अग्नि पुराण — पृष्ठ 861–870

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 861–870

पृष्ठ 861

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षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ८५७ त्रैपुरश्चान्धकवधो नवमो वृत्रघातकः । हिरण्यकशिपोश्चोरो विदार्य च नखैः पुरा । देवासुरे वामनश्च च्छलित्वा बलमूर्जितम् । वराहस्तु हिरण्याक्षं हत्वा देवानपालयत् । मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा तु वासुकिम् । तारकामयसङ्ग्रामे तदा देवाश्च पालिताः । विश्वामित्रवशिष्ठात्रिकवयश्च रणे सुरान् । पृथ्वीरथे ब्रह्मयन्तुरीशस्य शरणो हरिः गौरीं जिहीर्षुणा रुद्रमन्धकेनार्दितं हरिः । अपां फेनमयो भूत्वा देवासुररणे हरन् शाल्वादीन्दानवाञ्जित्वा हरिः परशुरामकः ।

हालाहलं विषं दैत्यं निराकृत्य महेश्वरात् ।

जितो हालाहलश्चाथ घोरः कोलाहलो रणः ॥१२ ॥

नारसिंहो देवपालः प्रह्लादं कृतवान्नृपम् ॥१३ ॥

महेन्द्राय ददौ राज्यं काश्यपोऽदितिसंभवः ॥१४ ॥

उज्जहार भुवं मग्नां देवदेवैरभिष्टुतः ॥१५ ॥

सुरासुरैश्च मथितं देवेभ्यश्चामृतं ददौ ॥१६ ॥

निवार्येन्द्रं गुरून्देवान्दानवान्सोमवंशकृत् ॥१७ ॥

अपालयंस्ते निर्वार्य रागद्वेषादिदानवान् ॥१८ ॥

। ददाह त्रिपुरं देवपालको दैत्यमर्दनः ॥१९ ॥

अनुरक्तश्च रेवत्यां चक्रे चान्धासुरार्दनम् ॥ २० ॥

। वृत्रं देववरं विष्णुर्देवधर्मानपालयत् ॥२१ ॥

अपालयत्सुरादींश्च दुष्टक्षत्रं निहत्य च ॥ २२ ॥

भयं निर्णाशयामास देवानां मधुसूदनः ॥ २३ ॥

वृत्रघातक, दसवें का जित, ग्यारहवें का हालाहल और बारहवें का नाम कोलाहल था ॥१० - १२ ॥ प्राचीनकाल में देवताओं के रक्षक नृसिंह ने हिरण्यकशिपु के वक्षःस्थल को नख से फाड़कर प्रह्लाद को राजा बनाया था । देवासुर संग्राम में अदिति से उत्पन्न कश्यप - पुत्र वामन ने बलि को छलकर इन्द्र को राज्य दे दिया था । वाराह ने हिरण्याक्ष को मारकर देवताओं की रक्षा की थी और देवाधिदेव ( इन्द्र ) के द्वारा स्तुति करने पर जलमग्न पृथ्वी का उद्धार किया था ॥१३-१५ ॥ देवताओं और दैत्यों ने मिलकर समुद्र - मन्थन किया था जिसमें मन्दराचल को मथानी और वासुकि को रस्सी बनाया गया था । मन्थन से जो अमृत निकला उसे भगवान् विष्णु ने देवताओं में बाँट दिया । तारकामय संग्राम में हरि ने इन्द्र और बृहस्पति आदि देवों तथा दानवों को युद्ध में हराकर देवताओं की रक्षा की थी । उस रण में विश्वामित्र, वशिष्ठ, अत्रि तथा शुक्र ने राग, द्वेष आदि दानवों का निवारण करके देवताओं की रक्षा की थी ॥१६-१८ ॥ पृथ्वी पर त्रिपुरासुर का महान् अत्याचार होने पर देवपालक, दैत्यनाशक और ब्रह्मा तथा शङ्कर के भी रक्षक भगवान् विष्णु ने उस राक्षस को भस्मसात् कर दिया था । गौरी का हरण करने की इच्छा करनेवाले अन्धकासुर द्वारा पीड़ित शंकर के ऊपर कृपा करके भगवान् विष्णु ने रेवती नक्षत्र में उस राक्षस को मार डाला । देवों और असुरों के युद्ध में भगवान् विष्णु ने जल का फेन बनकर वृत्रासुर का वध किया और इस प्रकार देवताओं के धर्म की रक्षा की ॥१९ -२१ ॥ परशुराम अवतार में भगवान् विष्णु ने शाल्व आदि दानवों को जीतकर और दुष्ट क्षत्रियों का वध करके देवताओं की रक्षा की । मधुसूदन ने शङ्कर से हालाहल विष लेकर दैत्यों के ऊपर प्रयोग किया जिससे देवता अभय हो गये ॥२२-२३ ॥ १ छ. देवहरं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 862

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८५८ अग्निपुराणम् देवासुरे रणे ' यश्च दैत्यः कोलाहलो जित: । पालिताश्च सुराः सर्वे विष्णुना धर्मपालनात् ॥२४ ॥

राजानो राजपुत्राश्च मुनयो देवता हरिः । यदुक्तं यच्च नैवोक्तमवतारा हरेर ॥ २५ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये द्वादशसंख्याकसङ्ग्रामकथनं नाम षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७६ ॥

अथ सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः राजवंशवर्णनम् अग्निरुवाच तुर्वसोश्च सुतो ' वर्गो गोभानुस्तस्य चाऽऽत्मजः । गोभानोरासीत्त्रैशानिस्त्रैशानेस्तु करंधमः करंधमान्मरुत्तोऽभूद्दुष्यन्तस्तस्य ॥१ ॥

चाऽऽत्मजः । दुष्यन्तस्य बरूथोऽभूद्गाण्डीरस्तु बरूथतः ॥ २ ॥

गाण्डीराच्चैव गान्धारः पञ्च जानपदास्ततः । गान्धाराः केरलाश्चोलाः पाण्ड्याः कोला महाबलाः द्रुह्यस्तु ' बभ्रुसेतुश्च बभ्रुसेतोः पुरोवसुः । ततो गान्धारा गान्धारैर्धर्मो ॥३ ॥

धर्माद्धृतोऽभवत् ॥४ ॥

घृतात्तु विदुषस्तस्मात्प्रचेतास्तस्य वै शतम् । अनडुश्च सुभानुश्च चाक्षुषः सुभानोश्च कालानलः परमेषुकः ॥ ५ ॥

कालानलजः सृञ्जयः । पुरंजयः सुञ्जयस्य तत्पुत्रो जनमेजयः ॥६ ॥

देवासुर संग्राम में कोलाहल नामक दैत्य को मारकर भगवान् विष्णु ने धर्म की रक्षा की, जिससे देववृन्द राजपुत्र - समूह और मुनिगण की रक्षा हुई । ये भगवान् विष्णु के अवतार हैं । इनके, राजवृन्द, है और जो कुछ नहीं भी कहा गया है वह सब सम्बन्ध में जो कुछ कहा गया सत्य समझना चाहिए ॥ २४-२५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में द्वादश संग्राम कथन नामक दो सौ छिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥२७६ ॥

अध्याय २७७ राजवंश - वर्णन अग्निदेव बोले - तुर्वसु का पुत्र वर्ग हुआ और उसका पुत्र हुआ गोभानु । गोभानु से त्रैशानि उत्पन्न हुआ ॥१ ॥ करंधम से मरुत्त और दुष्यन्त की उत्पत्ति हुई और त्रैशानि से करंधम

॥२ ॥ गाण्डीर से गान्धार की उत्पत्ति हुई ॥ दुष्यन्त से बरूथ और बरूथ से गाण्डीर उत्पन्न हुआ

तथा कोल । द्रुह्य से वभ्रुसेतु गान्धार के नाम से पाँच सबल देश प्रख्यात हुए - गान्धार, केरल, चोल, पाण्ड्य घृत से विदुष और और वभ्रुसेतु से पुरोवसु की उत्पत्ति हुई । गान्धारी के पुत्र गान्धार ही कहलाये । धर्म से घृत उससे प्रचेता की उत्पत्ति हुई । प्रचेता के अनडु, सुभानु, चाक्षुष, परमेषुक, सुभानु का पुत्र कालानल और कालानल का पुत्र सृञ्जय हुआ आदि सौ पुत्र हुए ॥३-५ ॥ । सृञ्जय का पुत्र पुरञ्जय और उसका पुत्र जनमेजय हुआ । १ क. ङ. ' णे दैत्यं पञ्चजनं जघान ह । पा । २ क. ङ. वंशो । ३ क. ङ. द्रुह्योस्तु CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundatio USA ॥

पृष्ठ 863

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सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ८५ ९ तत्पुत्रस्तु महाशालस्तत्पुत्रोऽभून्महामनाः नरायां तु नरश्चाऽसीत्कृमिस्तु कृमितः सुतः शिवेः पुत्रास्तु चत्वारः पृथुदर्भश्च वीरकः तितिक्षुरुशीनरजस्तिक्षोश्च रुषद्रथः महायोगी बलिस्तस्मादङ्गो वङ्गश्च मुख्यकः ) अङ्गादधिवाहनोऽभूत्तस्माद्दिविरथो नृपः चित्ररथात्सत्यरथो लोमपादश्च तत्सुतः पृथुलाक्षाच्च चम्पोऽभूच्चम्पाद्धर्यङ्गकोऽभवत् तस्मादभूद्बृहद्भानुर्बृहद्भानोर्बृंहात्मवान् बृहद्रथाद्विश्वजिच्च कर्णो विश्वजितोऽभवत् एतेऽङ्गवंशजा भूपाः पुरोर्वंशं निबोध मे इत्यादिमहापुराण आग्नेये राजवंशवर्णनं । तस्मादुशीनरो ब्रह्मन्नृगायां तु नृगस्तत: ॥७ ॥

। दशायां सुव्रतो जज्ञे दृषद्वत्यां शिविस्तथा ॥ ८ ॥

। ( ' कैकेयो भद्रकस्तेषां नाम्ना जनपदाः शुभाः ॥९ ॥

। रुषद्रथादभूत्यैलः पैलाच्च सुतपाः सुतः ॥१० ॥

। पुण्ड्रः कलिङ्गो बालेयो बलिर्योगी बलान्वितः ॥११ ॥

। दिविरथाद्धर्मरथस्तस्य चित्ररथः सुतः ॥१२ ॥

। लोमपादाच्चतुरङ्गः पृथुलाक्षश्च तत्सुतः ॥१३ ॥

। हर्यङ्गाच्च भद्ररथो बृहत्कर्मा च तत्सुतः ॥ १४ ॥

। तस्माज्जयद्रथो ह्यासीज्जयद्रथाद्द्बृहद्रथः ॥१५ ॥

। कर्णस्य वृषसेनस्तु वृषसेनस्तु पृथुसेनस्तदात्मजः ॥१६ ॥ १६ ॥ ॥

॥१७ ॥

नाम सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७७ ॥

जनमेजय का पुत्र महाशाल और उसका पुत्र महामना हुआ । महामना का पुत्र उशीनर हुआ । अये ब्रह्मन्! नृगा से नृग, नरा से नर और कृमि से कृमि की उत्पत्ति हुई । दशा से सुव्रत और दृषद्वती से शिवि की उत्पत्ति हुई ॥६-८ ॥ शिवि के चार पुत्र हुए – पृथुदर्भ, वीरक, कैकेय और भद्रक । उनके नामों से चार पवित्र देश प्रसिद्ध हुए । उशीनर का पुत्र तितिक्षु, तितिक्षु का रुषद्रथ, रुषद्रथ का पैल और पैल का पुत्र सुतपा हुआ ॥९ - १० ॥ सुतपा से महायोगी बलि, बलि से अंग, वंग, पुण्ड्र, कलिंग तथा बालेय की उत्पत्ति हुई । अंग से दधिवाहन और उससे राजा दिविरथ, धर्मस्थ से चित्ररथ की उत्पत्ति हुई । चित्ररथ से सत्यरथ और सत्यरथ से लोमपाद की उत्पत्ति हुई । चतुरंग से पृथुलाक्ष, पृथुलाक्ष का चम्प, चम्प का हर्यङ्ग, हर्यङ्ग का भद्ररथ, भद्ररथ का बृहत्कर्मा बृहद्भानु का बृहात्मवान्, बृहात्मवान् का जयद्रथ, जयद्रथ का कर्ण, कर्ण का विषसेन और

हुआ । यह सभी राजा अंग वंश में हुए थे । अब पुरुवंश का वर्णन सुनो ॥११-१७ ॥

श्री अग्निमहापुराण में राजवंश वर्णन नामक दो सौ सतहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥२७७ ॥

दिविरथ से धर्मरथ और लोमपाद का पुत्र चतुरंग, , बृहत्कर्मा का बृहद्भानु, विषसेन का पुत्र पृथुसेन १ कैकेयो मुख्यकः क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 864

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८६० अग्निपुराणम् अथाष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पुरुवंशवर्णनम् अग्निरुवाच पुरोर्जनमेजयोऽभूत्प्राचीवान्नाम तत्सुतः । प्राचीवतो मनस्युस्तु तस्माद्वीतमयो नृपः ॥१ ॥

शुन्धुर्वीतमयाच्चाभूच्छुन्धोर्बहुविधः सुतः । बहुविधाच्च संयाती रहोवादी च तत्सुतः ॥२ ॥

तस्य पुत्रोऽथ भद्राश्वो भद्राश्वस्य दशाऽऽत्मजाः । ऋचेयुश्च कृषेयुश्च संतनेयुस्तथाऽऽत्मजः ॥३ ॥

घृतेयुश्च चितेयुश्च स्थण्डिलेयुश्च सत्तमः । धर्मेयुः सन्नतेयुश्च कृतेयुर्मतिनारकः ॥४ ॥

तंसुरोधः प्रतिरथः पुरस्तो मतिनारजाः । आसीत्प्रतिरथात्कण्वः कण्वान्मेधातिथिस्त्वभूत् ॥५ ॥

तंसुरोधाच्च चत्वारो दुष्यन्तोऽथ प्रवीरकः । सुमन्तश्चानयो वीरो दुष्यन्ताद्भरतोऽभवत् ॥६ ॥

शकुन्तलायां तु बली यस्य नाम्ना तु भारताः । सुतेषु मातृकोपेन ( ण ) नष्टेषु भरतस्य च ॥७ ॥

ततो मरुद्भिरानीय पुत्रः स तु बृहस्पतेः । संक्रामितो भरद्वाजः क्रतुभिर्वितथोऽभवत् ॥८ ॥

स चापि वितथः पुत्राञ्जनयामास पञ्च वै 1 । सुहोत्रं च सुहोतारं गयं गर्भं तथैव च ॥९ ॥

कपिलं च महात्मानं सुकेतुं च सुतद्वयम् । कौशिकं च गृत्सपतिं तथा गृत्सपतेः सुताः ॥१० ॥

अध्याय २७८ पुरुवंश - वर्णन अग्निदेव बोले - पुरु का पुत्र जनमेजय हुआ और उसका पुत्र प्राचीवान् । प्राचीवान् का पुत्र मनस्यु और उसका पुत्र वीतमय नामक राजा हुआ ॥१ ॥ वीतमय से शुन्धु, शुन्धु से बहुविध, बहुविध से संयाती, संयाती से रहोवादी

और रहोवादी से भद्राश्व की उपत्ति हुई । भद्राश्व के दस पुत्र हुए- ऋचेयु, कृषेयु, संनतेयु, घृतेयु, चितेयु, स्थण्डिलेयु, धर्मेयु, सन्नतेयु, कृतेयु तथा मतिनारक हैं ॥ २-४ ॥ मतिनारक के तंसुरोध, प्रतिरथ तथा पुरस्त नामक पुत्र हुए । प्रतिरथ से कण्व और कण्व से मेधातिधि का जन्म हुआ । तंसुरोध के दुष्यन्त, प्रवीरक, सुमन्त तथा वीरअनय नामक पुत्र हुए । दुष्यन्त से भरत उत्पन्न हुए || ५-६ ॥ दुष्यन्त और शकुन्तला से बलवान् भरत उत्पन्न हुए, जिनके चार से भारत वंश ( देश ) प्रसिद्ध हुआ । माता के कोप के कारण भरत के पुत्रों के नष्ट हो जाने पर मरुतों ने उसे बृहस्पति नाम का पुत्र लाकर दे दिया । जिसका नाम था भरद्वाज । भरद्वाज ने यज्ञों के द्वारा वितथ को उत्पन्न किया ॥७-८ से पाँच पुत्रों की उत्पत्ति हुई, जिनके नाम थे- सुहोत्र, सुहोता, गय, गर्भ तथा महात्मा कपिल ॥ वितथ तथा गृत्सपति नामक दो पुत्रों को उत्पन्न किया । गृत्सपति के ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा । सुहोत्र ने कौशिक वैश्य पुत्र हुए, जिनकी संज्ञा दीर्घतमा १ क. ख. ङ. गर्गं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 865

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अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ८६१ ब्राह्मणाः क्षत्रियाः वैश्याः ' काशा दीर्घतमाः सुताः । केतुमतो हेमरथो दिवोदास इति श्रुतः । वत्सादनर्क आसीच्च अनर्कात्क्षेमकोऽभवत् । विभोरानर्तः पुत्रोऽभूद्विभोश्च सुकुमारकः । सुहोत्रस्य बृहत्पुत्रो बृहतस्तनयास्त्रयः । अजमीढस्य केशिन्यां जज्ञे जनुः प्रतापवान् । वलाकाश्वस्य कुशिकः कुशिकाद्गाधिरिन्द्रकः । देवरातः कतिमुखा विश्वामित्रस्य ते सुताः । नीलिन्यां शान्तिपरः पुरुजातिः सुशान्तितः । मुकुलः सृञ्जयश्चैव राजा बृहदिषुस्तथा । मुकुलस्य तु मौकुल्याः ' क्षात्रोपेता द्विजातयः । दिवोदासो ह्यहल्या च अहल्यायां शरद्वतात् ।

कृपः कृपी दिवोदासान्मैत्रेयः सोमपस्ततः ।

ततो धन्वन्तरिश्चाऽऽसीत्तत्सुतोऽभूच्चकेतुमान् ॥११ ॥

प्रतर्दनो दिवोदासाद्भर्गवत्सौ प्रतर्दनात् ॥१२ ॥

क्षेमकाद्वर्षकेतुश्च वर्षकेतोर्विभुः स्मृतः ॥ १३ ॥

सुकुमारात्सत्यकेतुर्वत्सभूमिस्तु वत्सकात् ॥१४ ॥

अजमीढो द्विमीढश्च पुरुमीढश्च वीर्यवान् ॥ १५ ॥

जह्नेोरभूदजकाश्वो बलाकाश्वस्तदात्मजः ॥१६ ॥

गाधेः सत्यवती कन्या विश्वामित्रः सुतोत्तमः ॥१७ ॥

शुनः शेपोऽष्टकश्चान्यो ह्यजमीढात्सुतोऽभवत् ॥१८ ॥

पुरुजातेस्तु बाह्याश्वो बाह्याश्वात्पञ्च पार्थिवाः ॥१९ ॥

यवीनरश्च कृमिलः पाञ्चाला इति विश्रुताः ॥ २० ॥

चञ्चाश्वो मुकुल्ला ( ला ) ज्जज्ञे चञ्चाश्वान्मिथुनंह्यभूत् ॥२१ ॥

शतानन्दः शतानन्दात्सत्यधृ‌मिथुनं ततः ॥ २२ ॥

सृञ्जयात्पञ्चधनुषः सोमदत्तश्च तत्सुतः ॥ २३ ॥

है । दीर्घतमा से धन्वन्तरि की उत्पत्ति हुई । धन्वन्तरि का पुत्र केतुमान् हुआ ॥९ - ११ ॥ केतुमान् से हेमरथ और उससे दिवोदास का जन्म हुआ । दिवोदास से प्रतर्दन और प्रतर्दन से भर्ग तथा वत्स की उत्पत्ति हुई । वत्स से अनर्क, अनर्क से क्षेमक, क्षेमक से वर्षकेतु, वर्षकेतु से विभु, विभु से आनर्त, आनर्त से सुकुमारक और सुकुमारक से सत्यकेतु उत्पन्न हुआ । वत्सक ने वत्सभूमि को उत्पन्न किया ॥१२- १४ ॥ सुहोत्र का पुत्र बृहत् हुआ । बृहत् के तीन पुत्र हुए अजमीढ़, द्विमीढ़ और पराक्रमी पुरुमीढ़ । अजमीढ़ से केशिनी के प्रतापी जह्नु उत्पन्न हुआ । जह्रु से अजकाश्व और उससे बलाकाश्व नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । बलाकाश्व से कुशिक और कुशिक से गाधि की उत्पत्ति हुई । गाधि की कन्या सत्यवती और पुत्र विश्वामित्र हुए ॥१५-१७ ॥ विश्वामित्र के पुत्र देवरात, कतिमुख तथा शुनः शेप हुए । अजमीढ़ के आठ पुत्र और थे । उसने अपनी नलिनी नामक स्त्री से शान्ति को जन्म दिया । शान्ति से पुरुजाति और पुरुजाति से बाह्याश्व की उत्पत्ति हुई, बाह्याश्व के पाँच पुत्र हुए- मुकुल, सृञ्जय, बृहदिषु, यवीनर और कृमिल । ये पाँचों पाञ्चाल नाम से प्रख्यात हैं ॥१८-२० ॥ मुकुल के क्षात्र धर्म से युक्त द्विजाति पुत्र मौकुल्य कहलाये । मुकुल से चञ्चाश्व उत्पन्न हुआ । चञ्चाश्व से दिवोदास तथा अहल्या की उत्पत्ति हुई । अहल्या ने शरद्वान् से शतानन्द को जन्म दिया । शतानन्द से सत्यधृक् उत्पन्न हुआ । सत्यधृक् के कृप और कृपी नामक दो सन्तानें हुईं । दिवोदास से मैत्रेय और मैत्रेय से सोमप की उत्पत्ति हुई । सृञ्जय से पञ्चधनुष और उससे सोमदत्त का जन्म हुआ ॥२१-२३ ॥ सोमदत्त से सहदेव, १ ङ. काशे । २ ख. चू. मागल्या it Academy ३ छ. क्षेत्रोपेता , Jammmu ।. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 866

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८६२ अग्निपुराणम् सहदेवः सोमदत्तात्सहदेवात्तु सोमकः पृषतादद्रुपदस्तस्माद्धृष्टद्युम्नोऽथ तत्सुतः । ऋक्षात्संवरणो जज्ञे कुरुः संवरणात्ततः । कुरोः सुधन्वा सुधनुः परीक्षिच्च रिपुंजयः । ' वसुश्रेष्ठोपरिचाराः सप्ताऽऽसन्गिरिकासुता: । मत्स्यकाली कुशाग्रोऽतो ह्यासीद्राज्ञो बृहद्रथात् । सुधन्वा तत्सुतश्चोर्ज ऊर्जादासीच्च संभवः । सहदेवादुदापिश्च उदापेः श्रुतकर्मकः । जनमेजयात्रसद्दस्युर्जह्नोस्तु सुरथः सुतः । जनमेजयस्य पुत्रौ तु सुरथो महिमांस्तथा । ऋक्षस्य तु द्वितीयस्य भीमसेनोऽभवत्सुतः । देवापिर्बाह्निकश्चैव सोमदत्तस्तु शंतनोः । गङ्गायां शंतनोर्भीष्मः काल्यायां ` चित्रवीर्यकः । धृतराष्ट्रं च पाण्डुं च विदुरं चाप्यजीजनत् । नकुलः सहदेवश्च पाण्डोर्माद्र्यां च दैवतः ॥ आसीच्च सोमकाज्जन्तुर्जन्तोश्च पृषतः सुतः ॥२४ ॥

धृष्टकेतुश्च धूमिन्यामृक्षोऽभूदजमीढतः ॥२५ ॥

यः प्रयागादपाक्रम्य कुरुक्षेत्रं चकार ह ॥ २६ ॥

सुधन्वनः सुहोत्रोऽभूत्सुहोत्राच्च्यवनो ह्यभूत् ॥ २७ ॥

बृहद्रथः कुशो वीरो यदुः प्रत्यग्रहो बलः ॥ २८ ॥

कुशाग्राद्वृषभो जज्ञे तस्य सत्यहितः सुतः ॥ २ ९ ॥ संभवाच्च जरासंधः सहदेवश्च तत्सुतः ॥ ३० ॥

परीक्षितस्य दायादो धार्मिको जनमेजयः ॥ ३१ ॥

श्रुतसेनोग्रसेनौ च भीमसेनश्च नामतः ॥३२ ॥

सुरथाद्विदूरथोऽभूदृक्ष आसीद्विदूरथात् ॥३३ ॥

प्रतीपो भीमसेनात्तु प्रतीपस्य तु शंतनुः ॥ ३४ ॥

बाह्निकात्सोमदत्तोऽभूद्भूरिर्भूरिश्रवाः शलः ॥३५ ॥

कृष्णद्वैपायनश्चैव क्षेत्रे वै चैत्रवीर्यके ॥ ३६ ॥

पाण्डोर्युधिष्ठिरः कुन्त्यां भीमश्चैवार्जुनस्त्रयः ॥३७ ॥

अर्जुनस्य च सौभद्रः परीक्षिदभिमन्युतः ॥३८ ॥

सहदेव से सोमक, सोमक से जन्तु, जन्तु से पृषत, पृषत से द्रुपद और द्रुपद से धृष्टद्युम्न की उत्पत्ति हुई । धूमिनी से धृष्टकेतु का जन्म हुआ । अजमीढ़ का पुत्र ऋक्ष हुआ । ऋक्ष से संवरण और संवरण से कुरु उत्पन्न हुआ, जिसने प्रयाग से आकर कुरुक्षेत्र का निर्माण किया || २४ - २६ ॥ कुरु से सुधन्वा, सुधनु से परीक्षित् तथा रिपुंजय की उत्पत्ति हुई । सुधन्वा से सुहोत्र और सुहोत्र से च्यवन उत्पन्न हुआ । गिरिका के सात पुत्र हुए- बृहद्रथ वीर, यदु, प्रत्यग्रह, बल तथा मत्स्यकाली । राजा बृहद्रथ से कुशाग्र का जन्म हुआ । कुशाग्र से वृषभ, कुश, सत्यहित की उत्पत्ति हुई ॥२७-२९ ॥ सत्यहित से सुधन्वा, सुधन्वा से ऊर्ज, ऊर्ज से सम्भव, सम्भव से और जरासंध उससे जरासंध से सहदेव, सहदेव से उदापि और उदापि से श्रुतकर्मक का जन्म हुआ । परीक्षित् का पुत्र धर्मात्मा, हुआ ॥३०-३१ ॥ जनमेजय से ऋसद्दस्यु की उत्पत्ति हुई । जह्नु के पुत्र थे- सुरथ, श्रुतसेन, उग्रसेन और जनमेजय भीमसेन । जनमेजय के दो पुत्र हुए सुरथ और महिमान् । सुरथ से विदूरथ और विदूरथ से ऋक्ष की उत्पत्ति का पुत्र भीमसेन, भीमसेन का प्रतीप, प्रतीप का शन्तनु और शन्तनु के पुत्र देवापि हुई । ऋक्ष से सोमदत्त, भूरि, भूरिश्रवा तथा शल की उत्पत्ति हुई ॥३२-३५ ॥ शन्तनु, बाह्लिक तथा सोमदत्त । बाह्लिक को जन्म दिया । चित्रवीर्य की पत्नी से कृष्णद्वैपायन ने गंगा से भीष्म और काल्या से चित्रवीर्य पत्नी कुन्ती से युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर को उत्पन्न किया । पाण्डु की पुत्र अभिमन्यु, भीम तथा अर्जुन की उत्पत्ति हुई और माद्री से नकुल तथा सहदेव की । अर्जुन का और अभिमन्यु का पुत्र परीक्षित् हुआ ॥३६-३८ ॥ द्रौपदी पाण्डवों की प्रियतमा थी । उसमें युधिष्ठिर १ छ. वशिष्ठपरिचाराभ्यां CC - 0. स JK । Sanskrit २ छ. Academy विचित्रवीर्यकः , Jammmu ।. Digitized छत्रे by, वै, चित्र ख देवतः ।

पृष्ठ 867

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अग्निपुराणम् ८६३ द्रौपदी पाण्डवानां च प्रिया तस्यां युधिष्ठिरात् । प्रतिविन्ध्यो भीमसेनाच्छुतकीर्तिर्धनंजयात् ॥३९ ॥

सहदेवाच्छुतसोमः ' शतानीकस्तु नाकुलिः ॥ भीमसेनाद्धिडम्बायामन्य आसीद्घटोत्कचः || ४० || एते भूता भविष्याश्च नृपाः संख्या न विद्यते । गताः कालेन कालो हि हरिस्तं पूजयेद्विज ॥ होममग्नौ समुद्दिश्य कुरु सर्वप्रदो यतः ॥४१ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये पुरुवंशवर्णनं नामाष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७८ ॥

अथैकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः सिद्धौषधानि अग्निरुवाच आयुर्वेदं प्रवक्ष्यामि सुश्रुताय यमब्रवीत् ॥ देवो धन्वन्तरिः सारं मृतसंजीवनीकरम् ॥१ ॥

सुश्रुत उवाच ( आयुर्वेदं मम ब्रूहि नराश्वेभरुगर्दनम् । सिद्धयोगान्सिद्धमंत्रान्मृतसंजीवनीकरान् ) ॥२ ॥

धन्वन्तरिरुवाच रक्षन्बलं हि ज्वरितं लङ्घितं योजयेद्भिषक् । सर्विश्वं लाजमण्डं तु तृड्ज्वरान्तं शृतं जलम् ॥३ ॥

से प्रतिविन्ध्य, भीमसेन से ( सुतसोम ) *, अर्जुन से श्रुतकीर्ति, सहदेव से श्रुतसोम और हुई । भीमसेन ने हिडम्बा से घटोत्कच नामक अन्य पुत्र को भी उत्पन्न किया । अये और होते रहेंगे । इनकी कोई संख्या नहीं है । इनको काल ने कवलित कर लिया है । करके और उनके निमित्त अग्नि में आहुतियाँ डालनी चाहिए, क्योंकि वे सब - कुछ श्री अग्निमहापुराण में पुरुवंश वर्णन नामक दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय अध्याय २७ ९ सिद्धौषध - वर्णन नकुल से शतानीक की उत्पत्ति द्विज! ये सब राजा हो गये हैं काल ही हरि हैं । उनकी पूजा देनेवाले हैं ॥३९ -४१ ॥ समाप्त ॥२७८ ॥

अग्निदेव बोले - देव धन्वन्तरि ने मृतकों को जीवित करनेवाले जिस आयुर्वेद को सुश्रुत के लिए कहा था उस आयुर्वेद को सार रूप में कहूँगा ॥ १ ॥

सुश्रुत बोले- मृतकों को जीवित करनेवाले सिद्ध योगों एवं सिद्ध मन्त्रों तथा मनुष्य, अश्व एवं हस्ती के रोगों को नष्ट करनेवाले आयुर्वेद को आप मुझसे कहिये ॥२ ॥

धन्वन्तरि बोले - ज्वर से पीड़ित व्यक्ति के बल की रक्षा करने के लिए धान का लावा, सोंठ और माँड़ के १ क. ङ. तशर्मा श ° । ख. ग. छ. " तकर्माः श ' । २ ख. ग. ङ. छ. सर्वप्रदं । * मूल में भीमसेन के पुत्र का नामोल्लेख नहीं है, परन्तु महाभारत के अनुसार उसे यहाँ दे दिया गया । * ३ क. ङ. च. छ. " तं भोज ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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८६४ अग्निपुराणम् मुस्तपर्पटकोशीरचन्दनोदीच्यनागरैः स्नेहयेत्त्यक्तदोषं तु ततस्तं च विरेचयेत् तद्विधास्ते ज्वरेष्विष्टा यवानां विकृतिस्तथा ' आढक्यो लावकाद्याश्च ` कर्कोटककटोलकम् ' अधोगे वमनं शस्तमूर्ध्वगे च विरेचनम् सक्तुगोधूमलाजाश्च यवशालिमसूरकाः साधिता घृतदुग्धाभ्यां क्षौद्रं वृषरसो मधु अनभिष्यन्दि यच्चान्नं लोध्रवल्कलसंयुतम् वाट्यं क्षीरेण चाश्नीयाद्वास्तुकं घृतसाधितम् गोधूमशालयो मुद्गा ब्रह्मर्क्षखदिरोऽभया ' मातुलुङ्गरसाजाजिशुष्कमूलकसैन्धवाः साथ देवे । नागरमोथा, पित्तपापड़ा, खश, लालचन्दन । षडहे च व्यतिक्रान्ते तिक्तकं पापयेद्ध्रुवम् ॥ ४ ॥

॥ जीर्णाः षष्टिकनीवाररक्तशालिप्रमोदकाः ॥५ ॥

। मुद्गा मसूराश्चणकाः कुलत्थाश्च सकुष्ठकाः ॥६ ॥

। पटोलं सुफलं निम्बं पर्पटं दाडिमं ज्वरे ॥ ७ ॥

। रक्तपित्ते तथा पानं षडङ्गंशुण्ठिवर्जितम् ॥८ ॥

। सकुष्ठचणका मुद्गा भक्ष्या गोधूमका हिताः ॥ ९ ॥

। अतीसारे पुराणानां शालीनां भक्षणं हितम् ॥ १० ॥

। मारुतं वर्जयेद्यत्नः कार्यो गुल्मेषु सर्वथा ॥ ११ ॥

। गोधूमशालयस्तिक्ता हिता जठरिणामथ ॥ १२ ॥

। पञ्चकोलं जाङ्गलाश्च निम्बधात्र्यः पटोलकाः ॥१३ ॥

। कुष्ठिनां च तथा शस्तं पानार्थे खदिरोदकम् ॥१४ ॥

, सुगन्धवाला एवं सोंठ से पका हुआ जल तृषा तथा ज्वर - नाश के हेतु पीने को दे । छह दिन बीत जाने पर चिरायता का काढ़ा पिलावे ॥३ - ४ ॥ निर्दोष ज्वरांश न स्पर्श होने पर स्नेह ( ज्वरनाशक ओषधियों से सिद्ध ) स्नेह घृत या तेल पान करावे । इसके पश्चात् विरेचन कराये । ( भोजन के लिए ) पुराना साठी का चावल, नीवार ( एक प्रकार का धान जो जल में स्वयं उत्पन्न होता है ) लाल चावल, शालि चावल ( उत्तम कोटि का बासमती जैसा ) प्रमोदक ( चावल का एक भेद ) एवं इसी प्रकार का अन्य चावल ज्वर में खिलाने के लिए हितकर हैं । यव की रोटी, माँड़, सत्तू आदि भी हितकर हैं । मूँग, मसूर, चना, कुलथी, मोथी ( मोट ), अरहर, लावा आदि पक्षियों के मांस का रस, करेला, खेकशा, परवल, कुन्दरू, निम्बपत्र का साग, पित्तपापड़ा और अनार ज्वर में दे ॥५-७ ॥ रक्त पित्त के अध: मार्ग ( गुदा, लिंग, योनि ) से उद्भूत होने पर वमन करावे और ऊर्ध्वमार्ग ( मुख, नासिका, अक्षि एवं कर्ण ) से उद्भूत होने पर रोगी को विरेचन दे और नागरमोथा, पित्तपापड़ा, खश, लालचन्दन और सुगन्धवाला का काढ़ा पिलावे || ८ || सत्तू, गेहूँ, धान का लावा, यव, शालि ( उत्तम प्रकार का चावल ), मसूर, मोथी, चना, मूँग और गेहूँ का भोजन हितकर है । घृत एवं दुग्ध में अडूसे का स्वरस पकाकर ( और उसे ठण्डा करके ) उसमें मधु पिलाकर पीने को दे ।९ - ९ ३ ॥ अतिसार में पुराना चावल खाने के लिए दे एवं जो भी अन्न अनभिष्यन्दि ( कब्जियत ) करनेवाले न हों वह खाने को दे । इसमें लोधवृक्ष के छाल का काढ़ा दे । गुल्म रोग ( वायुगोला ) में वायु से रक्षा करे ( अर्थात् वातकारक आहार - विहार न करे ), उदर रोग में - दूध एवं फुलका ( जवे की बहुत ही पतली रोटी ) घृत में बथुई का साग पकाकर खाये । गेहूँ तथा चावल भोजन में दे और कुटकी ( सदा विरेचन के लिए ) का काढ़ा दे ॥१०-१२ ॥ कुष्ठ रोग में गेहूँ, चावल, मूँग, आँवला, खैर और हरड़, पंचकोल ( पिप्पली, पिपरामूल, चव्य, चित्रक और सोंठ ), जंगली पशुओं का मांस, निम्ब ( नीम का पाँचों अंग-जैसे त्वचा, पत्र, पुष्प, फल और सार ), तीनों आँवले ( पहाड़ी, जमीन का और कलमी ), परवल के पत्र, बिजौरे नींबू का रस, काला जीरा, सूखी मूली ( जड़ ), सैन्धव नमक, खदिरोदक ( खैर ) का काढ़ा अथवा खदिरारिष्ट देना १ छ. " क्यो नारका । २ क. ङ. कठिलक । ३ छ. टोल्वकम् । ४ छ... ज्ञातिशुः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundationf

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एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः मसूरमुद्गौ ' सूपार्थे भोज्या जीर्णाश्च शालयः । विडङ्गं मरिचं मुस्तं कुष्ठं लोध्रं सुवर्चिका । अपूपकुष्ठकुल्माषयवाद्य मेहिनां हिताः । तिक्तरूक्षाणि शाकानि तिक्तानि हरितानि च ।

मुद्गाः सयवगोधूमा धान्यं वर्षस्थितं च यत् ।

कुलत्थमुद्गकोलाद्यैः शुष्कमूलकजाङ्गलैः ॥

मातुलुङ्गरसक्षौद्रद्राक्षाव्योषादिसंस्कृतैः । दशमूलबलारास्नाकुलत्थैरूपसाधिताः । शुष्कमूलककौलत्थमूलजाङ्गलजै रसैः । शोथवान्सगुडां पथ्यां खादेद्वा गुडनागरम् । पुराणयवगोधूमशालयो जाङ्गलो रसः । ८६५ निम्बपर्पटको शाकौ जाङ्गलानां तथा रसः ॥१५ ॥

मनः शिला ' वचा लेपः कुष्ठहा मूत्रपेषितः ॥१६ ॥

यवान्नविकृतिर्मुद्गाः कुलत्था जीर्णशालयः ॥१७ ॥

तैलानि तिलशिग्रुकविभीतकेङ्गदानि च ॥ १८ ॥

जाङ्गलस्य रसः शस्तो भोजने राजयक्ष्मिणाम् ॥१९ ॥

पूपैर्वा विष्किरैः सिद्धैर्दधिदाडिमसाधितैः ॥२० ॥

यवगोधूमशाल्यन्नैर्भोजयेच्छ्वासकासिनम् ॥२१ ॥

पेया घृतरसक्वाथाः श्वासहिक्कनिवारणाः ॥ २२ ॥

यवगोधूमशाल्यन्नं जीर्णं सोशीरमाचरेत् ॥२३ ॥

तक्रं च चित्रकश्चोभौ ग्रहणीरोगनाशनौ ॥२४ ॥

मुद्गामलकखर्जूरमृद्वीका बदराणि च ॥२५ ॥

चाहिए । भोजन में मसूर और मूँग का जूस, बासमती चावल का भात, निम्ब पत्र, पटोल - पत्र का शाक, जंगली पशु-पक्षियों का रस देना चाहिए । लेपन के लिए - वायविडंग, मरिच, नागरमोथा, कूठ, लोध्र, हुरहुर, मैनशिल और वच के साथ गोमूत्र का प्रयोग करे ॥ १३ - १६ ॥ प्रमेही को यव का अपूप पूआ बनाकर खिलावे एवं यव के अन्य पदार्थ बनाकर खाने को दे । कूठ, कुलथी का भी अनेक प्रकार से अपूप आदि बनाकर दे । भोजन में मूँग एवं कुलथी की दाल, पुराना शाली चावल का भात दे । हरे, तिक्त एवं रुक्ष शाक खाने को दे । ( जैसे करेला ) तिल, सहिजन, बहेड़ा एवं इंगुदी के तेल का प्रयोग करे । राजयक्ष्मा के रोगी को भोजन के लिए एक वर्ष का पुराना यव एवं गेहूँ की रोटी तथा मूँग की दाल दे । जंगली पशु एवं पक्षियों का मांस का रस भी दे ॥ १७-१९ ॥ श्वास कास रोग में रोगी को भोजन के लिए कुलथी, मूँग, सूखा बेर, सूखी मूली और जंगली पशु - पक्षियों के मांस से पूआ बना ले, उसे दधि में भिगो दे और उसमें अनार का रस, बिजौरे नींबू का रस, मधु, मुनक्का, सोंठ, मिर्च, पीपरि मात्रा के अनुसार मिलाकर दे । जवा, गेहूँ तथा बासमती चावल भी खाने को दे । श्वास एवं हिक्का रोग में रोगी को जो पेय मण्डभेद बनाकर या घृत पकाकर या काढ़ा बनाकर दे उसे दशमूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, छोटी कटेरी - भटकैया, बड़ी कटेरी - वनभाँटा, गोखरू, आलू, अरणी, पाढ़, खंभारी और बेल का गूदा ), बला ( वरिअरा ), रास्ना एवं कुलथी ओषधियों से सिद्ध करके दे ॥२०-२२ ॥ शोथ रोगवाले को भोजन के लिए पुराना जवा, गेहूँ और बासमती चावल को सूखी मूली, कुलथी, पुनर्नवा की जड़ तथा जंगली पशु - पक्षियों के मांस रस से पकाकर दे अथवा गुड़ - हरड़ या गुड़ - सोंठ को खिलावे । ग्रहणी रोग का नाश करनेवाला मट्ठा एवं चित्रक दोनों ही हैं ॥ २३-२४ ॥ वातरोगी के लिए पुराना जवा, गेहूँ तथा बासमती चावल का भात और जंगली पशु - पक्षियों का मांस रस भोजन के लिए दे । मूँग की दाल पकाकर १ क. ङ. छ. पेयार्थं । २ छ ला च वालेयः Academy ।, ३. Famimimu छ. पेयाः . Digitized पपरसाः by S3 क्वा Foundation da USA ५५

पृष्ठ 870

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८६६ अग्निपुराणम् मधु सर्पिः पयस्तक्रं निम्बपर्पटको वृषम् । द्रोगिणो बिरेच्यास्तु पिप्पल्या ( ल्यो ) हिक्किनां हिताः । ' मुस्ता सौवर्चलाऽजाजी ' मद्यं शस्तं मदात्यये । क्षयं मांसरसाहारो वह्निसंरक्षणाज्जयेत् । यवान्नविकृतिर्मांसं शाकं सौवर्चलं शटी । मुस्ताभ्यासस्तथा लोपश्चित्रकेण हरिद्रया । ऋषुषैर्वारु ( १ ) गोधूमाः क्षीरेक्षुघृतसंयुताः । लाजाः सक्तुस्तथा क्षौद्रं शून्यं मांसं परूषकम् । शाल्यन्नं तोयपयसी केवलोष्णे शृतेऽपि वा । यवान्नविकृतिः पूपं शुष्कमूलकजं तथा । मुद्गाढकमसूराणां सतिलैर्जाङ्गलै रसैः । उसमें आँवला, खजूर, मुनक्का और बेर डाल दे । मधु, तक्रारिष्टाश्च शस्यन्ते सततं वातरोगिणाम् ॥२६ ॥

तक्रारनालसीधूनि युक्तानि शिशिराम्भसा ॥ २७ ॥

सक्षौद्रपयसा लाक्षां पिबेच्च क्षतवान्नरः ॥२८ ॥

शालयो भोजने रक्ता नीवारकमलादयः ॥२९ ॥

पथ्या तथैवार्शसां यन्मण्डस्तक्रं च वारिणा ॥ ३० ॥

यवान्नविकृतिः शालिवास्तूकं ससुवर्चलम् ॥ ३१ ॥

मूत्रकृच्छ्रे च शस्ताः स्युः पाने मण्डसुरादयः ॥३२ ॥

वार्ताकुलावशिखिनश्छर्दिघ्नाः पानकानि च ॥ ३३ ॥

तृष्णाघ्ने मुस्तगुडयोर्गुटिका वा मुखे धृता ॥ ३४ ॥

शाकं पटोलवेत्राग्रमूरुस्तम्भविनाशनम् ॥ ३५ ॥

ससैन्धवघृतद्राक्षाशुण्ठ्याम ( ल ) ककोलजैः ॥३६ ॥

घृत, मट्ठा, तक्रारिष्ट, दुग्ध एवं नीम, पित्तपापड़ा और अडूसा का निरन्तर सेवन करावे । हृदय रोगवाले को रोचक ओषधि ( जुलाब ) दे । हिक्का के रोगी को तीनों प्रकार की पीपरि, मट्ठा, काजी और आसव में ठण्डा जल मिलाकर दे ॥ २५-२७ ॥ मदात्यय ( मद्य अत्यधिक पीने से होनेवाले ) रोग में नागरमोथा, सोंचर और कालाजीरा मिलाकर मद्य ही दे । ( रुक्ष मद्य के पीने से उत्पन्न मदात्यय में स्निग्ध मद्य तथा स्निग्ध मद्य के पीने से उत्पन्न मदात्यय में रुक्ष मद्य उपर्युक्त तीनों ओषधि मिलाकर पीने को दे ), उरःक्षत ( राजयक्ष्मा का एक भेद ) में दुग्ध में लाख और मधु मिलाकर दे । क्षय ( राजयक्ष्मा ) रोग को जठराग्नि की रक्षा करते हुए मांस रस के आहार से शान्त करे । क्षय रोगी को भोजन में बासमती चावल, लाल चावल, कलमी चावल आदि लघु आहार पकाकर दे ॥२८-२९ ॥ अर्श ( बवासीर ) के रोगी को जवा के बने विविध प्रकार के आहार मांस रस के साथ दे । हुरहुर के पत्ते का शाक खिलावे । कचूर एवं हरड़ का चूर्ण मण्ड से या मट्ठे से जल के साथ दे । नागरमोथा के काढ़े को निरन्तर पिलावे । चित्रक एवं हल्दी एक में पीसकर बवासीर के मस्से पर लेप करे । मूत्रकृच्छ्र ( जिसे पेशाब कठिनाई से उतरे तथा पीड़ा हो ऐसे ) रोग में खीरा, पपीता खाने को दे । गेहूँ की रोटी दे इनके साथ ही दूध पीने को दे, गन्ना चूसने को दे, आहार में घृत दे । पीने के लिए मण्ड एवं सुरा आदि दे ॥३०-३२ ॥ धान का लावा, सतुआ, मधु, हल्का मांस, फालसा, मोटा लावा पक्षी का मांस, मयूर का मांस और पना ये सब वमन रोग के नाशक हैं । तृषा ( जिससे बार - बार अधिक जल पीने पर भी प्यास शान्त नहीं होती है ) ऐसे रोग में भोजन के लिए बासमती का चावल दे, दूध और पानी बराबर हिस्से में मिलाकर पका ले, जब थोड़ा - थोड़ा गरम रहे तब पीने को दे या नागरमोथा और गुड़ को पीसकर गोली बनाकर मुख में धारण करे । उरुस्तम्भ ( जिसमें दोनों शून्य हो जाते हैं ऐसे ) रोग का नाश करने के लिए जवे के बने अनेक प्रकार के भोजन और सूखी मूली का पूआ, पटोल एवं बेल के पत्ते का साग दे ॥३३-३५ ॥ विसर्प रोगवाले को चाहिए कि पुराने गेहूँ तथा जवा की रोटी, बासमती चावल का भात, १ छ. मुक्ताः । २ CCC छ -. 0. जादिम JK ' Sanskrit ' । Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA