी के सम्मुख ही साक्षी को यह कहकर सुना देना चाहिए कि यदि तुम झूठी गवाही दोगे तो तुम्हें उन्हीं लोकों में जाना पड़ेगा जहाँ पातकियों, महापातकियों, आग लगानेवालों, स्त्रीहत्या तथा बालहत्या करनेवालों को जाना पड़ता है । यदि तुम झूठ बोलोगे तो तुम्हारे वे सभी पुण्य नष्ट हो जायँगे जिन्हें तुमने सैकड़ों १ क. ङ. ' काः । लाक्षाव ' । २ ग. प्ताश्च सं । छ. ' प्तान्नसं । ३ छ. सर्वसाक्षी । ४ क. ङ. ' क्ष्ये धैर्यपा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 784

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७८० अग्निपुराणम् तत्सर्वं तस्य जानीहि यं पराजयसे मृषा गुणिद्वैधे तु वचनं ग्राह्यं ये गुणवत्तराः अन्यथा वादिनो यस्य ध्रुवस्तस्य पराजयः द्विगुणा वान्यथा ब्रूयुः कूटाः स्युः पूर्वसाक्षिणः विवादाद्विगुणं ' दण्डं विवास्यो ब्राह्मणः स्मृतः स दाप्योऽष्टगुणं दण्डं ब्राह्मणं तु विवासयेत् यः कश्चिदर्थोऽभिमतः स्वरुच्या तु परस्परम् समामासतदर्धाहर्नामजातिस्वगोत्रकैः समाप्तेऽर्थे ऋणी नाम स्वहस्तेन निवेशयेत् साक्षिणश्च स्वहस्तेन पितृनामकपूर्वकम् अलिपिज्ञ ऋणी यः स्याल्लेखयेत्स्वमतं तु सः । द्वैधे बहूनां वचनं समेषु गुणिनां तथा ॥१० ॥

। यस्योचुः साक्षिणः सत्यां प्रतिज्ञां स जयी भवेत् ॥११ ॥

। उक्तेऽपि साक्षिभिः साक्ष्ये यद्यन्ये गुणवत्तराः ॥१२ ॥

। पृथक्पृथग्दण्डनीयाः कूटकृत्साक्षिणस्तथा ॥१३ ॥

। यः साक्ष्यं श्रावितोऽन्येभ्यो निह्नुते तत्तमोवृतः ॥१४ ॥

। वर्णिनां हि वधो यत्र तत्र साक्ष्येऽनृतं वदेत् ॥ १५ ॥

। लेख्यं तु साक्षिमत्कार्यं तस्मिन्धनिकपूर्वकम् ॥१६ ॥

। सब्रह्मचारिकात्मीयपितृनामादिचिह्नितम् ॥१७ ॥

। मतं मेऽमुकपुत्रस्य यदत्रोपरि लेखितम् ॥ १८ ॥

। अत्राहममुकः साक्षी लिखेयुरिति ते समाः ॥ १ ९ ॥ । साक्षी वा साक्षिणाऽन्येन सर्वसाक्षिसमीपतः ॥ २० ॥

जन्म - जन्मान्तरों में संचित किया है । साक्षियों की बातों में दुविधा होने पर अधिक साक्षियों की बात को मानना चाहिए ॥६-१० ॥ यदि दोनों पक्षों की ओर साक्षियों की संख्या समान हो तो उनमें उन लोगों की बात माननी चाहिए जो अधिक गुणवान् हों । जहाँ पर गुणवान् साक्षियों में भी दुविधा हो वहाँ पर जो अधिक गुणवान् हो उसकी बात माननी चाहिए । विजय उसी की होती है जिसके ( द्वारा प्रस्तुत ) साक्षी सत्य प्रतिज्ञा करनेवाले हुआ करते हैं । जिसके साक्षी असत्य भाषण करते हैं, उनकी पराजय निश्चित ही होती है । साक्षियों की गवाही हो चुकने पर विशिष्ट विद्वान् लोग या पूर्व साक्षियों की अपेक्षा दूने अन्य लोग ( पूर्व साक्षियों से ) भिन्न बात कहें तो पूर्व साक्षियों को झूठी गवाही देनेवाला समझना चाहिए और उन झूठी गवाही देनेवालों को पृथक् - पृथक् दण्ड देना चाहिए । ऐसी परिस्थिति में यदि कोई साक्षी विवाद करे तो दुगुना दण्ड देना चाहिए । इन्हीं परिस्थितियों में यदि यही कार्य कोई ब्राह्मण जातीय साक्षी करे तो उसे देश से निष्कासित कर देना चाहिए । जो व्यक्ति गवाही देने के लिए बुलाये जाने पर छिप जाता है, वह आठ गुने दण्ड का भागी होता है, किन्तु ऐसा करनेवाला ब्राह्मण तो देश से बहिष्कृत ही कर दिया जाता है । ( यदि सत्य बोलने से ) ब्राह्मणों के वध की शंका हो तो झूठी गवाही भी दी जा सकती है ॥११-१५ ॥ ( उत्तमर्ण और अधमर्ण में ) परस्पर जिस ( हिरण्यादि ) अर्थ ( लेन - देन का ) निश्चय स्वेच्छा से किया जाय उसे साक्षियों के सामने लेखबद्ध कर लेना चाहिए । लेख में उत्तमर्ण का नाम पहले आना चाहिए । उस ( लेख में ) वर्ष, मास, पक्ष, दिन, ( दोनों के ) नाम, जाति, गोत्र, सतीर्थ तथा पिता के नाम आदि का उल्लेख होना चाहिए । इस प्रकार ( लेख ) पूर्ण हो जाने पर ऋणी को अपने हाथ से यह लिखना चाहिए कि ' ऊपर जो कुछ लिखाया गया है वह मेरा मत है, जो मैं अमुक का पुत्र हूँ । ' साक्षी भी अपने हाथ से अपने - अपने पिता के नाम के सहित इस प्रकार उल्लेख करे कि ' इसमें अमुक नामवाला मैं साक्षी हूँ । ' साक्षियों की संख्या समान होनी चाहिए ॥१६-१९ ॥ यदि ऋण लेनेवाला लिखना न जानता हो तो उसे अपना मत ( किसी दूसरे से ) लिखवा देना चाहिए । ( ऋणी अथवा १ क. ख. ङ. द्रव्यं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 785

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पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७८१ उभयाभ्यर्थितेनैतन्मया ह्यमुकसूनुना विनापि साक्षिभिर्लेख्यं स्वहस्तलिखितं च यत् ऋणं लेख्यकृतं देयं पुरुषैस्त्रिभिरेव तु देशान्तरस्थे दुर्लेख्ये नष्टोन्मृष्टे हृते तथा संदिग्धार्थविशुद्ध्यर्थं स्वहस्तलिखितं तु यत् लेख्यस्य पृष्ठेऽभिलिखेत्प्रविष्टमधमर्णिनः दत्वर्णं पाटयेल्लेख्यं शुद्धयै चान्यत्तु कारयेत् तुलाग्न्यापो विषं कोषो दिव्यानीह विशुद्धये रुच्या वाऽन्यतरः कुर्यादपरो वर्तयेच्छिरः नाऽऽसहस्राद्धरेत्फालं न तुलां न विषं तथा सहस्त्रार्थे तुलादीनि कोषमल्पेऽपि दापयेत् । लिखितं ह्यमुकेनाति ' लेखकोऽन्ते ततो लिखेत् ' ॥ २१ ॥

। तत्प्रमाणं स्मृतं सर्वं बलोपधिकृतादृते ॥२२ ॥

। आधिस्तु भुज्यते तावद्यावत्तन्न प्रदीयते ॥ २३ ॥

। भिन्ने छिन्ने तथा दग्धे लेखमन्यत्तु कारयेत् ॥२४ ॥

। युक्तिप्राप्तिक्रियाचिह्नसंबन्धागमहेतुभिः ॥२५ ॥

। धनी चोपगतं दद्यात्स्वहस्तपरिचिह्नितम् ॥२६ ॥

। साक्षिमच्च भवेद्यत्तु तद्दातव्यं ससाक्षिकम् ॥२७ ॥

। महाभियोगेष्वेतानि शीर्षकस्थेऽभियोक्तरि ॥ २८ ॥

। विनाऽपि शीर्षकात्कुर्यान्नृपद्रोहेऽथ पातके ॥ २ ९ ॥ । नृपार्थेष्वभियोगेषु वहेयुः शुचयः सदा ॥ ३० ॥

। शतार्थं दापयेच्छुद्धमशुद्धो दण्डभाग्भवेत् ॥३१ ॥

साक्षी के लिए ) लिखनेवाले को ( लेख के ) अन्त में यह लिख देना चाहिए कि ( उत्तमर्ण और अधमर्ण ) दोनों की प्रार्थना से अमुक का पुत्र अमुक नामवाले मैंने इसे लिखा है । साक्षियों के बिना भी वह लेख प्रमाण माना जायगा जो अपने हाथ से लिखा गया हो किन्तु जिसमें बल तथा छल आदि का प्रयोग न किया गया हो । लेख के आधार पर लिया गया ऋण भी ( ऋणी की ) तीन पीढ़ियों के द्वारा ही देय हुआ करता है किन्तु जब तक ऋण समाप्त नहीं हो जाता है तब तक ( उत्तमर्ण के द्वारा ) आधि का भोग किया जाता है ॥२०-२३ ॥ यदि लेख कहीं दूसरे स्थान पर हो, अस्पष्ट हो, नष्ट हो गया हो, मिट गया हो, चोरी चला गया हो, छिन्न - भिन्न हो गया हो या जल गया हो तो उसके स्थान पर दूसरा लेख लिखवाना चाहिए । किसी लेख के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न हो जाने पर युक्ति, प्राप्ति, क्रिया, चिह्न, सम्बन्ध और आगम के द्वारा सन्देह का निराकरण किया जा सकता है । जितने - जितने ऋण का भुगतान होता रहे उसका उल्लेख ऋणी के द्वारा लेख के पृष्ठ भाग पर होना चाहिए या उत्तमर्ण को ही उस ( लेख ) के पीछे अपने हाथ से प्राप्त धन का उल्लेख करते रहना चाहिए । ऋण चुका देने पर लेख को फाड़ देना चाहिए या प्रमाण के लिए ( धनिक ) से दूसरा लेख लिखवा लेना चाहिए । साक्षियों के सम्मुख लिया गया ऋण साक्षियों के सम्मुख ही चुकाना चाहिए ॥ २४-२७ ॥ ( किसी अभियोग की ) परिशुद्धि के लिए जो दिव्य प्रमाण माने गये हैं, वे हैं- तुला, अग्नि, जल, विष और कोष । किन्तु इनका प्रयोग तभी होता है जब कोई गम्भीर अभियोग हो, और अभियोक्ता चोटी पर ( अर्थात् चतुर्थ पाद में पहुँच गया हो ) । ( वादी और प्रतिवादी में ) कोई एक अपनी इच्छा से दिव्य प्रमाण का प्रयोग कर सकता है और दूसरे को इसका परिणाम स्वीकार करना होगा । राजद्रोह तथा ( अन्य ) पातक में ( वादी और प्रतिवादी में ) एक के स्वीकार न करने पर भी दूसरा इसका प्रयोग कर सकता है । एक हजार ( पण ) से कम के अभियोग में हल, तुला तथा विष के दिव्य प्रमाणों को स्वीकार नहीं करना चाहिए । किन्तु राजा से सम्बद्ध अभियोगों में सदैव पवित्र होकर दिव्य प्रमाणों का प्रयोग करना चाहिए । एक सहस्र ( पण ) के लिए तुला इत्यादि का तथा उससे कम में अर्थात् पचास ( पण ) तक कोष के प्रमाण का प्रयोग करना चाहिए । इन प्रमाणों की अशुद्धता पर इनका प्रयोग करनेवाला दण्ड का भागी होता है ॥२८-३१ ॥ वस्त्रों से १ क. ख. ङ. लेखितार्थास्ततो । छ. लेखकोऽर्थांस्ततो । २ क. नयेत् । ३ छ. ' लोपाधि । ४ ख. ज्ञेयं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 786

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७८२ अग्निपुराणम्

सचेलस्नातमाहूय सूर्योदय उपोषितम् । कारयेत्सर्वदिव्यानि नृपब्राह्मणसन्निधौ ॥३२ ॥

तुलास्त्रीबालवृद्धान्धपङगुब्राह्मणरोगिणाम् । अग्निर्जलं वा शूद्रस्य यवाः सप्तविषस्य वा ' ॥ ३३ ॥

तुलाधारणविद्वद्भिरभियुक्तस्तुलाश्रितः ' । प्रतिमानसमीभूतो रेखां ' कृत्वाऽवतारितः ' ॥ ॥३४ ३४ ॥ ॥ आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च, द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभे च त्वं तुले सत्यधामाऽसि पुरा देवैर्विनिर्मिता यद्यस्मि पापकृन्मातस्ततो मां त्वमधो नय करौ विमृदितव्रीहेर्लक्षयित्वा ततो न्यसेत् त्वमेव सर्वभूतानामन्तश्चरसि पावक तस्येत्युक्तवतो लौहं पञ्चाशत्पलिकं ' समम् तमादाय सप्तैव मण्डलानि शनैर्व्रजेत् संध्ये, ' धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥३५ ॥

। सत्यं वदस्व कल्याणि संशयान्मा विमोचय ॥३६ ॥

। शुद्धश्चेद्गमयोर्ध्वं मां तुलामित्यभिमन्त्रयेत् ॥ ३७ ॥

। सप्ताश्वत्थस्य पत्राणि तावत्सूत्रेण वेष्टयेत् ॥ ३८ ॥

। साक्षिवत्पुण्यपापेभ्यो ब्रूहि सत्यं करे मम ॥३९ ॥

। अग्निवर्णं न्यसेत्पिण्डं हस्तयोरुभयोरपि ॥ ४० ॥

। षोडशाङ्गुलकं ज्ञेयं मण्डलं तावदन्तरम् ॥४१ ॥

युक्त, स्नान किये हुए तथा उपवास करनेवाले व्यक्ति को सूर्योदय के समय बुलाकर राजा तथा ब्राह्मण के सामने ही सभी दिव्य प्रमाणों का प्रयोग करवाना चाहिए । स्त्री, बालक, वृद्ध, अन्धे, लँगड़े, ब्राह्मण तथा रोगी के लिए तुला का, क्षत्रिय के लिए अग्नि का, वैश्य के लिए जल का तथा शूद्र के लिए सात सौ की तौल के विष का दिव्य प्रमाण होता है । तुला धारण में कुशल व्यक्तियों के द्वारा अभियुक्त को तुला पर बिठलाकर, समान भार से उसे तौलकर, वहीं पर एक रेखा बनाकर उसे तुला से उतार लिया जाता है । सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, द्युलोक, भूमि, जल, हृदय, यम, दिन, रात्रि, दोनों सन्ध्याएँ और धर्म - ये सब मनुष्य के चरित्र को जानते हैं ॥३२-३५ ॥ तदनन्तर तुला को इस प्रकार अभिमन्त्रित करना चाहिए - ' अयि तुले! देवताओं ने प्राचीन काल में तुम्हारा निर्माण किया था, तुम सत्य के निवास - स्थान हो । अयि कल्याणि! सत्य बोलो और मुझे संशय से छुड़ाओ । अयि मातः! यदि मैं पापकर्म करनेवाला हूँ तो तुम मुझे नीचे ले जाओ किन्तु यदि मैं शुद्ध हूँ तो तुम मुझे ऊपर ले चलो । ' जिस व्यक्ति ने अपने हाथों से धान्यों को मला हो उसके हाथों को चिह्नित करके उनमें पीपल के सात पत्तों को रखकर उतने ही धागों से तुम्हें लपेट देना चाहिए ॥३६-३८ ॥ अये पावक! आप सभी प्राणियों के अन्तःकरण में विचरण किया करते हैं, इसलिए मेरे हाथ में रहकर साक्षी के समान मेरे पाप - पुण्यों को बतला दीजिये - इस प्रकार अग्नि को अभिमन्त्रित करके दोनों हाथों में पचास पलिक भार के तथा अग्नि के समान लाल लोहे के गोले को रख लेना चाहिए । दिव्य प्रमाण के प्रयोग करनेवाले को इस गोले को लेकर धीरे - धीरे सात मण्डल तक जाना चाहिए । प्रत्येक मण्डल सोलह अंगुल ( व्यास ) का होता है तथा दो मण्डलों के बीच में उतना ही ( सोलह अंगुल ) का अन्तर रहता है । तदनन्तर अग्नि को छोड़कर ( हाथों से ) धान्य मलकर यदि वह व्यक्ति जलता नहीं है तो वह ( ऋण आदि से ) शुद्धि १ क. च.। २ च. “ लास्थितः । ३ क. ङ. लीला । ख. ग. लेखं । ४ च. ' त्वा विभावितः । ५ क. धर्मो हि जा । ६ क. तथा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 787

अग्नि पुराण, पृष्ठ 787 का मूल पृष्ठ
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पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ७८३ मुक्त्वाऽग्निं मृदितव्रीहिरदग्धः शुद्धिमाप्नुयात् पवित्राणां पवित्र त्वं शोध्यं शोधय पावन नाभिदध्नोदकस्थस्य ` गृहीत्वोरू जलं विशेत् यदि तस्मिन्निमग्नाङ्गं पश्येच्चेच्छुद्धिमाप्नुयात् त्रायस्वास्मादमीशापात्सत्येन भव मेऽमृतम् यस्य वेगैर्विना जीर्णं शुद्धिं तस्य विनिर्दिशेत् " संश्राव्य पाययेत्तस्माज्जलात्तु प्रसृतित्रयम् व्यसनं जायते घोरं स शुद्धः स्याद ( " संशयम् देवतागुरुपादाश्च इष्टापूर्तकृतानि च इत्यादिमहापुराण आग्नेये दिव्यप्रमाणकथनं । अन्तरा पतिते पिण्डे संदेहे वा पुनर्हरेत् ॥४२ ॥

। सत्येन माऽभिरक्षस्व ' वरुणेत्यभिशस्तकम् ॥४३ ॥

। समकालमिषु मुक्तमानीयाद्यो जवान्नरः ' ॥ ४४ ॥

। त्वं विष ब्रह्मणः पुत्र सत्यधर्मे व्यवस्थितम् ॥४५ ॥

। एवमुक्त्वा विषं साङ्गं भक्षयेद्धिमशैलजम् ॥४६ ॥

। देवानुग्रान्समभ्यर्च्य तत्स्नानोदकमाहरेत् ॥४७ ॥

। आ चतुर्दशमादह्रो यस्य नो राजदैविकम् ॥४८ ॥

। सत्यवाहनशस्त्राणि गोबीजकनकानि च ॥४९ ॥

। इत्येते सुकराः प्रोक्ताः शपथाः स्वल्प ) संशये ॥ ५० ॥

नाम पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५५ ॥

प्राप्त कर लेता है । यदि लोहे का गोला बीच में ही गिर जाय या कुछ सन्देह उत्पन्न हो जाय तो उसे ( लौह पिण्ड को ) फिर से ( हाथ में रखकर ) ले जाना पड़ता है ॥ ३ ९ -४२ ॥ अये पावन! आप पवित्रों में पवित्र हैं, मैं शुद्धि योग्य हूँ, अतः आप मुझे शुद्ध कर दीजिये । अये वरुण! आप सत्य से मेरी रक्षा कीजिये - इस प्रकार जिस जल को अभिमन्त्रित किया जा चुका है उस जल में प्रवेश करना चाहिए तथा वहाँ पर नाभि तक गहरे जल में खड़े हुए व्यक्ति की दोनों जङ्घाओं को पकड़ लेना चाहिए । जो व्यक्ति उसी समय छोड़े गये को वेग से जाकर ले आता है और दिव्य प्रमाण का प्रयोग करनेवाला जल में निमग्न होते हुए ही उसे देख लेता है तो वह ( ऋण आदि से ) शुद्धि प्राप्ति कर लेता है । अये विष! आप ब्रह्म के पुत्र हैं तथा सत्य और धर्म में व्यवस्थित हैं ॥४३ - ४५ ॥ " आप इस अभियोग से हमारी रक्षा कीजिये । ( मेरे ) सत्य के कारण आप मेरे लिये अमृत बन जाइये । " ऐसा कहकर हिमालय पर उत्पन्न होनेवाले साङ्ग नामक विष का भक्षण कर लेना चाहिए । जो व्यक्ति बिना विष के फैलाव के उसे पचा ले उसे ( ऋण आदि से ) शुद्ध समझना चाहिए । ( दुर्गा और आदित्य आदि ) उग्र देवताओं को पहले जल से स्नान करवाना चाहिए, तत्पश्चात् उस जल को अभिमन्त्रित करके उससे तीन अञ्जलि जल पीना चाहिए । यह जल पीने के चौदह दिनों तक जिसके ऊपर राजा अथवा देवताओं के द्वारा उत्पन्न विपत्ति नहीं आ पड़ती है तो उसे निश्चय ही ( ऋण आदि से ) शुद्ध माना जाता है । ( किसी अपराध का ) थोड़ा - सा संशय उत्पन्न होने पर उस संदिग्ध व्यक्ति से शपथ लेकर सत्य कहलाना चाहिए अथवा अपनी शुद्धता को सिद्ध करने के लिए किसी सवारीवाले पशु, गाय, शस्त्र, बीज, स्वर्ण, देवता तथा गुरु के चरण और ( मन्दिर तथा तालाब आदि ) इष्टापूर्तिकर्मों का स्पर्श करवाना चाहिए ॥४६-५० ॥ श्री अग्निमहापुराण में दिव्यप्रमाण कथन नामक दो सौ पचपनवाँ अध्याय समाप्त ॥२५५ ॥

१ ख. ग. ' भिजाप्यक ' । २ क. ख. ग. ' त्वोरुज । ३ क. ङ. च. छ. जवीनरः । ४ क. ङ. छ. शार्ङ्ग । ५ क. संस्राव्य । ६ क. ङ. च. ' शकाद ' । ७ संशयम् “ स्वल्प च. पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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७८४ अग्निपुराणम् अथ षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः दायविभागकथनम् अग्निरुवाच विभागं चेत्पिता कुर्यादिच्छ्या विभजेत्सुतान् । ज्येष्ठं वा श्रेष्ठभागेन सर्वे वा स्युः समाशिनः || १ || यदि दद्यान्समानंशान्कार्याः पल्यः समाशिकाः । न दत्तं स्त्रीधनं यासां भर्त्रा वा श्वशुरेण वा || २ || शक्तस्यानीहमानस्य किंचिद्दत्त्वा पृथक् क्रिया । न्यूनाधिकविभक्तानां धर्म्यश्च पितृतः कृतः || ३ || विभजेयुः सुताः पित्रोरूर्ध्वमृक्थमृणं समम् । मातुर्दुहितरः शेषमृणात्ताभ्य ऋतेऽर्पयेत् ॥४ ॥

पितृद्रव्यविनाशेन यदन्यत्स्वयमर्जयेत् । मैत्रमौद्वाहिकं चैव दायादानां न तद्भवेत् ॥५ ॥

सामान्यार्थसमुत्थाने विभागस्तु समः स्मृतः । अनेकपितृकार्याणां ’ पितृतोभागकल्पना ॥६ ॥

भूर्या पितामहोपात्ता निबन्धो द्रव्यमेव वा । तत्र स्यात्सदृशं स्वाम्यं पितुः पुत्रस्य चोभयोः ॥७ ॥

विभक्तेषु सुतो जातः सवर्णायां विभागभाक् । दृश्याद्वा तद्विभागः स्यादायव्ययविशोधितात् ॥८ ॥

क्रमादभ्यागतं द्रव्यं हृतमभ्युद्धरेच्च यः । दायादेभ्यो न तद्दद्याद्विद्यया लब्धमेव च ॥ ९ ॥

अध्याय २५६ दायविभागकथन अग्निदेव बोले - यदि ( सम्पत्ति ) का विभाजन पिता करे तो वह अपनी इच्छा से पुत्रों का विभाजन कर सकता है । वह यदि चाहे तो ज्येष्ठ पुत्र को श्रेष्ठ भाग दे अथवा सबको समान अंश ही दे । यदि पुत्रों को समान अंश दिया जाय तो उन पत्नियों को भी समान भाग देना चाहिए, जिन्हें अपने पति अथवा श्वशुर को स्त्रीधन प्राप्त न हुआ हो । शक्तिशाली ( धनोपार्जन में समर्थ ) तथा ( पितृधन की ) इच्छा न रखनेवाले पुत्र को थोड़ा - बहुत देकर ही विभाजन हो सकता है । पिता के द्वारा ( पुत्रों को ) दिया गया न्यूनाधिक अंश भी धर्मसम्मत हुआ करता है । पिता की मृत्यु के अनन्तर पुत्रों को उसकी सम्पत्ति तथा ऋण दोनों को समान रूप से विभाजित कर लेना चाहिए । माता की सम्पत्ति से ऋण को निकालकर शेष धन पुत्रियाँ प्राप्त कर लेती हैं और उनके अभाव में ( पुत्रादि को ) दे दिया जाता है ॥१-४ ॥ पितृधन के व्यय किये बिना ही जो धन स्वयं उपार्जित किया जाता है, मित्रों से प्राप्त होता है या विवाह में प्राप्त होता है उसमें दायादों का भाग नहीं होता है । जो धन सामान्य लागत से अर्जित किया जाता है उसमें सबका समान अंश होता है । अनेक पिताओं की सन्तान में ( उन ) पिताओं ( की सम्पत्ति धन की के अनुसार ही सम्पत्ति का विभाजन होता है । पितामह से प्राप्त भूमि निबन्ध और ( सोना, चाँदी आदि ) द्रव्य ) पुत्र दोनों का समान अधिकार होता है । पुत्रों में विभाजन हो जाने के बाद सवर्ण पत्नी में पिता और का अधिकारी होता है । यह विभाग उसी घन से होता है जो आय - व्यय की शुद्धि के से उत्पन्न होनेवाला पुत्र भी विभाग प्राप्त किन्तु ( अन्य लोगों के द्वारा ) अपहृत जो धन किसी पुत्र के द्वारा पुनः अनन्तर शेष रह जाता है । परम्परा से विद्या के कारण प्राप्त होता है, उसे दायादों को नहीं देना प्राप्त कर लिया जाता है तथा जो धन उसे अपनी होता है ॥५ - ९ ॥ माता - पिता के द्वारा जो धन जिसे दे दिया जाता १ क. ङ. च. स्मृतः । २ ख. ग. छ. ' काणां तु पि । ३ क. ङ. ' रेत्तु यः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः पितृभ्यां यस्य यद्दत्तं तत्तस्यैव धनं भवेत् असंस्कृतास्तु संस्कार्या भ्रातृभिः पूर्वसंस्कृतैः चतुस्त्रिद्व्येकभागाः स्युर्वर्णशो ब्राह्मणात्मजाः अन्योन्यापहृतं द्रव्यं विभक्ते यत्तु दृश्यते अपुत्रेण परक्षेत्रे नियोगोत्पादितः सुतः औरसो धर्मपत्नीजस्तत्समः पुत्रिकासुतः गृहे प्रच्छन्न उत्पन्नो गूढजस्तु सुतः स्मृतः अक्षतायां क्षतायां वा जातः पौनर्भवः सुतः क्रीतश्च ताभ्यां विक्रीतः कृत्रिमः स्यात्स्वयं कृतः उत्सृष्टो गृह्यते यस्तु सोऽपविद्धो भवेत्सुतः । सजातीयेष्वयं प्रोक्तस्तनयेषु मया विधिः । ७८५ । पितुरूर्ध्वं विभजतां माताऽप्यंशं समं हरेत् ॥१० ॥

। भगिन्यश्च निजादंशाद्दत्त्वांऽशं तु तुरीयकं ॥ ११ ॥

। क्षत्रजास्त्रिद्वयेकभागा विड्जास्तु द्वयेकभागिनः ॥१२ ॥

। तत्पुनस्ते समैरंशैर्विभजेरन्निति स्थितिः ॥१३ ॥

। उभयोरप्यसावृक्थी पिण्डदाता च धर्मतः ॥ १४ ॥

। क्षेत्रजः क्षेत्रजातस्तु सगोत्रेणेतरेण वा ॥१५ ॥

। कानीनः कन्यकाजातो मातामहसुतो ' मतः ॥ १६ ॥

। दद्यान्मातापिता वा यं स पुत्रो दत्तको भवेत् ॥१७ ॥

। दत्तात्मा तु स्वयं दत्तो गर्भे ' विन्नः सहोढजः ॥१८ ॥

पिण्डदोंऽशहरश्चैषां पूर्वाभावे परः परः ॥१९ ॥

जातोऽपि दास्यां शूद्रस्य कामतोंऽशहरो भवेत् ॥२० ॥

है, वह धन उसी का होता है, किन्तु पिता की मृत्यु के बाद विभाजन होने पर माता भी समान अंश प्राप्त कर लेती है । ( पिता के जीवनकाल में ) जिन पुत्रों का ( यज्ञोपवीत आदि ) संस्कार नहीं हो सका हो उनका संस्कार उन पुत्रों के द्वारा किया जाना चाहिए, जिनका संस्कार हो चुका हो । बहनों ( के विवाह आदि ) का संस्कार भाइयों को अपना - अपना चतुर्थांश देकर करना चाहिए । ब्राह्मणों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि स्त्रियों ) से उत्पन्न ( ब्राह्मण आदि ) पुत्र अपने - अपने वर्ण के अनुसार क्रमशः चार, तीन, दो, एक भाग प्राप्त करते हैं । उसी प्रकार क्षत्रिय के पुत्र वर्ण के अनुसार क्रमशः तीन, दो और एक भाग प्राप्त करते हैं तथा वैश्य के पुत्र वर्णक्रम से दो और एक भाग के अधिकारी होते हैं । विभाजन के समय किसी पुत्र के द्वारा जो धन चुरा लिया गया हो, किन्तु बाद में जिसका पता चल गया हो वह धन सभी पुत्रों में समान रूप से विभाजित कर दिया जाता है - यह नियम है ॥१०-१३ ॥ पुत्रहीन व्यक्ति के द्वारा नियोग ( प्रथा ) से अन्य की स्त्री में उत्पन्न पुत्र दोनों ( व्यक्तियों ) की सम्पत्ति का अधिकारी होता है तथा दोनों का पिण्डदान भी कर सकता है । धर्मपत्नी से जो पुत्र उत्पन्न होता है उसे औरस पुत्र कहते हैं । कन्या का पुत्र ( दौहित्र ) भी उसी ( औरस ) के तुल्य है । सगोत्री या परगोत्री द्वारा दूसरे की स्त्री में जो पुत्र उत्पन्न होता है, उसे ‘ क्षेत्रज ' कहते हैं । घर में प्रच्छन्न रूप से उत्पन्न होनेवाला पुत्र ' गूढज ' कहलाता है । अक्षतयोनि ( अविवाहिता ) कन्या से उत्पन्न होनेवाले पुत्र को कानीन कहते हैं । वह अपने मातामह का पुत्र माना जाता है । छतयोनि ( विवाहिता ) कन्या से उत्पन्न होनेवाले पुत्र को पौनर्भव कहते हैं । माता - पिता के द्वारा किसी दूसरे को दे दिया गया पुत्र दत्तक कहलाता है ॥१४-१७ ॥ माता - पिता के द्वारा खरीदा हुआ पुत्र विक्रीत कहलाता है । स्वयं ( किसी प्रकार से ) प्राप्त पुत्र कृत्रिम कहलाता है । जो पुत्र स्वयं अपने - आपको दे देता है वह ' स्वयं दत्त ' होता है । अज्ञातगर्भा स्त्री से विवाह करने के उपरान्त उसके गर्भ में उत्पन्न होनेवाला पुत्र सहोढज कहलाता है, अपने माता - पिता के द्वारा परित्यक्त होकर जो पुत्र किसी अन्य के द्वारा पुत्ररूप में स्वीकार कर लिया जाता है, उसे ‘ अपविद्ध ' कहते हैं । इन पुत्रों में पूर्व के अभाव में ही उसके बाद में आनेवाला पिण्डदान करने तथा सम्पत्ति का अधिकारी होता है । यह विधान सजातीय पुत्रों के सम्बन्ध में ही कहा गया है । किसी दासी से उत्पन्न होनेवाला शूद्र का पुत्र भी उसकी इच्छानुसार ( सम्पत्ति में ) भाग का अधिकारी होता है ॥१८-२० ॥ पिता के मर जाने पर सब भाइयों १ क. ङ. गिन्याश्च । २ ख. ग. पकृतं । ३ ख. यतः । ४ क. ङ. वाऽपि स । ५ छ. वित्तः । ५० CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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७८६ अग्निपुराणम् मृते पितरि कुर्युस्तं भ्रातरस्त्वर्धभागिकम् । पत्नीदुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा । एषामभावे पूर्वः स्याद्धनभागुत्तरोत्तरः । वानप्रस्थयतिब्रह्मचारिणामृक्थभागिनः । संसृष्टिनस्तु संसृष्टी सोदरस्य तु सोदरः । अन्योदर्यस्तु संसृष्टी नान्योदर्यधनं हरेत् । पतितस्तत्सुतः क्लीबः पङ्गुरुन्मत्तको जडः । औरसाः क्षेत्रजास्त्वेषां निर्दोषा भागहारिणः । अपुत्रा योषितश्चैषां भर्तव्या साधुवृत्तयः पितृमातृपतिभ्रातृदत्तमध्यग्न्युपागतम् । बन्धुदत्तं तथा शुल्कमन्वाधेयकमेव च अभ्रातृको हरेत्सर्वं दुहितृणां सुतादृते ॥२१ ॥

तत्सुतो गोत्रजो बन्धुः शिष्यः सब्रह्मचारिणः ॥ २२ ॥

स्वर्यातस्य ह्यपुत्रस्य सर्ववर्णेष्वयं विधिः ॥ २३ ॥

क्रमेणाऽऽचार्य सच्छिष्यधर्मभ्रात्रेकतीर्थिनः ॥२४ ॥

दद्याच्चापहरेच्चांशं जातस्य च मृतस्य च ॥ २५ ॥

असंसृष्ट्यपि चाऽऽदद्यात्सोदर्यो नान्यमातृजः ॥२६ ॥

अन्धोऽचिकित्स्यरोगाद्या भर्तव्यास्तु निरंशकाः ॥ २७ ॥

सुताश्चैषां प्रभर्तव्या यावद्वै भर्तृसात्कृताः ॥२८ ॥

। निर्वास्या व्यभिचारिण्यः प्रतिकूलास्तथैव च ॥ २ ९ ॥ आधिवेदनिकं चैव स्त्रीधनं परिकीर्तितम् ॥ ३० ॥

। अप्रजायामतीतायां बान्धवास्तदवाप्नुयुः ॥३१ ॥

को दासी पुत्र को भी अपने अंश का आधा भाग देना चाहिए । जिस दासी पुत्र का कोई भाई न हो तथा उसके पिता का दौहित्र भी न हो वह अपने पिता के सम्पूर्ण धन का अधिकारी होता है । सभी वर्गों में पुत्रहीन मृत्यु को प्राप्त होनेवाले पिता की सम्पत्ति के विभाजन का क्रम यह है -पत्नी, पुत्रियाँ, माता - पिता, भाई, भतीजा, सगोत्रज, बन्धु, शिष्य और सतीर्थ्य । इसमें पहले के अभाव में ही दूसरा धन का अधिकारी होता है । सभी वर्गों में पुत्रहीन के मरने पर यही विधान है ॥२१-२३ ॥ वानप्रस्थ, संन्यासी तथा ब्रह्मचारी की सम्पत्ति के अधिकारी क्रमशः आचार्य, सत्शिष्य, धर्मभ्राता और सहपाठी होते हैं । संसृष्टि ( दायादी बँटवारा हो जाने के बाद मित्रतावश पुनः अपने - अपने धन में परस्पर सम्पर्क स्थापित करनेवाले भाई ) का उत्तराधिकारी संसृष्टि और सहोदर भाई का उत्तराधिकारी सहोदर होता है । इसी प्रकार ( विभाजन के बाद उत्पन्न होनेवाले ) संसृष्टी या सहोदर का अपना अंश देना पड़ता है । सहोदर संसृष्टी असहोदर संसृष्टी के धन का अधिकारी नहीं हो सकता है । सोदर यदि असंसृष्टी भी हो तो भी सम्पत्ति पाने का अधिकारी होता है किन्तु अन्य माता से उत्पन्न होनेवाला असंसृष्टी सम्पत्ति का अधिकारी नहीं होता है । पतित, उसका पुत्र, नपुंसक, पशु, उन्मत्त, जड़, अन्ध, असाध्य रोगी ऐसे व्यक्ति दाय " के अधिकारी तो नहीं होते हैं, किन्तु उन्हें भरण - पोषण का अधिकार होता है । इन ( पतित आदि ) के औरस तथा क्षेत्रज पुत्रों में यदि ( उपर्युक्त ) दोष न हों तो वे भी दाय के अधिकारी होते हैं और उनकी पुत्रियों का तब तक भरण - पोषण करना चाहिए जब तक उनका विवाह न हो जाय । ऐसे ( सम्पत्ति के अधिकारी व्यक्तियों ) की पुत्रहीन और साध्वी पत्नियाँ भरण - पोषण की अधिकारिणी होती हैं । किन्तु जो पत्नियाँ व्यभिचारिणी तथा ( अपने पतियों के ) प्रतिकूल हों उन्हें निष्कासित कर देना चाहिए । पिता, पति तथा भाई के द्वारा दिया गया, विवाह के समय प्राप्त या दूसरी स्त्री के साथ पति का विवाह होने पर जो प्राप्त होता है, उसे स्त्रीधन कहते हैं ॥२४-३० ॥ बन्धुओं के द्वारा दिया तथा विवाह के समय शुल्क रूप में प्राप्त स्त्रीधन उस समय उस ( स्त्री ) के बान्धवों को प्राप्त हो जाता है यदि स्त्री सन्तानरहित ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती है । ब्राह्म आदि चार विवाहों से विवाहित तथा सन्तानरहित मरनेवाली स्त्री का धन उसके पति को प्राप्त होता है । यदि वह पुत्रीवती हो तो १ क. ङ. छ. पूर्वस्य ACC - 0. धन JK " Sanskrit । Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA